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मैथिलीशरण गुप्त की नारी भावना चित्रण | maithili sharan gupt ki nari bhavna

मैथिलीशरण गुप्त की नारी भावना चित्रण | maithili sharan gupt ki nari bhavna

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जीवन परिचय

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त सन 1886 को चिरगांव जिला झांसी में हुआ था। आप खड़ी बोली के रचनाकार और द्विवेदी युग के कवि हैं। मैथिलीशरण गुप्त को राष्ट्रकवि की संज्ञा महात्मा गांधी ने दिया था। स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने सन 1952 में गुप्त जी को राज्यसभा सदस्य मनोनीत किया था।
साकेत, यशोधरा, द्वापर, पंचवटी, सैरन्ध्री, नहुष, भारत भारती जैसे प्रमुख रचनाएं हैं। साकेत महाकाव्य में सीता जी को, यशोधरा महाकाव्य में यशोधरा जी को संघर्ष, त्याग, बलिदान की प्रतिमूर्ति दिखाया गया है। मैथिलीशरण गुप्त की मृत्यु 12 दिसंबर 1964 को हुई थी।

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नारी भावना का चित्रण


आदिकाल से ही समाज में नारी का स्थान सम्माननीय और पूज्यनीय रहा है। नारी मानव की जननी एवं सृष्टि निर्माणी है। नारी को पुरुष की अर्धांगिनी कहा गया है। नारी और नर के संयोग से ही समाज का निर्माण हुआ है। नारी की प्रेरणा से मानव के अंदर महानता का संचार हुआ है। नारी मानव के जीवन में सौंदर्य और आनंद की अनुभूति के सुखद क्षणों का हिस्सा है, किंतु आज समाज में नारी का महत्व बदल गया है। इस बदलते हुए महत्व को देखते हुए मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है-

अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी।
आँचल में है दूध और आँखों में है पानी।।


गुप्त ने अपने काव्य में नारी की परिणीता (विवाहिता) रूप को स्वीकारा है। राष्ट्रकवि गुप्त जी ने सीता, यशोधरा, उर्मिला, कौशल्या, द्रौपदी आदि के माध्यम से नारी के उज्ज्वल और संघर्षशील वैवाहिक रूप को निरूपित किया है। उनकी दृष्टि में नारी पुरुषों के समय समस्त कार्य कर सकती है, कंधे से कंधा मिलाकर चल सकती है-

निज स्वामियों के कार्य में समभाग जो लेती न वे,
अनुराग पूर्वक योग जो उसमें सदा देती न वे।
तो फिर कहाती किस तरह अर्धांगिनी सुकुमारियाँ,
तात्पर्य यह अनुरूप ही थी नर वरों के नारियाँ।


यशोधरा आदर्श पत्नी है वह अपने पति को प्राणों से भी ज्यादा चाहती है। एक दिन भगवान गौतम बुद्ध रात्रि में यशोधरा को छोड़कर वन को चले जाते हैं। तभी उनके हृदय में आघात लगता है और कहती हैं-


नाथ कहाँ जाते हो, अब भी अंधकार छाया है,
हा! जाग कर क्या पाया, मैंने वह स्वप्न भी गवाया है।


यशोधरा “पूत कपूत हो सकता, पर माता कुमाता नहीं हो सकती”, की भावना से पति वियोग को भूल कर अपने शेष जीवन का आधार पुत्र राहुल को ही मानती हैं। मैथिलीशरण गुप्त ने माँ का पुत्र के प्रति स्नेह का सहज और मार्मिकता से परिपूर्ण वर्णन किया है-


तुझको क्षीर पिला कर लूँगी।
नयन नीर उनको ही दूँगी।


गुप्त जी की कविता में नारी की निर्बलता में सफलता, कठोरता में कोमलता का संधान और आत्म समर्पण में आत्म अभिमान का विधान दिखता है। गुप्त जी ने यशोधरा का चरित्र चित्रण बड़े मार्मिक ढंग से किया है-


कठोर हो वज्रादपि ओ कुसुमादि सुकुमारी,
आर्यपुत्र दे चुके परीक्षा, अब है मेरी बारी।।


गुप्त जी ने माँ सीता के माध्यम से स्त्री को स्वाभिमानी, परिश्रमी तथा पुरुषों को नानादि व्यंजन और स्नेह देकर खुश करने वाली, पति के सुख-दुःख में बराबर की सहभागिनी बताया है-


औरों के हाथों यहाँ नहीं पलती हूँ,
अपने पैरों पर खड़ी आप चलती हूँ।
श्रमवारि बिंदुफल स्वास्थ्य शुचि फलती हूँ,
अपने अंचल से व्यंजन आप झलती हूँ।


गुप्त जी ने लक्ष्मण-उर्मिला के माध्यम से स्त्री को संघर्षशील बनने के साथ-साथ सुंदर सुकुमारी प्रेमिका एवं पत्नी के रूप में चित्रित किया है। लक्ष्मण की जीवनसंगिनी उर्मिला के माध्यम से मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है कि पत्नी को भी साथ चलने और जीवन के संघर्षों में साथ खड़े होने का अवसर दीजिये-


वन में तनिक तपस्या करके,
बनने दो मुझको निज योग्य,
भाभी की भगिनी, तुम मेरे,
अर्थ नहीं केवल उपभोग्य।


गुप्त ने साकेत महाकाव्य के माध्यम से लिखा है की स्त्री रामराज्य छोड़कर वन गमन को जाती है। वहाँ भी गुरुजनों, परिजनों का सम्मान करना नहीं भूलती है। सभी को अतिथि मानती है। यहाँ तक जड़ी बूटियों का ज्ञान रखकर वैद्य की भाँति इलाज भी कर सकती है। विपरीत परिस्थितियों में स्त्री सब सीख जाती है और पुरुष को हर मुश्किल से उबार सकती है-


गुरुजन परिजन सब धन्य धन्य ध्येय हैं मेरे,
औषधियों के गुण-विगुण ज्ञेय हैं मेरे।
वन-देव-देवियाँ अतिथेय हैं मेरे,
प्रिय संग यहाँ सब प्रेय श्रेय हैं मेरे।

अंत में इतना ही कहना चाहूँगा कि मैथिलीशरण गुप्त के साहित्य सृजन में राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रीय भावना कूट-कूट कर भरी गयी है। सन 1900 के दशक में स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई चरम पर थी। गुप्त जी को जितनी चिंता नारी सम्मान की थी, उससे कहीं ज्यादा चिंता देश के हालातों पर थी। आप प्रखर वक्ता और निडर साहित्यकार थे, अपनी भारतीय जनता को जगाने का प्रयास करते हैं।

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1912 ई० गुप्त की रचना भारत भारती अंग्रेजों ने जब्त कर ली थी।भारत की परतंत्रता देखकर भी सोई जनता की जगाती हुई रचना दृष्टव्य है-
हम कौन थे, क्या हो गए हैं,
और क्या होंगे अभी?
आओ विचारे आज मिलकर,
ये समस्याएँ सभी।

सरयू-भगवती कुंज
अशोक कुमार गौतम
अध्यक्ष हिंदी विभाग
शिवा जी नगर
रायबरेली (उ.प्र.)
9415951459
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मैथिलीशरण गुप्त का जीवनवृत्त | Biography of Maithilisharan Gupta

मैथिलीशरण गुप्त का जीवनवृत्त | Biography of Maithilisharan Gupta

  • जन्म- 3 अगस्त सन 1886 ई०
  • श्रावण मास शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि
  • जन्मस्थान- चिरगाँव झांसी।


मैथिलीशरण गुप्त वैष्णव परिवार में जन्मे थे। पिता सेठ राम चरण कवि थे। वे कनक लता नाम से रचनाएं करते थे। गुप्त द्विवेदी युग के प्रमुख और प्रखर कवि थे, जिन्हें राष्ट्रकवि की संज्ञा महात्मा गांधी ने दी थी।
स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ० राजेंद्र प्रसाद ने मैथिलीशरण गुप्त को सन 1952 में राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया किया था। गुप्त जी ने आचार्य महावीर द्विवेदी को अपना अनुयाई माना था।

मैथिलीशरण गुप्त की प्रमुख रचनाएँ-


रंग में भंग, जयद्रथ वध, पंचवटी, त्रिपथगा, किसान, विराट भट, गुरुकुल, साकेत, यशोधरा, द्वापर, सिद्धराज सैरंध्री, नहुष, शकुंतला, भारत भारती, स्वदेश संगीत, वेतालिक, हिंदू, झंकार, मंगलघट आदि कृतियां हैं।
साकेत महाकाव्य गुप्त की कालजयी रचना है, जिसका प्रकाशन सन् 1921 में हुआ। साकेत का अर्थ अयोध्या है। साकेत महाकाव्य में चित्रकूट में सीता जी को खुरपी, कुदाल, चरखा चलाना, वृक्ष लगाना, सिंचाई करना, अपने हाथों से खाना बनाना, सफाई करना आदि संघर्षपूर्ण कार्य करते हुए दिखाया गया है। इस महाकाव्य में करुण रस प्रमुख है। उर्मिला का विरह वर्णन लिखा गया है। सीता राजपाट छोड़ जंगल में आकर अपना प्रत्येक कार्य स्वयं करती हुई कहती हैं-
औरों के हाँथों यहाँ नहीं पलती हूँ,
अपने पैरों खड़ी आप चलती हूँ।
श्रमवारि बिन्दुफल स्वास्थ्य सुचि फलती हूँ,
अपने अंचल से व्यंजन आप झलती हूँ।

यशोधरा कृति का प्रकाशन सन 1933 में हुआ। इस रचना में मुख्य नायिका भगवान गौतमबुद्ध की पत्नी यशोधरा है, जो उर्मिला की भाँति उपेक्षित है। इस ग्रंथ में गद्य-पद्य, दृश्य-श्रव्य का अद्भुत समन्वय है-

अबला जीवन हाय! तुम्हारी येही कहानी–
आँचल में है दूध और आँखों में पानी!

