अमर शहीद जोधा सिंह अटैया : सत्तावनी क्रांति के अग्रदूत, जो 51 क्रान्तिकारियों संग एक साथ फांसी पर झूल गए

भारत प्राचीन काल से ही संपदा संपन्न, सुखी व समृद्ध रहा है। अखिल विश्व में भारतवर्ष की अलग पहचान सदियों से रही है। जल-थल-नभ में बहुमूल्य खनिज सम्पदा, औषधियां, हीरा जवाहरात आदि उत्पन्न होते थे। शायद इसीलिये भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था, किन्तु अनेक विदेशी आक्रांताओं ने कई बार भारत की अस्मिता पर हमला किया। पराधीनता की अंतिम दास्ताँ को भी समाप्त करने की शुरुआत सन् 1857 से पहले हो चुकी थी। उसके बाद सम्पूर्ण भारत में एक स्वर में सन् 1857 में जंग-ए-आजादी का परवान चढने लगी थी। तब अनेक क्रांतिकारियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हुए भारत माता की रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर कर दिया।

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ऐसे ही फतेहपुर के क्रांतिकारी अमर शहीद जोधा सिंह अटैया थे। जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर अंग्रेजों से अपनी रियासत मुक्त कराई थी।
जोधा सिंह अटैया का जन्म उत्तर प्रदेश सूबे के फतेहपुर जनपद में बिंदकी के निकट रसूलपुर पंधारा में हुआ था।
शहीद जोधा सिंह के नाम के साथ जुडे ‘अटैया’ शब्द की भी अपनी अलग कहानी है। अटैया शब्द इक्ष्वाकु वंश से संबंधित है, जिसके अन्तर्गत ‘गौतम’ गोत्र वाले क्षत्रिय आते हैं। गौतम वंशीय क्षत्रिय उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान में अधिक संख्या में निवास करते हैं। ये लोग ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, राष्ट्रप्रेमी, हृदय के साफ और दुश्मनों से बदला लेने में भी माहिर होते हैं।
भगवान गौतम बुद्ध (सिद्धार्थ) के कहने पर गुरु शालण्य ने कपिलवस्तु से अलग राज्य स्थापित करने के लिए गौतम वंश की नींव डाली थी। ‘गौतम’ शब्द संस्कृत में गो + तम से बना है। इसलिए गौतम का अर्थ अंधकार को आध्यात्मिक ज्ञान से दूर करने वाला अर्थात ‘उज्जवल प्रकाश’ होता है।
कहा जाता है कि गौतम बुद्ध के वंशज फ़तेहपुर के शासक हरि वरण सिंह अटैया थे, जिन्होंने मुगलों से कई बार युद्ध करके उन्हें पराजित किया था। राजा हरि वरण सिंह के वंशज ही राजा जोधा सिंह अटैया थे।
इतिहासकार श्री शिव सिंह चौहान ने अपनी पुस्तक “अर्गल राज्य का इतिहास” में लिखा था कि फ़तेहपुर परिक्षेत्र इलाहाबाद (प्रयागराज) रेजीडेंसी के अन्तर्गत आता था, जिसे पश्चिमी इलाहाबाद और पूर्वी कानपुर के नाम से संबोधित किया जाता था। मुगलकाल का अंतिम दौर और ब्रिटिश काल का प्रारंभिक समय तक फ़तेहपुर नाम का कोई अस्तित्व नहीं था। कालांतर में अंग्रेजों ने यथाशीघ्र अपने साम्राज्य का विस्तार करने के उद्देश्य से सन् 1826 में फ़तेहपुर जनपद का गठन किया था।
भारत की दो पवित्र नदियाँ माँ गंगा (सुरसरि) और यमुना (कालिंदी) के मध्य फ़तेहपुर जनपद में स्थित हैं। फतेहपुर जनपद के उत्तर में गंगा और दक्षिण में यमुना के हजारों वर्षों से अनवरत कल-कल की मधुर ध्वनि के साथ बहती हुई प्रतिदिन लाखों लोगों को जीवन दान देती हैं।
अमर शहीद ठाकुर जोधा सिंह का जन्म फ़तेहपुर से दक्षिण-पश्चिम में स्थित बिंदकी के समीप रिसालपुर के राजवाड़ा परिवार में हुआ था।
फ़तेहपुर छावनी में हमेशा भारी मात्रा में गोला बारूद का जखीरा रहता था। मातादीन वाल्मीकि ने जब शहीद मंगल पाण्डेय का जातिवाद के तंज पर आक्रोशित होकर कहा कि सुअर और गाय की चर्बी लगी करतूस मुँह से खींचते हो, तब तुम्हारी पंडिताआई कहाँ चली जाती है। इतना सुनते ही मानो अमर शहीद मंगल पाण्डेय के चक्षु खुल गए हों। मंगल पाण्डेय ने पश्चिम बंगाल स्थित बैरकपुर में 10 मार्च सन् 1857 को बगावत करते हुए ब्रिटिश अधिकारी मेजर ह्यूसन को गोली मार दी। उसके बाद 10 मई सन् 1857 को मेरठ में पूर्ण रूप से क्रांति की चिंगारी भड़की थी। यह क्रान्ति की चिंगारी ही नहीं, भारतीयों को आजादी पाने और भारत के उद्धार की लौ थी। यही चिंगारी ठीक एक माह बाद 10 जून को फ़तेहपुर में आग का गोला बनकर भड़क उठी थी। फ़तेहपुर के राजा ठाकुर जोधा सिंह पहले से ही सतर्क और घात लगाये बैठे थे कि यथाशीघ्र फिरंगियों पर हमला किया जा सके। इसलिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार की नीतियों के खिलाफ अपने नज़दीकी नाना साहब सहमति पाकर फिरंगियों के ख़िलाफ़ फतेहपुर में जंग-ए-आजादी का आगाज़ कर दिया।
फ़तेहपुर के तत्कालीन कलेक्टर हिकमतुल्ला कहने को तो ब्रिटिश सरकार के नौकर थे, लेकिन उनका रक्त सच्चा हिंदुस्तानी था। इसलिए कलेक्टर ने क्रांतिकारियों का हर कदम पर सहयोग किया। उनके सहयोग से क्रांतिकारियों ने कचहरी परिसर में झंडा फहरा दिया। फ़तेहपुर की आज़ादी की घोषणा होते ही कलेक्टर हिकमतुल्ला को चकलेदार/ रिसालेदार नियुक्त कर दिया था। ‘चकलेदार’ का अर्थ- ‘कर Tax वसूलने वाला अधिकारी’ होता है। फ़तेहपुर की आज़ादी की घोषणा का स्वर लंदन पर जाकर सुनाई दिया था। तब फिरंगी इनसे भयभीत हो गए थे।
सन 1857 के गदर में शहीद जोधा सिंह का नाम कुशल रणनीतिकारों की श्रेणी में अग्रणी रहता था। अपनी रणनीति के तहत जोधा सिंह अटैया ने अवध और बुन्देलखण्ड के क्रान्तिकारी राजाओं से बेहतर ताल मेल बैठाया। सभी रियासतों के राजाओं और क्रान्तिकारियों ने एक साथ मिलकर उचित अवसर देखकर धीरे-धीरे सम्पूर्ण भारत में फिरंगियों और उनकी दमनकारी नीतियों के खिलाफ संग्राम छेड़ दिया था।
अंग्रेज सैनिक अपने गुप्तचरों के साथ मिलकर, जोधा सिंह अटैया को खोज रहे थे। इस बीच जोधा सिंह को अपने गुप्तचरों से जानकारी हुई कि अंग्रेज सिपाही दरोगा दीवान आदि महमूद पुर गाँव में डेरा डाल चुके हैं। तब जोधा सिंह अटैया और उनके क्रांतिकारी साथियों ने गाँव में घुसकर 27 अक्तूबर सन् 1857 को सभी अंग्रेजों को एक घर में कैद करके आग के हवाले कर दिया। कई अंग्रेज सैनिकों की आग से जलकर मृत्यु हो गई थी। जोधा सिंह को पता चला की एक स्थानीय गद्दार रानीपुर पुलिस चौकी में छिपा है। जोधा सिंह ने साथियों को 7 दिसम्बर सन् 1857 को नाव से गंगा पार भेज कर देशद्रोही गद्दार को भी मरवा दिया था। अब तो अंग्रेजों में दशहत बढ़ती ही जा रही गई थी। अंग्रेज अधिकारी भी ठाकुर जोधा सिंह का नाम सुनते ही थर-थर काँपने लगे थे।
लंदन की अंग्रेज सरकार ने कर्नल पॉवेल को फतेहपुर का दमन करने के लिए भेजा। कर्नल पॉवेल ने जोश के साथ अपने सैनिकों को ठाकुर जोधा सिंह अटैया और उनकी सेना पर हमला करने के लिए भेजा। किन्तु अंग्रेज सैनिकों को उल्टे पैर भागने को मजबूर होना पड़ा। तब कर्नल पॉवेल आग बबुला हो गए। जोधा सिंह अटैया ने अवसर मिलते ही कर्नल पॉवेल को भी घेर कर सिर को धड़ से अलग करके मार डाला। भारत में चारों तरफ फ़तेहपुर की क्रांति की चर्चा हो रही थी। लंदन का सिंहासन भी डोलने लगा था।
अंग्रेज गवर्नर ने अब अत्यंत क्रूर कर्नल नील को फ़तेहपुर की क्रांति का दमन करने के लिए भेजा। कर्नल नील ने अपनी भारी मात्रा में सेना को फ़तेहपुर में जोधा सिंह व उनका रजवाड़ा को तहस-नहस करने का आदेश जारी किया। कर्नल नील बेकसूर लोगों को भी बहुत प्रताड़ित कर रहा था। क्रांतिकारियों को तो तत्काल मार देता था। इस प्रकार जोधा सिंह अटैया की सेना कमजोर पढ़ने लगी थी, लेकिन हौसला और उत्साह दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था।
गोरिल्ला युद्ध में निपुण जोधा सिंह अटैया ने नए सिरे से पुराने सैनिकों के साथ ही युवाओं को भी क्रांतिकारी, देशप्रेमी के रूप में प्रशिक्षण देकर फिर से नई फ़ौज तैयार किया। उसके बाद जोधा सिंह अटैया ने अपना गुप्त स्थान फ़तेहपुर से स्थानांतरित करते हुए खजुहा बना लिया था। खजुहा में जोधा सिंह का गोपनीय स्थान अंग्रेज नहीं जानते थे। किंतु स्थानीय देशद्रोही ने लालचवश क्रांतिकारी जोधा सिंह अटैया का गोपनीय ठिकाना अंग्रेजों को बता दिया। देशद्रोही की मुखबरी के कारण कर्नल नील ने अपनी घुड़सवार सेना के साथ घोरहा गांव के पास जोधा सिंह अटैया व उनके 51 साथियों को चारों तरफ से गिरफ़्तार कर लिया था।
28 अप्रैल सन 1858 का वह मनहूस दिन था, जब अंग्रेजों ने बिना किसी अदालत की सुनवाई के ही जोधा सिंह अटैया समेत बावन साथियों को बिंदकी के निकट मुगल रोड पर खजुहा ग्राम स्थित इमली के पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दिया था। फांसी देने के बाद कर्नल नील ने आस-पास के गाँव में मुनादी करवा दी कि, जो व्यक्ति इन शवों को नीचे उतारेगा, उन्हें भी फांसी दे दी जाएगी। लगभग 18 दिन तक शव पेड़ पर लटके रहे और चील कौवा माँस नोच-नोच कर खाते रहे। आज इस पावन धरा को बावनी इमली के नाम से जाना जाता है।
महाराज राजा भवानी सिंह ने भारी तादाद में अपने सैनिकों के साथ 4 जून सन् 1858 की रात में सभी शवों को नीचे उतार कर शिवराजपुर स्थित गंगा तट पर अंतिम संस्कार किया था।
शिवराजपुर में भगवान श्री कृष्ण का प्राचीन मंदिर है। जिसे मेवाड़ राज्य के राजा भोजराज सिंह की पत्नी, कृष्ण भक्त मीराबाई ने स्थापित किया था।
फ़तेहपुर जनपद में खजुहा का भी अपना अलग पौराणिक व ऐतिहासिक महत्व है। खजुहा को ‘छोटी काशी’ कहा जाता है। इस छोटे से कस्बे में लगभग 118 शिव मंदिर है। औरंगजेब के समय की मुगल रोड आज भी है। कहा जाता है कि दशहरा का दिन यहां पर रावण को जलाया नहीं जाता, बल्कि उनकी पूजा होती है। दशहरा में मेला लगता है। 52 क्रान्तिकारियों के शहादत की अंतिम विदाई देने वाला मूक गवाह इमली का पेड़ आज भी सुरक्षित और संरक्षित है। जिसमें 28 अप्रैल सन 1858 को 52 क्रान्तिकारी परवाने भारत माँ की रक्षा करते हुए फांसी पर झूल गए थे।
खजुहा ग्राम को भी अब बावनी ‘इमली’ ग्राम से जाना जाता है। ‘बावनी इमली’ स्थल पर शहीद स्मारक बना हुआ है, जहाँ पर प्रतिवर्ष 28 अप्रैल को शहीदों की स्मृतियों को जीवन्त रखने के लिए अनेक साँस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। मेला जैसा उत्सव मनाया जाता है।

