तुम जरूर लौटकर आओगी | डॉ0 सम्पूर्णानंद मिश्र

तुम जरूर लौटकर आओगी!

शर्मिला आज पाँच साल बाद हरदोई रेलवे स्टेशन पहुँची। मन में जहाँ नई नौकरी के प्रति आकर्षण था, वहीं जिला कलेक्टर बनने की खुशी हृदय की नदी को तोड़कर बह जाना चाहती थी। एक अलग उल्लास अलग उमंग। मन में नाना प्रकार की तरंगें तरंगित हो रही थीं ।आज के पाँच साल पहले जब ससुराल आई थी, तो उसके अरमान को विवेक ने चकनाचूर कर दिया था। दरअसल शर्मिला स्नातक के बाद सिविल सर्विसेज की तैयारी करना चाहती थी, उसके मन में बचपन से ही देश सेवा का जुनून सवार था। शादी के एक साल तक सब कुछ ठीक – ठाक चला। उसकी सेवा परायणता ने ससुराल वालों का मन मोह लिया। सभी उससे प्रेम करते थे। लेकिन जब भी वह सिविल सर्विसेज की तैयारी की बात अपने पति से कहती थी तो उसका पति विवेक हर बार नजरअंदाज कर देता था। एक बार शर्मिला ने दिल्ली जाकर तैयारी करने की बात अपने ससुर से जब कहा तो उसे जैसे काठ मार दिया। कुछ देर के बाद बुझे स्वर से उसके ससुर रामप्रसाद ने कहा जैसा विवेक चाहे वैसा करो। इधर विवेक अपने पिता के ऊपर तैयारी करने की बात टाल देता था। द्वंद्व की चक्की में बेचारी शर्मिला की इच्छा पीसी जा रही थी। उसने अपने पति विवेक की विवेकहीनता की तलवार से अपने भविष्य के पंख को कटने नहीं देना चाहती थी। इस बात को लेकर आए दिन घर में कलह होने लगा। शर्मिला ने मजबूरन कोर्ट जाकर तलाक की अर्जी दाखिल कर दी। कुछ दिन बाद जब वह शाम को बैठकर पढ़ रही थी,तभी एक चपरासी कोर्ट से तलाकनामा लेकर विवेक के घर पहुँचा। विवेक उस समय घर पर नहीं था। यह पत्र उसके पिता रामप्रसाद ने प्राप्त किया। पत्र पढ़ते ही जैसी उसके पिता के नीचे की जमीन किसी ने खींच ली हो। रात के नौ बजे रहे थे। पौष का महीना था। लोग घरों में दुबक गए थे। बाहर कुत्तों के भौंकने की आवाज इस शीत के सन्नाटे को क्षण भर के लिए जरूर चीर दे रही थी, लेकिन शायद वह अपर्याप्त था। विवेक अपने मित्र के घर से लौट रहा था। पता नहीं क्यों आज उसका मन अशांत था। उसके मोटरसाइकिल की स्पीड आज बढ़ाए नहीं बढ़ रही थी। कुछ अनहोनी की आशंका उसके मन को दबोच रही थी। जब वह घर पहुँचा, तब उसके पिता ने कहा बेटा अब हम लोगों के बुरे दिन आ गए है शर्मिला ने तुमको तलाक दे दिया है। यह सुनते ही विवेक की आँखों से आँसू की अनवरत धारा बहने लगी। विवेक किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया। पत्नी के प्रति उसके मन में अनुरक्ति थी। प्रेम का जो बीजारोपण दोनों ने किया था। आज छतनार वृक्ष बन गया था। शर्मिला भी उस छतनार वृक्ष की छाया से दूर नहीं जाना चाहती थी, लेकिन हर लड़की की तरह उसके मन की भी कल्पनाएँ आसमान छूना चाहती थीं ।
इधर शर्मिला का हरदोई स्टेशन पर भव्य स्वागत हुआ। कलेक्ट्रेट कार्यालय के बड़े बाबू कामताप्रसाद और कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने पुष्प गुच्छ देकर शर्मिला का स्वागत किया। कार्यालय में कार्यभार ग्रहण करने के उपरांत शर्मिला ने सारे कर्मचारियों का परिचय प्राप्त किया। बड़े बाबू ने सभी का परिचय कराया। एक व्यक्ति जो सबसे कोने में बैठा था, जब उसके परिचय की बात आई तो शर्मिला ने बड़े बाबू से कहा कि ये खुद अपना परिचय देंगे। वह व्यक्ति शर्मिला को देखकर अवाक हो गया जैसे वह निस्तेज हो गया था। आज पाँच साल बाद अपनी पत्नी को जिलाधिकारी के रूप में देखकर वह हतप्रभ हो गया। उसके मुँह से एक शब्द नहीं निकल पा रहा था। उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया। वह किसी तरह से अपना परिचय दिया। इसके ठीक बाद वह बिना किसी को बताए कार्यालय से घर चला गया और चार दिन तक कार्यालय नहीं आया। कार्यालय के सभी कर्मचारी समझ ही नहीं पा रहे थे कि आखिर बात क्या है! उसके इस व्यवहार को उसके सहकर्मी समझ नहीं पा रहे थे। आपस में कानाफुसी होने लगी कि विवेक को आखिर ऐसा क्या हुआ कि जबसे मैडम यहाँ आयीं हैं तब से वह कुछ असंतुलित हो गया है।
चार दिन के बाद जब पाँचवें दिन भी वह नहीं लौटा, तो मैडम को उसकी चिंता होने लगी।
उसने बड़े बाबू को बुलाकर कहा कि विवेक कार्यालय क्यों नहीं आ रहा है? क्या बात है आप पता करके कल बताइए!
अगले दिन बड़े बाबू ने आकर मैडम से कहा कि विवेक के घर मैं गया था। वह बीमार है अब ठीक हो रहा है ऐसा उसने बताया। कल से संभवत: वह कार्यालय आयेगा।
अगले दिन विवेक साढ़े दस बजे कार्यालय पहुँचा। मैडम समय की पाबंद थी। ठीक दस बजे ही कार्यालय पहुँच गईं थीं। कुछ पुरानी फाइल का उन्हें निस्तारण करना था।
अपने कार्य में मैडम व्यस्त हो
गईं। ठीक ग्यारह बजे उन्होंने एक चपरासी को भेजा कि जाकर देखो कि विवेक आया है कि नहीं! यदि आया है तो बुला लाओ!
विवेक ने जैसे ही मैडम के कार्यालय में प्रवेश किया। उसे देखते ही मैडम ने कहा कि मिस्टर विवेक बिना अवकाश के आप घर क्यों बैठ गए! ऐसे नहीं चलेगा! आइंदा ऐसा होगा तो आपके खिलाफ मुझे सख्त कार्रवाई करनी पड़ेगी।
उसने कहा मैडम अगली बार ऐसा नहीं होगा। इस शब्द को मुँह से निकालने में जितनी पीड़ा आज हुई थी, उतनी पहले कभी नहीं हुई थी। आज उसके पुरुषार्थ को जैसे किसी ने हठात चुनौती दे दी हो।
आज से पाँच साल पहले जिस चाँदनी रात में उसने अपने भावी जीवन को सुंदर बनाने कि एकसाथ कसमें खाई थीं एक दूसरे की बाँहों से लिपटकर। कल्पना की कितनी उड़ान भरी थीं दोनों ने। कितनी मधुर रातें इस बात की साक्षी रही हैं।
आज उसी का यह आदेशात्मक स्वर! जैसे पूरा शरीर करेण्ट से झनझना गया हो।
आज पत्नी शर्मीला का यह सख्त आदेशात्मक स्वर जैसे उसके शरीर को छेद कर पार कर गया हो।
लेकिन वह कुछ कर भी नहीं सकता था। सिर्फ! आदेश को मानने के सिवा।
दूसरे दिन कार्यालय में हंगामा हो गया।
मैडम ने पूर्व के टेण्डर जो मानक के अनुरूप नहीं थे को निरस्त कर दिया। नए टेण्डर की प्रक्रिया फिर से शुरु करने की आज्ञा संबंधित अधिकारियों एवं क्लर्कों को दे दी।
मिस्टर वर्मा जो उस कार्यालय के उच्च अधिकारी थे उनको जैसे ही पता चला कि उनके द्वारा संस्तुत टेंण्डर निरस्त कर दिया गया। वे झल्ला गए। अपना आपा उन्होंने खो दिया। कार्यालय में जोर- जोर से शर्मिला मैडम को भला- बुरा कहने लगे।
यह बात विवेक को बड़ा ही नागवार लगा। उसने भी आवेश में आकर अपने सीनियर अधिकारी वर्मा का कालर पकड़ लिया और कहा
मिस्टर वर्मा होश में रहिए। जिहृवा बाहर खींच लूँगा। मैडम को यदि एक शब्द और कहा।
मिस्टर वर्मा ने कहा कि तुम मैडम के क्या लगते हो! तुम्हें इतनी मिर्ची क्यों लग रही है ?
दफ्तर के अन्य कर्मचारी बीच बचाव नहीं करते तो शायद हंगामा और भी बढ़ जाता।
रात के छह बज रहे थे विवेक सीधे मोस्टरसाइकिल से घर के लिए चल चुका था, जैसे ही बाजार क्रास करने वाला था। दो तीन बदमाश अँधेरे का लाभ उठाते हुए पीछे से आए और विवेक के सिर पर लाठी डंडे से प्रहार करने लगे। विवेक वहीं लहूलुहान होकर गिर पड़ा। मोहन वहीं पास में सब्जी खरीद रहा था, दौड़कर आया तो देखा कि यह तो मेरा पड़ोसी विवेक है। उसने फौरन उसे अस्पताल पहुँचाया। और इमर्जेंसी वार्ड में एडमिट कराया। सिर पर गहरा जख्म था। डाक्टरों की टीम ने आई0 सी0 यूo में शिफ्ट करने का आदेश दिया।
कुल बत्तीस टाँकें लगाए गए। रात के बारह बज रहे थे। अस्पताल में नर्स वार्ड में अपने मरीजों को देखकर सोने की तैयारी कर रही थीं। तभी विवेक के पिता को कहीं से सूचना मिली। वे वेचारे रोते बिलखते अस्पताल पहुंँचे, और नर्स से अपने बेटे के विषय में पूछने लगे। नर्स ने कहा कि आप का बेटा खतरे से बाहर हैं उन्हें नींद का इंजेक्शन दे दिया गया। सोये हैं आप सुबह ही मिल पायेंगे। वे बेचारे आईo सीo यूo के बाहर ही सुबह का इंतजार करने लगे।
अगले दिन जब विवेक कार्यालय नहीं पहुँचा, तो शर्मिला मैडम को चिंता होने लगी कि क्या बात है आज विवेक नहीं आया।
इसी बीच एक चपरासी ने कल की घटना का पूरा वृतांत मैडम को बताया।
मैडम समझ गई कि यह सब वर्मा का ही किया कराया है।
इधर शहर में उस दिन एक बड़ा कार्यक्रम था। राज्य के मंत्री को आना था। विभागीय तैयारी लगभग हो चुकी थी। कलेक्टर साहिबा को वहाँ एक घण्टे पहले पहुंँचना था। उन्होंने कार्यालय के बड़े बाबू को बुलाया और कहा कि विवेक अस्पताल में है वहाँ मेरा जाना बहुत जरूरी है। उसने कहा कि मैडम! लेकिन मंत्री जी आ रहे हैं! आपको वहाँ रहना चाहिए। मंत्री जी बुरा मान जायेंगे।
मैडम ने कहा! मंत्री जी अपना काम करेंगे और मैं अपना।
यही कहकर अपने ड्राइबर और एक कांस्टेबिल के साथ मैडम अस्पताल के लिए निकल गयी।
अस्पताल में मैडम ने जब विवेक को देखा तो मैडम की आँखों से आँसू छलक पड़े। अपने पति को इस हालत में देखकर।
तब तक विवेक को होश आ गया था। मैडम ने कहा कि क्या जरूरत थी वर्मा से उलझने की। वह मुझे अपशब्द कह रहा तुम्हें तो नहीं!
शर्मिला मैम की इन बातों से उसके जख्म पर जैसे मलहम लग गया हो। उसने औपचारिकता व प्रोटोकॉल की दीवार को क्षण भर में भहराते हुए कहा कि तुम्हें कोई अपशब्द कहे यह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता। दोनों की नजरों की नदी में जैसे अतीत की सुनहली नावें चलने लगी। दोनों अपने- अपने आँसू छुपाने लगे।
शर्मिला ने कहा कि तुम्हारी पत्नी कहाँ हैं?
उसने कहा कि मैंने शादी नहीं की।
और तुम!
मैंने भी नहीं!
तुमने क्यों नहीं की?
मेरी जिंदगी में पहले भी तुम थे और आज भी तुम्हीं हो!
विवेक ने कहा मुझे उम्मीद थी कि तुम जरूर लौटकर आओगी!
यह कहते ही दोनों फफककर रोने लगे और एक दूसरे से गले लिपट गए।

