प्यासा कलश | नरेन्द्र सिंह बघेल | लघुकथा

यह जरूरी नहीं कि जो कलश भरा दिखाई देता हो प्यासा न हो । इस पीड़ा को कलश बनाने वाला सिर्फ कुम्हार ही समझ सकता है , इसीलिए वह ग्राहक को कलश बेचते समय कलश को ठोंक बजा कर इस आश्वासन से देता है कि इसका पानी ठंडा रहेगा ।सच बात यह है कि जब तक वह अपनी बाह्य परत से जलकण आँसू के रूप में निकालता है तब तक कलश का जल शीतल रहता है , यदि कलश से आंसू निकलने बंद हो जाएं तो फिर जल की शीतलता भी गायब हो जाती है । इसलिए तन को शीतल रखने के लिए आँसू निकलना भी जरूरी रहता है जो मानसिक विकार को तन से निकाल देते हैं ।कलश से आँसू निकलने का फार्मूला सिर्फ कुम्हार को ही पता है , वो कुम्हार जो सृष्टि का नियंता है । जो आँसू निकलते हैं उन्हें निकल जाने दें ये निकल कर तन को शीतल ही करेंगे । प्यासा कलश दूसरों की प्यास शीतल जल से जरूर बुझाता है पर खुद प्यासा रहकर लगातार आँसू ही बहाता रहता है । बेचारा प्यासा कलश ।
*** नरेन्द्र ****

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किराये का रिश्ता | रत्ना भदौरिया

दो दिन पहले फेसबुक पर एक लाईन पढ़ी ‘उसके साथ रिश्ता मेरा किराये के घर जैसा रहा, मैंने उससे सजाया तो बहुत लेकिन वो कभी मेरा न हुआ। अभी पढ़ ही रही थी कि दिमाग ने चलना शुरू कर दिया और चार साल पहले इन्हीं पंक्तियों में जुड़ी मेरी एक सहेली जो आज भी यही सोच के साथ जिंदगी काट रही है। जब तब मैं अपने गांव जाती हूं तो उससे जरुर मिलती हूं फिर वो घंटों बैठकर अपनी कहानी सुनाती है मुझे।

आज इस लाइन को पढ़ते ही एक बार फिर वो और उसकी कहानी याद आ गयी स्नातक की पढ़ाई के बाद उसने बी टी सी के लिए दाखिला लिया और मैं आगे की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद चली गई। बी टी सी करते करते उसे एक लड़के से प्यार हो गया। प्यार सिर्फ प्यार तक सीमित नहीं रहा बात शादी तक पहुंची। दोनों तैयार थे लेकिन जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया कि मेरी सहेली उमा के पापा की मृत्यु हो गई ‌। मृत्यु के अभी पन्द्रह दिन भी व्यतीत नहीं हुए कि उसके प्रेमी ने उससे शादी के लिए घर में बात करने कहा उसने कहा देखो प्यार जितना आपका जरुरी है उतना मेरा भी लेकिन अभी पापा को गये हुए पंद्रह दिन भी नहीं हुए और घर में कोई नहीं है मां को संभालने वाला उसने कहा ठीक है संभालो मां को अपनी उसी दिन से उसने राश्ता बदला और दूसरी लड़की से शादी कर ली। कई महीने बाद पता चला।ये तो आजकल शोसल मीडिया का शुक्र जो बात आयी गयी पता चल ही जाती है।

तब उसने पूछा कि आपने ऐसा क्यों किया ?प्रेमी का जवाब तो क्या करता उधर लड़की भी तुमसे सुंदर,पैसे भी अच्छे मिल रहे थे और तो और शादी भी जल्दी हो गयी ।इधर क्या ? पता नहीं कितने साल तुम अपनी मां को संभालती और बाप तो था नहीं मिलता भी क्या ?अच्छा जब प्रेम किया था तब ये चीजें नहीं देखी थी कि ये उमा खूबसूरत नहीं है और फिर शादी की बात की ही क्यों थी ?तब तुम्हारा बाप नौकरी करता था और न तुम्हारे ऊपर मां का बोझ ढोने की जिम्मेदारी थी। खूबसूरती में नौकरी का क्या लेना- देना उमा ने पूछा ?हो -हो कर हंसते हुए बोला तुम भी उमा कितनी भोली हो अरे नौकरी करता तो मोटी रकम तो देता कमसे कम तेरा बाप ?अच्छा !छोटा सा उत्तर देकर कुछ क्षण उमा चुप रही और फिर एक जोरदार थप्पड़ मारते हुए कहा आज बहुत खुश हूं इसलिए कि मुझे समझ आ गयी।

पापा के जाने से भी आज दुखी नहीं खुश हूं कि शायद वो नहीं जाते तो मैं प्यार में अंधी होकर क्या कर बैठती। अनुतरित, आश्चर्यचकित ज़रुर हूं लेकिन खुश हूं।कहते हुए वहीं लाईन गुनगुने लगी’उसके साथ मेरा रिश्ता किराये के घर जैसा रहा, मैंने उससे सजाया तो बहुत लेकिन वो कभी मेरा न हुआ।।

रत्ना भदौरिया रायबरेली उत्तर प्रदेश

लगभग एक वर्ष पहले मुझे एक अविस्मरणीय पुस्तक मिली-‘सदी की सबसे बड़ी तालाबंदी | लेखक -अवधेश सिंह जी की | रश्मि ‘लहर’

पुस्तक -‘सदी की सबसे बड़ी तालाबंदी’, लेखक -अवधेश सिंह
प्रथम संस्करण -२०२३
मूल्य -रूपये-२९५
प्रकाशक -ए.आर.पब्लिशिंग कंपनी
ISBN: 978-93-94165-02-1
पृष्ठ संख्या -112

लगभग एक वर्ष पहले मुझे एक अविस्मरणीय पुस्तक मिली-‘सदी की सबसे बड़ी तालाबंदी’, लेखक -अवधेश सिंह जी की। पुस्तक पढ़ने के मध्य कई बार अश्रुपूरित नेत्रों ने व्यवधान डाला। मैं कई बार फूट-फूट कर रोई भी। बहुत सोचा कि इस पुस्तक पर अपने विचार लिखूॅं, पर, खोये हुए अपनों की स्मृतियों के कारण मन सदैव हिम्मत हारता रहा। आज अपने को संयत कर अपने विचार व्यक्त कर रही हूॅं।

यदि हम ‘सदी की सबसे बड़ी तालाबंदी ‘ की बात करें तो यह पुस्तक कई मायनों में विशिष्ट है। इसमें प्रयुक्त आंकड़ें, उस समय की पारिवारिक स्थितियाॅं, समाज में फैलते स्वार्थ की कटुताऍं तथा व्यक्तिगत हित के भाव की सटीक अभिव्यक्ति इस पुस्तक को अन्य पुस्तकों से एकदम अलग कर देती है। मजे की बात यह है कि लेखक की शैली इतनी रोचक, तथ्यात्मक रूप से परिपक्व तथा सहज है कि पाठक पूरी पुस्तक तन्मयता से पढ़ता चला जाता है। देखा गया है कि कई बार आंकड़ों से जुड़ी पुस्तकें ऊब से भर देती हैं।