डॉ अशोक कुमार गौतम
असिस्टेन्ट प्रोफेसर, लेखक, सम्पादक
शिवा जी नगर, दूरभाष नगर, रायबरेली UP
मो. 9415951459

1857 के स्वाधीनता संग्राम में रायबरेली के प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का योगदान | अशोक कुमार गौतम

1857 के स्वाधीनता संग्राम में रायबरेली के प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का योगदान

सन 1857 की क्रांति में अखण्ड भारत के जिन-जिन वीर सपूतों ने अपने प्राणों की आहुति दी, उनमें बैसवारा के राजा राव राम बक्श सिंह, अवध केसरी राणा बेनी माधव सिंह, वीर वीरा पासी, लाल चंद्र स्वर्णकार, राजा हरिप्रसाद सिंह, खद्दर-भद्दर यादव, रघुनाथ आज का नाम सर्वादरणीय है। स्वाधीनता संग्राम की चिंगारी सन 1857 में अखंड भारत में भड़क चुकी थी। जिसमें असंख्य ज्ञात-अज्ञात शहीदों ने स्वतंत्रता संग्राम की मिसाल को अपने लहू से जलाए रखा। शहीदों के प्रति हम मूक श्रद्धांजलि अर्पित कर पा रहे हैं। सन 1857 के बाद की क्रांति की चिंगारी 1920 के लगभग पुनः जोर-शोर से भड़की और भारत के आजादी प्राप्त तक प्रज्वलित होती रही।
इस क्रम में कुछ प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों का परिचय देना समीचीन प्रतीत होता है-

राना बेनी माधव सिंह


अवध प्रांत के शंकरपुर रायबरेली रियासत के राजा राणा बेनी माधव सिंह सन 1857 के गदर में अंग्रेजों से बराबर मोर्चा लेते रहे। आपने अपना साम्राज्य बहराइच तक फैलाया था। गोरिल्ला युद्ध में माहिर राणा साहब को लखनऊ की रानी बेगम हजरत महल ने दिलेर-ए-जंग की उपाधि दी थी। माँ भगवती के उपासक राणा बेनी माधव सिंह ने अंग्रेज सेनापति होप ग्रांड और चैंबर लेन को भागने पर मजबूर कर दिया। आपको अवध केसरी, नर नाहर कहा जाता है। आपने अपने सेनापति वीरा पासी के सहयोग से हर स्तर पर अंग्रेजों को खदेड़ा है और अंतिम सांस तक अंग्रेजों के हाथ नहीं आए।


