आओ राम बिराजो | दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश’

आओ राम बिराजो | दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश’

बहुत दिनों के बाद बिराजे,
नव निर्मित घर राम।
बहुत दिनों के बाद आज,
यह पूर्ण हुआ है काम।
बाइस जनवरी सन् चौबीस का,
शुभ अवसर है आया।
राम की लीला कोई न जाने,
यह सब प्रभु की माया।
राम का नाम लियें सब मिलकर,
सुबह, दोपहरी, शाम।
सजी अयोध्या दुल्हन जैसी,
शोभा वरनि न जाए।
ढोल,मंजीरा,झांझ लिये,
सब मिलकर नाचे गायें।
स्वर्ग से फूल देव बरसाते,
लेकर राम का नाम।
घट-घट के वासी हैं राम,
जिनके नाम से बनते काम।
जिनके केवल दर्शन से ही,
मिल जाता है सुख का धाम।
आओ हम सब मिलकर बोलें,
जय-जय-जय-जय- जय श्री राम।

दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश’

अवध की सांस्कृतिक लोक चेतना

कहते हैं कृषि प्रधान देश भारत गाँवों में बसता है। शहरों के साथ ही बदलते हुए ग्रामीण परिवेश में आपसी प्रेम, सामंजस्य और लोक परम्परा, लोक संस्कृति लुप्त हो रही हैं। लोक संस्कृतियों के प्रति हमारी अबोधता उसके अस्तित्व की रक्षा करने में असमर्थ है। आकाश, सूर्य, चाँद, पानी, हवा, पृथ्वी आदि का हमारे जीवन का मूल आधार है। इनके महत्व को हम भूलते जा रहे हैं। और तो और, इन सब बातों में हम वक्त बर्बाद नहीं करना चाहते हैं। ईश्वर प्रदत्त हर अमूल्य निधियाँ निःशुल्क मुझे मिल रही है, फिर भी हम इन प्राकृतिक निधियों की रक्षा करने के बजाय, निरंतर दोहन कर रहे हैं। वास्तविकता तो यह है कि बिन सांस्कृतिक लोक के हमारा जीवन अधूरा है और इसके अभाव में हम सुखमय जीवन की कल्पना नहीं कर सकते हैं।

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प्रत्येक क्षेत्र की अपनी सांस्कृतिक विशेषताएँ हैं। जिसके कारण वह क्षेत्र पहचाना जाता है। इस दृष्टि से अवध की संस्कृति और उसकी परम्पराएँ एक समृद्ध विरासत को संजोए हुए हैं।
जैसा कि नाम से स्पष्ट है अवध। यह एक भौगोलिक क्षेत्र ही नहीं, अपितु त्रेतायुग से ही एक अनूठी संस्कृति का जीता-जागता प्रमाण है, जो भारत में शायद ही कहीं देखने को मिले। जहाँ खिलते, महकते फूल, फल, मुस्कुराते मौसम, आती-जाती ऋतुएँ हैं। तीज त्यौहार, लोक कंठ से फूटे ताने धुने, धर्म-कर्म हैं। पाश्चात्य सभ्यता और वहाँ की संस्कृति के बढ़ते प्रभाव से भले ही हमारी संस्कृति क्षीण हुई हो, लेकिन अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पूरी दमखम के साथ विद्यमान है।

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अवध क्षेत्र लगभग 12 जनपदों में विस्तारित है। यहाँ के लोक संस्कृति विविधताओं से भरी है और उनका स्वरूप आज भी गाँवों में देखने को मिलता है। जब हम त्योहारों की बात करते हैं तो अवध क्षेत्र में पूरे वर्ष भर विभिन्न प्रकार के पर्व मनाया जाते हैं। होली, दीपावाली, दशहरा, रामनवमी, दुर्गा पूजा, रक्षाबंधन आदि के अतिरिक्त इस्लाम धर्मावलंबी ईद, बकरीद, मुहर्रम, ईसाई धर्मावलंबी क्रिसमस, ईस्टर, गुड फ्राइडे, धूमधाम से मनाते हैं। यहाँ के त्योहारों की विशेषता है कि सब त्यौहार एक साथ बिन भेदभाव के मनाए जाते हैं। दशहरे में रामलीला का मंचन तो होली में झूमकर फाग होता है। व्रतों की बात करें तो, करवाचौथ हलछठ, गणेश चतुर्थी, हरितालिका तीज, रोजा (रमजान) आदि व्रत रखे जाते हैं। जो कहीं पति की लंबी उम्र के लिए, तो कहीं बालकों की लंबी उम्र के लिए महिलाओं द्वारा बड़ी आस्था के साथ रखे जाते हैं। यहाँ लोकगीतों की बहुलता है। शादी विवाह में अलग लोकगीत, ऋतुओं के अलग लोकगीत, श्रम के अलग लोकगीत और अलग-अलग जातीय नृत्य हैं। विवाह गीत गुनगुनाते हैं-
जउने अंगनवा खेली हो बिटिया, वह सुना करि जई हो।
कुछ बेरिया के बाद हो बिटिया, अपने घर का जई हो।।
सास-ससुर से मिल कर रहि हो,
वई माई बाबू तुम्हार हो।
ननद के साथै हँसीहो खेलि हो,
वई बहिनी अब तुम्हार हो।।

