एक कप दूध | Hindi Story | डॉ० सम्पूर्णानंद मिश्र

आज रामसिंगार बाबू के घर सुबह से ही ज़ोर ज़ोर से चीखने की आवाज़ आ रही थी। दरअसल कल उनका अपनी पत्नी से किसी बात पर बहस हो गई थी। बहस लंबी चली। मानों दोनों बहस के युद्ध में पूरी तैयारी से उतरे हों। रामसिंगार बाबू की पत्नी शहर के एक प्रतिष्ठित बैंक में कैशियर के पद पर कार्यरत हैं। कल रात सात बजे थकी मांदी घर पहुंची। अमूमन वे छ: बजे तक घर पहुंच जाया करती थी, लेकिन आज कैश काउंटर पर बड़ी भीड़ थी। जिस काउंटर पर कैश जमा होता था, वे साहब आज अवकाश पर थे।‌ एक ही काउंटर पर लेन- देन दोनों हो रहा था।‌ शाम को साढ़े चार बजे काउंटर क्लोज होने पर उनकी पत्नी दीक्षा ने हिसाब मिलाया तो दस हजार रुपए कम था। वे घबरा गई। ऐसा प्रतीत हुआ कि उनके पैर‌ से जमीन खिसक गई हो।‌ पसीना उनके माथे से निकलकर उनकी पूरी साड़ी को भिगोने लगा। इस महंगाई में दस हजार रुपए का नुक़सान एक बड़ा नुक़सान था। वे सोचने लगी कि अभी मकान मालिक का किराया भी देना है। बच्चों की फीस भी बाकी है। घर के चूल्हे की मद्धिम और तेज लौ दीक्षा की सैलरी के लाइटर पर ही निर्भर रहती थी।‌ शहर के एक निजी कंपनी में उनके पति एक मामूली सा काम करते थे, वे अपना खर्च निकाल लें यही दीक्षा के लिए बहुत था। इसी बात को लेकर आए दिन‌ दीक्षा के अहंकार की तलवार राम सिंगार के ऊपर चल जाया करती थी। राम सिंगार अपनी इन कमज़ोरियों से पूरी तरह वाकिफ थे। इसलिए पत्नी के क्रोध के तेज़ाब से वे हमेशा अपने को बचाते थे लेकिन कभी-कभी उसके छींटें से वे बच नहीं पाते थे।
उधर दीक्षा रुआंसा चेहरा लेकर मैनेजर के पास गयी। बोली सर आज मेरा हिसाब नहीं मिल रहा है। मैंने पूरा बाउचर चेक कर लिया है सर दस हजार रुपए कम आ रहे हैं, अगर बंटी को मेरे कैश मिलान के लिए कह दें तो मुझे सर सुविधा हो जायेगी।
मैनेजर ने कहा, देखिए मैम यह आपका रोज़ रोज़ का है। कभी हिसाब नहीं मिलता है कभी बाउचर पर मुहर लगाना भूल जाती हैं और आए दिन कुछ न कुछ गलतियां!
आए दिन लेट आती हैं यह सब नहीं चलेगा।‌ दरअसल मैनेजर मैम को ऊपरी तौर पर तो डांट रहा था, लेकिन उसकी वासनात्मक आंखों की कड़ाही में मैम के सौंदर्य की मछली नृत्य रही थी। वह इस मछली को किसी भी तरह से पाने के लिए अपनी गिद्ध दृष्टि गड़ाए हुए था। आज मछली फंस गई थी।
मैनेजर शंभूसिंह जब से इस बैंक में आएं हैं उनकी इस हरकत से बैंक में कार्यरत तमाम महिलाएं अपना ट्रांसफर करवाकर दूसरे अन्य बैंक में चली जाती थीं। दीक्षा को आए इस बैंक में चार महीने ही हुए थे वह अपने काम में निपुण थी। बैंक मैनेजर को शिकायत का कभी मौका भी नहीं देती थी लेकिन जब संयोग खराब हो तो सावधान जानवर भी विदग्ध आखेटक के जाल में फंस जाता है और असहाय महसूस करते हुए दया की भीख मांगता है। आज दीक्षा की भी यही स्थिति है। बेचारी आज जाल में फंस चुकी थी। उसने कहा सर आज मुझे बहुत जल्दी है। बंटी से कह दीजिए कि वह मेरा सहयोग कर दे। मैनेजर ने संकेत संकेत में बंटी को मना कर दिया था।
बेचारी अपने केबिन में आकर रोने लगी। वह किंकर्तव्यविमूढ़ थी। तभी मैनेजर ने मैम को चैंबर में बुलाकर कहा कि ठीक है मैम आप घर जाइए! मैं हिसाब मिलवा लूंगा। दीक्षा को एक पल की खुशी तो मिली लेकिन वह मैनेजर की गिद्ध दृष्टि की आंखों में वासना की बनती बिगड़ती रेखाओं को पढ़ चुकी थी।‌
वहां से घर आने में सात बज चुके थे। उसे भूख और प्यास लगी थी। आते ही वह कटे वृक्ष की तरह विस्तर पर गिर चुकी थी।
अपने पति राम सिंगार को आवाज देते हुए चाय बनाने के लिए कही।राम सिंगार भी दिन भर का भूखा था,उसने कहा तुम खुद बना लो!
इतना सुनते ही वह बिगड़ैल बैल की तरह भड़क उठी और उसने अपनी ज्वलनशील वाणी के तेज़ाब में पति को इस तरह नहलाया कि अगल बगल की बिल्डिंग भी इस छींटें से नहीं बच सकी। रामसिंगार अपने क्रोध को अपने विवेक के जल से
नहीं शांत करते,तो आज कुछ भी हो सकता था। रात के ग्यारह बजे रहे थे। अंधेरी रात थी। झमाझम बारिश हो रही थी। दीक्षा कोपभवन में जा चुकी थी। राम सिंगार को बहुत ज़ोर से भूख लगी थी दोपहर में भी उसने कुछ नहीं खाया था। जाकर रसोईघर में देखा तो सारे बर्तन जूठे पड़े थे। फ्रिज में एक कप दूध रखा था‌। रात को कुछ बनाने की स्थिति में नहीं था। रामसिंगार ने दूध गरम होने के लिए रख दिया। रसोईं में कुछ ढूँढ़ रहे थे कि दूध के साथ खाकर सो जाया जाए कि अचानक पत्नी की सुध आई और पता नहीं क्या हुआ कि बड़ी ख़ामोशी से उन्होंने जूठे बर्तन साफ़ किए और भगोने में दाल चावल डाल कर खिचड़ी चढ़ा दी।
अपनी ज़िंदगी को कोसती दीक्षा भूख अपमान और क्रोध से करवटें बदल रही थी। सिर फटा जा रहा था। अचानक उठी कि किचन में जाकर कुछ खा लूँ और क्रोसीन ले कर सो जाऊँ कि अचानक बत्ती जली और देखा कि रामसिंगार एक हाथ में खिचड़ी की थाली और दूजे में पानी का गिलास लिए सामने खड़े हैं और खिचड़ी से देशी घी की सुगंध नथुनों में ज़बरदस्ती घुसी जा रही थी।

डॉ० सम्पूर्णानंद मिश्र
शिवपुर वाराणसी
7458994874

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किराये का रिश्ता | रत्ना भदौरिया

दो दिन पहले फेसबुक पर एक लाईन पढ़ी ‘उसके साथ रिश्ता मेरा किराये के घर जैसा रहा, मैंने उससे सजाया तो बहुत लेकिन वो कभी मेरा न हुआ। अभी पढ़ ही रही थी कि दिमाग ने चलना शुरू कर दिया और चार साल पहले इन्हीं पंक्तियों में जुड़ी मेरी एक सहेली जो आज भी यही सोच के साथ जिंदगी काट रही है। जब तब मैं अपने गांव जाती हूं तो उससे जरुर मिलती हूं फिर वो घंटों बैठकर अपनी कहानी सुनाती है मुझे।

आज इस लाइन को पढ़ते ही एक बार फिर वो और उसकी कहानी याद आ गयी स्नातक की पढ़ाई के बाद उसने बी टी सी के लिए दाखिला लिया और मैं आगे की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद चली गई। बी टी सी करते करते उसे एक लड़के से प्यार हो गया। प्यार सिर्फ प्यार तक सीमित नहीं रहा बात शादी तक पहुंची। दोनों तैयार थे लेकिन जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया कि मेरी सहेली उमा के पापा की मृत्यु हो गई ‌। मृत्यु के अभी पन्द्रह दिन भी व्यतीत नहीं हुए कि उसके प्रेमी ने उससे शादी के लिए घर में बात करने कहा उसने कहा देखो प्यार जितना आपका जरुरी है उतना मेरा भी लेकिन अभी पापा को गये हुए पंद्रह दिन भी नहीं हुए और घर में कोई नहीं है मां को संभालने वाला उसने कहा ठीक है संभालो मां को अपनी उसी दिन से उसने राश्ता बदला और दूसरी लड़की से शादी कर ली। कई महीने बाद पता चला।ये तो आजकल शोसल मीडिया का शुक्र जो बात आयी गयी पता चल ही जाती है।