लेखक ने संपूर्ण विषय को अट्ठारह भागों में बाॅंट कर लिखा है। महामारी के दौर का आरंभ, चरम सीमा तथा भविष्य में उपजने वाले विभिन्न दुष्परिणामों से निपटने के प्रयासों की सार्थक पहल का भली प्रकार वर्णन किया है। यह पुस्तक अपने विषय-विभाजन के कारण बहुत व्यवस्थित ढंग से पाठकों के मन-मस्तिष्क को छू पाने में तथा प्रभावित कर पाने में पूर्णतया समर्थ रही है। एक उदाहरण देखिए –

९. कोरोना के असली योद्धा विषय के अंतर्गत जब पाठक यह पढ़ता है कि –

“तमाम सुरक्षा कवच से लैस एम्स में अभी तक 489 से अधिक स्वास्थ्यकर्मी कोरोना वायरस की चपेट मे आ गये हैं, जिनमें तीन की मौत डराने वाली है.. कमोबेश यही स्थिति पूरे देश की है, न तो कोरोना वायरस का कहर थमता दिख रहा है, और न कोरोना योद्धाओं का साहस।” यह पढ़कर मन उस विचित्र समय की याद करके चिंतित हो जाता है। लेखक ने जीवन के तथा समाज के हर रूप को शब्दों के माध्यम से चित्रित करने का सफल प्रयास किया है।

यहाॅं पर मैं बनार्ड शों के इस कथन को उद्धृत करना चाहूॅंगी-“विचारों के युद्ध में किताबें ही अस्त्र होती हैं।” इस पुस्तक को पढ़ते समय मुझे यह पंक्तियां एकदम सही प्रतीत हुईं। मुझे लगा कि दहशत भरे उस समय को जब भविष्य में कोई पढ़ना चाहेगा तो मददगारों के विभिन्न रूपों से भी रूबरू होगा तथा मानवीय सरोकारों के नकारात्मक एवं सकारात्मक पक्षों को भी समझेगा तथा उनसे भविष्य को सुरक्षित करने का विलक्षण ढंग सीखेगा।

किताब भले ही महामारी से जुड़ी है, परन्तु उसमें सिमटे मनोभाव पीढ़ियों को प्रभावित करने की अक्षुण्ण क्षमता रखते हैं। पुस्तक पढ़ते समय मुझे अब्राहिम लिंकन जी की यह पंक्तियाॅं याद आ गईं-“मैं यही कहूॅंगा कि, वही मेरा सबसे अच्छा दोस्त है, जो मुझे ऐसी किताब दे जो आज तक मैंने न पढ़ी हो।”
ऐसी महत्वपूर्ण पुस्तक सदियों तक अपनी महत्ता बनाए रखेगी ऐसा मेरा विश्वास है।

इसमें महामारी के समय संपूर्ण विश्व के क्रमानुसार आंकड़ों का यथार्थवादी आकलन किया गया है। मानवीय चेतना को झकझोरने वाले अनुभवों के साथ संदेश देने वाले कुछ वाक्य मन से विलग नहीं होते हैं।

पुस्तक में पृष्ठ संख्या 48 पर कोविड हाहाकार..में लिखित पंक्तियाॅं पढ़कर मन उद्वेलन से भर गया – राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कोविड-19 महामारी के दौरान एक लाख से अधिक बच्चों ने अपने माता-पिता में से एक या दोनों को खो दिया है। न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने राज्यों से सक्रिय कदम उठाने को कहा । अदालत ने कहा, “उन बच्चों की पहचान करें जिन्होंने दोनों या एक माता या पिता को खो दिया है, संकटग्रस्त बच्चों की जरूरतों का पता लगाने के लिए यह एक जरूरी प्रारंभिक बिंदु है।”

ऐसी तमाम बातें आम आदमी को पता ही नहीं हैं। पुस्तक पढ़कर यह भी स्पष्ट होता है कि सरकार किसी भी समस्या से निपटने की तैयारी भी करती है तथा हर ओर अपनी पैनी नज़र रखती है। भविष्य में आम जनता/छात्र-छात्राओं के लिए यह पुस्तक बहुत उपयोगी सिद्ध होगी। क्योंकि लेखक की खोजी दृष्टि से सरकार द्वारा किए कोई कार्य बच नहीं पाए हैं। अमूमन लोगों को इतनी जानकारी होती ही नहीं है कि सरकार या अदालत भी कुछ सहयोग करती है। पुस्तक के अंत में सिख गुरुद्वारा कमेटी, अरदास केन्द्रों तथा छोटी बड़ी व्यक्तिगत संस्थाओं द्वारा की गई मदद की चर्चा समाज के लिए बहुत उपयोगी है। मन यह सोचकर शांत हुआ कि इंसानियत अभी जिंदा है और आगे भी ज़िदा रहेगी। समाज इतना बुरा नहीं हुआ है जितनी बुराई होती है। मानव मानव की पीड़ा समझे तथा बाॅंटे यह किसी भी समाज के उत्थान का संकेत है।

अंत में मैं लेखक को धन्यवाद देना चाहूॅंगी कि उनके सफल तथा सजग प्रयासों के कारण एक सार्थक पुस्तक हम सबके समक्ष है। यदि बात त्रुटियों की करें तो मुझे पुस्तक में न तो कुछ अतिरिक्त लगा, न फर्जी लगा। वर्तनी का भी पूरा ध्यान रखा गया है। बहुत कम ऐसा होता है जबकि कोई पुस्तक इतने गंभीर विषय को समेटने के बावजूद रोचक बनी रहे। भविष्य में भी ऐसी पुस्तकें पढ़ने को मिलेंगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

मैं सफदर हाशमी साहब की इन पंक्तियों के साथ अपने विचारों को विराम देती हूॅं-
सफदर हाशमी कहते हैं-

किताबें करती हैं बातें
बीते ज़मानों की
दुनिया की, इंसानों की
आज की, कल की
एक-एक पल की
ख़ुशियों की, ग़मों की
फूलों की, बमों की
जीत की, हार की
प्यार की, मार की
क्या तुम नहीं सुनोगे
इन किताबों की बातें?
किताबें कुछ कहना चाहती हैं।
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं॥

रश्मि ‘लहर’
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
मोबाइल -9794473806

पराजित प्रतीक्षा | अनिल पाराशर ‘मासूम’

“अच्छा हुआ तूने किसी का तो फ़ोन उठाया। शायद अपने किसी दोस्त का ही उठाया होगा, नहीं तो अब तक सब कुछ राख हो गया होता। ये तुझे देखना चाहती थी, तुझे दिखना चाहती थी, पर तू हर फ़ोन काट रहा था। अफ़सोस! अब तू तो इसे देख सकता है, पर यह तुझे देख नहीं सकती। अगर तू फ़ोन उठा लेता, तो शायद ये नहीं जाती, रुक जाती।” महेंद्र नाथ जी ने अपने बेटे श्रीकांत के कंधे पर अपना हाथ रखते हुए कहा।

श्रीकांत यह भी नहीं कह सका कि मुझे बुलाया क्यों नहीं, क्योंकि रात को पार्टी में जाने के बाद उसने सभी घर वालों के फ़ोन उठाने बंद कर दिए थे। ऐसा पहली बार नहीं हुआ था, यह उसकी आदत थी। अब रात को जितनी पी हुई थी, सब उतर चुकी थी। मन में एक दुःख भी था, पर अब कुछ हो नहीं सकता था।

महेंद्र नाथ जी ने कविता के चेहरे से कपड़ा हटाते हुए कहा “कांत, एक बार देख ले और बता पहचानता है इसे?”

“आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? क्यों नहीं पहचानूँगा अपनी माँ को?” श्रीकांत ने आँसू पोंछते हुए कहा।

मैंने तो इस बात पर ध्यान नहीं दिया था, परंतु जाने से पहले कविता बोल रही थी “कांत को तीन दिन से नहीं देखा, तीन दिन से उसकी पार्टी चल ही रही है। एक बात सोचती हूँ कि जब वह यहाँ होता है तब उसके कमरे में जाकर उसे सोते हुए जरूर देखती हूँ और देखकर संतोष कर लेती हूँ। उसका चेहरा मुझे पूरा याद रहता है, हमेशा ही याद रहेगा। पर क्या वह मुझे देखकर पहचान लेगा? कई महीनों से उसने घर में रहते हुए भी नज़र भरके मुझे नहीं देखा है; जबकि पिछले कुछ महीनों में मैं उसकी चिंता में बहुत बदल गई हूँ। अगर मुझे कुछ हो जाए, तो मेरे चेहरे से कपड़ा हटाकर उसे बता ज़रूर देना कि ये तुम्हारी माँ थी, तब शायद वह पहचान जाए।”

श्रीकांत फूट-फूटकर रोने लगा। काँपती आवाज़ में कहने लगा- “पापा संस्कार कब करना है?”

“तूने दर्शन कर लिए और पहचान लिया माँ को, यही बहुत है। बहुत ख़ुश होगी वह, जहाँ भी होगी। रही बात संस्कार की, तो उसे तो तू रहने ही दे। तेरी शराब और तेरे दोस्त तेरा इंतिज़ार कर रहे होंगे, अब तू जा सकता है। संस्कार का काम मैं स्वयं देख लूँगा। तूने अक्सर अपनी माँ से कहा था “आपने मेरे लिए किया ही क्या है?”, तो आज तू भी बदला ले ले, आख़िरी ज़िम्मेदारी पूरी न करके।”

एक बात और कही थी कविता ने कि “कांत से कहना उसने मेरे घर पैदा होकर मुझे ज़िंदगी की सबसे बड़ी ख़ुशी दी थी। वही ख़ुशी मैं कांत को दूँगी उसके घर जन्म लेकर। मगर वह दुःख उसे कभी नहीं दूँगी, जो उसने जवान होकर मुझे दिए; बल्कि उसके सारे दुःख माँग लूँगी।” कहते-कहते महेंद्र नाथ जी की आँखें भीग गईं।

वे धीरे से बोले “बेटा अपने सफ़र पर निकल जा ताकि मैं भी कविता को उसके आख़िरी सफ़र पर ले चलूँ। अपना ख़याल रखना। एक बात और, मुझे लगता था कि जो शराब पीता है, शराब उसकी जान ले लेती है; मगर तेरी शराब ने कविता की जान ले ली। हो सके तो शराब छोड़ देना, तेरी माँ यही चाहती थी।”

आख़िरी बार श्रीकांत की तरफ पीठ करके महेंद्र नाथ बोले “जब मैं जाऊँगा तो कोशिश करूँगा तेरे किसी दोस्त को भी इस बात का पता ना चले। मैं आराम से जाना चाहूँगा और तेरे आराम में कभी खलल नहीं डालना चाहूँगा। हाँ! मगर मैं भूल नहीं सकूँगा कि तूने मेरी कविता को मुझसे छीन लिया। मैं तो ग़ुस्सा भी नहीं हो सकता तुझ पर; क्योंकि कविता ने कहा था “आप उसे कुछ कहना नहीं, आप के ग़ुस्सा करते ही वह अपना आपा खो देता है और उसकी तबियत ख़राब हो जाती है।”

तभी आवाजें गूँजने लगीं- “राम नाम सत्य है।”

श्रीकांत को लगा उसके दोनों पैरों में जैसे कीलें गड़ी हुईं थीं। न वो माँ के साथ चल सकता था, न ही अपनी दुनिया में लौट सकता था।

अवधी भाषा में लिखी मधुरस पंखुड़ियां साझा काव्य संग्रह पुस्तक का हुआ विमोचन

रायबरेली: अवधी भाषा में लिखी मधुरस पंखुड़ियां साझा काव्य संग्रह पुस्तक का हुआ विमोचन । अवधी भाषा अवध के क्षेत्र की भाषा है जिसे आगे बढ़ाने के लिए साहित्यकारों का एक समूह काम कर रहा है जिसका एक पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम रायबरेली में आयोजित हुआ l

अवधी मधुरस कला समन्वय समिति अमेठी के तत्वाधान में आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में भाषा सलाहकार डॉ संतलाल उपस्थित रहे संयुक्त रूप से प्रकाशित मधुरस पंखुड़ियां साझा काव्य संग्रह पुस्तक में अवधी भाषा में लिखी कविताओं को संकलित किया गया है l
कार्यक्रम में अनिल कुमार सिंह, शिव कुमार सिंह ‘शिव’ डॉ रामगोपाल जायसवाल, डॉ मनोज सिंह ,जितेंद्र सिंह और अंकित सैनी के साथ अवधी भाषा के प्रख्यात विद्वान इंद्रेश भदोरिया व हिंदी रचनाकार समूह के संस्थापक अभिमन्यु सिंह भी मौजूद रहे l

मुख्य अतिथि डॉक्टर संतलाल ने बताया कि अवधी भाषा का इतिहास रामायण काल से माना जाता है इसलिए यह पुरानी भाषाओं में गिनी जाती है भले ही शहर के लोग इसे बोलने में संकोच करते हैं लेकिन गांव क्षेत्र में आज भी यह भाषा प्रचलित है जिसे संकलित करके आगे बढ़ाने की आवश्यकता है l

बिहार में विद्या वाचस्पति सम्मान से सम्मानित हुए जिले के प्रख्यात अवधी विद्वान इंद्रेश भदौरिया

