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तंबाकू की हैवानियत / अशोक कुमार गौतम

“बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथहिं गावा।।”

(उत्तरकाण्ड- रामचरित मानस)

तंबाकू की हैवानियत

मानव रूप में जीवन पाना ईश्वर का दिया हुआ सबसे खूबसूरत उपहार है। जिसे सजा-संवार कर बनाए रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। तंबाकू के सेवन से हम अपना खुशहाल जीवन बर्बाद कर देते हैं। ‘नशा’ नाश की जड़ है, इस सूक्ति को भूलकर विभिन्न माध्यमों में तंबाकू खाते पीते हैं, जिससे असमय मृत्यु हो जाती है। विश्व के विभिन्न देशों में सन 1500 ई0 के बाद तंबाकू का सेवन प्रारंभ हो गया था। तब तंबाकू सिर्फ छोटे व्यापार का माध्यम हुआ करती थी। पुर्तगाल के व्यापारियों द्वारा भारत में सन 1608 ई0 में तंबाकू का पहला पौधा रोपा गया था। वह पौधा आज लगभग संपूर्ण भारत में लह-लहा रहा है। सन 1920 में जर्मन के वैज्ञानिकों ने तंबाकू से होने वाले कैंसर का पता लगाया था और सभी देशों को सचेत किया था। परंतु सन 1980 में तंबाकू खाने से होने वाले कैंसर की पुष्टि हुई है। निकोटियाना प्रजाति के पेड़ों के पत्तों को सुखाकर तंबाकू बनाया जाता है, जिसका प्रयोग सिगरेट, गुटखा, पान आदि के माध्यम से करते हैं। मध्यप्रदेश में तेंदू के पत्तों से बीड़ी बनाई जाती है जिसके अंदर भी तंबाकू भरते हैं। तम्बाकू में निकोटीन पाया जाता है जो शरीर की नसों को शनैः शनैः ब्लॉक करने लगता है, जिससे चेहरे की चमक तक चली जाती है। मुँह भी पूरा नहीं खोल पाते हैं।
अखिल विश्व में तंबाकू का प्रयोग दो प्रकार से होता है- चबाकर खाना और धुंआ के द्वारा। दोनों ही प्रकार से तंबाकू द्वारा बने उत्पादों का सेवन करने से मुख में कैंसर, गले में कैंसर, फेफड़ों में कैंसर, हृदय रोग दमा आदि बीमारियाँ हो जाती हैं। ये बीमारियाँ अकाल जानलेवा बन जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) के सर्वे में विश्व में प्रतिवर्ष 60 लाख से अधिक लोगों की असमय मृत्यु का कारण तंबाकू है। इसके दुष्परिणामों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 31 मई सन 1988 को अंतरराष्ट्रीय बैठक करके यह निर्णय लिया कि तंबाकू सेवन की रोकथाम और निवारण के लिए प्रतिवर्ष 31 मई को ‘विश्व तंबाकू निषेध दिवस’ मनाया जाएगा। वर्ष 2008 में भारत सरकार ने तंबाकू से जुड़े विज्ञापनों पर रोक लगा दी तथा तंबाकू से जुड़े सभी उत्पादों जैसे गुटखा, बीड़ी, सिगरेट, पान में प्रयोग की जाने वाली तंबाकू आदि के पैकेट ऊपर बिच्छू का चित्र, मुंह में कैंसर वाली मानवाकृति छपवाने का आदेश दिया। इतना ही नहीं नशा से जुड़ी हर पाउच, पैकेट, बोतल पर स्लोगन भी लिखवाया जाता है कि तंबाकू सेवन/मदिरा सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
भारत सरकार ने सार्वजनिक स्थानों जैसे बस स्टेशन, रेलवे स्टेशन, चिकित्सालय, स्कूल, कॉलेज, विभिन्न कार्यालयों आदि में धूम्रपान करने पर अर्थदंड का प्रावधान किया है। साथ ही 18 वर्ष से कम आयु के लड़कों को तंबाकू से जुड़े उत्पादों की बिक्री पर रोक लगा दी गयी है। यदि देखा जाए तो धूम्रपान की शुरुआत अक्सर शौकिया लोग करते हैं, लेकिन शुरू में खुशी या गम का इजहार करने का शौक समय के साथ लत बन जाता है जो प्राणघातक है। आज की युवा पीढ़ी अपने शौक पूरा करने तथा दोस्ती को प्रगाढ़ बनाने के लिए धूम्रपान कर रही है। तंबाकू का सेवन किसी भी रूप में करना मीठा जहर है जिसके प्रति शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लड़के लड़कियां अधिक आकर्षित हो रही हैं। इसके दुष्परिणाम बहुत ही घातक होंगे। यह युवा पीढ़ी के लिए चिंता का विषय है।
सरकार विभिन्न विज्ञापनों में करोड़ों रुपए खर्च करती है जिससे तंबाकू से लोगों को छुटकारा मिले। एक सिगरेट पीने से 11 मिनट आयु कम होती है तथा विश्व में 6 सेकंड में एक मृत्यु तंबाकू से होने वाले कैंसर से होती है। तम्बाकू सेवन छुड़ाने के लिए आयुर्वेद को बढ़ावा दिया जाए, जिससे इस बीमारी और लत को रोका जा सके।
भारत में विडम्बना है कि नशा मुक्ति अभियान में करोड़ों रुपए खर्च करके आमजन को जागरूक करने का सार्थक प्रयास किया जाता है, किंतु ‘नशा’ से जुड़ी वस्तुओं और अन्य मादक पदार्थों के उत्पादन पर रोक नहीं लगाई जाती है? यह भी वास्तविकता है कि धूम्रपान/आबकारी विभाग से सरकार को राजस्व प्राप्त होता है, परन्तु मानव जीवन को खतरा में डालना भी अनुचित है। इसलिए हम जिम्मेदार नागरिकों को संकल्प लेना होगा कि न नशा करेंगे, न किसी को प्रेरित करेंगे। नशा न करने से घर की अर्थव्यवस्था सुदृढ होगी, साथ ही पारिवारिक स्नेह, आत्मीय सम्मान और शारीरिक, मानसिक बल मिलेगा।

         
सरयू-भगवती कुंज,
अशोक कुमार गौतम
(असिस्टेंट प्रोफेसर)
शिवा जी नगर, रायबरेली
मो. 9415951459

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हिंदी की घटती लोकप्रियता, बढ़ता जनाधार | Essay on Hindi Diwas in Hindi

हिंदी की घटती लोकप्रियता, बढ़ता जनाधार | Essay on Hindi Diwas in Hindi

हिंदी की घटती लोकप्रियता, बढ़ता जनाधार

हिंदी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन पाई है

भाषा के बिना समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। मजबूत और दृढ़ राष्ट्र की एकता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रभाषा का होना उतना ही आवश्यक है, जितना जीवित रहने के लिए आत्मा का होना आवश्यक है। हिंदी भाषा की जब भी बात होती है तो मन में 14 सितंबर हिंदी दिवस गूँजने लगता है, तत्क्षण बैंकिंग सेक्टर, आईसीएसई, सीबीएसई बोर्ड के स्कूल, सोशल मीडिया, हिंग्लिश का प्रचलन आदि की ओर ध्यानाकर्षण होने लगता है। हम सब मिलकर चिंतन करें कि आखिर 72 वर्ष बाद भी हिंदी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन पाई है? वोट की राजनीति या विभिन्न सरकारों में इच्छाशक्ति की कमी या क्षेत्रवाद? या भौतिकवादी समाज में खुद को श्रेष्ठ दिखाना? कारण कुछ भी हो, हम कह सकते हैं कि हिंदी अपने ही देश में बेगानी होती जा रही है। हिंदी का प्रत्येक व्यंजन और स्वर मुख्यतः अर्धचंद्र और बिंदी से बना है। यदि हम हिंदी लिखते समय सुकृत बिंदी और अर्धचंद्र का प्रयोग आवश्यकतानुसार करें, तो सभी वर्ण अति सुंदर तथा सुडौल बनेंगे। विश्व की सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत है, तत्पश्चात क्रमानुसार पालि> प्राकृत> अपभ्रंश तब हिंदी का उद्भव हुआ है।

सर्वप्रथम महात्मा गांधी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की पहल की थी

गुरु गोरखनाथ हिंदी के प्रथम गद्य लेखक माने जाते हैं। चंद्रवरदाई, जायसी, खुसरो, अब्दुल रहमान, रैदास, सूरदास तुलसीदास, बिहारी, मीराबाई, नाभादास आदि ने हिंदी में अपनी रचनाएं की है, जो आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल से हिंदी प्रचलन में होने का प्रमाण है। हिंदी के पुरोधा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सन 1903 में सरस्वती पत्रिका का संपादन किया, तब वे रेलवे में नौकरी करते थे। उसी वर्ष द्विवेदी जी ने राष्ट्रप्रेम और हिंदी के उत्थान के लिए नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। स्वतंत्र भारत से पूर्व सन 1918 ईस्वी में सर्वप्रथम महात्मा गांधी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की पहल की थी। भारतीय संविधान के भाग 17 में वर्णित अनुच्छेद 343 से 351 तक संघ की भाषा, उच्चतम तथा उच्च न्यायालयों की भाषा, प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा देने का वर्णन है। हम गर्व के साथ कहते हैं कि विश्वपटल पर हिंदी दूसरे पायदान पर है। दिनांक 10 जनवरी 2017 को दैनिक जागरण के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित शीर्षक ‘दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बनी हिंदी, के अंतर्गत मुंबई विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉक्टर करुणा शंकर उपाध्याय ने अपनी पुस्तक हिंदी का विश्व संदर्भ में यह उल्लेख किया है कि हिंदी विश्व पटल पर सर्वाधिक बोली जाती है।

सरकारी, गैर सरकारी कार्यालयों में जो व्यक्ति कार्यालयी कार्य हिंदी में करे, उसे अतिरिक्त वेतन, अतिरिक्त अवकाश तथा अहिंदी भाषी राज्यों में भ्रमण हेतु पैकेज दिया जाना चाहिए। हिंदी विषय के विभिन्न साहित्यकारों और अन्य ज्ञानोपयोगी बिंदुओं पर शोधकार्य होना चाहिए, जिसके लिए सरकार और विश्वविद्यालयों को पहल करनी होगी। हिंदी को प्रोत्साहन देने के लिए संपूर्ण भारत के सभी स्कूलों में हिंदी विषय में प्रथम श्रेणी प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को अन्य विद्यार्थियों की अपेक्षा अतिरिक्त छात्रवृत्ति, प्रशस्ति पत्र औऱ अधिभार अंक मिलना चाहिए, जिससे छात्रों का हिंदी प्रेम और मनोबल बढ़े। महानगरों की ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं वाले स्कूलों में छात्रों और अभिभावकों से हिंदी में ही वार्तालाप किया जाए। हिंदी को पाठ्यक्रम का एक हिस्सा मानकर नहीं, वरन मातृभाषा के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए।

हिंदी आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वैज्ञानिक शब्दावली की भाषा है

हिंदी आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वैज्ञानिक शब्दावली की भाषा है। जिसके उच्चारण कंठ, तालु, होष्ठ, नासिका आदि से निर्धारित अक्षरों में किए जाते हैं। ऐसा वैज्ञानिक आधार अन्य भाषाओं में नहीं मिलेगा। हिंदी में जो लिखते हैं, वही पढ़ते हैं- जैसे ‘क’ को ‘क’ ही पढ़ेंगे। अंग्रेजी में ‘क’ को सीएच, क्यू, सी, के पढ़ते या लिखते हैं। अखिल विश्व की प्रमुख भाषाओं में चीनी भाषा में 204, दूसरे स्थान पर हिंदी में 52, संस्कृत में 44, उर्दू में 34, फारसी में 31, अंग्रेजी में 26 और लैटिन भाषा में 22 वर्ण होते हैं। हिंदी की महत्ता और वैज्ञानिक पद्धति को समझते हुए देश में सर्वप्रथम बनारस हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी के आईआईटी विभाग ने अपने पाठ्यक्रम को हिंदी भाषा में पढ़ने-पढ़ाने की अनुमति प्रदान की है।

बड़े गर्व की बात है उच्च न्यायालय प्रयागराज के न्यायमूर्ति श्री शेखर कुमार यादव ने स्व का तंत्र और मातृभाषा विषयक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए अधिवक्ताओं से कहा कि आप हिंदी में बहस करें। मैं हिंदी में निर्णय दूँगा। साथ ही कहा कि 25 प्रतिशत निर्णय में हिंदी में ही देता हूँ।

विश्वविद्यालयों की वार्षिक/सेमेस्टर परीक्षाओं में वर्णनात्मक/निबंधात्मक प्रश्नोत्तर लगभग समाप्त करके बहुविकल्पीय प्रश्नपत्रों को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। इस विकृत व्यवस्था से नकल को बढ़ावा तो मिला ही, साथ-साथ विद्यार्थी के अंदर लिखने-पढ़ने का कौशल तथा भाषाई ज्ञान समाप्त हो रहा है। अब तो व्हाट्सएप की संक्षिप्त भाषा को विद्यार्थी अपने जीवन और लेखन में उतरने लगे हैं।जिसका संक्षिप्त प्रयोग न हिंदी का सही व्याकरणीय ज्ञान का बोध करा पा रहा है, न अंग्रेजी का। जैसे प्लीज को पीएलजेड, थैंक्स को टीएचएनएक्स, मैसेज को एमएसजेड लिखने का प्रचलन खूब चल रहा है। जो आने वाली पीढ़ी के लिए घातक है।

