Karwa Chauth 2021 | करवा चौथ और आरती

‘करवा चौथ और आरती’

कार्तिक माह का आगमन हो चुका था..आरती मन ही मन बहुत परेशान थी, दो दिन बाद ही करवा चौथ का व्रत होगा..पहली बार अकेले सबकुछ करने की सोच से ही वो उदास थी.. चौबीस वर्ष वो संयुक्त परिवार के स्नेहिल माहौल में रही थी, पर इस वर्ष कुछ ऐसा घटित हुआ कि पतिदेव ने घर छोड़ देने का फैसला किया..वो धक से रह गई.. असंभव लगा उसको आगे जी पाना.. सबसे इतना प्रेम था उसको कि मायका भी भूल गई थी वो..उसको नये घर में शिफ्ट हुए दस माह हो चुके थे, पर पुराने झगड़े जस के तस दिमाग पर कब्जा किये थे.. उसने दिमाग को झटका और तैयारी करने लगी..याद कर-कर के सामान जुटाने लगी.. फिर अचानक फूट-फूट कर रो पड़ी.. “हे भगवान! ये क्या हो गया.. मैं कैसे जी पाऊंगी बिना अम्मा लोगों के..” ये सोच कर वो फिर तनावग्रस्त हो गई..तब तक प्रवेश आ गया..”अरे! तुम फिर रोने लगी? कहकर उसको गले लगा लिया” उसकी ऑंख भी भरी थी, पर छलकने नहीं दिया उसने..”चलो, बाजार हो आते हैं” कहकर वो गाड़ी निकालने लगा..मन से वो भी बहुत अशांत था, पर आरती के सम्मान के लिए उसको ये बड़ा निर्णय लेना पड़ा..उन दोनों के कोई बच्चा नहीं था..पर उनको छोटे भाई के बच्चे अपने ही लगते थे.. उसके दिमाग में उस दिन की वो कड़वी बात फिर उलझ गई.. किचकिच होना तो आम बात थी, पर छोटे भाई का ये कहना कि “मेरे बच्चों को अपना समझना छोड़ क्यों नहीं देते ये लोग..जब इनके अपने बच्चे नहीं हैं तो नहीं हैं, फिर काहे हर समय बड़ी मम्मी बनी फिरती है ये बाॅंझ”..
भाई ने अपनी पत्नी से कहा था..जीने उतरते समय प्रवेश ने जैसे ही ये शब्द सुने धक से रह गया वो! उसको यकीन नहीं हुआ..जो उसके कानों ने सुना..आरती का निश्छल प्रेम.. समर्पण सब व्यर्थ? छि: ..इतनी गिरी हुई सोच थी छोटे की, सहसा उसको घिन आई अपने रिश्ते पर, और तो और माॅं-बाबूजी भी चुप थे.. उसने तुरंत निर्णय ले लिया और .. ..तब तक आरती ने उसका हाथ दबाया.. “क्या सोचने लग गए आप, चलिए ना..”
“ओह! चलो -चलो” कहकर उसने गाड़ी निकाली..
आज करवा चौथ था..
सजी-धजी आरती उसको बहुत प्यारी लग रही थी.. प्रवेश ने प्यार से उससे पूछा “क्या क्या बनेगा आज , सब मैं बनाऊंगा ..तुम बस बता देना”
तभी कालबेल बजी..”मैं देखता हूॅं..”कहकर प्रवेश दरवाजा खोलने बढ़ा..
प्रवेश की “सुनो” की आवाज सुनकर आरती बाहर आई.. “अरे अम्मा..”खुशी से आरती की आवाज थरथरा गई.. सामने अम्मा-पापा खड़े थे! आरती दौड़ कर अम्मा के गले लग गई और फूट-फूट कर रो पड़ी..
“रोते नहीं है आरती, इतने सालों से तुमने बिन कुछ कहे अपनी सारी जि़म्मेदारी निभाई है, तुम्हारे वहाॅं से आने के बाद हम दोनों ने बहुत विचार किया और फिर तुमको अपने घर वापस ले चलने के लिए आ गये..”
“नहीं अम्मा, अब वहाॅं नहीं जाएंगे हम, आप छोटे के साथ ही रहिए वहां.. “प्रवेश ने बहुत खिन्नता से कहा..
“बेटा.. छोटे को दस दिन पहले ही हम लोगों ने घर से निकाल दिया है, तुम लोगों के जाने के बाद से वो बहुत बदल गया था, शराब पीकर ऊटपटांग बोलता था, एक दिन आरती के लिए कुछ ऐसा कहा कि तुम्हारे पापा अपना आपा खो बैठे और उसको घर से निकल जाने को कह दिया..”बताते बताते अम्मा हाॅंफ सी गईं और उन्होंने आरती का हाथ कस के पकड़ लिया..”आप अंदर चलिए अम्मा..सारी बातें दरवाजे पर ही कर लेंगी क्या?” कहते हुए आरती ने दोनों के पैर छुए और दोनों को अंदर लेकर चल दी..
दस महीने बाद अपने घर में पूजा करने बैठी आरती ने अम्मा के साथ चंद्रमा का दर्शन किया और प्रवेश को साज-श्रंगार किये हुए अम्मा के साथ, हॅंसते खिलखिलाते देखकर सहसा भावुक हो गई.. “कितने दिन बाद प्रवेश इतना खुश दिख रहा है”, सोचते हुए आरती.. अपनी अम्मा के साथ करवा चौथ की पूजा संपन्न करने बैठ गई।