डॉ0 सम्पूर्णानंद मिश्र
शिवपुर वाराणसी
7458994874

नहीं आ पाऊँगा घर इस होली पर | डॉ0 सम्पूर्णानंद मिश्र

नहीं आ पाऊँगा घर इस होली पर

( कहानी)

सारा देश जिस दिन होलिका दहन की तैयारी में जुटा था, उस दिन श्रवण के मोबाइल पर एक अज्ञात नंबर से काल आया। काल करने वाले ने कहा कि मैं रायपुर छत्तीसगढ़ से डाक्टर सुशांत बोल रहा हूँ, तुम्हारे पिताजी की हालत बेहद गंभीर है उन्हें ए प्लास्टिक एनीमिया हो गया है। उनको तुरंत रक्त चढ़ाना होगा। मेरे खाते में तुरंत पच्चीस हजार रुपए भेज दो नहीं तो, तुम्हारे पिताजी नहीं बच पाएंगे!
श्रवण ने कहा कि नहीं डाक्डर बाबू! ऐसा न कहिए। लेकिन यह कैसे हुआ! अभी तो बाबू ठीक- ठाक थे। बीस दिन पहले ही तो घर से शहर आया हूँ। क्या मैं झूठ बोल रहा हूँ! अपने भाई मुरारी से बात करो। एo आईo के जमाने में किसी की आवाज में बात करना कितना आसान होता है।ठीक उसके भाई मुरारी की आवाज में एक व्यक्ति जो उस गिरोह का हिस्सा था, वैसी ही आवाज में कहा। हाँ भैया बापू ठीक नहीं हैं इनका खून नहीं बढ़ रहा है। आँखों से कुछ देख नहीं पा रहे हैं। आप तुरंत डाक्डर बाबू को पच्चीस हजार रुपए भेज दीजिए! नहीं तो बापू मर जायेंगे। श्रवण आश्वस्त हो गया था कि बापू बीमार हैं। इस समय पैसा न भेजना मौत को दावत देना है।
श्रवण का परिवार रायपुर छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गाँव चित्रसेनपुर में रहता है। चित्रसेनपुर रायपुर से पश्चिम की ओर लगभग चालीस किलोमीटर दूरी पर स्थित एक छोटा सा गाँव है। बीस घर का एक पूरा है। उस गाँव के अधिकांश लोग एक भट्ठे पर ईंटा पाथने का काम करते हैं। उसी से उनके घर का खर्च चल जाया करता था। इधर कोरोना में काम बंद हो जाने से मुफलिसी आ गई थी। गाँव की औरतें रोज शहर जाकर सेठ साहूकारों के यहाँ छोटा- मोटा काम करके अपना और अपने कुटुंबियों का पेट किसी तरह भर पाती थी। श्रवण के घर में माँ पिता छोटा भाई मुरारी और उसके तीन बच्चे व श्रवण की पत्नी धनपत्ती और एक बेटा जो दस साल का है सब मिलजुल कर रहते थे। श्रवण की भयहू अलका अपने ससुर का बहुत ध्यान रखती थी। पत्नी के चल बसने से उसके ससुर टूट गए थे। आए दिन बीमार रहते थे। श्रवण के घर को देखकर लगता है कि घर के हर कोने से गरीबी झाँक रही है, लेकिन इतना जरूर था कि दो वक्त की रोटी परिवार को किसी तरह मिल जाती थी। लेकिन कुनबा बढ़ने से कभी- कभी यह परिवार फाँका भी कर जाता था। महँगाई ने परिवार की कमर तोड़ दी थी। इन्हीं हालातों को देखकर श्रवण अपनी पत्नी धनपत्ती और दस साल के बेटे मोनू को लेकर बनारस कमाने के लिए आ गया था। कुछ दिन तक तो काम की तलाश में भटकता रहा। बनारस आध्यात्मिक नगरी है। यहाँ महादेव की कृपा से कोई भूखा नहीं सोने पाता है! सबके मुँह में महादेव कुछ न कुछ डलवा ही देते हैं। इसी बनारस का एक छोटा सा क्षेत्र है, अर्दली बाजार। वहाँ रोजई पर काम के लिए शहर के आस पास के गाँव से लेबर अपने श्रम बेचने प्रतिदिन आते हैं, और यदि काम मिल गया तो वे मालिक के खूँटें में बँध जाते हैं । काम की कुशलता को देखकर मालिक उन मजदूरों से दो- चार दिन और काम करा उन्हें उनका पारिश्रमिक देकर विदा कर देता था।
एक दिन श्रवण की मुलाकात पाचू लेबर से अर्दली बाजार मे ही हो गई। जिस मालिक के यहाँ ठेकेदार काम करवाता था।
उस ठेकेदार से पाचू ने श्रवण को मिलवा दिया। ठेकेदार की आँखों में चमक आ गई, क्योंकि रोजई पर काम करने वालों को रोज पैसा देना पड़ता था। वह ऐसे मजदूर की तलाश कर रहा था, जिससे काम अधिक लेकर थोड़े थोड़े पैसे उसे दे। शहर में लगभग हर ठेकेदारों की यही मनोवृत्ति है। श्रवण उस दिन से राजेश ठेकेदार के अंडर में काम करने लगा। बहुत मेहनत करके एक- एक पैसा बचाने लगा। जब भी ठेकेदार सारे लेबरों का हिसाब करता था, वह यही कहता था कि बाद में ले लेंगे। होली पर घर जाना है। उसी समय जरूरत पड़ेगी। भाई उसकी पत्नी और उसके बच्चों के लिए कपड़े लेना है। बनारस की मिठाई ले जायेंगे। बापू को आँखों से कम दिखता हैं उनके लिए नया चश्मा ले जायेंगे इस बार होली पर।
श्रवण ने हाड़- तोड़ मेहनत करके एक एक पैसा जुटाया था। उसके घर जाने की आशाएँ आसमान छू रही थी। यदि उसके पास पंख होता तो शायद उड़कर चला जाता, लेकिन विधाता को कुछ और मंजूर था।! साइबर अपराधियों ने पुख्ता जानकारी उसके घर से जुटाकर पैसा ऐंठने का एक अनोखा जाल बिछाया और भोला- भाला श्रवण उस नकली ठग डाक्टर के जाल में फँस गया। पच्चीस हजार रुपए ठेकेदार से उसने बापू के इलाज के लिए ट्रांसफर करवा दिया।
श्रवण को पैसे भेजकर लगा कि चलो बापू का इलाज हो जाएगा। वे ठीक हो जायेंगे। होली अगली साल मना लेंगे। उसने डाक्टर को दस मिनट बाद फोन लगाया तो स्विच आफ बताने लगा। लगातार बीसों काल किया, लेकिन उधर से कोई आवाज नहीं आयी। ठेकेदार पढ़ा लिखा होशियार व्यक्ति था। वह सारा माजरा समझ गया। उसने श्रवण से कहा कि तुम्हारे साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ। तुम्हारे पैसे साइबर अपराधियों ने लूट लिया है। यह सुनकर श्रवण जमीन पर कटे वृक्ष की तरह गिर पड़ा। उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया। वास्तव में विपत्ति कमजोरों को ही तोड़ती है। तीन घण्टे बाद होश आया तो श्रवण के आसपास काफी भीड़ थी। श्रवण और उसकी पत्नी का रो रोकर बुरा हाल था। एक निवाला मुँह में नहीं गया। रात में ग्यारह बजे उसके छोटे भाई का फोन आया कि भैया कल आप आ रहे है न! यह सुनकर श्रवण फफक- फफक रोने लगा। धीमी आवाज में उसने कहा भाई मेरे साथ बहुत बड़ा छल हुआ है। मेरे मेहनत को अपराधियों ने लूट लिया है। इस होली को घर नहीं आ पाऊँगा। ठेकेदार ने श्रवण के भाई मुरारी के एकाउंट में दयालुता का परिचय देते हुए पाँच हजार रुपये ट्रांसफर कर दिया।