पुत्र जन्म पर सोहर गाने की परंपरा है, तो शादी में बन्ना विदाई गीत, भोजन करते समय गारी (गाली) आदि गाने की परंपरा है। अवध क्षेत्र में वैवाहिक रस्मों में आत्मिक प्रेम कूट-कूट कर भरा था, बराती भोजन ग्रहण करते समय गलियाँ (गारी) भी खाते थे, और ऊपर से उन गारी के बदले कुछ धनराशि भी महिलाओं को नेग रूप में देते थे। ये प्रेम डोर की प्रथा अब अतिथि ग्रहों (गेस्ट हाउस) और बफर सिस्टम ने सुरसा की भाँति निगल लिया है। शादी के गीतों में इतनी विविधता है कि तिलकोत्सव, द्वारचार के अलग गीत, सप्तपदी (सात फेरे) के अलग गीत, विदाई के अलग गीत हैं। कोई भी गीत गाने से पहले महिलाएं देवी गीत गाना नहीं भूलती हैं। जिसमें गौरी, गणेश, शीतला माँ के गीत सम्मिलित हैं। विभिन्न धार्मिक अवसरों पर देवी गीत और जागरण के गीत गाए जाते हैं जिन्हें भजन कहते हैं-
देवी आँगन मोरे आई,निहुरि कै मैं पईयाँ लागू।
काऊ देखि देवी मगन भइहैं, काऊ देखि मुस्कानी।
रानी देखि देवी मगन भई हैं, बालक देखि मुस्कानी,
देवी आँगन मोरे आई, निहुरि कै मैं पइयाँ लागू।

इन्हीं लोकगीतों के सहारे जनमानस अपने दुखों को भूल कर अपना सामंजस्य बैठाते हैं। खेती-किसानी करते समय, श्रम गीतों के गाने की प्रथा है। खेतों में धान लगाते समय गीत गाये जाते थे, जिससे सर्वधर्म समभाव के साथ किसानों में एकता, ऊर्जा और उत्साह का संचार होता रहे-

रिमझिम बरसे पनिया, आवा चली धान रोपे धनियाँ।
लहरत बा तलवा में पनिया, आवा चली धान रोपे धनियाँ।।
सोने की थारी मां ज्योना परोसे,
पिया का जेवाई आई धनियाँ।
नाच्यो गायो खुसी मनायो, भरि जइहैं कोठिला ए धनियाँ।

पहले घर की महिलाएँ मिल-जुलकर प्रातःकाल उठकर चकिया (जात) में गेहूँ पीसती थी, उसके बाद दैनिक कार्यों में लग जाती थी। जब भी कोई मेहमान आता था तो बड़े सम्मान से उन्हें भोजन कराती थी। घर की महिलाएँ चकिया में गेहूं पीसते हुए लोकगीत के माध्यम से ही मेहमानों से हालचाल पूँछती और अपनी उन्हें बताती थी। ससुराल में जात पीस रही एक स्त्री अपने भाई से बात करते हुए गाती है-
बैठहुँ न मोरे भैया रतनी पलंगिया हो न,

बहिनी कहीं जाऊ आपन हवालिया हो न।
नौ मन कूटयो भइया, नौ मन पीस्यो हो न,
भइया पहिली टिकरिया, मोर भोजनवा हो न।

इस तरह से महिलाएं अपने भाई को गीत के माध्यम से हाल-चाल बताती थी। कुछ जातियां बिरहा गाती हैं। जातीय नृत्यों में यादव गडरिया का नृत्य, धोबियों पासियों का नृत्य प्रसिद्ध है। खेद का विषय यह है कि अब यह नृत्य विलुप्तप्राय हो चुके हैं। इस प्रकार के नृत्य करने वाले लोग उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। अब इन नृत्यकारों को संरक्षित और इन पर शोध करने की आवश्यकता है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति इन नृत्य-गीतों को न सीखना चाहता है और न ही अपने बच्चों को सिखाना चाहते हैं। कारण समाज अब नृत्य करने वालों को हेय दृष्टि से देखने लगा है, समाज को ऐसी कुत्सित विचारधारा बदलनी होगी। डीजे के युग में दिल पर सीधा कुप्रहार करने वाले गीतों की भीड़ में लोकनृत्यों का अस्तित्व समाप्त की ओर है।
फाल्गुन हिन्दू कैलेंडर का अंतिम महीना है। रंगों का त्योहार होली के मौसम में एक महीना तक अर्थात वसंत पंचमी से शीतलाष्टमी तक फ़ाग की धूम रहती है। बड़े-बड़े ढोल-नगाड़ों की थाप पर फाग गाए जाते हैं और किसी प्रतिष्ठित स्थान पर फाग की प्रतियोगिता भी आयोजित होती है। चौताल, डेढ़ताल, ढाईताल फाग ढोलक की थाप पर सामूहिक रूप से गाए जाते हैं। कवि दुलारे ने तो अमर शहीद राणा बेनीमाधव सिंह पर डेढ़ताल का फाग ही लिख डाला। जिसको न गाया जाय तो फाग अधूरा माना जाता है-