साहित्य के क्षेत्र में रायबरेली जिले का नाम भी स्वर्णिम अक्षर से लिखा जाता है वर्तमान में अवधी भाषा के प्रख्यात विद्वान इंद्रेश बहादुर सिंह भदौरिया को बिहार में वाचस्पति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है l

मूल रूप से हरचंदपुर क्षेत्र के निवासी इंद्रेश कुमार भदौरिया अवधी भाषा के प्रख्यात विद्वान हैं उनकी कई पुस्तक अब तक प्रकाशित हो चुकी है कई बड़े-बड़े मंचों पर अपना लोहा अवधि भाषा के क्षेत्र में मनवा चुके इंद्रेश कुमार भदौरिया को बिहार प्रदेश में विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ विश्वविद्यालय के तत्वाधान में आयोजित एक मंड सम्मान कार्यक्रम में विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया गया है l

इंद्रेश कुमार भदौरिया की कई पुस्तक ऐसी है जिन पर विशेष रूप से शोध भी हो रहा है क्योंकि उन्होंने अवधी भाषा को एक स्थान दिलाने के लिए प्रयास किया है l

पुरस्कार प्राप्त करने वाले इंद्रेश कुमार भदौरिया का कहना है कि जिस तरह भोजपुरी अब बुंदेली भाषा को महत्व दिया जाता है वैसे ही अवधी भाषा को भी महत्व देना चाहिए क्योंकि यह मीठी भाषा अवध क्षेत्र के गांव में बोली जाती है लेकिन शहर के लोग इसे बोलने में संकोच करते हैं जबकि घर के अंदर इसी भाषा का उपयोग आपस में बात करने के लिए किया जाता है तो क्यों ना इस भाषा को प्रचारित और प्रसारित करके सामाजिक जीवन में भी बोलने के लिए प्रयोग किया जाए l

वाचस्पति पुरस्कार से सम्मानित होने पर जिले के साहित्यकार भाषा सलाहकार डॉ संतलाल, पुष्पा श्रीवास्तव शैली, अशोक कुमार, डॉक्टर प्रियंका, रत्ना भदौरिया और कल्पना अवस्थी ने इंद्रेश भदौरिया को शुभकामनाएं दी है l

अमर शहीद जोधा सिंह अटैया : सत्तावनी क्रांति के अग्रदूत, जो 51 क्रान्तिकारियों संग एक साथ फांसी पर झूल गए

भारत प्राचीन काल से ही संपदा संपन्न, सुखी व समृद्ध रहा है। अखिल विश्व में भारतवर्ष की अलग पहचान सदियों से रही है। जल-थल-नभ में बहुमूल्य खनिज सम्पदा, औषधियां, हीरा जवाहरात आदि उत्पन्न होते थे। शायद इसीलिये भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था, किन्तु अनेक विदेशी आक्रांताओं ने कई बार भारत की अस्मिता पर हमला किया। पराधीनता की अंतिम दास्ताँ को भी समाप्त करने की शुरुआत सन् 1857 से पहले हो चुकी थी। उसके बाद सम्पूर्ण भारत में एक स्वर में सन् 1857 में जंग-ए-आजादी का परवान चढने लगी थी। तब अनेक क्रांतिकारियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हुए भारत माता की रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर कर दिया।