तब उसने पूछा कि आपने ऐसा क्यों किया ?प्रेमी का जवाब तो क्या करता उधर लड़की भी तुमसे सुंदर,पैसे भी अच्छे मिल रहे थे और तो और शादी भी जल्दी हो गयी ।इधर क्या ? पता नहीं कितने साल तुम अपनी मां को संभालती और बाप तो था नहीं मिलता भी क्या ?अच्छा जब प्रेम किया था तब ये चीजें नहीं देखी थी कि ये उमा खूबसूरत नहीं है और फिर शादी की बात की ही क्यों थी ?तब तुम्हारा बाप नौकरी करता था और न तुम्हारे ऊपर मां का बोझ ढोने की जिम्मेदारी थी। खूबसूरती में नौकरी का क्या लेना- देना उमा ने पूछा ?हो -हो कर हंसते हुए बोला तुम भी उमा कितनी भोली हो अरे नौकरी करता तो मोटी रकम तो देता कमसे कम तेरा बाप ?अच्छा !छोटा सा उत्तर देकर कुछ क्षण उमा चुप रही और फिर एक जोरदार थप्पड़ मारते हुए कहा आज बहुत खुश हूं इसलिए कि मुझे समझ आ गयी।

पापा के जाने से भी आज दुखी नहीं खुश हूं कि शायद वो नहीं जाते तो मैं प्यार में अंधी होकर क्या कर बैठती। अनुतरित, आश्चर्यचकित ज़रुर हूं लेकिन खुश हूं।कहते हुए वहीं लाईन गुनगुने लगी’उसके साथ मेरा रिश्ता किराये के घर जैसा रहा, मैंने उससे सजाया तो बहुत लेकिन वो कभी मेरा न हुआ।।

रत्ना भदौरिया रायबरेली उत्तर प्रदेश

पराजित प्रतीक्षा | अनिल पाराशर ‘मासूम’

“अच्छा हुआ तूने किसी का तो फ़ोन उठाया। शायद अपने किसी दोस्त का ही उठाया होगा, नहीं तो अब तक सब कुछ राख हो गया होता। ये तुझे देखना चाहती थी, तुझे दिखना चाहती थी, पर तू हर फ़ोन काट रहा था। अफ़सोस! अब तू तो इसे देख सकता है, पर यह तुझे देख नहीं सकती। अगर तू फ़ोन उठा लेता, तो शायद ये नहीं जाती, रुक जाती।” महेंद्र नाथ जी ने अपने बेटे श्रीकांत के कंधे पर अपना हाथ रखते हुए कहा।

श्रीकांत यह भी नहीं कह सका कि मुझे बुलाया क्यों नहीं, क्योंकि रात को पार्टी में जाने के बाद उसने सभी घर वालों के फ़ोन उठाने बंद कर दिए थे। ऐसा पहली बार नहीं हुआ था, यह उसकी आदत थी। अब रात को जितनी पी हुई थी, सब उतर चुकी थी। मन में एक दुःख भी था, पर अब कुछ हो नहीं सकता था।

महेंद्र नाथ जी ने कविता के चेहरे से कपड़ा हटाते हुए कहा “कांत, एक बार देख ले और बता पहचानता है इसे?”

“आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? क्यों नहीं पहचानूँगा अपनी माँ को?” श्रीकांत ने आँसू पोंछते हुए कहा।

मैंने तो इस बात पर ध्यान नहीं दिया था, परंतु जाने से पहले कविता बोल रही थी “कांत को तीन दिन से नहीं देखा, तीन दिन से उसकी पार्टी चल ही रही है। एक बात सोचती हूँ कि जब वह यहाँ होता है तब उसके कमरे में जाकर उसे सोते हुए जरूर देखती हूँ और देखकर संतोष कर लेती हूँ। उसका चेहरा मुझे पूरा याद रहता है, हमेशा ही याद रहेगा। पर क्या वह मुझे देखकर पहचान लेगा? कई महीनों से उसने घर में रहते हुए भी नज़र भरके मुझे नहीं देखा है; जबकि पिछले कुछ महीनों में मैं उसकी चिंता में बहुत बदल गई हूँ। अगर मुझे कुछ हो जाए, तो मेरे चेहरे से कपड़ा हटाकर उसे बता ज़रूर देना कि ये तुम्हारी माँ थी, तब शायद वह पहचान जाए।”

श्रीकांत फूट-फूटकर रोने लगा। काँपती आवाज़ में कहने लगा- “पापा संस्कार कब करना है?”

“तूने दर्शन कर लिए और पहचान लिया माँ को, यही बहुत है। बहुत ख़ुश होगी वह, जहाँ भी होगी। रही बात संस्कार की, तो उसे तो तू रहने ही दे। तेरी शराब और तेरे दोस्त तेरा इंतिज़ार कर रहे होंगे, अब तू जा सकता है। संस्कार का काम मैं स्वयं देख लूँगा। तूने अक्सर अपनी माँ से कहा था “आपने मेरे लिए किया ही क्या है?”, तो आज तू भी बदला ले ले, आख़िरी ज़िम्मेदारी पूरी न करके।”

एक बात और कही थी कविता ने कि “कांत से कहना उसने मेरे घर पैदा होकर मुझे ज़िंदगी की सबसे बड़ी ख़ुशी दी थी। वही ख़ुशी मैं कांत को दूँगी उसके घर जन्म लेकर। मगर वह दुःख उसे कभी नहीं दूँगी, जो उसने जवान होकर मुझे दिए; बल्कि उसके सारे दुःख माँग लूँगी।” कहते-कहते महेंद्र नाथ जी की आँखें भीग गईं।

वे धीरे से बोले “बेटा अपने सफ़र पर निकल जा ताकि मैं भी कविता को उसके आख़िरी सफ़र पर ले चलूँ। अपना ख़याल रखना। एक बात और, मुझे लगता था कि जो शराब पीता है, शराब उसकी जान ले लेती है; मगर तेरी शराब ने कविता की जान ले ली। हो सके तो शराब छोड़ देना, तेरी माँ यही चाहती थी।”

आख़िरी बार श्रीकांत की तरफ पीठ करके महेंद्र नाथ बोले “जब मैं जाऊँगा तो कोशिश करूँगा तेरे किसी दोस्त को भी इस बात का पता ना चले। मैं आराम से जाना चाहूँगा और तेरे आराम में कभी खलल नहीं डालना चाहूँगा। हाँ! मगर मैं भूल नहीं सकूँगा कि तूने मेरी कविता को मुझसे छीन लिया। मैं तो ग़ुस्सा भी नहीं हो सकता तुझ पर; क्योंकि कविता ने कहा था “आप उसे कुछ कहना नहीं, आप के ग़ुस्सा करते ही वह अपना आपा खो देता है और उसकी तबियत ख़राब हो जाती है।”

तभी आवाजें गूँजने लगीं- “राम नाम सत्य है।”

श्रीकांत को लगा उसके दोनों पैरों में जैसे कीलें गड़ी हुईं थीं। न वो माँ के साथ चल सकता था, न ही अपनी दुनिया में लौट सकता था।

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साबुन की बट्टी | रत्ना भदौरिया | Hindi Short Story

इन दिनों अक्सर कमरे के सामने माल और वहां पर जीनों पर काफी बैठने की जगह होने की वजह से मैं भी जाकर बैठ जाती हूं। जिस दिन काम कम होता है उस दिन चार बजे से लेकर रात आठ नौ तक बैठी रहती हूं,जिस दिन काम ज्यादा होता है उस दिन थोड़ी देर ही बैठ पाती हूं लेकिन बैठती जरुर हूं। एक व्यक्ति रोज हाथ फैलाये इसी वक्त मिल ही जाता है मैं भी ज्यादा नहीं लेकिन पांच रुपए वाला बिस्किट का पैकेट जरूर थमा देती हूं। वो खुशी -खुशी ले भी लेता है।

आज उसने मुझसे कहा -मैडम बिस्किट नहीं आज साबुन की एक बट्टी दे दीजिए या फिर दस रुपए। आज साबुन क्यों ? गर्मी हो‌ रही है न मैडम बदबू आने पर लोग भीख भी नहीं देंगे। अरे आजकल तो इलेक्शन चल रहे हैं आजकल महकने की नहीं वोट की जरूरत है। वोट देने पर पेंट भर राशन मिल जायेगा। क्या बात करती है मैडम आप भी ? पेट भर राशन मिल जाता तो धक्के क्यों खाता और पांच किलो में भला महीना कैसे पूरा होगा ?आप ही बताओ न मैडम ! अच्छा ये बताओ तुम्हें देखती हूं तुम हर दिन सुबह शाम भीख क्यों मांगते हो ?पूरा दिन क्यों नहीं मांगते ? और यदि नहीं तो कोई काम क्यों नहीं करते ?अभी तो तुम्हारी उम्र काम लायक अच्छी खासी है ।

मैंने उससे यह सवाल इसलिए पूछा क्योंकि अक्सर आते जाते बाकी समय उसे सड़क किनारे सोते देखा है। मैडम काम मुझे कैसे मिलेगा ?मेरे से ज्यादा पढ़े लिखे मुझसे ज्यादा जवान लड़के लड़कियां बेरोजगार सड़कों पर घूम रहे हैं उन्हें ही भला काम मिल जाये ,उनके पास रोजगार होगा तो पेट मेरा भर ही जायेगा। ये कहते हुए व्यक्ति मुस्कुराते हुए वहां से चल पड़ा —-! अरे -अरे साबुन की बट्टी तो लेते जाइये मैं कहती रही वो वहां से चला गया —–?