कोविड-19 का दुष्प्रभाव बच्चों पर बहुत पड़ा है। इसके कारण 2 वर्षों से वास्तविक, स्कूली और किताबी और प्रयोगात्मक पढ़ाई न हो पाने के कारण उत्पन्न हुई भाषाई, उच्चारण और व्याकरण की समस्या दूर करने के लिए शिक्षकों के साथ-साथ अभिभावकों को भी आगे आना होगा। अभिभावक गण अपने पाल्यों की कॉपियां देखें और त्रुटियों की ओर उनका ध्यानाकर्षण करें।

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हिंदी दिलों को जोड़ने वाली मातृभाषा।

अंग्रेजी व्यापारिक भाषा है तो हिंदी दिलों को जोड़ने वाली मातृ भाषा। हिंदी माँ है तो उर्दू मौसी और संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। इसका गहनता से अध्ययन करते हुए हिंदी भाषा को सशक्तिकरण के रूप में अपनाना होगा। प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाने का तात्पर्य यह नहीं है कि हिंदी पीछे है या कमजोर है। इस महत्वपूर्ण दिन को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाने का उद्देश्य है- हिंदी को सम्मान देना। इस सम्मान की गरिमा बनाए रखने के लिए देवनागरी लिपि हिंदी को यथाशीघ्र राष्ट्रभाषा घोषित किया जाना चाहिए।

कभी-कभी मैं स्वयं हतप्रभ रह जाता हूँ। 21 अगस्त सन 2021 को हिंदुस्तान समाचार पत्र में प्रकाशित खबर के अनुसार प्रवक्ता पद के प्रश्नपत्र में 90% व्याकरण सम्बन्धी और अक्षरों की त्रुटियां हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में इतनी अधिक त्रुटियाँ होना हम सब को कटघरे में खड़ा करता है।यह योग्यता में कमी या इच्छाशक्ति में कमी या हिंदी के प्रति दुर्व्यवहार दर्शाता है? आखिर हमारी शैक्षिक पद्धति कहाँ जा रही है। अंत में इतना ही कहना चाहूँगा।

भारतीयता की पोषक हिन्दी और इसका वैश्विक स्वरूप/ रश्मि लहर

भारतीयता की पोषक हिन्दी और इसका वैश्विक स्वरूप/ रश्मि लहर

प्राचीन काल में भारत में प्रमुख रूप से आर्य परिवार एवं द्रविण परिवार की भाषाएं बोली जाती थीं । उत्तर भारत की भाषाएं आर्य परिवार की तथा दक्षिण भारत की भाषाएं द्रविण परिवार की थीं । उत्तर भारत की आर्य भाषाओं में संस्कृत सबसे प्राचीन है जिसका प्राचीनतम रूप ऋग्वेद में मिलता है, इसी की उत्तराधिकारिणी हिन्दी है ।

आज हम जिस भाषा को हिन्दी के रूप में जानते हैं वह आधुनिक आर्य भाषाओं में से एक है । हिन्दी वस्तुतः फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है हिन्दी या हिंद से सम्बंधित । हिन्दी शब्द की निष्पत्ति सिन्धु-सिंध से हुई है क्योंकि ईरानी भाषा में ‘स’ को ‘ह’ बोला जाता है। इस प्रकार हिन्दी शब्द वास्तव में सिन्धु शब्द का प्रतिरूप है । कालातंर में हिंद शब्द सम्पूर्ण भारत का पर्याय बनकर उभरा है । इसी ‘हिंद’ शब्द से हिन्दी बना ।

आधुनिक आर्य भाषाओं में, जिनमें हिन्दी भी है, का जन्म 1000 ई. के आस पास ही हुआ था किन्तु उसमें साहित्य रचना का कार्य 1150 ई. या इसके बाद आरंभ हुआ । हिन्दी भाषा का विकास अपभ्रंश के शौरसेनी, मागधी और अर्ध मागधी रूपों से हुआ है।

वैश्वीकरण, ग्लोबलाइजेशन या भूमण्डलीयकरण का अर्थ है विश्व में चारो ओर अर्थव्यवस्थाओं का बढ़ता हुआ एकीकरण। निःसंदेह यह एक आर्थिक अवधारणा है जो आज एक सांस्कृतिक एवं बहु-अर्थों में भाषाई संस्कार से भी जुड़ चुकी है । वैश्वीकरण आधुनिक विश्व का वह स्तंम्भ है जिस पर खड़े होकर दुनिया के हर समाज को देखा, समझा और महसूस किया जा सकता है। वैश्वीकरण आधुनिकता का वह मापदण्ड है जो किसी भी व्यक्ति, समाज, राष्ट्र को उसकी भौगोलिक सीमाओं से परे हटाकर एक समान धरातल उपलब्ध कराता है, जहाँ वह अपनी पहचान के साथ अपने स्थान को मजबूत करता है । इसके प्रवाह में आज कोई भी भाषा और साहित्य अछूता नहीं रह गया है, वह भी अपनी सरहदों को पारकर दुनिया भर के पाठकों तक अपनी पहचान बना चुका है, जिसमें दुनिया भर के प्रबुद्ध पाठक भी एक दूसरे से जुड़ चुके हैं और साहित्य का वैश्विक परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन संभव हो पा रहा है ।

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असंख्य अहिन्दी भाषी क्षेत्रों के विद्वानों ने न केवल हिन्दी को अपनाया वरन उन्होने हिन्दी को राजभाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित भी कराना चाहा और सभी जगह घूम-घूमकर हिन्दी का बिगुल बजाया साथ ही विदेशों में भी जाकर हिन्दी की पुरजोर वकालत की और अंतराष्ट्रीय परिदृश्य में हिंदी का परचम लहराया । इस सम्बंध में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का योगदान महत्वपूर्ण है । गुजराती भाषी महात्मा गाँधी ने कहा था “हिन्दी ही देश को एक सूत्र में बाँध सकती है । मुझे अंग्रेजी बोलने में शर्म आती है और मेरी दिली इच्छा है कि देश का हर नागरिक हिन्दी सीख ले व देश की हर भाषा देवनागरी में लिखी जाए” गाँधी का मानना था कि हर भारतवासी को हिन्दी सीखना चाहिए। इसी तरह मराठी भाषी लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने एक अवसर पर कहा था “हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी ।” स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, सुभाषचंद्र बोस, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, केशवचंद्र सेन आदि अनेक अहिन्दी भाषी विद्वानों ने हिन्दी भाषा का प्रबल समर्थन किया और हिन्दी को भारतवर्ष का भविष्य माना । स्वामी विवेकानन्द ने तो सन 1893 ई. में शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में ‘पार्लियामेंट आफ रिलीजन’ में अपने भाषण की शुरूआत भाइयों और बहनों से करके सब को मंत्रमुग्ध कर दिया था । स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ जैसा क्रांतिकारी ग्रंथ हिन्दी में रचकर हिन्दी को एक प्रतिष्ठा प्रदान की । कवि राजनेता और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने जनता सरकार के तत्कालीन विदेशमंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में पहला भाषण देकर इसके अंतराष्ट्रीय स्वरूप और महत्व में अत्यंत वृद्धि की।

14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने हिन्दी को भारतीय संघ की राजभाषा घोषित किया । तब से लेकर अब तक हिन्दी के स्वरूप में उत्तरोत्तर विकास औए परिवर्तन हुआ है । आज हिन्दी भी वैश्वीकरण की बयार से अछूती नहीं है । आज हम यह कह सकते हैं कि हिन्दी भाषा एक बार फिर नई चाल में ढल रही है ।

मैं कहना चाहूँगी कि आज हिन्दी भारत के साथ-साथ विश्व भाषा बनने को तैयार है । आज हिन्दी बाजार और व्यापार की प्रमुख भाषा बनकर उभरी है । हिन्दी आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मजबूत जगह बना चुकी है । अमेरिकी राष्ट्रपति ने स्पष्टतया घोषणा की कि “हिन्दी ऐसी विदेशी भाषा है जिसे 21वीं सदी में राष्ट्रीय सुरक्षा और समृद्धि के लिए अमेरिका के नागरिकों को सीखना चाहिए” । अमेरिका में भी आज हिन्दी भाषा का प्रयोग बढ़ा है । इस प्रकार हम कह सकते हैं आज हिन्दी अंतराष्ट्रीय स्तर पर किसी पहचान की मोहताज नहीं है वरन उसने विश्व परिदृश्य में एक नया मुकाम हासिल किया है ।

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आज अप्रवासी भारतीय पूरे विश्व में फैले हैं । एक आँकड़े के अनुसार इनकी संख्या पूरे विश्व में लगभग 2 करोड़ हैं । जिनके मध्य हिन्दी का पर्याप्त प्रचार प्रसार है । विश्व में हिन्दी शिक्षण को बढ़ावा देने के लिए निजी संस्थाएं, धार्मिक संस्थाए और सामाजिक संस्थाएं तो आगे आ ही रही है, सरकारी स्तर पर विद्यालय एवं विश्वविद्यालय द्वारा भी हिन्दी शिक्षण का बखूबी संचालन किया जा रहा है । उच्च अध्ययन संस्थानों में भी अध्ययन – अध्यापन एवं अनुसंधान की अच्छी व्यवस्था है । इस सम्बंध में अमेरिकी विद्वान डा. शोमर का कहना है कि “अमेरिका में ही 113 विश्वविद्यालयों और कालेजों में हिन्दी अध्ययन की सुविधाएं उपलब्ध हैं । जिनमें से 13 तो शोध स्तर के केंद्र बने हुए हैं ।“ आँकड़े बताते हैं कि इस समय विश्व के 143 विश्वविद्यालयों में हिन्दी शिक्षा की विविध स्तरों पर व्यवस्था है ।

भारत के बाहर जिन देशों में हिन्दी को बोलने, लिखने-पढ़ने तथा अध्ययन और अध्यापन की दृष्टि से प्रयोग होता है उनको अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से निम्न वर्गों में बाँटा जा सकता है –

  1. जहाँ भारतीय मूल के लोग अधिक संख्या में रहते हैं, जैसे पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यामांर, श्रीलंका व मालदीव आदि ।
  2. भारतीय संस्कृति से प्रभावित दक्षिण पूर्वी एशियाई देश जैसे इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, चीन, मंगोलिया, कोरिया तथा कनाडा ।
  3. जहाँ हिन्दी को विश्व की आधुनिक भाषा के रूप में पढ़ाया जाता है, जैसे अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोप के देश ।
  4. अरब तथा अन्य इस्लामी देश जैसे संयुक्त अरब अमीरात (दुबई), अफगानिस्तान, कतर, मिश्र, उजबेकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान आदि ।

अंत में मैं यह कह्ना चाह्ती हूँ कि भारतीयता की पोषक हिन्दी और इसका वैश्विक स्वरूप आज अपने श्रेष्ठ रूप में परिलक्षित हो रहा है । हिंदी संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनने के लिए प्रयत्नशील है । 21वीं सदी के पहले दशक में हिन्दी भाषा में जो परिवर्तन हुए हैं वे साधारण नहीं है । आज हिन्दी का स्वरूप ग्लोबल हो चला है । भाषा और व्याकरण में नए प्रयोग किये जा रहे हैं । साथ ही आज हिन्दी का महत्व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ रहा है ।

सविता चड्डा की रचना धर्मिता एक अमूल्य निधि है – डा पुष्पा सिह बिसेन

साहित्य जगत में अपनी लेखनी के माध्यम से अपना स्थान एवं अपनी पहचान को जिस प्रकार से बनाने में सविता जी सफल हुई है वह बहुत ही कठिन है। बहुत ही कम आयु में नौकरी प्राप्त करना और वैवाहिक बंधन को आत्मसात करते हुए ,एक सफर की शुरुआत, जिसमें जीवन साथी के साथ साथ अनेक रिश्ते भी  होते हैं।  अपना परिवार एवं दफ्तर, सभी तरह से सामंजस्य और सत्य के साथ ,साहस से समाज के सरोकारों की बातें, स्त्री की स्थिति के संदर्भ में अनेक समस्याओं को उद्धृत करते हुए,  अपनी बात को सरल शब्दों में रखने का हुनर सभी में नहीं दृष्टिगत होता । इनकी अनेक पुस्तकों के अवलोकन से यह बात साबित हुई है कि लेखिका एक मंजी हुई साहित्यकार तो है ही साथ ही विदुषी स्त्री भी हैं।  अपने अनेक प्रिय कार्यों में लेखन इन्हें अति प्रिय है। 

अपने अनेक करीब 10-12 वर्षों के मुलाकात में हम लगभग 10-12 बार ही सविता जी से मिल पाए हैं लेकिन सविता जी के व्यक्तित्व की बात करें तो इनकी व्यवहार कुशलता, स्नेह और आत्मीयता का कोई जवाब नहीं। ” मैं और मेरे साक्षात्कार”  पुस्तक को पढ़ने से इनकी अनेक प्रकार की खूबियों को जानने का मौका मिला।  अनेक प्रश्न जटिल भी है लेकिन इतनी सहजता से उनके उत्तर को विस्तार पूर्वक देना, ज्ञान के भंडार की वह विशेषता है जो कम लोगों में पाई जाती है । 