मैथिलीशरण गुप्त की भाषा खड़ी बोली है। भाषा सुबोध सरस भाव व्यंजनापूर्ण है। गुप्त ने अपनी रचनाओं में प्रसाद, माधुर्य, ओज गुण स्थापित किया है। विवरणात्मक गीत काव्य शैली, उपदेश प्रधान शैली की प्रचुरता है।
श्रृंगार और वीर रस की प्रधानता है। उपमा, रूपक, अनुप्रास, उत्प्रेक्षा, विभावना, विरोधाभास, यमक, श्लेष, मानवीकरण अलंकारों का प्रयोग किया गया है। हरिगीतिका, दोहा, सोरठा, गीतिका, घनाक्षरी, सवैया छंद का प्रयोग है।
आपके के नाम से चिरगांव में राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय भी खोला गया है।
राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त 12 दिसंबर 1964 को हमेशा के लिए चिरनिद्रा में लीन हो गए और साहित्य जगत का एक तारा अस्त हो गया।

अशोक कुमार गौतम
असिस्टेंट प्रोफेसर (विभागाध्यक्ष हिंदी)
शिवा जी नगर, दूरभाष नगर
रायबरेली (उ.प्र.)
मो. 9415951459

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बाल श्रम पर लेख | Paragraph on Child Labour in Hindi

बाल श्रम पर लेख | Paragraph on Child Labour in Hindi

बाल कार्य क्या है

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि पंडित जवाहरलाल नेहरु का जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है एक तरफ तो हम इस दिन को बड़े ही उत्साह से मनाते हैं लेकिन दूसरी और हमारा ध्यान उन बच्चों की ओर नहीं जाता है जिन का शोषण कहीं न कहीं किसी रूप में समाज में हो रहा है हमारे समाज में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो गरीब तबके के बच्चों को चंद पैसों की खातिर अपने निजी जरूरतों के लिए उनका प्रयोग करते हैं आज हमारे समाज में एक बहुत ही शर्मनाक विभीषिका है वह है बाल श्रम

बाल श्रम का प्रमुख कारण क्या है?

अगर आप अपने आसपास नजर दौड़ आएंगे तो आपको अनेक ऐसे बच्चे दिखाई पड़ेंगे जो अपनी उम्र से कहीं ज्यादा जिम्मेदारियों का बोझ उठाए हुए हैं कभी कंधे पर बोरा लेकर कबाड़ चलते हुए कहीं किसी होटल में चाय के गिलास धोते हुए या फिर छोटे-छोटे कोमल हाथों से किसी घर में बर्तन साफ करते हुए यह भी किसी के बगीचे के फूल है इनका माली भी अपने फूल को मुस्कुराता और फलता फूलता देखना चाहता है लेकिन इनकी मजबूरी इनकी गरीबी इन्हें यह सोचने और सपने देखने की इजाजत नहीं देती है हमारे समाज में ही कुछ ऐसे लोग हैं जो अपने हित और फायदे के लिए इन मासूमों का शोषण कर उनसे उनका बचपन छीन कर जरूर तो और अभाव का वास्ता देकर उन्हें बाल श्रम की भट्टी में झोंक देते हैं और इस तरह समाज का एक वर्ग एक पीढ़ी एक नस्लें देश के भावी कर्णधार पढ़ने की उम्र में अशिक्षित रह जाते हैं और आगे चलकर यही समाज के लिए कलंक बाना समस्या पैदा करते हैं इसी तरह से बेरोजगारी आतंकवाद चोरी डकैती आदि को बढ़ावा मिलता है।

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बालश्रम को रोकने के लिए क्या कदम उठाने चाहिए?

बच्चे अगर यह शिक्षित होंगे तो एक अच्छा नागरिक बन देश के सुधार में भागीदार बनेंगे इस समस्या को खत्म करने के लिए हम आपको ही पहल करनी होगी इस बच्चों से हम अपना निजी स्वार्थ सिद्ध ना करें हो सके तो इन्हें आर्थिक मदद कर उनके जीवन का अंधकार मिटा कर शिक्षा रूपी प्रकाश प्रदान करें जोकि ज्ञान से वंचित हो अज्ञानता के भंवर में डूब जा रहे हैं हमें एकजुट होकर समाज की इस बुराई को दूर करना चाहिए मैं कहती हूं ऊंची ऊंची बात करने वाले समाज के उन सेवकों को क्या इनका दर्द नहीं दिखाई पड़ता इनके दिलों में कभी किसी ने झांक कर देखा है कि यह भी कुछ कहना चाहते हैं इनके भी कोई सपने हैं हमें आपको ही इसे रोकना है आगे हाथ बढ़ाकर इन्हें एक अच्छा नागरिक बनने का अवसर प्रदान करिए जिस तरह कोई किसी कोमल पौधे को सिर उठाने से पहले रौंद डालें ठीक उसी तरह बाल श्रम है वे मासूम जिन्हें हमें प्यार से सीचना चाहिए उन्हें यह समाज कठोर जीवन जीने के लिए मजबूर कर देता है ।

बाल श्रम पर कविता

बाल श्रम वह अग्नि है जिसने फूलो को भी न छोडा है
हवा न दो इस चिनगारी को जिसने मानव के जमीर को निगला है
जलाने के लिए है समाज मे बहुत जलावन
भस्म करो उन बुराइयो को
जिसने मानव से मानवता को छीना है
झोके न तुम इन मासूम फूलो को
बाल श्रम की भट्टी मे
मुरझाने न दो इन्हे समय से पहले
‘प्रेम ‘का समाज से यह कहना है.

प्रेमलता शर्मा
प्रेमलता शर्मा

आपको बाल श्रम पर लेख | Paragraph on Child Labour in Hindi प्रेमलता शर्मा का लेख कैसा लगा अपने सुझाव कमेंट बॉक्स में अवश्य बताये , आपके सुझावों का हमे इंतज़ार रहेगा।

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लघुकथा | एक नई रोशनी -सविता चडढा

लघुकथा | एक नई रोशनी -सविता चडढा

उस दिन बाप बेटे में तकरार शुरू हो गई। देर रात बेटे ने कुछ ज्यादा ही पी ली थी। बाप ने समझाने की कोशिश की लेकिन तकरार बढ़ते-बढते बहुत सारी हदें पार कर गई । तकरार के बाद धक्का-मुक्की शुरू हुई और बेटे ने बाप पर हाथ उठा दिया।  बाप  चोटिल हो गया। 

अगले दिन  बाप ने सोचा भगवान से ही जाकर पूछता हूं । सुबह उठने पर जब वह धीरे-धीरे मंदिर की सीढ़ियां चड़ रहा था तो उसे एक महिला ने पूछा “अंकल  आपको क्या हुआ ।” उसने नजरें उठाई और देखा , ये तो गुणवंती की बहू है । उसने घर ,अपने  सम्मान को बचाने की फिज़ूल कोशिश करते  हुए इतना ही कहा “भगवान का शुक्र मनाओ गुणवंती की बहू ,भगवान ने तुम्हें तीन बेटियां ही दी है।  बेटियां कभी बाप पर हाथ नहीं उठाती। गुणवंती की बहू ने एक नई रोशनी महसूस की और भगवान का आभार प्रकट किया।

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राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जीवन परिचय

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त सन 1886 को चिरगांव जिला झांसी में हुआ था। आप खड़ी बोली के रचनाकार और द्विवेदी युग के कवि हैं। मैथिलीशरण गुप्त को राष्ट्रकवि की संज्ञा महात्मा गांधी ने दिया था। स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने सन 1952 में गुप्त जी को राज्यसभा सदस्य मनोनीत किया था।
साकेत, यशोधरा, द्वापर, पंचवटी, सैरन्ध्री, नहुष, भारत भारती जैसे प्रमुख रचनाएं हैं। साकेत महाकाव्य में सीता जी को, यशोधरा महाकाव्य में यशोधरा जी को संघर्ष, त्याग, बलिदान की प्रतिमूर्ति दिखाया गया है। मैथिलीशरण गुप्त की मृत्यु 12 दिसंबर 1964 को हुई थी।

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नारी भावना का चित्रण


आदिकाल से ही समाज में नारी का स्थान सम्माननीय और पूज्यनीय रहा है। नारी मानव की जननी एवं सृष्टि निर्माणी है। नारी को पुरुष की अर्धांगिनी कहा गया है। नारी और नर के संयोग से ही समाज का निर्माण हुआ है। नारी की प्रेरणा से मानव के अंदर महानता का संचार हुआ है। नारी मानव के जीवन में सौंदर्य और आनंद की अनुभूति के सुखद क्षणों का हिस्सा है, किंतु आज समाज में नारी का महत्व बदल गया है। इस बदलते हुए महत्व को देखते हुए मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है-

अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी।
आँचल में है दूध और आँखों में है पानी।।


गुप्त ने अपने काव्य में नारी की परिणीता (विवाहिता) रूप को स्वीकारा है। राष्ट्रकवि गुप्त जी ने सीता, यशोधरा, उर्मिला, कौशल्या, द्रौपदी आदि के माध्यम से नारी के उज्ज्वल और संघर्षशील वैवाहिक रूप को निरूपित किया है। उनकी दृष्टि में नारी पुरुषों के समय समस्त कार्य कर सकती है, कंधे से कंधा मिलाकर चल सकती है-

निज स्वामियों के कार्य में समभाग जो लेती न वे,
अनुराग पूर्वक योग जो उसमें सदा देती न वे।
तो फिर कहाती किस तरह अर्धांगिनी सुकुमारियाँ,
तात्पर्य यह अनुरूप ही थी नर वरों के नारियाँ।