रत्ना भदौरिया रायबरेली उत्तर प्रदेश

कहानी | ठंडा पड़ गया शरीर | सम्पूर्णानंद मिश्र

कहानी | ठंडा पड़ गया शरीर | सम्पूर्णानंद मिश्र

चाय का कप लेकर बेडरूम में जैसे ही दीप्ति पहुंचती है वैसे ही सुमित के मोबाइल की घंटी घनघना उठती है।‌ सुमित हड़बड़ाकर बिस्तर से उठता है उस समय घड़ी सुबह के नौ बजा रही थी उसे लगा कि आज फिर दफ़्तर के लिए लेट हो जाऊंगा। उसने अपनी पत्नी को डांटते हुए कहा कि तुमने मुझे जगाया क्यों नहीं आज बास फिर डांटेंगे हो सकता है कि अंकित का फ़ोन हो! आज हम दोनों को दफ़्तर में जल्दी बुलाया गया था हे भगवान ! अब क्या होगा। इसी उधेड़बुन में मोबाइल के घण्टी की घनघनाहट बंद हो गई। लेकिन जैसे ही मिस्ड काल को सुमित ने देखा तो वह थोड़ा सकपका गया उसे लगा कि चाचा तो कभी मुझे याद नहीं करते थे आज क्या बात है।‌ उसने अनमने भाव से चाचा को काल किया तो चाचा ने कहा कि बेटा तुम्हारे पापा अस्पताल में भर्ती हैं उन्हें रक्त की बहुत ज़रूरत है उनका प्लेटलेट्स बन नहीं रहा है।‌

स्वास्थ्य उनका गिरता जा रहा है तुम दो चार दिन की छुट्टी लेकर आ जाओ। उसने कहा कि चाचा उन्होंने मेरे लिए किया ही क्या है! बिजनेस के लिए उस समय पचास हजार रुपए मांगा था तो उन्होंने किस तरह से मुझे फटकारा था और कहा कि तुम्हें देने के लिए मेरे पास एक पाई नहीं है और किस तरह से उस घर में मेरे साथ भेदभाव किया गया था मैं नहीं भूल सकता हूं बड़े भैया के बेटे सिब्बू को एक लाख रुपए देकर बड़े शहर में पढ़ाने के लिए भेजे थे। कलक्टरी की पढ़ाई के लिए तो फिर मुझसे क्यों उम्मीद करते हैं वे जिएं या मरें मुझसे मतलब नहीं है। चाचा ने कहा बेटा वो तुम्हारे पिता हैं अगर तुम्हें कुछ कड़वी बात कह दी हो तो दिल पर मत लगाओ। इस समय पुत्र के दायित्व का निर्वहन करो। यह कठिन समय है अतीत की बातों को घोट जाओ। एक बार आ जाओ ! शायद तुम्हें और तुम्हारे बेटे अर्थ को देखने की उनकी बहुत इच्छा है।‌ उसने कहा कि चाचा मेरे और मेरी पत्नी के साथ उन्होंने बहुत दुर्व्यवहार किया है मुझसे किसी चीज की उम्मीद न करें ।

मेरा उनसे किसी तरह का कोई रिश्ता नहीं रह गया है।‌ मां जब मेरी पत्नी दीप्ति के बालों को घसीट कर धक्का देकर घर से निकाल रही थी, तब वो कहां थे‌ उस समय तो वो भीष्म पितामह बने हुए थे। मैं नहीं आऊंगा! चाचा ने कहा बेटा समझाना मेरा काम था, बाकी तुम्हारी इच्छा। दरअसल कामता प्रसाद सिंचाई विभाग के आफिस सुपरिटेंडेंट पद से 2000 में सेवानिवृत्त हो गए थे। घर में खुशियां ही खुशियां थीं। दो बेटे और दो बेटियां थीं। भरा पूरा परिवार था किसी चीज की कमी नहीं थी बड़ी बिटिया सुरेखा का हाथ उन्होंने आज के तीस साल पहले ही पीला कर दिया था।‌ अच्छे घर में वह चली गई थी खाता पीता परिवार था। किसी चीज की कोई दिक्कत नहीं थी। उनके जीवन के आंगन में खुशियों का हरा भरा बगीचा बहुत दिनों तक लहकता रहा। लेकिन न जाने किसकी नज़र उस परिवार पर पड़ी कि पूरा परिवार बिखर गया। दूसरी बिटिया की असामयिक मौत पीलिया से हो गई । कामता प्रसाद और उनकी पत्नी सुशीला पूरी तरह से टूट गए ।

आज भी रह रहकर वह दर्द उभर आता है। धीरे-धीरे स्थितियां सामान्य हो ही रही थीं कि उनका बड़ा बेटा सुशील जो धीर गंभीर था। माता- पिता की सेवा में हमेशा लगा रहता था। सारे रिश्तेदार उसकी प्रशंसा करते नहीं अघाते थे। एक दिन अपने दोनों बच्चों और पत्नी को छोड़कर किसी आश्रम में चला गया। बाद में पता चला कि वह साधु बन गया। न जाने कौन सी आंधी आई कि कामता प्रसाद की खुशियों की मंड़ई को उड़ाक चली गई। सुशीला के ऊपर विपत्तियों ने ऐसा बज्र गिराया कि जहां से निकलना पूरी तरह से असंभव था। इधर अस्पताल में कामता प्रसाद जीवन और मौत से संघर्ष कर रहे थे। एक दिन उनका साधु बेटा उन्हें देखने आया तो लोगों ने घर चलने का आग्रह किया लेकिन उसने कहा कि साधु और घर में छत्तीस का आंकड़ा है। पिता के स्नेह ने उसे यहां तक खींचकर तो लाया लेकिन भावनाओं की बेड़ियों को वह तुड़ाकर दूसरे ही दिन चला गया। उसी साधु का बेटा सिब्बू दिन -रात दादा की सेवा करता रहा।‌अस्पताल से एक मिनट के लिए नहीं हटता था। साथ में उसकी बुआ भी थी जो अपनी गृहस्थी को छोड़कर पिता की सेवा लगी रही।‌


कामता प्रसाद अपने नौकरी पीरियड में बहुतों का उद्धार किया। किसी की नौकरी लगवाई तो किसी की बेटी की शादी के लिए बहुत दूर तक चले जाते थे अपने कष्ट की परवाह किए।‌ जहां तक होता था सबकी मदद करते थे लेकिन आज जब उन्हें ज़रूरत है तो उनके संबंधी और उनसे अपना स्वार्थ सिद्ध करने वालों ने उन्हें मझधार में छोड़ दिया। कामता प्रसाद का शरीर आज कुछ ठंडा पड़ गया। कल ही उन्हें जनरल वार्ड से आई०सी० यू० में स्थानांतरित किया गया था।‌ चिकित्सकों ने अथक प्रयास किया लेकिन उन्हें नहीं बचा सके।
मृत्यु का समाचार सुनकर भी उनके दोनों बेटे नहीं आए।
उनके पौत्र सिब्बू ने ही मुखाग्नि दी और मृत्यु के बाद की सारी क्रियाएं, लोकाचार और लोकरीतियों का उसने ही निर्वहन किया। सिब्बू आज सदमे में है क्योंकि दादा के पेंशन से ही घर चल रहा था।

सम्पूर्णानंद मिश्र
शिवपुर वाराणसी
7458994874

आपाधापी जिंदगी (कहानी) / रत्ना भदौरिया

घर की खूब धड़ल्ले से चल रही साफ -सफाई बयां कर रही थी कि कोई त्यौहार आने वाला है लेकिन इस बात से मैं कोसों दूर थी कि आखिर कौन सा त्योहार आयेगा ? रोज सोचती तो मां से या घर में अन्य किसी सदस्य से पूछूं तो सही कि कौन सा त्यौहार आयेगा लेकिन सुबह छः बजे घर से निकल जाता तो रात को ग्यारह बजे वापस आता।