वीरा पासी
स्वामिभक्त वीरा पासी का जन्म 11 नवंबर सन 1835 को लोधवारी में हुआ था। आपका वास्तविक नाम शिवदीन पासी था। आप राणा बेनी माधव सिंह के प्रमुख सेनापति व अंगरक्षक थे। आपने राणा साहब को ब्रिटिश हुकूमत की जेल से रोशनदान के रास्ते बाहर निकालकर आजाद कराया था। अपनी जान देकर राणा साहब के प्राणों की रक्षा करने वाले वीरा पासी के नाम से अंग्रेज थर-थर कांपते थे। इसलिए अंग्रेजों ने वीरा पासी का पता बताने वाले या वीरा को पकड़ने वाले को उस समय 50,000 रुपये इनाम की घोषणा की थी। भीरा की लड़ाई में राणा बेनी माधव सिंह के प्राणों की रक्षा करते हुए आप शहीद हो गए थे।
अमर शहीद औदान सिंह, सुक्खू सिंह, टिर्री सिंह, रामशंकर द्विवेदी व चौधरी महादेव
18 अगस्त सन 1942 को असंख्य रणबाकुरे सरेनी स्थित थाना में तिरंगा फहराने की जिद पर अड़े थे। तभी अंग्रेजों की गोलियों से 5 क्रांतिकारी शहीद हो गए थे। उन्हीं की स्मृति में थाना के ठीक सामने शहीद स्मारक बनाया गया है।
अंजनी कुमार तिवारी
इनका जन्म 1905 में बछरावां में हुआ था। पिता का नाम स्व० रामदयाल तिवारी था। आजादी की लड़ाई में आप 6 बार जेल गए, 4 वर्ष की सजा भुगती और ₹ 100 जुर्माना लगाया गया। 14 फरवरी सन1982 को आप का स्वर्गवास हो गया था।
अश्विनी कुमार शुक्ल
इनका जन्म 4 जुलाई सन 1907 को बकुलिहा, खीरों में सुखनंदन शुक्ल जी के घर में हुआ। इनकी शिक्षा-दीक्षा मारवाड़ी स्कूल कानपुर में हुई। साइमन कमीशन के विरोध में लाला लाजपत राय और गोविंद बल्लभ पंत के ऊपर हुए लाठीचार्ज से आहत होकर आप काले झंडे के साथ जुलूस में सम्मिलित हुए। इन्होंने लगान बंदी का भी विरोध किया। लालगंज में 1932 में जत्था बनाकर तार कटिंग की। जिसके जुर्म में 2 वर्ष का कारावास और ₹ 50 जुर्माना लगाया गया।
अम्बिका प्रसाद मिश्र
अम्बिका प्रसाद मिश्र का उपनाम दिवाकर शास्त्री था। आपका जन्म सुल्तानपुर खेड़ा (ऐहार) में स्व० नंदलाल मिश्र के घर में हुआ था। इनकी शिक्षा-दीक्षा काशी विद्यापीठ में हुई। डॉ० संपूर्णानंद और आचार्य नरेंद्र देव के संपर्क में आकर अनेक आंदोलनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। आप समाजवाद के समर्थक और नमक सत्याग्रह में सम्मिलित थे।
अहोरवा दीन यादव
आपका जन्म सन 1910 में पहाड़पुर (मोहन गंज) में हुआ था। पिता का नाम स्व० अधीन यादव था। आप कानपुर में डाक विभाग में नौकरी करते थे, साथ ही गणेश शंकर विद्यार्थी के सम्पर्क में बराबर बने रहते थे। अहोरवादीन स्वाधीनता संग्राम में कॉंग्रेस जुलूस में सम्मिलित होते थे, जिसके कारण 6 माह की जेल और 15 रुपये जुर्माना लगाया गया था। बाद में सन 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह करने के जुर्म में 1 वर्ष का कठोरतम कारावास हुआ था।
अल्ला तवक्कुल मौलाना
अल्ला तवक्कुल मौलाना का जन्म शिवदयाल खेड़ा (बछरावां) में हुआ था। सन 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लेने के कारण 1 वर्ष की कठोर सजा और 40 रुपये जुर्माना लगाया गया था। मौलाना जी बड़े रौबदार इंसान थे, कहते थे कि ‘हमने 1 मिनट में अंग्रेजों को भगा दिया।’
कालिका प्रसाद मुंशी
कालिका प्रसाद मुंशी रायबरेली जनपद में कांग्रेस के जन्मदाताओं में से एक हैं। सन 1921 के मुंशीगंज गोली कांड के बाद एक खुलकर मैदान में आ गए थे। इनके नाम से ताल्लुकेदार और पुलिस दोनों घबराते थे। लालगंज में गांधी चबूतरा आपने ही बनवाया था। जमीदारों ने इन्हें परेशान करने के लिए निराधार मुकदमे लादे। मुंशीगंज मेला इन्होंने शुरू कर आया था। इनको तीन बार में छः छः माह की सजा दी गई थी। संपूर्ण जनपद में इनका व्यापक प्रभाव था खजूरगांव, टेकरी, तिलोई के राजाओं से हमेशा मोर्चा लिया था।
गजाधर प्रसाद वर्मा
आपका जन्म 2 नवंबर 1881 को अजबापुर थाना मोहनगंज में हुआ था। पिता का नाम स्वर्गीय राम सहाय वर्मा था। इन्होंने कक्षा चार तक की शिक्षा पाई थी। तिलोई कांग्रेस कार्यालय पर जब पुलिस ने कब्जा कर लिया तो गजाधर प्रसाद वर्मा ने फिर से ताला तोड़कर कब्जा कर लिया था। माफी न मानने पर अंग्रेजों ने जेल भेज दिया और 6 माह की सजा सुनाई गई थी। जेल में शारीरिक प्रताड़ना दी गई और इनसे कोलू चक्की चलाई गई थी।
गुप्तार सिंह
जिले के प्रमुख कांग्रेसी नेता थे। सरेनी में स्वाधीनता आंदोलन करने के परिणाम स्वरूप कई कई बार में 6 वर्ष की सजा और 2 वर्ष की नजरबंदी ही थी। जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे हैं। 18 अगस्त सन 1942 में सरेनी गोलीकांड के प्रमुख सूत्रधार थे, जो थाना सरेनी पर कब्जा करके थाना पर तिरंगा फहराना चाहते थे। बाद में ब्रिटिश पुलिस ने गुप्तार सिंह को फरार घोषित करके इनका घर खुदवा लिया था।
चंद्रिका प्रसाद मुंशी जी असहयोग आंदोलन के पश्चात इन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी। आप 9 बार जेल गए और 7 वर्ष की सजा काटी। कुर्री सिदौली और शिवगढ़ रियासत का सदैव विद्रोह करते रहे। आप गुरुजी के नाम से प्रसिद्ध हैं। आप महात्मा गांधी से विशेष प्रभावित थे। बछरावां में गांधी विद्यालय इंटर कॉलेज और दयानंद डिग्री कॉलेज सहित कई शिक्षण संस्थाओं के संस्थापक रहे। जीवन भर आपने नमक नहीं खाया।
दल बहादुर सिंह
आपका जन्म 20 अक्टूबर सन 1906 को करामा रक्त में रति पाल सिंह के यहां हुआ था मुंबई में नमक सत्याग्रह मैं 3 माह की सजा काटकर रायबरेली आ गए थे यहां भी बराबर ब्रिटिश हुकूमत से मोर्चा लेते हुए आपने कुल 5 वर्ष की सजा काटी थी।
शिवराम विश्वकर्मा
शिवराम विश्वकर्मा का उपनाम मुरली था। आप जतुआ टप्पा, मलिकमऊ चौबारा के निवासी थे। सन 1932 में 6 माह की सजा काटी थी। आपके ही सहयोग से पुराना तिलक भवन बेलीगंज में बना था। आपके राष्ट्र के प्रति निष्ठा भाव था और हमेशा ब्रिटिश शासन का विरोध किया।
मदन मोहन मिश्र
आपका जन्म 16 जनवरी सन 1917 को बेहटा कला सरेनी में हुआ था। पिता का नाम स्व० चन्द्रनाथ मिश्र था। ये किशोरावस्था से क्रांतिकारी थे। आप स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिषद के अध्यक्ष भी थे। 12 जून सन 1938 को विवाह मंडप से आप की गिरफ्तारी हुई थी। आपने “जनता राज” समाचार पत्र का संपादन किया, जिसका अंग्रेजों ने अनवरत विरोध किया। अंत में 20 जनवरी 1994 को आप का स्वर्गवास हो गया था।
रमाकान्त पाण्डेय
आप सलारपुर कोतवाली सदर के रहने वाले थे। पिता का नाम स्वर्गीय संत शरण पांडेय था। सन 1940 – 41 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में 1 वर्ष की सजा और 50 रुपये जुर्माना लगाया गया था। सन 1942 के आंदोलन में अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंककर आप फरार हो गए थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिषद के अध्यक्ष थे। देश को आजाद होने पर उन्होंने भारत माता का अभिवादन दंडवत किया था।
राम भरोसे श्रीवास्तव
आपका जन्म सन 1915 में तिलोई में हुआ था। पिता का नाम जगन्नाथ प्रसाद श्रीवास्तव था। पुरुषोत्तम दास टंडन के आग्रह पर आप मद्रास में हिंदी का प्रचार-प्रसार करने गए थे। फिर सन 1926 में रायबरेली आ गए। आते ही किसान आंदोलन में राजा विश्वनाथ से टक्कर हो गई। आपको कुल 5 वर्ष की सजा हुई थी।
श्रीमती सिताला और श्रीमती सुखदेई
आप दोनों मुस्तफाबाद, ऊँचाहार की रहने वाली थी। सन 1930 में इन वीरांगनाओं को नमक आंदोलन में भाग लेने के कारण 6 माह की सजा और भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के लिए 1 वर्ष का कठोर कारावास हुआ था।
गोविंद सिंह
आपका जन्म 18 जून सन 1912 को ओसाह महाराजगंज में हुआ था। सन 1932 में लगान बंदी आंदोलन में भाग लेने के कारण 6 माह की सजा हुई थी। सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी 1 वर्ष के लिए आप जेल गए थे।
गुरुदास
आपका जन्म धुरेमऊ सरेनी में हुआ था। आपके पिता का नाम स्व० भोला था। सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 18 अगस्त 1942 को हुए सरेनी गोलीकांड में आप पकड़े गए थे, जिसके कारण 7 वर्ष का कठोर कारावास की सजा आपने काटी थी।
चोहरजा सिंह
आपका जन्म स्वर्गीय पृथ्वीपाल सिंह के यहां जगदीशपुर नसीराबाद में हुआ था। आपने सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया था। सन 1931 में 6 माह की जेल और 25 रुपये अर्थदंड लगाया गया था
जगन्नाथ दीक्षित
पिता का नाम स्वर्गीय दयानिधि दीक्षित था। आप रामपुर निहस्था के निवासी थे। सन 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन में शामिल होने के जुर्म में एक वर्ष की जेल और 200 रुपये जुर्माना लगाया गया था।
जयराम सुधांशु
सुधांशु का जन्म 5 मई सन 1922 को दीन शाह गौरा में हुआ था। आपके पिता का नाम स्वर्गीय बाबूलाल था। सन 1941 के सत्याग्रह में 9 माह की सजा का का कठोर कारावास हुआ था।
श्रीमती बुद्धा
आपका जन्म पचवासी जगतपुर में हुआ था। पिता का नाम स्वर्गीय गुरुदीन था। आपने व्यक्तिगत सत्याग्रह में शामिल थी, और आसपास के गॉंवों की महिलाओं को अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोही तेवर रखने को कह रही थी। इस आंदोलन में भाग लेने के कारण आपको 3 माह की कड़ी कैद और 50 रुपये जुर्माना अंग्रेजों ने लगाया था।
सुन्दारा देवी
आपका जन्म ग्राम वंशपुर मुस्तफाबाद, सलोन में हुआ था। सन 1930 में महात्मा गाँधी से प्रेरित होकर सविनय अवज्ञा आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही थी, जिसके जुर्म में 6 माह की कड़ी कैद हुई थी।
रायबरेली जनपद में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की संख्या लगभग 1100 से ऊपर है। मुंशीगंज गोलीकांड में जिस किसान को पहली गोली लगी वह व्यक्ति अमर शहीद बदरू बेड़िया था।
आज के अवसर पर भले ही सभी क्रांतिकारी महानायकों की सूची प्राप्त नहीं है, लेकिन अखण्ड भारत के साथ ही रायबरेली में हुए सभी सभी गोलीकांडों में शहीद हुए किसानों, नौजवानों को श्रद्धा सुमन अर्पित करना मेरा धर्म है। इन सबके अतिरिक्त पंडित अमोल शर्मा जिन्हें मुंशीगंज गोलीकांड में छह माह की कैद और ₹ 50 जुर्माना हुआ था, उनको याद करना चाहिए। अलोपीदीन तिवारी, अंगद सिंह, अयोध्या, अवतार पासी, कमला किशोर, केदारनाथ द्विवेदी, गंगा दयाल बाजपेई, गया प्रसाद, जानकी देवी, हजारी प्रसाद, जयराम, सुधांशु, जगन्नाथ कुशवाह, देवता देवी, देवी प्रसाद, उत्तम लाल जैसे न जाने कितने अनगिनत वीरों के नाम हैं, जिनको स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जेल जाना पड़ा और यातनाएं सहनी पड़ी। परिणाम स्वरूप आज हम स्वतंत्र होकर खुली हवा में सांस ले रहे हैं। अब जरूरत है मानसिक रूप से भी स्वतंत्र हो जाये, जिससे हर भारतवासी सशख़्त और सक्षम बन सके।