यशोधरा आदर्श पत्नी है वह अपने पति को प्राणों से भी ज्यादा चाहती है। एक दिन भगवान गौतम बुद्ध रात्रि में यशोधरा को छोड़कर वन को चले जाते हैं। तभी उनके हृदय में आघात लगता है और कहती हैं-


नाथ कहाँ जाते हो, अब भी अंधकार छाया है,
हा! जाग कर क्या पाया, मैंने वह स्वप्न भी गवाया है।


यशोधरा “पूत कपूत हो सकता, पर माता कुमाता नहीं हो सकती”, की भावना से पति वियोग को भूल कर अपने शेष जीवन का आधार पुत्र राहुल को ही मानती हैं। मैथिलीशरण गुप्त ने माँ का पुत्र के प्रति स्नेह का सहज और मार्मिकता से परिपूर्ण वर्णन किया है-


तुझको क्षीर पिला कर लूँगी।
नयन नीर उनको ही दूँगी।


गुप्त जी की कविता में नारी की निर्बलता में सफलता, कठोरता में कोमलता का संधान और आत्म समर्पण में आत्म अभिमान का विधान दिखता है। गुप्त जी ने यशोधरा का चरित्र चित्रण बड़े मार्मिक ढंग से किया है-


कठोर हो वज्रादपि ओ कुसुमादि सुकुमारी,
आर्यपुत्र दे चुके परीक्षा, अब है मेरी बारी।।


गुप्त जी ने माँ सीता के माध्यम से स्त्री को स्वाभिमानी, परिश्रमी तथा पुरुषों को नानादि व्यंजन और स्नेह देकर खुश करने वाली, पति के सुख-दुःख में बराबर की सहभागिनी बताया है-


औरों के हाथों यहाँ नहीं पलती हूँ,
अपने पैरों पर खड़ी आप चलती हूँ।
श्रमवारि बिंदुफल स्वास्थ्य शुचि फलती हूँ,
अपने अंचल से व्यंजन आप झलती हूँ।


गुप्त जी ने लक्ष्मण-उर्मिला के माध्यम से स्त्री को संघर्षशील बनने के साथ-साथ सुंदर सुकुमारी प्रेमिका एवं पत्नी के रूप में चित्रित किया है। लक्ष्मण की जीवनसंगिनी उर्मिला के माध्यम से मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है कि पत्नी को भी साथ चलने और जीवन के संघर्षों में साथ खड़े होने का अवसर दीजिये-


वन में तनिक तपस्या करके,
बनने दो मुझको निज योग्य,
भाभी की भगिनी, तुम मेरे,
अर्थ नहीं केवल उपभोग्य।


गुप्त ने साकेत महाकाव्य के माध्यम से लिखा है की स्त्री रामराज्य छोड़कर वन गमन को जाती है। वहाँ भी गुरुजनों, परिजनों का सम्मान करना नहीं भूलती है। सभी को अतिथि मानती है। यहाँ तक जड़ी बूटियों का ज्ञान रखकर वैद्य की भाँति इलाज भी कर सकती है। विपरीत परिस्थितियों में स्त्री सब सीख जाती है और पुरुष को हर मुश्किल से उबार सकती है-


गुरुजन परिजन सब धन्य धन्य ध्येय हैं मेरे,
औषधियों के गुण-विगुण ज्ञेय हैं मेरे।
वन-देव-देवियाँ अतिथेय हैं मेरे,
प्रिय संग यहाँ सब प्रेय श्रेय हैं मेरे।

अंत में इतना ही कहना चाहूँगा कि मैथिलीशरण गुप्त के साहित्य सृजन में राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रीय भावना कूट-कूट कर भरी गयी है। सन 1900 के दशक में स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई चरम पर थी। गुप्त जी को जितनी चिंता नारी सम्मान की थी, उससे कहीं ज्यादा चिंता देश के हालातों पर थी। आप प्रखर वक्ता और निडर साहित्यकार थे, अपनी भारतीय जनता को जगाने का प्रयास करते हैं।

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1912 ई० गुप्त की रचना भारत भारती अंग्रेजों ने जब्त कर ली थी।भारत की परतंत्रता देखकर भी सोई जनता की जगाती हुई रचना दृष्टव्य है-
हम कौन थे, क्या हो गए हैं,
और क्या होंगे अभी?
आओ विचारे आज मिलकर,
ये समस्याएँ सभी।

सरयू-भगवती कुंज
अशोक कुमार गौतम
अध्यक्ष हिंदी विभाग
शिवा जी नगर
रायबरेली (उ.प्र.)
9415951459
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मैथिलीशरण गुप्त का जीवनवृत्त | Biography of Maithilisharan Gupta

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  • जन्म- 3 अगस्त सन 1886 ई०
  • श्रावण मास शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि
  • जन्मस्थान- चिरगाँव झांसी।


मैथिलीशरण गुप्त वैष्णव परिवार में जन्मे थे। पिता सेठ राम चरण कवि थे। वे कनक लता नाम से रचनाएं करते थे। गुप्त द्विवेदी युग के प्रमुख और प्रखर कवि थे, जिन्हें राष्ट्रकवि की संज्ञा महात्मा गांधी ने दी थी।
स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ० राजेंद्र प्रसाद ने मैथिलीशरण गुप्त को सन 1952 में राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया किया था। गुप्त जी ने आचार्य महावीर द्विवेदी को अपना अनुयाई माना था।

मैथिलीशरण गुप्त की प्रमुख रचनाएँ-


रंग में भंग, जयद्रथ वध, पंचवटी, त्रिपथगा, किसान, विराट भट, गुरुकुल, साकेत, यशोधरा, द्वापर, सिद्धराज सैरंध्री, नहुष, शकुंतला, भारत भारती, स्वदेश संगीत, वेतालिक, हिंदू, झंकार, मंगलघट आदि कृतियां हैं।
साकेत महाकाव्य गुप्त की कालजयी रचना है, जिसका प्रकाशन सन् 1921 में हुआ। साकेत का अर्थ अयोध्या है। साकेत महाकाव्य में चित्रकूट में सीता जी को खुरपी, कुदाल, चरखा चलाना, वृक्ष लगाना, सिंचाई करना, अपने हाथों से खाना बनाना, सफाई करना आदि संघर्षपूर्ण कार्य करते हुए दिखाया गया है। इस महाकाव्य में करुण रस प्रमुख है। उर्मिला का विरह वर्णन लिखा गया है। सीता राजपाट छोड़ जंगल में आकर अपना प्रत्येक कार्य स्वयं करती हुई कहती हैं-
औरों के हाँथों यहाँ नहीं पलती हूँ,
अपने पैरों खड़ी आप चलती हूँ।
श्रमवारि बिन्दुफल स्वास्थ्य सुचि फलती हूँ,
अपने अंचल से व्यंजन आप झलती हूँ।

यशोधरा कृति का प्रकाशन सन 1933 में हुआ। इस रचना में मुख्य नायिका भगवान गौतमबुद्ध की पत्नी यशोधरा है, जो उर्मिला की भाँति उपेक्षित है। इस ग्रंथ में गद्य-पद्य, दृश्य-श्रव्य का अद्भुत समन्वय है-

अबला जीवन हाय! तुम्हारी येही कहानी–
आँचल में है दूध और आँखों में पानी!

मैथिलीशरण गुप्त की भाषा खड़ी बोली है। भाषा सुबोध सरस भाव व्यंजनापूर्ण है। गुप्त ने अपनी रचनाओं में प्रसाद, माधुर्य, ओज गुण स्थापित किया है। विवरणात्मक गीत काव्य शैली, उपदेश प्रधान शैली की प्रचुरता है।
श्रृंगार और वीर रस की प्रधानता है। उपमा, रूपक, अनुप्रास, उत्प्रेक्षा, विभावना, विरोधाभास, यमक, श्लेष, मानवीकरण अलंकारों का प्रयोग किया गया है। हरिगीतिका, दोहा, सोरठा, गीतिका, घनाक्षरी, सवैया छंद का प्रयोग है।
आपके के नाम से चिरगांव में राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय भी खोला गया है।
राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त 12 दिसंबर 1964 को हमेशा के लिए चिरनिद्रा में लीन हो गए और साहित्य जगत का एक तारा अस्त हो गया।

अशोक कुमार गौतम
असिस्टेंट प्रोफेसर (विभागाध्यक्ष हिंदी)
शिवा जी नगर, दूरभाष नगर
रायबरेली (उ.प्र.)
मो. 9415951459

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जैसा कि हम सभी जानते हैं कि पंडित जवाहरलाल नेहरु का जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है एक तरफ तो हम इस दिन को बड़े ही उत्साह से मनाते हैं लेकिन दूसरी और हमारा ध्यान उन बच्चों की ओर नहीं जाता है जिन का शोषण कहीं न कहीं किसी रूप में समाज में हो रहा है हमारे समाज में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो गरीब तबके के बच्चों को चंद पैसों की खातिर अपने निजी जरूरतों के लिए उनका प्रयोग करते हैं आज हमारे समाज में एक बहुत ही शर्मनाक विभीषिका है वह है बाल श्रम

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बालश्रम को रोकने के लिए क्या कदम उठाने चाहिए?