अब आप ये सोच रहे होंगे कि इतनी सी बात पूंछने के लिए आखिर समय ही कितना लगेगा। बिल्कुल सही बात है मगर सुबह याद रहता तो शाम को भूल जाता और शाम को अभी पूछेंगे तभी पूछेंगे के चक्कर में कब खाकर सो जाता पता ही नहीं चलता। समय का पहिया अपने आप सबकुछ पता करवा ही देता है। वो दिन भी आ गया था जिस दिन के लिए घर की एक एक चीजें साफ की जा रही थी।

सुबह उठा तो देखा मां रसोई में लगी हुई हैं पास जाकर मां को बोला- क्या बात है मां ? तुमने बताया नहीं कि त्यौहार आने वाला है वो तो कल जब आफिस में छुट्टी के लिए बोला गया तो पता चला कि कल राखी का त्यौहार है। मां आप ऐसा क्यों करती हैं आजकल ?पहले तो ऐसा कभी नहीं करती थी। मां फीकी सी हंसी हंसते हुए बेटा आज त्यौहार के दिन मैं कुछ नहीं कहना चाहती इसलिए कल बात करेंगे इस बारे में आज ———–।

जा फ्रेश होकर नहा धो ले तेरी बहन ससुराल से आती होंगी और हां राखी बंधवाने के बाद ही कहीं जाना , साल में एक बार तो ऐसा मौका आता है। बेटा सुन बहू भी तो जायेगी अपने मायके सड़क तक मुझे भी छोड़ देना उसी गाड़ी में आगे टैक्सी करके मैं अपने यहां चली जाऊंगी इतना कहकर मां फिर कामों में लग गयी। बेटा -मां अगर वो बात बता देती तो मैं निश्चिंत होकर सब काम करता । नहीं बेटा आज कुछ नहीं कहना है कल बताऊंगी तुम निश्चिन्त रहो। ठीक है जैसी आपकी मर्जी कहते हुए बेटा चला गया। अभी एक घंटा भी नहीं बीता था कि खटपट की आवाज सुनाई पड़ी जैसे ही मां ने पीछे देखा तो बेटा और बहू तैयार खड़े थे।

मां कुछ कहती कि उसके पहले ही बेटे ने कहा -मां बहन पता नहीं कब आयेगी समिता अपने घर पहुंचने में लेट हो जायेगी इसलिए हम लोग निकल रहें हैं। बहन को कह देना रात को राखी बांध देगी या फिर रखकर चली जायेगी मैं खुद से बांध लूंगा और हां मां आपके लिए टैक्सी बुक कर दूंगा आप उसी से मामा के यहां चली जाना। अच्छा अब ——–।

मां की आवाज बेटा बस तेरी बहन पहुंचने ही वाली होगी पन्द्रह मिनट और रुक जा फिर —। मां बता तो दिया हमें देर हो रही है कहते हुए दोनों बाहर निकल गये। महज पन्द्रह मिनट के बाद मां —मा के मुलायम स्वर से मां ने दुबारा पीछे देखा तो बेटी आ खड़ी थी । अरे !बेटी तुम आ गयी तुम्हारे भाई भाभी को लेकर उनके घर गये हैं शाम तक आ जायेंगे। मां आपने रोंका क्यों नहीं ? क्या भाई के पास इतना भी समय नहीं है? की वो थोड़ी देर रुक जाता। बेटी भाभी के भाई तो इंतजार कर रहे होंगे, कोई बात नहीं शाम को राखी बांध देना। चलो गरमा गरम कचौड़ी खाओ, मैं भी तैयार होने जा रही हूं कहते हुए मां ने कचौड़ी की प्लेट बेटी के हाथ में थमा दी और खुद अपने मायके जाने की तैयारी करने लगी।

कुछ ही छड़ में तैयार होकर मां भी अपने मायके की तरफ चली तो बेटी ने कहा मां आप भी जा रही हैं,भाई- भाभी भी चले गये पापा बचे हैं तो वे घर देख लेंगे मैं भी अपने घर जाऊंगी अब ये राखी रखी है भाई आयें तो कह देना कि खुद ही राखी बांध लें और जब यहां किसी के पास समय नहीं तो मेरे पास भी कहां —-? कहते हुए बेटी चल पड़ी।तभी मां ने बेटी को पैसे पकड़ाते हुए कहा बेटी ये राखी बांधने का तुम्हारा उपहार है भाई को समय नहीं मिला इसलिए कोई चीज नहीं ला पाया,तुम खुद से खरीद लेना। मां की बात पर बेटी का जवाब -मां भाई से कहना कि तेरी बहन को कुछ नहीं चाहिए बस तेरी इस आपाधापी की जिंदगी में से कम से कम साल में एक बार समय चाहिए वो जब हो तो बता देना —–।

मां ने भी नम आंखों से ठीक है बेटी कह दिया था। दूसरे दिन जब बेटा- बहू वापस आये तब तक मां आ चुकी थी। दोनों अन्दर घुसते ही मां sorry कल नहीं आ पाये बहन की राखी रखी होगी ,अभी बांध लेंगे और तुम मामा के यहां गयी थी एक बार फोन कर देती टैक्सी कर देता ध्यान से उतर गया और मामा के यहां सब ठीक है।

अच्छा मां थोड़ा आराम कर लें बहुत थक गये हैं फिर आते हैं कहकर अंदर चले गये। मां ने कुछ नहीं कहा वो भी चुपचाप चाप बैठी रहीं। आराम करते करते दोपहर के एक बज गए तब बेटा -बहू बाहर निकल कर आये,बहू मां वो मां हम लोग बहुत थक गये थे और आंख लग गयी न आपने उठाया और न ही खाने में कुछ बनाया चलो रहने दो कुछ बाहर से मंगवा लेते हैं कहते हुए बहू फोन लेकर आर्डर करने लगी‌। तभी मां ने बेटे को पास बुलाकर बिठाया और बोली कल तू पूंछ रहा था न कि मैं कितना बदल गयी हूं तो सुन बेटा मैं नहीं तू बदल गया है। मां की बात पर बेटे का स्वर -कैसे मां क्या आपको कोई चीज की कमी है हर चीज तो लाकर देता हूं फिर भी आप —–और उदाहरण देने के लहजे से सामने देखो रमेश को उसके मां- बाप न तो इतना अच्छा पहनते हैं और न खा पाते हैं और उन्हें कुछ चाहिए होता है तो जिस दिन कहते हैं उसके चार दिन बाद रमेश लाकर दे पाता है और मैं आपके मुंह से निकला लाकर देता हूं बताओ न मां —–।

बेटा बात ठीक है लेकिन एक बार अपने बचपन के दिन याद कर जब तू सोकर उठता तो मैं तुझे दूध की बोतल , बिस्किट का पैकेट, चिप्स और जो भी खाने के लिए चाहिए सब देने के बावजूद तू जिद्द करता कि मैं तेरे पास बैठूं। रात को तू नहीं सोता तो मुझे भी नहीं सोने देता इसलिए कि तू बोर होगा। ये बातें कहते हुए मां की आंखें भर आयीं थीं और हां बेटा तू रमेश की बात कर रहा था न कि भले ही चीजें देर से लाता है लेकिन बैठता हर दिन है कभी- कभी तो पूरा पूरा दिन बैठे देखा है उसे अपने मां -बाप के साथ —-। पहले से तुम्हें मैंने नहीं तुमने खुद नहीं जाना कि ये साफ -सफाई आखिर क्यों—-? बेटा सब सुनकर मुंह नीचे लटकाये बैठा रहा, मां बोलती रही —–।

दूसरा भगवान | सम्पूर्णानंद मिश्र | हिंदी कहानी

दूसरा भगवान | सम्पूर्णानंद मिश्र | हिंदी कहानी

प्रोफ़ेसर ब्रजनंदन प्रसाद को सेवानिवृत्त हुए अभी तीन महीने ही नहीं हुए थे कि उनकी ज़िंदगी में उथल-पुथल मच गया। तीन महीने पहले से ही मां वैष्णो देवी के धाम जाने का उन्होंने निश्चय किया।‌ दरअसल जब तक कालेज में थे, एक मिनट की फ़ुरसत नहीं थी। कालेज में पढ़ाने लिखाने में उनकी कोई सानी नहीं थी। मध्यकालीन इतिहास हो या प्राचीन सब पर उनकी गहरी पकड़ थी। छात्रों के बीच में बेहद लोकप्रिय थे। इतिहास से इतर विद्यार्थी भी उनकी कक्षा में आकर चुपचाप बैठकर विषय का रसपान किया करते थे। प्रोफ़ेसर साहब घर से ही तांबूल खाकर कालेज आते थे, और खूब रस लेकर पढ़ाते थे। शेरो शायरी पर भी ज़बरदस्त पकड़ थी। बिहारी के शृंगार के कुछ दोहों को भी उन्होंने कंठस्थ कर लिया था।

