राम लौट घर आये हैं। हरिश्चन्द्र त्रिपाठी’हरीश

आओ मिल-जुल खुशी मनायें,
राम लौट घर आये हैं,
चलो अवध सन्देशा लेकर,
घर-घर अक्षत आये हैं।टेक।

गहन निशा की मिटी कालिमा,
दुर्दिन सारा बीत गया,
नये भोर की अगवानी को,
बरस पॉच सौ रीत गया।
रात अंधेरी गुजर गई अब,
नव प्रभात फिर आये हैं।
आओ मिल-जुल खुशी मनायें,
राम लौट घर आये हैं1।

विध्वंसक भाव विचारों की,
हो गई पराजित बर्बरता,
सत्य-न्याय का बिगुल बज रहा,
चहॅक उठी है मानवता।
राष्ट्र-धर्म के गीत सुनाते,
अधर सुधा छलकाये हैं।
आओ मिल-जुल खुशी मनायें,
राम लौट घर आये हैं।।2।

क्षिति-जल-अम्बर जगत देखता,
दसों दिशायें , दनुज , देवता।
शेष विधर्मी राह झॉकते,
चाह रहे कुछ मिले नेवता।
विश्व-पटल पर कौतूहल के,
मेघ सनातन छाये हैं।
आओ मिल-जुल खुशी मनायें,
राम लौट घर आये हैं।3।

निरख नियति की व्यग्र भावना,
करते कोटिक कंठ साधना।
राम हमारे सभी राम के,
कौन अभागा जिसे चाव ना।
धन्य सुपावन भूमि अवध की,
हनुमत शीश नवाये हैं।
आओ मिल-जुल खुशी मनायें,
राम लौट घर आये हैं।4।

रचना मौलिक,अप्रकाशित,स्वरचित,सर्वाधिकार सुरक्षित है।

हरिश्चन्द्र त्रिपाठी’हरीश;
रायबरेली (उप्र) 229010

एक समीक्षा | पुस्तक अठारह पग चिन्ह | पुष्पा श्रीवास्तव ‘शैली’ | रश्मि लहर

एक समीक्षा
पुस्तक अठारह पग चिन्ह
लेखिका** आदरणीया रश्मि लहर जी
पृष्ठ*95 मूल्य ₹150/
प्रकाशन * बोधि प्रकाशन
Isbn:9789355367945
सी *8,इक्षुपुरी कॉलोनी,लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
मो• 917565001657

‘अठारह पग चिन्ह’

“तुम्हे देखा नहींं लेकिन नज़र में बस गए हो तुम,
ये सच है हॅंसी की सुरमई सी लालिमा हो तुम।”

बड़ी रोचक बात है कि हमने एक-दूसरे को अभी तक देखा नहीं है ,लेकिन विश्वास की नदी का प्रवाह गति के साथ अविरल है।
पंक्तियाॅं उकेरते हुए मन आह्लादित हो उठा।

मेरी प्रिय सखी रश्मि ‘लहर’ जी का कहानी संग्रह ‘अठारह पग चिन्ह’ हाथ में आते ही अथाह प्रसन्नता हुई।

जीवन-लहरों से अंजुरी भर अनुभवों को बटोरते हुए, शब्दों के माध्यम से कागज पर उकेरते हुए, हृदय पर अंकित कर देने का अद्भुत प्रयास कहानीकार की लेखनी को शीर्ष पर विराजमान कर देता है।

‘अठारह पग चिन्ह’ नाम को सार्थकता प्रदान करते हुए हर पग पर जीवन का एक चित्र मिलता है। इस यात्रा में कहानीकार और पाठक के बीच का अन्तर समाप्त होता महसूस किया हमने।

आदरणीय माया मृग जी का ये वक्तव्य कि
“ये आपकी कहानियाॅं हैं, सिर्फ कहानीकार की नही” अक्षरशः सत्य सिद्ध होता है।