मैं प्रोफेसर नाम नामवर सिंह और आचार्य निशांत केतु जी के सानिध्य में 25 वर्षों से रही । महिला रचनाकारों में सविता चड्ढा जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से बहुत ही ज्यादा प्रभावित रही । मैंने महिला साहित्यकारों में कृष्णा सोबती, प्रभा खेतान एवं बुशरा रहमान को समग्र पढ़ी हूं।  अनेक समस्याओं के संग ,जो भी इन सभी की लेखन धर्मिता है,  उससे अलग हटकर, अनेक विधाओं में जो पठनीय  सामग्री सविता जी ने साहित्य जगत को दी है, वह अद्भुत दिव्यतम है। साहित्य भी एक ऐसा सरोवर है कि जिस में डुबकी लगाकर हम सार्थक साहित्य लेखन को आत्मसात करते हुए उसके मर्म को समझ सकते हैं।

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अनेक सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं ने इन्हें इनके लेखन के लिए सम्मानित किया है। सविता जी को अगर मैं  साहित्य रतन कहूं तो यह गलत नहीं होगा ।  सविता जी मैं जन्मजात अनेक विलक्षण प्रतिभाओं के बीज अंश मौजूद रहे होंगे जिन्हें समय-समय पर  वात्सल्य की उर्जा ने अंकुरित कर पल्लवित पोषित किया होगा । यहां अगर मैं उनके पति भाई श्री सुभाष चंद्र जी की बात ना करूं तो यह अन्याय होगा क्योंकि एक साहित्य वटवृक्ष  को उनके प्रेम और सानिध्य ने विशाल बरगद का स्वरूप दिया है 

हां, सविता दीदी अपने साहित्य सृजन के साथ-साथ अपने मधुर व्यवहार एवं मितव्ययता के लिए भी प्रसिद्ध है । उनमें जो सहजता एवं सरलता का संसार है वह बहुत ही दुर्लभ है । द्वेष, ईर्ष्या का लेश मात्र भी समावेश नहीं है । सभी से अथाह प्रेम करती हैं और अपने व्यक्तित्व की जो छाप लोगों के दिलों में छोड़ती हैं वे सभी जानते हैं ।

वह सदैव अपने लेखन से हमारे साहित्य जगत को शिक्षाप्रद साहित्य देती रहती है । कलम की धनी सविता जी सदैव इसी प्रकार अपने आप को गतिमान रखते हुए प्रगति पथ पर अग्रसर रहेगी।  साक्षात्कार की इस पुस्तक में अनेक विद्वानों के द्वारा लिए उनके लिए गए साक्षात्कार के जो प्रश्न है वह बहुत ही स्पीक और सार्थक हैं । साहित्य की मर्यादा का ध्यान रखते हुए,  सवालों और जवाबों के दायरे में बहुत ही सच्चाई और आत्मीयता का बोध होता है । प्रश्नों की श्रृंखला के बीच  यदि स्वयं का स्वयं से तादात्म्य बैठाना और सहजता के साथ उत्तर देना रचनाकार के व्यक्तित्व को अद्भुत बनाता है । आप सभी जानते हैं इन्हें और उनकी साहित्यिक विशिष्टता एवं श्रेष्ठता को पहचानते हैं । तभी तो इस पुस्तक में एक भी विवादित प्रश्न नहीं है।  लेखिका अपनी दोनों आंखों मैं परिवार एवं साहित्य को रचाती  बसाती है तभी तो आज सफलता के उस मुकाम पर आप प्रतिष्ठित होती हैं जहां ना तो साहित्य को आपसे कोई शिकायत है और ना ही परिवार को कोई रंज । बहुत ही खुशहाल परिवार की बेटी और बहू है सविता जी।

 मैं यह दावे के साथ कह सकती हूं कि आज के 21वीं सदी में सविता चड्डा जी के जैसा सामाजिक सरोकार एवं वर्तमान समस्याओं को उद्धृत करते हुए कोई भी नहीं लिख रहा है । साहित्यिक गुट बदियों से दूर स्वयं को रखते हुए इन्होंने अपनी रचना धर्मिता को जो मुकाम दिया है वह एक मील का पत्थर है। अपनी कहानियों,कविताओं से ये समाज से जुड़ती हैं और उन्हें समस्याओं से उभारती भी हैं।

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एक बार आचार्य निशांत केतु जी के यहां साहित्यिक बातचीत के दौरान जब यह बात कही गई थी आज के समय में लुम बहुत ही सार्थक लेखन कर रही हो,  तब मैंने कहा कि आचार्य जी ऐसा नहीं है सविता जी का लेखन श्रेष्ठ है।  बोले कि नाम तो बहुत सुना हूं लेकिन कोई पुस्तक पढ़ा नहीं हूं, यह मेरा दुर्भाग्य रहा । जबकि नामवर बाबूजी  जानते थे सविता जी को और कहते भी थे व्यवसायिकता   के दौर में कुछ महिलाएं ही अच्छा लेखन कर रही हैं।  मैं स्वयं को सौभाग्यशाली समझती हूं कि मुझे एक ऐसी श्रेष्ठ रचनाकारा का  प्यार – दुलार प्राप्त होता रहता है । 

आज के दौर में अगर सविता जी जैसे लोग आपके  साहित्य सृजन में है तो समझिए आपको अच्छा और बेहतर साहित्य पढ़ने का मौका मिलेगा।  शिक्षाप्रद साहित्य हमारे समाज एवं राष्ट्र के उत्थान में अपना योगदान देते हुए उसके रचनाकार को सदियों सदियों तक जीवंत रखता है।  

सविता जी का संपूर्ण साहित्य हमारे साहित्य जगत के लिए अनमोल धरोहर है और हम  महिला लेखिकाओं के लिए एक साहित्यिक विरासत जिसे पढ़कर अगली पीढ़ी याद करेगी कि 21वीं सदी की महान विदुषी साहित्यकारा सविता चड्ढा जी की रचना धर्मिता एक ऐसी अमूल्य निधि है जो हमें संभालकर रखनी है सदियों सदियों तक ।

डॉ पुष्पा सिंह बिसेन 
वरिष्ठ साहित्यकार 
मोबाइल 9873338623

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तंबाकू की हैवानियत / अशोक कुमार गौतम

“बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथहिं गावा।।”

(उत्तरकाण्ड- रामचरित मानस)

तंबाकू की हैवानियत

मानव रूप में जीवन पाना ईश्वर का दिया हुआ सबसे खूबसूरत उपहार है। जिसे सजा-संवार कर बनाए रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। तंबाकू के सेवन से हम अपना खुशहाल जीवन बर्बाद कर देते हैं। ‘नशा’ नाश की जड़ है, इस सूक्ति को भूलकर विभिन्न माध्यमों में तंबाकू खाते पीते हैं, जिससे असमय मृत्यु हो जाती है। विश्व के विभिन्न देशों में सन 1500 ई0 के बाद तंबाकू का सेवन प्रारंभ हो गया था। तब तंबाकू सिर्फ छोटे व्यापार का माध्यम हुआ करती थी। पुर्तगाल के व्यापारियों द्वारा भारत में सन 1608 ई0 में तंबाकू का पहला पौधा रोपा गया था। वह पौधा आज लगभग संपूर्ण भारत में लह-लहा रहा है। सन 1920 में जर्मन के वैज्ञानिकों ने तंबाकू से होने वाले कैंसर का पता लगाया था और सभी देशों को सचेत किया था। परंतु सन 1980 में तंबाकू खाने से होने वाले कैंसर की पुष्टि हुई है। निकोटियाना प्रजाति के पेड़ों के पत्तों को सुखाकर तंबाकू बनाया जाता है, जिसका प्रयोग सिगरेट, गुटखा, पान आदि के माध्यम से करते हैं। मध्यप्रदेश में तेंदू के पत्तों से बीड़ी बनाई जाती है जिसके अंदर भी तंबाकू भरते हैं। तम्बाकू में निकोटीन पाया जाता है जो शरीर की नसों को शनैः शनैः ब्लॉक करने लगता है, जिससे चेहरे की चमक तक चली जाती है। मुँह भी पूरा नहीं खोल पाते हैं।
अखिल विश्व में तंबाकू का प्रयोग दो प्रकार से होता है- चबाकर खाना और धुंआ के द्वारा। दोनों ही प्रकार से तंबाकू द्वारा बने उत्पादों का सेवन करने से मुख में कैंसर, गले में कैंसर, फेफड़ों में कैंसर, हृदय रोग दमा आदि बीमारियाँ हो जाती हैं। ये बीमारियाँ अकाल जानलेवा बन जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) के सर्वे में विश्व में प्रतिवर्ष 60 लाख से अधिक लोगों की असमय मृत्यु का कारण तंबाकू है। इसके दुष्परिणामों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 31 मई सन 1988 को अंतरराष्ट्रीय बैठक करके यह निर्णय लिया कि तंबाकू सेवन की रोकथाम और निवारण के लिए प्रतिवर्ष 31 मई को ‘विश्व तंबाकू निषेध दिवस’ मनाया जाएगा। वर्ष 2008 में भारत सरकार ने तंबाकू से जुड़े विज्ञापनों पर रोक लगा दी तथा तंबाकू से जुड़े सभी उत्पादों जैसे गुटखा, बीड़ी, सिगरेट, पान में प्रयोग की जाने वाली तंबाकू आदि के पैकेट ऊपर बिच्छू का चित्र, मुंह में कैंसर वाली मानवाकृति छपवाने का आदेश दिया। इतना ही नहीं नशा से जुड़ी हर पाउच, पैकेट, बोतल पर स्लोगन भी लिखवाया जाता है कि तंबाकू सेवन/मदिरा सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
भारत सरकार ने सार्वजनिक स्थानों जैसे बस स्टेशन, रेलवे स्टेशन, चिकित्सालय, स्कूल, कॉलेज, विभिन्न कार्यालयों आदि में धूम्रपान करने पर अर्थदंड का प्रावधान किया है। साथ ही 18 वर्ष से कम आयु के लड़कों को तंबाकू से जुड़े उत्पादों की बिक्री पर रोक लगा दी गयी है। यदि देखा जाए तो धूम्रपान की शुरुआत अक्सर शौकिया लोग करते हैं, लेकिन शुरू में खुशी या गम का इजहार करने का शौक समय के साथ लत बन जाता है जो प्राणघातक है। आज की युवा पीढ़ी अपने शौक पूरा करने तथा दोस्ती को प्रगाढ़ बनाने के लिए धूम्रपान कर रही है। तंबाकू का सेवन किसी भी रूप में करना मीठा जहर है जिसके प्रति शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लड़के लड़कियां अधिक आकर्षित हो रही हैं। इसके दुष्परिणाम बहुत ही घातक होंगे। यह युवा पीढ़ी के लिए चिंता का विषय है।
सरकार विभिन्न विज्ञापनों में करोड़ों रुपए खर्च करती है जिससे तंबाकू से लोगों को छुटकारा मिले। एक सिगरेट पीने से 11 मिनट आयु कम होती है तथा विश्व में 6 सेकंड में एक मृत्यु तंबाकू से होने वाले कैंसर से होती है। तम्बाकू सेवन छुड़ाने के लिए आयुर्वेद को बढ़ावा दिया जाए, जिससे इस बीमारी और लत को रोका जा सके।
भारत में विडम्बना है कि नशा मुक्ति अभियान में करोड़ों रुपए खर्च करके आमजन को जागरूक करने का सार्थक प्रयास किया जाता है, किंतु ‘नशा’ से जुड़ी वस्तुओं और अन्य मादक पदार्थों के उत्पादन पर रोक नहीं लगाई जाती है? यह भी वास्तविकता है कि धूम्रपान/आबकारी विभाग से सरकार को राजस्व प्राप्त होता है, परन्तु मानव जीवन को खतरा में डालना भी अनुचित है। इसलिए हम जिम्मेदार नागरिकों को संकल्प लेना होगा कि न नशा करेंगे, न किसी को प्रेरित करेंगे। नशा न करने से घर की अर्थव्यवस्था सुदृढ होगी, साथ ही पारिवारिक स्नेह, आत्मीय सम्मान और शारीरिक, मानसिक बल मिलेगा।

         
सरयू-भगवती कुंज,
अशोक कुमार गौतम
(असिस्टेंट प्रोफेसर)
शिवा जी नगर, रायबरेली
मो. 9415951459

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हिंदी की घटती लोकप्रियता, बढ़ता जनाधार | Essay on Hindi Diwas in Hindi

हिंदी की घटती लोकप्रियता, बढ़ता जनाधार | Essay on Hindi Diwas in Hindi

हिंदी की घटती लोकप्रियता, बढ़ता जनाधार

हिंदी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन पाई है

भाषा के बिना समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। मजबूत और दृढ़ राष्ट्र की एकता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रभाषा का होना उतना ही आवश्यक है, जितना जीवित रहने के लिए आत्मा का होना आवश्यक है। हिंदी भाषा की जब भी बात होती है तो मन में 14 सितंबर हिंदी दिवस गूँजने लगता है, तत्क्षण बैंकिंग सेक्टर, आईसीएसई, सीबीएसई बोर्ड के स्कूल, सोशल मीडिया, हिंग्लिश का प्रचलन आदि की ओर ध्यानाकर्षण होने लगता है। हम सब मिलकर चिंतन करें कि आखिर 72 वर्ष बाद भी हिंदी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन पाई है? वोट की राजनीति या विभिन्न सरकारों में इच्छाशक्ति की कमी या क्षेत्रवाद? या भौतिकवादी समाज में खुद को श्रेष्ठ दिखाना? कारण कुछ भी हो, हम कह सकते हैं कि हिंदी अपने ही देश में बेगानी होती जा रही है। हिंदी का प्रत्येक व्यंजन और स्वर मुख्यतः अर्धचंद्र और बिंदी से बना है। यदि हम हिंदी लिखते समय सुकृत बिंदी और अर्धचंद्र का प्रयोग आवश्यकतानुसार करें, तो सभी वर्ण अति सुंदर तथा सुडौल बनेंगे। विश्व की सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत है, तत्पश्चात क्रमानुसार पालि> प्राकृत> अपभ्रंश तब हिंदी का उद्भव हुआ है।

