डॉ. अंबेडकर के राष्ट्रवादी विचार | Nationalism thoughts of Dr Ambedkar

डॉ. अंबेडकर के राष्ट्रवादी विचार | Nationalism thoughts of Dr Ambedkar

“जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता हांसिल नहीं कर लेते, कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वो आपके किसी काम की नहीं।”

– डॉ भीमराव अम्बेडकर

बाबा साहब डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का जीवन परिचय / Dr Bhim Rao Ambedkar Biography in Hindi

भारत रत्न, ज्ञानवान, दूरदृष्टा, अर्थशास्त्री, मुक्तिदाता, संविधान निर्माता, समता मूलक भाव रखने वाले, करुणा, मैत्री और बंधुत्व की भावना से परिपूर्ण बाबा साहब डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल सन 1891 को मध्य प्रदेश राज्य के इंदौर जिला में महू सेना छावनी में हुआ था। डॉ. अंबेडकर के पिता का नाम राम जी राव और माता का नाम भीमाबाई था। डॉ. अंबेडकर अपने पिता की चौदहवीं संतान थे। डॉ. अंबेडकर के अलावा उनके दो भाई बलवंत और आनंद राव तथा उनकी दो बहनें मंजुला और तुलसा ही जीवित रह पाई थी। डॉ. अंबेडकर जब मात्र 5 वर्ष के थे तभी उनकी माता भीमाबाई का निधन 1896 ईस्वी को हो गया था। बचपन में ही माता का साया सिर से उठ गया तब उनकी बुआ मीराबाई ने माँ की कमी नहीं होने दी और उनका लालन-पालन बड़े स्नेह से किया। अबोध बालक भीमराव के पिता राम जी राव सेना में सूबेदार पद से सेवानिवृत्त हो चुके थे। पिता ने मराठा विद्यालय में उनका दाखिला करा दिया। भीमराव अंबेडकर का जन्म अछूत (महार) जाति में होने के कारण प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए बहुत बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। उन्हें विद्या ग्रहण करने के लिए कमरे से बाहर (जहाँ जूता चप्पल उतारे जाते थे के पास) बैठकर पढ़ना पड़ता था। अन्य मराठा छात्र उनके साथ अमानवीय व्यवहार करते थे, किताब-कॉपी नहीं छूने देते थे। यहाँ तक अंबेडकर अपने हाँथों से घड़ा का पानी निकाल कर भी नहीं पी सकते थे, दूसरे विद्यार्थी दूर से पानी पिलाते थे। बाबा साहब उसी प्रकार स्कूल में दबकर रहते थे, जिस प्रकार 32 दाँतों के बीच जीभ रहती है। बालक भीमराव अंबेडकर अपने साथ हो रहे दुर्व्यवहार को सीने में दफन करके अपनी पढ़ाई की ओर ध्यान देते थे क्योंकि पढ़ने की असीम चेष्टा उनके अंदर विद्यमान थी। डॉ आंबेडकर जब 14 वर्ष के हुए तभी उनका विवाह 9 वर्ष की रमाबाई से कर दिया गया था। जैसे-जैसे अंबेडकर बड़े होते गए उनके जीवन में समस्याएं भी बढ़ती गई। जलती छुआछूत का प्रकोप आपको अपमानित करता था, लताड़ता था। वह जीवन जिया है आपने। आज की पीढ़ी तत्कालीन भारतीय समाज में निम्न जाति के प्रति घृणित और दूषित भावना की कल्पना भी नहीं कर सकती है।

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उदार प्रवृत्ति के बाबा साहब के जीवन में सबसे दुःखद समय तब आया जब उनकी प्रिय पत्नी जो हर समय सुख-दुःख में साथ खड़ी रहती थी, जिन्हें प्यार से रामू कह कर पुकारते थे वह बीमार हो गई और गरीबी के कारण इलाज न होने के कारण सन 1935 में स्वर्गवासी हो गईं। उस समय अंबेडकर ने खुद को अकेले महसूस किया। दुःख की इस घड़ी में टूट गए थे, हताश हो गए थे किंतु आपके अंदर एक अटूट विश्वास और अदम्य साहस था जिसके बल पर आपने स्वयं को वह जंग लड़ने के लिए तैयार किया जिसके लिए पृथ्वी पर आपका जन्म हुआ था। वह जंग थी ‘शूद्र स्वतंत्रता।’ अम्बेडकर जी ने 20 मार्च सन 1927 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के महाड़ स्थान पर दलितों के साथ चवदार तालाब में अपने हाँथ से पानी पीकर पानी का अधिकार प्राप्त किया था। 25 दिसम्बर सन 1927 को महाड़ तालाब के किनारे पुरुष सत्तात्मक और वर्ण के आधार पर भेदभाव करने वाला ग्रंथ मनुस्मृति का दहन किया था। मनुस्मृति में लिखा है- स्त्रीशूद्रो नाधीयताम अर्थात स्त्री औऱ शूद्र ज्ञान प्राप्त न करे।

मनुस्मृति के अनुसार अन्य वर्णों के लिए अपराध पर आर्थिक दंड का प्रावधान था, जबकि शूद्रों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान था- शतं ब्राह्मण मकृष्य क्षत्रियों दंडं अहर्ति। वैश्यों व्यर्थ शतं द्वेवा, शूद्रस्तु वधम अहर्सि। (मनुस्मृति 8/267)। मनुस्मृति के पदचिन्हों पर चलते हुए तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है- पूजिअ विप्र सील गुन हीना। शूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।। (अरण्यकाण्ड 1/34)

भारत में डॉक्टर अंबेडकर के जीवन में जातिवाद का ज़हर घोलने वाले हजारों दुश्मन चारों ओर मधुमक्खियों की तरह फैले हुए थे, किंतु आपकी प्रतिभा, नेक इरादे, प्रबल इच्छा शक्ति एवं ओजस्वी विचारधारा के आगे दुश्मन सदैव नतमस्तक थे। डॉ. अंबेडकर के विषय में हम कह सकते हैं कि यह संसार एक सौरमंडल की तरह है और आप उस सौरमंडल का सूर्य।
डॉक्टर अंबेडकर धन्य हैं जिनके पास अदम्य साहस, हिमालय पर्वत के समान दृढ़ संकल्पित इरादे जिन्हें डगमगाने की इस दुनिया में किसी के पास साहस न था। आपके आगे पूरा विश्व नतमस्तक हो गया था। इसी असीम ज्ञान के कारण समस्त मानव जाति का प्रेरणास्रोत बन गए।

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सन 1947 में जब भारत अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हुआ तब इस भारतीय लोकतंत्र को संचालित करने का कोई नियम व कानून नहीं था, इसलिए भारतीय संविधान जो विश्व का सबसे बड़ा संविधान और सबसे बड़ा लोकतंत्र को संचालित करता है को तैयार करने की किसी अन्य के पास योग्यता न थी, तब डॉ आंबेडकर को एक टीम के साथ इस नेक एवं बड़े महत्वपूर्ण कार्य के लिए उपयुक्त माना गया, किंतु सभी लोग किसी न किसी कारण से अलग हो गए। तब डॉ. अंबेडकर को सौंपी गई एक बड़ी जिम्मेदारी को अपनी कठोर मेहनत और लगन से निष्ठापूर्वक 18 घंटे लगातार काम करके बखूबी निभाया। इस बीच डॉक्टर अंबेडकर को मधुमेह हो जाने के कारण स्वास्थ्य खराब होने लगा फिर भी उन्होंने अथक प्रयासों के बाद 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में भारतीय संविधान पूर्ण किया। लगभग 6.4 करोड़ रुपये खर्च हुए। प्रारूप पर 114 दिन बहस चली। मूल संविधान में 22 भाग, 8 अनुसूचियाँ और 395 अनुच्छेद हैं। प्रमुख अंश विभिन्न देशों से भी लिए गए हैं। भारत का संविधान 26 नवम्बर सन 1949 को बनकर तैयार हुआ और 26 जनवरी सन 1950 को लागू हुआ। विश्व का सबसे बड़ा संविधान भारत का है। संविधान की मूल प्रति हिंदी और अंग्रेजी भाषा में हस्तलिखित है। भारतीय संविधान को राष्ट्रीय ग्रंथ की उपाधि दी गई है। उससे भारत का लोकतंत्र संचालित होता है और उसका सम्मान सभी भारतीय हृदय से करते हैं। दिन प्रतिदिन बिगड़ते स्वास्थ्य का इलाज महाराष्ट्र के एक अस्पताल में करा रहे थे। उन दिनों उनकी देखभाल करने वाला कोई जिम्मेदार व्यक्ति नहीं था अस्पताल की नर्स शारदा कबीर (ब्राम्हण) उनकी देखभाल जिम्मेदारी के साथ कर रही थी। इस कारण शारदा का स्नेह डॉक्टर अंबेडकर के प्रति बढ़ता गया और सन 1948 में नर्स के साथ अंबेडकर का विवाह संपन्न हो गया। विवाह बाद शारदा कबीर का नाम बदलकर सविता अंबेडकर नाम रखा गया।