यात्रा प्रारंभ करते ही ‘लव यू नानी’
पत्र के माध्यम से बड़ा ही मजबूत संदेश देती हुई कहानी मन को भाव विभोर कर जाती है।

‘करवा चौथ’ जैसी कहानी मानवता के दायित्व का निर्वहन दर्शाती है।आगे बढ़ते हुए पुनः जीवन के बीच से उभर कर मन को आह्लादित कर देती है।

कहानी ‘प्रेम के रिश्ते’ में पर शोएब चचा कोरोना जैसी महामारी को भी अपने दायित्व के बीच नहीं आने देते। मानवता की मशाल जलाते हुए यह कहानी समाज को एक सीख दे जाती है।

‘बावरी’ को पढ़ते हुए ऑंख भर आती है, स्वतः एक चित्र मस्तिष्क पर खिंच जाता है।हृदय चीख उठता है।

अनुत्तरित प्रेम के दीप के रूप में ‘अनमोल’
कहानी निरंतर मद्धम लौ की तरह प्रकाशित होते रहने का पर्याय है।

ममता का सिंधु समेटे समाधान के साथ खड़ी हो जाती हैं ‘अम्मा’।

‘अचानक’ कहानी को पढ़ते वक्त मन तीन स्थान पर ठहरता है।

पहला कि नकारात्मकता गुंडो के रूप में समाज में अवसर मिलते ही हावी हो जाती है।
दूसरा दादी के रूप में दूसरे की पीड़ा को न समझने वाले लोग। और तीसरा संकल्प और संकल्प की माॅं ,जो रूढ़ियों को तोड़ते हुए सुलभा की पीड़ा में दुखी हैं, और सुलभा से विवाह करने के लिए अड़े हुए हैं। यह कहानी समाज के बीच पथ प्रदर्शिका का कार्य करती है। कहानीकार और लेखनी दोनो को
साधुवाद।

‘असली उत्सव’, ‘अद्भुत डॉक्टर’, ‘तेरी बिंदिया रे’ सभी कहानियाॅं पाठक को बाॅंधें रखने में समर्थ हैं।

धीरे-धीरे कदम रखते हुए ‘लव यू गौरव’ और ‘गुलगुले’ पर ठहरना पड़ जाता है।

मां की ममता और संवेदना की लहर थामे नहीं थमती है। कहानी समाप्त होते-होते नेत्रों का बाॅंध टूट जाता है, और ऑंसू रूपी गुलगुले बिखर जाते हैं।

प्रणाम करती हूॅं कहानीकार की अंजुरी को जिसमें भावनाओं के पुष्प एक गुच्छ के रूप में एक साथ समाहित हैं।

‘अतीत के दस्तावेज’ में आज के स्वार्थी संतानों की लालची और विकृत मानसिकता को उधेड़ने का सार्थक प्रयास करते हुए नज़र आती है लेखनी।

‘शिरीष’, ‘संयोग’ और ‘कैसे-कैसे दु:ख’ के माध्यम से जीवन के बड़े नाज़ुक पहलुओं को छूने का प्रयास किया है कहानीकार ने।

एक के बाद एक सभी कहानियाॅं भावनात्मकता का सजीव निर्वाह करती हैं।प्रवाहमयता के साथ-साथ पाठक को अपने में डुबा लेने का अद्भुत सामर्थ्य है इन कहानियों में।

ये समाज के बीच ज्वलंत प्रश्नों को उठाती हैं, और समाधान भी प्रस्तुत करती हैं तथा अंत में उद्देश्य परक संदेश प्रेषित करते हुए सार्थकता को पोषित करती हैं।

मैं ‘अठारह पग चिन्ह’ कहानी संग्रह की सफलता की कामना करती हुई प्रिय मित्र रश्मि ‘लहर’ जी की लेखनी और भावों की सरिता का आचमन करते हुए प्रणाम करती हूॅं।