सर्वप्रथम महात्मा गांधी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की पहल की थी

गुरु गोरखनाथ हिंदी के प्रथम गद्य लेखक माने जाते हैं। चंद्रवरदाई, जायसी, खुसरो, अब्दुल रहमान, रैदास, सूरदास तुलसीदास, बिहारी, मीराबाई, नाभादास आदि ने हिंदी में अपनी रचनाएं की है, जो आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल से हिंदी प्रचलन में होने का प्रमाण है। हिंदी के पुरोधा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सन 1903 में सरस्वती पत्रिका का संपादन किया, तब वे रेलवे में नौकरी करते थे। उसी वर्ष द्विवेदी जी ने राष्ट्रप्रेम और हिंदी के उत्थान के लिए नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। स्वतंत्र भारत से पूर्व सन 1918 ईस्वी में सर्वप्रथम महात्मा गांधी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की पहल की थी। भारतीय संविधान के भाग 17 में वर्णित अनुच्छेद 343 से 351 तक संघ की भाषा, उच्चतम तथा उच्च न्यायालयों की भाषा, प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा देने का वर्णन है। हम गर्व के साथ कहते हैं कि विश्वपटल पर हिंदी दूसरे पायदान पर है। दिनांक 10 जनवरी 2017 को दैनिक जागरण के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित शीर्षक ‘दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बनी हिंदी, के अंतर्गत मुंबई विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉक्टर करुणा शंकर उपाध्याय ने अपनी पुस्तक हिंदी का विश्व संदर्भ में यह उल्लेख किया है कि हिंदी विश्व पटल पर सर्वाधिक बोली जाती है।

सरकारी, गैर सरकारी कार्यालयों में जो व्यक्ति कार्यालयी कार्य हिंदी में करे, उसे अतिरिक्त वेतन, अतिरिक्त अवकाश तथा अहिंदी भाषी राज्यों में भ्रमण हेतु पैकेज दिया जाना चाहिए। हिंदी विषय के विभिन्न साहित्यकारों और अन्य ज्ञानोपयोगी बिंदुओं पर शोधकार्य होना चाहिए, जिसके लिए सरकार और विश्वविद्यालयों को पहल करनी होगी। हिंदी को प्रोत्साहन देने के लिए संपूर्ण भारत के सभी स्कूलों में हिंदी विषय में प्रथम श्रेणी प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को अन्य विद्यार्थियों की अपेक्षा अतिरिक्त छात्रवृत्ति, प्रशस्ति पत्र औऱ अधिभार अंक मिलना चाहिए, जिससे छात्रों का हिंदी प्रेम और मनोबल बढ़े। महानगरों की ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं वाले स्कूलों में छात्रों और अभिभावकों से हिंदी में ही वार्तालाप किया जाए। हिंदी को पाठ्यक्रम का एक हिस्सा मानकर नहीं, वरन मातृभाषा के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए।

हिंदी आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वैज्ञानिक शब्दावली की भाषा है

हिंदी आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वैज्ञानिक शब्दावली की भाषा है। जिसके उच्चारण कंठ, तालु, होष्ठ, नासिका आदि से निर्धारित अक्षरों में किए जाते हैं। ऐसा वैज्ञानिक आधार अन्य भाषाओं में नहीं मिलेगा। हिंदी में जो लिखते हैं, वही पढ़ते हैं- जैसे ‘क’ को ‘क’ ही पढ़ेंगे। अंग्रेजी में ‘क’ को सीएच, क्यू, सी, के पढ़ते या लिखते हैं। अखिल विश्व की प्रमुख भाषाओं में चीनी भाषा में 204, दूसरे स्थान पर हिंदी में 52, संस्कृत में 44, उर्दू में 34, फारसी में 31, अंग्रेजी में 26 और लैटिन भाषा में 22 वर्ण होते हैं। हिंदी की महत्ता और वैज्ञानिक पद्धति को समझते हुए देश में सर्वप्रथम बनारस हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी के आईआईटी विभाग ने अपने पाठ्यक्रम को हिंदी भाषा में पढ़ने-पढ़ाने की अनुमति प्रदान की है।

बड़े गर्व की बात है उच्च न्यायालय प्रयागराज के न्यायमूर्ति श्री शेखर कुमार यादव ने स्व का तंत्र और मातृभाषा विषयक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए अधिवक्ताओं से कहा कि आप हिंदी में बहस करें। मैं हिंदी में निर्णय दूँगा। साथ ही कहा कि 25 प्रतिशत निर्णय में हिंदी में ही देता हूँ।

विश्वविद्यालयों की वार्षिक/सेमेस्टर परीक्षाओं में वर्णनात्मक/निबंधात्मक प्रश्नोत्तर लगभग समाप्त करके बहुविकल्पीय प्रश्नपत्रों को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। इस विकृत व्यवस्था से नकल को बढ़ावा तो मिला ही, साथ-साथ विद्यार्थी के अंदर लिखने-पढ़ने का कौशल तथा भाषाई ज्ञान समाप्त हो रहा है। अब तो व्हाट्सएप की संक्षिप्त भाषा को विद्यार्थी अपने जीवन और लेखन में उतरने लगे हैं।जिसका संक्षिप्त प्रयोग न हिंदी का सही व्याकरणीय ज्ञान का बोध करा पा रहा है, न अंग्रेजी का। जैसे प्लीज को पीएलजेड, थैंक्स को टीएचएनएक्स, मैसेज को एमएसजेड लिखने का प्रचलन खूब चल रहा है। जो आने वाली पीढ़ी के लिए घातक है।

कोविड-19 का दुष्प्रभाव बच्चों पर बहुत पड़ा है। इसके कारण 2 वर्षों से वास्तविक, स्कूली और किताबी और प्रयोगात्मक पढ़ाई न हो पाने के कारण उत्पन्न हुई भाषाई, उच्चारण और व्याकरण की समस्या दूर करने के लिए शिक्षकों के साथ-साथ अभिभावकों को भी आगे आना होगा। अभिभावक गण अपने पाल्यों की कॉपियां देखें और त्रुटियों की ओर उनका ध्यानाकर्षण करें।

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हिंदी दिलों को जोड़ने वाली मातृभाषा।

अंग्रेजी व्यापारिक भाषा है तो हिंदी दिलों को जोड़ने वाली मातृ भाषा। हिंदी माँ है तो उर्दू मौसी और संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। इसका गहनता से अध्ययन करते हुए हिंदी भाषा को सशक्तिकरण के रूप में अपनाना होगा। प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाने का तात्पर्य यह नहीं है कि हिंदी पीछे है या कमजोर है। इस महत्वपूर्ण दिन को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाने का उद्देश्य है- हिंदी को सम्मान देना। इस सम्मान की गरिमा बनाए रखने के लिए देवनागरी लिपि हिंदी को यथाशीघ्र राष्ट्रभाषा घोषित किया जाना चाहिए।

कभी-कभी मैं स्वयं हतप्रभ रह जाता हूँ। 21 अगस्त सन 2021 को हिंदुस्तान समाचार पत्र में प्रकाशित खबर के अनुसार प्रवक्ता पद के प्रश्नपत्र में 90% व्याकरण सम्बन्धी और अक्षरों की त्रुटियां हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में इतनी अधिक त्रुटियाँ होना हम सब को कटघरे में खड़ा करता है।यह योग्यता में कमी या इच्छाशक्ति में कमी या हिंदी के प्रति दुर्व्यवहार दर्शाता है? आखिर हमारी शैक्षिक पद्धति कहाँ जा रही है। अंत में इतना ही कहना चाहूँगा।

भारतीयता की पोषक हिन्दी और इसका वैश्विक स्वरूप/ रश्मि लहर

भारतीयता की पोषक हिन्दी और इसका वैश्विक स्वरूप/ रश्मि लहर

प्राचीन काल में भारत में प्रमुख रूप से आर्य परिवार एवं द्रविण परिवार की भाषाएं बोली जाती थीं । उत्तर भारत की भाषाएं आर्य परिवार की तथा दक्षिण भारत की भाषाएं द्रविण परिवार की थीं । उत्तर भारत की आर्य भाषाओं में संस्कृत सबसे प्राचीन है जिसका प्राचीनतम रूप ऋग्वेद में मिलता है, इसी की उत्तराधिकारिणी हिन्दी है ।

आज हम जिस भाषा को हिन्दी के रूप में जानते हैं वह आधुनिक आर्य भाषाओं में से एक है । हिन्दी वस्तुतः फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है हिन्दी या हिंद से सम्बंधित । हिन्दी शब्द की निष्पत्ति सिन्धु-सिंध से हुई है क्योंकि ईरानी भाषा में ‘स’ को ‘ह’ बोला जाता है। इस प्रकार हिन्दी शब्द वास्तव में सिन्धु शब्द का प्रतिरूप है । कालातंर में हिंद शब्द सम्पूर्ण भारत का पर्याय बनकर उभरा है । इसी ‘हिंद’ शब्द से हिन्दी बना ।

आधुनिक आर्य भाषाओं में, जिनमें हिन्दी भी है, का जन्म 1000 ई. के आस पास ही हुआ था किन्तु उसमें साहित्य रचना का कार्य 1150 ई. या इसके बाद आरंभ हुआ । हिन्दी भाषा का विकास अपभ्रंश के शौरसेनी, मागधी और अर्ध मागधी रूपों से हुआ है।

वैश्वीकरण, ग्लोबलाइजेशन या भूमण्डलीयकरण का अर्थ है विश्व में चारो ओर अर्थव्यवस्थाओं का बढ़ता हुआ एकीकरण। निःसंदेह यह एक आर्थिक अवधारणा है जो आज एक सांस्कृतिक एवं बहु-अर्थों में भाषाई संस्कार से भी जुड़ चुकी है । वैश्वीकरण आधुनिक विश्व का वह स्तंम्भ है जिस पर खड़े होकर दुनिया के हर समाज को देखा, समझा और महसूस किया जा सकता है। वैश्वीकरण आधुनिकता का वह मापदण्ड है जो किसी भी व्यक्ति, समाज, राष्ट्र को उसकी भौगोलिक सीमाओं से परे हटाकर एक समान धरातल उपलब्ध कराता है, जहाँ वह अपनी पहचान के साथ अपने स्थान को मजबूत करता है । इसके प्रवाह में आज कोई भी भाषा और साहित्य अछूता नहीं रह गया है, वह भी अपनी सरहदों को पारकर दुनिया भर के पाठकों तक अपनी पहचान बना चुका है, जिसमें दुनिया भर के प्रबुद्ध पाठक भी एक दूसरे से जुड़ चुके हैं और साहित्य का वैश्विक परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन संभव हो पा रहा है ।

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असंख्य अहिन्दी भाषी क्षेत्रों के विद्वानों ने न केवल हिन्दी को अपनाया वरन उन्होने हिन्दी को राजभाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित भी कराना चाहा और सभी जगह घूम-घूमकर हिन्दी का बिगुल बजाया साथ ही विदेशों में भी जाकर हिन्दी की पुरजोर वकालत की और अंतराष्ट्रीय परिदृश्य में हिंदी का परचम लहराया । इस सम्बंध में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का योगदान महत्वपूर्ण है । गुजराती भाषी महात्मा गाँधी ने कहा था “हिन्दी ही देश को एक सूत्र में बाँध सकती है । मुझे अंग्रेजी बोलने में शर्म आती है और मेरी दिली इच्छा है कि देश का हर नागरिक हिन्दी सीख ले व देश की हर भाषा देवनागरी में लिखी जाए” गाँधी का मानना था कि हर भारतवासी को हिन्दी सीखना चाहिए। इसी तरह मराठी भाषी लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने एक अवसर पर कहा था “हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी ।” स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, सुभाषचंद्र बोस, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, केशवचंद्र सेन आदि अनेक अहिन्दी भाषी विद्वानों ने हिन्दी भाषा का प्रबल समर्थन किया और हिन्दी को भारतवर्ष का भविष्य माना । स्वामी विवेकानन्द ने तो सन 1893 ई. में शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में ‘पार्लियामेंट आफ रिलीजन’ में अपने भाषण की शुरूआत भाइयों और बहनों से करके सब को मंत्रमुग्ध कर दिया था । स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ जैसा क्रांतिकारी ग्रंथ हिन्दी में रचकर हिन्दी को एक प्रतिष्ठा प्रदान की । कवि राजनेता और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने जनता सरकार के तत्कालीन विदेशमंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में पहला भाषण देकर इसके अंतराष्ट्रीय स्वरूप और महत्व में अत्यंत वृद्धि की।