अवध मां राना भैयो मरदाना।
पहिल लड़ाई भई बकसर मां, सेमरी के मैदाना।
हुवाँ से जाय पुरवा मां जीत्यो, तबै लाट घबराना।
नक्की मिले, मान सिंह मिलिगै, जानै सुदर्शन काना।।
अवध मां राना भयो मरदाना।।

अवध की संस्कृति सामूहिकता पर आधारित है जो समूह को महत्व देती है। नौटंकी यहाँ की प्रमुख लोककला है। शादी के दिन जब सभी पुरुष बारात चले जाते हैं तब रात्रि में घर की सुरक्षा व्यवस्था बनाये रखने के लिए महिलाएँ रातिजगा करती हैं। जिसके लिए रात्रि में स्त्रियाँ अपना रूप बदलते हुए चोर, पुलिस, किसान, पुरुष आदि का भेष बनाकर खेलती थी, जिसे नकटा कहा जाता था। ये परम्परा भी अंतिम साँसे गिन रही है। स्त्रियाँ स्वांग प्रहसन् करके रात भर जागती हैं, जिससे घर में किसी प्रकार का कोई खतरा उत्पन्न न हो।
वर्षा ऋतु में ढोलक, हारमोनियम, बीन की थाप और धुन पर पर अल्हैत लोग हिंदी साहित्य का वीर रस से ओतप्रोत आल्हा गाते हैं और जनमानस में वीरता व ओज का संचार करते हैं। आल्हा यद्यपि बुंदेलखंड की पावन धरती, विशेषकर महोबा, उरई, जालौन क्षेत्र की विधा है, क्योंकि आल्हा यादव और उदल यादव बुंदेलखंड के महोबा में पैदा हुए थे लेकिन उनकी वीरता की कहानियाँ पूरे उत्तर भारत में आल्हा गायन के रूप में गाई जाती हैं। उन्नाव जनपद के नारायणदास खेड़ा निवासी श्री लल्लू बाजपेई को आल्हा सम्राट कहा जाता है। रामरथ पांडेय (लालगंज) आल्हा गायन में मशहूर हैं। लल्लू बाजपेई के आल्हा की दो पंक्तियां दृष्टव्य हैं-

बड़े लड़ाईया महोबे वाले इनकी मार सही ना जाए।
एक को मारे दो मर जाएँ, मरै तीसरा दहशत खाए।।

ये तो परमसत्य है कि लोकगीतों के स्रोत विलुप्त होते जा रहे हैं। लोग जीवन में जैसे-जैसे आपसी सहयोग और सद्भाव विलुप्त हो रहा है, उसी तरह हमारी प्राचीन संस्कृति भी विलुप्त होने के कगार पर है। हम तो उस देश के वासी हैं, जहाँ हर कदम, हर पर्व पर खुशी मिल-जुलकर बाँटते हैं। हर त्योहार का कोई न कोई गीत भी सामूहिक गान के रूप में गया जाता है। जैसे गीतों में सावन कजरी गाई जाती है। यद्यपि कजरी गीत का मूल स्रोत मिर्जापुर माना गया है, लेकिन अवध के विभिन्न जनपदों में कजरी बहुतायत गाई जाती है। पूरा श्रावण मास ही भगवान शिव को समर्पित है। सावन के महीने में पेड़ो की शाखाओं पर झूले पड़ जाते हैं। महिलाएँ झूले पर झूलते हुए गाती हैं। इस प्रकार के गीतों से परिवार व पड़ोसियों से बिगड़े हुए मधुर सम्बन्ध भी बन जाते हैं-

कहाँ से आये श्याम बनवारी, कहाँ से आई राधिका रानी।
गोकुल से आए बनवारी ,
मथुरा आई राधिका प्यारी।।
कि झोंका धीरे से देओ, हमें डर लगता भारी।
डरो मत राधिका प्यारी, हमें तो तुम जान से प्यारी।।