पुष्पा श्रीवास्तव ‘शैली’
रायबरेली

नए भवन में | दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश

राम आए पधारे,
नए भवन में।
नींद भर करके सोए,
नए भवन में।
साथ लक्ष्मण,मां सीता,
और हनुमत भी हैं।
साथ उनके ये सारा,
जनमत भी है।
सारी खुशियां पधारीं,
नए भवन में।
भाई शत्रुघ्न,भरत,
कैकई,कौशल्या भी।
राजा दशरथ, सुमित्रा,
आई उर्मिला भी।
देख खुशियां मनाईं,
नए भवन में।
सरयू नदिया का पानी,
भी इठलाता है।
आज कितना हूं खुश,
सबको बतलाता है।
प्रीति की फुहार बरसी,
नए भवन में।
राम जी की कृपा,
सदा सबको मिले।
उनके आशीष से,
जीवन सबका खिले।
स्वर्ग से फूल बरसे,
नए भवन में।
अब तो ‘दुर्गेश’ का,
मन उछलनें लगा।
हर घड़ी राम का,
नाम जपने लगा।
बहे खुशियों के आंसू,

नए भवन में।

(सारे अधिकार लेखक के आधीन)
दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश

शतक संगति समारोह में सविता चडढा जन सेवा समिति सम्मानित”

नई दिल्ली : काकासाहेब कालेलकर एवं विष्णु प्रभाकर की स्मृति में आयोजित सन्निधि की सौ संगोष्ठी पूर्ण होने पर शतक संगति समारोह का आयोजन गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा नई दिल्ली में आयोजित किया गया।इस अवसर पर विभिन्न साहित्यकारों एवं उत्कृष्ट कार्य करने वाली समिति और संस्थाओं को भी सम्मानित किया। साहित्य ,कला,संस्कृति एवं सामाजिक सरोकारों को समर्पित सविता चडढा जन सेवा समिति को भी उनके साहित्य अनुराग, विशिष्ट साहित्य सेवा एवं समाज सेवा तथा नव युवाओं को प्रोत्साहन द्वारा समाज को जागरुक एवं समर्थ करने के उत्कृष्ट एवं निष्ठा पूर्ण प्रयासों के लिए विशिष्ट सेवा सम्मान 2024 प्रदान किया गया ।इस अवसर पर देशभर से पधारे साहित्यकारों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की।


कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सुप्रसिद्ध हास्य कवि श्री सुरेंद्र शर्मा जी रहे जिन्होंने हिंदी भाषा एवं अन्य भाषाओं पर अपने सारगर्भित विचार प्रस्तुत किये। इस अवसर पर जनसत्ता के संपादक और लेखक मुकेश भारद्वाज और वरिष्ठ आलोचक डॉ गोपेश्वर सिंह की उपस्थिति उल्लेखनीय रही ।कार्यक्रम में सभी अतिथियों का स्वागत अतुल प्रभाकर ने किया । कार्यक्रम का उत्कृष्ट संचालन प्रसून लतांत ने किया ।

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सजा | रत्ना भदौरिया | लघुकथा