अरी दहेड़ी जिन धर जिन तू लेहि उतारि
नीके है छींकें छुअत ऐसी ही रहत नारि

छात्रों को इतिहास के साथ-साथ हिंदी साहित्य की गंगा में भी डुबो देते थे। इसलिए छात्र सबसे ज्यादा इतिहास ही पढ़ना पसंद करते थे। उनकी इस मांग की वजह से जहां प्राचार्य उनसे खुश रहते थे वहीं उनके वे सहकर्मी जो हिंदी पढ़ाते थे स्टाफ रूम में उन्हें कोसते हुए पाए जाते थे। घर पर भी शोध छात्रों का जमावड़ा लगा रहता था। पत्नी जयलक्ष्मी कभी-कभी झल्ला कर कहती थी कि आपको खाने- पीने का भी वक़्त नहीं है। आप ही एक प्रोफ़ेसर हैं या और दूसरे भी। प्रोफ़ेसर अवस्थी को देखिए कालेज से भी पहले आ जाते हैं, आराम करके शाम को पार्क भी टहलने परिवार के साथ जाते हैं, और बच्चों को माल भी घुमाने ले जाते हैं और एक आप हैं कि पूरे कालेज को सिर पर उठा लिया है।

प्रोफ़ेसर साहब पत्नी से ज्यादा तर्क़ वितर्क नहीं करते थे। वे जानते थे कि बात बिल्कुल सही है। आज से पच्चीस साल पहले जब जयलक्ष्मी डॉक्टर साहब के घर आयी थी; तो उसके भी अपने कुछ स्वप्न थे। न जाने कौन- कौन सी ख़्वाहिश उसके मन में पल रही थी। भीतर ही भीतर वह खुश रहती थी। उसकी मंद- मंद मुस्कान पर डाक्टर साहब फ़िदा थे। पारिजात का फूल भी तोड़कर लाने के लिए तैयार थे। पति-पत्नी का दाम्पत्य जीवन सुखमय था, लेकिन समय के डायनामाइट ने अरमानों के पर्वत को चकनाचूर कर दिया था। विवाह के पंद्रह साल बीत जाने पर भी प्रोफ़ेसर साहब के आंगन में बाल किलकारी नहीं गूंज सकी। तमाम दवा झाड़ फूंक करवाया गया लेकिन उसका कोई लाभ नहीं। कछ लोगों ने राय दी कि भाई के बच्चे को प्रोफेसर साहब गोद ले लीजिए। आपके भाई साहब के पांच बच्चे हैं इस महंगाई में उनका भी बोझ हल्का हो जाएगा और आपको अपत्य सुख भी मिलेगा। लेकिन डॉक्टर साहब जानते थे कि अपना अपना ही होता है।

कुछ लोगों ने किराए की कोख की भी चर्चा की, लेकिन जयलक्ष्मी इसके लिए तैयार नहीं हुई। वक्त के थपेड़े और संतान की चिंता ने जयलक्ष्मी को ऐसी मार मारी कि वह असमय बूढ़ी हो गई। डॉक्टर साहब को भी चिंता रूपी सर्पिणी रह- रहकर डंक मार ही दिया करती थी; इसलिए वह ज़रूरत से ज़्यादा व्यस्त रहने लगे।अध्ययन व अध्यापन को ही जीवन जीने का आधार बना लिया। इसीलिए जयलक्ष्मी के क्रोध की लपट जब आकाश छूती थी तो डाक्टर साहब उसे बहस के घी से नहीं बल्कि प्रेम- जल के छीटें से उसे बुझा देते थे। उन्होंने कहा लक्ष्मी बस जनवरी में सेवानिवृत्त हो रहा हूं। कालेज के काम से भी मुक्त हो जाऊंगा। कोई और जिम्मेदारियां कन्धों पर नहीं होगी तो हम लोग आराम से मार्च के महीने में मां के धाम में मत्था टेकने जायेंगे। समय बड़ा बलवान होता है। ईश्वर की व्यवस्था अपने ही तरह से संचालित होती है। उसमें किसी का हस्तक्षेप नहीं हो सकता। भगवान राम के राज्याभिषेक को एक ही दिन रह गया था लेकिन पूरा नहीं हो सका। विधि की लेखनी को कोई मिटा नहीं सकता। मार्च का महीना था। होली बीत चुकी थी। दो दिन बाद प्रोफ़ेसर साहब की ट्रेन जम्मू की थी। टिकट उन्होंने पहले ही बुक करा ली थी। तैयारियां जाने की ज़ोरों से चल रही थी। डाक्टर साहब ने कहा कि जयलक्ष्मी दस दिन का कार्यक्रम है बाहर का। कुछ सूखी चीज भी बना लेना। सफ़र में यही सब काम आता है।

जयलक्ष्मी ने तंज़ कसते हुए कहा कि आप घर गृहस्थी की चिंता कब से करने लगे। आप बस अपना सामान जो ले जाना है उसे पैक कर लीजिए; यही मेरे लिए बहुत है।
आज सुबह से ही घर में उत्साह का माहौल है जयलक्ष्मी कभी सामान को इस बैग में तो कभी उस बैग में रख रही है। डाक्टर साहब ने मजाकिया अंदाज में कहा कि माना कि मैं बूढ़ा हो गया हूं लेकिन कभी- कभी हमको देख लिया करो। दिल से अभी भी जवान हूं। जयलक्ष्मी ने कहा धत्त!

जयलक्ष्मी हड़बड़ाकर उठी और वाशरूम की तरफ़ जैसे ही आगे बढ़ी उसका पैर स्लिप हो गया और हड्डी के चटकने की तेज़ आवाज़ आयी। वह वहीं बैठ गई। ज़ोर- ज़ोर से चिल्लाने लगी। असहनीय दर्द से वह छटपटा रही थी। डाक्टर साहब किंकर्तव्यविमूढ़ थे। इसी बीच एक दो पड़ोसी भी चिल्लाने की आवाज़ सुनकर आ गए। स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए पड़ोसियों ने कहा कि प्रोफ़ेसर साहब पहले इनको हड्डी के अच्छे डाक्टर के पास ले चलिए। क्योंकि मैम को असहनीय दर्द है एकाक इंजेक्शन दर्द‌ का लग जाएगा तो इनको कुछ राहत मिल जायेगी। शहर के नामचीन डाक्टर के पास प्रोफेसर साहब अपनी पत्नी को ले गए। डाक्टर साहब ने पैर देखा और कहा कि इनकी हड्डियां काफ़ी कमजोर हो गईं हैं। पैर बुरी तरह से फ्रैक्चर हो गया है। अभी एक इंजेक्शन दे रहा हूं; दर्द से कुछ राहत मिल जायेगी। कल आपरेशन करेंगे।

अगले दिन आपरेशन- कक्ष में जयलक्ष्मी को ले जाया गया। आपरेशन सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया; लेकिन जैसे ही डॉक्टर साहब आपरेशन थियेटर से बाहर जाने लगे; उनकी नजऱ‌ पेशेंट के गले पर पड़ गईं। बायीं तरफ़ एक गांठ दिखलाई पड़ी। डाक्टर साहब ने प्रोफेसर साहब से अंदेशा जताया कि आप एक बार वायोप्सी टेस्ट करा लीजिए। शायद मेरा अंदेशा गलत ही हो।
दस दिन बाद वायोप्सी टेस्ट की रिपोर्ट आ गई। डाक्टर साहब का अंदेशा सच निकला। रिपोर्ट प्रोफ़ेसर साहब ने कैंसर के बड़े डाक्टर को दिखाया तो उन्होंने थ्रोट कैंसर बताया।

एक महीने बाद जब जयलक्ष्मी को पैर से आराम मिला। तब प्रोफेसर साहब मुंबई शहर के एक प्रसिद्ध कैंसर अस्पताल में जयलक्ष्मी को कीमोथेरेपी और अन्य इलाज के लिए ले गए। उसके गले में डाक्टरों ने एक नली लगा दी, जिससे वह कुछ तरल पदार्थ ले सके। इस समय वह जीवन और मृत्यु से वह संघर्ष कर रही है। डाक्टर दूसरा भगवान होता है। प्रोफ़ेसर साहब को इस दूसरे भगवान से ही अब कुछ उम्मीद है।

सम्पूर्णानंद मिश्र
शिवपुर वाराणसी
7458994874

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सुकून | लघुकथा | हिंदी कहानी | रत्ना भदौरिया