अशोक कुमार गौतम
असिस्टेंट प्रोफेसर

शिवा जी नगर, दूरभाष नगर
रायबरेली यूपी
मो० 9415951459

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मण्डी नगर और शिवमन्दिर | Mandi Nagar and shiv Mandir – आशा शैली

मण्डी नगर और शिवमन्दिर | Mandi Nagar and shiv Mandir – आशा शैली

हिमाचल प्रदेश में कुल मिलाकर बारह जिले हैं। प्रत्येक जिले की अपनी देव-परम्पराएँ और मेले त्यौहार हैं। इनमें से कुछ तो देश भर में विख्यात हैं और कुछ को अब विश्व स्तर पर भी पहचान मिलने लगी है। इन विख्यात त्यौहारों में कुल्लू का दशहरा, किन्नौर का फ्लैच, रामपुर का लवी मेला, चम्बा का मिंजर और मण्डी की शिवरात्रि आदि की गणना की जा सकती है। इन मेलों में एक बात जो समान है वह है देवताओं की सहभागिता। पूरे प्रदेश में देवताओं की सहभागिता को विशेष महत्व दिया जाता है और इनके प्रति इस प्रकार का व्यवहार अमल में लाया जाता है जैसे वह हम-आप जैसे ही हो किन्तु हमसे उच्च और विशिष्ट स्थान रखते हों। इस प्रकार आदर दिया जाता है जैसे किसी राजा-महाराजा को दिया जाए। लोग इन की पालकियों को सामने रखकर इस तरह नाचते-गाते हैं मानों देवता इन लोगों को देख रहा है और नाचने वाले इस प्रकार नृत्य मग्न होते हैं मानों देवता को प्रसन्न कर रहे हों। यही हिमाचल के मेलों की सबसे बड़ी विशेषता होती है वरना क्रय-विक्रय तो प्रत्येक मेले में होता ही है। हिमाचली मेलों की दूसरी विशेषता होती है वहाँ के लोकनृत्य, जिन्हें नाटी कहा जाता है, नाटी अर्थात् सामूहिक नृत्य। तो आइए कुछ बातें मण्डी नगर और उसकी शिवरात्रि की करें। इसके लिए हम आप को मण्डी ले चलते हैं, क्योंकि मण्डी जिले की सुन्दरता के लिए ही हिमाचल की सुन्दरता का बखान होता है।

मण्डी नगर जो कि जिला मुख्यालय भी है, व्यास और सुकेती नदियों के संगम स्थल पर समुद्र तल से 760 मीटर के ऊँचाई पर बसा हुआ एक सुन्दर और रमणीक नगर है। इतिहासकारों के अनुसार यह स्थान कुल्लू और लाहुल-स्पिति जाने के मार्ग में पड़ता है इस लिए यह मैदानों और पहाड़ों को जोड़ने वाली एक कड़ी रहा है। व्यापार का केंद्र रहने के कारण ही सम्भवतया इस का नाम मण्डी पड़ गया हो, लेकिन मण्डी नाम माण्डव्य ऋषि से सम्बद्ध भी माना जाता है। जनश्रुति के अनुसार माण्डव्य ऋषि ने इस क्षेत्र में तपस्या की थी। इस क्षेत्र में रियासतों की स्थापना जहाँ सातवीं ईस्वी पूर्व की मानी जाती है वहीं इस नगर की स्थापना बारे तथ्य है कि ईस्वी सन् 1526 में इसे मण्डी रियासत के शासक अजबरसेन ने बसाया था। इससे पूर्व इस स्थान पर घने जंगल हुआ करते थे। रियासत की राजधानी पुरानी मण्डी हुआ करती थी। इस जंगल पर सलयाणा के राणा गोकल का अधिकार था। लेकिन मण्डी में अजबरसेन का शासन था। राणा लोग राजाओं के अधीन ही रहते थे।

कहा जाता है कि एक दिन अजबरसेन को स्वप्न दिखई दिया। जिसमें राजा ने देखा कि एक गाय जंगल में एक स्थान पर आकर खड़ी हो जाती है और उसके थनों से अपने-आप दूध बहने लगता है। जिस स्थान पर दूध गिर रहा था वहाँ राजा को एक शिवलिंग नजर आया। उपरोक्त स्वप्न राजा को निरंतर कई रातों तक दिखाई देता रहा। जब ऐसा बार-बार होने लगा तो राजा ने अपने मंत्रियों को पूरी बात सुनाई। सुनकर सब ने ही आश्चर्य व्यक्त किया और इस बात की खोज-बीन करने का परामर्श राजा को दिया। राजा ने खोज कराई तो पता चला कि यह मात्र स्वप्न ही नहीं था, अपितु ठोस वास्तविकता थी। वास्तव में उस जंगल में एक स्थान पर ऐसा ही होता था, जैसा राजा ने स्वप्न में देखा था। तब राजा अजबरसेन ने उस स्थान पर बाबा भूतनाथ (सदाशिव) का मन्दिर बनवाया और अपनी राजधनी पुरानी मण्डी से यहाँ ले आए और स्वयं भी सदाशिव के शरणागत हो गए।

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भारत की स्वाधीनता के पश्चात् जब रियासतों का भारत संघ में विलय और हिमाचल का गठन हुआ तो 1948 में मण्डी, पांगणा और सुकेत की तीन छोटी-छोटी रियासतों को मिला कर इस क्षेत्र को भी जिले का रूप दिया गया और जिला मण्डी नाम दिया गया। वर्तमान में इस जिले का क्षेत्रफल 4018 वर्ग किमी. है।

इस समय इस नगर में छोटे-बड़े कुल मिलाकर 85 मन्दिर हैं, किन्तु प्रमुख मन्दिर आज से लगभग सौ वर्ष पूर्व व्यास नदी के किनारे पर तत्कालीन मण्डी नरेश विजयसेन की माता द्वारा बनवाया गया था। इस मन्दिर का नाम साहबानी है। मन्दिर में ग्यारह रुद्रों के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं की बहुत सी सुन्दर और कलात्मक मूर्तियाँ भी स्थापित की गई हैं। इसके अतिरिक्त अर्धनारीश्वर, पंचवक्त्र महादेव मन्दिर, त्रिलोकनाथ मन्दिर, जालपा (भीमाकाली) आदि अन्य देवी-देवताओं के भी मन्दिर हैं, परन्तु अधिक मात्रा शिव मन्दिरों की ही है। इन्ही शिव मन्दिरों के कारण इसे छोटी काशी कहा जाता है।

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मण्डी रियासत के अधिकतर शासक शैव रहे हैं इसीलिए यहाँ शिवमन्दिरों की बहुतायत है। त्रिलोकीनाथ मन्दिर राजा अजबरसेन की रानी सुल्तान देवी ने अपने पति की सुख-समृद्धि के लिए बनवाया था इसका निर्माणकाल 1520 ईस्वी के आस-पास बताया जाता है। इस दृष्टि से त्रिलोकी नाथ मन्दिर पहले बना और भूतनाथ मन्दिर बाद में परन्तु भूतनाथ मन्दिर की मान्यता और प्रसिद्धि अधिक है। मण्डी का शिवरात्रि मेला भी भूतनाथ मन्दिर से ही प्रारम्भ हुआ माना जाता है। ईस्वी सन्1527 की शिवरात्रि को इस मन्दिर की प्राणप्रतिष्ठा की गई और उसी दिन से यह मेला प्रारम्भ किया गया जो अब पूरे भारत में विख्यात हो चुका है। मण्डी नगर और शिवरात्रि एक-दूसरे के पर्यायवाची बन गए हैं। घरों में पकवान बनने लगते हैं और कानों में गूंजने लगते हैं स्वर खरनाली, हरणसिंगे और ढोल की थाप के। अभी तक शिवरात्रि का मेला मण्डी में सात दिन तक चलता है। इस मेले में पूरे प्रदेश ही नहीं भारत के अन्य स्थानों के लोग भी स्थानीय देवताओं की ही तरह भाग लेते हैं। लेकिन इस मेले में अधिक सहभागिता हिमाचल सरकार की ही रहती है क्योंकि यह मेला अब विशुद्ध सरकरी तंत्र पर निर्भर हो कर रह गया है।

मण्डी वासियों की मान्यता है कि सूखा पड़ने की स्थिति में व्यास का इतना जल शिवलिंग पर चढ़ाया जाए कि पानी पुनः व्यास में मिलने लगे तो वर्षा हो जाती है। अतः सूखे की स्थिति में लोग आज भी घड़े भर-भर पानी शिवलिंग पर चढ़ाते हैं और इसकी निरंतरता को तब तक बनाए रखा जाता है, जब तक पानी की धारा व्यास में न मिलने लगे।
मण्डी का शिवरात्रि मेला भी हिमाचल के अन्य मेलों की ही भान्ति उन्हीं सारी परम्पराओं का निर्वाह करता है जिनका अन्य मेले करते हैं परन्तु प्रगति की अन्धी दौड़ में पुरातन कहीं खोता जा रहा है। नगर में नवनिर्माण के नाम पर बस्तियाँ मन्दिरों के प्रागणों तक फैलती जा रही हैं। नगर के मध्य भाग में राजा सिद्धिसेन का बनाया सुभाष पार्क है, जिसके एक कोने में मन्दिर और दूसरे कोने में सार्वजनिक शौचालय है। जिसकी सफाई न होने से साथ में ही बने पुस्तकालय एवं पाठशाला में बैठना भी दूभर हो जाता है। मन्दिरों का रख-रखाव भाषा एवं कला संस्कृति विभाग के सुपुर्द होने से मन्दिर सुरक्षित हैं लेकिन नगर अपना ऐतिहासिक महत्व खोता जा रहा है। मन्दिरों के पुजारी धूप जला कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। जहाँ एक भ्रांत-क्लांत मन विश्राम और शान्ति की आशा लेकर आने पर एक भी हरी शाखा न पाकर नदी किनारे के गोल और सूखे पत्थरों के दर्शन कर लौट जाते हैं।
सेरी रंगमंच की दर्शकदीर्घा की सीढ़ियाँ उखाड़ दी गई हैं, जहाँ बैठकर लोग शिवरात्रि और अन्य विशेष समारोहों का आनन्द लेते थे। इस विकास से तो यह आभास हो रहा है कि किसी समय छोटीकाशी खोज का विषय बन जाएगी और मण्डी के 85 मन्दिर शोध का विषय बन जाएंगे।

