मुक्ति का द्वार है | सम्पूर्णानंद मिश्र

मुक्ति का द्वार है | सम्पूर्णानंद मिश्र

स्त्री
हाड़, मांस,
और लोथड़े से निर्मित
सिर्फ़ एक देह नहीं है

जिसके लोथड़े को
नोंच लिया जाय
जब चाहे
और उसकी हड्डियों को
गली के
अन्यान्य कुत्तों के लिए
छोड़ दिया जाय

वह
एक आत्मा है
जो मुक्कमल शरीर में बसती है

जिस दिन
यह निकल जाय
पूरी गृहस्थी रोती है

ओढ़ती है जो
दु:खों की फटी चादर

लेकिन
अपने दु:खों के
आंसुओं के छींटों से
पुत्रों को नहीं भिगोती

उजड़ी
गृहस्थी की सिलाई
वह अपने
संतोष की सूई से करती है

लेकिन
अपनी पीड़ा की उल्टियां
करके
किसी की
दया के जल से अपना
और अपनी संतति का
मुंह नहीं धोती है

स्त्री देह नहीं है
हाड़- मांस का सिर्फ़
एक पुतला नहीं है

वह तो मुक्ति का
एक खुला द्वार है!

सम्पूर्णानंद मिश्र
शिवपुर वाराणसी
7458994874

विद्या प्रेम संस्कृति न्यास द्वारा डॉ सविता चडढा सुप्रसिद्ध साहित्यकार को मिला प्रेम रत्न सम्मान”

नयी दिल्ली : कार्यक्रम के प्रारंभ में विद्या प्रेम संस्कृति न्यास की ओर श्रीमती विद्या पांडेय ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। इस वर्ष का “प्रेम रत्न सम्मान” डॉ श्रीमती सविता चडढा, सुप्रतिष्ठित साहित्यकार को दिया गया। प्रेम-रत्न’ से सम्मानित डॉ. सविता चड्ढा ने सम्मान के प्रति आत्मीयता भरे शब्द कहे। उन्होंने कहा कि है ‘प्रेम रत्न’ सम्मान डॉ. कल्पना पांडेय के पिता श्री प्रेम किशोर पांडेय जी को समर्पित है इसलिए आज से इस वे भी डॉ कल्पना पांडेय के लिए पिता तुल्य हो गईं हैं । उन्होंने स्वर्गीय श्री प्रेम किशोर पांडेय की कविता “तुझको क्या हो गया बनारस “की कुछ पंक्तियां भी पढ़ीं-किसकी…..किसकी काली छाया पड़ी कि तू असहाय हो गया, अपनी संस्कृति की रक्षा में क्यूंकर तू निरुपाय हो गया।”

श्री अजीज सिद्दीकी, श्री अनिल जोशी, श्री एस जी एस सिसोदिया ,पंडित सुरेश नीरव ,श्री रामस्वरूप दीक्षित ,डॉ पुष्पा सिंह बिसेन की उपस्थिति ने कार्यक्रम को ऊंचाइयां प्रदान की ।

उल्लेखनीय है कि श्रीमती सविता चड्ढा वर्ष 1984 से लेखन कार्य कर कर रही है और विभिन्न विधाओं पर आप की अब तक 50 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं।

आपका लेखन बहुआयामी है आपके 17 कहानी संग्रह, 12 पत्रकारिता विषयक पुस्तकें प्रकाशित है जिनमें से चार विभिन्न संस्थानों में पाठ्यक्रम में संस्तुत हैं, 11 लेख संग्रह, 2 उपन्यास ,11 काव्य की पुस्तकें तो प्रकाशित हैं ही । समय-समय पर आप आपकी कहानियों पर टेली फिल्में बनी है ,नाटक मंचन हुए हैं, अनुवाद हुए हैं, आपकी कहानियों पर शोध कार्य संपन्न हो चुके हैं । राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपके लेखन को समाजोपयोगी स्वीकार किया गया है । आपके साहित्यिक यात्राओं का उल्लेख किया जाए तो विभिन्न संस्थाओं में आपकी सक्रियता और उपस्थिति ने साहित्य को नई ऊंचाइयों प्रदान की है। आपकी निरंतर साहित्य साधना के लिए आपको विभिन्न संस्थाओं द्वारा समय-समय पर सम्मानित किया गया है और आप इन सभी सामानों के लिए ईश्वर का, पाठकों का आभार व्यक्त करती हैं। आपका कहना है मिलने वाले पुरस्कार और सम्मान आपको भविष्य में श्रेष्ठ और अच्छे लेखन के लिए उत्साहित करते हैं।
इस अवसर पर डॉ कल्पना पांडेय ‘नवग्रह ‘ द्वारा संपादित पुस्तक “तुझको क्या हो गया बनारस” के अनावरण का लोकार्पण भी हुआ । कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती शकुंतला मित्तल जी ने किया।