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ऐसे ही फतेहपुर के क्रांतिकारी अमर शहीद जोधा सिंह अटैया थे। जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर अंग्रेजों से अपनी रियासत मुक्त कराई थी।
जोधा सिंह अटैया का जन्म उत्तर प्रदेश सूबे के फतेहपुर जनपद में बिंदकी के निकट रसूलपुर पंधारा में हुआ था।
शहीद जोधा सिंह के नाम के साथ जुडे ‘अटैया’ शब्द की भी अपनी अलग कहानी है। अटैया शब्द इक्ष्वाकु वंश से संबंधित है, जिसके अन्तर्गत ‘गौतम’ गोत्र वाले क्षत्रिय आते हैं। गौतम वंशीय क्षत्रिय उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान में अधिक संख्या में निवास करते हैं। ये लोग ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, राष्ट्रप्रेमी, हृदय के साफ और दुश्मनों से बदला लेने में भी माहिर होते हैं।
भगवान गौतम बुद्ध (सिद्धार्थ) के कहने पर गुरु शालण्य ने कपिलवस्तु से अलग राज्य स्थापित करने के लिए गौतम वंश की नींव डाली थी। ‘गौतम’ शब्द संस्कृत में गो + तम से बना है। इसलिए गौतम का अर्थ अंधकार को आध्यात्मिक ज्ञान से दूर करने वाला अर्थात ‘उज्जवल प्रकाश’ होता है।
कहा जाता है कि गौतम बुद्ध के वंशज फ़तेहपुर के शासक हरि वरण सिंह अटैया थे, जिन्होंने मुगलों से कई बार युद्ध करके उन्हें पराजित किया था। राजा हरि वरण सिंह के वंशज ही राजा जोधा सिंह अटैया थे।
इतिहासकार श्री शिव सिंह चौहान ने अपनी पुस्तक “अर्गल राज्य का इतिहास” में लिखा था कि फ़तेहपुर परिक्षेत्र इलाहाबाद (प्रयागराज) रेजीडेंसी के अन्तर्गत आता था, जिसे पश्चिमी इलाहाबाद और पूर्वी कानपुर के नाम से संबोधित किया जाता था। मुगलकाल का अंतिम दौर और ब्रिटिश काल का प्रारंभिक समय तक फ़तेहपुर नाम का कोई अस्तित्व नहीं था। कालांतर में अंग्रेजों ने यथाशीघ्र अपने साम्राज्य का विस्तार करने के उद्देश्य से सन् 1826 में फ़तेहपुर जनपद का गठन किया था।
भारत की दो पवित्र नदियाँ माँ गंगा (सुरसरि) और यमुना (कालिंदी) के मध्य फ़तेहपुर जनपद में स्थित हैं। फतेहपुर जनपद के उत्तर में गंगा और दक्षिण में यमुना के हजारों वर्षों से अनवरत कल-कल की मधुर ध्वनि के साथ बहती हुई प्रतिदिन लाखों लोगों को जीवन दान देती हैं।
अमर शहीद ठाकुर जोधा सिंह का जन्म फ़तेहपुर से दक्षिण-पश्चिम में स्थित बिंदकी के समीप रिसालपुर के राजवाड़ा परिवार में हुआ था।
फ़तेहपुर छावनी में हमेशा भारी मात्रा में गोला बारूद का जखीरा रहता था। मातादीन वाल्मीकि ने जब शहीद मंगल पाण्डेय का जातिवाद के तंज पर आक्रोशित होकर कहा कि सुअर और गाय की चर्बी लगी करतूस मुँह से खींचते हो, तब तुम्हारी पंडिताआई कहाँ चली जाती है। इतना सुनते ही मानो अमर शहीद मंगल पाण्डेय के चक्षु खुल गए हों। मंगल पाण्डेय ने पश्चिम बंगाल स्थित बैरकपुर में 10 मार्च सन् 1857 को बगावत करते हुए ब्रिटिश अधिकारी मेजर ह्यूसन को गोली मार दी। उसके बाद 10 मई सन् 1857 को मेरठ में पूर्ण रूप से क्रांति की चिंगारी भड़की थी। यह क्रान्ति की चिंगारी ही नहीं, भारतीयों को आजादी पाने और भारत के उद्धार की लौ थी। यही चिंगारी ठीक एक माह बाद 10 जून को फ़तेहपुर में आग का गोला बनकर भड़क उठी थी। फ़तेहपुर के राजा ठाकुर जोधा सिंह पहले से ही सतर्क और घात लगाये बैठे थे कि यथाशीघ्र फिरंगियों पर हमला किया जा सके। इसलिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार की नीतियों के खिलाफ अपने नज़दीकी नाना साहब सहमति पाकर फिरंगियों के ख़िलाफ़ फतेहपुर में जंग-ए-आजादी का आगाज़ कर दिया।
फ़तेहपुर के तत्कालीन कलेक्टर हिकमतुल्ला कहने को तो ब्रिटिश सरकार के नौकर थे, लेकिन उनका रक्त सच्चा हिंदुस्तानी था। इसलिए कलेक्टर ने क्रांतिकारियों का हर कदम पर सहयोग किया। उनके सहयोग से क्रांतिकारियों ने कचहरी परिसर में झंडा फहरा दिया। फ़तेहपुर की आज़ादी की घोषणा होते ही कलेक्टर हिकमतुल्ला को चकलेदार/ रिसालेदार नियुक्त कर दिया था। ‘चकलेदार’ का अर्थ- ‘कर Tax वसूलने वाला अधिकारी’ होता है। फ़तेहपुर की आज़ादी की घोषणा का स्वर लंदन पर जाकर सुनाई दिया था। तब फिरंगी इनसे भयभीत हो गए थे।
सन 1857 के गदर में शहीद जोधा सिंह का नाम कुशल रणनीतिकारों की श्रेणी में अग्रणी रहता था। अपनी रणनीति के तहत जोधा सिंह अटैया ने अवध और बुन्देलखण्ड के क्रान्तिकारी राजाओं से बेहतर ताल मेल बैठाया। सभी रियासतों के राजाओं और क्रान्तिकारियों ने एक साथ मिलकर उचित अवसर देखकर धीरे-धीरे सम्पूर्ण भारत में फिरंगियों और उनकी दमनकारी नीतियों के खिलाफ संग्राम छेड़ दिया था।
अंग्रेज सैनिक अपने गुप्तचरों के साथ मिलकर, जोधा सिंह अटैया को खोज रहे थे। इस बीच जोधा सिंह को अपने गुप्तचरों से जानकारी हुई कि अंग्रेज सिपाही दरोगा दीवान आदि महमूद पुर गाँव में डेरा डाल चुके हैं। तब जोधा सिंह अटैया और उनके क्रांतिकारी साथियों ने गाँव में घुसकर 27 अक्तूबर सन् 1857 को सभी अंग्रेजों को एक घर में कैद करके आग के हवाले कर दिया। कई अंग्रेज सैनिकों की आग से जलकर मृत्यु हो गई थी। जोधा सिंह को पता चला की एक स्थानीय गद्दार रानीपुर पुलिस चौकी में छिपा है। जोधा सिंह ने साथियों को 7 दिसम्बर सन् 1857 को नाव से गंगा पार भेज कर देशद्रोही गद्दार को भी मरवा दिया था। अब तो अंग्रेजों में दशहत बढ़ती ही जा रही गई थी। अंग्रेज अधिकारी भी ठाकुर जोधा सिंह का नाम सुनते ही थर-थर काँपने लगे थे।
लंदन की अंग्रेज सरकार ने कर्नल पॉवेल को फतेहपुर का दमन करने के लिए भेजा। कर्नल पॉवेल ने जोश के साथ अपने सैनिकों को ठाकुर जोधा सिंह अटैया और उनकी सेना पर हमला करने के लिए भेजा। किन्तु अंग्रेज सैनिकों को उल्टे पैर भागने को मजबूर होना पड़ा। तब कर्नल पॉवेल आग बबुला हो गए। जोधा सिंह अटैया ने अवसर मिलते ही कर्नल पॉवेल को भी घेर कर सिर को धड़ से अलग करके मार डाला। भारत में चारों तरफ फ़तेहपुर की क्रांति की चर्चा हो रही थी। लंदन का सिंहासन भी डोलने लगा था।
अंग्रेज गवर्नर ने अब अत्यंत क्रूर कर्नल नील को फ़तेहपुर की क्रांति का दमन करने के लिए भेजा। कर्नल नील ने अपनी भारी मात्रा में सेना को फ़तेहपुर में जोधा सिंह व उनका रजवाड़ा को तहस-नहस करने का आदेश जारी किया। कर्नल नील बेकसूर लोगों को भी बहुत प्रताड़ित कर रहा था। क्रांतिकारियों को तो तत्काल मार देता था। इस प्रकार जोधा सिंह अटैया की सेना कमजोर पढ़ने लगी थी, लेकिन हौसला और उत्साह दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था।
गोरिल्ला युद्ध में निपुण जोधा सिंह अटैया ने नए सिरे से पुराने सैनिकों के साथ ही युवाओं को भी क्रांतिकारी, देशप्रेमी के रूप में प्रशिक्षण देकर फिर से नई फ़ौज तैयार किया। उसके बाद जोधा सिंह अटैया ने अपना गुप्त स्थान फ़तेहपुर से स्थानांतरित करते हुए खजुहा बना लिया था। खजुहा में जोधा सिंह का गोपनीय स्थान अंग्रेज नहीं जानते थे। किंतु स्थानीय देशद्रोही ने लालचवश क्रांतिकारी जोधा सिंह अटैया का गोपनीय ठिकाना अंग्रेजों को बता दिया। देशद्रोही की मुखबरी के कारण कर्नल नील ने अपनी घुड़सवार सेना के साथ घोरहा गांव के पास जोधा सिंह अटैया व उनके 51 साथियों को चारों तरफ से गिरफ़्तार कर लिया था।
28 अप्रैल सन 1858 का वह मनहूस दिन था, जब अंग्रेजों ने बिना किसी अदालत की सुनवाई के ही जोधा सिंह अटैया समेत बावन साथियों को बिंदकी के निकट मुगल रोड पर खजुहा ग्राम स्थित इमली के पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दिया था। फांसी देने के बाद कर्नल नील ने आस-पास के गाँव में मुनादी करवा दी कि, जो व्यक्ति इन शवों को नीचे उतारेगा, उन्हें भी फांसी दे दी जाएगी। लगभग 18 दिन तक शव पेड़ पर लटके रहे और चील कौवा माँस नोच-नोच कर खाते रहे। आज इस पावन धरा को बावनी इमली के नाम से जाना जाता है।
महाराज राजा भवानी सिंह ने भारी तादाद में अपने सैनिकों के साथ 4 जून सन् 1858 की रात में सभी शवों को नीचे उतार कर शिवराजपुर स्थित गंगा तट पर अंतिम संस्कार किया था।
शिवराजपुर में भगवान श्री कृष्ण का प्राचीन मंदिर है। जिसे मेवाड़ राज्य के राजा भोजराज सिंह की पत्नी, कृष्ण भक्त मीराबाई ने स्थापित किया था।
फ़तेहपुर जनपद में खजुहा का भी अपना अलग पौराणिक व ऐतिहासिक महत्व है। खजुहा को ‘छोटी काशी’ कहा जाता है। इस छोटे से कस्बे में लगभग 118 शिव मंदिर है। औरंगजेब के समय की मुगल रोड आज भी है। कहा जाता है कि दशहरा का दिन यहां पर रावण को जलाया नहीं जाता, बल्कि उनकी पूजा होती है। दशहरा में मेला लगता है। 52 क्रान्तिकारियों के शहादत की अंतिम विदाई देने वाला मूक गवाह इमली का पेड़ आज भी सुरक्षित और संरक्षित है। जिसमें 28 अप्रैल सन 1858 को 52 क्रान्तिकारी परवाने भारत माँ की रक्षा करते हुए फांसी पर झूल गए थे।
खजुहा ग्राम को भी अब बावनी ‘इमली’ ग्राम से जाना जाता है। ‘बावनी इमली’ स्थल पर शहीद स्मारक बना हुआ है, जहाँ पर प्रतिवर्ष 28 अप्रैल को शहीदों की स्मृतियों को जीवन्त रखने के लिए अनेक साँस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। मेला जैसा उत्सव मनाया जाता है।