14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने हिन्दी को भारतीय संघ की राजभाषा घोषित किया । तब से लेकर अब तक हिन्दी के स्वरूप में उत्तरोत्तर विकास औए परिवर्तन हुआ है । आज हिन्दी भी वैश्वीकरण की बयार से अछूती नहीं है । आज हम यह कह सकते हैं कि हिन्दी भाषा एक बार फिर नई चाल में ढल रही है ।

मैं कहना चाहूँगी कि आज हिन्दी भारत के साथ-साथ विश्व भाषा बनने को तैयार है । आज हिन्दी बाजार और व्यापार की प्रमुख भाषा बनकर उभरी है । हिन्दी आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मजबूत जगह बना चुकी है । अमेरिकी राष्ट्रपति ने स्पष्टतया घोषणा की कि “हिन्दी ऐसी विदेशी भाषा है जिसे 21वीं सदी में राष्ट्रीय सुरक्षा और समृद्धि के लिए अमेरिका के नागरिकों को सीखना चाहिए” । अमेरिका में भी आज हिन्दी भाषा का प्रयोग बढ़ा है । इस प्रकार हम कह सकते हैं आज हिन्दी अंतराष्ट्रीय स्तर पर किसी पहचान की मोहताज नहीं है वरन उसने विश्व परिदृश्य में एक नया मुकाम हासिल किया है ।

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आज अप्रवासी भारतीय पूरे विश्व में फैले हैं । एक आँकड़े के अनुसार इनकी संख्या पूरे विश्व में लगभग 2 करोड़ हैं । जिनके मध्य हिन्दी का पर्याप्त प्रचार प्रसार है । विश्व में हिन्दी शिक्षण को बढ़ावा देने के लिए निजी संस्थाएं, धार्मिक संस्थाए और सामाजिक संस्थाएं तो आगे आ ही रही है, सरकारी स्तर पर विद्यालय एवं विश्वविद्यालय द्वारा भी हिन्दी शिक्षण का बखूबी संचालन किया जा रहा है । उच्च अध्ययन संस्थानों में भी अध्ययन – अध्यापन एवं अनुसंधान की अच्छी व्यवस्था है । इस सम्बंध में अमेरिकी विद्वान डा. शोमर का कहना है कि “अमेरिका में ही 113 विश्वविद्यालयों और कालेजों में हिन्दी अध्ययन की सुविधाएं उपलब्ध हैं । जिनमें से 13 तो शोध स्तर के केंद्र बने हुए हैं ।“ आँकड़े बताते हैं कि इस समय विश्व के 143 विश्वविद्यालयों में हिन्दी शिक्षा की विविध स्तरों पर व्यवस्था है ।

भारत के बाहर जिन देशों में हिन्दी को बोलने, लिखने-पढ़ने तथा अध्ययन और अध्यापन की दृष्टि से प्रयोग होता है उनको अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से निम्न वर्गों में बाँटा जा सकता है –

  1. जहाँ भारतीय मूल के लोग अधिक संख्या में रहते हैं, जैसे पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यामांर, श्रीलंका व मालदीव आदि ।
  2. भारतीय संस्कृति से प्रभावित दक्षिण पूर्वी एशियाई देश जैसे इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, चीन, मंगोलिया, कोरिया तथा कनाडा ।
  3. जहाँ हिन्दी को विश्व की आधुनिक भाषा के रूप में पढ़ाया जाता है, जैसे अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोप के देश ।
  4. अरब तथा अन्य इस्लामी देश जैसे संयुक्त अरब अमीरात (दुबई), अफगानिस्तान, कतर, मिश्र, उजबेकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान आदि ।

अंत में मैं यह कह्ना चाह्ती हूँ कि भारतीयता की पोषक हिन्दी और इसका वैश्विक स्वरूप आज अपने श्रेष्ठ रूप में परिलक्षित हो रहा है । हिंदी संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनने के लिए प्रयत्नशील है । 21वीं सदी के पहले दशक में हिन्दी भाषा में जो परिवर्तन हुए हैं वे साधारण नहीं है । आज हिन्दी का स्वरूप ग्लोबल हो चला है । भाषा और व्याकरण में नए प्रयोग किये जा रहे हैं । साथ ही आज हिन्दी का महत्व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ रहा है ।

सविता चड्डा की रचना धर्मिता एक अमूल्य निधि है – डा पुष्पा सिह बिसेन

साहित्य जगत में अपनी लेखनी के माध्यम से अपना स्थान एवं अपनी पहचान को जिस प्रकार से बनाने में सविता जी सफल हुई है वह बहुत ही कठिन है। बहुत ही कम आयु में नौकरी प्राप्त करना और वैवाहिक बंधन को आत्मसात करते हुए ,एक सफर की शुरुआत, जिसमें जीवन साथी के साथ साथ अनेक रिश्ते भी  होते हैं।  अपना परिवार एवं दफ्तर, सभी तरह से सामंजस्य और सत्य के साथ ,साहस से समाज के सरोकारों की बातें, स्त्री की स्थिति के संदर्भ में अनेक समस्याओं को उद्धृत करते हुए,  अपनी बात को सरल शब्दों में रखने का हुनर सभी में नहीं दृष्टिगत होता । इनकी अनेक पुस्तकों के अवलोकन से यह बात साबित हुई है कि लेखिका एक मंजी हुई साहित्यकार तो है ही साथ ही विदुषी स्त्री भी हैं।  अपने अनेक प्रिय कार्यों में लेखन इन्हें अति प्रिय है। 

अपने अनेक करीब 10-12 वर्षों के मुलाकात में हम लगभग 10-12 बार ही सविता जी से मिल पाए हैं लेकिन सविता जी के व्यक्तित्व की बात करें तो इनकी व्यवहार कुशलता, स्नेह और आत्मीयता का कोई जवाब नहीं। ” मैं और मेरे साक्षात्कार”  पुस्तक को पढ़ने से इनकी अनेक प्रकार की खूबियों को जानने का मौका मिला।  अनेक प्रश्न जटिल भी है लेकिन इतनी सहजता से उनके उत्तर को विस्तार पूर्वक देना, ज्ञान के भंडार की वह विशेषता है जो कम लोगों में पाई जाती है । 

मैं प्रोफेसर नाम नामवर सिंह और आचार्य निशांत केतु जी के सानिध्य में 25 वर्षों से रही । महिला रचनाकारों में सविता चड्ढा जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से बहुत ही ज्यादा प्रभावित रही । मैंने महिला साहित्यकारों में कृष्णा सोबती, प्रभा खेतान एवं बुशरा रहमान को समग्र पढ़ी हूं।  अनेक समस्याओं के संग ,जो भी इन सभी की लेखन धर्मिता है,  उससे अलग हटकर, अनेक विधाओं में जो पठनीय  सामग्री सविता जी ने साहित्य जगत को दी है, वह अद्भुत दिव्यतम है। साहित्य भी एक ऐसा सरोवर है कि जिस में डुबकी लगाकर हम सार्थक साहित्य लेखन को आत्मसात करते हुए उसके मर्म को समझ सकते हैं।

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अनेक सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं ने इन्हें इनके लेखन के लिए सम्मानित किया है। सविता जी को अगर मैं  साहित्य रतन कहूं तो यह गलत नहीं होगा ।  सविता जी मैं जन्मजात अनेक विलक्षण प्रतिभाओं के बीज अंश मौजूद रहे होंगे जिन्हें समय-समय पर  वात्सल्य की उर्जा ने अंकुरित कर पल्लवित पोषित किया होगा । यहां अगर मैं उनके पति भाई श्री सुभाष चंद्र जी की बात ना करूं तो यह अन्याय होगा क्योंकि एक साहित्य वटवृक्ष  को उनके प्रेम और सानिध्य ने विशाल बरगद का स्वरूप दिया है 

हां, सविता दीदी अपने साहित्य सृजन के साथ-साथ अपने मधुर व्यवहार एवं मितव्ययता के लिए भी प्रसिद्ध है । उनमें जो सहजता एवं सरलता का संसार है वह बहुत ही दुर्लभ है । द्वेष, ईर्ष्या का लेश मात्र भी समावेश नहीं है । सभी से अथाह प्रेम करती हैं और अपने व्यक्तित्व की जो छाप लोगों के दिलों में छोड़ती हैं वे सभी जानते हैं ।

वह सदैव अपने लेखन से हमारे साहित्य जगत को शिक्षाप्रद साहित्य देती रहती है । कलम की धनी सविता जी सदैव इसी प्रकार अपने आप को गतिमान रखते हुए प्रगति पथ पर अग्रसर रहेगी।  साक्षात्कार की इस पुस्तक में अनेक विद्वानों के द्वारा लिए उनके लिए गए साक्षात्कार के जो प्रश्न है वह बहुत ही स्पीक और सार्थक हैं । साहित्य की मर्यादा का ध्यान रखते हुए,  सवालों और जवाबों के दायरे में बहुत ही सच्चाई और आत्मीयता का बोध होता है । प्रश्नों की श्रृंखला के बीच  यदि स्वयं का स्वयं से तादात्म्य बैठाना और सहजता के साथ उत्तर देना रचनाकार के व्यक्तित्व को अद्भुत बनाता है । आप सभी जानते हैं इन्हें और उनकी साहित्यिक विशिष्टता एवं श्रेष्ठता को पहचानते हैं । तभी तो इस पुस्तक में एक भी विवादित प्रश्न नहीं है।  लेखिका अपनी दोनों आंखों मैं परिवार एवं साहित्य को रचाती  बसाती है तभी तो आज सफलता के उस मुकाम पर आप प्रतिष्ठित होती हैं जहां ना तो साहित्य को आपसे कोई शिकायत है और ना ही परिवार को कोई रंज । बहुत ही खुशहाल परिवार की बेटी और बहू है सविता जी।

 मैं यह दावे के साथ कह सकती हूं कि आज के 21वीं सदी में सविता चड्डा जी के जैसा सामाजिक सरोकार एवं वर्तमान समस्याओं को उद्धृत करते हुए कोई भी नहीं लिख रहा है । साहित्यिक गुट बदियों से दूर स्वयं को रखते हुए इन्होंने अपनी रचना धर्मिता को जो मुकाम दिया है वह एक मील का पत्थर है। अपनी कहानियों,कविताओं से ये समाज से जुड़ती हैं और उन्हें समस्याओं से उभारती भी हैं।

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एक बार आचार्य निशांत केतु जी के यहां साहित्यिक बातचीत के दौरान जब यह बात कही गई थी आज के समय में लुम बहुत ही सार्थक लेखन कर रही हो,  तब मैंने कहा कि आचार्य जी ऐसा नहीं है सविता जी का लेखन श्रेष्ठ है।  बोले कि नाम तो बहुत सुना हूं लेकिन कोई पुस्तक पढ़ा नहीं हूं, यह मेरा दुर्भाग्य रहा । जबकि नामवर बाबूजी  जानते थे सविता जी को और कहते भी थे व्यवसायिकता   के दौर में कुछ महिलाएं ही अच्छा लेखन कर रही हैं।  मैं स्वयं को सौभाग्यशाली समझती हूं कि मुझे एक ऐसी श्रेष्ठ रचनाकारा का  प्यार – दुलार प्राप्त होता रहता है । 

आज के दौर में अगर सविता जी जैसे लोग आपके  साहित्य सृजन में है तो समझिए आपको अच्छा और बेहतर साहित्य पढ़ने का मौका मिलेगा।  शिक्षाप्रद साहित्य हमारे समाज एवं राष्ट्र के उत्थान में अपना योगदान देते हुए उसके रचनाकार को सदियों सदियों तक जीवंत रखता है।  

सविता जी का संपूर्ण साहित्य हमारे साहित्य जगत के लिए अनमोल धरोहर है और हम  महिला लेखिकाओं के लिए एक साहित्यिक विरासत जिसे पढ़कर अगली पीढ़ी याद करेगी कि 21वीं सदी की महान विदुषी साहित्यकारा सविता चड्ढा जी की रचना धर्मिता एक ऐसी अमूल्य निधि है जो हमें संभालकर रखनी है सदियों सदियों तक ।

डॉ पुष्पा सिंह बिसेन 
वरिष्ठ साहित्यकार 
मोबाइल 9873338623

पत्रकारों के लिए बहुत ही उपयोगी पुस्तक “मैं और मेरे साक्षात्कार” लोकार्पण संपन्न हुआ

पत्रकारों के लिए बहुत ही उपयोगी पुस्तक “मैं और मेरे साक्षात्कार” लोकार्पण संपन्न हुआ

श्रीमती सविता चड्डा की नवीनतम प्रकाशित कृति ” मैं और मेरे साक्षात्कार ” का लोकार्पण माननीय पूर्व उपमहापौर वरयाम कौर और वरिष्ठ पत्रकार हरीश चोपड़ा ,लतांत  प्रसून, डा  कल्पना पांडेय द्वारा किया गया।  इस अवसर पर इस पुस्तक में जिन पत्रकारों, लेखकों के इंटरव्यू शामिल है वे भी इस अवसर पर उपस्थित थे ।

कार्यक्रम का शुभारंभ और संचालन करते हुए वरिष्ठ कवि और लेखक अमोद कुमार ने कहा कि ” यह एक दुर्लभ कृति है जिसमें सविता चड्ढा के लेखन और समाज के प्रति उनके दृष्टिकोण के दर्शन होते हैं ।