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उत्तराखण्ड का इतिहास | History of Uttarakhand| आशा शैली

उत्तराखण्ड का इतिहास | History of Uttarakhand / आशा शैली

दुनिया जानती है कि इतिहास विजयी लोगों का होता है। पराजित सेनायें, राजा-महाराजा चाहे कितनी वीरता से ही क्यों न लड़े हों, उनका इतिहास ( History of Uttarakhand ) नहीं लिखा जाता, क्योंकि सत्ता विजेता के हाथ में होती है और वह धनबल से चाहे जो लिखवा सकता है। हाँ, यह बात अलग है कि पराजित वीरों की गाथायें जन-जन के हृदय में अवश्य रहती हैं और रहता है उन देशद्रोहियों के प्रति एक अव्यक्त आक्रोश जिनके कारण अन्यायी और अत्याचारी विजयश्री प्राप्त कर लेता है।

उत्तर भारत में स्थित एक नव निर्मित राज्य है

उत्तराखण्ड (पूर्व नाम उत्तरांचल), भले ही उत्तर भारत में स्थित एक नव निर्मित राज्य है परन्तु यहाँ का इतिहास अति प्राचीन है। प्राचीनकाल से लेकर स्वतंन्त्रता प्राप्ति तक अनेक इतिहासकारों ने अपने-अपने तरीके से इसका उल्लेख किया है। डॉ. अजय सिंह रावत की ‘उत्तराखण्ड का समग्र राजनैतिक इतिहास (पाषाण युग से 1949 तक) नामक पुस्तक के आमुख में ‘दीपक रावत आई.ए.एस.’ ने लिखा है कि उत्तराखण्ड से ऐसे अनेक पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त होते हैं, जिनके आधार पर यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यह क्षेत्र अतिप्राचीन काल से ही मानवीय गतिविधियों से सम्बद्ध रहा है।’1 वर्तमान में इसका निर्माण 9 नवम्बर 2000 को कई वर्षों के आन्दोलन के पश्चात् भारत गणराज्य के सत्ताइसवें राज्य के रूप में किया गया और सन् 2000 से 2006 तक यह उत्तरांचल के नाम से जाना जाता था। जनवरी 2007 में स्थानीय लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए राज्य का आधिकारिक नाम बदलकर उत्तराखण्ड कर दिया गया। राज्य की सीमाएँ उत्तर में तिब्बत और पूर्व में नेपाल से लगी हैं। पश्चिम में हिमाचल प्रदेश और दक्षिण में उत्तर प्रदेश इसकी सीमा से लगे राज्य हैं। सन 2000 में अपने गठन से पूर्व यह उत्तर प्रदेश का एक भाग था।

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पहले कहा जा चुका है कि उत्तराखण्ड भले ही नवनिर्मित राज्य हो परन्तु इसका इतिहास अति प्राचीन है। पारम्परिक हिन्दू ग्रन्थों और प्राचीन साहित्य में इस क्षेत्र का उल्लेख किया गया है। पांचवीं सदी ईस्वी पूर्व में पाणिनी ने इस क्षेत्र का उल्लेख ‘उत्तरपथे वाहृतम’ कहकर किया है। तैत्तरीय उपनिषद् में ‘नमो गंगा यमुनायोर्मध्ये ये वसानि, ते मे प्रसन्नात्मा चिरंजीवित वर्धयन्ति’ कह कर यहाँ के निवासियों के लिए मंगलकामनायें प्रकट की गई हैं। हिन्दी और संस्कृत में उत्तराखण्ड का अर्थ उत्तरी क्षेत्र या भाग होता है, इस राज्य में हिन्दू धर्म की पवित्रतम और भारत की सबसे बड़ी नदियों गंगा और यमुना के उद्गम स्थल क्रमशः गंगोत्री और यमुनोत्री तथा इनके तटों पर बसे वैदिक संस्कृति के कई महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थान हैं। आइए, आज हम उत्तराखण्ड के इतिहास पर एक दृष्टि डालें। इसके लिए हमें उत्तराखण्ड को अधिक गहराई से जानना होगा।
देहरादून, उत्तराखण्ड की अन्तरिम राजधानी होने के साथ इस राज्य का सबसे बड़ा नगर भी है। गैरसैण नामक एक छोटे से कस्बे को इसकी भौगोलिक स्थिति को देखते हुए भविष्य की राजधानी के रूप में प्रस्तावित तो किया गया है किन्तु विभिन्न विवादों और संसाधनों के अभाव के चलते अभी भी देहरादून ही अस्थाई राजधानी बना हुआ है परन्तु राज्य का उच्च न्यायालय नैनीताल में है। आइये उत्तराखण्ड के इतिहास को खंगालते हैं।

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उत्तराखण्ड के इतिहास


इतिहास बताता है कि प्राचीन काल में उत्तराखण्ड पर अनेक जातियों ने शासन किया जिनमें से कुणिन्द उत्तराखंड पर शासन करने वाली पहली राजनैतिक शक्ति कही जाती है। इसका प्रमाण हमें अशोक के कालसी अभिलेख से मिलता है। जौनसार बाबर तथा लेंसडाउन ;पौड़ीद्ध से मिली मुद्राओं से हमें उत्तराखण्ड में यौधेयों के शासन के भी प्रमाण मिलते हैं।
कुणिन्द प्रारंभ में मौर्यों के अधीन थे। कुणिन्द वंश के सबसे शक्तिशाली राजा अमोधभूति की मृत्यु के बाद उत्तराखण्ड के मैदानी भागां पर शकों ने अधिकार कर लिया।
शकों के पतन के बाद तराई वाले भागों में कुषाणों ने अधिकार कर लिया था। ‘बाडवाला यज्ञ वेदिका’ का निर्माण करने वाले शील वर्मन को कुछ विद्वान कुणिन्द व कुछ यौधेय मानते हैं। उत्तर महाभारतकाल, पाणिनी काल या बौद्धकाल में मैदानों से आने वाले लोगों के यहाँ बसने और स्थानीय लोगों से घुलमिल जाने की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी थी। ‘उत्तराखण्डःगढ़वाल की संस्कृति, इतिहास और लोक साहित्य’ पुस्तक, जिसे डॉ. शिव प्रसाद नैथानी ने लिखा है, की भूमिका में डॉ. नैथानी लिखते हैं, ‘उत्तराखण्ड गढ़वाल का प्राचीन साहित्य वैदिक काल के साहित्य के समान अलिखित, मौखिक और गेय-गान के रूप में होता था।’’
कर्तपुर राज्य के संस्थापक भी कुणिन्द ही थे, कर्तपुर में उस समय उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश तथा रोहिलखण्ड का उत्तरी भाग शामिल था। कालान्तर में कर्तपुर के कुणिन्दों को पराजित कर नागों ने उत्तराखण्ड पर अपना अधिकार कर लिया। नागों के बाद कन्नोज के मौखरियों ने उत्तराखण्ड पर शासन किया। मौखरी वंश का अंतिम शासक गृह्वर्मा था। हर्षवर्धन ने इसकी हत्या करके शासन को अपने हाथ में ले लिया। इसी हर्षवर्धन के शासन काल में चीनी यात्री व्हेनसांग उत्तराखण्ड भ्रमण पर आया था।
हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद उत्तराखण्ड पर अनेक छोटी-छोटी शक्तियों ने शासन किया। इसके पश्चात 700 ई. में कार्तिकेयपुर राजवंश की स्थापना हुई। इस वंश के तीन से अधिक परिवारों ने उत्तराखण्ड पर 700 ई. से 1030 ई. तक लगभग 300 साल तक शासन किया। इस राजवंश को उत्तराखण्ड का प्रथम ऐतिहासिक राजवंश कहा जाता है।
प्रारंभ में कार्तिकेयपुर राजवंश की राजधानी जोशीमठ ;चमोलीद्ध के समीप कार्तिकेयपुर नामक स्थान पर थी परन्तु बाद में राजधानी बैजनाथ (बागेश्वर) बनायी गई।
इस वंश का प्रथम शासक बसंतदेव था किन्तु बसंतदेव के बाद के इस वंश के राजाओं के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती। इसके बाद खर्परदेव के शासन के बारे में जानकारी मिलती है। खर्परदेव कन्नौज के राजा यशोवर्मन का समकालीन था। इसके बाद इसका पुत्र कल्याण राजा बना। खर्परदेव वंश का अंतिम शासक त्रिभुवन राज था।
नालंदा अभिलेख में बंगाल के पाल शासक धर्मपाल द्वारा गढ़वाल पर आक्रमण करने की जानकारी मिलती है। इसी आक्रमण के बाद कार्तिकेय राजवंश में खर्परदेव वंश के स्थान पर राजा निम्बर के वंश की स्थापना हुई। निम्बर ने जागेश्वर में विमानों का निर्माण करवाया था।
निम्बर के बाद उसका पुत्र इष्टगण शासक बना, उसने समस्त उत्तराखण्ड को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया था। जागेश्वर में नवदुर्गा, महिषमर्दिनी, लकुलीश तथा नटराज मंदिरों का निर्माण कराया।
इष्टगण के बाद उसका पुत्र ललित्शूर देव शासक बना तथा ललित्शूर देव के बाद उसका पुत्र भूदेव शासक बना इसने बौद्ध धर्म का विरोध किया तथा बैजनाथ मंदिर निर्माण में सहयोग दिया। कार्तिकेयपुर राजवंश में सलोड़ादित्य के पुत्र इच्छरदेव ने सलोड़ादित्य वंश की स्थापना की। कार्तिकेयपुर शासकों की राजभाषा संस्कृत तथा लोकभाषा पाली थी।
कार्तिकेयपुर शासनकाल में आदि गुरु शंकराचार्य उत्तराखण्ड आये। उन्होंने बद्रीनाथ व केदारनाथ मंदिरों का पुनरुद्धार कराया और सन 820 ई. में केदारनाथ में ही उन्होंने प्राणोत्सर्ग किया। कार्तिकेयपुर वंश के बाद कुमाऊं में कत्यूरियों का शासन हुआ