डॉ अशोक कुमार गौतम
असिस्टेन्ट प्रोफेसर, लेखक, सम्पादक
शिवा जी नगर, दूरभाष नगर, रायबरेली UP
मो. 9415951459

सविता चड्ढा द्वारा लिखी पुस्तक”हिंदी पत्रकारिता भूमिका और समीक्षा” का लोकार्पण और उनकी कहानियों पर चर्चा संपन्न

New Delhi: “हिंदी पत्रकारिता भूमिका एवं समीक्षा’ का लोकार्पण पंजाब केसरी की चेयरपर्सन श्रीमती किरण चोपड़ा,श्री अनिल जोशी, श्री ऋषि कुमार शर्मा ,डाॅ. मुक्ता, ओमप्रकाश प्रजापति एवं मनमोहन शर्मा जी के कर कमलों से संपन्न हुआ। लेखिका सविता चड्ढा ने उपस्थित सभी माननीय अतिथियों का हार्दिक अभिनंदन और स्वागत करते हुए कहा कि उनका लेखन अपने पाठकों और शुभचिंतकों शुभकामनाओं और आशीर्वाद से ही संभव हो पता है । उन्होंने अपने प्रकाशकों का भी आभार व्यक्त किया सदैव उनकी पुस्तकें प्रकाशित करने के लिए तत्पर रहते हैं।

पंजाब केसरी की चेयरपर्सन और वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब की संस्थापिका ने लेखिका के लेखन की भरपूर सराहना की। उनके द्वारा लिखी गई साहित्य के विभिन्न विधाओं की पुस्तकों का उल्लेख करते हुए आज लोकार्पित हिंदी पत्रकारिता भूमिका और समीक्षा पुस्तक की विशेष रूप से सराहना की।
श्री अनिल जोशी ने भी इस अवसर पर अपनी शुभकामनाएं लेखिका को देते हुए उनके बहुआयामी व्यक्तित्व पर चर्चा करते हुए उनके द्वारा लिखी गई विभिन्न कृतियों की चर्चा की और उनके साहित्यिक सफर का उल्लेख करते हुए उन्हें शुभकामनाएं प्रदान की ।

हिंदी अकादमी के उप सचिव श्री ऋषि कुमार शर्मा ने कहा “
सविता चड्ढा जी ने विभिन्न विषयों पर अपनी लेखनी चलाई है। इनका कहानी संग्रह “नारी अंतर्वेदना की कहानियाँ ” में एक सशक्त नारी का आधुनिक रूप निखर कर आया है। ये कहानियाँ कालजयी है जो समाज की समस्या के ऊपर दृष्टिपात करके उनका समाधान भी देती हुई चलती है । समाज, परिवार और पाठकों के द्वारा इन कहानियों का पढ़ा जाना आवश्यक है। ये कहानियाँ हिंदी साहित्य की धरोहर हैं। इस संग्रह की कुछ कहानियाँ मेरी साहित्य की समझ का विकास करती हैं।”
इस अवसर पर डॉक्टर मुक्ता, डाॅ, ओमप्रकाश प्रजापति, श्री मनमोहन शर्मा जी ने लेखिका के साहित्यिक सफर का उल्लेख करते हुए उनकी प्रकाशित विभिन्न पुस्तकों का उल्लेख किया और आज की पुस्तक “हिंदी पत्रकारिता: भूमिका और समीक्षा” को पत्रकारों के लिए और लेखकों के लिए बहुत उपयोगी बताया ।

” नारी अस्मिता व अंतरवेदना की कहानियां” संग्रह पर चर्चा के प्रारंभ में मंच संचालन करते हुए डॉ. कल्पना पांडेय ‘नवग्रह’ ने कहा ” सविता चड्ढा की कहानियाँ नारी सशक्तिकरण के लिए अंतरात्मा से उठी हुई वो आवाज़ है जो न केवल एक दूरदृष्टि देती है बल्कि संवेदनाओं के तार भी झंकृत करती है। दिशा देती , ख़ुद से पहचान कराती भावपूर्ण कहानियाँ।”
डॉ पुष्पा सिंह बिसेन ने कहा सविता चड्ढा की शख्सियत, व्यक्तित्व और कृतित्व बहुत विशाल है। उन्होंने सभा को सूचित किया कि वह सविता चड्ढा के संपूर्ण व्यक्तित्व पर पर एक खंडकाव्य लिख रही है । इस सुखद सूचना को सुनकर सभी ने कर्तल ध्वनि से उनके निर्णय का स्वागत किया ।
उमंग सरीन ने संग्रह की तीन चार कहानियों का उल्लेख किया । उन्होंने कहानी “बिब्बो”, “दिल्ली में भी है” और “फिलिपिनो” पर अपने विचार प्रकट किये।
“शकुंतला मित्तल ने कहानियों पर बोलते हुए कहा “नारी अन्तर्वेदना की कहानियाँ” वेदना,और पीड़ा को झेलते हुए भी स्वाभिमान रख कर संघर्ष करती उन नारियों की कहानियां हैं,जो संघर्ष में ही समाधान खोज अपना जीवन मार्ग तलाशती हैं।
पात्रों के चरित्र को समझ उसके मनोविज्ञान को गढ़ने में कुशल डॉ सविता चड्डा जी बोल्ड कथ्य को मर्यादित और सधी भाषा में मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति देने में पूर्णतया सक्षम हैं, इसलिए इनका पाठकों पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है।