सभा में उपस्थित सभी प्रबुद्ध जनों में श्री अतुल प्रभाकर, डॉ शारदा मिश्रा, श्रीमती स्मिता श्रीवास्तव , श्रीमती वीना अग्रवाल, श्रीमती चंचल वशिष्ठ श्रीमती निरंजन शर्मा, श्री सरोज जोशी, श्री संजय गर्ग, श्री कुमार सुबोध, ने उपस्थित होकर आज के कार्यक्रम की गरिमा को बढ़ाया। अंत में आयोजन में आए हुए सभी अतिथियों का दिल से धन्यवाद देते हुए विद्या-प्रेम संस्कृति न्यास के संरक्षक डॉ. आर. के. सिंह ने किया सभी का आभार व्यक्त किया।

दिल्ली में 11 मार्च को होगा भारतीय महिला शक्ति सम्मान समारोह
  • देशभर की पच्चीस महिलाएं होंगी सम्मानित
  • सविता चड्ढा का होगा सार्वजनिक अभिनंदन

नई दिल्ली : भारतीय महिला शक्ति सम्मान समारोह सावित्तीबाई सेवा फाउंडेशन पुणे अंग जन गण और मेरा गांव मेरा देश फाउंडेशन द्वारा 11 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के परिप्रेक्ष्य में और सावित्रीबाई फुले की पुण्यतिथि पर
नई दिल्ली स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में आयोजित किया जा रहा है।
यह जानकारी देते हुए सावित्रीबाई सेवा फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रसून लतांत , सचिव हेमलता म्हस्के और अंग जन गण के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा सुधीर मंडल ने कहा कि सावित्री बाई फुले की स्मृति में यह सम्मान इसलिए दिया जाता है क्योंकि वे भारतीय महिलाओं के लिए एक अति उज्ज्वल आदर्श है। उन्होंने देश में तब लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला जब लड़कियों को पढ़ाना पाप समझा जाता था। आज महिलाएं पढ़ लिख कर आगे बढ़ गई हैं लेकिन बहुत से मामलों में उनके साथ भेदभाव बरता जाता है। आज समाज को बार बार यह अहसास दिलाने की जरूरत है कि महिलाएं भी कम नहीं हैं। उन्हें भी उनके अधिकार दिए जाएं उनकी गुणवत्ता और कुशलता को मान सम्मान दिया जाना चाहिए।