Short Story Manzil Ki Aur | मंजिल की ओर/ रूबी शर्मा

Short Story Manzil Ki Aur- मंजिल की ओर-रूबी शर्मा

मंजिल की ओर

रूबी शर्मा

अनेक संघर्षों का सामना करते हुए आज मुझे मेरी मंजिल मिल गई हैं। आज मैं सुपरस्टार हूं। पूरा शहर मुझसे परिचित है। अधिकांश तो मेरे प्रशंसक हैं। यह तो मुझ पर परमपिता परमेश्वर की असीम अनुकंपा है कि उसने मुझे बहुत ही सुंदर बनाया, मेरे रंग के अनुरूप काया भी सुडौल बनाई है । इतना ही नहीं उसने मुझे कोयल जैसी मीठी आवाज एवं स्वर दिया । यही कारण है कि आज मेरे दर्शक मुझ से बहुत प्रभावित हैं । मेरी कई फिल्में सुपर हिट हो चुकी है।

आज मेरे पास पैसों की कमी नहीं है। ऐश्वर्य हमारे कदमों में बिखरा हुआ है । तीन चार नौकरों का घर भी मेरी वजह से प्रसन्नता पूर्वक चल रहा है ।

यह सब अपनी दोस्त श्रेया को बताते बताते अचानक आयुषी के चेहरे पर उदासी छा गई ,वह शांत हो गई ।आयुषी की यह दशा देखकर श्रेया को बहुत आश्चर्य हुआ । उसने कहा,” अभी तो तुम ठीक ठीक बात कर रही थी किंतु बात करते-करते तुम्हें यह क्या हो गया। श्रेया के पूछने पर उसने कहा कि बहन शायद तुम्हें पता नहीं कि यह सब पाने के लिए, अपनी स्टार बनने की इच्छा की पूर्ति के लिए मैंने क्या-क्या खोया है ।कितने कष्ट सहे हैं । आज मेरे मम्मी- पापा ,भाई ,सास-ससुर एवं पति सतीश सभी मुझसे दूर हो गए हैं ।”

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इतने पर श्रेया बोली,” क्या वे सभी लोग तुम्हें स्टार नहीं बनाना चाहते थे ? क्या उन्हें इस क्षेत्र में कैरियर बनाना पसंद नहीं था? क्या वे सब तुम्हें कुछ और बनाना चाहते थे?”      

आयुषी ने दुख भरी आवाज में कहा ,”हां !वे सभी मुझे स्टार नहीं बनाना चाहते थे। मेरे मम्मी-पापा तो मुझे डॉक्टर बनाना चाहते थे, ताकि मैं समाज की सेवा कर सकूं ।बीमार व्यक्तियों की चिकित्सा करके उनका कष्ट दूर कर सकूं ।उनका यह भी कहना था कि मैं गरीब असहाय लोगों की चिकित्सा करके उन्हें निरोग बनाऊं परंतु मैं यह नहीं चाहती थी।मुझे अभिनय कला एवम् संगीत से बेहद रूचि थी ।मैं अपनी इस कला को निखरना चाहती थी ।

जब मैं कॉलेज में पढ़ती थी, कालेज के प्रत्येक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेती थी । गीत संगीत एवं नाटक में बहुत अच्छा प्रदर्शन करती थी जिसके कारण मैं पूरे कालेज में जानी पहचानी जाती थी ।मेरे अध्यापक भी मुझसे बहुत स्नेह करते थे ।वह सभी मेरी प्रतिभा का सम्मान करते थे।

मेरी प्रतिभा को देखकर मेरी संगीत की अध्यापिका मैडम दीपांशी मेरी बहुत प्रशंसा करती थी । अक्सर मुझे और अच्छा गाने या अभिनय करने के लिए प्रेरित करती थी । उनका कहना था कि यदि मैं थोड़ी सी मेहनत संगीत एवं अभिनय के प्रति कर दूं तो मैं इस क्षेत्र की ऊंची से ऊंची मंजिल प्राप्त कर सकती हूं। मैडम दीपांशी की बातें मुझे बहुत अच्छी लगती थी क्योंकि मेरी रुचि जो इस क्षेत्र में थी। धीरे-धीरे मेरे कालेज की पढ़ाई समाप्त हो गई। मैं स्नातक अच्छे अंको से उत्तीर्ण हो गई ।