कल के दृश्य ने वो गाना सार्थक कर दिया ‘मेरा गम तेरे ग़म से कितना कम है ‘। अभी तक गाना खूब सुना ,गुनगुनाया लेकिन हमेशा लगता रहा कि नहीं दुनिया में मुझसे ज्यादा दुखी कोई भी नहीं है। कल के दृश्य ने सबकुछ बदल दिया और लगने लगा अरे ! मुझसे कम दुखी कोई नहीं है। मेरी और नंदिनी की बात अभी ज्यादा पहले नहीं शुरू हुई थी महज एक महीना हुआ था लेकिन दोनों को एक दूसरे पर विश्वास ऐसा जम गया मानो बचपन की सहेलियां हों। काम की व्यस्तता की वजह से फोन पर कम ही बातें होती मैसेज से हाल खबर रोज ही हो जाती। इन एक महीने में तीन से चार बार फोन पर बात हुई। लेकिन ज़्यादातर दो से तीन मिनट ही बात सम्भव हो पायी।कल हम दोनों फ्री थे मेरा कुछ स्वास्थ्य ठीक नहीं था और नंदिनी की कालेज की छुट्टी थी। बातों का दौर लम्बा चला तो उसने उस दृश्य का जिक्र किया जो मेरे लिए दृश्य लेकिन उसकी कहानी थी। नंदिनी ने बात मेरी शादी से शुरू की । तो मैंने कहा नहीं यार अभी नहीं वैसे सच बताऊं करना नहीं चाहती कोई रुचि नहीं है। भाई ,बहन , मां- बाप सब लोग हैं नौकरी भी है फिर क्या जरूरत आज कल वैसे भी लड़कों का कोई भरोसा नहीं। वैसे नंदिनी आपकी शादी हो गयी क्या? नहीं मैं तो चालीस से ऊपर की हो गयी अब क्या करूंगी शादी करके ? क्या ?आप तो बहुत बड़ी हैं मुझसे माफ़ी चाहूंगी हमेशा आपका नाम या यार कहकर बुलाती रही मैं इतनी बेवकूफ कभी पूछा भी नहीं।

अरे नहीं कोई बात नहीं बिट्ट सब चलता है। शादी नहीं की इसके पीछे बहुत बड़ी कहानी है। बताइये ना दीदी आज मैं बिल्कुल व्यस्त नहीं हूं मैंने कहा। नहीं बिट्टू फिर कभी बताऊंगी। नहीं दीदी मैं जिद्द करने लगी । चलो अच्छा इतनी जिद्द कर रही हो तो बता ही देती हूं। आज के बीस साल पहले पापा सरकारी मास्टर के पद से रिटायर हुए और घर पर रहने लगे। एक साल व्यतीत भी नहीं हुआ था कि पापा को कैंसर हो गया उनके रिटायरमेंट के जितने पैसे थे सब उनकी दवाई में लग गये और दुर्भाग्य देखो उसी दौरान कोरोना आ गया मैं प्राइवेट स्कूल अध्यापिका थी कालेज की नौकरी तो बाद में मिली, नौकरी छूट गयी पापा को कैंसर के साथ -साथ कोरोना भी हो गया।

मां भी पापा की देखभाल करते -करते कोरोना की शिकार हो गयी। और एक एक करके दोनों चलते बने। घर ,पैसा जो भी बचा था दोनों भाईयों ने ले लिया मैं अकेले रह गयी। फिर पता है बिट्टू सब लोग कहते इसका भी कहीं रिश्ता कर दो । दोनों भाइयों ने योजना बनाई और जितने भी रिश्ते आते वे तोड़वा देते एक भाई एक कमी निकालता तो दूसरा दूसरी कमी , कोई रिश्ता ही नहीं हो पा रहा था। पास पड़ोस के लोग और भी बोलने लगे थे लेकिन भाइयों को कोई फर्क नहीं पड़ा, एक सबसे दुर्भाग्य का दिन तब आया जब पता चला कि मुझे पागल होने के लिए दवाईयां दी जा रही थी वो भी भाइयों के द्वारा इसका कारण जानने कि कोशिश कि तो पता चला कि महज यह कारण था ,अब इसे संभाले कौन और शादी में तनिक रकम नहीं खर्च होती कौन करे इतने पैसे खर्च —-।

फिर पता है बिट्टू मैंने कहा दिया ना किसी को किसी के सामने गिड़गिड़ाने की जरूरत है और ना ही मेरे बारे में चिंता करने की आप सब अपना अपना देखो। उस दिन से चौकन्नी और सतर्कता के साथ काम करने लगी भगवान का शुक्र रहा कि जल्द ही गांव के एक स्कूल में नौकरी मिल गयी। बिट्टू आज मैं पैंतालीस साल की हो गयी हूं और खुश हूं अपनी दुनिया में लेकिन दोनों भाईयों को जब कभी कभी दुखी देखती हूं तो समझ नहीं पाती की उनको क्या कहूं उनके किये की सजा है या कुछ और ——।

सखियां मंगल गाओ | प्रतिभा इन्दु

आने वाला है वह शुभ दिन
मिलकर हर्ष मनाओ ,
आयेंगे श्री राम अवध में
सखियाँ मंगल गाओ !