यह सम्मान शिखर महिला और पदमश्री डा शीला झुनझुनवाला, के सान्निध्य में पंजाब केशरी न्यूज प्रा लिमिटेड की चेयर पर्सन और मुख्य अतिथि किरण चोपड़ा अतुल प्रभाकर, प्रसिद्ध समाज सेवी इंद्रजीत शर्मा , पदमश्री डा संजय , अज़ीज़ सिद्दिकी ,डा ममता ठाकुर मिल कर देंगें।
इस मौके पर वरिष्ठ लेखिका और समाजसेविका डा सविता चड्ढा का सार्वजनिक अभिनंदन किया जाएगा। अनेक सम्मानों और पुरुस्कारों से सम्मानित डा सविता चड्ढा का साहित्य और समाज में योगदान सराहनीय है। महिलाओं के लिए वे आदर्श हैं कि कैसे वे संघर्षों से जूझती हुई अपने मुकाम पर पहुंची। इस समारोह में जिनको भारतीय महिला शक्ति सम्मान से सम्मानित किया जाएगा उनके नाम इस प्रकार हैं।
1.नंदिनी जाधव – पुणे – महिला सशक्तिकरण
2.रत्ना भदौरिया – दिल्ली – साहित्य
3.सांत्वना श्रीकांत – दिल्ली – साहित्य
4.दीपिका तिर्की – जहारखंड – शिक्षा
5.मनीषा धुर्वे – मध्यप्रदेश – शराबबंदी
6.नूतन पांडेय – दिल्ली – पूर्वोत्तर साहित्य
7.शारदा बेन मगेरा – गुजरात – शिक्षा
8.कपना पांडे नवग्रह – दिल्ली – साहित्य
9.डा.श्र्वेता – बिहार – शिक्षा
10.सिनीवाली गोयल – छत्तीसगढ़ – समाज कल्याण
11.वसुधा कनुप्रिया – दिल्ली- साहित्य एवं समाज सेवा
12 डा.जुही बिरला- उत्तर प्रदेश – शिक्षा
13.पुष्पा राय – दिल्ली – समाज सेवा
14.दमयंती बेन गमेती – गुजरात – लोक गायन
15.डॉ.अनीता कपूर – अपेरिका – साहित्य
16.अंजु खरबंदा – दिल्ली – लेखन
17.डी.एम.एस.मधुभाषिणी कुलसिंह (सुगंधि) – श्रीलंका – हिंदी
18.कल्पना झा- दिल्ली – साहित्य
19.मधु बेरिया साह – उत्तराखंड – लोक गायन
20.बाल कीर्ति- दिल्ली – साहित्य
21.संध्या यादव, मुंबई – साहित्य
22.डॉ.पुष्पा जोशी – उत्तराखंड – महिला सुशक्तिकरण
23.स्मिता जिंदल – पंजाब – बाल शिक्षण
24 मिलन धुर्वे मध्य प्रदेश समाज सेवा
25 नाज़नीन अंसारी, साहित्य, दिल्ली

कवि ब्रजकिशोर वर्मा ” शैदी” का जीवन परिचय

कवि ब्रजकिशोर वर्मा ” शैदी” का जीवन परिचय

 जन्म3 जून 1941,अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)
परिचय नामब्रजकिशोर वर्मा ” शैदी”
 उपनाम” शैदी”
शिक्षाबी. लिब. एस सी., एम.एससी.,एम.फिल
 कुछ प्रमुख कृतियाँ
प्रकाशित पुस्तकें: विभिन्न विधाओं में 25 पुस्तकें प्रकाशित जिनमें “मधुशाला” के छंद में “मयखाना” व उर्दू में लगभग लुप्तप्राय विधा “मसनवी” सम्मिलित. पांच पुस्तकें प्रकाशनाधीन. अनेक संपादित संग्रहों में सहभागिता.
 विविध
विदेश यात्राएं: 26 देशों में
सम्मान:
1.अनेक साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित.
“खुशदिलाने-जोधपुर” साहित्यिक संस्था द्वारा प्रदत्त “लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड”_ 2019.
80 वें वर्ष में प्रवेश पर प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ “शैदी “
परत-दर-परत.
रेडियो व दूरदर्शन पर अनेक बार प्रस्तुति.
संप्रति: दिल्ली विश्वविद्यालय से एसोसिएट प्रोफेसर के समकक्ष पद से सेवानिवृत्ति के उपरांत समाज सेवा व काव्य सृजन में व्यस्त.
पता: 11/ 108,राजेंद्र नगर, साहिबाबाद-201005, ज़िला गाजियाबाद.
दूरभाष: 98714 37552
 लेखकीय भाषा
उपरोक्त सभी भाषाओं में मौलिक लेखन व अनुवाद.
भाषा ज्ञान
हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, ब्रजभाषा, सर्बियाई व क्रोशियाई
जो है क़ातिल उसी की हुकूमत | ग़ज़ल | राजेन्द्र वर्मा’ राज ‘