कृष्ण जन्माष्टमी के समय सोहर, भजन, धार्मिक गीत गाए जाते हैं। नृत्य की बात करें तो धोबियों (निर्मल) के लोकनृत्य में अब माइक का प्रयोग होने लगा है। पहले कमर में घंटी बाँधकर लहंगा पहनकर और बांसुरी लेकर नाचने वाला व्यक्ति जब बाँसुरी की तान छेड़ता था तो, दर्शक व श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे। इस नृत्य में मुख्य रूप से मृदंग और कसावत वाद्य यंत्र होता था। एक आदमी प्रकाश के लिए मशाल जलाकर आगे-आगे चलता था।
यादवों (अहीरों) के लोकनृत्य में घुँघरू वाले जाँघिया को धोती के ऊपर पहनते और 7 मीटर का पटुका बाँधते थे। इनके वाद्य यंत्रों में नगाड़ा और नगरची होते थे। इनमें नाचने वालों को गॉंव के लोग नचनिया समझते थे।
इन्हीं लोकनृत्य में एक प्रमुख लिल्ली घोड़ी का नृत्य बहुत प्रसिद्ध था। शुभ अवसर पर एक व्यक्ति काठ के घोड़े को सजा कर अपनी कमर में रस्सी के सहारे पहन लेता है, तत्पश्चात सुंदर मनमोहक नृत्य करता था। इसे देखकर बच्चे और स्त्रियाँ अति प्रसन्न होते थे।
प्राचीन काल से ही अवध की संस्कृति में खान-पान, रहन-सहन और वेशभूषा की विशेषता रही है। अनेक अवसरों पर नाना प्रकार के पकवान बनाए जाने की परंपरा रही है। जैसे होली में गुझिया पापड़, बरगदाही में बरगद गुलगुले, गुरुपूर्णिमा असाड़ी को बेसन की बेढ़ई, नागपंचमी में गेहूं चने की घुघरी, दीपावली को लाई चूरा रेवड़ी चीनी के खिलौने, गणेश चतुर्थी को तिलवा लड्डू धूंधा, मकर संक्रांति में घी खिचड़ी नीम्बू आदि बनाए जाने की परंपरा रही है। मशीनीकरण और अर्थ के युग मे अब ये सब समाप्ति की ओर है। लोग अनपढ़ थे, परन्तु वैज्ञानिक ज्ञान उनके अंदर कूट-कूट कर भरा था। शायद इसीलिए मौसम अनुसार खाद्य पदार्थ बनते थे, जो शरीर के लिए लाभदायक है। किंतु आज हम भोजन के साथ मिलावटी पदार्थ अर्थात मीठा जहर खा रहे हैं।
अवध की संस्कृति गाँव की संस्कृति है। सद्भाव और सहकार इसके मूल में बसा है। आधुनिकता की चकाचौंध में अवध की संस्कृति अभी भी जीवित है। हाँ, संकट भी मंडरा रहा है। गाँव की विभिन्न कथाएँ-प्रथाएँ दम तोड़ने लगी है, जो पहले दिलों को जोड़ने वाली होती थी। विवाह के समय दुल्हन के यहाँ बारात 3 दिन रुकती थी और अब 3 घंटे में बरात हो जाती है। क्योंकि अब बारात दिल जोड़ने वाली नहीं, अपितु अर्थ जोड़ने वाली हो गयी है। बारात की तैयारियों में पूरा गाँव लग जाता था। ग्रामीणों की चारपाई आ जाती थी। बर्तन, ड्रम आदि सब मिल जाते थे। इन सबसे अर्थ बचत और एकता बढ़ती थी। आज इंसान ये सब करने में खुद को अपमानित महसूस करने लगा है। हम डीजे की कानफोड़ू आवाज और जगमगाती रोशनी के द्वारा अपनी सभ्यता और संस्कृति को नहीं बचा सकते हैं। आज सगे संबंधियों का नाता भी पकवानों तक सीमित हो गया है। मेहमान, मित्र आदि भोजन का अंदाजा लगा कर ही घरों से निकलते हैं, जिसके कारण दूरियाँ बढ़ गयी हैं-
बफर सिस्टम सबसे महान।
न कोउ भूखा, न अघान।।
हुआँ तो धक्का मुक्की की बहार है।
कहते हैं कि समरसता की फुहार है।।
कोउ गुस्से मा लाल पीला,
तो कोहू का कपड़ा लाल पीला।
यह सब अवगुण कहीं नहीं अखिल भारत और अवध के लिए घातक सिद्ध होंगे। धर्म, वंश, जाति, लिंग भेद से बहुत ऊपर उठकर हमें अपनी विलुप्त होती जा रही जड़ों पर विचार करना होगा, अन्यथा हमारी लोक संस्कृति किस्सा-कहानी तक सीमित और सपना बनकर रह जायेगी।

डॉ० अशोक कुमार
असिस्टेंट प्रोफेसर
शिवा जी नगर, दूरभाष नगर
रायबरेली
मो० 9415951459

कोहरा | Hindi Kavita | दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश’