डॉ. अंबेडकर प्रारंभ से ही हिंदू धर्म में समावेशित उन कुरीतियों और कुप्रथाओं के आलोचक रहे हैं, जो मानवता के खिलाफ थीं। हिंदू धर्म प्रारंभ से ही ऊँच-नीच में विश्वास करता रहा है जो मानवता के बिल्कुल प्रतिकूल है।शूद्र जातियों के साथ कुत्ते बिल्लियों से बदतर व्यवहार किया जाता था। शूद्र लोग जब पगडंडियों से निकलते थे तो कमर में झाडू, गले में मटका बाँधकर ही निकलते थे। अंबेडकर ने हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध आदि धर्मों का गहनता के साथ अध्ययन किया। अंततः आप बौद्ध धर्म से प्रभावित हुए और 14 अक्टूबर 1956 को 22 प्रतिज्ञा के साथ आपने अपनी पत्नी और लगभग 5,00000 अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया। डॉक्टर अंबेडकर बौद्ध धर्म के सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए श्रीलंका, म्यांमार गए। डॉ. अंबेडकर ने अपना अंतिम लेख ‘द बुद्ध एंड हिज धम्म’ सन 1956 में पूर्ण किया था। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान बुद्ध से है। डॉक्टर अंबेडकर बीसवीं सदी के सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में प्रसिद्ध हुए। डॉक्टर अंबेडकर एक विश्व प्रसिद्ध शख्सियत थे जिन्होंने गरीबों, वंचितों, महिलाओं, बच्चों मजदूरों आदि की आवाज बुलंद की। डॉक्टर अंबेडकर कहते थे शिक्षा वह शेरनी का दूध है जो पियेगा दहाड़ेगा इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि डॉक्टर अंबेडकर के अंदर ज्ञान की गंगा बहती थी। डॉक्टर अंबेडकर को अमेरिका में ज्ञान का प्रतीक Symbol of Knowledge कहा जाता है, तो वहीं भारत में दुर्भाग्य है कि आपके पुतले तोड़े जाते हैं, गाली दी जाती हैं और उन्हें अपमानित किया जाता है। डॉक्टर अंबेडकर किसी एक जाति के नहीं थे वरन सभी के उद्धारक थे किंतु अफसोस होता है छोटी जाति में पैदा होने के कारण उनके साथ समानता के व्यवहार आज भी नहीं किया जाता है।

सर्वविदित है उस समय शूद्र अछूत कहे जाने वाले समाज को शिक्षा अर्जित करना हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार दंडनीय व प्रतिबंधित था और धर्म का उल्लंघन भी। मान्यता थी कि मनुस्मृति के अनुसार शूद्र सिर्फ अपने जाति आधारित कर्म करेगा, इसके अलावा कुछ भी नहीं करेगा। जब डॉक्टर अंबेडकर को शिक्षा ग्रहण करने की बात आई तो सामंतवादी व्यवस्था प्रणाली में अंबेडकर को स्कूल में दाखिला लेने से इनकार कर दिया गया। उनके अंदर शिक्षा प्राप्त करने की असीम जिज्ञासा थी वह इसके लिए किसी भी रास्ते से गुजरने को तैयार थे। अंबेडकर साहब अपना पूरा ध्यान पठन-पाठन में लगाते थे, किंतु कक्षा के अन्य बच्चे उस अबोध निरीह बालक को अछूत महार कह कर उसके साथ अनुचित व्यवहार करते थे। डॉक्टर अंबेडकर अपने साथ ज्यादती को महसूस करते और सहन भी करते थे, किंतु उनका कोई साथी ही न होने कारण अपमान के कड़वे घूंट पीने के लिए मजबूर थे। उस दर्द को सीने में दफन कर लेते थे और अपने जीवन में लक्ष्य की ओर अग्रसर करते रहते थे। तनिक भी समय नष्ट नहीं करते थे। अंबेडकर ने मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। स्नातक परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की, तत्पश्चात पिता का देहावसान हो गया तब उन्हें एक बड़ा झटका लगा। वह दिन उनके जीवन का सर्वाधिक दुखद दिन था। आर्थिक समस्या से जूझ रहे अंबेडकर की शेष शिक्षा बाधित होने लगी थी लेकिन कहते हैं परिश्रमी का साथ ईश्वर भी देता है। तो अंबेडकर की प्रतिभा से प्रभावित होकर महाराष्ट्र के बड़ौदा नरेश सयाजी राव गायकवाड ने उनके आगे की पढ़ाई पूर्ण करने की जिम्मेदारी लेकर उन्हें 25 रुपये मासिक छात्रवृत्ति देने की घोषणा की, इस शर्त के साथ कि अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद 10 वर्ष बड़ौदा रियासत में सेवा करेंगे। डॉक्टर अंबेडकर ने आगे की शिक्षा, वकालत, शोधकार्य, डॉक्टरेट उपाधियाँ अमेरिका, लंदन, ओसामिया में जाकर पूर्ण किया। हमारे लिए बड़ा ही गौरवशाली व्यक्तित्व था जिसने देश-विदेश तक अपने ज्ञान का परचम लहराया। त्याग, परिश्रम व लंबे संघर्ष के बाद शिक्षा जगत में अपना अद्वितीय स्थान रखने वाले प्रथम भारतीय बन गए। डॉक्टर अंबेडकर के अंदर विद्यमान अपार ज्ञान सदैव अतुलनीय रहेगा क्योंकि आप स्वयं विश्व प्रेरक हैं। आपका कहना था जिस समाज में व्याप्त वर्षों पुराने कृतियों का अंत करना है तो व्यक्ति को पूर्ण शिक्षित होना पड़ेगा तभी सभी बुराइयों को नष्ट कर सकते हैं, इसलिए ‘शिक्षित बनो संगठित रहो।’ बाबा साहब स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री 15 अगस्त 1947 से सितंबर 1951 तक रहे। 29 अगस्त 1947 से 24 जनवरी 1950 तक मसौदा समिति के अध्यक्ष थे। 3 अप्रैल 1952 से 6 दिसम्बर 1956 तक राज्यसभा सदस्य थे।

भारत राष्ट्र को बाबा साहब की देन
(स्रोत : पुस्तक- भारतरत्न भीमराव अंबेडकर, लेखक डॉ एम.एल. परिहार, प्रकाशक बुद्धम पब्लिशर्स जयपुर)

  • रोजगार कार्यालय की स्थापना, कर्मचारी राज्य बीमा निगम,
  • काम का समय 12 घण्टे से कम करके 8 घण्टा,
  • महिलाओं को प्रसूति अवकाश, मंहगाई भत्ता,
  • अवकाश का वेतन,
  • हेल्थ इंश्योरेंस,
  • कर्मचारी भविष्य निधि,
  • श्रमिक कल्याण कोष,
  • तकनीकी प्रशिक्षण योजना,
  • सेंट्रल सिचाई आयोग का गठन
  • वित्त आयोग का गठन,
  • मतदान का अधिकार,
  • भारतीय सांख्यकीय कानून,
  • हीराकुंड बाँध,
  • दामोदर घाटी परियोजना,
  • ओडिशा नदी परियोजना,
  • भाखड़ा नागल बाँध,
  • भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना।