डॉ0 सम्पूर्णानंद मिश्र
शिवपुर वाराणसी 7458994874

प्रेम की रेत में मौत भी नहाती है | भारमल गर्ग “विलक्षण”

प्रेम की रेत में मौत भी नहाती है | भारमल गर्ग “विलक्षण”

प्रेम की रेत में मौत भी नहाती है

सत्यपुर की सीमा पर फैला मरुस्थल अनंत की तरह था। रेत के टीलों पर सूरज की किरणें ऐसे नाचतीं, मानो अग्निदेव यज्ञ की लपटें बिखेर रहे हों। इसी रेगिस्तान के किनारे बसा था सत्यपुर—एक ऐसा नगर जहाँ के लोग प्रेम को भोग समझते थे, और मृत्यु को अंत।

नगर की संकरी गलियों में एक युवक भटकता रहता। नाम था सुदर्शन। उसकी आँखों में तपस्वियों-सी गहराई थी, पर चेहरे पर एक अद्भुत कोमलता। वह मंदिरों की सीढ़ियों पर बैठकर लोगों के चेहरे पढ़ता—उनकी आँखों में छिपे लालच, प्रेम और पीड़ा को समझने की कोशिश करता। लेकिन भिक्षा नहीं माँगता था वह… शायद इसलिए कि उसकी भूख रोटी से नहीं, सत्य से थी।

नगर के बाहर एक उजड़ा उपवन था। उसमें एक प्राचीन बावड़ी थी, जिसके बारे में कहा जाता “इसका जल पीने वाला प्रेम में कभी अपवित्र नहीं होता।” उसी बावड़ी के पास रहती थी राजलक्ष्मी। उसका नाम ही उसके अस्तित्व का सार था—वह राजसी ठाठ से दूर, पर हृदय से रानी थी। उसकी आँखों में निर्मलता थी, और चेहरे पर वह तेज जो केवल सच्चे प्रेम में ही जागता है।

एक संध्या, जब आकाश लालिमा में नहा रहा था, सुदर्शन ने पहली बार राजलक्ष्मी को बावड़ी के किनारे देखा। वह पानी में पैर डुबोए आकाश की तरफ देख रही थी। उसके पैरों के पास जल में कमल-सी छवि बन रही थी। सुदर्शन की नज़रें उस पर टिक गईं। तभी राजलक्ष्मी ने मुड़कर देखा। उसकी साँसें एक क्षण के लिए रुक गईं—ऐसा लगा जैसे उसके भीतर का कोई सुप्त सुर जाग उठा हो।

“आप कौन हैं?” उसने पूछा, आवाज़ में एक अजीब कंपन।
सुदर्शन मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में रेत की गर्मी और ओस की ठंडक दोनों समाई थीं।
“मैं वह हूँ जो तुम्हारे भीतर हमेशा से था… बस तुमने अभी तक पहचाना नहीं।”

उस दिन के बाद से राजलक्ष्मी और सुदर्शन का मिलना नियमित हो गया। वह उसे उपवन में राग सिखाती, और वह उसे जीवन के मर्म समझाता। धीरे-धीरे, उनके बीच शब्दों की जगह मौन ने ले ली। एक दिन जब राजलक्ष्मी ने सुदर्शन का हाथ थामा, तो उसकी उँगलियों में स्पर्श नहीं, एक प्रार्थना थी।

“तुम जानते हो, मेरा विवाह राजकुमार चंद्रकेतु से तय है?” उसने एक दिन कहा।
सुदर्शन ने आकाश की ओर देखते हुए कहा, “जो प्रेम को युद्ध समझता है, वह कभी तुम्हारा नहीं हो सकता।”
“पर पिता की आज्ञा…”
“प्रेम आज्ञा नहीं, आत्मा की भाषा माँगता है।”

किंतु समय ने करवट ली। विवाह की तैयारियाँ शुरू हो गईं। राजलक्ष्मी के कक्ष में लाल चुनरी और गहनों के डिब्बे आने लगे। एक रात, जब चंद्रकेतु की सेना के घोड़ों की टापों की आहट नज़दीक आई, राजलक्ष्मी ने निर्णय लिया। वह भागी—उस उपवन की ओर, जहाँ सुदर्शन प्रतीक्षा कर रहा था।

“ले चलो मुझे उस रेत तक, जहाँ प्रेम और मृत्यु एक हों,” उसने कहा।

वे दोनों मरुस्थल के गर्भ में एक टूटी हवेली में रुके। उसकी दीवारें जर्जर थीं, पर उन पर उकेरी गई प्रेम कथाएँ अभी भी साँस ले रही थीं। सुदर्शन ने बावड़ी का जल राजलक्ष्मी को पिलाया। “यह जल हमें उस प्रेम तक ले जाएगा, जहाँ कोई विछोह नहीं,” उसने कहा।

पर चंद्रकेतु के सैनिक उनके पीछे थे। एक सुबह, जब सूरज ने रेत को सोने जैसा चमकाया, सैनिकों ने हवेली को घेर लिया। सुदर्शन ने राजलक्ष्मी की ओर देखा। उसकी आँखों में डर नहीं, विश्वास था।

“याद रखना, प्रेम की रेत में मृत्यु भी पवित्र होती है,” उसने कहा।
दोनों ने हाथ मिलाया और मरुस्थल की ओर चल पड़े। पीछे से तलवारों की खनखनाहट थी, आगे केवल अनंत रेत।

जब सैनिकों ने उन्हें ढूँढ़ा, तो वहाँ कोई नहीं था—केवल रेत पर दो छायाएँ बिखरी थीं, जो धीरे-धीरे हवा में विलीन हो रही थीं। कहते हैं, उस रात से आज तक, जहाँ वे लुप्त हुए, वहाँ की रेत चाँदनी में स्वयं प्रकाशित होती है। गाँव वाले कहते हैं। “प्रेम की रेत मृत्यु को नहला देती है, और मृत्यु प्रेम को अमर कर जाती है।”

श्री भारमल गर्ग “विलक्षण”

सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

पुस्तक विमोचन: पुष्पलता श्रीवास्तव ‘शैली’ का प्रथम काव्य संग्रह ‘देहरी’

पुष्पलता श्रीवास्तव, शैली का प्रथम प्रकाशित काव्य संग्रह, ‘देहरी’, लोक संपृक्ति के प्रसंगों को समाविष्ट किए हुए भावों एवं विचारों का ऐसा समन्वय सहेजे है कि इससे गुजरते हुए मन रस आप्लावित हो उठता है।
अत्यंत सहज रूप से भावों की अभिव्यक्ति, आडम्बरहीन तरीके से उद्गारों को शब्द देना पुष्पा जी की कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता है। गहन संवेदना की अभिव्यक्ति इतने सरल, प्राकृतिक रूप में वही कलम कर सकती है जिसे कविता रचनी नहीं पड़ती वरन् जो कविता को जीती है। अत्यंत सशक्त संप्रेषण शक्ति है पुष्पा जी की कलम में। कविता के रचे जाने और पढ़े जाने का सम्पूर्ण प्रकरण कुछ ऐसा है कि लिखने वाले के मन में जो भाव उठे वे सीधे जा कर पढ़ने वाले के मन में घर कर जाने की क्षमता रखते हैं।

