तुम जरूर लौटकर आओगी | डॉ0 सम्पूर्णानंद मिश्र
तुम जरूर लौटकर आओगी!
शर्मिला आज पाँच साल बाद हरदोई रेलवे स्टेशन पहुँची। मन में जहाँ नई नौकरी के प्रति आकर्षण था, वहीं जिला कलेक्टर बनने की खुशी हृदय की नदी को तोड़कर बह जाना चाहती थी। एक अलग उल्लास अलग उमंग। मन में नाना प्रकार की तरंगें तरंगित हो रही थीं ।आज के पाँच साल पहले जब ससुराल आई थी, तो उसके अरमान को विवेक ने चकनाचूर कर दिया था। दरअसल शर्मिला स्नातक के बाद सिविल सर्विसेज की तैयारी करना चाहती थी, उसके मन में बचपन से ही देश सेवा का जुनून सवार था। शादी के एक साल तक सब कुछ ठीक – ठाक चला। उसकी सेवा परायणता ने ससुराल वालों का मन मोह लिया। सभी उससे प्रेम करते थे। लेकिन जब भी वह सिविल सर्विसेज की तैयारी की बात अपने पति से कहती थी तो उसका पति विवेक हर बार नजरअंदाज कर देता था। एक बार शर्मिला ने दिल्ली जाकर तैयारी करने की बात अपने ससुर से जब कहा तो उसे जैसे काठ मार दिया। कुछ देर के बाद बुझे स्वर से उसके ससुर रामप्रसाद ने कहा जैसा विवेक चाहे वैसा करो। इधर विवेक अपने पिता के ऊपर तैयारी करने की बात टाल देता था। द्वंद्व की चक्की में बेचारी शर्मिला की इच्छा पीसी जा रही थी। उसने अपने पति विवेक की विवेकहीनता की तलवार से अपने भविष्य के पंख को कटने नहीं देना चाहती थी। इस बात को लेकर आए दिन घर में कलह होने लगा। शर्मिला ने मजबूरन कोर्ट जाकर तलाक की अर्जी दाखिल कर दी। कुछ दिन बाद जब वह शाम को बैठकर पढ़ रही थी,तभी एक चपरासी कोर्ट से तलाकनामा लेकर विवेक के घर पहुँचा। विवेक उस समय घर पर नहीं था। यह पत्र उसके पिता रामप्रसाद ने प्राप्त किया। पत्र पढ़ते ही जैसी उसके पिता के नीचे की जमीन किसी ने खींच ली हो। रात के नौ बजे रहे थे। पौष का महीना था। लोग घरों में दुबक गए थे। बाहर कुत्तों के भौंकने की आवाज इस शीत के सन्नाटे को क्षण भर के लिए जरूर चीर दे रही थी, लेकिन शायद वह अपर्याप्त था। विवेक अपने मित्र के घर से लौट रहा था। पता नहीं क्यों आज उसका मन अशांत था। उसके मोटरसाइकिल की स्पीड आज बढ़ाए नहीं बढ़ रही थी। कुछ अनहोनी की आशंका उसके मन को दबोच रही थी। जब वह घर पहुँचा, तब उसके पिता ने कहा बेटा अब हम लोगों के बुरे दिन आ गए है शर्मिला ने तुमको तलाक दे दिया है। यह सुनते ही विवेक की आँखों से आँसू की अनवरत धारा बहने लगी। विवेक किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया। पत्नी के प्रति उसके मन में अनुरक्ति थी। प्रेम का जो बीजारोपण दोनों ने किया था। आज छतनार वृक्ष बन गया था। शर्मिला भी उस छतनार वृक्ष की छाया से दूर नहीं जाना चाहती थी, लेकिन हर लड़की की तरह उसके मन की भी कल्पनाएँ आसमान छूना चाहती थीं ।
इधर शर्मिला का हरदोई स्टेशन पर भव्य स्वागत हुआ। कलेक्ट्रेट कार्यालय के बड़े बाबू कामताप्रसाद और कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने पुष्प गुच्छ देकर शर्मिला का स्वागत किया। कार्यालय में कार्यभार ग्रहण करने के उपरांत शर्मिला ने सारे कर्मचारियों का परिचय प्राप्त किया। बड़े बाबू ने सभी का परिचय कराया। एक व्यक्ति जो सबसे कोने में बैठा था, जब उसके परिचय की बात आई तो शर्मिला ने बड़े बाबू से कहा कि ये खुद अपना परिचय देंगे। वह व्यक्ति शर्मिला को देखकर अवाक हो गया जैसे वह निस्तेज हो गया था। आज पाँच साल बाद अपनी पत्नी को जिलाधिकारी के रूप में देखकर वह हतप्रभ हो गया। उसके मुँह से एक शब्द नहीं निकल पा रहा था। उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया। वह किसी तरह से अपना परिचय दिया। इसके ठीक बाद वह बिना किसी को बताए कार्यालय से घर चला गया और चार दिन तक कार्यालय नहीं आया। कार्यालय के सभी कर्मचारी समझ ही नहीं पा रहे थे कि आखिर बात क्या है! उसके इस व्यवहार को उसके सहकर्मी समझ नहीं पा रहे थे। आपस में कानाफुसी होने लगी कि विवेक को आखिर ऐसा क्या हुआ कि जबसे मैडम यहाँ आयीं हैं तब से वह कुछ असंतुलित हो गया है।
चार दिन के बाद जब पाँचवें दिन भी वह नहीं लौटा, तो मैडम को उसकी चिंता होने लगी।
उसने बड़े बाबू को बुलाकर कहा कि विवेक कार्यालय क्यों नहीं आ रहा है? क्या बात है आप पता करके कल बताइए!