इस अवसर पर पुस्तक पर बोलते हुए डॉक्टर कविता मल्होत्रा ने कहा “सविता जी की कहानियां महिला सशक्तिकरण का सकारात्मक पक्ष उजागर करती हैं।सविता जी का कहना है कि यदि महिलाएँ स्वंय अपना आत्म निरीक्षण करना शुरू कर दें तो उनकी हर समस्या का समाधान हो सकता है, क्यूँकि महिलाओं की अस्मिता पर होने वाले सामाजिक प्रहारों को कोई एन. जी. ओ.,कोई प्रशासन या कोई सरकार नहीं रोक सकती, इसलिए सभी महिलाओं को स्वाभिमानी और स्वंयसिद्धा होने का संदेश देती सविता जी की हर कहानी प्रणम्य है।सविता जी को उनकी कृतियों के विमोचन की हार्दिक बधाई।”
श्री अमोद कुमार ने कहा “सविता जी ने जहाँ नारी के भिन्न रिश्तों मे हो रहे उत्पीड़न और उसके अंर्तमन की वेदना को अपनी कहानियों मे उजागर किया है वहीं नारी को संघर्षशील होकर अपने पैरों पर खड़े होकर स्वाभिमान का जीवन जीने की प्रेरणा भी दी है।

डाॅ. शुभ्रा अपनी लिखित एक विस्तृत समीक्षा लेखिका को प्रदान की और कुछ कहानियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने संग्रह की कहानियों को पतठनीय और समाजोप योगी बताया।
शारदा मित्र और आमोद कुमार ने कहानियों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए सविता चड्ढा की कहानियों को समाजोपयोगी बताया और इसमें नारी चेतना के विभिन्न स्वरों को प्रस्तुत करते हुए संग्रह की सभी कहानियों व्याख्या प्रस्तुत की ।
श्रीमती सरोज शर्मा, श्रीमती प्रमिला भारती , शारदा मित्तल , डॉ कविता मल्होत्रा , श्री राजेंद्र नटखट,अंजू क्वात्रा, कुमार सुबोध ने लेखिका को अपनी शुभकामनाएं और बधाई दी, वहीं पधारी रंजना मजूमदार ने सविता चड्डा की एक खूबसूरत ग़ज़ल को स्वर देखकर सभी को मंत्र मुग्ध कर दिया।

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साबुन की बट्टी | रत्ना भदौरिया | Hindi Short Story

इन दिनों अक्सर कमरे के सामने माल और वहां पर जीनों पर काफी बैठने की जगह होने की वजह से मैं भी जाकर बैठ जाती हूं। जिस दिन काम कम होता है उस दिन चार बजे से लेकर रात आठ नौ तक बैठी रहती हूं,जिस दिन काम ज्यादा होता है उस दिन थोड़ी देर ही बैठ पाती हूं लेकिन बैठती जरुर हूं। एक व्यक्ति रोज हाथ फैलाये इसी वक्त मिल ही जाता है मैं भी ज्यादा नहीं लेकिन पांच रुपए वाला बिस्किट का पैकेट जरूर थमा देती हूं। वो खुशी -खुशी ले भी लेता है।

आज उसने मुझसे कहा -मैडम बिस्किट नहीं आज साबुन की एक बट्टी दे दीजिए या फिर दस रुपए। आज साबुन क्यों ? गर्मी हो‌ रही है न मैडम बदबू आने पर लोग भीख भी नहीं देंगे। अरे आजकल तो इलेक्शन चल रहे हैं आजकल महकने की नहीं वोट की जरूरत है। वोट देने पर पेंट भर राशन मिल जायेगा। क्या बात करती है मैडम आप भी ? पेट भर राशन मिल जाता तो धक्के क्यों खाता और पांच किलो में भला महीना कैसे पूरा होगा ?आप ही बताओ न मैडम ! अच्छा ये बताओ तुम्हें देखती हूं तुम हर दिन सुबह शाम भीख क्यों मांगते हो ?पूरा दिन क्यों नहीं मांगते ? और यदि नहीं तो कोई काम क्यों नहीं करते ?अभी तो तुम्हारी उम्र काम लायक अच्छी खासी है ।

मैंने उससे यह सवाल इसलिए पूछा क्योंकि अक्सर आते जाते बाकी समय उसे सड़क किनारे सोते देखा है। मैडम काम मुझे कैसे मिलेगा ?मेरे से ज्यादा पढ़े लिखे मुझसे ज्यादा जवान लड़के लड़कियां बेरोजगार सड़कों पर घूम रहे हैं उन्हें ही भला काम मिल जाये ,उनके पास रोजगार होगा तो पेट मेरा भर ही जायेगा। ये कहते हुए व्यक्ति मुस्कुराते हुए वहां से चल पड़ा —-! अरे -अरे साबुन की बट्टी तो लेते जाइये मैं कहती रही वो वहां से चला गया —–?

रत्ना भदौरिया रायबरेली उत्तर प्रदेश

अंतिम मुगल सम्राट : बहादुर शाह जफर, जिनको भोजन में फिरंगियों ने बेटों के सिर परोसा

