तंबाकू की हैवानियत / अशोक कुमार गौतम

“बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथहिं गावा।।”

(उत्तरकाण्ड- रामचरित मानस)

तंबाकू की हैवानियत

मानव रूप में जीवन पाना ईश्वर का दिया हुआ सबसे खूबसूरत उपहार है। जिसे सजा-संवार कर बनाए रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। तंबाकू के सेवन से हम अपना खुशहाल जीवन बर्बाद कर देते हैं। ‘नशा’ नाश की जड़ है, इस सूक्ति को भूलकर विभिन्न माध्यमों में तंबाकू खाते पीते हैं, जिससे असमय मृत्यु हो जाती है। विश्व के विभिन्न देशों में सन 1500 ई0 के बाद तंबाकू का सेवन प्रारंभ हो गया था। तब तंबाकू सिर्फ छोटे व्यापार का माध्यम हुआ करती थी। पुर्तगाल के व्यापारियों द्वारा भारत में सन 1608 ई0 में तंबाकू का पहला पौधा रोपा गया था। वह पौधा आज लगभग संपूर्ण भारत में लह-लहा रहा है। सन 1920 में जर्मन के वैज्ञानिकों ने तंबाकू से होने वाले कैंसर का पता लगाया था और सभी देशों को सचेत किया था। परंतु सन 1980 में तंबाकू खाने से होने वाले कैंसर की पुष्टि हुई है। निकोटियाना प्रजाति के पेड़ों के पत्तों को सुखाकर तंबाकू बनाया जाता है, जिसका प्रयोग सिगरेट, गुटखा, पान आदि के माध्यम से करते हैं। मध्यप्रदेश में तेंदू के पत्तों से बीड़ी बनाई जाती है जिसके अंदर भी तंबाकू भरते हैं। तम्बाकू में निकोटीन पाया जाता है जो शरीर की नसों को शनैः शनैः ब्लॉक करने लगता है, जिससे चेहरे की चमक तक चली जाती है। मुँह भी पूरा नहीं खोल पाते हैं।
अखिल विश्व में तंबाकू का प्रयोग दो प्रकार से होता है- चबाकर खाना और धुंआ के द्वारा। दोनों ही प्रकार से तंबाकू द्वारा बने उत्पादों का सेवन करने से मुख में कैंसर, गले में कैंसर, फेफड़ों में कैंसर, हृदय रोग दमा आदि बीमारियाँ हो जाती हैं। ये बीमारियाँ अकाल जानलेवा बन जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) के सर्वे में विश्व में प्रतिवर्ष 60 लाख से अधिक लोगों की असमय मृत्यु का कारण तंबाकू है। इसके दुष्परिणामों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 31 मई सन 1988 को अंतरराष्ट्रीय बैठक करके यह निर्णय लिया कि तंबाकू सेवन की रोकथाम और निवारण के लिए प्रतिवर्ष 31 मई को ‘विश्व तंबाकू निषेध दिवस’ मनाया जाएगा। वर्ष 2008 में भारत सरकार ने तंबाकू से जुड़े विज्ञापनों पर रोक लगा दी तथा तंबाकू से जुड़े सभी उत्पादों जैसे गुटखा, बीड़ी, सिगरेट, पान में प्रयोग की जाने वाली तंबाकू आदि के पैकेट ऊपर बिच्छू का चित्र, मुंह में कैंसर वाली मानवाकृति छपवाने का आदेश दिया। इतना ही नहीं नशा से जुड़ी हर पाउच, पैकेट, बोतल पर स्लोगन भी लिखवाया जाता है कि तंबाकू सेवन/मदिरा सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
भारत सरकार ने सार्वजनिक स्थानों जैसे बस स्टेशन, रेलवे स्टेशन, चिकित्सालय, स्कूल, कॉलेज, विभिन्न कार्यालयों आदि में धूम्रपान करने पर अर्थदंड का प्रावधान किया है। साथ ही 18 वर्ष से कम आयु के लड़कों को तंबाकू से जुड़े उत्पादों की बिक्री पर रोक लगा दी गयी है। यदि देखा जाए तो धूम्रपान की शुरुआत अक्सर शौकिया लोग करते हैं, लेकिन शुरू में खुशी या गम का इजहार करने का शौक समय के साथ लत बन जाता है जो प्राणघातक है। आज की युवा पीढ़ी अपने शौक पूरा करने तथा दोस्ती को प्रगाढ़ बनाने के लिए धूम्रपान कर रही है। तंबाकू का सेवन किसी भी रूप में करना मीठा जहर है जिसके प्रति शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लड़के लड़कियां अधिक आकर्षित हो रही हैं। इसके दुष्परिणाम बहुत ही घातक होंगे। यह युवा पीढ़ी के लिए चिंता का विषय है।
सरकार विभिन्न विज्ञापनों में करोड़ों रुपए खर्च करती है जिससे तंबाकू से लोगों को छुटकारा मिले। एक सिगरेट पीने से 11 मिनट आयु कम होती है तथा विश्व में 6 सेकंड में एक मृत्यु तंबाकू से होने वाले कैंसर से होती है। तम्बाकू सेवन छुड़ाने के लिए आयुर्वेद को बढ़ावा दिया जाए, जिससे इस बीमारी और लत को रोका जा सके।
भारत में विडम्बना है कि नशा मुक्ति अभियान में करोड़ों रुपए खर्च करके आमजन को जागरूक करने का सार्थक प्रयास किया जाता है, किंतु ‘नशा’ से जुड़ी वस्तुओं और अन्य मादक पदार्थों के उत्पादन पर रोक नहीं लगाई जाती है? यह भी वास्तविकता है कि धूम्रपान/आबकारी विभाग से सरकार को राजस्व प्राप्त होता है, परन्तु मानव जीवन को खतरा में डालना भी अनुचित है। इसलिए हम जिम्मेदार नागरिकों को संकल्प लेना होगा कि न नशा करेंगे, न किसी को प्रेरित करेंगे। नशा न करने से घर की अर्थव्यवस्था सुदृढ होगी, साथ ही पारिवारिक स्नेह, आत्मीय सम्मान और शारीरिक, मानसिक बल मिलेगा।

         
सरयू-भगवती कुंज,
अशोक कुमार गौतम
(असिस्टेंट प्रोफेसर)
शिवा जी नगर, रायबरेली
मो. 9415951459

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