ग़ज़ल
उस कहानी में थोड़ी नसीहत भी है।
कुछ फ़साना है तो कुछ हक़ीक़त भी है।।

वो खफ़ा है जो तुमसे तो यह जान लो।
उसे तुमसे यक़ीनन मुहब्बत भी है।।

कुछ दिखावा ज़रूरी है वरना यहांँ।
सादगी आजकल इक मुसीबत भी है।।

मेरी ख़ामोशियों की तू वज़हें न ढूंँढ।
मुझे कम बोलने की कुछ आदत भी है।।

कई दुश्मन मेरे दोस्त जैसे भी हैं।
और कुछ दोस्तों से अदावत भी है।।

मुझे मंदिर या मस्जिद की ख़्वाहिश नहीं।
फ़र्ज़ ही मेरा मेरी इबादत भी है।।

‘राज’ इंसाफ़ कैसे मिलेगा भला।
जो है क़ातिल उसी की हुकूमत भी है।।

– राजेन्द्र वर्मा’ राज ‘

राम लौट घर आये हैं। हरिश्चन्द्र त्रिपाठी’हरीश

आओ मिल-जुल खुशी मनायें,
राम लौट घर आये हैं,
चलो अवध सन्देशा लेकर,
घर-घर अक्षत आये हैं।टेक।

गहन निशा की मिटी कालिमा,
दुर्दिन सारा बीत गया,
नये भोर की अगवानी को,
बरस पॉच सौ रीत गया।
रात अंधेरी गुजर गई अब,
नव प्रभात फिर आये हैं।
आओ मिल-जुल खुशी मनायें,
राम लौट घर आये हैं1।

विध्वंसक भाव विचारों की,
हो गई पराजित बर्बरता,
सत्य-न्याय का बिगुल बज रहा,
चहॅक उठी है मानवता।
राष्ट्र-धर्म के गीत सुनाते,
अधर सुधा छलकाये हैं।
आओ मिल-जुल खुशी मनायें,
राम लौट घर आये हैं।।2।

क्षिति-जल-अम्बर जगत देखता,
दसों दिशायें , दनुज , देवता।
शेष विधर्मी राह झॉकते,
चाह रहे कुछ मिले नेवता।
विश्व-पटल पर कौतूहल के,
मेघ सनातन छाये हैं।
आओ मिल-जुल खुशी मनायें,
राम लौट घर आये हैं।3।

निरख नियति की व्यग्र भावना,
करते कोटिक कंठ साधना।
राम हमारे सभी राम के,
कौन अभागा जिसे चाव ना।
धन्य सुपावन भूमि अवध की,
हनुमत शीश नवाये हैं।
आओ मिल-जुल खुशी मनायें,
राम लौट घर आये हैं।4।

रचना मौलिक,अप्रकाशित,स्वरचित,सर्वाधिकार सुरक्षित है।

हरिश्चन्द्र त्रिपाठी’हरीश;
रायबरेली (उप्र) 229010

एक समीक्षा | पुस्तक अठारह पग चिन्ह | पुष्पा श्रीवास्तव ‘शैली’ | रश्मि लहर

एक समीक्षा
पुस्तक अठारह पग चिन्ह
लेखिका** आदरणीया रश्मि लहर जी
पृष्ठ*95 मूल्य ₹150/
प्रकाशन * बोधि प्रकाशन
Isbn:9789355367945
सी *8,इक्षुपुरी कॉलोनी,लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
मो• 917565001657

‘अठारह पग चिन्ह’

“तुम्हे देखा नहींं लेकिन नज़र में बस गए हो तुम,
ये सच है हॅंसी की सुरमई सी लालिमा हो तुम।”

बड़ी रोचक बात है कि हमने एक-दूसरे को अभी तक देखा नहीं है ,लेकिन विश्वास की नदी का प्रवाह गति के साथ अविरल है।
पंक्तियाॅं उकेरते हुए मन आह्लादित हो उठा।

मेरी प्रिय सखी रश्मि ‘लहर’ जी का कहानी संग्रह ‘अठारह पग चिन्ह’ हाथ में आते ही अथाह प्रसन्नता हुई।

जीवन-लहरों से अंजुरी भर अनुभवों को बटोरते हुए, शब्दों के माध्यम से कागज पर उकेरते हुए, हृदय पर अंकित कर देने का अद्भुत प्रयास कहानीकार की लेखनी को शीर्ष पर विराजमान कर देता है।