बच्चे अगर यह शिक्षित होंगे तो एक अच्छा नागरिक बन देश के सुधार में भागीदार बनेंगे इस समस्या को खत्म करने के लिए हम आपको ही पहल करनी होगी इस बच्चों से हम अपना निजी स्वार्थ सिद्ध ना करें हो सके तो इन्हें आर्थिक मदद कर उनके जीवन का अंधकार मिटा कर शिक्षा रूपी प्रकाश प्रदान करें जोकि ज्ञान से वंचित हो अज्ञानता के भंवर में डूब जा रहे हैं हमें एकजुट होकर समाज की इस बुराई को दूर करना चाहिए मैं कहती हूं ऊंची ऊंची बात करने वाले समाज के उन सेवकों को क्या इनका दर्द नहीं दिखाई पड़ता इनके दिलों में कभी किसी ने झांक कर देखा है कि यह भी कुछ कहना चाहते हैं इनके भी कोई सपने हैं हमें आपको ही इसे रोकना है आगे हाथ बढ़ाकर इन्हें एक अच्छा नागरिक बनने का अवसर प्रदान करिए जिस तरह कोई किसी कोमल पौधे को सिर उठाने से पहले रौंद डालें ठीक उसी तरह बाल श्रम है वे मासूम जिन्हें हमें प्यार से सीचना चाहिए उन्हें यह समाज कठोर जीवन जीने के लिए मजबूर कर देता है ।

बाल श्रम पर कविता

बाल श्रम वह अग्नि है जिसने फूलो को भी न छोडा है
हवा न दो इस चिनगारी को जिसने मानव के जमीर को निगला है
जलाने के लिए है समाज मे बहुत जलावन
भस्म करो उन बुराइयो को
जिसने मानव से मानवता को छीना है
झोके न तुम इन मासूम फूलो को
बाल श्रम की भट्टी मे
मुरझाने न दो इन्हे समय से पहले
‘प्रेम ‘का समाज से यह कहना है.

प्रेमलता शर्मा
प्रेमलता शर्मा

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लघुकथा | एक नई रोशनी -सविता चडढा

लघुकथा | एक नई रोशनी -सविता चडढा

उस दिन बाप बेटे में तकरार शुरू हो गई। देर रात बेटे ने कुछ ज्यादा ही पी ली थी। बाप ने समझाने की कोशिश की लेकिन तकरार बढ़ते-बढते बहुत सारी हदें पार कर गई । तकरार के बाद धक्का-मुक्की शुरू हुई और बेटे ने बाप पर हाथ उठा दिया।  बाप  चोटिल हो गया। 

अगले दिन  बाप ने सोचा भगवान से ही जाकर पूछता हूं । सुबह उठने पर जब वह धीरे-धीरे मंदिर की सीढ़ियां चड़ रहा था तो उसे एक महिला ने पूछा “अंकल  आपको क्या हुआ ।” उसने नजरें उठाई और देखा , ये तो गुणवंती की बहू है । उसने घर ,अपने  सम्मान को बचाने की फिज़ूल कोशिश करते  हुए इतना ही कहा “भगवान का शुक्र मनाओ गुणवंती की बहू ,भगवान ने तुम्हें तीन बेटियां ही दी है।  बेटियां कभी बाप पर हाथ नहीं उठाती। गुणवंती की बहू ने एक नई रोशनी महसूस की और भगवान का आभार प्रकट किया।

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मण्डी नगर और शिवमन्दिर | Mandi Nagar and shiv Mandir – आशा शैली

मण्डी नगर और शिवमन्दिर | Mandi Nagar and shiv Mandir – आशा शैली

हिमाचल प्रदेश में कुल मिलाकर बारह जिले हैं। प्रत्येक जिले की अपनी देव-परम्पराएँ और मेले त्यौहार हैं। इनमें से कुछ तो देश भर में विख्यात हैं और कुछ को अब विश्व स्तर पर भी पहचान मिलने लगी है। इन विख्यात त्यौहारों में कुल्लू का दशहरा, किन्नौर का फ्लैच, रामपुर का लवी मेला, चम्बा का मिंजर और मण्डी की शिवरात्रि आदि की गणना की जा सकती है। इन मेलों में एक बात जो समान है वह है देवताओं की सहभागिता। पूरे प्रदेश में देवताओं की सहभागिता को विशेष महत्व दिया जाता है और इनके प्रति इस प्रकार का व्यवहार अमल में लाया जाता है जैसे वह हम-आप जैसे ही हो किन्तु हमसे उच्च और विशिष्ट स्थान रखते हों। इस प्रकार आदर दिया जाता है जैसे किसी राजा-महाराजा को दिया जाए। लोग इन की पालकियों को सामने रखकर इस तरह नाचते-गाते हैं मानों देवता इन लोगों को देख रहा है और नाचने वाले इस प्रकार नृत्य मग्न होते हैं मानों देवता को प्रसन्न कर रहे हों। यही हिमाचल के मेलों की सबसे बड़ी विशेषता होती है वरना क्रय-विक्रय तो प्रत्येक मेले में होता ही है। हिमाचली मेलों की दूसरी विशेषता होती है वहाँ के लोकनृत्य, जिन्हें नाटी कहा जाता है, नाटी अर्थात् सामूहिक नृत्य। तो आइए कुछ बातें मण्डी नगर और उसकी शिवरात्रि की करें। इसके लिए हम आप को मण्डी ले चलते हैं, क्योंकि मण्डी जिले की सुन्दरता के लिए ही हिमाचल की सुन्दरता का बखान होता है।

मण्डी नगर जो कि जिला मुख्यालय भी है, व्यास और सुकेती नदियों के संगम स्थल पर समुद्र तल से 760 मीटर के ऊँचाई पर बसा हुआ एक सुन्दर और रमणीक नगर है। इतिहासकारों के अनुसार यह स्थान कुल्लू और लाहुल-स्पिति जाने के मार्ग में पड़ता है इस लिए यह मैदानों और पहाड़ों को जोड़ने वाली एक कड़ी रहा है। व्यापार का केंद्र रहने के कारण ही सम्भवतया इस का नाम मण्डी पड़ गया हो, लेकिन मण्डी नाम माण्डव्य ऋषि से सम्बद्ध भी माना जाता है। जनश्रुति के अनुसार माण्डव्य ऋषि ने इस क्षेत्र में तपस्या की थी। इस क्षेत्र में रियासतों की स्थापना जहाँ सातवीं ईस्वी पूर्व की मानी जाती है वहीं इस नगर की स्थापना बारे तथ्य है कि ईस्वी सन् 1526 में इसे मण्डी रियासत के शासक अजबरसेन ने बसाया था। इससे पूर्व इस स्थान पर घने जंगल हुआ करते थे। रियासत की राजधानी पुरानी मण्डी हुआ करती थी। इस जंगल पर सलयाणा के राणा गोकल का अधिकार था। लेकिन मण्डी में अजबरसेन का शासन था। राणा लोग राजाओं के अधीन ही रहते थे।

कहा जाता है कि एक दिन अजबरसेन को स्वप्न दिखई दिया। जिसमें राजा ने देखा कि एक गाय जंगल में एक स्थान पर आकर खड़ी हो जाती है और उसके थनों से अपने-आप दूध बहने लगता है। जिस स्थान पर दूध गिर रहा था वहाँ राजा को एक शिवलिंग नजर आया। उपरोक्त स्वप्न राजा को निरंतर कई रातों तक दिखाई देता रहा। जब ऐसा बार-बार होने लगा तो राजा ने अपने मंत्रियों को पूरी बात सुनाई। सुनकर सब ने ही आश्चर्य व्यक्त किया और इस बात की खोज-बीन करने का परामर्श राजा को दिया। राजा ने खोज कराई तो पता चला कि यह मात्र स्वप्न ही नहीं था, अपितु ठोस वास्तविकता थी। वास्तव में उस जंगल में एक स्थान पर ऐसा ही होता था, जैसा राजा ने स्वप्न में देखा था। तब राजा अजबरसेन ने उस स्थान पर बाबा भूतनाथ (सदाशिव) का मन्दिर बनवाया और अपनी राजधनी पुरानी मण्डी से यहाँ ले आए और स्वयं भी सदाशिव के शरणागत हो गए।

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भारत की स्वाधीनता के पश्चात् जब रियासतों का भारत संघ में विलय और हिमाचल का गठन हुआ तो 1948 में मण्डी, पांगणा और सुकेत की तीन छोटी-छोटी रियासतों को मिला कर इस क्षेत्र को भी जिले का रूप दिया गया और जिला मण्डी नाम दिया गया। वर्तमान में इस जिले का क्षेत्रफल 4018 वर्ग किमी. है।

इस समय इस नगर में छोटे-बड़े कुल मिलाकर 85 मन्दिर हैं, किन्तु प्रमुख मन्दिर आज से लगभग सौ वर्ष पूर्व व्यास नदी के किनारे पर तत्कालीन मण्डी नरेश विजयसेन की माता द्वारा बनवाया गया था। इस मन्दिर का नाम साहबानी है। मन्दिर में ग्यारह रुद्रों के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं की बहुत सी सुन्दर और कलात्मक मूर्तियाँ भी स्थापित की गई हैं। इसके अतिरिक्त अर्धनारीश्वर, पंचवक्त्र महादेव मन्दिर, त्रिलोकनाथ मन्दिर, जालपा (भीमाकाली) आदि अन्य देवी-देवताओं के भी मन्दिर हैं, परन्तु अधिक मात्रा शिव मन्दिरों की ही है। इन्ही शिव मन्दिरों के कारण इसे छोटी काशी कहा जाता है।