मधुमेह के कारण बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर का स्वास्थ्य बिगड़ता ही चला गया है और युगपुरुष डॉक्टर अंबेडकर 65 वर्ष की उम्र में 6 दिसंबर सन 1956 गुरुवार की रात चिरनिद्रा में हमेशा के लिए लीन हो गए। आपकी स्मृतियों को संजोने के लिए मुम्बई के चैत्यभूमि में भव्य समाधि स्थल बनाया गया है।

अशोक कुमार गौतम
असिस्टेंट प्रोफेसर (अध्यक्ष हिंदी विभाग)
शिवा जी नगर, दूरभाष नगर
रायबरेली (उप्र)
मो. 9415951459

डॉ. चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव का जीवन परिचय | Dr. Chumman Prasad Srivastava Biography in hindi

आदित्य अभिनव उर्फ़ डॉ. चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव का जीवन परिचय | Dr. Chumman Prasad Srivastava Biography in Hindi

हिंदी साहित्य का वो नाम जो किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है। वर्तमान हिन्दी के उन्नयन की कहानी में प्रभावशाली योगदान का संकल्प मुखरित हुआ डॉ. चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव के द्वारा। किसी के व्यक्तित्व पर लिखना एक उलझन पूर्ण और चुनौती भरा कार्य है। वह व्यक्ति विशेष यदि रचनाकार हो तो मुश्किलें और बढ़ जाती है क्योकि उसके बाहर -भीतर की अपेक्षा एक समानान्तर संसार की हलचल सदैव उपस्थित रहती है। उसी से वह भाव ग्रहण करता है और उसी पृष्ठभूमि से अनुभूति ग्रहण कर अपनी लेखनी से कुछ समाज के जिन पड़ावों मोड़ो से होकर गुज़रता है वही उसके सौन्दर्य की निरन्तरता बन जाती है। बाह्य और अन्तस के समानुपात में वह सादगी और सौम्यता के लिए संदेश देकर मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से सचेतन रचनाकार की श्रेणी में पहुँच जाता है। साहित्य में डॉ. चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव एकांत भाव में स्वान्तः सुखाय सर्जन करने वाले रचनाकार है।

आदित्य अभिनव उर्फ़ डॉ. चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव का जीवन परिचय Dr. Chumman Prasad Srivastava Biography in hindi )

क्रमांकजीवन परिचय बिंदुडॉ. चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव जीवन परिचय
1.       पूरा नामडॉ. चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव
2.       अन्य नामआदित्य अभिनव
3.       जन्म30 जून 1970
4.       जन्म स्थानभटगाई, प्रखण्ड – तरैया, जिला- छपरा ( सारण) बिहार – 841424
5.       माता-पिताश्रीमती कांती देवी – स्व0 पांडेय कमलेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव
6.       शिक्षाएम. ए. (हिंदी) , पी. एच . डी.
7.       रचनाएँ- शोध प्रबंध प्रपत्तिपरक गीतों की परम्परा और निराला के प्रपत्तिपरक गीत ‘’ ( 2012)
प्रमुख कविताएँ – अमर शहीद , चमक , रावण- दहन , सूरज का गाँव , मरी हुई मछली की बू , तय है, भारतीय प्रजातंत्र, किन्नर, रजनी , राष्ट्रभाषा हिंदी , गण और तंत्र , विकास , रोटी, पिता के आँसू आदि
काव्य संग्रह – “ सृजन संगी ‘’ ( साँझा काव्य संकलन ) ( प्रकाशन वर्ष 2006) , “ सृजन के गीत ’’ ( प्रकाशन वर्ष 2018 ),
“ हाँ ! मैं मज़दूर हूँ ‘’ ( साझा काव्य संग्रह) ( प्रकाशन वर्ष 2020 )
प्रमुख कहानियाँ – “ ताज़िया ” , “ सुंदरी ” , “ मानुष तन “ , “ मज़बूर’’ , “ एहसान’’ , “अंतिम सम्बोधन ‘’, “ ऐसा तो होना ही था ‘’ , “बँधी प्रीत की डोर ‘’ , “ रुका न पंछी पिंजरे में ‘’ , “ फरिश्ते ‘’ “दंश’’ “कोख ‘’ , “ क्षितिज के पार ‘’, “माँ ‘’, “ स्वप्नजाल’’, “ कवने घाट पर सौनन भईली’’ आदि
8.       समीक्षा “ वैदिक एवं उपनिषद् साहित्य और निराला’’ (2013) , “ विशिष्टाद्वैत और निराला ‘’ (2013) “ निराला के भक्ति पर तुलसी का प्रभाव ‘’ (2014) “ प्रपत्ति : अर्थ और स्वरूप ‘’ (2014) , “ शांकर वेदांत और निराला ‘’ (2014) , “ शमशेर की कविता : अतियथार्थवादी रूप में’’ (2015) , “ निराला के प्रपत्तिपरक गीतों के दार्शनिक आधार ‘’(2015) , “ पारसी थियेटर का भारत में नया स्वरूप ‘’ (2015) , “ भूमण्डलीकरण , भारतीय किसान और हिंदी साहित्य ‘’ (2015) , “ उसने कहा था : एक कालजयी कहानी ‘’ (2016) , “ सूर साहित्य में लोक गीत और लोक नृत्य ‘’ (2018) , “ दिनकर के काव्य में क्रांति और विद्रोह का स्वर ‘’ (2019) ,” दिनकर के काव्य में सर्प बिम्ब ‘’ (2020) , “ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और निराला ‘’ आदि
9.       विशेष आकाशवाणी – बीकानेर , जोधपुर और गोरखपुर से कविता का प्रसारण
दूरदर्शन – मारवाड़ समाचार , जोधपुर से कविता का प्रसारण
सम्पादन सहयोग – “ मानव को शांति कहाँ ‘’ (मासिक पत्रिका) (2004- 2008 तक उप संपादक )
आयोजन सचिव – “ महामारी ,आपदा और साहित्य ‘’ पर एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेविनार
( 13 जून 2020)( आयोजक – भवंस मेह्ता महाविद्यालय, भरवारी,यूपी)
व्याख्यान – “ सिनेमा और साँझी विरासत ‘’ (14 जुलाई 2020 ) वाड़.मय पत्रिका ,अलीगढ़ और विकास प्रकाशन ,कानपुर के संयुक्त तत्वाधान में ।
सम्मान – साहित्योदय सम्मान (2020) , लक्ष्यभेद श्रम सेवी सम्मान(2020)
10.   धर्महिन्दू
11 .पता आदित्य अभिनव उर्फ डॉ. चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव
सहायक आचार्य (हिंदी)
भवंस मेह्ता महाविद्यालय , भरवारी
कौशाम्बी (उ. प्र. )
पिन – 212201
12 .नागरिकता भारतीय
13 .संपर्क सूत्र मोबाइल 7767041429 , 7972465770
ई –मेल [email protected]

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मिल्खा सिंह जीवन परिचय | Milkha Singh biography and quotes in hindi

मिल्खा सिंह जीवन परिचय | Milkha Singh biography and quotes in hindi

फ्लाइंग सिख नाम से मशहूर एथलीट  मिल्खा सिंह ऐसे खिलाडी थे जिन्होंने देश के लिए कई स्वर्ण पदक जीते , भारतीया  आर्मी में रहकर एक सफलतम धावक के रूप में विश्व में एक पहचान बनायीं।  विभाजन के दौरान अनाथ हो गए थे , लेकिन कभी न हारने का जज्बा ने उन्हें देश का एक सफलतम धावक धावक बना दिया।

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मिल्खा सिंह जीवन परिचय | Milkha Singh biography and quotes in hindi