वर्षों से प्यासी आँखों में
नूतन आस जगी है ,
आने वाला है वह क्षण , उस
पथ पर दृष्टि लगी है ।
द्वार-द्वार पर बनी रंगोली
कंचन थाल सजाओ !
आयेंगे श्रीराम अवध में
सखियाँ मंगल गाओ !

इंतजार के बाद सामने
चिर प्रतीक्षित घड़ियाँ ,
सारी अड़चन दूर हुई अब
टूट गई हथकड़ियाँ ।
प्रभु के पग जिस जगह पड़ेंगे
उस पर फूल सजाओ !
आयेंगे श्रीराम अवध में
सखियाँ मंगल गाओ !

राम पिता हैं सकल विश्व के
जननी सीता माई ,
धर्म , अर्थ औ” काम,मोक्ष हैं
रघुवर चारों भाई ।
नवल रंग , नूतन उमंग भर
धर्म-ध्वजा फहराओ !
आयेंगे श्रीराम अवध में
सखियाँ मंगल गाओ !

प्रतिभा इन्दु

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श्मशान लघुकथा | रत्ना भदौरिया

थरथर कांपता हुआ इधर उधर भटकने के बावजूद कहीं गर्माहट वाली जगह नहीं मिली ,तो एक जगह पेड़ की आड़ में बैठ गया ।जितनी तेजी से रात का समय बढ़ रहा था उतनी ही तेजी से कंपकंपाहट बढ़ रही थी। सिर ,कान ,नाक और हाथ पर एक भी कपड़ा ना होने की वजह से ऐसा लग रहा था मानो जम गया हो। शरीर पर तो फिर भी फटे पुराने कपड़े थे‌। पेड़ से दो चार बूंदें सिर पर टपक जाती और मैं अंदर तक और थर्रा जाता। गाड़ियों की आवा जाही ठप सी हो गई थी, आसमान की तरफ देखेकर ऐसा लगा कि अभी एक या दो ही बजे होंगे। तभी पेड़ों से टपक रही बूंदें शुरू हुई ये क्या लगता है बारिश तेज हो गई। अगर नहीं उठा तो राम नाम सत्य हो जायेगी, उठा और चल पड़ा कंपकंपी कम नहीं बढ़ रही थी ,बल्कि अब लथपथ भीग भी चुका था।तभी सामने आग की रोशनी सी प्रतीत हुई पास जाकर देखा तो पता चला ये श्मशान घाट है और ये जल रही लाशों की लपटें हैं।

पहले ठिठुका और पुराने दृश्य आंखों के सामने कौंध गये ,कैसे ? बचपन में ना अंधेरे में निकल पाता और ना ही घर के किसी कोने में जाता यहां तक बिस्तर या सोफे पर पैर नीचे करके नहीं हमेशा ऊपर करके बैठता। घर में अकेले रहना क्या होता है इससे कोशों दूर रहा , हमेशा यही बात का डर रहता कि भूत ना आ जाए।लेकिन एक महामारी आयी और घर का सबकुछ लेकर चली गयी,सब झटके में खत्म हुआ। जिसकी वजह से वो घर काटने को दौड़ता है। घर की प्रत्येक चीज से डर लगता है खुद नहीं समझ पाता कि अपने आप को पागल कहूं या बीमार या फिर कुछ और——।