‘अठारह पग चिन्ह’ नाम को सार्थकता प्रदान करते हुए हर पग पर जीवन का एक चित्र मिलता है। इस यात्रा में कहानीकार और पाठक के बीच का अन्तर समाप्त होता महसूस किया हमने।

आदरणीय माया मृग जी का ये वक्तव्य कि
“ये आपकी कहानियाॅं हैं, सिर्फ कहानीकार की नही” अक्षरशः सत्य सिद्ध होता है।

यात्रा प्रारंभ करते ही ‘लव यू नानी’
पत्र के माध्यम से बड़ा ही मजबूत संदेश देती हुई कहानी मन को भाव विभोर कर जाती है।

‘करवा चौथ’ जैसी कहानी मानवता के दायित्व का निर्वहन दर्शाती है।आगे बढ़ते हुए पुनः जीवन के बीच से उभर कर मन को आह्लादित कर देती है।

कहानी ‘प्रेम के रिश्ते’ में पर शोएब चचा कोरोना जैसी महामारी को भी अपने दायित्व के बीच नहीं आने देते। मानवता की मशाल जलाते हुए यह कहानी समाज को एक सीख दे जाती है।

‘बावरी’ को पढ़ते हुए ऑंख भर आती है, स्वतः एक चित्र मस्तिष्क पर खिंच जाता है।हृदय चीख उठता है।

अनुत्तरित प्रेम के दीप के रूप में ‘अनमोल’
कहानी निरंतर मद्धम लौ की तरह प्रकाशित होते रहने का पर्याय है।

ममता का सिंधु समेटे समाधान के साथ खड़ी हो जाती हैं ‘अम्मा’।

‘अचानक’ कहानी को पढ़ते वक्त मन तीन स्थान पर ठहरता है।

पहला कि नकारात्मकता गुंडो के रूप में समाज में अवसर मिलते ही हावी हो जाती है।
दूसरा दादी के रूप में दूसरे की पीड़ा को न समझने वाले लोग। और तीसरा संकल्प और संकल्प की माॅं ,जो रूढ़ियों को तोड़ते हुए सुलभा की पीड़ा में दुखी हैं, और सुलभा से विवाह करने के लिए अड़े हुए हैं। यह कहानी समाज के बीच पथ प्रदर्शिका का कार्य करती है। कहानीकार और लेखनी दोनो को
साधुवाद।

‘असली उत्सव’, ‘अद्भुत डॉक्टर’, ‘तेरी बिंदिया रे’ सभी कहानियाॅं पाठक को बाॅंधें रखने में समर्थ हैं।

धीरे-धीरे कदम रखते हुए ‘लव यू गौरव’ और ‘गुलगुले’ पर ठहरना पड़ जाता है।

मां की ममता और संवेदना की लहर थामे नहीं थमती है। कहानी समाप्त होते-होते नेत्रों का बाॅंध टूट जाता है, और ऑंसू रूपी गुलगुले बिखर जाते हैं।

प्रणाम करती हूॅं कहानीकार की अंजुरी को जिसमें भावनाओं के पुष्प एक गुच्छ के रूप में एक साथ समाहित हैं।

‘अतीत के दस्तावेज’ में आज के स्वार्थी संतानों की लालची और विकृत मानसिकता को उधेड़ने का सार्थक प्रयास करते हुए नज़र आती है लेखनी।

‘शिरीष’, ‘संयोग’ और ‘कैसे-कैसे दु:ख’ के माध्यम से जीवन के बड़े नाज़ुक पहलुओं को छूने का प्रयास किया है कहानीकार ने।

एक के बाद एक सभी कहानियाॅं भावनात्मकता का सजीव निर्वाह करती हैं।प्रवाहमयता के साथ-साथ पाठक को अपने में डुबा लेने का अद्भुत सामर्थ्य है इन कहानियों में।

ये समाज के बीच ज्वलंत प्रश्नों को उठाती हैं, और समाधान भी प्रस्तुत करती हैं तथा अंत में उद्देश्य परक संदेश प्रेषित करते हुए सार्थकता को पोषित करती हैं।