  • नाम –  मिल्खा सिंह 
  • जन्म –  20 नवंबर  1929
  • जन्मस्थान –   गोविंदपुरा पंजाब  (जो अब पाकिस्तान का हिस्सा हैं)
  • मृत्यु -१८ जून २०२१ (आयु ९१) चंडीगढ़, भारत
  • पत्नी का नाम – निर्मल कौर ( मृत्यु २०२१ )
  • राष्टीयता – भारतीय 
  • पुत्र का नाम – जीव मिल्खा ( गोल्फ खिलाडी )
  • संतान – ४ 
  • खेल – धावक( ट्रैक एंड फील्ड इवेंट )
  • सम्मान – एशियाई खेलो में – ४ पदक ,  राष्ट्रमंडल खेलों – १ पदक 
  • पुस्तक – आत्मकथा द रेस ऑफ़ माई लाइफ़

Milkha singh love story

मिल्खा सिंह को 1956 के खेल में ऑस्ट्रेलिया की महिला खिलाड़ी बेट्टी कथवर्ट से प्रेम हो गया था, फिर वो इस महिला खिलाड़ी से 1960 में दोबारा मिले, रिपोर्ट्स के अनुसार जब 2006 में खेलो का आयोजन  ऑस्ट्रेलिया में हुआ तो फोन उस महिला खिलाड़ी को लगाया तो उसके लड़के ने उठाया, बताया कि उसकी माँ की मौत कैंसर से हो चुकी है, मिल्खा सिंह जब गांव में रहते थे तब भी उनको वहाँ पर भी एक लड़की से प्रेम था, इसके बाबजूद उनका विवाह वालीवाल  महिला खिलाडी निर्मल कौर से हुआ था।

Milkha singh quotes in hindi

1 .अनुशासन, कड़ी मेहनत, इच्छा शक्ति… मेरे अनुभव ने मुझे इतना कठिन बना दिया कि मैं मौत से भी नहीं डरता।” लेकिन एक कहानी उनकी इच्छा को सबसे स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

2. आप जीवन में कुछ भी हासिल कर सकते हैं। यह सिर्फ इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसे हासिल करने के लिए कितने बेताब हैं।

3. मैं यह सोचकर आंसू बहा रहा था कि एक रात पहले मैं कुछ न होने से कुछ बन गया था।

4. जब मैं अपने जीवन पर चिंतन करता हूं, तो मैं स्पष्ट रूप से देख सकता हूं कि दौड़ने का मेरा जुनून मेरे जीवन पर कैसे हावी हो गया है। मेरे दिमाग में जो चित्र कौंधते हैं, वे दौड़ते हैं… दौड़ते हैं… दौड़ते हैं…

5. हमारे अमेरिकी कोच, डॉ. [आर्थर डब्ल्यू] हॉवर्ड, भारतीय टीम के साथ [कार्डिफ के लिए] थे ….डॉ हॉवर्ड की प्रेरणा और सलाह के कारण, मैंने गर्मी के बाद गर्मी जीती और आसानी से फाइनल में पहुंच गया।

6. इनमें से प्रत्येक क्षण कड़वी मीठी यादों को वापस लाता है क्योंकि वे मेरे जीवन के विभिन्न चरणों का प्रतिनिधित्व करते हैं, एक ऐसा जीवन जिसे मेरे चुने हुए व्यवसाय में जीत के लिए मेरे गहन दृढ़ संकल्प से बचाए रखा गया है।

7. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मुझे पहले 300 मीटर तक अपनी गति बनाए रखनी चाहिए, और फिर अंतिम 100 मीटर में अपना पूरा योगदान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर मैं पहले 300 मीटर पूरी गति से दौड़ता, तो स्पेंस भी ऐसा ही करते, हालांकि यह उनकी दौड़ने की रणनीति नहीं थी।

8. मैं तब तक नहीं रुकता जब तक मैं अपने पसीने से बाल्टी नहीं भर लेता। मैं अपने आप को इतना धक्का दूंगा कि अंत में मैं गिर जाऊं और मुझे अस्पताल में भर्ती होना पड़े, मैं भगवान से प्रार्थना करूंगा कि मुझे बचाए, वादा करता हूं कि मैं भविष्य में और अधिक सावधान रहूंगा। और फिर मैं यह सब फिर से करूँगा।

9. मेरे लिए ट्रैक, एक खुली किताब की तरह था, जिसमें मैं जीवन के अर्थ और उद्देश्य को पढ़ सकता था। मैंने इसका सम्मान ऐसे किया जैसे मैं एक मंदिर के गर्भगृह में होता, जहाँ देवता निवास करते थे और जिसके सामने मैं एक भक्त के रूप में विनम्रतापूर्वक स्वयं को प्रणाम करता था। अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहने के लिए, मैंने सभी सुखों और विकर्षणों को त्याग दिया, अपने आप को फिट और स्वस्थ रखने के लिए, और अपना जीवन उस जमीन को समर्पित कर दिया जहां मैं अभ्यास और दौड़ सकता था। इस तरह दौड़ना मेरा भगवान, मेरा धर्म और मेरा प्रिय बन गया था

FAQ 

उत्तर – 1 .  फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह दूसरा नाम है जो पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल अयूब खान ने दिया था।

उत्तर – २.  भाग मिल्खा भाग मूवी२०१३ में आयी थी , जिसका निर्देशन राकेश ओमप्रकाशमेहरा ने किया था।

उत्तर -३. मिल्खा सिंह की लम्बाई 178 सेंटीमीटर है और उनका वजन 70 kg है

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राजस्थान की धरती ने वीरों को जन्म दिया है उन्ही वीरों में रावल रतन सिंह का नाम आपने शायद न सुना हो लेकिन आप रानी पद्मावती को जानते होंगे उन्ही के पति रावल रतन सिंह मेवाड़ की जीवनी के बारे में इस लेख में बात करेंगे, चित्तौड़ की महारानी का जौहर , राजपूत सैनिको के द्वारा अलाउदीन का सामना करना इस लेख में बताया गया है।

रावल रतन सिंह का जीवन परिचय एवं इतिहास


नाम – रावल रतन सिंह
पिता का नाम -रावल समरसिंह
शासक – मेवाड़ के ४२ शासक ( अंतिम शासक )
शासन वर्ष – १३०२ -१३०३ ( एक वर्ष )
वंश – गुहिल वंश
मृत्यु – अलाउद्दीन खिलजी के द्वारा धोखे से
पत्नी -रानी पद्मावती
भाई – २ (राघव और चेतन )


रावल रतन सिंह मेवाड़ कौन थे

रावल रतन सिंह १३ शताब्दी में जन्मे चितौड़ के राजपूत राजा थे , राजा रत्न सिंह के बारे में जानकारी हिंदी के महाकाव्य पद्मावत में मिलती है ,अपने वंश के अंतिम शासक भी थे। राजा रतन सिंह शादीशुदा थे १३ रानी उनके महल में निवास करती थी , लेकिन राजपूत खून होने की वजह से वह महाराजा मलखान सिंह को युद्ध में हराकर  रानी पद्मावती से विवाह किया , इसके बाद उनके द्वारा जीवन में कोई विवाह नहीं किया गया।

रावल रतन सिंह की मृत्यु का कारण क्या था ?


रावल रतन सिंह की मृत्यु की वजह अलाउदीन की राजनीतिक  महत्वाकांक्षा थी ,रत्न सिंह के भाइयों के द्वारा  अलाउदीन से मिलकर उनकी पत्नी पद्मावती की सुंदरता की चर्चा की , जिसके कारण उसने चित्तौड़ पर हमला कर दिया लेकिन राजपूत सैनिको ने उसकी सेना से खूब लड़ाई लड़ी , जब वह असफल रहा तो उसने प्रस्ताव भेजा कि मैं आपकी पत्नी का चेहरा शीशे के माद्यम से देखना चाहता हूँ , राजा रतन सिंह उसके जाल में फँस गए। जैसे ही उसने रानी पद्मिनी का प्रतिबिंब देखा वह मोहित हो गया २८ जनवरी १३०३ में दिल्ली से धावा बोल दिया चित्तौड़ की तरफ २६ अगस्त १३०३ को चित्तौड़ को फतह कर लिया। इस युद्ध में ३० हज़ार से अधिक राजपूत लड़ाकू मारे गए थे , जब रानी पद्मावती को पता चला कि राजा रतन सिंह मारे गए है , १६ हज़ार रानियों के साथ अग्नि में जौहर कर आत्माहुति दी

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Ashok kumar gautam biography in hindi