ऐसा लगने लगा जैसे हड्डियां बोल रही हों इस कंपकंपी से इसलिए पुराने दृश्य को छोड़ श्मशान की तरफ बढ़ चला और वहीं आग के पास लेट गया,सुबह की आवाजों ने नींद तोडा आंखें खोली तो सामने देखा एक सज्जन कह रहें हैं कि ये रे पागल तू श्मशान में लाश की आग के पास लेट गया डर नहीं लगा। कैसा आदमी है तू? अरे भाई साहब ठंड की कंपकंपी से कम ही डर लगा और सबसे अच्छा तो यह लगा कि चैन की नींद आ गयी इस गरमाहट से—। वो सज्जन बुदबुदाया और वहां से चलता बना , मैं भी अपने कदम बाहर की ओर बढ़ा लिया —-।

रत्ना भदौरिया रायबरेली उत्तर प्रदेश

सलाहकार | सम्पूर्णानंद मिश्र

सलाहकार

सलाहकार
हर युग में हुए हैं राजाओं के

कुछ सलाहकार
राजा के ओंठ होते हैं
आगे-आगे राजा
पीछे- पीछे वे

वे सीधे- सीधे-सीधे
राजा के पेट में चहलकदमी करते हैं

कुछ ऐसे होते हैं
जो बिना कहे
राजा के विचार के चित्र को
अपनी सलाह की तूलिका‌ से रंग देते हैं

एक सीमा तक
इस तरह की पच्चीकारी
स्वीकारता है राजा

और कुछ ऐसे
सलाहकार होते हैं

जो दिन की रोशनी में राजा
और घोर घुप्प अंधेरी रात में
प्रजा के साथ

कुछ सलाहकार
ऐसे होते हैं जो
सत्ता के लिए

राजा के अनैतिक
कार्यों की आग में
ईर्ष्या का घी डालकर
प्रजा को उसमें झोंक देते है

और सारा कसूर
राजा के सिर मढ़ देते हैं

हर युग में
ऐसे सलाहकार रहे हैं
त्रेता में कुछ इसी तरह की
चूक राजा से हुई थी

इसीलिए गाहे-बगाहे
आज भी उस मर्यादित राजा को
इजलास में खड़ा कर दिया
जाता है

सम्पूर्णानंद मिश्र
शिवपुर वाराणसी
7458994874

स्वर्ण युग का आगमन | प्रेमलता शर्मा

22 जनवरी वह पवित्र दिवस है
जब हिंदुस्तान के भाग्य जागेंगे
प्रभु अयोध्या आएंगे
फिर एक बार इस धरती पर
राम नाम ध्वजा फहराएंगे
राम नाम पर शहीद हुए जो
उनका बलिदान रंग लाया है
यह तो प्रभु की माया है
कि यह दिन अब सत्य होने वाला है
आस लिए व्याकुल नैन निहार रहे थे
कि कब प्रभु के पद रज धोकर
कई केवट भवसागर तर जाएगे
कोटि-कोटि भारतवासी के हृदय मे
इस दिन का इंतजार था
हर एक सनातनी के मन मे यही सवाल था
कब इस आर्यावर्त की भूमि पर
आर्य हमारे पधारने
धन्य है वो मां के लाल ,जिनके कर कमलो से अयोध्या का उद्धार हुआ
सतयुग मे तो एक रावण था
कलियुग मे रावण से धरती पटी पडी
इसीलिए यह लंका युद्ध अधिक लंबा
था, और प्रभु को अयोध्या लौटने इतना विलंब हुआ ।
देर हुई तो क्या हुआ राम लला घर आ ही गए ।
प्रभु के आने की खुशी मे हम सब
घर-घर दीप जलाकर दिपावली मनाएंगे ।
फिर एक बार धरती पर राम राज्य आने का सपना हम सब मिलकर सजाएगे।
प्रेमलता शर्मा ( रायबरेली)

अन्तर्चिन्तन:राम घर आते हैं | हरिश्चन्द्र त्रिपाठी ‘हरीश’ | क्यों हिन्दी दिवस मनाते हो?