मैं ‘अठारह पग चिन्ह’ कहानी संग्रह की सफलता की कामना करती हुई प्रिय मित्र रश्मि ‘लहर’ जी की लेखनी और भावों की सरिता का आचमन करते हुए प्रणाम करती हूॅं।

पुष्पा श्रीवास्तव ‘शैली’
रायबरेली

नए भवन में | दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश

राम आए पधारे,
नए भवन में।
नींद भर करके सोए,
नए भवन में।
साथ लक्ष्मण,मां सीता,
और हनुमत भी हैं।
साथ उनके ये सारा,
जनमत भी है।
सारी खुशियां पधारीं,
नए भवन में।
भाई शत्रुघ्न,भरत,
कैकई,कौशल्या भी।
राजा दशरथ, सुमित्रा,
आई उर्मिला भी।
देख खुशियां मनाईं,
नए भवन में।
सरयू नदिया का पानी,
भी इठलाता है।
आज कितना हूं खुश,
सबको बतलाता है।
प्रीति की फुहार बरसी,
नए भवन में।
राम जी की कृपा,
सदा सबको मिले।
उनके आशीष से,
जीवन सबका खिले।
स्वर्ग से फूल बरसे,
नए भवन में।
अब तो ‘दुर्गेश’ का,
मन उछलनें लगा।
हर घड़ी राम का,
नाम जपने लगा।
बहे खुशियों के आंसू,

नए भवन में।

(सारे अधिकार लेखक के आधीन)
दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश

शतक संगति समारोह में सविता चडढा जन सेवा समिति सम्मानित”

नई दिल्ली : काकासाहेब कालेलकर एवं विष्णु प्रभाकर की स्मृति में आयोजित सन्निधि की सौ संगोष्ठी पूर्ण होने पर शतक संगति समारोह का आयोजन गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा नई दिल्ली में आयोजित किया गया।इस अवसर पर विभिन्न साहित्यकारों एवं उत्कृष्ट कार्य करने वाली समिति और संस्थाओं को भी सम्मानित किया। साहित्य ,कला,संस्कृति एवं सामाजिक सरोकारों को समर्पित सविता चडढा जन सेवा समिति को भी उनके साहित्य अनुराग, विशिष्ट साहित्य सेवा एवं समाज सेवा तथा नव युवाओं को प्रोत्साहन द्वारा समाज को जागरुक एवं समर्थ करने के उत्कृष्ट एवं निष्ठा पूर्ण प्रयासों के लिए विशिष्ट सेवा सम्मान 2024 प्रदान किया गया ।इस अवसर पर देशभर से पधारे साहित्यकारों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की।


कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सुप्रसिद्ध हास्य कवि श्री सुरेंद्र शर्मा जी रहे जिन्होंने हिंदी भाषा एवं अन्य भाषाओं पर अपने सारगर्भित विचार प्रस्तुत किये। इस अवसर पर जनसत्ता के संपादक और लेखक मुकेश भारद्वाज और वरिष्ठ आलोचक डॉ गोपेश्वर सिंह की उपस्थिति उल्लेखनीय रही ।कार्यक्रम में सभी अतिथियों का स्वागत अतुल प्रभाकर ने किया । कार्यक्रम का उत्कृष्ट संचालन प्रसून लतांत ने किया ।

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सजा | रत्ना भदौरिया | लघुकथा