अशोक कुमार का जीवन परिचय 

(Ashok kumar gautam biography in hindi)


जीवन संगिनी- श्रीमती किरन
आँखों के तारे- चित्रांशी, वेदांश प्रताप
जन्मतिथि- 10 दिसंबर 1978
जन्मस्थान- सरेनी, जनपद रायबरेली
शैक्षणिक योग्यता- एम0ए0, बी0एड0, यू0जी0सी0 नेट (2 बार)


सम्पादन


  1. महावीर स्मृति (वार्षिक पत्रिका)
  2. निष्कम्प दीपशिखा : डॉ0 चम्पा श्रीवास्तव (आस्था ग्रंथ)

 

शोध पत्र प्रकाशन


  1. 10 अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार में आलेख,
  2. 15 राष्ट्रीय सेमिनार में आलेख,
  3. 25 स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में लेख।

सहभागिता

Ashok kumar gautam biography in hindi


  1. 93 राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय वेबीनॉर,
  2. समाजोपयोगी रेडियो सन्देश प्रसारण,
  3. विभिन्न समाचार पत्रों और यूट्यूब चैनलों में छात्रों और आमजन से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर लेखन और वक्तव्य।

सम्मान, प्रशस्ति पत्र


  1. गयत्रीकुंज हरिद्वार द्वारा सम्मान (2012 ई0)
  2. सरस्वती सम्मान, भारत विकास परिषद शाखा रायबरेली (2015 ई0)
  3. मतदाता जागरूकता अभियान के लिए जिलाधिकारी रायबरेली द्वारा सम्मान (2017 ई0)
  4. गणितज्ञ रामानुजन सम्मान (2018 ई0)
  5. कलमकार सम्मान (2019 ई0)
  6. टीचर इन्नोवेशन अवार्ड, नई दिल्ली (ZIIEI 2019 ई0)

  • मूल मंत्र- अंग्रेजी के अल्पज्ञान ने हिंदी को पंगु बना दिया।

संप्रति


  • असिस्टेंट प्रोफेसर (विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग) कुलानुशासक,
  • श्री महावीर सिंह स्नातकोत्तर महाविद्यालय, हरचंदपुर, रायबरेली।
  • सम्पर्क सूत्र- 9415951459, 9415819451
  • ईमेल- [email protected]
  • वर्तमान पता-सरयू-भगवती कुंज 172/6 शिवा जी नगर, जनपद- रायबरेली, उत्तर प्रदेश

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Jananayak Karpoori Thakur/कर्मयोगी जननायक कर्पूरी ठाकुर

कर्मयोगी जननायक कर्पूरी ठाकुर

Jananayak Karpoori Thakur: जिस समय भारत माता परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ी हुई थी। उसी समय कर्पूरी जी का जन्म समस्तीपुर के पितौझिया नामक ग्राम में 24 जनवरी 1924 को हुआ था। इनके पिता का नाम श्री गोपाल ठाकुर एवं माता का नाम श्रीमती रामदुलारी देवी था ।इनके बचपन पर उनके माता-पिता के गुणों का प्रभाव पड़ा ।इनके पिता एक किसान थे ।बाल्यावस्था इनका आर्थिक संघर्षों के बीच ही गुजरा ।
उस समय के वातावरण को देखते हुए इनका मन अपने देश को स्वतंत्र कराने में लगा ।देश भक्ति इनमें कूट कूट कर भरी थी ।भारत छोड़ो आंदोलन के समय इन्होंने 26 बार जेल की यात्रा की ।
कर्पूरी ठाकुर जी का विवाह कुलेश्वरी देवी जी के साथ हुआ।

राजनेता होने के साथ ही साथ यह एक समाज सुधारक भी थे

यह सरल और सरस स्वभाव के राजनेता थे ।राजनेता होने के साथ ही साथ यह एक समाज सुधारक भी थे। इन्होंने समाज में व्याप्त अनेक बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया। निम्न एवं पिछड़े वर्ग के लोगों को उनके अधिकार एवं कर्तव्य के प्रति जागरूक किया। इनके मुख्यमंत्री काल में ही पिछड़े वर्ग को 27% का आरक्षण प्रदान किया गया । कर्पूरी ठाकुर जी ने एक बार उपमुख्यमंत्री एवं दो बार मुख्यमंत्री पद को सुशोभित किया । एवं दशकों तक विधायक और विरोधी दल के नेता रहे। लोक नायक जयप्रकाश नारायण एवं समाजवादी चिंतक डॉ राम मनोहर लोहिया इन के राजनीतिक गुरु थे ।राम सेवक यादव जैसे दिग्गज साथी थे । लालू प्रसाद यादव नीतीश कुमार ,रामविलास पासवान और सुनील कुमार मोदी के यह राजनीतिक गुरु थे ।जब यह बोलते थे सारी जनता इनके भाषण को बड़े ही ध्यान से सुनती थी । उनका चिर परिचित नारा था “अधिकार चाहो तो लड़ना सीखो पग पग पर लड़ना सीखो, जीना है तो मरना सीखो ।
सादा -जीवन ,उच्च विचार इनके जीवन का आदर्श है । यह धन का व्यर्थ व्यय नहीं करते थे ।इनके दल के कुछ नेता अपने यहां की शादियों में करोड़ों रुपया खर्च करते थे परंतु जब इन्होंने अपनी बेटी की शादी की तो उन्होंने एक आदर्श उपस्थित किया और बहुत ही साधारण ढंग से विवाह किया ।एक मुख्यमंत्री की बेटी का विवाह अत्यंत साधारण ढंग से संपन्न हुआ , यह अपने आप में अनोखी बात थी।

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कर्पूरी जी का वाणी पर कठोर नियंत्रण था । वह भाषा के मर्मज्ञ थे। उनका भाषण आडंबर रहित ,ओजस्वी, उत्साहवर्धक एवं चिंतन परक होता था ।कड़वा से कड़वा सच बोलने के लिए वह इस तरह के शब्दों एवं वाक्यों को व्यवहार में लेते थे जिसे सुनकर प्रतिपक्ष तिलमिला तो उठता था लेकिन यह कभी यह नहीं कह पाता था कि कर्पूरी जी ने उसे अपमानित किया। उनकी आवाज बहुत ही शानदार एवं चुनौतीपूर्ण होती थी लेकिन यह उसी हद तक सत्य ,संयम और संवेदना से भी भरपूर होती थी ।इनके गुणों का बखान कहां तक करें जो अपने आप में अवर्णनीय है ।
इनकी लोकप्रियता ने ही इन्हें कर्पूरी ठाकुर से जननायक कर्पूरी ठाकुर बना दिया। 65 साल की उम्र में 17 फरवरी 1988 को दिल का दौरा पड़ने से कर्पूरी ठाकुर जी का निधन हो गया।
इनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर निम्न पंक्तियाँ भी प्रस्तुत है—–

हैं पल चांदनी रात की तरह,
जो बीत जाया करते हैं ।
है कर्म की ताकत,तूफ़ान प्रबल पर्वत,
झुक जाया करते हैं।
अक्सर दुनिया के लोग ,
समय के चक्कर खाया करते हैं ।
लेकिन कुछ ऐसे होते हैं ,
जो इतिहास बनाया करते हैं।।

यह उसी कर्मवीर इतिहास पुरुष की,
अनुपम अमर कहानी है ।

ईमानदारी ,कर्तव्यनिष्ठा ,सत्यवादिता,
जिसकी निशानी है।
दूरदर्शी,कुशल वक्ता होना ,
जिसकी पहचान है ।
सादा -जीवन, उच्च -विचार ,
कर्पूरी जी की शान है ।।

कुशल राजनीतिज्ञ बन ,
बिहार का मान बढ़ाया जिसने।
अपमान का घूंट पीकर भी,
प्रेम ही दिखाया जिसने ।
मानवता का पाठ पढ़कर भी,
सहा कारागृह का दुख जिसने ।
मुख्यमंत्री पद पाकर भी ,
अभिमान न दिखाया जिसने।।