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मण्डी रियासत के अधिकतर शासक शैव रहे हैं इसीलिए यहाँ शिवमन्दिरों की बहुतायत है। त्रिलोकीनाथ मन्दिर राजा अजबरसेन की रानी सुल्तान देवी ने अपने पति की सुख-समृद्धि के लिए बनवाया था इसका निर्माणकाल 1520 ईस्वी के आस-पास बताया जाता है। इस दृष्टि से त्रिलोकी नाथ मन्दिर पहले बना और भूतनाथ मन्दिर बाद में परन्तु भूतनाथ मन्दिर की मान्यता और प्रसिद्धि अधिक है। मण्डी का शिवरात्रि मेला भी भूतनाथ मन्दिर से ही प्रारम्भ हुआ माना जाता है। ईस्वी सन्1527 की शिवरात्रि को इस मन्दिर की प्राणप्रतिष्ठा की गई और उसी दिन से यह मेला प्रारम्भ किया गया जो अब पूरे भारत में विख्यात हो चुका है। मण्डी नगर और शिवरात्रि एक-दूसरे के पर्यायवाची बन गए हैं। घरों में पकवान बनने लगते हैं और कानों में गूंजने लगते हैं स्वर खरनाली, हरणसिंगे और ढोल की थाप के। अभी तक शिवरात्रि का मेला मण्डी में सात दिन तक चलता है। इस मेले में पूरे प्रदेश ही नहीं भारत के अन्य स्थानों के लोग भी स्थानीय देवताओं की ही तरह भाग लेते हैं। लेकिन इस मेले में अधिक सहभागिता हिमाचल सरकार की ही रहती है क्योंकि यह मेला अब विशुद्ध सरकरी तंत्र पर निर्भर हो कर रह गया है।

मण्डी वासियों की मान्यता है कि सूखा पड़ने की स्थिति में व्यास का इतना जल शिवलिंग पर चढ़ाया जाए कि पानी पुनः व्यास में मिलने लगे तो वर्षा हो जाती है। अतः सूखे की स्थिति में लोग आज भी घड़े भर-भर पानी शिवलिंग पर चढ़ाते हैं और इसकी निरंतरता को तब तक बनाए रखा जाता है, जब तक पानी की धारा व्यास में न मिलने लगे।
मण्डी का शिवरात्रि मेला भी हिमाचल के अन्य मेलों की ही भान्ति उन्हीं सारी परम्पराओं का निर्वाह करता है जिनका अन्य मेले करते हैं परन्तु प्रगति की अन्धी दौड़ में पुरातन कहीं खोता जा रहा है। नगर में नवनिर्माण के नाम पर बस्तियाँ मन्दिरों के प्रागणों तक फैलती जा रही हैं। नगर के मध्य भाग में राजा सिद्धिसेन का बनाया सुभाष पार्क है, जिसके एक कोने में मन्दिर और दूसरे कोने में सार्वजनिक शौचालय है। जिसकी सफाई न होने से साथ में ही बने पुस्तकालय एवं पाठशाला में बैठना भी दूभर हो जाता है। मन्दिरों का रख-रखाव भाषा एवं कला संस्कृति विभाग के सुपुर्द होने से मन्दिर सुरक्षित हैं लेकिन नगर अपना ऐतिहासिक महत्व खोता जा रहा है। मन्दिरों के पुजारी धूप जला कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। जहाँ एक भ्रांत-क्लांत मन विश्राम और शान्ति की आशा लेकर आने पर एक भी हरी शाखा न पाकर नदी किनारे के गोल और सूखे पत्थरों के दर्शन कर लौट जाते हैं।
सेरी रंगमंच की दर्शकदीर्घा की सीढ़ियाँ उखाड़ दी गई हैं, जहाँ बैठकर लोग शिवरात्रि और अन्य विशेष समारोहों का आनन्द लेते थे। इस विकास से तो यह आभास हो रहा है कि किसी समय छोटीकाशी खोज का विषय बन जाएगी और मण्डी के 85 मन्दिर शोध का विषय बन जाएंगे।

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उत्तराखण्ड का इतिहास | History of Uttarakhand| आशा शैली

उत्तराखण्ड का इतिहास | History of Uttarakhand / आशा शैली

दुनिया जानती है कि इतिहास विजयी लोगों का होता है। पराजित सेनायें, राजा-महाराजा चाहे कितनी वीरता से ही क्यों न लड़े हों, उनका इतिहास ( History of Uttarakhand ) नहीं लिखा जाता, क्योंकि सत्ता विजेता के हाथ में होती है और वह धनबल से चाहे जो लिखवा सकता है। हाँ, यह बात अलग है कि पराजित वीरों की गाथायें जन-जन के हृदय में अवश्य रहती हैं और रहता है उन देशद्रोहियों के प्रति एक अव्यक्त आक्रोश जिनके कारण अन्यायी और अत्याचारी विजयश्री प्राप्त कर लेता है।

उत्तर भारत में स्थित एक नव निर्मित राज्य है

उत्तराखण्ड (पूर्व नाम उत्तरांचल), भले ही उत्तर भारत में स्थित एक नव निर्मित राज्य है परन्तु यहाँ का इतिहास अति प्राचीन है। प्राचीनकाल से लेकर स्वतंन्त्रता प्राप्ति तक अनेक इतिहासकारों ने अपने-अपने तरीके से इसका उल्लेख किया है। डॉ. अजय सिंह रावत की ‘उत्तराखण्ड का समग्र राजनैतिक इतिहास (पाषाण युग से 1949 तक) नामक पुस्तक के आमुख में ‘दीपक रावत आई.ए.एस.’ ने लिखा है कि उत्तराखण्ड से ऐसे अनेक पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त होते हैं, जिनके आधार पर यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यह क्षेत्र अतिप्राचीन काल से ही मानवीय गतिविधियों से सम्बद्ध रहा है।’1 वर्तमान में इसका निर्माण 9 नवम्बर 2000 को कई वर्षों के आन्दोलन के पश्चात् भारत गणराज्य के सत्ताइसवें राज्य के रूप में किया गया और सन् 2000 से 2006 तक यह उत्तरांचल के नाम से जाना जाता था। जनवरी 2007 में स्थानीय लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए राज्य का आधिकारिक नाम बदलकर उत्तराखण्ड कर दिया गया। राज्य की सीमाएँ उत्तर में तिब्बत और पूर्व में नेपाल से लगी हैं। पश्चिम में हिमाचल प्रदेश और दक्षिण में उत्तर प्रदेश इसकी सीमा से लगे राज्य हैं। सन 2000 में अपने गठन से पूर्व यह उत्तर प्रदेश का एक भाग था।

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पहले कहा जा चुका है कि उत्तराखण्ड भले ही नवनिर्मित राज्य हो परन्तु इसका इतिहास अति प्राचीन है। पारम्परिक हिन्दू ग्रन्थों और प्राचीन साहित्य में इस क्षेत्र का उल्लेख किया गया है। पांचवीं सदी ईस्वी पूर्व में पाणिनी ने इस क्षेत्र का उल्लेख ‘उत्तरपथे वाहृतम’ कहकर किया है। तैत्तरीय उपनिषद् में ‘नमो गंगा यमुनायोर्मध्ये ये वसानि, ते मे प्रसन्नात्मा चिरंजीवित वर्धयन्ति’ कह कर यहाँ के निवासियों के लिए मंगलकामनायें प्रकट की गई हैं। हिन्दी और संस्कृत में उत्तराखण्ड का अर्थ उत्तरी क्षेत्र या भाग होता है, इस राज्य में हिन्दू धर्म की पवित्रतम और भारत की सबसे बड़ी नदियों गंगा और यमुना के उद्गम स्थल क्रमशः गंगोत्री और यमुनोत्री तथा इनके तटों पर बसे वैदिक संस्कृति के कई महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थान हैं। आइए, आज हम उत्तराखण्ड के इतिहास पर एक दृष्टि डालें। इसके लिए हमें उत्तराखण्ड को अधिक गहराई से जानना होगा।
देहरादून, उत्तराखण्ड की अन्तरिम राजधानी होने के साथ इस राज्य का सबसे बड़ा नगर भी है। गैरसैण नामक एक छोटे से कस्बे को इसकी भौगोलिक स्थिति को देखते हुए भविष्य की राजधानी के रूप में प्रस्तावित तो किया गया है किन्तु विभिन्न विवादों और संसाधनों के अभाव के चलते अभी भी देहरादून ही अस्थाई राजधानी बना हुआ है परन्तु राज्य का उच्च न्यायालय नैनीताल में है। आइये उत्तराखण्ड के इतिहास को खंगालते हैं।