कत्यूरी वंश


मध्यकाल में कुमाऊं में कत्यूरियों का शासन था इसके बारे में जानकारी हमें स्थानीय लोकगाथाओं व जागर से मिलती है।
सन् 740 ई. से 1000 ई. तक गढ़वाल व कुमाऊं पर कत्यूरी वंश के तीन परिवारों का शासन रहा, तथा इनकी राजधानी कार्तिकेयपुर (जोशीमठ) थी। आसंतिदेव ने कत्यूरी राज्य में आसंतिदेव वंश की स्थापना की और अपनी राजधानी जोशीमठ से रणचुलाकोट में स्थापित की। कत्यूरी वंश का अंतिम शासक ब्रह्मदेव था। यह एक अत्याचारी शासक था, जागरां में इसे वीरमदेव कहा गया है।
जियारानी की लोकगाथा के अनुसार 1398 में तैमूर लंग ने हरिद्वार पर आक्रमण किया और ब्रह्मदेव ने उसका सामना किया और इसी आक्रमण के बाद कत्यूरी वंश का अंत हो गया।
1191 में पश्चिमी नेपाल के राजा अशोक चल्ल ने कत्यूरी राज्य पर आक्रमण कर उसके कुछ भाग पर कब्ज़ा कर लिया। 1223 ई. में नेपाल के शासक काचल्देव ने कुमाऊं पर आक्रमण किया और कत्यूरी शासन को अपने अधिकार में ले लिया।


कुमाऊं का चन्द वंश


कुमाऊं में चन्द वंश का संस्थापक सोमचंद था जो 700ई. में गद्दी पर बैठा था। कुमाऊं में चन्द और कत्यूरी प्रारम्भ में समकालीन थे और उनमें सत्ता के लिए संघर्ष चला जिसमें अन्त में चन्द विजयी रहे। चन्दों ने चम्पावत को अपनी राजधानी बनाया। प्रारंभ में चम्पावत के आसपास के क्षेत्र ही इनके अधीन थे लेकिन बाद में वर्तमान का नैनीताल, बागेश्वर, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा आदि क्षेत्र इनके अधीन हो गए। राज्य के विस्तृत हो जाने के कारण भीष्मचंद ने राजधानी चम्पावत से अल्मोड़ा स्थान्तरित कर दी जो कल्याण चंद तृतीय के समय (1560) में बनकर पूर्ण हुआ। इस वंश का सबसे शक्तिशाली राजा गरुड़ चन्द था।
प्राचीन अल्मोड़ा कस्बा, अपनी स्थापना से पहले कत्यूरी राजा बैचल्देओ के अधीन था। उस राजा ने अपनी धरती का एक बड़ा भाग एक गुजराती ब्राह्मण श्री चांद तिवारी को दान दे दिया। बाद में जब बारामण्डल चांद साम्राज्य का गठन हुआ, तब कल्याण चंद द्वारा 1568 में अल्मोड़ा कस्बे की स्थापना इस केन्द्रीय स्थान पर की गई। चंद राजाओं के समय में इसे राजपुर कहा जाता था। ’राजपुर’ नाम का बहुत सी प्राचीन ताँबे की प्लेटों पर भी उल्लेख मिला है।
कल्याण चन्द चतुर्थ के समय में कुमाऊं पर रोहिल्लों का आक्रमण हुआ तथा प्रसिद्ध कवि ‘शिव’ ने कल्याण चंद्रौदयम की रचना की। चन्द शासन काल में ही कुमाऊं में ग्राम प्रधान की नियुक्ति तथा भूमि निर्धारण की प्रथा प्रारंभ हुई। चन्द राजाओं का राज्य चिन्ह गाय थी।
1790 ई. में नेपाल के गोरखाओं ने चन्द राजा महेंद्र चन्द को हवाल बाग के युद्ध में पराजित कर कुमाऊं पर अपना अधिकार कर लिया, इसके सांथ ही कुमाऊं में चन्द राजवंश का अंत हो गया।


गढ़वाल का परमार (पंवार) राजवंश


ईस्वी सन् 888 से पूर्व सारा गढ़वाल क्षेत्र छोटे छोटे ‘गढ़ों’ में विभाजित था, जिनमें अलग-अलग राजा थे जिन्हें ‘राणा’, ‘राय’ या ‘ठाकुर’ के नाम से जाना जाता था। इनमे सबसे शक्तिशाली चांदपुर का राजा भानुप्रताप था, 887 ई. में धार (गुजरात) का शासक कनकपाल तीर्थाटन पर आया। भानुप्रताप ने इसका स्वागत किया और अपनी बेटी का विवाह उसके साथ कर दिया और अपना राज्य भी उन्हें दे दिया।
कनकपाल द्वारा 888 ई. में चाँदपुरगढ़ (चमोली) में परमार वंश की नींव रखी। ईस्वी सन् 888 से 1949 ई. तक परमार वंश में कुल 60 राजा हुए।
इस वंश के राजा प्रारंभ में कार्तिकेयपुर राजाओं के सामंत रहे लेकिन बाद में स्वतंत्र राजनैतिक शक्ति के रूप में स्थापित हो गए। इस वंश के 37वें राजा अजयपाल ने सभी गढ़पतियों को जीतकर गढ़वाल भूमि का एकीकरण किया। इसने अपनी राजधानी चांदपुर गढ़ को पहले देवलगढ़ फिर 1517 ई. में श्रीनगर में स्थापित किया। परमार शासकों को लोदी वंश के शासक बहलोल लोदी ने शाह की उपाधि से नवाजा, सर्वप्रथम बलभद्र शाह ने अपने नाम के आगे शाह जोड़ा। परमार राजा पृथ्वीपति शाह ने मुग़ल शहजादा दाराशिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह को आश्रय दिया था।
1636 ई. में मुग़ल सेनापति नवाजत खां ने दून-घाटी पर हमला कर दिया। उस समय की गढ़वाल राज्य की संरक्षित महारानी कर्णावती ने अपनी वीरता से मुग़ल सैनिको को पकड़वाकर उनके नाक कटवा दिए। इसी घटना के बाद महारानी कर्णावती को ‘नाककटी रानी’ के नाम से प्रसिद्ध हो गयी।


1790 ई. में गोरखाओं ने कुमाऊं के चन्दां को पराजित कर, 1791 ई. में गढ़वाल पर भी आक्रमण किया लेकिन पराजित हो गए। गढ़वाल के राजा ने गोरखाओं पर संधि के तहत 25000 रुपये का वार्षिक कर लगाया और वचन लिया कि अब ये गढ़वाल पर आक्रमण नहीं करेंगे, लेकिन 1803 ई. में अमर सिंह थापा और हस्तीदल चौतरिया के नेतृत्व में गौरखाओं ने भूकम्प से ग्रस्त गढ़वाल पर आक्रमण कर उनके काफी भाग पर कब्ज़ा कर लिया। 27 अप्रैल 1815 को कर्नल गार्डनर तथा गोरखा शासक बमशाह के बीच हुई संधि के तहत कुमाऊं की सत्ता अंग्रेजो को सौपी दी। कुमाऊं व गढ़वाल में गोरखाओं का शासन काल क्रमशः 25 और 10.5 वर्षों तक रहा जो बहुत ही अत्याचार पूर्ण था। इस अत्याचारी शासन को गोरख्याली कहा जाता है। धीरे-धीरे गोरखाओं का प्रभुत्व बढ़ता गया और इन्होनें लगभग 12 वर्षों तक राज किया। इनका राज्घ्य कांगड़ा तक फैला हुआ था, फिर गोरखाओं को महाराजा रणजीत सिंह ने कांगड़ा से निकाल बाहर किया। और इधर सुदर्शन शाह ने इस्ट इंडिया कम्पनी की मदद से गोरखाओं से अपना राज्य पुनः छीन लिया।

14 मई 1804 को देहरादून के खुड़बुड़ा मैदान में गोरखाओं से हुए युद्ध में प्रद्युमन्न शाह की मौत हो गई। इस प्रकार सम्पूर्ण गढ़वाल और कुमाऊं में नेपाली गोरखाओं का अधिकार हो गया।
प्रद्युमन्न शाह के एक पुत्र कुंवर प्रीतमशाह को गोरखाओं ने बंदी बनाकर काठमांडू भेज दिया, जबकि दूसरे पुत्र सुदर्शनशाह हरिद्वार में रहकर स्वतंत्र होने का प्रयास करते रहे और उनकी मांग पर अंग्रेज गवर्नर जनरल लार्ड हेस्टिंग्ज ने अक्तूबर 1814 में गोरखा के विरुद्ध अंग्रेज सेना भेजी और 1815 को गढ़वाल को स्वतंत्र कराया लेकिन अंग्रेजों को लड़ाई का खर्च न दे सकने के कारण गढ़वाल नरेश को समझौते में अपना राज्य अंग्रेजों को देना पड़ा।
सुदर्शन शाह ने 28 दिसम्बर 1815 को अपनी राजधानी श्रीनगर से टिहरी गढ़वाल स्थापित की। टिहरी राज्य पर राज करते रहे तथा भारत में विलय के बाद टिहरी राज्य को 1 अगस्त 1949 को उत्तर प्रदेश का एक जनपद बना दिया गया।