वह साहसी ,वीर था ,
या त्यागी -सन्यासी ।
जिसके यश को याद करेंगे,
युग -युग तक भारतवासी ।
जननायक बनकर भी पहले ,
रहा वह देशवासी।
गीता -रामायण के भावों में थी,
उसकी आंखें प्यासी ।

पितौंझिया गांव ,कर्पूरी ग्राम बना,
जिसके नाम से।
दलितों का मसीहा हुआ वह ,
अपने काम से।
उनका कर्म क्षेत्र ,
उनके लिए ही धाम था ।
वेद -पुराणों की वाणी ही ,
उनके जीवन का घाम था ।।

Jananayak- Karpoori- Thakur

रूबी शर्मा
ग्राम व पोस्ट -जोहवा शर्की
जिला -रायबरेली
उत्तर प्रदेश

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जीवन परिचय सीताराम चौहान पथिक

जीवन – परिचय ।

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सीताराम चौहान पथिक

  • नामसीताराम चौहान पथिक
  • जीवन संगिनीस्व रंजना चौहान
  • जन्म तिथि: 5 जुलाई, 1940
  • जन्म स्थान- बठिंडा, पंजाब
  • योग्यता-एम ए हिंदी, बी-एड, साहित्य रत्न, प्रभाकर ,अनुवाद में डिप्लोमा ।

प्रकाशित पुस्तकें:


  • घूंट-कुछ कड़वे कुछ मीठे ।
    (कहानी- संग्रह)
  • नारी तुम केवल श्रद्धा हो (नारी-प्रधान नाटक संग्रह )
  • दर्पण — कविता संग्रह
  • वेदनाओ के ज्वाला- मुखी(कविता- संग्रह )
  • लावा ( कविता – संग्रह )
  • पीड़ा- घटते मूल्यों की( कविता – संग्रह )
  • कृष्ण- सुदामा मैत्री (खण्ड- काव्य )
  • स्वाभिमानी महाराणा प्रताप (खण्ड- काव्य)
  • गुरुकुल शिक्षा- एक स्वर्णिम अध्याय( खण्ड- काव्य )
  • बचपन और पचपन (बाल- गीत संग्रह)

साहित्यिक-उपलब्धियां


अब तक 100 सम्मान, जिनमे प्रमुख हैं

  1. राष्ट्रीय महा – महोपाध्याय विदश्री,
  2. जीवनोपलब्धि सम्मान,
  3. विद्या- वाचस्पति सम्मान,
  4. लाइफ- टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड ,
  5. अभिनन्दन -पत्र,
  6. भाषा – भूषण सम्मान आदि।

अन्यान्य —


  1. यूनेस्को के अन्तर्गत पुस्तक- एच आई वी काउन्सलिंग गाइड का हिन्दी अनुवाद,
  2. फ्रैंक माॆॅरिस की अंग्रेजी पुस्तक– जवाहरलाल नेहरू का हिन्दी अनुवाद,
  3. दिल्ली सरकार के वरिष्ठ विद्यालयों में हिंदी अध्यापन का 40 वर्षीय अनुभव ।

सम्प्रति —


  • सेवा- निवॄत हिन्दी शिक्षक , स्वतन्त्र साहित्य सॄजन , अध्ययन -मनन ।।

सम्पर्क —


  • सी-8 , 234ए , केशव पुरम, नयी दिल्ली — 110035
  • मोबाइल – 09650621606
  • दूरभाष-011-27106239
  • ई-मेल [email protected] 
  • राष्ट्र-हित में नेत्रदान संकल्प

सीताराम  चौहान पथिक की रचना हिंदीरचनाकर पर 


निराला की रिक्त तमन्नाओं का ग्रंथ : सरोजस्मृति

महाप्राण पं0 सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

(निराला की रिक्त तमन्नाओं का ग्रंथ : सरोजस्मृति)


निराला जी के पूर्वज उन्नाव जनपद के गढकोला ग्राम के रहने वाले थे, जो बैसवारा क्षेत्र में आता है। आपका जन्म पश्चिम बंगाल के महिषादल में 21 फरवरी 1896 ई0, वसंत पंचमी को हुआ था। बचपन का नाम सूरज कुमार था, बाद में उत्कृष्ट काव्यसृजन के कारण पूरा नाम ‘महाप्राण पं0 सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला’ हो गया था। बचपन में आपने बंगाली भाषा सीखी थी, तत्पश्चात आपका विवाह रायबरेली जनपद के डलमऊ निवासी पं0 रामदयाल की सपुत्री मनोरमा के साथ वैदिक बिधि-विधान के साथ संपन्न हुआ था। धर्मपत्नी मनोरमा के कहने पर आपने हिंदी भाषा का अध्ययन करके ही हिंदी में लेखन कार्य का श्रीगणेश किया। फिर संस्कृत और अंग्रेजी का अध्ययन किया। मनोरमा जी ने एक कन्या को जन्म दिया। बेटी को जन्म देने के बाद परलोकवासी हो गईं, तब निराला जी के जीवन में मानो वज्रपात हो गया हो।
 

छायावाद’ आधुनिक हिंदी कविता का स्वर्णिम युग माना जाता है।

पं0 सूर्यकांत त्रिपाठी निराला को महाप्राण, मतवाला, छयावाद का कबीर, मस्तमौला, विद्रोही कवि आदि नामों की संज्ञा दी गयी है। छायावाद के सभी तत्व निराला के काव्य में विद्यमान हैं। इनका जीवन सदैव शूलों से भरा था फिर भी गरीब, असहायों एवं महिलाओं के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण रखते थे। निराला ने अपनी रचनाओं में स्त्री को माता, पुत्री, पत्नी, आराध्या, देवि, साध्वी आदि रूपों में चित्रित किया है। आपने अपनी कविता में अत्यंत मार्मिक शब्दों में पत्नी ‘मनोरमा’ को स्मरण करते हुए लिखा है-

वह कली सदा को चली गयी दुनियां से,
वह सौरभ से पूरित आज दिगन्त।

 

ऐसा ही शोक संवेदनाओं से परिपूर्ण अश्रुपूरित काव्य ‘सरोजस्मृति’ है। इस जगत को हिंदी जगत का सर्वश्रेष्ठ ‘शोकगीत’ कहा जाता है। निराला ने अपनी पुत्री का विवाह शिव शेखर द्विवेदी से कर दिया था। अठारह वर्ष पूर्ण करके बेटी ने उन्नीसवें वर्ष में कदम रखा ही था कि चेचक और तपेदिक रोग हो जाने के कारण बीमार हो गयी। दुर्भाग्यवश विवाहिता पुत्री सरोज की मृत्यु 19वें वर्ष में सन 1935 में राणा बेनीमाधव सिंह जिला चिकित्सालय, रायबरेली में हो गयी थी। सुमित्रानंदन पंत जैसे वरिष्ठ साहित्यकार बेटी को देखने आए थे। निराला जी यह मानते हैं कि पुत्री की उम्र श्री मद्भागवत गीता के अठारह अध्याय के समान हैं, जो सरोज पूर्ण कर चुकी है। सरोज का मरण जीवन के शाश्वत विराम की ओर जाने की यात्रा है। इस शोकगीत में भाग्यहीन पिता का संघर्ष, समाज में उसके दायित्व, संपादकों के प्रति आक्रोश और अंतर्मन की पीड़ा दिखाई पड़ती है। कवि निराला ने श्रीमद्भागवत गीता में अटूट आस्था, श्रद्धा और विश्वास व्यक्त करते हुए लिखा है-

उन्नवीश पर जी प्रथम चरण,
तेरा यह जीवन सिंधु-तरण।
पूरे कर शुचितर सपर्याय,
जीवन के अष्टादशाध्याय।”

पुत्री सरोज की मृत्यु के तीन माह बाद सन 1935 में सरोजस्मृति कविता का सृजन और प्रकाशन भी हुआ। हिंदी साहित्य में ‘शोकगीत’ जैसी नई विधा की नींव डालना निराला जी के लिए किसी चुनौती से कम न था। पुत्री की असामयिक मृत्यु ने मानो कवि की अंतरात्मा को झकझोर दिया था तब आपने साहस और गंभीरता के साथ शोकगीत की नींव डाली। निराला के व्यक्तित्व और सहित्यप्रेम को देखते हुए आचार्य नंद दुलारे बाजपेयी ने कहा था- *”कविताओं के भीतर से जितना अथच अस्खलित व्यक्तित्व निराला जी का है, उतना न प्रसाद जी का है, न पंत जी का है। यह निराला जी की समुन्नत काव्य साधना का प्रमाण है।”*