पुस्तक ख़रीदने का लिंक : देहरी


लोक जीवन के विश्सनीय दृश्य, ग्राम्य संवेदना और संस्कृति में लिपटे परिवेश का एक सोंधी मिठास से परिपूर्ण ऐसा चित्रण हैं देहरी में संकलित कविताओं में कि कविताओं को पढ़ते हुए मन में जैसे खेत से ताजा तोड़े गन्ने की गड़ेरियों का रस बूंद बूंद भीतर उतरने लगता है।ग्रामीण दृश्यों का सहज लोक भाषा में स्निग्ध चित्रण है किंतु मात्र शब्द चित्र नहीं हैं वे, वरन् भरपूर वैचारिक सम्पन्नता भी है। सीख है, आग्रह है, विसंगतियां है, विपन्नता है, अपने पूरे ठेठ स्वरूप में यथार्थ है। शब्दों, भावों और विचारों का जो समन्वय है वही कविताओं की ग्राहयता को बढ़ा जाता है।
संदर्भित संग्रह में एक कविता है—’गाँव की महक’। इस कविता में कोयल की कूक है, आम महुए से आराम से बतिया रहे हैं, बाँस के झुरमुट से झांकता सूरज है, साँझ के गीत हैं..गरज यह की मन को माधुर्य से सिंचित करते बहुत से ग्रमीण संदर्भ के चित्र हैं पर कविता का असली उद्देश्य है बेटियों से इन सबको आत्मसात करने का आग्रह। इतना ही नहीं पारिवारिक संबंधों की सुदृढ़ता और इन्हें उचित मान देने पर भी बात की गई है। इसी कविता में कच्चे आंगन में जलते चूल्हे की सोंधी महक है, बिटिया के लिए रोटी सेंकती ताई भी हैं, रात भर दूध औटाती काकी भी हैं और ताऊ के प्यार की खनक भी है। अपनी जड़ों और पारिवारिक संबंधों के संरक्षण के प्रति कवियत्री की यह निष्ठा कविता को बेशकामती बना जाती है।इसी कविता की अंतिम पंक्तियों में गाँव के कुएं के संदर्भ में घूंघट से निकली बात का जिक्र आता है। जिन्हें गाँव के कुएं और पनघट पर पर एकत्रित गाँव की बहुओं वाले उस दृश्य और उसकी आत्मा का अनुभव होगा वह पाठक स्वयं को कवियत्री की इस बात से जोड़ पायेगा, ‘बात घूँघट के नीचे से निकली मगर, चुपके- चुपके हवा में पतंग बन गई।‘
देहरी में माँ और माँ की देहरी से संबंधित, माँ को संबोधित अत्यंत भाव प्रवण कवितायें हैं।
‘अम्मा जब मिलने आऊँगी, मुझको गले लगा लेना।
उलझे हुए मेरे बालों को तुम पहले सुलझा देना।‘
माँ और बेटी के अंतरंग, साख्य भाव से परिपूर्ण क्षणों का सर्वाधिक सटीक और मनभावन चित्र है, अम्मा के सामने बाल खोले बैठी बिटिया और तेल लगाती, बाल सुलझाती माँ, किंतु यहाँ भी बात वहीं तक तो सीमित नहीं है। माँ की देहरी से ससुराल की बखरी में प्रविष्ट हुई बिटिया के मन की बहुत सी उलझने सुलझाने, ढांढस बंधाने और रास्ता दिखाने का काम भी माँ ही करती है और इस बात को अभिव्यक्त करने के लिए अत्यंत आत्मीय बिम्ब हैं इस कविता में।
बात माँ की बनाई ‘तरकारी की सोंधी महक’ की हो या ‘कोठरी में बस मेरा सामान रखना’ का प्यारा सा अनुरोध हो, ऐसी हर कविता से गुजरते हुए मन में बरसों पहले छूटी देहरी की स्म़ृतियाँ बरबस घनीभूत हो उठती हैं। माँ ही क्यों यह कविता संग्रह पारिवारिक संबंधों फिर वो भाई- भाभी हो, बिटिया हो या ससुराल पक्ष के संबंध, के प्रति, उनके जीवन में होने के प्रति अनेक भावांजलियाँ समेटे है अपने आप में।
समसामायिक विषयों , सामाजिक समस्यायों के प्रति उदासीन नहीं है कवियत्री, पर्यावरण का असंतुलन, पारिवारिक विघटन के दौर में घर के बुजुर्गों का बढ़ता अकेलापन, कन्यायों- महिलाओं पर होते शारीरिक दुष्कर्म, बारिश में ढहती कच्ची छतें, कृषक के संघर्ष, सब पर दृष्टि गई है पुष्पा जी की और प्रत्येक विषय को अत्यंत संवेदनशील ढंग से सहेजा है उन्होंने अपनी कविताओ में।
प्रणय गीत भी हैं संग्रह में। ‘मन से मन जब मिला, तम लजा कर गिरा, लाज की ओढ़नी फिर बाँधनी पड़ी’, है कहीं तो कहीं, ‘साँकलों की खटक सुन प्रिये, लाज को छोड़ बैठे नयन’, चाँद है, चाँदनी है और हरसिंगार की महक भी, गरज यह कि हथेली पर पंख फड़फड़ाती तितली सरीखे भावों की कोमलता है इन प्रणय गीतों में। किंतु हम जिस कविता की ओर आपका ध्यानाकर्षण करना चाहेंगे वह है— ‘बेमतलब की डाँट तुम्हारी, प्रियतम नहीं सहूँगी।‘ इस कविता में प्रेयसी पत्नी का कहना है कि उसे भौतिक सुख और विलासता की बहुत चाह नहीं है। आर्थिक सामर्थ्य के बाहर उसे कुछ नहीं चाहिए किंतु किसी भी प्रकार का अन्याय, मानसिक प्रताड़ना वह नहीं सहन करेगी। इस कविता में पुष्पा जी ने स्त्री का जो रूप प्रतिष्ठित किया है, वही हमारी संस्क़ृति, नारी मन और पारस्परिक प्रेम का सच्चा प्रतिनिधित्व करता है।
देशज शब्दावली, लोक राग, लोक भाषा के शब्दों का प्रयोग और सहज अभिव्यक्ति शैली ‘देहरी’ की कविताओं को मन में रोपने में अत्यंत सहायक हुए हैं।
‘देहरी’ के विषय में कही गई बातें अधूरी रह जायेंगी यदि इसमें संकलित भूमिकाओं का जिक्र न किया गया। साहित्य जगत में स्थापित हस्ताक्षरों द्वारा लिखित भूमिकायें तो देहरी का मान बढ़ा ही रही हैं किंतु इसे विशिष्ट बनाती हैं परिवार जनों के भावों की अभिव्यक्ति और स्वयं पुष्पा जी की कही बात। भावों की सहज, ईमानदार, कोमल, कवितामयी अभिव्यक्ति से ओत- प्रोत ये भूमिकायें देहरी की कविताओं का वह प्रवेश द्वार हैं, जिससे भीतर जा बाहर निकलने का मन ही नहीं करता।
देहरी का विमोचन हो चुका है। पुस्तक आप सबके मध्य है। आनंद उठाइये। पुष्पा श्रीवास्तव ‘शैली’ को हमारी अगाध शुभकामनाएं। वे अपनी साहित्यिक यात्रा के पथ पर निरंतर अग्रसर हों पर हमें देहरी पर के नीम और घर के बखरी, दालान से जोड़े रहे उनकी कलम, यह हमारा अनुरोध है।
नमिता सचान सुंदर

उदैया चमार : अंग्रेजों को धूल चटाने वाले वीर योद्धा

उदैया चमार : अंग्रेजों को धूल चटाने वाले वीर योद्धा

अक्सर उच्च कुलीन लोगों द्वारा कहा जाता है कि दलितों ने समाज और देश के लिए क्या किया? सिर्फ वो सेवा ही तो करते थे। ऐसे प्रश्न करने वाले लोगों ने शायद इतिहास को गंभीरता से नहीं पढ़ा, या उन पुस्तकों तक पहुँच नहीं पाये हैं। ये भी विडंबना रही है कि दलितों को पढ़ने का अधिकार नहीं था, इसलिए उनका ओजस्वी इतिहास के स्वर्णिम पन्नों से गुम हो गया था।
वैसे तो स्वाधीनता संग्राम का श्रीगणेश तिलका मांझी के द्वारा सन 1771 में अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध से माना जाना चाहिए।
उसके बाद दूसरी बार सन 1804 में अंग्रेजों के खिलाफ चिंगारी भड़की थी। दुबले- पतले छहररे बदन वाले फुर्तीले उदैया चमार छतारी में चमड़े का व्यापार करते थे। उदैया अस्त्र शस्त्र चलाने में निपुण व दुश्मनों को चकमा देने में माहिर थे।
छतारी जिला अलीगढ़ के नवाब नाहर खान व उनके पुत्र ने सन 1804 में अंग्रेजों के खिलाफ भीषण युद्ध लड़ा। इस लड़ाई में उदैया चमार ने 100 से अधिक अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था। अन्ततः नवाब नाहर खान की जीत हुई।
पुनः सन 1807 में नवाब नाहर खान और उदैया चमार ने साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़ दी, जिसमें फिरंगी बुरी तरह परास्त हुए और उन्हें छतारी छोड़ कर भागना पड़ा।
दूसरी बार अपनी पराजय से बौखलाए अंग्रेजों ने कुछ दिन बाद नई कूटनीति से पूरी तैयारी के साथ आकर घेरा बनाकर उदैया चमार को गिरफ्तार कर लिया और सन 1807 में ही अंग्रेजों ने कुछ दिन ही मुकदमा चलाकर उदैया चमार को सरेआम छतारी गाँव के चौराहे पर फांसी दे दी थी।
अलीगढ़ के आसपास आज भी उदैया चमार के चर्चे होते हैं। कुछ जगह तो उदैया की पूजा भी होती है। वीर सपूत उदैया मातृभूमि के लिए शहीद हो गए, किंतु शूद्र होने के कारण उनका नाम गुम हो गया।

डॉ अशोक कुमार
रायबरेली UP
मो 9415951459

कुमारी सुनीति चौधरी : नाबालिग उम्र में ही अंग्रेज जिला कलेक्टर की गोली मारकर की हत्या