भारत में सत्तावनी स्वाधीनता संग्राम की क्रांति में किसी क्षेत्र या धर्म विशेष के लोगों ने अपनी कुर्बानियां नहीं दी, अपितु संपूर्ण भारत के सभी धर्म व सभी जातियों के लोगों ने खुशी-खुशी अपने प्राणों को निछावर कर दिया था। तत्कालीन परिस्थितियों में न हिंदू, न मुसलमान, न सिक्ख। स्वाधीनता संग्राम में जो भी शामिल था, वह सिर्फ सच्चा हिन्दुस्तानी, देश प्रेमी और भारत माता का रखवाला था। फिरंगियों ने भारतीयों पर जबरन अत्याचार, शोषण शुरू कर दिया। बच्चे औरतें भी अंग्रेजों के शोषण से बच नहीं सकी। फिर भी भारतीय वीर सपूत लड़ते रहे, तब अंत में भारत स्वतंत्र हुआ।
ऐसे ही वीर सपूत बहादुर शाह ज़फ़र थे।
बहादुर शाह ज़फ़र का जन्म 24 अक्टूबर सन 1775 में पुरानी दिल्ली में हुआ था। पिता का नाम मुगल सम्राट अकबर शाह द्वितीय और माता का नाम लालबाई था। जिन्होंने दिल्ली में कुशल शासक की भूमिका निभाते हुए होनहार बालक को जन्म दिया था। आप मशहूर शायर और मुगलकालीन शासन के अंतिम सम्राट थे। मुगल सम्राट अकबर शाह द्वितीय की मृत्यु के बाद 29 सितंबर सन 1837 को बहादुर शाह जफर ने दिल्ली के सिंहासन पर विराजमान होकर भारत पर शासन करना प्रारंभ किया। जिसके साथ ही भारत से फिरंगियों को खदेड़ना आपका मुख्य उद्देश्य बन चुका था। आपने अंग्रेजों के खिलाफ जंग-ए -आजादी का ऐलान कर दिया। स्वाधीनता संग्राम में मुगल मुगल शासक जफर ने भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व करते हुए 1857 का विद्रोह शुरू कर दिया और स्वयं भी जंग के मैदान में कूद पड़े। इस महासंग्राम को सिपाही विद्रोह, भारतीय विद्रोह आदि की संज्ञा दी गई थी। बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में सशस्त्र सिपाहियों का अंग्रेजों के विरुद्ध 2 वर्ष युद्ध चला। विद्रोह का श्रीगणेश ब्रिटिश सरकार की छोटी-छोटी छावनियों से प्रारंभ हुआ था। बहादुर शाह जफर की सेना छावनियों में गोलाबारी करके ब्रिटिश हुकूमत को तहस नहस करने में लगी थी। ऐसे समय में मंगल पांडेय ने शूद्र सफाईकर्मी गंगू मेहतर द्वारा की गई यथार्थवादी तल्ख टिप्पणी सुनकर मेरठ छावनी के विद्रोह की लौ जलाई थी, जो संपूर्ण भारत में धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी। ब्रिटिश सरकार में मंगल पांडेय सिपाही और गंगू मेहतर जमादार के पद पर कार्यरत थे।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, मशहूर सूफी विद्वान फजले हक खैराबादी ने दिल्ली स्थित भारत की सबसे बड़ी जामा मस्जिद से अंग्रेजों के विरुद्ध फतवा जारी कर दिया और इस फतवे को अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद का रूप दे दिया था। अब फिरंगियों में भय का माहौल था। अपनी कुर्सी डगमाती देख अंग्रेजों ने हजारों भारतीय उलेमाओं को सरेआम पेड़ों से लटका कर फांसी दे दी। इतना ही नहीं, अंग्रेजों ने अनेक वीर सपूतों को तोपों से भी उड़वा दिया, तो हजारों भारतीयों को काला पानी की आजीवन सजा भी दी। इस प्रकार अंग्रेजों का जुल्म और सितम बढ़ता गया है। फजले हक खैराबादी से अंग्रेज बहुत घबराते थे, इसलिए उन्हें रंगून (म्यांमार) में काला पानी की सजा देने के बावजूद भी मृत्युदंड दिया था।
यह क्रूरता अंग्रेजों पर ही भारी पड़ती जा रही थी। सम्राट बहादुर शाह जफर किसी भी कीमत पर पीछे हटने को तैयार न थे। अंग्रेजो ने कई संधि प्रस्ताव जफर के पास भेजा, किंतु सच्चे हिंदुस्तानी राष्ट्र प्रेमी जफर ने अंग्रेजों के सामने नतमस्तक होना कबूल नहीं किया, बल्कि फिरंगियों के खिलाफ और अधिक मुखर हो गए। तब फिरंगियों ने हजारों मुसलमानों को दिल्ली के लाल किला गेट पर गोली मार दी, सैकड़ो लोगों को वहीं पर फांसी भी दे दी। हजारों भारतीयों के बहते लहू का गवाह दिल्ली स्थित लाल किला के एक विशाल दरवाजे को आज भी ‘खूनी दरवाजा’ नाम से जाना जाता है। कुछ समय बाद लखनऊ में भी बेगम हजरत महल ने अंग्रेजों के विरुद्ध बिगुल फूंक दिया था।
डरे सहमे अंग्रेजों ने भारत में हर ‘तरफ फूट डालो, राज करो’ एवं छल-कपट की कूटनीति भी जारी रखी। ब्रिटिश सरकार का मेजर हडसन दिल्ली में ही उर्दू भाषा भी सीख रहा था। एक दिन मेजर हडसन को मुन्शी जब अली और मिर्जा इलाही बख्श से खुफिया जानकारी प्राप्त हुई कि बहादुर शाह जफर अपने दो पुत्रों मिर्जा मुगल व खिजर एवं पोता अबूबकर सुल्तान के साथ पुरानी दिल्ली स्थित हुमायूं का मकबरा में छिपे हैं। वहां मेजर हडसन ने पहुंचकर जफर को गिरफ्तार कर लिया था | क्योंकि बहादुर शाह जफर के दोनों पुत्रों और पोते ने अंग्रेजो के बीवी बच्चों का कत्ल करने मे हिस्सा लिया था| बहादुर शाह जफर और अन्य टीमों को गिरफ्तार करने के बाद मेजर हडसन ने शायराना अंदाज में कहा कि-
“दमदम में दम नहीं है, खैर मांगो जान की। ऐ जफर ठंडी हुई अब, तेग हिंदुस्तान की।।”
सम्राट, शायर बहादुर शाह ज़फ़र ने मेजर हडसन की इस बात पर क्रोधित होकर बुलंद आवाज में फिरंगियों को उत्तर देते हुए कहा–
“गाजियो में बू रहेगी, जब तलक ईमान की, तख्त-ए-लंदन तक, चलेगी तेग हिंदुस्तान की।।”
बाद में स्वाधीनता संग्राम के युद्ध में अंग्रेजों से बहादुर शाह जफर को पराजय का सामना करना पड़ा। अंग्रेजों ने बहादुर शाह जफर व उनके पुत्रों को गिरफ्तार कर लिया। पुत्रों को दिल्ली में फांसी दे दी गई और जफर को म्यांमार स्थित रंगून में काला पानी की आजीवन सजा दी और वहीं 7 नवंबर सन 1862 में बहादुर शाह जफर की मृत्यु हो गई।
कहा जाता है अंग्रेज कितने कितने निर्दयी थे, इसका अंदाजा लगाने मात्र से ही भारतीयों की रूह कांप उठेगी। जब बहादुर शाह जफर और उनके दोनों पुत्रों को दिल्ली हुमायूं का मकबरा में गिरफ्तार किया गया, तो पुत्रों को पहले फांसी दे दी गई। बहादुर शाह जफर कई दिनों से भूखे प्यासे थे, उन्होंने भोजन मांगा तब क्रूर अंग्रेजों ने जफर के सामने थाली में उनके पुत्रों का सिर परोस कर दिया। सोचों उस पिता के दिल पर क्या बीती होगी। उसके बाद भी बहादुर शाह जफर ने पराधीनता स्वीकार नहीं की। सच्चे हिंदुस्तानी का धर्म निभाते हुए भारत माता की रक्षा के लिए शहीद हो गए।

अशोक कुमार गौतम
असिस्टेंट प्रोफेसर, साहित्यकार,
रायबरेली यूपी
मो० 9415951459