इस अवसर पर लेखिका ने उपस्थित सभी महानुभावों का स्वागत और अभिनंदन किया । उन्होंने कहा कि जब मैं पत्रकारिता का डिप्लोमा कर रही थी और  जब  मेरी पुस्तक “नई पत्रकारिता और समाचार लेखन ” प्रकाशित हुई थी तब मुझे इस बात का बिल्कुल भी पता नहीं था कि कभी मेरे भी इंटरव्यू लिए जाएंगे और वह पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित  भी होंगे । उन्होंने कहा कि जिन लेखकों पत्रकारों ने मेरे इंटरव्यू लिए हैं मैं उनके प्रति बहुत आभारी हूं । सविता जी ने उन सब लेखकों, पत्रकारों को याद किया जिन्होंने 30 – 35 -40 वर्ष पूर्व उनके इंटरव्यू लिए और वे सब पत्र-पत्रिकाओं में , देश और विदेश में प्रकाशित किए हुए । उन्होंने  इस पुस्तक के कवर पर मुरारीलाल त्यागी जी के चित्र का उल्लेख करते हुए बताया कि यह चित्र उस अवसर का है जब त्यागी जी मेरे ही निवास पर वे कल्पांत पत्रिका के लिए मेरा इंटरव्यू करने आए थे।  

इसी अवसर पर श्रीमती वरयाम कौर, पूर्व उपमहापौर दिल्ली ने सविता चड्डा की पारिवारिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए कहा कि इन्हें लेखन के संस्कार इनकी माताजी से ही मिले हैं । उन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण बात का उल्लेख किया , उन्होंने कहा कि सविता जी की माता  जी जो स्कूल चलाती थी मैं उसी की विद्यार्थी रही हूं।  उन्होंने इस पुस्तक को बहुत ही उपयोगी कहा और यह भी कहा कि वह उनके द्वारा किए गए लेखन और परिश्रम की वे कद्रदान है । 

इस अवसर पर पंजाब केसरी के पत्रकार हरीश चोपड़ा ने लेखिका को  इस पुस्तक के प्रकाशन के लिए बधाई देते हुए इस पुस्तक की बहुत सराहना की और कहां इस पुस्तक की उपयोगिता पत्रकारिता के क्षेत्र में बहुत अधिक होने वाली है। उन्होंने बताया कि लगभग 30 वर्ष पूर्व जब उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया था  तब उन्होंने सविता जी का इंटरव्यू लिया था । उन्हें बहुत खुशी है कि उस इंटरव्यू को आज इस पुस्तक में शामिल किया गया है।

 इसी अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार लतांत प्रसून ने कहा कि सविता चड्डा एक बहुत ही कर्मठ महिला है और पत्रकारिता पर इनका बहुत बड़ा कार्य है।  यह पुस्तक भी पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।

लोकार्पण समारोह में बोलते हुए डॉ रवि शर्मा ‘मधुप’ ने कहा कि यह पुस्तक अपने आप में अनूठी है। इसमें संगृहीत 23 साक्षात्कार (17 हिंदी में और 6 अंग्रेज़ी में) लेखिका सविता चड्ढा के व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों को उद्घाटित करते हैं। साहित्य लेखन और परिवार के दायित्व, नारी की स्थिति, बच्चों का पालन-पोषण, भारत में हिंदी, साहित्यकार की भूमिका आदि विविध विषयों पर आपके विचार इस पुस्तक को पूर्णता प्रदान करते हैं। इस पुस्तक में संगृहीत मेरे द्वारा लिए गए साक्षात्कार में सविता जी ने भारत में हिंदी की विभिन्न रूपों में उपस्थिति और भविष्य की संभावनाओं पर विशद चर्चा की है। उन्होंने महत्त्वपूर्ण पुस्तक के लिए लेखिका को हार्दिक बधाई दी।

डा कल्पना पांडे ने सविता चड्ढा को बधाई और शुभकामनाएं देते हुए अपने एहसास काव्य के माध्यम से इस प्रकार प्रस्तुत किए।

ख़ूबसूरत ज़िंदगी का तुम नया अंदाज़ हो 

भाव में हर राग में सुंदर सी इक आवाज़ हो

नित नई आराधना में तुम समर्पित राग हो 

खिलखिलाती ज़िंदगी का तुम ही तो आगाज़ हो

लेखनी से भर ही देती तुम नया एहसास हो 

गीत हो या की ग़ज़ल हो प्रेम का सद्भाव हो

दर्द में तन्हाइयों में तुम मधुर सा साज़ हो 

तुम हो सविता तुम किरण हो रूपसी संसार हो

झिलमिलाती धूप में शीतल सुखद सी छांँव हो

मांँ हो तुम बेटी तुम्हीं हो सारे रिश्ते की हो खान

खूबसूरत प्यारी बगिया का तुम्हीं सविता हो नाम।

पंडित प्रेम बरेलवी अपने वक्तव्य में कहा

 आदरणीय सविता चड्ढा जी की आज एक और किताब ‘मैं और मेरे साक्षात्कार’ हम सबके समक्ष है। इससे पहले उनकी कृतियों में उपन्यास, कहानियों, कविताओं, स्त्री विमर्श, बाल साहित्य और पत्रकारिता की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। रेडियो, टेलिविज़न के लिए भी आपका योगदान सराहनीय है। सविता जी ने समाज की बुराइयों, कमियों को समाप्त करने, नये सुसंस्कृत समाज और सुदृढ़ राष्ट्र के निर्माण करने को ध्यान में रखकर साहित्य सृजन किया है। आपका साहित्य आज की बहकती हुई पीढ़ी के मार्गदर्शन के लिए बहुत उपयोगी है। अत्यधिक संघर्षरत जीवन में इतना अनमोल साहित्यिक सृजन हर कोई नहीं कर पाता। आपके लिए मेरा शे’र है- 

“आग से खेलना भी पड़ता है। 

आदमी यूँ बड़ा नहीं होता।। 

इस पुस्तक में प्रकाशित सविता जी का साक्षात्कार 15-16 साल पहले मैंने किया था। इस पुस्तक में उस साक्षात्कार को जगह देकर आपने मुझे भी कृतज्ञ किया है। ऐसी साहित्य विभूति सविता जी को उनकी इस पुस्तक के विमोचन और जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ, बधाई।

जितेंद्र प्रीतम ने एक चैनल के लिए सविता जी का साक्षात्कार लिया था उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा,

अत्यन्त सरल व सहज व्यक्तित्व की स्वामिनी, माननीया श्रीमति सविता चडढा जी को उनके जन्मदिवस तथा उनकी सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘मैं और मेरे साक्षात्कार’ के लोकार्पण के इस शुभ दिन पर हृदयतल से अनन्त व अशेष हार्दिक शुभकामनाऐं ।

सविता चडडा जी का व्यक्तित्व एवं व्यवहार दोनो बहुत चुम्बकीय हैं,

उनसे मिलने वाले लोग,उनकी सरलता से मंत्रमुग्ध हुए बिना नही रह सकते ।

पहली बार मिलने पर भी प्रतीत होता है जैसे हमारा इनसे न जाने कितना पुराना परिचय है ।

एक सफल प्रशासनिक अधिकारी, एक सम्मानित लेखिका, एक कुशल गृहिणी, तथा एक समर्पित माँ जैसे अनेकानेक महत्वपूर्ण दायित्वो का निर्वहन सविता चडढा जी ने जिस कुशलता के साथ किया है, वो अवर्णनीय है ।

आपके जन्मदिवस पर, ईश्वर से यही प्रार्थना है कि साहित्य और स्वास्थ्य दोनो का धन आपको प्रचुरता से उपलब्ध रहे ।

“आपके व्यक्तित्व की पहचान,

आपकी निर्मल निश्छल मुस्कान

आपके होठों पर सदैव रहे विद्यमान”

इन्ही पंक्तियों के साथ, आपको पुनः जन्मदिवस की बहुत-बहुत बधाई ।

इस अवसर पर  राजेंद्र नटखट नीनू कुमार, लतिका बत्रा,  पूनम मनकटोला ज्योति वर्धन साहनी  ने लेखिका को शुभकामनाएं दी और लेखिका के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला । पुस्तक के प्रकाशक और निदेशक धर्मेंद्र कुमार ने भी इस अवसर पर लेखिका का अभिनंदन किया  और उनके समग्र लेखन को अत्यंत सारगर्भित और समाजोपयोगी लेखन बताते हुए लेखिका को अपनी शुभकामनाएं दी। 

जिन लेखकों ने इंटरव्यू इस पुस्तक में शामिल है उन्हें प्रतीक चिन्ह, अंगवस्त्रम  माला  द्वारा उनका सम्मान भी किया गया । उल्लेखनीय है कि 28 अगस्त को लेखिका सविता चड्डा का जन्मदिन भी होता है।

डॉ. अंबेडकर के राष्ट्रवादी विचार | Nationalism thoughts of Dr Ambedkar

डॉ. अंबेडकर के राष्ट्रवादी विचार | Nationalism thoughts of Dr Ambedkar

“जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता हांसिल नहीं कर लेते, कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वो आपके किसी काम की नहीं।”

– डॉ भीमराव अम्बेडकर

बाबा साहब डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का जीवन परिचय / Dr Bhim Rao Ambedkar Biography in Hindi

भारत रत्न, ज्ञानवान, दूरदृष्टा, अर्थशास्त्री, मुक्तिदाता, संविधान निर्माता, समता मूलक भाव रखने वाले, करुणा, मैत्री और बंधुत्व की भावना से परिपूर्ण बाबा साहब डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल सन 1891 को मध्य प्रदेश राज्य के इंदौर जिला में महू सेना छावनी में हुआ था। डॉ. अंबेडकर के पिता का नाम राम जी राव और माता का नाम भीमाबाई था। डॉ. अंबेडकर अपने पिता की चौदहवीं संतान थे। डॉ. अंबेडकर के अलावा उनके दो भाई बलवंत और आनंद राव तथा उनकी दो बहनें मंजुला और तुलसा ही जीवित रह पाई थी। डॉ. अंबेडकर जब मात्र 5 वर्ष के थे तभी उनकी माता भीमाबाई का निधन 1896 ईस्वी को हो गया था। बचपन में ही माता का साया सिर से उठ गया तब उनकी बुआ मीराबाई ने माँ की कमी नहीं होने दी और उनका लालन-पालन बड़े स्नेह से किया। अबोध बालक भीमराव के पिता राम जी राव सेना में सूबेदार पद से सेवानिवृत्त हो चुके थे। पिता ने मराठा विद्यालय में उनका दाखिला करा दिया। भीमराव अंबेडकर का जन्म अछूत (महार) जाति में होने के कारण प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए बहुत बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। उन्हें विद्या ग्रहण करने के लिए कमरे से बाहर (जहाँ जूता चप्पल उतारे जाते थे के पास) बैठकर पढ़ना पड़ता था। अन्य मराठा छात्र उनके साथ अमानवीय व्यवहार करते थे, किताब-कॉपी नहीं छूने देते थे। यहाँ तक अंबेडकर अपने हाँथों से घड़ा का पानी निकाल कर भी नहीं पी सकते थे, दूसरे विद्यार्थी दूर से पानी पिलाते थे। बाबा साहब उसी प्रकार स्कूल में दबकर रहते थे, जिस प्रकार 32 दाँतों के बीच जीभ रहती है। बालक भीमराव अंबेडकर अपने साथ हो रहे दुर्व्यवहार को सीने में दफन करके अपनी पढ़ाई की ओर ध्यान देते थे क्योंकि पढ़ने की असीम चेष्टा उनके अंदर विद्यमान थी। डॉ आंबेडकर जब 14 वर्ष के हुए तभी उनका विवाह 9 वर्ष की रमाबाई से कर दिया गया था। जैसे-जैसे अंबेडकर बड़े होते गए उनके जीवन में समस्याएं भी बढ़ती गई। जलती छुआछूत का प्रकोप आपको अपमानित करता था, लताड़ता था। वह जीवन जिया है आपने। आज की पीढ़ी तत्कालीन भारतीय समाज में निम्न जाति के प्रति घृणित और दूषित भावना की कल्पना भी नहीं कर सकती है।

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उदार प्रवृत्ति के बाबा साहब के जीवन में सबसे दुःखद समय तब आया जब उनकी प्रिय पत्नी जो हर समय सुख-दुःख में साथ खड़ी रहती थी, जिन्हें प्यार से रामू कह कर पुकारते थे वह बीमार हो गई और गरीबी के कारण इलाज न होने के कारण सन 1935 में स्वर्गवासी हो गईं। उस समय अंबेडकर ने खुद को अकेले महसूस किया। दुःख की इस घड़ी में टूट गए थे, हताश हो गए थे किंतु आपके अंदर एक अटूट विश्वास और अदम्य साहस था जिसके बल पर आपने स्वयं को वह जंग लड़ने के लिए तैयार किया जिसके लिए पृथ्वी पर आपका जन्म हुआ था। वह जंग थी ‘शूद्र स्वतंत्रता।’ अम्बेडकर जी ने 20 मार्च सन 1927 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के महाड़ स्थान पर दलितों के साथ चवदार तालाब में अपने हाँथ से पानी पीकर पानी का अधिकार प्राप्त किया था। 25 दिसम्बर सन 1927 को महाड़ तालाब के किनारे पुरुष सत्तात्मक और वर्ण के आधार पर भेदभाव करने वाला ग्रंथ मनुस्मृति का दहन किया था। मनुस्मृति में लिखा है- स्त्रीशूद्रो नाधीयताम अर्थात स्त्री औऱ शूद्र ज्ञान प्राप्त न करे।