कुमारी सुनीति चौधरी : नाबालिग उम्र में ही अंग्रेज जिला कलेक्टर की गोली मारकर की हत्या

भारत में स्त्री और पुरुष को एक गाड़ी के दो पहिए कहा जाता है। वैसे कहने को तो भारत पुरुष सत्तात्मक देश है, फिर भी स्त्री का त्याग, तपस्या, ममता, स्नेह, बलिदान, संघर्ष सर्वोपरि है। स्त्री के बिना कोई कार्य पूर्ण नहीं हो सकता। कहा जाता है– *यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता।* अर्थात् जहां नारियों की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। भारत में एक ओर नारियों की पूजा होती है, तो दूसरी ओर जब परिवार, समाज या देश पर संकट आता है, तब कोमल हृदय वाली नारी रणचंडी बन तलवार उठाकर रणभूमि की ओर निकल पड़ती है। ऐसी ही असंख्य वीर नारियों ने सन 1857 के स्वाधीनता संग्राम में अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए थे, इतना ही नहीं, अपने प्राण न्योछावर कर दिए। हम ऐसी ही क्रांतिकारी वीरांगना कुमारी सुनीति चौधरी की अमर शौर्यगाथा की बात कर रहे हैं। जिस उम्र में नाबालिक बच्चे खेलते कूदते हैं, उस उम्र में कुमारी सुनीति ने अंग्रेज अफसर को गोली से उड़ा दिया था। कुमारी सुनीति चौधरी का जन्म बंगाल प्रेसीडेंसी के अंतर्गत कोमिला जिला (तत्कालीन बांग्लादेश) में 22 मई सन 1917 को हुआ था। पिता उमाचरण चौधरी अंग्रेजी सरकार में सरकारी मुलाजिम और माता सुर सुंदरी कुशल ग्रहणी थी। मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाली कायस्थ समाज की होनहार बेटी सुनीति चौधरी लिखने पढ़ने में होशियार थी। तत्कालीन परिस्थितियों में बालिकाओं को पढ़ने का अधिकार न के बराबर था। किंतु माता-पिता ने पुत्री स्नेह और उसकी हठधर्मिता के कारण स्कूल में दाखिला करा दिया था। वह बांग्लादेश के ही पैतृक गांव कोमिला में पढ़ने लगी थी। सुनीति तीरंदाजी, तलवारबाजी, लाठी चलाना, बंदूक चलाना, खेलकूद आदि में भी अव्वल थी। हाजिर–जवाबी उसकी विशेषता थी। कुमारी सुनीति चौधरी कोमिला के ही फैजिन्निशा गवर्नमेंट हाई स्कूल में कक्षा 8 की छात्रा थी। उनका मन पढ़ाई से ज्यादा क्रांतिकारी गतिविधियों में लगता था। इसलिए सर उल्लासकर दत्त को अपना क्रांतिकारी गुरु मानने लगी थी, क्योंकि उल्लासकर दत्त पहले ही फिरंगियों के खिलाफ बहुत मोर्चा खोल चुके थे। उनकी रणनीति व कूटनीति से अंग्रेज परेशान और भयभीत होने लगे थे। कुमारी सुनीति चौधरी बाद में त्रिपुरा जाकर पढ़ने लगी थी। वहां भी स्कूली गतिविधियों में अव्वल रहती थी। सन 1931 में वरिष्ठ सहपाठी प्रीतिलता ब्रम्हा की सलाह और प्रेरणा से कुमारी सुनीति चौधरी, शांति घोष क्रांतिकारी युगांतर समूह में शामिल हो गईं। प्रीतिलता ने लड़कियों का संघ बनाया। उस कमेटी में सुनीति चौधरी कप्तान, शांति घोष सचिव और प्रीतिलता अध्यक्ष चुनी गई। क्रांतिकारी बरुण भट्टाचार्य से सुनीति चौधरी और शांति घोष ने पिस्तौल शूटिंग और अन्य मार्शल आर्ट में प्रशिक्षण लेना प्रारंभ कर दिया। गर्म खून वाली सुनीति ने फिरंगियों का विरोध करते हुए कहा– “हमारे खंजर और लाठी के खेल का क्या मतलब, अगर हमें वास्तविक लड़ाई में भाग लेने का मौका ही नहीं मिले?”

त्रिपुरा के कॉलेज में प्रति वर्ष 6 मई को वार्षिकोत्सव धूमधाम से मनाया जाता था। जिसमें आदिवासी समुदाय के लोगों की भी बढ़-चढ़कर भागीदारी होती थी। इसी क्रम में 6 मई सन 1931 को आयोजित वार्षिकोत्सव में कुमारी सुनीति चौधरी को महिला स्वयंसेवी संस्था का लीडर, अस्त्र–शस्त्र व गोला बारूद का संरक्षक बनाया गया। साथ ही ‘मीरा देवी’ उपनाम दिया गया था। सुनीति की काबिलियत के कारण कई पद मिल चुके थे, इसलिए उनके अंदर अब उत्साह दोगुना हो गया था।
कु. सुनीति चौधरी अपने परिवार और अन्य लोगों से अंग्रेजों के काले कारनामों के विषय में सुना करती थी कि अंग्रेजों के जुल्म की दास्तां सुनकर हर भारतीय की आंखों में आंसू आ जाते हैं। फिरंगियों ने भारत के महिलाओं, बच्चों, पुरुषों, विकलांगो तक नहीं छोड़ा था। गरीबों के कारण जो व्यक्ति अंग्रेजों का टैक्स नहीं अदा कर पाता था, उन्हें अंग्रेज लोहे की कील लगे चमड़े के पट्टा से मारते थे। अंग्रेज सिपाही तो बेकसूर लोगों पर कोड़ा बरसाना और बंदूक चलाना अपना शौक समझते थे। जिस गांव से अंग्रेज दरोगा घोड़ा पर बैठकर निकल जाता था, उस गांव के घरों में सारे दरवाजे–खिड़की बंद हो जाते थे। अंग्रेज अपनी हवस मिटाने के लिए भारत की महिलाओं लड़कियों को घरों से उठा लेते थे और उनके साथ छावनी में बारी-बारी से दुष्कर्म और अप्राकृतिक संबंध बनाते थे। जो महिलाएं विरोध करती थी, उनके गुप्तांगों में बंदूक की नाल रखकर फायर कर देते थे, जिससे महिलाओं का शरीर के चीथड़े उड़ जाते थे और तुरंत ही उनकी मृत्यु हो जाती थी। ऐसे क्रूर अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारियों ने बिगुल छेड़ रखा था। अंग्रेज अफसर और सिपाही, क्रांतिकारियों के घर वालों को तो और अधिक परेशान करते थे। हाथ पैरों में नुकीली कील ठोक देते थे। अंग्रेज शोषण, दमनकारी नीति, अधिक टैक्स वसूली आदि लगातार थोंप रहे थे। इस प्रकार के अमानवीय कृत्य करने में एक अफसर नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत के लगभगअंग्रेज अफसर शामिल रहते थे। कु. सुनीति चौधरी ये सब जुल्म–ओ–सितम अपनी आंखों से देख–सुन रही थी। इसलिए वीरांगना सुनीति चौधरी के मन में दिन–प्रतिदिन अंग्रेजों के खिलाफ क्रूरता भरी बाते सुन कर आक्रोश बढ़ता ही जा रहा और उनका खून उबाल मार रहा था।
महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत में सविनय अवज्ञा आन्दोलन चल रहा था, जिसे चार्ल्स जेफ्री बकलैंड स्टीवंस ने दबाने की हरसंभव कोशिश की। जिसके कारण सुनीति चौधरी बहुत खफा थी।
लगभग 14 वर्षीय कुमारी सुनीति चौधरी और लगभग 15 वर्ष की कुमारी शांति (सेंटी) घोष ने त्रिपुरा के स्कूल में पढ़ाई कर रही थीं, इसलिए वहीं प्लान बनाया कि त्रिपुरा के अंग्रेज कलेक्टर के दफ्तर में जाकर अपने स्कूल में तैराकी प्रतियोगिता आयोजित करने की अनुमति के लिए प्रार्थना पत्र देंगे। उसी क्षण गोली मारकर उसकी हत्या भी कर दी जाएगी। इस प्लान की किसी को कानों–कान खबर नहीं हुई।
14 दिसंबर सन 1931 को दोपहर का समय, त्रिपुरा के मैजिस्ट्रेट के बंगले के बाहर एक गाड़ी से दो किशोरियाँ हँसते हुए उतरीं। दिसंबर में भीषण ठंड होने के कारण दोनों ने साड़ी के ऊपर से गर्म ऊनी शॉल ओढ़ रखा था, जिससे किसी को शक न हो। उन लड़कियों ने दफ्तर के अंदर अपने छद्म नाम (मीरा देवी और इला सेन) से पर्ची भेजा, जिसके बाद एसडीओ नेपाल सेन के साथ मैजिस्ट्रेट बाहर निकले। मैजिस्ट्रेट को स्विमिंग क्लब में आमंत्रित किया गया था, कलक्टर वहां जाने की जल्दबाजी में थे। दोनों वीरांगनाओं ने अंग्रेज सिपाहियों को प्रसन्न करने के लिए वार्तालाप में बड़ी मासूमियत से चापलूसी से भरे शब्दों का प्रयोग कर रही थीं, जिससे अंग्रेजों को अपनी ईमानदारी पर कोई संदेह नहीं होने दिया। लड़कियाँ स्वीकृति मिलने के लिए बेचैन हो रही थीं। मजिस्ट्रेट अपने चेंबर में गया और फाइल में रखे कुछ कागज पढ़ते हुए दोनों किशोरियों को कार्यालय के अंदर बुलवाया था।
दो सहेलियों कुमारी सुनीति चौधरी और कुमारी शांति (सेंटी) घोष पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार अपने स्कूल में तैराकी प्रतियोगिता कराने का प्रार्थना पत्र और शॉल के अंदर ऑटोमेटिक पिस्तौल छिपाकर त्रिपुरा के अंग्रेज कलेक्टर चार्ल्स जेफ्री बकलैंड स्टीवेंस के दफ्तर में पहुंच गई। मजिस्ट्रेट चार्ल्स जेफ्री फाइल रखे कुछ पेपर्स पढ़ ही रहे थे। तभी मौका पाकर दोनों कुमारी वीरांगनाओं ने अपने–अपने कपड़ों में छिपी पिस्तौल निकालकर एक साथ ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर उसकी हत्या कर दी। मजिस्ट्रेट को संभलने तथा अंग्रेज सिपाहियों को पोजीशन लेने तक का मौका नहीं मिला। बाद में ब्रिटिश सिपाहियों ने दोनों लड़कियों को गिरफ्तार कर लिया। त्रिपुरा क्षेत्र बंगाल प्रेसीडेंसी के अंतर्गत आता था, इसलिए कोलकाता न्यायालय में लगभग 8 माह मुकदमा चला। चूंकि दोनों किशोरियां नाबालिक थी, इसलिए न्यायाधीश ने उन्हें फांसी देने के बजाय, 10 वर्ष का सश्रम कारावास की सजा सुनाई।
क्रूर अंग्रेजों ने उम्मीद के मुताबिक कु. सुनीति चौधरी की दुश्मनी उनके परिवार के साथ निकालना शुरू किया। पिता जी को मिलने वाली सरकारी पेंशन बंद करा दी। दो निर्दोष अग्रजों को जेल में डाल दिया गया और अनुज की भूख से असमय मृत्यु हो गई।
गांधीवादी युग की शुरुआत हो चुकी थी। राष्ट्रपिता अहिंसावादी महात्मा गांधी अपने दबाव से कुछ निर्णय भारतीयों के हित में कर लिया करते थे। ऐसे समय में महात्मा गांधी और अंग्रेज अफसर के मध्य कुमारी सुनीति चौधरी को लेकर सफल वार्ता हुई। सुनीति और सेंटी घोष की सजा 10 वर्ष से घटाकर 7 साल करके सन 1939 में रिहा कर दिया गया। एक बार एक पत्रकार ने कुमारी सुनीति से जेल मैनुअल के विषय में पूछा, तो उन्होंने उत्तर देते हुए बताया कि– “घोड़े के अस्तबल में रहने से, मरना बेहतर है।” फिर भी भारत के वीर सपूतों ने हार नहीं मानी और लगभग 90 वर्ष का संघर्ष करने के बाद आजाद भारत में हमें जीने का अवसर मिला है। भारत में सबसे कम उम्र में क्रांतिकारी बनने वाली वीरांगना कुमारी सुनीति चौधरी और शांति घोष थी।
जेल से रिहा होने के बाद कुमारी सुनीति ने अपना भविष्य उज्ज्वल बनाने पर जोर दिया। कोलकाता स्थित कैम्पबेल मेडिकल कॉलेज से एम.बी.बी.एस. (तत्कालीन एम.बी. डिग्री) की पढ़ाई करके कुशल चिकित्सक बन गई। तत्पश्चात गरीब, किसान, मजदूर वर्ग की चिकित्सीय उपचार व सेवा करती रहीं। लोग उन्हें लेडी मां कहकर बुलाते थे। भारत स्वतंत्र होने पर, अर्थात् सन् 1947 में कुमारी सुनीति चौधरी ने बंगाल के प्रसिद्ध व्यापारी और व्यापार संघ के अध्यक्ष प्रद्योत कुमार घोष के साथ सात फेरे लेकर परिणय सूत्र में बंध गई थी। उनके दोनों भाई जेल से रिहा हो गए। परिवार पटरी पर दौड़ने लगा था। दुर्भाग्य से यह खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं रही, 71 वर्ष की उम्र में 12 जनवरी सन 1988 को श्रीमती सुनीति चौधरी घोष का स्वर्गवास हो गया था।