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उत्तराखण्ड के इतिहास


इतिहास बताता है कि प्राचीन काल में उत्तराखण्ड पर अनेक जातियों ने शासन किया जिनमें से कुणिन्द उत्तराखंड पर शासन करने वाली पहली राजनैतिक शक्ति कही जाती है। इसका प्रमाण हमें अशोक के कालसी अभिलेख से मिलता है। जौनसार बाबर तथा लेंसडाउन ;पौड़ीद्ध से मिली मुद्राओं से हमें उत्तराखण्ड में यौधेयों के शासन के भी प्रमाण मिलते हैं।
कुणिन्द प्रारंभ में मौर्यों के अधीन थे। कुणिन्द वंश के सबसे शक्तिशाली राजा अमोधभूति की मृत्यु के बाद उत्तराखण्ड के मैदानी भागां पर शकों ने अधिकार कर लिया।
शकों के पतन के बाद तराई वाले भागों में कुषाणों ने अधिकार कर लिया था। ‘बाडवाला यज्ञ वेदिका’ का निर्माण करने वाले शील वर्मन को कुछ विद्वान कुणिन्द व कुछ यौधेय मानते हैं। उत्तर महाभारतकाल, पाणिनी काल या बौद्धकाल में मैदानों से आने वाले लोगों के यहाँ बसने और स्थानीय लोगों से घुलमिल जाने की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी थी। ‘उत्तराखण्डःगढ़वाल की संस्कृति, इतिहास और लोक साहित्य’ पुस्तक, जिसे डॉ. शिव प्रसाद नैथानी ने लिखा है, की भूमिका में डॉ. नैथानी लिखते हैं, ‘उत्तराखण्ड गढ़वाल का प्राचीन साहित्य वैदिक काल के साहित्य के समान अलिखित, मौखिक और गेय-गान के रूप में होता था।’’
कर्तपुर राज्य के संस्थापक भी कुणिन्द ही थे, कर्तपुर में उस समय उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश तथा रोहिलखण्ड का उत्तरी भाग शामिल था। कालान्तर में कर्तपुर के कुणिन्दों को पराजित कर नागों ने उत्तराखण्ड पर अपना अधिकार कर लिया। नागों के बाद कन्नोज के मौखरियों ने उत्तराखण्ड पर शासन किया। मौखरी वंश का अंतिम शासक गृह्वर्मा था। हर्षवर्धन ने इसकी हत्या करके शासन को अपने हाथ में ले लिया। इसी हर्षवर्धन के शासन काल में चीनी यात्री व्हेनसांग उत्तराखण्ड भ्रमण पर आया था।
हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद उत्तराखण्ड पर अनेक छोटी-छोटी शक्तियों ने शासन किया। इसके पश्चात 700 ई. में कार्तिकेयपुर राजवंश की स्थापना हुई। इस वंश के तीन से अधिक परिवारों ने उत्तराखण्ड पर 700 ई. से 1030 ई. तक लगभग 300 साल तक शासन किया। इस राजवंश को उत्तराखण्ड का प्रथम ऐतिहासिक राजवंश कहा जाता है।
प्रारंभ में कार्तिकेयपुर राजवंश की राजधानी जोशीमठ ;चमोलीद्ध के समीप कार्तिकेयपुर नामक स्थान पर थी परन्तु बाद में राजधानी बैजनाथ (बागेश्वर) बनायी गई।
इस वंश का प्रथम शासक बसंतदेव था किन्तु बसंतदेव के बाद के इस वंश के राजाओं के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती। इसके बाद खर्परदेव के शासन के बारे में जानकारी मिलती है। खर्परदेव कन्नौज के राजा यशोवर्मन का समकालीन था। इसके बाद इसका पुत्र कल्याण राजा बना। खर्परदेव वंश का अंतिम शासक त्रिभुवन राज था।
नालंदा अभिलेख में बंगाल के पाल शासक धर्मपाल द्वारा गढ़वाल पर आक्रमण करने की जानकारी मिलती है। इसी आक्रमण के बाद कार्तिकेय राजवंश में खर्परदेव वंश के स्थान पर राजा निम्बर के वंश की स्थापना हुई। निम्बर ने जागेश्वर में विमानों का निर्माण करवाया था।
निम्बर के बाद उसका पुत्र इष्टगण शासक बना, उसने समस्त उत्तराखण्ड को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया था। जागेश्वर में नवदुर्गा, महिषमर्दिनी, लकुलीश तथा नटराज मंदिरों का निर्माण कराया।
इष्टगण के बाद उसका पुत्र ललित्शूर देव शासक बना तथा ललित्शूर देव के बाद उसका पुत्र भूदेव शासक बना इसने बौद्ध धर्म का विरोध किया तथा बैजनाथ मंदिर निर्माण में सहयोग दिया। कार्तिकेयपुर राजवंश में सलोड़ादित्य के पुत्र इच्छरदेव ने सलोड़ादित्य वंश की स्थापना की। कार्तिकेयपुर शासकों की राजभाषा संस्कृत तथा लोकभाषा पाली थी।
कार्तिकेयपुर शासनकाल में आदि गुरु शंकराचार्य उत्तराखण्ड आये। उन्होंने बद्रीनाथ व केदारनाथ मंदिरों का पुनरुद्धार कराया और सन 820 ई. में केदारनाथ में ही उन्होंने प्राणोत्सर्ग किया। कार्तिकेयपुर वंश के बाद कुमाऊं में कत्यूरियों का शासन हुआ


कत्यूरी वंश


मध्यकाल में कुमाऊं में कत्यूरियों का शासन था इसके बारे में जानकारी हमें स्थानीय लोकगाथाओं व जागर से मिलती है।
सन् 740 ई. से 1000 ई. तक गढ़वाल व कुमाऊं पर कत्यूरी वंश के तीन परिवारों का शासन रहा, तथा इनकी राजधानी कार्तिकेयपुर (जोशीमठ) थी। आसंतिदेव ने कत्यूरी राज्य में आसंतिदेव वंश की स्थापना की और अपनी राजधानी जोशीमठ से रणचुलाकोट में स्थापित की। कत्यूरी वंश का अंतिम शासक ब्रह्मदेव था। यह एक अत्याचारी शासक था, जागरां में इसे वीरमदेव कहा गया है।
जियारानी की लोकगाथा के अनुसार 1398 में तैमूर लंग ने हरिद्वार पर आक्रमण किया और ब्रह्मदेव ने उसका सामना किया और इसी आक्रमण के बाद कत्यूरी वंश का अंत हो गया।
1191 में पश्चिमी नेपाल के राजा अशोक चल्ल ने कत्यूरी राज्य पर आक्रमण कर उसके कुछ भाग पर कब्ज़ा कर लिया। 1223 ई. में नेपाल के शासक काचल्देव ने कुमाऊं पर आक्रमण किया और कत्यूरी शासन को अपने अधिकार में ले लिया।


कुमाऊं का चन्द वंश


कुमाऊं में चन्द वंश का संस्थापक सोमचंद था जो 700ई. में गद्दी पर बैठा था। कुमाऊं में चन्द और कत्यूरी प्रारम्भ में समकालीन थे और उनमें सत्ता के लिए संघर्ष चला जिसमें अन्त में चन्द विजयी रहे। चन्दों ने चम्पावत को अपनी राजधानी बनाया। प्रारंभ में चम्पावत के आसपास के क्षेत्र ही इनके अधीन थे लेकिन बाद में वर्तमान का नैनीताल, बागेश्वर, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा आदि क्षेत्र इनके अधीन हो गए। राज्य के विस्तृत हो जाने के कारण भीष्मचंद ने राजधानी चम्पावत से अल्मोड़ा स्थान्तरित कर दी जो कल्याण चंद तृतीय के समय (1560) में बनकर पूर्ण हुआ। इस वंश का सबसे शक्तिशाली राजा गरुड़ चन्द था।
प्राचीन अल्मोड़ा कस्बा, अपनी स्थापना से पहले कत्यूरी राजा बैचल्देओ के अधीन था। उस राजा ने अपनी धरती का एक बड़ा भाग एक गुजराती ब्राह्मण श्री चांद तिवारी को दान दे दिया। बाद में जब बारामण्डल चांद साम्राज्य का गठन हुआ, तब कल्याण चंद द्वारा 1568 में अल्मोड़ा कस्बे की स्थापना इस केन्द्रीय स्थान पर की गई। चंद राजाओं के समय में इसे राजपुर कहा जाता था। ’राजपुर’ नाम का बहुत सी प्राचीन ताँबे की प्लेटों पर भी उल्लेख मिला है।
कल्याण चन्द चतुर्थ के समय में कुमाऊं पर रोहिल्लों का आक्रमण हुआ तथा प्रसिद्ध कवि ‘शिव’ ने कल्याण चंद्रौदयम की रचना की। चन्द शासन काल में ही कुमाऊं में ग्राम प्रधान की नियुक्ति तथा भूमि निर्धारण की प्रथा प्रारंभ हुई। चन्द राजाओं का राज्य चिन्ह गाय थी।
1790 ई. में नेपाल के गोरखाओं ने चन्द राजा महेंद्र चन्द को हवाल बाग के युद्ध में पराजित कर कुमाऊं पर अपना अधिकार कर लिया, इसके सांथ ही कुमाऊं में चन्द राजवंश का अंत हो गया।


गढ़वाल का परमार (पंवार) राजवंश


ईस्वी सन् 888 से पूर्व सारा गढ़वाल क्षेत्र छोटे छोटे ‘गढ़ों’ में विभाजित था, जिनमें अलग-अलग राजा थे जिन्हें ‘राणा’, ‘राय’ या ‘ठाकुर’ के नाम से जाना जाता था। इनमे सबसे शक्तिशाली चांदपुर का राजा भानुप्रताप था, 887 ई. में धार (गुजरात) का शासक कनकपाल तीर्थाटन पर आया। भानुप्रताप ने इसका स्वागत किया और अपनी बेटी का विवाह उसके साथ कर दिया और अपना राज्य भी उन्हें दे दिया।
कनकपाल द्वारा 888 ई. में चाँदपुरगढ़ (चमोली) में परमार वंश की नींव रखी। ईस्वी सन् 888 से 1949 ई. तक परमार वंश में कुल 60 राजा हुए।
इस वंश के राजा प्रारंभ में कार्तिकेयपुर राजाओं के सामंत रहे लेकिन बाद में स्वतंत्र राजनैतिक शक्ति के रूप में स्थापित हो गए। इस वंश के 37वें राजा अजयपाल ने सभी गढ़पतियों को जीतकर गढ़वाल भूमि का एकीकरण किया। इसने अपनी राजधानी चांदपुर गढ़ को पहले देवलगढ़ फिर 1517 ई. में श्रीनगर में स्थापित किया। परमार शासकों को लोदी वंश के शासक बहलोल लोदी ने शाह की उपाधि से नवाजा, सर्वप्रथम बलभद्र शाह ने अपने नाम के आगे शाह जोड़ा। परमार राजा पृथ्वीपति शाह ने मुग़ल शहजादा दाराशिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह को आश्रय दिया था।
1636 ई. में मुग़ल सेनापति नवाजत खां ने दून-घाटी पर हमला कर दिया। उस समय की गढ़वाल राज्य की संरक्षित महारानी कर्णावती ने अपनी वीरता से मुग़ल सैनिको को पकड़वाकर उनके नाक कटवा दिए। इसी घटना के बाद महारानी कर्णावती को ‘नाककटी रानी’ के नाम से प्रसिद्ध हो गयी।