‘सरोजस्मृति’ हिंदी का सबसे लंबा शोकगीत है।

अंग्रेजी साहित्य में तो शोकगीत सन 1750 ई0 से पूर्व भी लिखे जाते थे, परन्तु हिंदी साहित्य में शोकगीत की सर्जना सन 1935 ई0 में सृजित सरोजस्मृति से मानी जाती है। निराला जी सदैव अपनी सहानुभूति शोषित वर्ग के प्रति रखते थे, इसलिए अपना धन, कपड़े, कम्बल आदि प्रयागराज में दान कर दिया करते थे। आप अर्थहीन हो गए थे। अपनी पुत्री का लालन-पालन भी खुले मन से नहीं कर पा रहे थे तब निराला जी की सासु माँ से यह दुःख देखा नहीं गया। निराला की सहमति से नन्ही सी परी सरोज को उसकी नानी डलमऊ लिवा लायी। वहीं पली बढ़ी। सरोज कभी कभी मोक्षदायिनी गंगा नदी के तट की रेत में खेला करती थी। सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी ने इस यथार्थवादी दृश्टान्त को बहुत ही मार्मिक शब्दों में ‘सरोजस्मृति’ कविता में व्यक्त किया है-

कुछ दिन रह गृह तू फिर समोद
बैठी नानी की स्नेह गोद।
मामा-मामी का रहा प्यार,
भर जलद धरा को ज्यो अपार।।

छायावादी युग में निराला जी की संवेदनाएँ

भारत में आदिकाल से स्त्री सभी रूपों में पूजनीय रही है और आज भी उसे देवी का स्थान दिया जाता है। छायावादी युग में निराला जी की संवेदनाएँ भी स्त्री के प्रति रही हैं। निराला जी परतंत्र भारत में भी भारतीय जन मानस को समाज की जिम्मेदारी का अहसास कराते हुए दहेजप्रथा का घोर विरोध करते हैं। भौतिकवादी युग में मनुष्य अपनी पुत्री के विवाह में दिखावा करने, पुत्री की खुशहाली और वर पक्ष की मांग पर अधिक से अधिक धन खर्च करता है। कभी-कभी तो खुद को श्रेष्ठ दिखाने के लिए जर-जमीन तक गिरवीं रख देता है या बेंच देता है। दहेज के लेन देन तथा अनावश्यक फिजूलखर्च निराला की दृष्टि में व्यर्थ है। निराला जी ने समाज को प्रेरणा देते हुए उपरोक्त तथ्यों को अपनी कविता सरोजस्मृति में मार्मिकता के साथ व्यक्त किया है-

*मेरी ऐसी, दहेज देकर,*
*मैं मूर्ख बनूँ, यह नहीं सुघर।*
*बरात बुलाकर मिथ्या व्यय,*
*मैं करूँ, नहीं ऐसा सुसमय।*

पुत्री सरोज की असामयिक मृत्यु के महाप्राण निराला दार्शनिक हो गए थे।

‘सरोजस्मृति’ में करुणा की प्रधानता है। आपने सरोज की शैशवावस्था, बाल्यावस्था, युवावस्था से लेकर मृत्यु तक के दुखद सफर का सजीव चित्रण क्रमशः लिपिबद्ध किया है। पुत्री वियोग को सहन करने की क्षमता निराला के अंदर न थी, फिर भी समाज और राष्ट्र के प्रति सचेत रहते हैं। निराला ने ‘शोषकों को डाल पर इतराता हुआ गुलाब कहा है, जिसकी सेवा करने वाले खाद-पानी रूपी गरीब शोषक जन हैं।’

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अंत में आंखों में आँसू लिए झिलमिलाते अक्षरों से पुत्री सरोज की मृत्यु का वर्णन चंद शब्दों में ही कर पाने का साहस कर पाए थे। मानो आपकी सहनशक्ति टूट गयी थी। महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी जी ने अपने हृदय पर पत्थर रखकर ‘सरोजस्मृति’ में लिखा है-

दुःख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ आज, जो नहीं कहीं।
कन्ये, गत कर्मों का अर्पण,
कर, करता मैं तेरा तर्पण।।

अशोक कुमार गौतम,
असि0 प्रोफेसर, चीफ प्रॉक्टर,
सरयू-भगवती कुंज
शिवा जी नगर, रायबरेली (उप्र)
9415951459

देखें अशोक कुमार गौतम का बधाई संदेश विश्व हिंदी दिवस 2021 पर

My writing journey-मेरा लेखन का सफरनामा/अंजना छलोत्रे

मेरा लेखन का सफरनामा(My writing journey) 

My- writing- journey
अंजना छलोत्रे

बरसात का मौसम , उस पर रिमझिम फुहारे , जंगल से गुजरती मेरी प्राइवेट रोडवेज बस,  उबड़ खाबड़ रास्ते और बस का अपना ही खतरनाक शोर (My writing journey) इन सबके बावजूद बाहर का दृश्य लुभावना,  पेड़ों की हरी पत्तियों पर बूंदों का टपकना और जो सूर्य को अर्घ्य देते उस तरह बूंदों का फिसलना बड़ा भला लग रहा था , आपस में झूमते एक दूसरे को ठेलते,  पेड़ों की टहनियाँ मनो हंसी ठिठोली करते वर्षा का आनंद ले रही थी.

खिड़की से आती वर्षा की बौछार को  मैं अपने आंचल से रोकने का प्रयास कर रही थी,  कितना फर्क था मुझ में और उन वनस्पतियों में,  फिर सोचा उन्हें सर्दी जुखाम जो  नहीं होता……

पढ़े: रानी लक्ष्मी बाई के अंतिम १८ दिन की यात्रा

ठंडी हवा सिरहन पैदा करती जा रही थी  लेकिन बाहर का मनभावन दृश्य मन में अनेकों अनेक उपमायें  उगाने लगा और एक कविता ने जन्म लिया ….मेरे पास कागज नहीं था मैने रास्ते से खरीदी सरिता पत्रिका के  पीछे ही अपनी पहली मासूम कुछ पंक्तियाँ लिखी….. भावनाओं के साथ कागज कलम का रिश्ता शुरू……

बस में मेरे पीछे की सीट पर परिचित सखी के पतिदेव विराजमान थे , जिन्होंने घर जाकर मेरी सखी को बताया कि वह कुछ लिखती हैं , बस फिर क्या था सखी ने वह   पत्रिका मांगी और मेरी कविता यह जा वह जा  हो गई…. और वह मुझे वापस नहीं मिली , लेकिन उस कविता का गुमना,  मेरे अंदर  भावनाओं का अंकुरण  होना , एक साथ हुआ  और मैं लिखने के लिए कटिबद्ध होती चली गई….

उस समय लेखन को घरों में निकृष्ट कार्य समझा जाता था सो लिखने के लिए एकांत की तलाश होती और अपनी कॉपी छुपा कर रखनी पड़ती थी,  जाने कितने वर्षों हमारी कॉपी हमारी अंतरंग सखी रही…..