डॉ. अशोक कुमार गौतम

असिस्टेंट प्रोफेसर
शिवा जी नगर, रायबरेली
मो० 9415951459

स्त्री; आश्रित या आश्रयदात्री|जिज्ञासा मिश्रा

हमारे भारतीय कानून में सबको एक समान माना गया है। क्या स्त्री ? क्या पुरुष ? क्या हिंदू और क्या मुस्लिम ? लेकिन क्या व्यवहार में भी ऐसा होता है ? बहुत ही कम!

आज हम बात कर रहे हैं गांव में रहने वाली लड़कियों ,बहुओं, कामकाजी महिलाओं की। हर क्षेत्र में उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता है , सिर्फ इसलिए क्योंकी वह एक स्त्री है। आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी स्त्रियां अपनी गुलामी की जंजीर तोड़ने के लिए संघर्षरत हैं। जो उनका जन्मसिद्ध अधिकार होता है वह भी उन्हें संघर्ष करके ही प्राप्त होता है। स्त्री – पुरुष का यह भेदभाव जन्म से ही शुरू हो जाता है। लडकों के पैदा होने पर उत्सव मनाया जाता है दावतें होती हैं और लड़कियों के पैदा होने पर कोई उत्सव नहीं होता। तब ” शादा जीवन उच्च विचार ” का ढोंग होने लगता है। शुरू से ही लडकों और लड़कियों को भिन्न – भिन्न संस्कार दिये जाते हैं

“तुम इतनी तेज नहीं बोल सकती , क्योंकी तुम लड़की हो।तुम्हें घरेलु काम करने हैं क्योंकी तुम लड़की हो। अरे! तुम ऐसे ठहाके मार के कैसे हंस सकती हो? तुम तो लड़की हो। कुछ तो शर्म करो। बचपन से ही लड़कियों को ” तुम लड़की हो ” का टैग मिल जाता है यही चीजें अगर लड़का करे तो पुरुषत्व की निशानी और अगर लड़की करें तो बेशरम। अरे वाह ! क्या दोगली रीत है ?

गांव में जब भी स्कूल में कोई वर्षिक उत्सव या आज़ादी का उत्सव मनाया जता है और उसमें नृत्य आदि के प्रतियोगितायें रखी जाति हैं तो उनमें भाग लेने के लिए लडकों को इजाजत की जरूरत नहीं होती लेकिन लड़कियों को ना जाने कितनी मेहनत करके घर वालों की इजाजत लेनी पड़ती है।” अरे तुम लड़की हो वहां इतने सारे लोगों के सामने स्टेज पर नाचोगी। तुम्हें हमारी मर्यादा का ख्याल तो है तुम्हें ? नृत्य जो एक कला है ,आत्म विकास का मध्यम है उसको भी मर्यादा से जोड़ कर उसका अर्थ ही बदल दिया जता है। वह भी सिर्फ लड़कियों के लिए। ” लड़का नाचे तो शान लड़की नाचे तो अपमान। ” हमारे गांव में लडकों का जब जी चाहता है तो घर से निकल पड़ते हैं घूमने के लिए। जब जी चाहता है तब घर आते हैं। लेकिन लड़कियां जब तक कोई जरूरी काम ना हो घर से बाहर नहीं निकल सकती और अगर कहीं जाते भी हैं तो कई सवालों के जवाब देने के बाद।

कहाँ जा रही हो ? वहां क्या काम हैं ? घंटे भर के अंदर वापस आ जाना। अकेले नहीं ,भाई को साथ लेकर जाओ, अच्छा उस सहेली के यहां जा रही हो, क्या जरूरत है जाने की? यह दोस्ती बस स्कूल तक सीमित रखो घर पर लाने की कोई जरूरत नहीं है। वगैरह – वगैरह इतने सवालों के जवाब देने के बाद भी इजाजत मिलेगी या नहीं , कोई पता नहीं होता। लड़कियों को बचपन से ही सीख दी जाती है की जब तक मायके में हो तब तक पिता और भाई के आश्रय में रहना है। ससुराल में पति के आश्रय में और बुढ़ापे में बेटों के। उनकी पुरी जिंदगी को आश्रित बना दिया जता है। अगर वो सक्षम भी हो तो बिना किसी पुरुष का साथ लिए उन्हें घर से बाहर कदम नहीं रखने दिया जाता है। लड़कियों की जिंदगी किराएदार की तरह होती है, उनका हिस्सा न मायके में होता है और ना ही ससुराल में। मायके वाले कहते हैं पराई अमानत है ,एक दिन चली जायेगी और ससुराल वाले कहते हैं पराय घर की है। हम सबके अपने होकर भी पराए रह जाते हैं। और तो और गांव में आज भी शादी सिर्फ़ समझौता होती है। अपनी पसंद चुनने का आपके पास कोई हक नहीं होता है। विवाह के क्षेत्र जाति – उपजाति में अत्यंत ही सीमित होते हैं और अगर गलती से किसी को दूसरी जाति या दुसरे उपजाति के ही लड़के या लड़की से प्रेम – प्रसंग हो जाए तो उसका अधिकार ,उसकी स्वतंत्रता सब छीन लिया जता है और अन्ततः समझौते की शादी करा दी जाति है। प्रेम जो खुद में ही पवित्र है ,शास्वत है अनंत और असिम है, जो हर जाति – पाति, ऊंच – नीच से परे है , उसको भी यहां एक कलंक के रूप में देखा जता है और प्रेम करने वालों को चरित्रहीन समझा जता है। मतलब अगर यहां किसी को प्यार करना हो तो कैसे करें? प्यार तो कोई सोच समझकर नहीं करते वो तो बस हो जाता है। या फिर हाथ में एक बोर्ड लेकर घूमें की “हिंदू ब्राह्मण कान्यकुब्ज प्रेमिका को उच्च व मान्य ब्राह्मण कुल का सजातीय प्रेमी चाहिए। तब जाकर कोई मिले और फिर उससे प्रेम करें।