1790 ई. में गोरखाओं ने कुमाऊं के चन्दां को पराजित कर, 1791 ई. में गढ़वाल पर भी आक्रमण किया लेकिन पराजित हो गए। गढ़वाल के राजा ने गोरखाओं पर संधि के तहत 25000 रुपये का वार्षिक कर लगाया और वचन लिया कि अब ये गढ़वाल पर आक्रमण नहीं करेंगे, लेकिन 1803 ई. में अमर सिंह थापा और हस्तीदल चौतरिया के नेतृत्व में गौरखाओं ने भूकम्प से ग्रस्त गढ़वाल पर आक्रमण कर उनके काफी भाग पर कब्ज़ा कर लिया। 27 अप्रैल 1815 को कर्नल गार्डनर तथा गोरखा शासक बमशाह के बीच हुई संधि के तहत कुमाऊं की सत्ता अंग्रेजो को सौपी दी। कुमाऊं व गढ़वाल में गोरखाओं का शासन काल क्रमशः 25 और 10.5 वर्षों तक रहा जो बहुत ही अत्याचार पूर्ण था। इस अत्याचारी शासन को गोरख्याली कहा जाता है। धीरे-धीरे गोरखाओं का प्रभुत्व बढ़ता गया और इन्होनें लगभग 12 वर्षों तक राज किया। इनका राज्घ्य कांगड़ा तक फैला हुआ था, फिर गोरखाओं को महाराजा रणजीत सिंह ने कांगड़ा से निकाल बाहर किया। और इधर सुदर्शन शाह ने इस्ट इंडिया कम्पनी की मदद से गोरखाओं से अपना राज्य पुनः छीन लिया।

14 मई 1804 को देहरादून के खुड़बुड़ा मैदान में गोरखाओं से हुए युद्ध में प्रद्युमन्न शाह की मौत हो गई। इस प्रकार सम्पूर्ण गढ़वाल और कुमाऊं में नेपाली गोरखाओं का अधिकार हो गया।
प्रद्युमन्न शाह के एक पुत्र कुंवर प्रीतमशाह को गोरखाओं ने बंदी बनाकर काठमांडू भेज दिया, जबकि दूसरे पुत्र सुदर्शनशाह हरिद्वार में रहकर स्वतंत्र होने का प्रयास करते रहे और उनकी मांग पर अंग्रेज गवर्नर जनरल लार्ड हेस्टिंग्ज ने अक्तूबर 1814 में गोरखा के विरुद्ध अंग्रेज सेना भेजी और 1815 को गढ़वाल को स्वतंत्र कराया लेकिन अंग्रेजों को लड़ाई का खर्च न दे सकने के कारण गढ़वाल नरेश को समझौते में अपना राज्य अंग्रेजों को देना पड़ा।
सुदर्शन शाह ने 28 दिसम्बर 1815 को अपनी राजधानी श्रीनगर से टिहरी गढ़वाल स्थापित की। टिहरी राज्य पर राज करते रहे तथा भारत में विलय के बाद टिहरी राज्य को 1 अगस्त 1949 को उत्तर प्रदेश का एक जनपद बना दिया गया।


ब्रिटिश शासन


अप्रैल 1815 तक कुमाऊॅ पर अधिकार करने के बाद अंग्रेजों ने टिहरी को छोड़ कर अन्य सभी क्षेत्रों को नॉन रेगुलेशन प्रांत बनाकर उत्तर पूर्वी प्रान्त का भाग बना दिया और इस क्षेत्र का प्रथम कमिश्नर कर्नल गार्डनर को नियुक्त किया। कुछ समय बाद कुमाऊं जनपद का गठन किया गया और देहरादून को 1817 में सहारनपुर जनपद में शामिल किया गया। 1840 में ब्रिटिश गढ़वाल के मुख्यालय को श्रीनगर से हटाकर पौढ़ी लाया गया व पौढ़ी गढ़वाल नामक नये जनपद का गठन किया। 1854 में कुमाऊं मंडल का मुख्यालय नैनीताल बनाया गया। 1891 में कुमाऊं को अल्मोड़ा व नैनीताल नामक दो जिलो में बाँट दिया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति तक कुमाऊं में केवल 3 ही ज़िले थे। अल्मोड़ा, नैनीताल, पौढ़ी गढ़वाल। टिहरी गढ़वाल क्षेत्र एक रियासत के रूप में था। 1891 में उत्तराखंड से नॉन रेगुलेशन प्रान्त सिस्टम को समाप्त कर दिया गया। 1902 में सयुंक्त प्रान्त आगरा एवं अवध का गठन हुआ और उत्तराखंड को इसमें सामिल कर दिया गया। 1904 में नैनीताल गजेटियर में उत्तराखंड को हिल स्टेट का नाम दिया गया।


उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन


मई 1938 में तत्कालीन ब्रिटिश शासन में गढ़वाल के श्रीनगर में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस पर्वतीय क्षेत्र के निवासियों को अपनी परिस्थितियों के अनुसार स्वयं निर्णय लेने तथा अपनी संस्कृति को समृद्ध करने के आंदोलन का समर्थन किया। एक नए राज्य के रूप में उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन के फलस्वरुप (उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000) उत्तराखण्ड की स्थापना 9 नवम्बर 2000 को हुई। इसलिए इस दिन को उत्तराखण्ड में स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है।

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martyred shailendra pratap singh par kavita

जम्मू कश्मीर के सोपोर जिले मेँ आतंकी हमले मेँ शहीद सीआरपीएफ रायबरेली के जवान शैलेन्द्र प्रताप सिंह के लिए हिंदी विद्धान दयाशंकर जी की कविता martyred shailendra pratap singh par kavita

*शहीद सैनिक शैलेन्द्र सिंह को समर्पित*

बालक शैलेन्द्र का बाल्यकाल,

ग्रामांचल मध्य व्यतीत हुआ।

प्रारंभिक शिक्षा हेतु माता ने,

ननिहाल नगर को भेज दिया ।

अपने सीमित श्रम साधन से,

प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण किया।

चल पड़े कदम देश की सेवा को,
दायित्व भार जो मिला तुम्हे,

उसको पूरा करना होगा ।

है शत्रु खड़ा जो सीमा पर,
उसका रण-मद हरना होगा।

रण की वेदी पर कभी कभी,
कुछ पुष्प चढ़ाने पड़ते हैं।

कुछ महा वीर होते शहीद,
जो मातृभूमि हित लड़ते हैं।

वह मौन हो गया परमवीर,
अपने पीछें संदेश छोड़ गया ।

भावी    युवकों की  आंखों   को,
भारत की सीमा की ओर मोड़ गया।

स्वर गूंजा मत रोना मुझको तिरंगे में लिपटे होने पर,
मत     तर्पण     करना    आंखों   के   पानी   का।

करना है तो तर्पण करना,
सीमा पर प्रखर जवानी का ।

श्रद्धांजलि मुझको देते हो,
तो साथ शपथ लेनी होगी।

भारत की सीमा पर वीरों प्राणों की आहुति अपनी देनी होगी।
जो दीप जलाया है मैंने,
वह बुझे नहीं बरखा व तूफानों से।

उसकी लौ क्रीड़ा करती रहे सतत,

आजादी के परवानों से।
*दया शंकर*
राष्ट्रपति पुरस्कृत,साहित्यकार
पूर्व अध्यक्ष हिंदी परिषद रायबरेली

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nahin thaharata hai vakt

नहीं ठहरता है वक्त

ए मुसाफ़िर सब बीत जायेगा
यह वक़्त कभी ठहरा ही नहीं !
रफ्त़ा- रफ़्ता निकल जायेगा
उजाले कब तलक क़ैद रहेंगे
देखना ! कल सुबह
अपनी रिहाई के
गीत ज़रूर गायेंगे
माना कि
आज सारे जुगनूं
तम से संधि कर
उजालों को चिढ़ा रहे हैं
जब अंधकार की छाती चीरकर
कल
रश्मियां विकीर्ण हो जायेंगी
तो इन्हीं में से कुछ जुगनूं
आफ़ताब से भी हाथ मिलायेंगे
ए मुसाफ़िर सब बीत जायेगा
ये वक्त कभी ठहरा ही नहीं!
आज आंजनेय के बध के लिए
बिसात बिछाई जा रही है
एक और सुरसा की ज़िंदगी
दांव पर लगाई जा रही है
लेकिन झूठ के वक्ष को चीरकर
जब
सत्य का सूर्य कल उदित होगा
तो देखना! यही अंधेरे
दिन में ही दिनकर
से हाथ मिलायेंगे
ए मुसाफ़िर सब बीत जायेगा
ये वक्त कभी ठहरा ही नहीं

संपूर्णानंद मिश्र
प्रयागराज फूलपुर

 

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Dr rasik kishore singh neeraj ka rachna sansar

Dr rasik kishore singh neeraj ka rachna sansar
डॉ. रसिक किशोर सिंह ‘नीरज’ की इलाहाबाद से वर्ष 2003 में प्रकाशित पुस्तक ‘अभिलाषायें स्वर की’ काव्य संकलन में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गीत कारों ,साहित्यकारों ने उनके साहित्य पर अपनी सम्मति प्रकट करते हुए कुछ इस प्रकार लिखे हैं

भूमिका

कविता अंतस की वह प्रतिध्वनि है जो शब्द बनकर हृदय से निकलती है। कविता वह उच्छ् वास है जो शब्दों को स्वयं यति- गति देता हुआ उनमें हृदय के भावों को भरना चाहता है क्योंकि कविता उच्छ् वास है और उच्छ् वास स्वर का ही पूर्णरूप है, अतः यदि स्वर की कुछ अभिलाषाएँ हैं तो वे एक प्रकार से हृदय की अभिलाषाएँ ही हैं जो काव्य का रूप लेकर विस्तृत हुई हैं ।’अभिलाषायें स्वर की’ काव्य संग्रह एक ऐसा ही संग्रह है इसमें कवि डॉ. रसिक किशोर सिंह ‘नीरज’ ने अपनी अभिलाषाओं के पहले स्वर दिए फिर शब्द।