ब्रिटिश शासन


अप्रैल 1815 तक कुमाऊॅ पर अधिकार करने के बाद अंग्रेजों ने टिहरी को छोड़ कर अन्य सभी क्षेत्रों को नॉन रेगुलेशन प्रांत बनाकर उत्तर पूर्वी प्रान्त का भाग बना दिया और इस क्षेत्र का प्रथम कमिश्नर कर्नल गार्डनर को नियुक्त किया। कुछ समय बाद कुमाऊं जनपद का गठन किया गया और देहरादून को 1817 में सहारनपुर जनपद में शामिल किया गया। 1840 में ब्रिटिश गढ़वाल के मुख्यालय को श्रीनगर से हटाकर पौढ़ी लाया गया व पौढ़ी गढ़वाल नामक नये जनपद का गठन किया। 1854 में कुमाऊं मंडल का मुख्यालय नैनीताल बनाया गया। 1891 में कुमाऊं को अल्मोड़ा व नैनीताल नामक दो जिलो में बाँट दिया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति तक कुमाऊं में केवल 3 ही ज़िले थे। अल्मोड़ा, नैनीताल, पौढ़ी गढ़वाल। टिहरी गढ़वाल क्षेत्र एक रियासत के रूप में था। 1891 में उत्तराखंड से नॉन रेगुलेशन प्रान्त सिस्टम को समाप्त कर दिया गया। 1902 में सयुंक्त प्रान्त आगरा एवं अवध का गठन हुआ और उत्तराखंड को इसमें सामिल कर दिया गया। 1904 में नैनीताल गजेटियर में उत्तराखंड को हिल स्टेट का नाम दिया गया।


उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन


मई 1938 में तत्कालीन ब्रिटिश शासन में गढ़वाल के श्रीनगर में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस पर्वतीय क्षेत्र के निवासियों को अपनी परिस्थितियों के अनुसार स्वयं निर्णय लेने तथा अपनी संस्कृति को समृद्ध करने के आंदोलन का समर्थन किया। एक नए राज्य के रूप में उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन के फलस्वरुप (उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000) उत्तराखण्ड की स्थापना 9 नवम्बर 2000 को हुई। इसलिए इस दिन को उत्तराखण्ड में स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है।

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वीरवर वीरा पासी का सत्तावनी क्रांति में योगदान | Veeravar Veera Pasi

वीरवर वीरा पासी का सत्तावनी क्रांति में योगदान | Veeravar Veera Pasi

रायबरेली जनपद का बैसवारा प्राचीन काल से कलम, कृपाण और कौपीन का धनी क्षेत्र माना जाता रहा है। वैसे तो बैसवारा क्षेत्र को रायबरेली, उन्नाव और लखनऊ की सीमाएं स्पर्श करती हैं। बैसवारा के अनेक राजाओं, ताल्लुकेदारों ने 1857 ई० की क्रांति जितना बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया, उतना ही उन राजाओं की सेनाओं ने भी हिस्सा लिया है। किसी राजा की जीत का आधार सैनिक ही होते हैं।

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रायबरेली की धरती ने वीरवर वीरा पासी जैसा नायक को जन्म दिया। वीरा पासी का वास्तविक नाम स्वर्गीय शिवदीन पासी था। वीरा पासी का जन्म 11 नवंबर सन 1835 को रायबरेली जिला के लोधवारी गाँव में हुआ था। लोधवारी शहजादा की रियासत थी। शहजादा महाराजा रणजीत सिंह के पोते थे। कुछ इतिहासकार वीरा पासी का जन्म भीरा गोविंदपुर मानते थे। भीरा गोविंदपुर वीरा पासी की बहन बतसिया की ससुराल थी। वीरा के पिता का नाम सुखवा और माता का नाम सुरजी था। माता-पिता बहुत ही निर्धन थे। दुर्भाग्यवश वीरा के बचपन में ही माता-पिता का स्वर्गवास हो गया था। अब वीरा बेसहारा होकर अपनी बहन बतसिया के ससुराल में आकर रहने लगे थे। कालांतर में बहन के ससुराल में रहने वाले भाई को वीरना कहा जाता था। इसलिए बहन के घर में रहने के कारण वीरना से वीरा नाम पड़ गया था।

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वीरा पासी बाल्यकाल से ही बहुत बलिष्ठ और फुर्तीला था। शंकरपुर रियासत के राजा राना बेनी माधव सिंह की फौज में सैनिकों की भर्ती होनी थी। राना साहब की फौज में भर्ती होने के कठोर नियम भी थे। भर्ती होने के लिए आए हुए नौजवान लड़कों को राणा साहब एक सेर (लगभग 950 ग्राम) घी खिला कर अपने कक्ष में बुलाते थे और सीना में जोर से दो घूसा (मुक्का) मारते थे। जो लड़का मूर्छित नहीं होता था, उसे अपना अंगरक्षक नियुक्त कर लेते थे। 18 वर्ष की आयु में वीरा पासी राना साहब के फौज में भर्ती होने गया और सेना भर्ती की अग्नि परीक्षा में सफल रहा है। राना साहब द्वारा मुट्ठी बंद करके दो घूसा खाने के बाद भी वीरा हिला तक नहीं। उसकी वीरता के कारण राना बेनी माधव सिंह ने अपना अंगरक्षक नियुक्त कर लिया।


जनश्रुतियों के आधार पर कहा जाता है, परशुराम के पसीने से पासी जाति की उत्पत्ति हुई थी। पासी जाति लड़ाकू, निडर और स्वामिभक्त के रूप में जानी जाती है। पासी शब्द पा+असि से मिलकर बना है। पा का अर्थ है पकड़ और असि का अर्थ है तलवार। इस प्रकार पासी शब्द का अर्थ हुआ- जिसके हाथ में तलवार हो।

भारत में मुसलमानों का वर्चस्व कायम था। जिसे रोकने के लिए हिंदू राजाओं ने पासी बिरादरी से सूअर का पालन करवाया था। जिससे मुसलमानों को हिंदू बस्ती में घुसने से रोका जा सके। पासी जाति के लोग वीरों की परंपरा में अग्रसर थे। स्वामिभक्त जाति को छोटी जाति मानते हुए षड्यंत्र के तहत जरायम (अपराधी जाति) बना दिया गया।


राना बेनी माधव सिंह ने अपने पिता राजा राम नारायण सिंह के साथ अपने ननिहाल नाइन में अंग्रेजों से लोहा लेने लगे थे। इस अनियोजित युद्ध में राना साहब के पिता वीरगति को प्राप्त हुए और घायल अवस्था में राना बेनी माधव सिंह अंग्रेजों द्वारा बंदी बना लिए गए। उस समय वीरा पासी अंगरक्षक के रूप में नियुक्त हो चुके थे। राना बेनी माधव सिंह की माता जी रो-रो कर मूर्छित हो जाती थी। राज माता के आँसू वीरा से देखे नहीं गए। वीरा पासी ने अंग्रेजों की जेल से राना साहब को छुड़वाने की योजना बनाई। जेल मैनुवल के नियमानुसार घड़ी में जितने बजते थे, उतने बार बंदी रक्षकों/पहरेदारों द्वारा घंटा बजाया जाता था। यह प्रथा आज भी भारत की जेलों और पुलिस लाइनों में विद्यमान है।

वीरा पासी ने विश्वासपात्र लोहार से मजबूत लोहे की सरिया से खूंटी नुमा 12 कील बनवाई। रात्रि में जेल के बैरक के पीछे छिपकर वीरा पासी बैठ गए। जैसे ही मध्यरात्रि के 12:00 बजे का 12 बार घंटा टन टन बजना शुरू हुआ। उसी घंटे की ध्वनि के साथ ही वीरा फुर्ती के साथ एक-एक कील ठोकते हुए मजबूत रस्सा लेकर छत पर पहुँच गए। रोशनदान के सहारे रस्सा डालकर राना बेनी माधव सिंह को जेल से आजाद करा लिया। ब्रिटिश साम्राज्य की बनी इमारतें ऊँची और बड़े रोशनदान वाले होती थी। जिनका प्रमाण आज भी सरकारी इमारतों में विद्यमान है।


राना साहब ने वीरा पासी की निडरता, बहादुरी और स्वामिभक्ति देखकर अपनी रियासत शंकरपुर का सेनापति बना लिया था। स्वामिभक्त वीरा पासी ने 50 से अधिक अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था। इसलिए भारत से लेकर लंदन तक वीरा पासी के नाम से अंग्रेज कांपते थे। अंग्रेजों ने वीरा से भयभीत होकर जिंदा या मुर्दा पकड़ने अथवा उनका पता बताने वाले को सन 1857 में 50,000 (पचास हजार रुपये) का इनाम घोषित किया था। भारतीय इतिहास में अंग्रेजों द्वारा पहली बार इतनी अधिक धनराशि का इनाम घोषित किया गया था, वरना क्रूर अंग्रेज 5.0 रुपये से अधिक का इनाम घोषित नहीं करते थे। इसका प्रमाण आज भी लंदन में देखा का रखा हुआ है। फिर भी वीरवर वीरा को अंग्रेज पकड़ नहीं सके थे।