सुकून | लघुकथा | हिंदी कहानी | रत्ना भदौरिया

जगवन्ती ने सुबह ही डलिये में दियाली रख बच्चों से गांव की गलियों में बेचने कह दिया और ये भी कहा कि वह काम पर जा रही है वापस आकर शहर दियाली बेचने जायेगी, वहां बेचने से जल्दी और ज्यादा दिये बिकेंगे। बच्चे अपनी -अपनी डलिया सिर पर रखकर निकल पड़े।दियाली ले लो दियाली—-‌ जगवन्ती भी काम पर निकल गई। घर से करीब दस‌ किलोमीटर की दूरी पर बसे लालगंज शहर में बर्तन चौका का काम करती। जाते समय जगवन्ती आज काफी खुश थी। दिवाली जो है सभी को बड़ा- बड़ा उपहार मिला वो बग में भाई दफ्तर में काम करता है कितना बड़ा उपहार मिला है उसकी मालकिन भी कुछ उपहार देंगी बड़ा न सही छोटा ही । वैसे भी एक मालकिन के यहां अभी आठ महीने हुए हैं। हां श्वेता मैडम जरूर बड़ा गिफ्ट दे सकती हैं उनके यहां पिछले दो साल से काम कर रही हूं। पिछले साल उनकी मां की तबीयत खराब होने की वजह से वे परेशान थी उन्होंने कहा भी था कि इस बार वे कुछ नहीं ला पायी अगले साल दोनों का देंगी। रास्ते भर यही सोचते -सोचते उसने दस किलोमीटर की दूरी कब तक कर ली पता ही नहीं चला । फटाफट टेंम्पो से उतर गेट की तरफ बढ़ी नहीं -नहीं श्वेता मैडम के यहां बाद में वे बड़ा उपहार देंगी उसे लेकर कहां घूमूगी। पहले अन्नू मैडम के यहां जाते हैं। अन्नू मैडम के दरवाजे की घंटी बजाई चेहरे पर ढेर सारी खुशी, दरवाजा खुलते ही दिवाली मुबारक मैडम। हां ठीक है !आओ जगवन्ती देखो सफाई खूब अच्छे से कर देना ,घर को अच्छे से सजा देना ।शाम को पूजा के बाद लोग खाने पर आएंगे। जी मैडम! जगवन्ती सोचने लगी मैडम ने दिवाली मुबारक भी नहीं बोला! बस हां ठीक है कहकर काम निपटा दिया। कहीं काम खत्म होते ही दिवाली उपहार ना देकर धन्यवाद से काम निपटा ना दें। नहीं- नहीं उसे ऐसी बात नहीं सोचनी चाहिए।

रत्ना भदौरिया की अन्य कहानी पढ़े : लघुकथा स्वेटर 

अगर घर को अच्छे से सजायेगी मैडम के मेहमान खुश हो जायेंगे तो मैडम बड़ा उपहार भी दे सकती हैं। वैसे रुपए पैसे कुछ भी नहीं चाहिए बस छोटा बेटा रामू को स्कूल में दाखिला कराने बोल दें, क्योंकि अभी पिछले हफ्ते ही उसने घर की दशा बतायी थी। जगवन्ती दनादन काम में लग गयी ,पूरे घर की सफाई करते -करते दोपहर के एक बज गए।अब उसके पेट में चूहे कूदने लगे, अभी से इतनी भूख अभी श्वेता मैडम का काम बाकी है।एक हाथ से पेट दबाती कभी पानी पी लेती।अभी घर को सजाना भी है और हां रंगोली भी बनानी है। घर को सजाते -सजाते तीन बज गए।मैडम साहब घर के सभी सदस्य टेबल पर बैठे हैं कई तरह के पकवान बने हैं, साथ में कई तरह की मिठाई भी।साहब मैडम से कहते हुए यार आज खाना बहुत खा लिया,मेरा खाना भी ज्यादा हो गया कहकर मैडम टेबल समेटने लगी। जगवन्ती ने रंगोली बनाई,घर का सारा काम खत्म कर शाम के साढ़े चार बजे मैडम को दुबारा दिवाली मुबारक बोल चलने लगी।मैडम भी ठाठ के साथ हां ठीक जगवन्ती बहुत बहुत धन्यवाद कहते हुए गेट बंद कर लिया। ये क्या वही हुआ? कोई बात नहीं मैडम भी क्या करें इतनी मंहगाई में।

श्वेता मैडम के यहां जाती हूं महज पांच मिनट की दूरी पर श्वेता मैडम का घर। श्वेता मैडम बाहर ही बच्चों के साथ पटाखें फोड़ रही थी। देखते ही भड़क गयी ये कोई समय है आने का ।जब देखो मुंह उठाकर चली आती हो आज का काम कर लिया है अब कल आ जाना। ठीक है मैडम दिवाली मुबारक हो आप सबको । क्या दिवाली मुबारक हो? सुबह से दिमाक खराब कर दिया। सारे रास्ते जगवन्ती ने उपहार पाने की खुशी छोड़ ये सोचने में बिता दिया कि पूरा दिन निकल गया उसने दिये नहीं बेचे अगर बच्चों के दिये नहीं बिके होंगे तो आज खाने में क्या बनायेगी?दस किलोमीटर की दूरी तय‌ करने में घंटा लग गया, क्योंकि सारे टैम्पो वाले घर दिवाली पूजा के लिए जा चुके होंगे,उसे पैदल ही दस किलोमीटर की दूरी तय‌ करनी पड़ी। घर पहुंच कर देखा धुंधले प्रकाश में दोनों बच्चे एक दूसरे से लिपटे हुए सिसक रहे हैं । दौड़ कर जगवन्ती बच्चों को पुचकारते हुए पूछने लगी क्या हुआ दोनों ऐसे क्यों रो रहे हो?मां -मां दिये नहीं बिके ।

छोटा बेटा सिसकते हुए भईया के सिर्फ पच्चास रुपए के ही दिये बिके हैं , और पता है मां सब कह रहे थे कि आज कल इनको कौन लेगा दो चार ले लो । तरह -तरह की लाइट आ गयी हैं, जो चमक और रौनक उनमें इन दियों में कहां? जगवन्ती मुस्कुराते हुए पता है जब मैं छोटी थी तो मेरी मां बहुत स्वादिष्ट खीर बनाती थी आज वही बनाती हूं देखना खाकर मजा आ जायेगा।चलो चलो‌ तुम लोग दियाली जलाओ। मैं अभी आती हूं। पच्चास रुपए लेकर जगवन्ती दुकान गयी वहां से दूध चीनी ले आयी घर के मटके से चावल निकाल खीर बनाने लगी दोनों बच्चे दियाली जलाने में मग्न हो गये । रात के करीब नौ बजे खीर खाने बैठे बच्चे जोर जोर से हंसते और मां को धन्यवाद करते हुए कहते वाह मां आज तो सच में मज़ा आ गया । खाकर तीनों कब सो गए पता ही नहीं चला सुबह जब फोन की घंटी बाजी देखा अरे! ये श्वेता मैडम का फोन है इतनी सुबह। इन्हें क्या हुआ । हेलो मैडम क्या हुआ? जगवन्ती तुम जल्दी से घर आ जाओ और सुनो घर से कुछ खाने का ले आना। यहां पर—–आगे श्वेता मैडम बोल नहीं पाती

जगवन्ती फटाफट बच्चों के लिए नमकीन चावल बना दिये और श्वेता मैडम के लिए खीर ले लेती हूं पसंद आयेगी। श्वेता मैडम के घर पहुंच कर श्वेता मैडम को देख स्तब्ध रह गई। ये सब कैसे हुआ मैडम? इससे पहले आपने कभी ——? कल साहब ने ——और खाना भी खाने नहीं दिया जिसकी वजह से ब्लड प्रेशर की दवाई‌ नहीं ली‌ सिर में बेतहाशा दर्द है । ला पहले जो लेकर आयी खाने का दे बाकी बातें बाद में। जगवन्ती ने मैडम को कटोरी में खीर डालकर दे दी मैडम बड़े आराम से खीर खाकर जोर की डकार ली जगवन्ती सच मजा आ गया,दवाई भी दे दे । जगवन्ती ने दवाई और पानी का गिलास उठा दिया। मैडम ने खीर और दवाई खाकर —-अब जाकर सुकून मिला। जगवन्ती हल्के से मुस्कुरा कर बाहर आ गयी मैडम चैन की सांस ——।

कलम – ए – दर्द ” कहानी | हिंदी कहानी | अभय प्रताप सिंह फियरलेस

कलम – ए – दर्द ” कहानी | हिंदी कहानी | अभय प्रताप सिंह फियरलेस

मैं लिखना चाहता हूं , लेखक बनना चाहता हूं , और अब मैं लिखना शुरू कर दिया हूं , धीरे – धीरे ही सही पर अब लिखने लगा हूं क्योंकि मैं बहुत दिनों से कुछ लिखने का प्रयास कर रहा हूं ,ये होती है एक कलमकार की शुरुआत एक रचनाकार की शुरुआत ।