अगले दिन बड़े बाबू ने आकर मैडम से कहा कि विवेक के घर मैं गया था। वह बीमार है अब ठीक हो रहा है ऐसा उसने बताया। कल से संभवत: वह कार्यालय आयेगा।
अगले दिन विवेक साढ़े दस बजे कार्यालय पहुँचा। मैडम समय की पाबंद थी। ठीक दस बजे ही कार्यालय पहुँच गईं थीं। कुछ पुरानी फाइल का उन्हें निस्तारण करना था।
अपने कार्य में मैडम व्यस्त हो
गईं। ठीक ग्यारह बजे उन्होंने एक चपरासी को भेजा कि जाकर देखो कि विवेक आया है कि नहीं! यदि आया है तो बुला लाओ!
विवेक ने जैसे ही मैडम के कार्यालय में प्रवेश किया। उसे देखते ही मैडम ने कहा कि मिस्टर विवेक बिना अवकाश के आप घर क्यों बैठ गए! ऐसे नहीं चलेगा! आइंदा ऐसा होगा तो आपके खिलाफ मुझे सख्त कार्रवाई करनी पड़ेगी।
उसने कहा मैडम अगली बार ऐसा नहीं होगा। इस शब्द को मुँह से निकालने में जितनी पीड़ा आज हुई थी, उतनी पहले कभी नहीं हुई थी। आज उसके पुरुषार्थ को जैसे किसी ने हठात चुनौती दे दी हो।
आज से पाँच साल पहले जिस चाँदनी रात में उसने अपने भावी जीवन को सुंदर बनाने कि एकसाथ कसमें खाई थीं एक दूसरे की बाँहों से लिपटकर। कल्पना की कितनी उड़ान भरी थीं दोनों ने। कितनी मधुर रातें इस बात की साक्षी रही हैं।
आज उसी का यह आदेशात्मक स्वर! जैसे पूरा शरीर करेण्ट से झनझना गया हो।
आज पत्नी शर्मीला का यह सख्त आदेशात्मक स्वर जैसे उसके शरीर को छेद कर पार कर गया हो।
लेकिन वह कुछ कर भी नहीं सकता था। सिर्फ! आदेश को मानने के सिवा।
दूसरे दिन कार्यालय में हंगामा हो गया।
मैडम ने पूर्व के टेण्डर जो मानक के अनुरूप नहीं थे को निरस्त कर दिया। नए टेण्डर की प्रक्रिया फिर से शुरु करने की आज्ञा संबंधित अधिकारियों एवं क्लर्कों को दे दी।
मिस्टर वर्मा जो उस कार्यालय के उच्च अधिकारी थे उनको जैसे ही पता चला कि उनके द्वारा संस्तुत टेंण्डर निरस्त कर दिया गया। वे झल्ला गए। अपना आपा उन्होंने खो दिया। कार्यालय में जोर- जोर से शर्मिला मैडम को भला- बुरा कहने लगे।
यह बात विवेक को बड़ा ही नागवार लगा। उसने भी आवेश में आकर अपने सीनियर अधिकारी वर्मा का कालर पकड़ लिया और कहा
मिस्टर वर्मा होश में रहिए। जिहृवा बाहर खींच लूँगा। मैडम को यदि एक शब्द और कहा।
मिस्टर वर्मा ने कहा कि तुम मैडम के क्या लगते हो! तुम्हें इतनी मिर्ची क्यों लग रही है ?