मनुस्मृति के अनुसार अन्य वर्णों के लिए अपराध पर आर्थिक दंड का प्रावधान था, जबकि शूद्रों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान था- शतं ब्राह्मण मकृष्य क्षत्रियों दंडं अहर्ति। वैश्यों व्यर्थ शतं द्वेवा, शूद्रस्तु वधम अहर्सि। (मनुस्मृति 8/267)। मनुस्मृति के पदचिन्हों पर चलते हुए तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है- पूजिअ विप्र सील गुन हीना। शूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।। (अरण्यकाण्ड 1/34)

भारत में डॉक्टर अंबेडकर के जीवन में जातिवाद का ज़हर घोलने वाले हजारों दुश्मन चारों ओर मधुमक्खियों की तरह फैले हुए थे, किंतु आपकी प्रतिभा, नेक इरादे, प्रबल इच्छा शक्ति एवं ओजस्वी विचारधारा के आगे दुश्मन सदैव नतमस्तक थे। डॉ. अंबेडकर के विषय में हम कह सकते हैं कि यह संसार एक सौरमंडल की तरह है और आप उस सौरमंडल का सूर्य।
डॉक्टर अंबेडकर धन्य हैं जिनके पास अदम्य साहस, हिमालय पर्वत के समान दृढ़ संकल्पित इरादे जिन्हें डगमगाने की इस दुनिया में किसी के पास साहस न था। आपके आगे पूरा विश्व नतमस्तक हो गया था। इसी असीम ज्ञान के कारण समस्त मानव जाति का प्रेरणास्रोत बन गए।

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सन 1947 में जब भारत अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हुआ तब इस भारतीय लोकतंत्र को संचालित करने का कोई नियम व कानून नहीं था, इसलिए भारतीय संविधान जो विश्व का सबसे बड़ा संविधान और सबसे बड़ा लोकतंत्र को संचालित करता है को तैयार करने की किसी अन्य के पास योग्यता न थी, तब डॉ आंबेडकर को एक टीम के साथ इस नेक एवं बड़े महत्वपूर्ण कार्य के लिए उपयुक्त माना गया, किंतु सभी लोग किसी न किसी कारण से अलग हो गए। तब डॉ. अंबेडकर को सौंपी गई एक बड़ी जिम्मेदारी को अपनी कठोर मेहनत और लगन से निष्ठापूर्वक 18 घंटे लगातार काम करके बखूबी निभाया। इस बीच डॉक्टर अंबेडकर को मधुमेह हो जाने के कारण स्वास्थ्य खराब होने लगा फिर भी उन्होंने अथक प्रयासों के बाद 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में भारतीय संविधान पूर्ण किया। लगभग 6.4 करोड़ रुपये खर्च हुए। प्रारूप पर 114 दिन बहस चली। मूल संविधान में 22 भाग, 8 अनुसूचियाँ और 395 अनुच्छेद हैं। प्रमुख अंश विभिन्न देशों से भी लिए गए हैं। भारत का संविधान 26 नवम्बर सन 1949 को बनकर तैयार हुआ और 26 जनवरी सन 1950 को लागू हुआ। विश्व का सबसे बड़ा संविधान भारत का है। संविधान की मूल प्रति हिंदी और अंग्रेजी भाषा में हस्तलिखित है। भारतीय संविधान को राष्ट्रीय ग्रंथ की उपाधि दी गई है। उससे भारत का लोकतंत्र संचालित होता है और उसका सम्मान सभी भारतीय हृदय से करते हैं। दिन प्रतिदिन बिगड़ते स्वास्थ्य का इलाज महाराष्ट्र के एक अस्पताल में करा रहे थे। उन दिनों उनकी देखभाल करने वाला कोई जिम्मेदार व्यक्ति नहीं था अस्पताल की नर्स शारदा कबीर (ब्राम्हण) उनकी देखभाल जिम्मेदारी के साथ कर रही थी। इस कारण शारदा का स्नेह डॉक्टर अंबेडकर के प्रति बढ़ता गया और सन 1948 में नर्स के साथ अंबेडकर का विवाह संपन्न हो गया। विवाह बाद शारदा कबीर का नाम बदलकर सविता अंबेडकर नाम रखा गया।

डॉ. अंबेडकर प्रारंभ से ही हिंदू धर्म में समावेशित उन कुरीतियों और कुप्रथाओं के आलोचक रहे हैं, जो मानवता के खिलाफ थीं। हिंदू धर्म प्रारंभ से ही ऊँच-नीच में विश्वास करता रहा है जो मानवता के बिल्कुल प्रतिकूल है।शूद्र जातियों के साथ कुत्ते बिल्लियों से बदतर व्यवहार किया जाता था। शूद्र लोग जब पगडंडियों से निकलते थे तो कमर में झाडू, गले में मटका बाँधकर ही निकलते थे। अंबेडकर ने हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध आदि धर्मों का गहनता के साथ अध्ययन किया। अंततः आप बौद्ध धर्म से प्रभावित हुए और 14 अक्टूबर 1956 को 22 प्रतिज्ञा के साथ आपने अपनी पत्नी और लगभग 5,00000 अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया। डॉक्टर अंबेडकर बौद्ध धर्म के सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए श्रीलंका, म्यांमार गए। डॉ. अंबेडकर ने अपना अंतिम लेख ‘द बुद्ध एंड हिज धम्म’ सन 1956 में पूर्ण किया था। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान बुद्ध से है। डॉक्टर अंबेडकर बीसवीं सदी के सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में प्रसिद्ध हुए। डॉक्टर अंबेडकर एक विश्व प्रसिद्ध शख्सियत थे जिन्होंने गरीबों, वंचितों, महिलाओं, बच्चों मजदूरों आदि की आवाज बुलंद की। डॉक्टर अंबेडकर कहते थे शिक्षा वह शेरनी का दूध है जो पियेगा दहाड़ेगा इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि डॉक्टर अंबेडकर के अंदर ज्ञान की गंगा बहती थी। डॉक्टर अंबेडकर को अमेरिका में ज्ञान का प्रतीक Symbol of Knowledge कहा जाता है, तो वहीं भारत में दुर्भाग्य है कि आपके पुतले तोड़े जाते हैं, गाली दी जाती हैं और उन्हें अपमानित किया जाता है। डॉक्टर अंबेडकर किसी एक जाति के नहीं थे वरन सभी के उद्धारक थे किंतु अफसोस होता है छोटी जाति में पैदा होने के कारण उनके साथ समानता के व्यवहार आज भी नहीं किया जाता है।

सर्वविदित है उस समय शूद्र अछूत कहे जाने वाले समाज को शिक्षा अर्जित करना हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार दंडनीय व प्रतिबंधित था और धर्म का उल्लंघन भी। मान्यता थी कि मनुस्मृति के अनुसार शूद्र सिर्फ अपने जाति आधारित कर्म करेगा, इसके अलावा कुछ भी नहीं करेगा। जब डॉक्टर अंबेडकर को शिक्षा ग्रहण करने की बात आई तो सामंतवादी व्यवस्था प्रणाली में अंबेडकर को स्कूल में दाखिला लेने से इनकार कर दिया गया। उनके अंदर शिक्षा प्राप्त करने की असीम जिज्ञासा थी वह इसके लिए किसी भी रास्ते से गुजरने को तैयार थे। अंबेडकर साहब अपना पूरा ध्यान पठन-पाठन में लगाते थे, किंतु कक्षा के अन्य बच्चे उस अबोध निरीह बालक को अछूत महार कह कर उसके साथ अनुचित व्यवहार करते थे। डॉक्टर अंबेडकर अपने साथ ज्यादती को महसूस करते और सहन भी करते थे, किंतु उनका कोई साथी ही न होने कारण अपमान के कड़वे घूंट पीने के लिए मजबूर थे। उस दर्द को सीने में दफन कर लेते थे और अपने जीवन में लक्ष्य की ओर अग्रसर करते रहते थे। तनिक भी समय नष्ट नहीं करते थे। अंबेडकर ने मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। स्नातक परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की, तत्पश्चात पिता का देहावसान हो गया तब उन्हें एक बड़ा झटका लगा। वह दिन उनके जीवन का सर्वाधिक दुखद दिन था। आर्थिक समस्या से जूझ रहे अंबेडकर की शेष शिक्षा बाधित होने लगी थी लेकिन कहते हैं परिश्रमी का साथ ईश्वर भी देता है। तो अंबेडकर की प्रतिभा से प्रभावित होकर महाराष्ट्र के बड़ौदा नरेश सयाजी राव गायकवाड ने उनके आगे की पढ़ाई पूर्ण करने की जिम्मेदारी लेकर उन्हें 25 रुपये मासिक छात्रवृत्ति देने की घोषणा की, इस शर्त के साथ कि अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद 10 वर्ष बड़ौदा रियासत में सेवा करेंगे। डॉक्टर अंबेडकर ने आगे की शिक्षा, वकालत, शोधकार्य, डॉक्टरेट उपाधियाँ अमेरिका, लंदन, ओसामिया में जाकर पूर्ण किया। हमारे लिए बड़ा ही गौरवशाली व्यक्तित्व था जिसने देश-विदेश तक अपने ज्ञान का परचम लहराया। त्याग, परिश्रम व लंबे संघर्ष के बाद शिक्षा जगत में अपना अद्वितीय स्थान रखने वाले प्रथम भारतीय बन गए। डॉक्टर अंबेडकर के अंदर विद्यमान अपार ज्ञान सदैव अतुलनीय रहेगा क्योंकि आप स्वयं विश्व प्रेरक हैं। आपका कहना था जिस समाज में व्याप्त वर्षों पुराने कृतियों का अंत करना है तो व्यक्ति को पूर्ण शिक्षित होना पड़ेगा तभी सभी बुराइयों को नष्ट कर सकते हैं, इसलिए ‘शिक्षित बनो संगठित रहो।’ बाबा साहब स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री 15 अगस्त 1947 से सितंबर 1951 तक रहे। 29 अगस्त 1947 से 24 जनवरी 1950 तक मसौदा समिति के अध्यक्ष थे। 3 अप्रैल 1952 से 6 दिसम्बर 1956 तक राज्यसभा सदस्य थे।

भारत राष्ट्र को बाबा साहब की देन
(स्रोत : पुस्तक- भारतरत्न भीमराव अंबेडकर, लेखक डॉ एम.एल. परिहार, प्रकाशक बुद्धम पब्लिशर्स जयपुर)

  • रोजगार कार्यालय की स्थापना, कर्मचारी राज्य बीमा निगम,
  • काम का समय 12 घण्टे से कम करके 8 घण्टा,
  • महिलाओं को प्रसूति अवकाश, मंहगाई भत्ता,
  • अवकाश का वेतन,
  • हेल्थ इंश्योरेंस,
  • कर्मचारी भविष्य निधि,
  • श्रमिक कल्याण कोष,
  • तकनीकी प्रशिक्षण योजना,
  • सेंट्रल सिचाई आयोग का गठन
  • वित्त आयोग का गठन,
  • मतदान का अधिकार,
  • भारतीय सांख्यकीय कानून,
  • हीराकुंड बाँध,
  • दामोदर घाटी परियोजना,
  • ओडिशा नदी परियोजना,
  • भाखड़ा नागल बाँध,
  • भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना।


मधुमेह के कारण बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर का स्वास्थ्य बिगड़ता ही चला गया है और युगपुरुष डॉक्टर अंबेडकर 65 वर्ष की उम्र में 6 दिसंबर सन 1956 गुरुवार की रात चिरनिद्रा में हमेशा के लिए लीन हो गए। आपकी स्मृतियों को संजोने के लिए मुम्बई के चैत्यभूमि में भव्य समाधि स्थल बनाया गया है।

अशोक कुमार गौतम
असिस्टेंट प्रोफेसर (अध्यक्ष हिंदी विभाग)
शिवा जी नगर, दूरभाष नगर
रायबरेली (उप्र)
मो. 9415951459

Weekend Top

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martyred shailendra pratap singh par kavita

जम्मू कश्मीर के सोपोर जिले मेँ आतंकी हमले मेँ शहीद सीआरपीएफ रायबरेली के जवान शैलेन्द्र प्रताप सिंह के लिए हिंदी विद्धान दयाशंकर जी की कविता martyred shailendra pratap singh par kavita

*शहीद सैनिक शैलेन्द्र सिंह को समर्पित*

बालक शैलेन्द्र का बाल्यकाल,

ग्रामांचल मध्य व्यतीत हुआ।

प्रारंभिक शिक्षा हेतु माता ने,

ननिहाल नगर को भेज दिया ।

अपने सीमित श्रम साधन से,

प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण किया।

चल पड़े कदम देश की सेवा को,
दायित्व भार जो मिला तुम्हे,

उसको पूरा करना होगा ।

है शत्रु खड़ा जो सीमा पर,
उसका रण-मद हरना होगा।

रण की वेदी पर कभी कभी,
कुछ पुष्प चढ़ाने पड़ते हैं।

कुछ महा वीर होते शहीद,
जो मातृभूमि हित लड़ते हैं।

वह मौन हो गया परमवीर,
अपने पीछें संदेश छोड़ गया ।

भावी    युवकों की  आंखों   को,
भारत की सीमा की ओर मोड़ गया।

स्वर गूंजा मत रोना मुझको तिरंगे में लिपटे होने पर,
मत     तर्पण     करना    आंखों   के   पानी   का।