कोहरा

कोहरे में सनें शहर- गांव,
लगता है चारों तरफ छांव।
दूर तक धुंधलापन दिखता,
धरती का नया रूप खिलता।
जिधर देखो धुआं- धुआं है,
पास का नहीं कुछ भी दिखता।
सूरज ने सबको दिया दांव,
कोहरे में सनें शहर- गांव।
ठंडक नें रूप है दिखाया,
जैसे मेहमान नया आया।
सर्दी से बचने की खातिर,
लोगों ने आग है जलाया।
ठंडक से जकड़े हाथ पांव,
कोहरे में सनें शहर- गांव।
चौपाये ठंड से हैं कांपते,
पक्षी भी घोसलों से झांकते।
कहीं अगर जाने की सोचो,
नज़र नहीं आते हैं रास्ते।
नदिया में चलती नहीं नाव,
कोहरे में सनें शहर- गांव।
नीचे को गिर रहा पारा,
अब केवल आग का सहारा।
कैसे कटेगी रात मेरी,
सोचता है बुधिया बेचारा।
दूसरा नहीं कोई ठांव,

कोहरे में सनें शहर- गांव ।

दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश’

सिलवटें | पुष्पा श्रीवास्तव शैली

सिलवटें | पुष्पा श्रीवास्तव शैली

मन की चादर पर पड़ी जो सिलवटें,
उम्र देकर ही मिटाती रह गई।
गिर गए कुछ पल सुनहरी मोतियों के,
ढूंढ कर उनको उठाती रह गई।

एक कोने में जला दी रोशनी अब
की अंधेरा अब न भरने पाएगा।
खिड़कियां भी खोल दी मन के जिरह पर,
अब तो झोंका संदली हो आएगा।

कुछ गुलाबी सी किरन भी आ गई तो,
मन गुलाबों सा खिला हो जायेगा।
बारिशें भी हो गईं तो पूछना क्या?
घर से आंगन तक धुला हो जाएगा।

जाग जाती काश सोई भीतियां सब,
तालियां ही मैं बजाती रह गई।
और निंदिया का हिडोला आन उतरे,
लोरियां मन को सुनाती रह गई।

आ गई है नींद किंतु मोतियां तो,
आज भी बिखरी हुई हैं जिंदगी में ।
सिलवटें सुधरी न चादर ही बदल कर,
सुरमई संध्या बुलाती रह गई।।

पुष्पा श्रीवास्तव शैली

जनकवि सुखराम शर्मा सागर की कविता | हिंदी रचनाकार

अभी सवेरा यतन कीजिए

अभी सवेरा यतन कीजिए

जो बचा है उसको जतन कीजिए
बने हैं राजा रंक यहां पर
दिलों में दीपक जला दीजिए
मिली जो शोहरत नहीं मुकम्मल
कौन है अपना नहीं है मुमकिन
बोया है जैसा वही मिलेगा
अजीब करिश्मा समझ लीजिए
दिलों में दीपक जला दीजिए
माता-पिता है जहां में भगवन
प्रकृति का मकसद समझ लीजिए
सागर की लहरें आती है जाती
मैल दिलों के समन कीजिए
उम्मीद तुमसे किया जो अपने
वही करे जो फर्ज समझिए
नापूरी होगी ख्वाहिश सभी की
माया की नगरी समझ लीजिए
जो बचा है उसका जतन कीजिए
अभी सवेरा यतन कीजिए

जनकवि सुखराम शर्मा सागर

मर्म


सुख दुख के भव सागर में
अपने मन की प्यास छिपाए
तन मन हारा हारा है
फर्ज हमारा मर्म तुम्हारा
जब था सब कुछ पास हमारे
अपना बनाया बन सबके प्यारे
बिरले दुख में बने है साथी
हकदार बने अब सभी बाराती
अपनों ने मजधार में मारा
फर्ज हमारा मर्म तुम्हारा
अपने प्रसाद में बने प्रवासी
भ पसीना था सपन संजोया
जेसीबी हो अब नियति तुम्हारी
माया में किया को जरा
अपनों से ही अपनों ने हार
फर्ज हमारा मर्म तुम्हारा
बसंत सुहाना आए जाए
पतझड़ से ना विस्मित हो जाए
यस अपयस रह जाए सारा
सुखसागर ही एक सहारा
अपनों ने मजधार में मारा
फर्ज हमारा मर्म तुम्हारा

जनकवि सुखराम शर्मा सागर

शिल्पी चड्ढा स्मृति सम्मान शाहाना परवीन को मिला
  • कला-संस्कृति,साहित्य और सामाजिक सरोकारों को समर्पित सविता चड्ढा जन सेवा समिति ने दिए चार सम्मान
  • हीरों में हीरा सम्मान प्रसून लतांत
  • साहित्यकार सम्मान डॉ संजीव कुमार
  • शिल्पी चड्ढा स्मृति सम्मान शाहाना परवीन
  • गीतकारश्री सम्मान रंजना मजूमदार