चोरी छुपे लिफाफा लाना , पोस्ट ऑफिस जाना,  टिकट लगा कर भेज देना,  किसी युद्ध से कम नहीं था . कई बार जो पत्रिकाएँ टिकट लगा लिफाफा भी मंगवाती थी तब तो हरदम वापस लौट आने का डर बना रहता था , उस पर ख़त उस समय आये जब घर में कोई न हो कि ईश्वर से प्रार्थना ….. हाय राम कितने अनोखे दिन थे…..।

पढ़े : धारी माता पर कविता

कई  रचना प्रकृति पर रची गई  फिर श्रृंगार रस और कुछ तो बाल रचनाएँ आई ,  वीर रस का पदार्पण हुआ इसके चलते कई वर्षों तक इन्हीं के बीच मेरी कलम घुमने लगी. कभी -कभी  ही लिख पाती , फिर  लगातार तीन वर्ष प्रतिदिन एक कविता, गीत  ग़ज़ल लिखती थी ….अब ये रचनाएँ 1200 हो गई हैं…

समसामयिक विषयों  पर लिखना शुरू हुआ

(my writing journey)

उस समय न्यूज़ पेपर में विषयों पर कालम के लिए  पाठकों से सामग्री मंगाई जाती थी,  हम  दैनिक भास्कर व अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं में भी  विषयों के अनुसार लेख भेजते रहें और लेख लिखने का सिलसिला वहीं से शुरू हुआ …समसामयिक विषयों  पर लिखना शुरू हुआ ,  खूब छपे, अस्विकृत भी खूब हुए…तो सम्मान भी पाया …पाठकों के पत्रों ने जहाँ सराहा वही कई नये विषय भी दिये…जिनसे हम रूबरू हुये…..

लघु कथा ने ही मुझे कहानी की छोटी दुनिया में प्रवेश कराया.  उस समय जुनून हुआ करता था कि  दोस्तों के साथ परिचित,  अपरिचित कहीं भी कोई  विषय मिला की लघुकथा का ताना-बाना बुनना शुरू …छोटी-छोटी घटनाएँ,  वार्ताएँ  हमें लघु कहानी लिखने की प्रेरणा  देती रही ,  वहीं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भी हम छपते रहे और साथ ही रेडियो में रिकॉर्डिंग भी होती रही , काफी समय तक यह दौर चला,  जब संग्रह के लिए एकत्रित किया तो 97 लघुकथाएँ  निकली …जो बाद मैं सौ से ज्यादा हो गई ओर बुक प्रकाशित हो गई।

लघु कथा से निकलकर थोड़ी लंबी कहानियाँ लिखी  जाने लगी,  अब जब लिखने बैठी तो कहानी बढ़ती चली जाती,  समझ नहीं आता कि  यह छोटी कहानियाँ कैसे लिखती चली जा रही हैं और एक ही बैठक में पूरी करने की प्रबल इच्छा  रहती थी,  लगता था की छूट गई तो कल फिर आगे का नहीं सोच पाएंगे तो ……ऐसी कहानियां 250 हो गई.

अब मन छोटी कहानियों से उचटने  लगा ,  कहानियाँ विस्तार लेने लगी और छूटने पर आगे लिख पाने की क्षमता बढ़ने लगी,  कभी चार दिनों में तो कभी आठ से पन्दरह दिनों में, तो  कभी-कभी महीना,  दो महीने में कहानी पूरी होने लगी  अब धैर्य से सोचकर कहानी आगे बढ़ती रहती, लिखकर पढती  तो स्वयं आश्चर्य  होता , हर दिन की सोच अलग-अलग होती थी ..

अब मैंने व्यवसायिक व साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में भेजना शुरू कर दिया. स्विकृत  होने व छपने से हौसला बढ़ने लगा और कहानी दर कहानी लिखी जाने लगी….गृहशोभा,  सरिता,  मनोरमा  व साहित्यिक पत्रिकाओं में छपना अच्छा लगने लगा,  हौसला बढ़ा तो कहानियों ने रफ्तार पकड़ी …उस दौर में 300 कहानियाँ लिखी गई…

सन् 2006 से उपन्यास का जुनून आया

(My writing journey) 

सन् 2006 से उपन्यास का जुनून आया , यह ऐसी महिलाओं पर केंद्रित कहानी हैं जिसमें वे अपने जीवन संघर्ष को बखूबी जीते हुए आगे बढ़ती हैं और अपने होने को प्रमाणित कर रही हैं . जब – जब लिखने का समय मिला,  लिखती गई.  जैसे – जैसे उपन्यास लंबा हुआ,  हर बार शुरू से पढ़ने की प्रक्रिया में कई बार आगे लिखने का कुछ सुझता ही नहीं था.. अभी भी कभी-कभी लिख लिया जाता है …

2010 से समीक्षा का क्षेत्र संभाला इससे दो फायदे  हुए,  पढ़ना तो होता ही था , साथ ही रचना का मूल तत्व समझ आने लगा. कहानियों की किताबों के साथ- साथ. समरलोक पत्रिका जो मेहरून्निसा परवेज भोपाल से निकालती हैं उसकी समीक्षा करने लगी,  जो लगातार जारी है ..जिससे मेरी लेखनी की पकड़ और मजबूत हुई…..

पत्रिका न्यूज़ पेपर से साक्षात्कार के लिए मुझसे कहा गया

(My writing journey) 

इसी बीच पत्रिका न्यूज़ पेपर से साक्षात्कार के लिए मुझसे कहा गया और मैंने साक्षात्कार करने के लिए चुन्नीदा साहित्यकारों की सूची बनाकर,  प्रश्नावली बना ली,  रोचक जानकारियों के साथ मेरे लिए हुए साक्षात्कार  रविवार को जयपुर से छपने लगे.  यह नया विषय,  उस पर वरिष्ठ साहित्यकारों से मिलना , उनके अनुभव जानना और उनके साहित्य सफर से परिचित होना , मेरे लिए रोमांच से कम नहीं था . बहुत सी ऐसी बातें भी पता चली जिसे मैं साक्षात्कार में नहीं दे  सकती थी… मेरे साथ उनकी बाटी हुई अत्यंत  गोपनीय  बातें हुआ करती , एक अलग व्यक्तित्व ,  अलग अनुभव, उनका  सानिध्य  मिलना वाकई अदभूत संसार में विचर रही थी मैं …..

 हमारे पूज्य आदरणीय कवि हुकुम पाल सिंह विकल जी ने मेरी रचनाओं की टोह ली और संग्रह छपवाने पर जोर दिया ……प्रकाशित पुस्तकें…


(1) .मैं अकेली नहीं (कहानी संग्रह  2001),

प्रकाशन…आस्था प्रकाशन41/4सी, साकेत नगर, भोपाल (म.प्र.)

( 2)  फ़रिश्ता (कहानी संग्रह 2006), आशीष प्रकाशन, बालाघाट (म.प्र.)

(3)…शब्द श्रृंगार (कविता संग्रह 2007),

(4) अटल संयोग ( कविता  संग्रह 2008),

(5)   अभिशप्त देव (कहानी संग्रह 2008), प्रकाशक, पेंगुइन प्रकाशन दिल्ली।

(6) लक्ष्मी बाई के ग्वालियर में अन्तिम अठारह दिन (शोधपरक बुक 2010),

( 7) पनाह (कहानी संग्रह 2016), published by WISHWELL , New Delhi ..

(8)  ऊँची उड़ान ( लघुकथा संग्रह 2017 ),आरती प्रकाशन, साहित्य सदन, जड़ सैक्टर, इन्द्रानगर, लालकुआ,नैनीताल(उत्तराखंड)..

(9)  मन का भगड़ा (कविता संग्रह 2018),प्रकाशक साहित्यभूमि, एन-3/5ए, मोहन गार्डन, नई दिल्ली.

(10) लोकतन्त्र की सार्थकता, पंचायती राज और कामकाजी महिलाएँ ( लघुशोध लेख 2019) प्रकाशक साहित्यभूमि, एन-3/ 5 ए, मोहन गार्डन, नई दिल्ली..

(11) भारतीय इतिहास की महान वीरांगनाएँ (एतिहासिक लेख 2020)

(12) 2021 में  ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित होगा।

 उपन्यास “आसमान बुनती औरतें” पर भी काम चल रहा है…..

मैं भाग्यशाली रही कि मेरी कभी आलोचना नहीं हो पाई क्योंकि पहले ही खूब सारा लिखकर रख लिया,  फिर छपी शायद इसलिए….

मेरे लिए सब से प्रमुख खूब  पढ़ना मेरी रुचि है जिसे मैं अपने भोजन की तरह रोजाना लेती हूँ…..

                                अंजना छलोत्रे

                 जी- 48, फॉरच्यून ग्लोरी

        ई-8, एक्सटेंशन बाबडिया कला

               भोपाल (म. प्र.) 462039