 

कवि डॉ. रसिक किशोर ‘नीरज‘ ने इस संग्रह में कविता के विभिन्न रूप प्रस्तुत किए हैं। उदाहरणतया उन्होंने अतुकांत में भी कुछ कवितायें लिखी हैं एक प्रश्न तथा अस्मिता कविता इसी शैली की कविताएं हैं तथा पवन बिना क्षण एक नहीं….. वह तस्वीर जरूरी है…… किसी अजाने स्वप्नलोक में…… अनहद के रव भर जाता है…. पत्र तुम्हारा मुझे मिला….. खिलता हो अंतर्मन जिससे….
विश्व की सुंदर सुकृति पर….. मित्रता का मधुर गान……. चढ़ाने की कोशिश……. चूमते श्रृंगार को नयन…… बनाम घंटियां बजती रही बहुत…… जो भी कांटो में हंसते ……..जिंदगी थी पास दूर समझते ही रह गये…….. गीत लिखता और गाता ही रहा हूं……. श्रेष्ठ गीत हैं इन रचनाओं में कवि ने अपने अंतर की प्रति ध्वनियों को शब्द दिए हैं
डॉ. कुंंअर बैचेन गाज़ियाबाद
2. कविता के प्रति नीरज का अनुराग बचपन से ही रहा है बड़े होने पर इसी काव्य प्रेम ने उन्हें सक्रिय सृजनात्मक कर्म में प्रवृत्त कियाl यौवनोमष के साथ प्रणयानुभूति उनके जीवन में शिद्त से उभरी और कविता धारा से समस्वरित भी हुई ।वह अनेक मरुस्थलों से होकर गुजरी किन्तु तिरोहित नहीं हुई। संघर्षों से जूझते हुए भावुक मन के लिए कविता ही जीवन का प्रमुख सम्बल सिद्ध हुई
डॉ. शिव बहादुर सिंह भदौरिया

इस प्रकार रायबरेली के ही सुप्रसिद्ध गीतकार पंडित बालकृष्ण मिश्र ने तथा डॉ. गिरजा शंकर त्रिवेदी संपादक नवगीत हिंदी मुंबई ने और डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी बरेली आदि ने अपनी शुभकामनाएं देते हुए डॉ. नीरज के गीतों की प्रशंसा की है

(1). पारब्रह्म परमेश्वर

पारब्रह्म परमेश्वर तेरी
जग में सारी माया है।
सभी प्राणियों का तू
नवसृजन सृष्टि करता
तेरी ही तूलिका से
नव रूप रंग भरता।
कुछ रखते सत् विचार
कुछ होते अत्याचारी
तरह तरह के लोग यहाँँ
आते, रहते बारी-बारी ।
जग के रंगमंच में थोड़ा
अभिनय सबका आया है।
कहीं किसी का भेद
खेद हो जाता मन में
नहीं किसी की प्रगति
कभी देखी जन-जन में ।
सदा सदा से द्वेष
पनपता क्यों जीवन में
माया के चक्कर में
मतवाले यौवन में।
‘नीरज’ रहती नहीं एक सी
कहीं धूप व छाया है।।

(2).राम हमारे ब्रह्म रूप हैंं

राम हमारे ब्रह्म रूप हैं ,राम हमारे दर्शन हैं ।
जीवन के हर क्षण में उनके, दर्शन ही आकर्षण हैं ।।
हुलसी सुत तुलसी ने उनका
दर्शन अद्भुत जब पाया ।
हुआ निनाँदित स्वर तुलसी का
‘रामचरितमानस’ गाया।।
वैदिक संस्कृति अनुरंजित हो
पुनः लोक में मुखर हुई ।
अवधपुरी की भाषा अवधी
भी शुचि स्वर में निखर गई।।
कोटि-कोटि मानव जीवन में, मानस मधु का वर्षण है ।
राम हमारे ब्रह्म रूप हैं राम, हमारे दर्शन हैं।।
ब्रह्म- रूप का रूपक सुंदर ,
राम निरंजन अखिलेश्वर ।
अन्यायी के वही विनाशक,
दीन दलित के परमेश्वर ।।
सभी गुणों के आगर सागर ,
नवधा भक्ति दिवाकर हैं।
मन मंदिर में भाव मनोहर
निशि में वही निशाकर है।
नीरज के मानस में प्रतिपल, राम विराट विलक्षण हैंं।
राम हमारे ब्रह्म रूप हैं , राम हमारे दर्शन हैं।

(3).शब्द स्वरों की अभिलाषायें

रात और दिन कैसे कटते
अब तो कुछ भी कहा ना जाये
उमड़ घुमड़ रह जाती पीड़ा
बरस न पाती सहा न जाये।
रह-रहकर सुधियाँ हैं आतीं
अन्तस मन विह्वल कर जातीं
संज्ञाहीन बनातीं पल भर
और शून्य से टकरा जातीं।
शब्द स्वरों की अभिलाषायें
अधरों तक ना कभी आ पायें
भावों की आवेशित ध्वनियाँ
‘ नीरज’ मन में ही रह जायें।

(4). समर्पण से हमारी चेतना

नई संवेदना ही तो
ह्रदय में भाव भरती है
नई संवेग की गति विधि
नई धारा में बहती है ।
कदाचित मैं कहूँँ तो क्या कि
वाणी मौन रहती है
बिखरते शब्द क्रम को अर्थ
धागों में पिरोती है ।
नई हर रश्मि अंतस की
नई आभा संजोती है
बदल हर रंग में जलती
सतत नव ज्योति देती है।
अगर दीपक नहीं जलते
बुझी सी शाम लगती है
मगर हर रात की घड़ियाँ
तुम्हारे नाम होती हैं।
नया आलोक ले ‘नीरज’
सरोवर मध्य खिलता है
समर्पण से हमारी चेतना
को ज्ञान मिलता है ।

(5).नाम दाम के वे नेता हैं

कहलाते थे जन हितार्थ वह
नैतिकता की सुंदर मूर्ति
जन-जन की मन की अभिलाषा
नेता करते थे प्रतिपूर्ति।
बदले हैं आचरण सभी अब
लक्षित पग मानव के रोकें
राजनीति का पाठ पढ़ाकर
स्वार्थ नीति में सब कुछ झोंके।
दुहरा जीवन जीने वाले
पाखंडी लोगों से बचना
शासन सत्ता पर जो बैठे
देश की रक्षा उनसे करना।
पहले अपनी संस्कृति बेची
अब खुशहाली बेंच रहे हैं
देश से उनको मोह नहीं है
अपनी रोटी सेक रहे हैं।
देशभक्ति से दूर हैं वे ही
सच्चे देश भक्त कहलाते
कैसे आजादी आयी है
इस पर रंचक ध्यान न लाते।
कथनी करनी में अंतर है
सदा स्वार्थ में रहते लीन
नाम धाम के वे नेता हैं
स्वार्थ सिद्धि में सदा प्रवीन।

(6). आरक्षण

जिसको देखो सब ऐसे हैं
पैसे के ही सब पीछे हैं
नहीं चाहिए शांति ज्ञान अब
रसासिक्त होकर रूखे हैं।
शिक्षा दीक्षा लक्ष्य नहीं है
पैसे की है आपा धापी
भटक रहे बेरोजगार सब
कुंठा मन में इतनी व्यापी ।
आरक्षण बाधा बनती अब
प्रतिभाएं पीछे हो जातीं
भाग्य कोसते ‘नीरज’ जीते
जीवन को चिंतायें खातीं ।
व्यथा- कथा का अंत नहीं है
समाधान के अर्थ खो गये
आरक्षण के संरक्षण से
मेधावी यों व्यर्थ हो गये।
सत्ता पाने की लोलुपता ने
जाने क्या क्या है कर डाला
इस यथार्थ का अर्थ यही है
जलती जन-जीवन की ज्वाला।

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प्यार का गीत – बाबा कल्पनेश

प्यार का गीत – बाबा कल्पनेश
प्यार का गीत
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत,
जिसमें हार हुई हो मेरी और तुम्हारी जीत।
कई जन्म बीते हैं हमको करते-करते प्यार,
तन-मन छोड़े-पहने हमने आया नहीं उतार।
छूट न पाया बचपन लेकिन चढ़ने लगा खुमार,
कितने कंटक आए मग में अवरोधों के ज्वार।
हम दोनों का प्यार भला कब बनता अहो अतीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
तुम आयी जब उस दिन सम्मुख फँसे नयन के डार,
छिप कर खेले खेल हुआ पर भारी हाहाकार।
कोई खेल देख पुरवासी लेते नहीं डकार,
खुले मंच से नीचे भू पर देते तुरत उतार।
करने वाले प्यार भला कब होते हैं भयभीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
नदी भला कब टिक पायी है ऊँचे पर्वत शृंग,
और कली को देखे गुप-चुप रह पाता कब भृंग।
नयनों की भाषा कब कोई पढ़ पाता है अन्य,
पाठ प्यार का पढ़ते-पढ़ते जीवन होता धन्य।
जल बिन नदी नदी बिन मछली जीवन जाए रीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
कभी मेनका बन तुम आयी विश्व गया तब हार,
हुई शकुंतला खो सरिता तट लाए दिए पवार।
कण्वाश्रम पर आया देखा सिर पर चढ़ा बुखार,
भरत सिंह से खेल खेलता वह किसका उद्गार।
वही भरत इस भारत भू पर हम दोनों की प्रीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
श्रृद्धा मनु से शुरू कहानी फैली मानव वेलि,
अब भी तो यह चलता पथ पर करता सुख मय केलि।
इसे काम भौतिक जन कहते हरि चरणों में भक्ति,
आशय भले भिन्न हम कह लें दोनो ही अनुरक्ति।
कभी नहीं थमने वाली यह सत्य सनातन नीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
बाबा कल्पनेश