एक कलमकार या रचनाकार जब अपनी लेखनी की शुरुआत करता है तो उसे कुछ मालूम नहीं होता है शिवाय उस सपने के, जो वो कुछ नींद में और कुछ जागते हुए देखा होता है, वो प्रयास करता है , शुरुआत करता है, गलती करता है लेकिन अपने शब्दों का चयन कर, हर रोज़ मेहनत कर आगे बढ़ता है ।

वो दुःख – सुख , धूप – छांव , रात – दिन नहीं देखता है, वो हर पल सोचता रहता है और जब भी कोई शब्द उसके मन में किसी दृश्य , किसी पल , किसी चित्र या किसी व्यक्ति विशेष को देखकर आता है तो, वो अपने शब्दकोश में इस उम्मीद से उस शब्द को उतार लेता है मानो आज वो उसी शब्द पर लिखने वाला हो, या फिर उसी शब्द का सहारा लेकर लिखने वाला हो , एक रचनाकार , साहित्यकार ,कलमकार , सृजनकार , ग्रंथकर्ता , ग्रंथकार , कातिब अपना सबकुछ लिख देता है , बस पढ़ने वालों को, वो महज़ कुछ पंक्तियां या कुछ शब्दों की श्रृंखलाएं लगती हैं , शायद यही कारण है की सैकड़ों की भीड़ में कोई एक ” कातिब ” निकलता है।

आज़ कातिब अपनी लेखन जगह पर बैठा , सामने रखे मेज पर एक डायरी और कलम रखे कुछ सोच ही रहा था तभी कलम बोली …

क्या कर रहे हो कातिब ?
कातिब – थोड़ा मुस्कराते हुए …. कलम कर तो कुछ नहीं रहा हूं बस आज कुछ लिखने की सोच रहा हूं।
कलम – अच्छा
कातिब – हां
कलम – तुम लोगों को तो लिखना बहुत आसान लगता होगा न ( असमंजस में )
कातिब – हां आसान तो लगता है बस ये मानो की शब्दों के कुवें में कूदना पड़ता है जहां लाखों – करोड़ों शब्दों का भंडार होता है और उस भंडार से कुछ चुनिंदा शब्दों को निकाल कर उन्हें एक रूप – रेखा देकर लिखना होता है , इसलिए आसान तो है ख़ैर।

कलम – अच्छा ये बताओ तुम इतने ज्यादा शब्दों को कुछ मिनटों में कैसे लिख लेते हो ?
कातिब – अगर इस सवाल का मैं जवाब दूं तो मुझे तुमको कुछ साल पीछे ले जाना पड़ेगा ।
कलम – अच्छा
कातिब – हां
कलम – बताओ फिर
कातिब – बात सालों पहले की है जब मुझे क्या लिखना है , कैसे लिखना है और क्यों लिखना है ?
इन सब सवालों में से किसी एक का भी जवाब नहीं पता था लेकिन मैं सवालों के जवाब ढूंढना शुरू किया तो महज़ कुछ महीनों में मुझे उन सारे सवालों के ज़वाब मिल गए।
कलम – उसके बाद ?
कातिब – उसके बाद फिर मैं बहुत सारे लोगों को पढ़ा ,फिर उनको समझा और जब वो लोग मुझे समझ में आ गए तब जाकर मै कुछ शब्दों को अपनी डायरी में उतारना शुरू किया , फिर देखा तो मुझे लगा की मैं अभी भी कुछ गलतियां कर रहा हूं।
कलम – उसके बाद ?
कातिब – उसके बाद, फिर से मैं लोगों को पढ़ा और उनके साथ – साथ इस बार साहित्य को भी पढ़ा ,पढ़ा ही नहीं बल्कि उसे समझा भी, तब जाकर मुझे पता लगा की मैं गलतियां कहां कर रहा था।
कलम – अच्छा
कातिब – हां
कलम – फिर ?
कातिब – फिर मैं जो पढ़ा था उन्हीं शब्दों को एक – एक करके लिखना शुरू किया पहले तो लगा की मैं अभी भी नहीं लिख पाऊंगा लेकिन हिम्मत नहीं हारा और कुछ पंक्तियां लिख दी। कुछ दिन थोड़ा – थोड़ा लिखने के बाद मुझे ये अहसास हुआ की मैं लिख सकता हूं और उसके बाद मैं धीरे – धीरे पंक्तियों की संख्या बढ़ाता गया और अपनी लेखनी को निखारता गया।
कलम – अच्छा
कातिब -हां

कलम थोड़ी देर सोची फिर बोली ….

कलम – अच्छा जब तुम लोग कुछ लिखकर उसे प्रकाशित करते होगे खुद से, या प्रकाशित करवाते होगे कहीं से या फिर जब तुम लोगों की लिखी लेखनी किसी पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित होती होगी तब तो तुम्हारा लोगों का नाम खूब रौशन होता होगा ।
कातिब – हां होता तो है, पर
कलम – पर, क्या ?
कातिब – दरअसल जब हम जैसे लोग कुछ लिखकर खुद से प्रकाशित करते हैं किसी न किसी माध्यम से या फिर कहीं से प्रकाशित होती है तो, बहुत सारे लोगों की प्रतिक्रियाएं आती हैं ।
कलम – तो , प्रतिक्रियाएं आनी तो अच्छी बात हैं
कातिब – हां, अच्छी बात तो है लेकिन उन प्रतिक्रियाओं में कुछ प्रतिक्रियाएं तो सकारात्मक होती हैं परंतु कुछ प्रतिक्रियाएं नकारात्मक भी होती हैं।
कलम – अच्छा
कातिब – हां
कलम – अच्छा नकारात्मक प्रतिक्रियाओं का क्या मतलब होता है ?
कातिब – ज्यादा तो कुछ नहीं होता है बस उसमें हम जैसे लोगों के लिए कुछ लोगों द्वारा कुछ अपशब्द बोले जाते हैं , कुछ अपशब्द भाषाओं का प्रयोग किया जाता है जिन्हें सुनकर थोड़ी देर के लिए मन उदास होता है और फिर से जब अपनी दिल की बात या अपने मन की बात पुनः शब्दो में उतार लेते हैं तो मन खुश हो जाता है और थोड़ी देर बाद हम पुनः मुस्कुराने लगते हैं या अपने कामों में लीन हो जाते हैं।
कलम – ओह!
कातिब – हां
कलम – और क्या होता है ?
कातिब – ज्यादा तो कुछ नहीं होता पर कभी – कभी हम लोगों की बेइज्जती भी कुछ लोग परिवार के सदस्यों से करते रहते हैं कि –

” ये क्या करता रहता है या करती रहती है। “

कलम – तुम लोग तो उनकी भलाई के लिए , उनके लिए और उनकी हित में ही लिखते हो, फिर वो लोग ऐसा क्यों बोलते हैं ?
कातिब – हां, लिखता तो उनकी हित में ही हूं , उनकी भलाई के लिए ही, परन्तु वो लोग इस बात को समझने के लिए तैयार ही नहीं होते , उनको लगता है की हम जैसे लोग पागल हैं जो इधर – उधर की बातें लिख कर अपने समय के साथ – साथ उनका समय भी ज़ाया करते हैं।

थोड़ी बात आगे बढ़ी फिर कलम बोली ….

अच्छा ये बताओ तुम लोग तो लोगों की भावनाओं को लिखते हो , उनकी समस्याओं का निवारण करने के लिए लिखते हो , उनको थोड़ा सा आगे बढ़ने में ताकत देने के लिए लिखते हो उनको उनकी रास्तों में सक्षम बनाने के लिए लिखते हो जिनसे वो लड़ सकें और एक नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ सकें या यूं कहूं की उन्हें एक नए रास्ते से परिचय कराते हो ?

कातिब – कलम तुम बोल तो सही रही हो लेकिन वो लोग उस बात को समझने के लिए तैयार ही नही होते हैं उनको लगता है की हम जैसे लोग बिलकुल बेकार बैठे हैं इसलिए लिखते रहते हैं उल्टा – सीधा। जबकि उनको ये नहीं पता होता है की हम बिना देखे , बिना सुने , बिना किसी के बारे में कुछ विशेष जाने , बस अपनी भावनाओं की मदद से , अपने दिमाग की मदद से , अपनी अंतरात्मा की मदद से किसी भी विषय पर या किसी के विषय में लिखने के लिए सक्षम होते हैं।

कलम थोड़ी देर सोचती रही , फिर बोली ….

अच्छा मुझे एक बात नहीं समझ आ रही है की जब तुम लोगों को कुछ ही लोग समझते हैं बाकी के लोग समझने को तैयार ही नहीं हैं तो लिखते ही क्यों हो ?