करना है तो तर्पण करना,
सीमा पर प्रखर जवानी का ।

श्रद्धांजलि मुझको देते हो,
तो साथ शपथ लेनी होगी।

भारत की सीमा पर वीरों प्राणों की आहुति अपनी देनी होगी।
जो दीप जलाया है मैंने,
वह बुझे नहीं बरखा व तूफानों से।

उसकी लौ क्रीड़ा करती रहे सतत,

आजादी के परवानों से।
*दया शंकर*
राष्ट्रपति पुरस्कृत,साहित्यकार
पूर्व अध्यक्ष हिंदी परिषद रायबरेली

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nahin thaharata hai vakt

नहीं ठहरता है वक्त

ए मुसाफ़िर सब बीत जायेगा
यह वक़्त कभी ठहरा ही नहीं !
रफ्त़ा- रफ़्ता निकल जायेगा
उजाले कब तलक क़ैद रहेंगे
देखना ! कल सुबह
अपनी रिहाई के
गीत ज़रूर गायेंगे
माना कि
आज सारे जुगनूं
तम से संधि कर
उजालों को चिढ़ा रहे हैं
जब अंधकार की छाती चीरकर
कल
रश्मियां विकीर्ण हो जायेंगी
तो इन्हीं में से कुछ जुगनूं
आफ़ताब से भी हाथ मिलायेंगे
ए मुसाफ़िर सब बीत जायेगा
ये वक्त कभी ठहरा ही नहीं!
आज आंजनेय के बध के लिए
बिसात बिछाई जा रही है
एक और सुरसा की ज़िंदगी
दांव पर लगाई जा रही है
लेकिन झूठ के वक्ष को चीरकर
जब
सत्य का सूर्य कल उदित होगा
तो देखना! यही अंधेरे
दिन में ही दिनकर
से हाथ मिलायेंगे
ए मुसाफ़िर सब बीत जायेगा
ये वक्त कभी ठहरा ही नहीं

संपूर्णानंद मिश्र
प्रयागराज फूलपुर

 

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Dr rasik kishore singh neeraj ka rachna sansar

Dr rasik kishore singh neeraj ka rachna sansar
डॉ. रसिक किशोर सिंह ‘नीरज’ की इलाहाबाद से वर्ष 2003 में प्रकाशित पुस्तक ‘अभिलाषायें स्वर की’ काव्य संकलन में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गीत कारों ,साहित्यकारों ने उनके साहित्य पर अपनी सम्मति प्रकट करते हुए कुछ इस प्रकार लिखे हैं

भूमिका

कविता अंतस की वह प्रतिध्वनि है जो शब्द बनकर हृदय से निकलती है। कविता वह उच्छ् वास है जो शब्दों को स्वयं यति- गति देता हुआ उनमें हृदय के भावों को भरना चाहता है क्योंकि कविता उच्छ् वास है और उच्छ् वास स्वर का ही पूर्णरूप है, अतः यदि स्वर की कुछ अभिलाषाएँ हैं तो वे एक प्रकार से हृदय की अभिलाषाएँ ही हैं जो काव्य का रूप लेकर विस्तृत हुई हैं ।’अभिलाषायें स्वर की’ काव्य संग्रह एक ऐसा ही संग्रह है इसमें कवि डॉ. रसिक किशोर सिंह ‘नीरज’ ने अपनी अभिलाषाओं के पहले स्वर दिए फिर शब्द।

 

कवि डॉ. रसिक किशोर ‘नीरज‘ ने इस संग्रह में कविता के विभिन्न रूप प्रस्तुत किए हैं। उदाहरणतया उन्होंने अतुकांत में भी कुछ कवितायें लिखी हैं एक प्रश्न तथा अस्मिता कविता इसी शैली की कविताएं हैं तथा पवन बिना क्षण एक नहीं….. वह तस्वीर जरूरी है…… किसी अजाने स्वप्नलोक में…… अनहद के रव भर जाता है…. पत्र तुम्हारा मुझे मिला….. खिलता हो अंतर्मन जिससे….
विश्व की सुंदर सुकृति पर….. मित्रता का मधुर गान……. चढ़ाने की कोशिश……. चूमते श्रृंगार को नयन…… बनाम घंटियां बजती रही बहुत…… जो भी कांटो में हंसते ……..जिंदगी थी पास दूर समझते ही रह गये…….. गीत लिखता और गाता ही रहा हूं……. श्रेष्ठ गीत हैं इन रचनाओं में कवि ने अपने अंतर की प्रति ध्वनियों को शब्द दिए हैं
डॉ. कुंंअर बैचेन गाज़ियाबाद
2. कविता के प्रति नीरज का अनुराग बचपन से ही रहा है बड़े होने पर इसी काव्य प्रेम ने उन्हें सक्रिय सृजनात्मक कर्म में प्रवृत्त कियाl यौवनोमष के साथ प्रणयानुभूति उनके जीवन में शिद्त से उभरी और कविता धारा से समस्वरित भी हुई ।वह अनेक मरुस्थलों से होकर गुजरी किन्तु तिरोहित नहीं हुई। संघर्षों से जूझते हुए भावुक मन के लिए कविता ही जीवन का प्रमुख सम्बल सिद्ध हुई
डॉ. शिव बहादुर सिंह भदौरिया

इस प्रकार रायबरेली के ही सुप्रसिद्ध गीतकार पंडित बालकृष्ण मिश्र ने तथा डॉ. गिरजा शंकर त्रिवेदी संपादक नवगीत हिंदी मुंबई ने और डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी बरेली आदि ने अपनी शुभकामनाएं देते हुए डॉ. नीरज के गीतों की प्रशंसा की है

(1). पारब्रह्म परमेश्वर

पारब्रह्म परमेश्वर तेरी
जग में सारी माया है।
सभी प्राणियों का तू
नवसृजन सृष्टि करता
तेरी ही तूलिका से
नव रूप रंग भरता।
कुछ रखते सत् विचार
कुछ होते अत्याचारी
तरह तरह के लोग यहाँँ
आते, रहते बारी-बारी ।
जग के रंगमंच में थोड़ा
अभिनय सबका आया है।
कहीं किसी का भेद
खेद हो जाता मन में
नहीं किसी की प्रगति
कभी देखी जन-जन में ।
सदा सदा से द्वेष
पनपता क्यों जीवन में
माया के चक्कर में
मतवाले यौवन में।
‘नीरज’ रहती नहीं एक सी
कहीं धूप व छाया है।।

(2).राम हमारे ब्रह्म रूप हैंं

राम हमारे ब्रह्म रूप हैं ,राम हमारे दर्शन हैं ।
जीवन के हर क्षण में उनके, दर्शन ही आकर्षण हैं ।।
हुलसी सुत तुलसी ने उनका
दर्शन अद्भुत जब पाया ।
हुआ निनाँदित स्वर तुलसी का
‘रामचरितमानस’ गाया।।
वैदिक संस्कृति अनुरंजित हो
पुनः लोक में मुखर हुई ।
अवधपुरी की भाषा अवधी
भी शुचि स्वर में निखर गई।।
कोटि-कोटि मानव जीवन में, मानस मधु का वर्षण है ।
राम हमारे ब्रह्म रूप हैं राम, हमारे दर्शन हैं।।
ब्रह्म- रूप का रूपक सुंदर ,
राम निरंजन अखिलेश्वर ।
अन्यायी के वही विनाशक,
दीन दलित के परमेश्वर ।।
सभी गुणों के आगर सागर ,
नवधा भक्ति दिवाकर हैं।
मन मंदिर में भाव मनोहर
निशि में वही निशाकर है।
नीरज के मानस में प्रतिपल, राम विराट विलक्षण हैंं।
राम हमारे ब्रह्म रूप हैं , राम हमारे दर्शन हैं।

(3).शब्द स्वरों की अभिलाषायें

रात और दिन कैसे कटते
अब तो कुछ भी कहा ना जाये
उमड़ घुमड़ रह जाती पीड़ा
बरस न पाती सहा न जाये।
रह-रहकर सुधियाँ हैं आतीं
अन्तस मन विह्वल कर जातीं
संज्ञाहीन बनातीं पल भर
और शून्य से टकरा जातीं।
शब्द स्वरों की अभिलाषायें
अधरों तक ना कभी आ पायें
भावों की आवेशित ध्वनियाँ
‘ नीरज’ मन में ही रह जायें।

(4). समर्पण से हमारी चेतना

नई संवेदना ही तो
ह्रदय में भाव भरती है
नई संवेग की गति विधि
नई धारा में बहती है ।
कदाचित मैं कहूँँ तो क्या कि
वाणी मौन रहती है
बिखरते शब्द क्रम को अर्थ
धागों में पिरोती है ।
नई हर रश्मि अंतस की
नई आभा संजोती है
बदल हर रंग में जलती
सतत नव ज्योति देती है।
अगर दीपक नहीं जलते
बुझी सी शाम लगती है
मगर हर रात की घड़ियाँ
तुम्हारे नाम होती हैं।
नया आलोक ले ‘नीरज’
सरोवर मध्य खिलता है
समर्पण से हमारी चेतना
को ज्ञान मिलता है ।

(5).नाम दाम के वे नेता हैं

कहलाते थे जन हितार्थ वह
नैतिकता की सुंदर मूर्ति
जन-जन की मन की अभिलाषा
नेता करते थे प्रतिपूर्ति।
बदले हैं आचरण सभी अब
लक्षित पग मानव के रोकें
राजनीति का पाठ पढ़ाकर
स्वार्थ नीति में सब कुछ झोंके।
दुहरा जीवन जीने वाले
पाखंडी लोगों से बचना
शासन सत्ता पर जो बैठे
देश की रक्षा उनसे करना।
पहले अपनी संस्कृति बेची
अब खुशहाली बेंच रहे हैं
देश से उनको मोह नहीं है
अपनी रोटी सेक रहे हैं।
देशभक्ति से दूर हैं वे ही
सच्चे देश भक्त कहलाते
कैसे आजादी आयी है
इस पर रंचक ध्यान न लाते।
कथनी करनी में अंतर है
सदा स्वार्थ में रहते लीन
नाम धाम के वे नेता हैं
स्वार्थ सिद्धि में सदा प्रवीन।

(6). आरक्षण

जिसको देखो सब ऐसे हैं
पैसे के ही सब पीछे हैं
नहीं चाहिए शांति ज्ञान अब
रसासिक्त होकर रूखे हैं।
शिक्षा दीक्षा लक्ष्य नहीं है
पैसे की है आपा धापी
भटक रहे बेरोजगार सब
कुंठा मन में इतनी व्यापी ।
आरक्षण बाधा बनती अब
प्रतिभाएं पीछे हो जातीं
भाग्य कोसते ‘नीरज’ जीते
जीवन को चिंतायें खातीं ।
व्यथा- कथा का अंत नहीं है
समाधान के अर्थ खो गये
आरक्षण के संरक्षण से
मेधावी यों व्यर्थ हो गये।
सत्ता पाने की लोलुपता ने
जाने क्या क्या है कर डाला
इस यथार्थ का अर्थ यही है
जलती जन-जीवन की ज्वाला।

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प्यार का गीत – बाबा कल्पनेश

प्यार का गीत – बाबा कल्पनेश
प्यार का गीत
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत,
जिसमें हार हुई हो मेरी और तुम्हारी जीत।
कई जन्म बीते हैं हमको करते-करते प्यार,
तन-मन छोड़े-पहने हमने आया नहीं उतार।
छूट न पाया बचपन लेकिन चढ़ने लगा खुमार,
कितने कंटक आए मग में अवरोधों के ज्वार।
हम दोनों का प्यार भला कब बनता अहो अतीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
तुम आयी जब उस दिन सम्मुख फँसे नयन के डार,
छिप कर खेले खेल हुआ पर भारी हाहाकार।
कोई खेल देख पुरवासी लेते नहीं डकार,
खुले मंच से नीचे भू पर देते तुरत उतार।
करने वाले प्यार भला कब होते हैं भयभीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
नदी भला कब टिक पायी है ऊँचे पर्वत शृंग,
और कली को देखे गुप-चुप रह पाता कब भृंग।
नयनों की भाषा कब कोई पढ़ पाता है अन्य,
पाठ प्यार का पढ़ते-पढ़ते जीवन होता धन्य।
जल बिन नदी नदी बिन मछली जीवन जाए रीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
कभी मेनका बन तुम आयी विश्व गया तब हार,
हुई शकुंतला खो सरिता तट लाए दिए पवार।
कण्वाश्रम पर आया देखा सिर पर चढ़ा बुखार,
भरत सिंह से खेल खेलता वह किसका उद्गार।
वही भरत इस भारत भू पर हम दोनों की प्रीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
श्रृद्धा मनु से शुरू कहानी फैली मानव वेलि,
अब भी तो यह चलता पथ पर करता सुख मय केलि।
इसे काम भौतिक जन कहते हरि चरणों में भक्ति,
आशय भले भिन्न हम कह लें दोनो ही अनुरक्ति।
कभी नहीं थमने वाली यह सत्य सनातन नीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
बाबा कल्पनेश