नयी दिल्ली : सविता चड्ढा जन सेवा समिति, दिल्ली द्वारा हिन्दी भवन में चार महत्वपूर्ण सम्मान प्रदान किए गए । अपनी बेटी की याद में शुरू किए सम्मानों में, अति महत्वपूर्ण “हीरों में हीरा सम्मान” इस बार गांधीवादी विचारक प्रसून लतांत को, साहित्यकार सम्मान साहित्यकार एवं प्रकाशक डॉ संजीव कुमार और शिल्पी चड्ढा स्मृति सम्मान शाहाना परवीन और रंजना मजूमदार को गीतकारश्री सम्मान महामहोपाध्याय आचार्य इंदु प्रकाश और इंद्रजीत शर्मा के कर कमलों से प्रदान किया गया। अनिल जोशी और राजेश गुप्ता की उपस्थिति ने कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की । शिल्पी चड्ढा स्मृति सम्मान समारोह की संस्थापक एवं महासचिव, एवं साहित्यकार सविता चड्ढा ने  शाहाना परवीन को सम्मान के साथ साथ पाँच हज़ार एक सौ रुपए की नकद राशि भी प्रदान की और देश भर से पधारे लेखकों, कवियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि ये सम्मान माँ और बेटी के मधुर संबंधों को समर्पित है।

अपनी बेटी के लिए पिछले सात साल से प्रारम्भ इन सम्मानों के लिए सविता चड्ढा की सराहना 

इस अवसर पर प्रसून लतांत ने स्वयं को हीरों मे हीरा सम्मान दिये जाने पर समिति का आभार व्यक्त किया और सभा को संबोधित करते इन सम्मानों को दिए जाने को साहित्य में सकारात्मकता के रूप में लिए जाना कहा। अपनी बेटी के लिए पिछले सात साल से प्रारम्भ इन सम्मानों के लिए सविता  की सराहना की । इस अवसर पर डॉ.संजीव कुमार, डॉ स्मिता मिश्रा। शकुंतला मित्तल ने अपने विचार रखें और इन सम्मानों की निष्पक्षता और चुने जाने की प्रक्रिया अपनी बात कही ।

इस वर्ष प्राप्त पुस्तकों में से अन्य 14 लेखकों की पुस्तकों का चयन भी किया था। इस अवसर पर डॉ विनय सिंघल निश्छल को उनकी पुस्तक, संबंध, व्यक्त अव्यक्त,  नाज़रीन अंसारी को ,मां और लफ्जों का संगम पुस्तक के लिए ,. अर्चना कोचर, को तपती ममता में गूंजती किलकारियां संग्रह के लिए , आशमा कौल को स्मृतियों की आहट के लिए ,. राही राज को उनकी पुस्तक पिता के लिए,. कमल कपूर को जिएं तो गुलमोहर के तले, के लिए  रत्ना भादोरिया को “सामने वाली कुर्सी” के लिए ,डॉ पुष्पा सिंह बिसेन को उनके उपन्यास “भाग्य रेखा” के लिए,. अंजू कालरा दासन ‘नलिनी’ को उनके संग्रह “आईना सम्बन्धों का” के लिए , यति शर्मा को उनकी पुस्तक “आधी रात की नींद”,  हेमलता म्हस्के को “”अनाथों की माँ सिंधुताई” के लिए शिल्पी चड्ढा स्मृति सम्मान समारोह ” में सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर जापान, लंदन, अमेरिका के आलावा दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, मध्य प्रदेश, लखनऊ,आगरा, राजस्थान, मुरादाबाद, इंदौर,बैंगलोर , पंजाब, नोएडा और दिल्ली के साहित्यकार और गणमान्य उपस्थित थे । कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ कल्पना पांडेय ने किया ।

वर्तमान स्थिति में लव मैरिज बेहतर क्यों और कैसे?

शादी का मौसम चल रहा है , सभी अपने सगे सबंधी के शादी समारोह के लिए शॉपिंग करते हुए आपको बाज़ारों में दिख जायेंगे। कुछ दिनों पहले अख़बार में मैंने पढ़ा कि इस वर्ष शादी समारोह में पांच लाख करोड़ का रेवेन्यू आएगा जो भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा। भारत में दो चीजे ऐसी है जिन पर पैसा लगाओ कम ही है, एक घर बनाना दूसरा शादी , हमने भारत में शादी के बदलते कल्चर को देखा है पहले बाराती पांच छः दिन रूकती थी। अब कुछ घंटो में बाराती चल देते है शादी में सगे- सबंधी कुछ समय पहले रुकते थे , आपस में मेल- जोल बढ़ता था। साथ में भोजन की व्यवस्था होती थी। हलवाई मिठाई बनाता था , बड़े बुजर्ग अपने सामने साफ सफाई से पूरा खाना पीना तैयार करते थे। अब वो दौर चला गया , अब होटल ,रेस्टोरेंट ने उसकी जगह ले ली है , वो खाने का स्वाद भी फीका सा लगता है , अब हम अपने टॉपिक पर आते है कि ये संस्मरण मैंने अपने अनुभवों को देखते हुए लिखा है , जो वर्तमान स्थिति से लिया गया है।