दफ्तर के अन्य कर्मचारी बीच बचाव नहीं करते तो शायद हंगामा और भी बढ़ जाता।
रात के छह बज रहे थे विवेक सीधे मोस्टरसाइकिल से घर के लिए चल चुका था, जैसे ही बाजार क्रास करने वाला था। दो तीन बदमाश अँधेरे का लाभ उठाते हुए पीछे से आए और विवेक के सिर पर लाठी डंडे से प्रहार करने लगे। विवेक वहीं लहूलुहान होकर गिर पड़ा। मोहन वहीं पास में सब्जी खरीद रहा था, दौड़कर आया तो देखा कि यह तो मेरा पड़ोसी विवेक है। उसने फौरन उसे अस्पताल पहुँचाया। और इमर्जेंसी वार्ड में एडमिट कराया। सिर पर गहरा जख्म था। डाक्टरों की टीम ने आई0 सी0 यूo में शिफ्ट करने का आदेश दिया।
कुल बत्तीस टाँकें लगाए गए। रात के बारह बज रहे थे। अस्पताल में नर्स वार्ड में अपने मरीजों को देखकर सोने की तैयारी कर रही थीं। तभी विवेक के पिता को कहीं से सूचना मिली। वे वेचारे रोते बिलखते अस्पताल पहुंँचे, और नर्स से अपने बेटे के विषय में पूछने लगे। नर्स ने कहा कि आप का बेटा खतरे से बाहर हैं उन्हें नींद का इंजेक्शन दे दिया गया। सोये हैं आप सुबह ही मिल पायेंगे। वे बेचारे आईo सीo यूo के बाहर ही सुबह का इंतजार करने लगे।
अगले दिन जब विवेक कार्यालय नहीं पहुँचा, तो शर्मिला मैडम को चिंता होने लगी कि क्या बात है आज विवेक नहीं आया।
इसी बीच एक चपरासी ने कल की घटना का पूरा वृतांत मैडम को बताया।
मैडम समझ गई कि यह सब वर्मा का ही किया कराया है।
इधर शहर में उस दिन एक बड़ा कार्यक्रम था। राज्य के मंत्री को आना था। विभागीय तैयारी लगभग हो चुकी थी। कलेक्टर साहिबा को वहाँ एक घण्टे पहले पहुंँचना था। उन्होंने कार्यालय के बड़े बाबू को बुलाया और कहा कि विवेक अस्पताल में है वहाँ मेरा जाना बहुत जरूरी है। उसने कहा कि मैडम! लेकिन मंत्री जी आ रहे हैं! आपको वहाँ रहना चाहिए। मंत्री जी बुरा मान जायेंगे।
मैडम ने कहा! मंत्री जी अपना काम करेंगे और मैं अपना।
यही कहकर अपने ड्राइबर और एक कांस्टेबिल के साथ मैडम अस्पताल के लिए निकल गयी।
अस्पताल में मैडम ने जब विवेक को देखा तो मैडम की आँखों से आँसू छलक पड़े। अपने पति को इस हालत में देखकर।
तब तक विवेक को होश आ गया था। मैडम ने कहा कि क्या जरूरत थी वर्मा से उलझने की। वह मुझे अपशब्द कह रहा तुम्हें तो नहीं!
शर्मिला मैम की इन बातों से उसके जख्म पर जैसे मलहम लग गया हो। उसने औपचारिकता व प्रोटोकॉल की दीवार को क्षण भर में भहराते हुए कहा कि तुम्हें कोई अपशब्द कहे यह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता। दोनों की नजरों की नदी में जैसे अतीत की सुनहली नावें चलने लगी। दोनों अपने- अपने आँसू छुपाने लगे।
शर्मिला ने कहा कि तुम्हारी पत्नी कहाँ हैं?
उसने कहा कि मैंने शादी नहीं की।
और तुम!
मैंने भी नहीं!
तुमने क्यों नहीं की?
मेरी जिंदगी में पहले भी तुम थे और आज भी तुम्हीं हो!
विवेक ने कहा मुझे उम्मीद थी कि तुम जरूर लौटकर आओगी!
यह कहते ही दोनों फफककर रोने लगे और एक दूसरे से गले लिपट गए।
डॉ0 सम्पूर्णानंद मिश्र
शिवपुर वाराणसी
7458994874