“वाह ! सोच के भी कितना दुःख होता है की अनंत और असीम प्रेम को भी एक सीमा और क्षेत्र विशेष में बंध दिया गया है और इस बंधन को कुछ गिने – चुने लोग ही तोड़ पाते हैं। वह भी एक लंबे संघर्ष के बाद। लंबे अरसे के बाद। बहुओं की दशा तो और भी दयनीय होती है, उनका अस्तित्व बस पति की सेवा करने का, कामकाज करने और घर की चारदीवारी के अंदर ही होता है। और अगर औरत घर से बाहर निकलकर काम भी करना चहती है तो उस पर हजार पाबंदीयां लगाई जाती हैं।

” आदमियों से ज्यादा बोल – चाल मत रखना, अपने काम से काम रखना ,घर से कार्यालय और कार्यालय से घर। इसके आगे कदम मत बढ़ाना “नौकरी शुरू करते ही उसमें ऐसी कई पाबंदियां लगा दी जाती हैं ।अगर एक औरत भले ही काम के सिलसिले में ही किसी आदमी से बोल दे , दो – चार बातें कर ले तो उसको चरित्रहीन कह दिया जाता है। अगर किसी कामकाजी महिला के घर पर उस घर के मुखिया के बजाय उस महिला के नाम से निमंत्रण पत्र आ जाता है तब तो पूछो ही मत । तुरंत औरत को सवालों के कटखरे में खड़ा कर दिया जाता है। ” यह तुम्हारे नाम से क्यों आया है? तुम ठेकेदार हो ? घर के पुरुष मर गए हैं क्या ? “अरे भाई ! जब उस महिला की सह – कर्मचारी उसे ही जानती है तो उसी के नाम से निमंत्रण पत्र भेजेगी ना। जैसे किसी पुरुष का दोस्त पुरुष के नाम का निमंत्रण पत्र भेजेगा ना की उसकी पत्नी या मां के नाम का। सीधी सी बात है लेकिन इससे पुरुषों के ताथकथित आत्मसम्मान को ठेस पहुंच जाति है ,की कोई हमारी जगह कैसे ले सकता है ?

क्या स्त्रियों का मन नहीं होता ? उनकी प्रतिभा, प्रतिभा नहीं होती ? फिर क्यों उनकी प्रतिभाओं को दबा दिया जाता है ? क्यों उन्हें वो करने की आज़ादी नहीं मिलती जो वे करना चहती हैं ? क्या उनको हक नहीं की वह अपनी जिंदगी अपने तरीके से जिएं न की किसी और के निरंकुश नियमों का पालन करके।

हमेशा से कह दिया जाता है कि लड़कियां कमजोर होती हैं। इनके पास दिमाग नहीं होता है।अरे इस पुरूष प्रधान समाज में क्या लड़कियों को उतने अवसर उतनी सुविधाएं दिये गए जितने के लडकों को ? फिर बिना अवसर दिए ही आप यह कैसे कह सकते हैं की लड़कियां कमजोर होती हैं ? ये तो कुछ यूं बात हो गई जैसे कि किसी को लड़ाई के मैदान में उतारे बिना ही उसे पराजित घोषित कर दिया जाए। अगर लड़कियों को अवसर मिलता है और तब वह कुछ ना कर पाती तब आप उन्हें असक्षम कहें ,तब हमें कोई शिकायत ना होंगी। लेकिन मुझे यकीन है की जितने अवसर व सुविधाएं लडकों को दिये जाते हैं उसका आधा भी अगर लड़कियों को मिले तो निश्चित ही वह प्रगति करेंगी क्योंकि स्त्रियां इतनी भी कमजोर नहीं होती हैं। उनमें तो सहनशीलता का गुण हो होता है। वो अपनी जान पर खेलकर, तमाम चोट सहकर , तमाम मुसीबतों को सहकर, तमाम तकलीफों को झेलने के बाद भी, वह दूसरों की रक्षा करती हैं। अपना संपूर्ण जीवन अपनी इच्छायें सब कुछ अपनों के लिए समर्पण कर देती हैं।

एक औरत के कई रूप होते हैं एक बेटी माता-पिता के लिए उनके मान – सम्मान के लिए अपनी इच्छाओं को त्याग देती है। एक बहु अपने मायके को त्याग देती है और ससुराल में ही सर्वस्व ढूंढती है। एक पत्नी स्वयं की पहचान को त्याग देती है और पति के पहचान में ही ढल जाती है। एक मां अपने बच्चों के लिए अपने सपने त्याग देती है। खुद भूखी रह कर भी अपने हिस्से से बच्चों का पेट भरती है ।पर इतना त्याग करने के बाद भी उसको मिलता क्या है अपमान , कलंक, रोक – टोक इत्यादि।

क्या पुरुषों का कोई फर्ज नहीं है? क्या उनका फर्ज बस इतना ही है कि वो पैसे कमाएं और परिवार का पेट भरें। क्या पुरुष उन स्त्रियों लिए, उन सब के लिए जो इतना त्याग करती हैं थोड़ा सम्मान, थोड़ी स्वतंत्रता और बिना रोक – टोक किए उनको उनकी जिंदगी जीने अधिकार नहीं दे सकते ? जोकि उनका जन्मसिद्ध अधिकार है? क्या स्त्रियों की प्रतिभाओं की ऊंगली पकड़ कर उनको प्रोत्साहन नहीं दे सकते? उनकी इच्छाओं को पुरा करने का अवसर उन्हें नहीं दे सकते ?

मुझे नहीं लगता है कि स्त्रियां सिर्फ़ पिता, पति या बेटों पर आश्रित होती हैं। वह तो स्वयं हम सबको आश्रय देती हैं। अपने आंचल के छांव में सबको समेटे रहती है। खुद अत्याचार सह कर भी सबको प्यार देती हैं। अपनी इच्छाओं को मार कर सबकी छोटी-छोटी इच्छाओं का भी सम्मान करती हैं ।

इतिहास गवाह है कि जब – जब स्त्रियों की सहनशीलता टूटी है तब – तब उन्होंने अपनी वीरता का परिचय दिया है। और तब जाकर समाज में क्रांति व परिवर्तन हुए हैं। स्त्री तो एक शांत नदी की तरह है जो सबको शीतलता प्रदान करती है। सबकी प्यास बुझाती है। लेकिन अगर उस पर अत्याचार होगा ,अपमान होगा तो वही स्त्री नदी की भयानक बाढ़ की तरह सब कुछ तहस – नहस कर सकती है। जिस दिन स्त्रियों को सम्मान ,उनके प्रतिभाओं को अवसर और उन्हें उनके हिस्से की स्वतंत्रता मिलने लगेगी तभी यह देश प्रगति की सीढ़ी पर चढ़ते हुए और आगे बढ़ सकेगा। क्योंकि भारत की आधी आबादी महिलाऐं ही हैं। आज विश्व में किसी भी ऐसे देश का उदाहरण नहीं है जो अपनी महिलाओं को सम्मान और बराबरी का दर्जा दिए बिना केवल पुरुषों के बल पर विकसित हुआ हो। स्वामी विवेकानंद जी ने भी महिलाओं के प्रति कहा है कि – “जैसे किसी पक्षी के लिए एक पंख से उड़ना आसन नहीं है उसी प्रकार बिना महिलाओं की स्थिति में सुधार किए इस समाज का कल्याण संभव नहीं है।”

वीरांगना झलकारी बाई : वीरता का पर्याय

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की नियमित सेना में महिला शाखा
दुर्गा दल की सेनापति,वीरांगना झलकारी बाई कोली (कोरी) का जन्म 22 नवबंर सन 1830 को उत्तर प्रदेश(तत्कालीन नाम पश्चिमोत्तर प्रान्त) राज्य में झांसी जनपद के भोजला ग्राम में हुआ था। पिता का नाम स्व० सदोवर सिंह और मां का नाम स्वर्गीया जमुना देवी था। झलकारी बाई का जन्म के कुछ दिन में ही मां असमय स्वर्ग सिधार गई, अब बेटी की सेवा करने की जिम्मेदारी पिता पर आ गई। पिता जी ने लड़के की भांति ही झलकारी बाई का पालन–पोषण किया।


तत्कालीन सामाजिक विपरीत परिस्थितियों के कारण पिता स्व० सदोवर सिंह अपनी सपुत्री को स्कूली शिक्षा नहीं दिला सके, किंतु घुड़सवारी, अस्त्र–शस्त्र चलाना, युद्ध करना आदि संघर्षी कार्य जरूर बखूबी सिखाया था। वह स्कूली शिक्षा में तो अनपढ़, किंतु तलवार चलाने में बहुत निपुण थी। अक्सर झलकारी बाई जंगल में लकड़ी लेने जाया करती थी।एक बार झांसी के जंगलों में झलकारी बाई का आमना–सामना तेंदुआ से हो गया, झलकारी बाई ने डरकर भागने के बजाय, कुल्हाड़ी से काटकर वन्यजीव को मार डाला था। यह बात रानी लक्ष्मी बाई को पता चली तो झलकारी बाई को अपनी सेना में सेनापति बनाया था।