वीरा पासी ने अपने अदम्य साहस के साथ राना बेनी माधव सिंह का हर कदम साथ दिया। कभी भी अंग्रेजों ने राना साहब की भनक तक नहीं लगने दी। भीरा की लड़ाई में कुछ देसी गद्दारों की सहायता से अंग्रेजों ने राना साहब को घेर लिया था। युद्ध कला में निपुण वीरा पासी ने राना साहब के प्राणों की रक्षा करते हुए स्वयं का बलिदान कर दिया था। इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए वीर योद्धा वीरा का सिर अपने हाथों में रखकर राना बेनी माधव सिंह बहुत रोए थे। राना साहब वीरा को अपना दाहिना हाँथ मानते थे।


वीरा पासी की यादों को चिरस्थाई बनाने के लिए रायबरेली में जिला पंचायत कार्यालय से पहले वीरा पासी द्वार बनाया गया है। बैसवारा का केंद्र बिंदु लालगंज में नगर पंचायत कार्यालय के सामने वीरा पासी के वक्षस्थल तक की प्रतिमा लगाई गई है। अफसोस शासन और प्रशासन की लापरवाही और निष्ठुरता के कारण लालगंज में वीरा पासी की मूर्ति के आसपास का चबूतरा व गेट टूट चुका है, जिसे बनवाने वाला कोई भी समाजसेवी, जनप्रतिनिधि अथवा प्रशासन सामने नजर नहीं आता है। यथाशीघ्र स्थल का जीर्णोद्धार होना चाहिए।


जातिगत राजनीति का खेल था कि दलित होने के कारण वीरवर वीरा पासी को इतिहास के पन्नों में इंसाफ नहीं मिल सका। महान योद्धा, कुशल अंगरक्षक, सेनापति और स्वामिभक्त होने के बावजूद नाम के आगे पासी शब्द लगा होने के कारण इस वीर पुरुष का नाम गुमनाम हो गया, वरना इस योद्धा का नाम भी इतिहास पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों से लिखा गया होता।

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सरयू-भगवती कुंज
अशोक कुमार गौतम
असिस्टेंट प्रोफेसर
शिवा जी नगर, दूरभाष नगर
रायबरेली (उ०प्र०)
मो0 9415951459

रानी रूदाबाई का इतिहास | Rani Rudabai ( Rupba ) History in Hindi

रानी रूदाबाई का इतिहास | Rani Rudabai ( Rupba ) History in Hindi

१५वीं शताब्दी ईसवीं सन् १४६०-१४९८ पाटन राज्य गुजरात से कर्णावती (वर्तमान अहमदाबाद) के राजा थे राणा वीर सिंह वाघेला, यह वाघेला राजपूत राजा की एक बहुत सुन्दर रानी थी जिनका नाम था रुदाबाई (उर्फ़ रूपबा)। इनकी सुंदरता के चर्चे चारों ओर फैले हुए थे। जितनी ही रूप वान थी उतनी ही दृढ़ संकल्प और साहसी महिला।

रानी रुदाबाई परिवार (Rani Rudabai Family) –

क्रमांकजीवन परिचय बिंदुरुदाबाई जीवन परिचय
1.       पूरा नामरुदाबाई (उर्फ़ रूपबा)
2.       राज्य गुजरात से कर्णावती (वर्तमान अहमदाबाद)
3.       विशेष रानी रुदाबाई की पच्चीस सौ धनुर्धारी वीरांगनाओं ने सुल्तान बेघारा के दस हजार सैनिकों को मार डाला था
4.       प्रसिद्धि का कारण सुल्तान बेघारा को मार कर रानी रुदाबाई ने सीना फाड़ कर दिल निकाल कर कर्णावती शहर के बीच में टांग दिया था
5.       पति का नामराजा वीर सिंह वाघेला
6.       मृत्युजल समाधि

कट्टरपंथी का सीना फाड़ शहर के बीच टांगने वाली रूदाबाई

पाटन राज्य बहुत ही वैभवशाली राज्य था इस राज्य ने कई तुर्क हमले झेले थे, पर कामयाबी किसी को नहीं मिली , सन् १४९७ पाटन राज्य पे हमला किया राणा वीर सिंह वाघेला के पराक्रम के सामने सुल्तान बेघारा की चार लाख से अधिक संख्या की फ़ौज २ घंटे से ज्यादा टिक नहीं पाई थी।

राणा वीर सिंह वाघेला की फ़ौज छब्बीस सौ से अठ्ठाइस सौ की तादात में थी क्योंकि कर्णावती और पाटन बहुत ही छोटे छोटे दो राज्य थे। इनमें ज्यादा फ़ौज की आवश्यकता उतनी नहीं होती थी । राणा जी के रणनीति ने चार लाख की जिहादी लूटेरों की फ़ौज को खदेड दिया था।

इतिहास गवाह है कि कुछ हमारे ही भेदी इस तरह के हुए हैं जो दुश्मनों से जाकर अक्सर मिल जाया करते थे कुछ लालच और लोभ में , इसी तरह द्वितीय युद्ध में राणा जी के साथ रहने वाले निकटवर्ती मित्र धन्नू साहूकार ने राणा वीर सिंह को धोखा दिया । धन्नू साहूकार जा मिला सुल्तान बेघारा से और सारी गुप्त जानकारी उसे प्रदान कर दी, जिस जानकारी से राणा वीर सिंह को परास्त कर रानी रुदाबाई एवं पाटन की गद्दी को हड़पा जा सकता था । सुल्तान बेघारा ने धन्नू साहूकार के साथ मिल कर राणा वीरसिंह वाघेला को मार कर उनकी स्त्री एवं धन लूटने की योजना बनाई ।

सुल्तान बेघारा ने साहूकार को बताया अगर युद्ध में जीत गए तो जो मांगोगे दूंगा, तब साहूकार की दृष्टि राणा वाघेला की सम्पत्ति पर थी और सुल्तान बेघारा की नज़र रानी रुदाबाई को अपने हरम में रखने की एवं पाटन राज्य की राजगद्दी पर आसीन होकर राज करने की थी ।

सन् १४९८ ईसवीं (संवत् १५५५) दो बार युद्ध में परास्त होने के बाद सुल्तान बेघारा ने तीसरी बार फिर से साहूकार से मिली जानकारी के बल पर दुगनी सैन्यबल के साथ आक्रमण किया, राणा वीर सिंह की सेना ने अपने से दुगनी सैन्यबल देख कर भी रणभूमि नहीं त्यागी और असीम पराक्रम और शौर्य के साथ लड़ाई लड़ी, जब राणा जी सुल्तान बेघारा के सेना को खदेड़ कर सुल्तान बेघारा की और बढ़ रहे थे तब उनके भरोसेमंद साथी धन्नू साहूकार ने पीछे से वार कर दिया, जिससे राणा जी की रणभूमि में मृत्यु हो गयी ।

साहूकार ने जब सुल्तान बेघारा को उसके वचन अनुसार राणा जी की धन को लूट कर उनको देने का वचन याद दिलाया तब सुल्तान बेघारा ने कहा …”एक गद्दार पर कोई ऐतबार नहीं करता हैं ,गद्दार कभी भी किसी से भी गद्दारी कर सकता हैं .।” सुल्तान बेघारा ने साहूकार को हाथी के पैरों के तले फेंक कर कुचल डालने का आदेश दिया और साहूकार की पत्नी एवं साहूकार की कन्या को अपने सिपाहियों के हरम में भेज दिया।

रानी रुदाबाई ने महल के ऊपर छावणी बनाई

सुल्तान बेघारा रानी रुदाबाई को अपनी वासना का शिकार बनाने हेतु राणा जी के महल की ओर दस हजार से अधिक लश्कर लेकर पँहुचा, रानी रुदाबाई के पास शाह ने अपने दूत के जरिये निकाह प्रस्ताव रखा, रानी रुदाबाई ने महल के ऊपर छावणी बनाई थी जिसमे पच्चीस सौ धनुर्धारी वीरंगनायें थी, जो रानी रुदाबाई के इशारा पाते ही लश्कर पर हमला करने को तैयार थी। रानी रुदाबाई न केवल सौंदर्य की धनी ही नहीं थी बल्कि शौर्य और बुद्धि की भी धनी थी , उन्होंने सुल्तान बेघारा को महल द्वार के अन्दर आने को कहा, सुल्तान बेघारा रानी को पाने के लालच में अंधा होकर वैसा ही किया जैसा रुदाबाई ने कहा, और रुदाबाई ने समय न गंवाते हुए सुल्तान बेघारा के सीने में खंजर उतार दिया और उधर छावनी से तीरों की वर्षा होने लगी जिससे शाह का लश्कर बचकर वापस नहीं जा पाया।

सुल्तान बेघारा को मार कर रानी रुदाबाई ने सीना फाड़ कर दिल निकाल कर कर्णावती शहर के बीच में टांग दिया था , और उसके सर को धड़ से अलग करके पाटन राज्य के बीच टंगवा दिया, साथ ही यह चेतावनी भी दी गई कि कोई भी आततायी भारतवर्ष पर, या हिन्दू नारी पर बुरी नज़र डालेगा तो उसका यही हाल होगा ।
रानी रुदाबाई की पच्चीस सौ धनुर्धारी वीरांगनाओं ने सुल्तान बेघारा के दस हजार सैनिकों को मार डाला था।
रानी रुदाबाई इस युद्ध के बाद जल समाधी ले ली ताकि उन्हें कोई और आक्रमणकारी अपवित्र न कर पाएं ।

भारतवर्ष में ही ऐसी वीरांगनाओं की कथाएँ मिलेंगी जिन्होंने अपने राज्य और देश की सेवा में अपना सर्वस्व निछावर किया और इतिहास लिखकर कुछ कर गई। अब हम पर है कि हम उनको, उनकी शहादत को किस तरह सम्मान देते हैं।

अंजना छलोत्रे

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