1 . लव मैरिज से दहेज प्रथा पर लगेगा लगाम

आज फिर एक बेटी दहेज़ के कारण आत्महत्या को मजबूर हो गयी , सुबह ही अख़बार में मैंने पढ़ा। सभी पढ़े लिखे लोग थे , पढ़े लिखे लोगो में डॉक्टर उनका पेशा था , जिस देश में नवरात्रि में देवी की पूजा होती है , उसी देश में घर आने वाली देवी को ख़रीदा जाता है , ये प्रथा को पढ़े लिखे लोग ही बढ़ावा दे रहे है , मैंने कुछ समय एक वेबसाइट पढ़ी थी जिस पर आईएएस , बैंकिंग, रेलवे सरकारी नौकरी वालों के दहेज़ के रेट लगे थे , जिस पर बोली लगती है। अब जब प्रेम विवाह की बात करे तो इस विवाह में प्रेमी और प्रेमिका एक दूसरे को जानते है ,इस परिस्थिति में मंदिर , कोर्ट में विवाह को करते हुये देखा गया है। बाद में दोनों पक्ष रिसेप्शन पार्टी भी दे देते है , जिससे दोनों पक्ष खुश रहते है।

2 . अरेंज मैरिज के दौरान बढ़ते खर्चे

इसी साल में अपने रिश्तेदार की शादी में गया , इस दौरान पांच से छः फंक्शन हुए लड़की के पिताजी ने इस शादी में एक करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किये , पिता ने अपनी बेटी के लिए जो वर चुना था , वो सरकारी अधिकारी था फिर भी उसने दहेज़ लिया , ये देखा गया अरेंज मैरिज में लोग ज्यादा खर्चा करते है ये आंकड़े बोल रहे है आने वाले चार महीने में चार लाख करोड़ अर्थव्यवस्था में शादी समारोह से आएगा करीब 38 लाख शादी भारत में होगी , भारत में 75 % लोग अरेंज मैरिज करना पसंद करते है ये आंकड़ा है ये बदल रहा है। वही लव मैरिज में ख़र्चे कम होते है ये आपने महसूस किया होगा।

3 . लिव इन रिलेशनशिप बनाम लव मैरिज

कुछ समय पहले लिव इन रिलेशनशिप की एक घटना ने पूरे भारत को सोचने पर मजबूर कर दिया है , ये भारत वर्ष में एक रोग की तरह सामने आ रहा है , जिसमे हमारी युवा पीढ़ी को शिकार बनाया है। जो डेवलप देश है वहां विवाह तो नाम मात्र है वहां इस तरह के रिवाजो के चलते युवा पिता नहीं बनाना चाह रहे है , जिसके चलते पहले रिश्तो में ब्रेकअप और फिर तलाक होता है , इस लिव इन रिलेशनशिप के दौरान पुत्र या पुत्री की प्राप्ति होती है तो नया शब्द आया है सिंगल पेरेंट्स जिसमे माँ को ही बच्चे की परवरिश करनी पड़ती है, इस दौरान समाज के ताने भी सुनने पड़ते है। इन्ही रिवाजो के चलते विकसित देश में बुजुर्गो की संख्या में बढ़ोतरी देखी गयी है। इसलिए कहा जा सकता है भारत में आप आपसी सहमति से विवाह करे या प्रेम विवाह करे , दोनों को स्थान है पर लिव इन रिलेशनशिप समाज का अभिशाप है , ये नैतिक दृष्टि से बिलकुल सनातन संस्कृति के विरुद्ध है।

4 . अंतिम समय में निर्णय सही नहीं होते ये कोई बॉलीवुड मूवी नहीं है

आपने हिंदी मूवी देखी होगी वहां प्रेम विवाह पर पूरी मूवी केंद्रित होती है , लेकिन जब प्रेमी और प्रेमिका एक दूसरे को चुनते है तो वहां पिता और माँ को विलन दिखा दिया जाता है। आखिर में होता है शादी के दौरान प्रेमिका जहर खा लेती है या प्रेमी के साथ भाग जाती है। पिछले दो दशकों में गांव में रोज ही ये घटनाये देखने को मिल रही है शहरों में 1980 के बाद प्रेम विवाह प्रांरभ हो चुके थे ,यहाँ हम हाल ही एक केस स्टडी से समझते है आजकल यूट्यूब पर मनोज दे जो फेमस यूटूबर है मनोज ने प्रेम विवाह किया दोनों यूटूबर थे , भाग के कलकत्ता में शादी की , फिर आ कर परिवार से सॉरी बोला , दोनों परिवार राजी , इसी घटना से एक कहावत याद आती है मिया बीबी राजी तो क्या करेगा काजी। प्रेम विवाह में माँ बाप को बता देना ठीक होता है , अंतिम समय में जब बताया जाता है माँ बाप की सामाजिक प्रतिष्ठा ख़राब होती है साथ ही माँ बाप की जमा पूंजी खर्च हो जाती है। 2023 में आज की पीढ़ी तो बता देती है , जिस कारण प्रेम विवाह सफल भी हो रहे है।