अन्तर्चिन्तन::राम घर आते हैं।

दिव्य राम छवि धाम सुघर मुसकाते हैं,
जन-जन पावन दृष्टि कृपा बरसाते हैं।
युग-युग से अवध निहार रहा कब आयेंगे-
कण-कण हुआ निहाल राम घर आते हैं।1।

बर्बर नीच लुटेरों ने ऐसे दिन दिखलाया है,
कालखण्ड यह देख मुखर मुसकाया है।
जीत सदा सच की होती संघर्ष करो-,
सुदिन देख धरती पर त्रेता फिर आया है।2।

हे राम सभी निष्काम कर्म करते जायें,
उर-मर्यादित भाव धर्म के बढ़ते जायें।
खा कर शबरी-बेर,नई इक रीति बनाओ-
नवल सृजन-पथ लोग सदा चलते जायें।3।

मोक्ष दायिनी सरयू की जल धारा हो जाये,
उत्सर्गित कण-कण अवध दुबारा हो जाये।
ध्वजा सनातन पुनि अम्बर अशेष फहरे-,
अब विश्व-पूज्य यह भारत प्यारा हो जाये।4।

जैसा चाहो राम कराओ हम तो दास तुम्हारे,
अनभिज्ञ सदा छल-छद्मों से मेरी कौन सवॉरे।
निष्कपट हृदय अनुसरण तुम्हारा करता निशि दिन-,
तेरी चरण-शरण में आया तू ही मुझे उबारे।5।

रघुनाथ तुम्हारे आने की हलचल यहॉ बहुत है,
निठुर पातकी जन की धरती खलल यहॉ बहुत है।
चाह रहे हैं लोग सभी लिये त्राण की अभिलाषा-,
कब धर्म-ध्वजा फहराये उत्कंठा प्रबल बहुत है।6।

पड़ा तुम्हारे चरण में इसे शरण दो नाथ,
जब तक करुणा न मिले नहीं उठेगा माथ।
युग की प्यास बुझाई है तुमने ही आकर-,
मातु जानकी पवनसुत सहित मिलो रघुनाथ।7।

2 .क्यों हिन्दी दिवस मनाते हो?

भारत की प्रिय प्यारी हिन्दी,
यथा सुहागन की हो बिन्दी।1।
जन्म जात अपनी यह बोली,
दीप जलाये खेले होली।2।
अधर-अधर मुस्कान बिखेरे,
वरद गान कवि चतुर चितेरे।3।
सुधा-वृष्टि-तर करती रहती,
अंजन बनकर नयन सवॅरती।4।
सबको प्रिय मन भाती हिन्दी,
विश्व-कुटुम्ब बनाती हिन्दी।5।
तुम भी गाओ मैं भी गाऊॅ,
हिन्दी का परचम लहराऊॅ।6।
धर्म – ध्वजा अम्बर लहराये,
वीणावादिनि पथ दिखलाये।7।
हिन्दी पढ़ें , पढ़ायें हिन्दी,
दुनिया को सिखलायें हिन्दी।8।
निज में शर्म , सुधार करो,
फिर हिन्दी – ऋंगार करो।9।
निज बालक कहॉ पढ़ाते हो?
क्यों हिन्दी दिवस मनाते हो?10।
नौकरशाह और सरकारी-
सेवक से प्रिय हिन्दी हारी।11।
शपथ सोच कर लेना होगा,
भरत-भूमि-ऋण देना होगा।12।
आओ लें संकल्प आज हम,
हिन्दी में ही करें काम हम।13।
प्रिय राम हमारे हिन्दी में,
हर काम सवॉरें हिन्दी में।14।
विश्व पूज्य यह हिन्दी होगी,
द्वेष-मुक्त प्रिय हिन्दी होगी।15।