इस बार कातिब धीरे से मुस्कुराया और बोला ….

हमें पता होता है कि हमें कुछ ही लोग समझ पाते हैं बाकी लोग समझने के लिए तैयार नहीं होते हैं फिर भी हम सिर्फ़ इसलिए या इस उम्मीद से लिख देते हैं की जो ज्ञान हमारे पास है उससे उन्हें कुछ सीख मिले, हमारे पास जो अनुभव होता है उसे हम इसलिए लिख देते हैं की जिन परेशानियों से , समस्याओं से ,चुनौतियों से हम पीछे रह गए हैं , जिस मार्गदर्शन बिना हम आगे नहीं बढ़ पाए हैं, वो न रहें बल्कि वो दिन – रात मेहनत करके अपने कर्तव्य को पहचानते हुए एक नई रौशनी , नई उम्मीद , नई उमंग या यूं कहें की एक नई ऊर्जा के साथ सदैव आगे बढ़ते रहें।

थोड़ी देर बाद …..

कलम – तो क्या इसे अब मुझे ” दर्द – ए – कलम ” मान लेना चाहिए ?
कातिब – बिलकुल
कलम – पर क्यों ?
कातिब – क्योंकि हम जैसे लोग अपने दिलों में उन तमाम मुसीबतों को , परेशानियों को , चुनौतियों को , दर्द एवं तकलीफों को दबाए हुए रहते हैं जिन्हें हम शब्दों में उतार कर लोगों के पास पहुंचाने का प्रयास करते हैं , हम ये उम्मीद करते हैं की शायद इसे कोई पढ़ेगा और अपनी गलतियों को सुधार कर आगे बढ़ेगा । हम जैसे लोग तो उनकी समस्याओं को , परेशानियों को भावनाओं को , चुनौतियों को , दर्द एवं तकलीफों को देखकर समझ जाते हैं , भांप लेते हैं जिन्हें शब्दों में उतार कर एक ” रचना ” का नाम दे देते हैं लेकिन हम लोगों की परेशानी , चुनौती , समस्याएं , दुःख – दर्द , तकलीफें तो छोड़ो कोई हमारी भावनाएं तक नहीं समझता है और न ही समझने की कोशिश करता है इसलिए सैकड़ों की भीड़ में कोई एक ही रचनाकार , साहित्यकार, कलमकार, ग्रंथकर्ता , ग्रंथकार , सृजनकार निकलता है इसलिए हम जैसे लोगों की भावनाओं को ” दर्द – ए – कलम ” समझने में या यूं कहें की कहने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए।

हिंदी कहानी मुट्ठी भर जिंदगी | अभय प्रताप सिंह

मुट्ठी भर जिंदगी “

शहर से दूर गंगा नदी के किनारे बसा एक ऐसा गांव और उस गांव में बसा महतो काका का परिवार मानों ” सोने पर सुहागा ” वाले कहावत से मिलता जुलता हो , जितना सुंदर वो गांव उससे कई गुना ज्यादा सुंदर महतो काका का परिवार भी था। महतो काका अपने छोटे से घर को गांव से हटकर चौराहे से करीब 500 मीटर मीटर दूर बनवाए थे, ईंट गारा से बना घर और उसके पास लगे तमाम प्रकार के पेड़ पौधे घर की सुन्दरता को और बढ़ा रहे थे , घर के एक तरफ़ फ़ल देने वाले पौधे तो दूसरी तरफ़ प्यारी सी खुशबू देने वाले कुछ फूलों के पौधे भी लगे हुए थे। इन सबके साथ – साथ महतो काका के घर को सुंदर बनाने में उनके पांचों बेटे और दोनों बेटियों का भी बहुत बड़ा हांथ था। घर के सभी सदस्य संस्कारो और गांव, घर के रीति रिवाजों से बंधे हुए थे , सभी सदस्यों का शिक्षण कार्य भी खत्म हो गया था और अब महतो जी के पांचों बेटे विद्यालय में पढ़ाने लगे थे इन सभी के अंदर ज्ञान तो इतना भरा था मानो ज्ञान रूपी गंगा बह रही हो। खुशहाली का दूसरा नाम कहा जाने वाला महतो जी का घर रोज़ एक नए अंदाज़ में अपनी जिंदगी को जिया करते थे और सभी सदस्यों के बीच एक समझदारी वाला भाव हमेशा साफ़ – साफ़ देखा जा सकता था। महतो जी का परिवार गांव के लोगों से थोड़ा अलग इसलिए दिखता था क्योंकि यहां जलन, लालच , छल , कपट से सभी सदस्य कोषों दूर या यूं कहें कि कोसों अंजान थे।

महतो जी के पांचों बेटों में उनका बड़ा बेटा जगमोहन विवाह योग्य हो गया था जिसके लिए रिश्तों का आवागम भी होने लगा था लेकिन मन न मिलने की वजह से बहुत सारे रिश्तों को जगमोहन के द्वारा ठुकरा दिया गया था। लेकिन मानो वो दिन दूर नहीं था आज फिर से जगमोहन के लिए एक रिश्ता उनके मामा जी के द्वारा लाया गया था और परिवार के सभी सदस्यों से बात करने के बाद, उनके मत लेने के बाद आज उस रिश्तों को महतो काका के द्वारा हां करके रिश्ते को तय कर दिया गया , रिश्ता तय होने के कुछ महीने बाद जगमोहन का विवाह गीतारानी से कर दिया गया । आज महतो काका का देखा हुआ वर्षों का सपना साकार होते दिख रहा था और दोनों दंपती सबका आशीर्वाद लेने के बाद शादी के जोड़े में मानो हमेशा हमेशा के लिए बंध गए हों ।

जगमोहन की शादी के बाद परिवार के सभी सदस्य अथाह खुश थे क्योंकि उस परिवार में किसी के अंदर किसी भी प्रकार की कोई बुराई नही थी जिसकी वजह से गीतरानी महज़ कुछ दिनों में उस परिवार को अपना परिवार मान ली थी। घर में इतनी खुशियां थी जिसकी कोई मोल नहीं थी और गीतारानी भी परिवार के सभी सदस्यों को खुश देखकर अपने आप को महफूज़ समझ रही थी। ये खुशियां उस दिन और दोगुनी हो गई थी जब गीतारानी एक नन्ही सी बच्ची को जन्म दी थी लेकिन मानो ऊपर वाले को कुछ और मंजूर ही था जिस घर में खुशहाली थी या जिस घर में बच्ची के आगमन से गाने बजाने होने वाले थे उसी घर में अचानक दुखों का पहाड़ टूट गया ।

बच्ची की वजन कम होने से महतो काका के परिवार के सदस्यों को 15 दिन के लिए बच्ची को अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ गया था और इधर गीतारानी की भी तबियत थोड़ी बहुत ख़राब होने लगी थी , घर के सभी सदस्य गीतारानी को अच्छे से अच्छे अस्पताल में दिखाते थे और दिखाने के बाद जब गीतारानी घर वापस आती थी तो सभी सदस्य एक बच्चे की भांति उनकी सेवा में लग जाते थे । डॉक्टर्स भी महंगे से महंगे दवाईयां गीतारानी को खाने को देते थे लेकिन गीतारानी उन दवाओं को खाने की जगह छिपा कर रख देती थी और घर के सदस्यों को लग रहा था की वो दवाएं खा रही हैं।


ये सिलसिला कई महीनों से चल रहा था , गीतारानी को दवाईयां लाकर दी जाएं और वो न खाएं। इसलिए एक समय घर के सदस्यों को लगने लगा की शायद ये झूठ बोल रही हैं इनको कोई बिमारी नहीं है जबकि यकीनन गीतारानी को तकलीफें थी बस दवाओं और डॉक्टरों के डर के कारण वो किसी से बताती नहीं थी बस यही कारण था की गीतारानी को उसका खामियाजा भुगतना पड़ गया था, गीतरानी के आखरी वक्त में महतो काका के परिवार के सभी सदस्य लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी उन्हें बचाने में असमर्थ रहे और गीतारानी विवाह वक्त से महज एक साल और मां बनने के बाद महज़ एक माह में ही घर के सभी सदस्यों के साथ – साथ उस नन्हीं सी जान को भी हमेशा के लिए छोड़कर उन सबसे बहुत दूर चली गई।

नोट – इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है की कैसे छोटी सी गलतफहमी और छोटा सा डर हमें परिवार के सदस्यों से दूर करा देता है। इसलिए अगर आप लोगों के बीच भी कोई ” गीतारानी ” हों तो उन्हें ” मुट्ठी भर जिंदगी ” न बनने दें और एक हंसते खेलते परिवार को हमेशा के लिए उजड़ने से बचाएं।