कल के दृश्य ने वो गाना सार्थक कर दिया ‘मेरा गम तेरे ग़म से कितना कम है ‘। अभी तक गाना खूब सुना ,गुनगुनाया लेकिन हमेशा लगता रहा कि नहीं दुनिया में मुझसे ज्यादा दुखी कोई भी नहीं है। कल के दृश्य ने सबकुछ बदल दिया और लगने लगा अरे ! मुझसे कम दुखी कोई नहीं है। मेरी और नंदिनी की बात अभी ज्यादा पहले नहीं शुरू हुई थी महज एक महीना हुआ था लेकिन दोनों को एक दूसरे पर विश्वास ऐसा जम गया मानो बचपन की सहेलियां हों। काम की व्यस्तता की वजह से फोन पर कम ही बातें होती मैसेज से हाल खबर रोज ही हो जाती। इन एक महीने में तीन से चार बार फोन पर बात हुई। लेकिन ज़्यादातर दो से तीन मिनट ही बात सम्भव हो पायी।कल हम दोनों फ्री थे मेरा कुछ स्वास्थ्य ठीक नहीं था और नंदिनी की कालेज की छुट्टी थी। बातों का दौर लम्बा चला तो उसने उस दृश्य का जिक्र किया जो मेरे लिए दृश्य लेकिन उसकी कहानी थी। नंदिनी ने बात मेरी शादी से शुरू की । तो मैंने कहा नहीं यार अभी नहीं वैसे सच बताऊं करना नहीं चाहती कोई रुचि नहीं है। भाई ,बहन , मां- बाप सब लोग हैं नौकरी भी है फिर क्या जरूरत आज कल वैसे भी लड़कों का कोई भरोसा नहीं। वैसे नंदिनी आपकी शादी हो गयी क्या? नहीं मैं तो चालीस से ऊपर की हो गयी अब क्या करूंगी शादी करके ? क्या ?आप तो बहुत बड़ी हैं मुझसे माफ़ी चाहूंगी हमेशा आपका नाम या यार कहकर बुलाती रही मैं इतनी बेवकूफ कभी पूछा भी नहीं।

अरे नहीं कोई बात नहीं बिट्ट सब चलता है। शादी नहीं की इसके पीछे बहुत बड़ी कहानी है। बताइये ना दीदी आज मैं बिल्कुल व्यस्त नहीं हूं मैंने कहा। नहीं बिट्टू फिर कभी बताऊंगी। नहीं दीदी मैं जिद्द करने लगी । चलो अच्छा इतनी जिद्द कर रही हो तो बता ही देती हूं। आज के बीस साल पहले पापा सरकारी मास्टर के पद से रिटायर हुए और घर पर रहने लगे। एक साल व्यतीत भी नहीं हुआ था कि पापा को कैंसर हो गया उनके रिटायरमेंट के जितने पैसे थे सब उनकी दवाई में लग गये और दुर्भाग्य देखो उसी दौरान कोरोना आ गया मैं प्राइवेट स्कूल अध्यापिका थी कालेज की नौकरी तो बाद में मिली, नौकरी छूट गयी पापा को कैंसर के साथ -साथ कोरोना भी हो गया।

मां भी पापा की देखभाल करते -करते कोरोना की शिकार हो गयी। और एक एक करके दोनों चलते बने। घर ,पैसा जो भी बचा था दोनों भाईयों ने ले लिया मैं अकेले रह गयी। फिर पता है बिट्टू सब लोग कहते इसका भी कहीं रिश्ता कर दो । दोनों भाइयों ने योजना बनाई और जितने भी रिश्ते आते वे तोड़वा देते एक भाई एक कमी निकालता तो दूसरा दूसरी कमी , कोई रिश्ता ही नहीं हो पा रहा था। पास पड़ोस के लोग और भी बोलने लगे थे लेकिन भाइयों को कोई फर्क नहीं पड़ा, एक सबसे दुर्भाग्य का दिन तब आया जब पता चला कि मुझे पागल होने के लिए दवाईयां दी जा रही थी वो भी भाइयों के द्वारा इसका कारण जानने कि कोशिश कि तो पता चला कि महज यह कारण था ,अब इसे संभाले कौन और शादी में तनिक रकम नहीं खर्च होती कौन करे इतने पैसे खर्च —-।

फिर पता है बिट्टू मैंने कहा दिया ना किसी को किसी के सामने गिड़गिड़ाने की जरूरत है और ना ही मेरे बारे में चिंता करने की आप सब अपना अपना देखो। उस दिन से चौकन्नी और सतर्कता के साथ काम करने लगी भगवान का शुक्र रहा कि जल्द ही गांव के एक स्कूल में नौकरी मिल गयी। बिट्टू आज मैं पैंतालीस साल की हो गयी हूं और खुश हूं अपनी दुनिया में लेकिन दोनों भाईयों को जब कभी कभी दुखी देखती हूं तो समझ नहीं पाती की उनको क्या कहूं उनके किये की सजा है या कुछ और ——।