पति का नाम अमर शहीद पूरन सिहं कोली था, जो रानी लक्ष्मीबाई के तोपखाने का कर्मचारी थे। पूरन सिंह कोली बहुत ही स्वामिभक्त, मेहनतकश व कर्तव्यनिष्ठ थे,जिनकी ईमानदारी पर रंच मात्र भी संदेह नहीं किया जाता था। इसलिए महारानीलक्ष्मीबाई ने पूरन सिंह कोली को अपने तोपखाना की जिम्मेदारी दी थी।


झलकारी बाई, रानी लक्ष्मीबाई की हमशक्ल होने के कारण अंग्रेजों को कई बार गुमराहकरके रानी वेश में युद्ध लड़ती थी, उसी समय रानी लक्ष्मीबाई स्वयं अगली रणनीति तैयार करने में लग जाती थी। अन्तिम समय में भी झलकारी बाई स्वयं रानी की वेशभूषा में लड़ते हुए अंग्रेजों के हाथों गिरफ्तार हो गई, उधर लक्ष्मीबाई अभेद्य किला से भागने में सफल रही।


झलकारी बाई का प्रसिद्ध वाक्य- “जय भवानी” था। ब्रिटिश सेना के जनरल ह्यूज रोज ने सन 1857 का स्वाधीनता संग्राम के दौरान एक बड़ी सेना के साथ झांसी में हमला किया। तब भी झलकारी बाई ने ही रानी लक्ष्मीबाई को जान बचाकर भगाने में मदद की थी। युद्ध के मैदान में भी दोनों में सब सुनियोजित रणनीति होने के कारण झलकारी बाई भी फिरंगियों को चकमा देकर भागने में सफल रहती थी। झांसी के ही गद्दार ने झलकारी बाई को पहचान करके अंग्रेजों की मुखबरी की, इसलिए झलकारी बाई ने गद्दार को सरेआम गोली मार दी थी। तब तक
लक्ष्मीबाई और झलकारी बाई की हमशक्ल वाली सच्चाई अंग्रेजों के सामने आ चुकी थी।


जनरल ह्यूज रोज ने झलकारी बाई को गिरफ्तार कर अभेद्य टेंट में कैद करके रखा था, फिर भी झलकारी बाई चालाकी से फिरंगियों के चंगुल से भागने में सफल रही। उसके बाद ह्यूज रोज ने किला पर भारी हमला किया। किला की रक्षा करते हुए पति पूरन सिंह कोली शहीद हुए थे। झलकारी बाई अपने पति का शोक में डूबने, तेरहवीं संस्कार आदि करने के बजाय, दूसरी रणनीति बनाकर फिरंगियों पर ज्वाला बनकर टूट पड़ी थी।

कई अंग्रेजों को तलवार से मौत के घाट उतार दिया था। कुछ दिन बाद ही ग्वालियर में 4 अप्रैल सन 1857 को तोप के गोले से झलकारी बाई भी मृत्यु पाकर वीरगति को प्राप्त हो गई थी।
कवि बिहारी लाल हरित ने “वीरांगना झलकारी बाई काव्य” नमक पुस्तक लिखा, जिसका एक दोहा दृष्टव्य है—
लक्ष्मीबाई का रूप धार, झलकारी खड्ग सवार चली।
वीरांगना निर्भय लश्कर में, शस्त्र अस्त्र तन धार चली।।

सरयू–भगवती कुंज
डॉ अशोक कुमार गौतम
असिस्टेंट प्रोफेसर
शिवा जी नगर, रायबरेली
मो० 9415951459

Poet Pushpa Srivastava
उस साल चांँद निहार कर उतरते हुए जीने से गिर गई थी मैं। अफरा- तफरी मच गई थी पूरे घर में | संस्मरण | पुष्पा श्रीवास्तव ‘शैली

उस साल चांँद निहार कर उतरते हुए जीने से गिर गई थी मैं। अफरा- तफरी मच गई थी पूरे घर में।

“कौन गिरा?”

“अरे देखो!”

जेठानी जी तेज आवाज में- “अरे! देखो गुड्डी गिर गई!”

“अरे ! छोटी दीदी गिर गईं!” सब दौड़ कर आए गये।

“अरे मुझे चोट नहीं आई, मैं बिल्कुल ठीक हूॅं!” कहते हुए मैं भाव-विह्वल हो गई।

त्वरित निर्णय लिया गया कि अब अगली बार से पूजा नीचे  आंँगन में ही  होगी।

“अम्मा भी छत पर नहीं जा पातीं, वो भी आंँगन में बैठ पाएंँगी ।”

“हाँ -हाँ बिल्कुल।” सभी ने एक स्वर से सहमति जतायी।

बहुओं को सज -धज कर करवा चौथ की पूजा करते देख अम्मा बहुत खुश होती थीं ।

‘ठुक -ठुक’  डंडे की आवाज़ के साथ कभी मुझे निहारती कभी देवरानी को और कभी जेठानी को। वे पूरी तरह हमारे बीच शामिल हो जाना चाहतीं थीं।  

फोटो खिंचवाते समय आंँगन के चाॅंद की तरह घूम -घूम हम सब को निहारतीं और खुश होकर कुछ गुनगुनाती।

“मेरी नथुनी उलझ गई देखो पिया” 

आगे के बोल भूल जातीं, फिर कहतीं- ” राम राम बिसरि गयेन” और बिना दांँत के मुंँह से आह्लादित होकर हंँसती।

आज घर में पहले की तरह ही सब कुछ हुआ, हम सब घर की बहुएंँ सजीं , फोटो भी खींची गई। आंँगन में पूजा भी हुई, नीम के झुरमुट से आंँख-मिचौली करते हुए चाँद से भी मुलाकात हुई। पर मन! वो तो अम्मा की स्मृतियों में खोया रहा! अम्मा के घर पर न होने से उपजा खालीपन खुशियों पर भारी रहा! 

आज अपनी खिलखिलाती हँसी से घर के कोने कोने में

सितारे टांँकने वाली अम्मा की लाडली पारियांँ भी नहीं आईं।

कहाॅं चली गई थीं अम्मा! कहाॅं गया वह आंँगन में ठुक- ठुक की आवाज़ करने वाला चांँद? आज नहीं मिला पूजा के बाद पांँव छूने पर पीठ पर देर तक फिरने वाला वह थरथराता सा हाथ!  वह सदियों तक गूॅंजने वाला आशीर्वाद –

“बनीं रहौ बच्ची,अहिवात बना रहे”!

मेरे मुॅंह से सहसा निकला-“अम्मा तुम्हारा यह आशीष इस घर पर अक्षत रहे!” और तभी  मेरी भरी-भरी ऑंखों ने भी सिसकते हुए धीरे से कहा -“प्रणाम माँ!”

पुष्पा श्रीवास्तव ‘शैली’

‘हमारी सांस्कृतिक प्रेरणा- अम्मा जी!’ संस्मरण 

संस्मरण 

‘हमारी सांस्कृतिक प्रेरणा- अम्मा जी!’

नई-नई बहू मैं निर्जला व्रत पहली बार रखे थी! पूजा करने के लिए तैयार हुई तो अम्मा बार-बार मुझे देख कर बताती रहीं..” नथ पहनना ज़रूरी होता है। देखो बेंदी तिरछी है, ठीक कर लो। कान वाले झाले काहे नहीं पहिने?” उजबक ढंग से तैयार हुई मैं लॅंहगे की चुन्नी नहीं सॅंभाल पा रही थी। अम्मा ने मुस्करा कर कहा था- “धीरे-धीरे आदत पड़ जाएगी” सुनकर मुझे चैन मिला। पहला हर काम बड़ा कठिन लगता था। 

अम्मा “देखो बबलू दुलहिन! लहंगा लंबा है सॅंभल कर चलो।  भूख लगे तो पहले साल ही कुछ खा लो” आदि बातें बता कर सारी तैयारी करने लगतीं। 

घर पकवानों की सोंधी महक से भर जाता।ढेर सारा पुजापा बनता, साथ में तरह-तरह के व्यंजन भी बनते। अम्मा सुबह से भजन गुनगुनाते हुए काम में लग जाती थीं। अम्मा कमाल की कलाकार भी थीं। दीवार पर माता जी का चित्र बनातीं तो जैसे माॅं साक्षात मुस्करा पड़ती थीं। सूरज-चंन्द्रमा बनाने के साथ अम्मा का चेहरा भी चमक उठता था। 

दशहरे वाले दिन से घर की दीवार का एक कोना अम्मा की उंगलियों से सजने लगता। पापा कहते..”देखो टेढ़ी न हो जाए लाइन!”  वे दोनों दीवार पर अपने भावों के साथ परिवार की सुखद कामना रचाते रहते। पापा मुग्ध होकर अम्मा की कलाकारी देखते थे। उनके चेहरे के प्रशंसित भाव देखकर हम लोग भी बहुत खुश होते थे। मेरी आर्ट तो इतनी खराब थी कि.. क्या कहें। अम्मा के पास बैठ जाएं तो वे कहें, “माता जी की चुनरी तुम भी रंग दो।”  मैं झिझक जाऊॅं तो वे कहें-“भगवान भावना देखते हैं बहू!” 

इतने वर्षों बाद भी पहले साल की वे अनमोल स्मृतियाॅं मन में जस की तस  सिमटी हैं। समय बीतता रहा..पापा के जाने से जो धक्का लगा वो अम्मा की बीमारी से और बढ़ गया। कल अम्मा बोल भी नहीं सकीं। जीवन का यह बदलाव अंतर्मन को अनदेखी पीड़ा से भरता जा रहा है। बार-बार मन करता है भगवान से कहें -” अम्मा को स्वस्थ कर दीजिए भगवन्!” 

रश्मि ‘लहर’