5 . परिवार का सपोर्ट न करना प्रेम विवाह की सबसे कमजोर कड़ी है

जब प्रेम विवाह होता है ज्यादा देखा गया है भाग कर शादी होती है , जिस कारण माता पिता , सगे संबंधी नाता तोड़ लेते है। इस दौरान फाइनेंसियल सपोर्ट ख़त्म हो जाता है। प्रेमी और प्रेमिका को जॉब या बिज़नेस करना पड़ता है। साथ ही समाज से सुनना पड़ता है , लेकिन ये नजरिया भी बदल रहा है अगर आप माँ या पिता में से एक को इस प्रेम के बारे में बताये तो फाइनेंसियल सपोर्ट होता है। प्रेम विवाह के दौरान सपोर्ट लेकर चले नहीं तो आने वाली समस्याएं आपके रिश्ते को कमजोर कर सकती है।

6 . प्रेम विवाह किया है कोई पाप नहीं

प्रेम विवाह में प्रेम ही सबसे बड़ी चीज है , प्रेम के बिना रिश्ता की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। प्रेम विवाह तो भगवान श्री कृष्णा ने भी किया , पर आज की पीढ़ी सुंदरता पक्ष देखकर प्रेम करती है ये सच्चा प्रेम नहीं है , प्रेम को हम गोपियों से सीख़ सकते है , ये ही पक्ष प्रेम को निश्छल बनाता है। प्रेम विवाह करिये लेकिन गोपियों जैसा त्याग भी अपने चरित्र में अपनाइए।

आशा है कि ये लेख आपको पसंद आया होगा ,प्रस्तुत लेख मैंने अपने संस्मरणों पर तैयार किया। ये लेखक की निजी राय है , इसका कोई उद्देश्य नहीं है पाठको को आहात करना है।

मैंने ऐसी प्रीति देखी है | हिंदी गीत | डॉ.रसिक किशोर सिंह नीरज

मैंने ऐसी प्रीति देखी है | हिंदी गीत | डॉ.रसिक किशोर सिंह नीरज

मैंने ऐसी प्रीति देखी है
जिससे लाज सॅवर जाती है
मैंने ऐसी रीति देखी है
नैया बीच भ‌ॅवर जाती है ।

बादल भी कुछ ऐसे देखे
जो केवल गरजा करते हैं
उनमें कुछ ऐसे भी देखे
जो केवल वर्षा करते हैं ।

कहीं-कहीं तो हमने देखा
अपनों के ख़ातिर मरते हैं
अपनों को कुछ ऐसा देखा
अपने ही मारा करते हैं ।

सोचा कुछ अनसोचा देखा
दूर बहुत कुछ पास से देखा
जैसा दिखता वैसा ना वह
झूठी लेकिन आस से देखा ।

इसको उसको सबको देखा
नीरज जीवन भर है देखा
देखा कुछ अनदेखा देखा
रहे सुनिश्चित हर क्षण है लेखा ।

डॉ.रसिक किशोर सिंह नीरज
गीतकार रायबरेली

जिन्दगी | अवधी कविता | इन्द्रेश भदौरिया

जिन्दगी | अवधी कविता | इन्द्रेश भदौरिया

रंग कइसा देखावत हवै जिन्दगी।
रंक राजा बनावत हवै जिन्दगी।

आजु आये हवौ काल्हि जइहौ चले,
एकु दिन सबका बोलावत हवै जिन्दगी।

जबै चाभी भरै तो खेलउना चलै,
जानी का? का? करावत हवै जिन्दगी।

जउनि दुस्मन रहे मेलु उनते करै,
मेली दुस्मन बनावत हवै जिन्दगी।

जिनका पहिले धरा पर गिराइसि रहै,
आजु उनका उठावत हवै जिन्दगी।

कुछौ हम ना करी कुछौ तुमना करौ,
काम सबकुछ करावत हवै जिन्दगी।

काम अच्छे करौ नेक इंसान बन,
यहै सबका बतावत हवै जिन्दगी।

हमतौ वहै बकेन जउन जानत रहेन,
नहीं आगे बतावत हवै जिन्दगी।

इन्द्रेश भदौरिया रायबरेली

गंगा | दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश’

गंगा | दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश’

हे पतित पावनी गंगा,
तेरी जय हो।
हे पापनाशिनी,
गंगा तेरी जय हो।
पर्वत से चलकर,
तू धरती पर आई।
तू आई तो धरती पर,
रौनक छाई।
मैं तेरा ही गुण गाऊं,
तेरी जय हो।
अमृत जैसा तेरा जल,
सबको भाया।
मानव पीने को,
तेरे तट पर आया।
हे मोक्षदायिनी गंगा,
तेरी जय हो।
अंत समय में सबको,
तू अपनाती है।
अपनी गोदी में फिर,
उसे सुलाती है।
जन्म-मरण की साक्षी,

तेरी जय हो।

दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश’
रायबरेली