अब मैं मुंबई जाकर एक्टिंग का कार्य सीखना चाहती थी। मैंने अपनी इच्छा अपने पापा के सम्मुख रखा उनसे विनती के स्वर में कहा,” पापा! मेरी इच्छा स्टार बनने की है इसलिए मैं एक्टिंग का कार्य सीखना चाहती हूं।अतः आप मेरा ऐसे ही किसी कॉलेज में एडमिशन करवा दीजिए जिससे मैं अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकूं ।”

मेरे पिताजी मुझे इस क्षेत्र में नहीं भेजना चाहते थे । उन्होंने कहा ,”तुम्हें आगे डॉक्टर बनना है ।अतः तुम डॉक्टरी की पढ़ाई करो ।इस समय सिटी विश्वविद्यालय में फार्म आ चुके हैं ।एक-दो दिन में तुम ऑनलाइन फॉर्म देना।”

पापा की इन बातों को सुनकर मेरे हृदय को बहुत आघात पहुंचा लेकिन मैं कर ही क्या सकती थी। फिर मैंने सोचा एक बार और प्रयास करूं ,शायद पापा मान ही जाएं ।वह मुझे मुंबई भेज दे ।

शाम को जब पापा टहलने के लिए बाहर गए तब मैंने मम्मी से पूरी बात कही। उनसे प्रार्थना किया कि वे पापा को किसी भी तरह से तैयार कर लें ।मम्मी ने सांत्वना देते हुए कहा, “ठीक है बेटी मैं तुम्हें तुम्हारे पापा से बात करूंगी ।शायद वह मान जाए।”

बाद में मम्मी ने पापा से इस विषय में बात की लेकिन फिर भी पापा तैयार नहीं हुए । इसी बीच मेरे फूफा जी घर आए । दो-तीन दिन रुके थे। उन्होंने गाजीपुर में रहने वाले दयाराम के बेटे सतीश से मेरी शादी करने के लिए पापा से कहा। पापा ने लड़का देखा। सुंदर और होनहार लड़का देखकर आनन-फानन में ही शादी कर दी । मैं सोच रही थी कि मैं अपनी इच्छा सतीश के सामने प्रकट करुं, शायद वह मेरा साथ दे ।

एक दिन मैंने साहस करके सतीश से अपनी बात कही लेकिन सतीश की भी प्रतिक्रिया सहयोगात्मक न थी ।उसने भी मना कर दिया ।बोला – तुम बी.एड., बी.पी.एड.,नेट,पी- एच.डी. कर लो।नौकरी करके सम्मान की जिंदगी जियो ।उनका यह परामर्श मुझे अच्छा नहीं लगा ।

ससुराल में एक वर्ष ही बीता था कि सहसा मेरे मन में घर द्वार ,नाते- रिश्ते छोड़कर अपने लक्ष्य को पाने का विचार आया।मैं अपना कुछ आवश्यक सामान ,पैसे एवं कुछ जेवर एक बैग में रख कर घर से भाग गई। वहां से मैं रेलवे स्टेशन पहुंची । मुंबई के लिए टिकट लेकर गाड़ी में बैठ गई।कुछ घंटों के सफर के बाद मैं मुंबई पहुंच गई ।मुंबई में कहां जाना था ,मुझे स्वयं ही नहीं पता था ,लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी । खोजते -खोजते एक कमरा किराए पर ले लिया ।वहां रहने लगी।मैं काम की खोज में घर से बाहर निकली लेकिन काफी समय तक मुझे काम नहीं मिला। धीरे-धीरे पैसे भी समाप्त हो गए थे ।एक-एक करके मैंने जेवर बेचना शुरू किया ।

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बाद में मुझे गाना गाने के लिए एक छोटे से थिएटर में नौकरी मिल गई। मैं इससे संतुष्ट नहीं थी क्योंकि घर द्वार छोड़कर मैं थिएटर में गाना गाने नहीं आई थी ।मैं करती भी तो क्या ,मेरे सामने कोई रास्ता नहीं था। इस अनजान शहर में मैं बिना पैसे के कैसे जीवन व्यतीत करती ।कभी- कभी मेरे मन में घर लौटने का विचार आता था लेकिन मैं सोचती शायद मेरे घर वाले मुझसे नाराज होंगे । अब वह मुझे घर में नहीं रहने देंगे ।यह सोचकर मैं सहम उठती और घर न जाने का विचार मन में दृढ़ कर लेती। काफी दिनों तक मैं थिएटर में ही गाना गाती रही तथा लोगों का मनोरंजन करती रही।

एक बार भाग्य ने मुझे मौका दिया ।अचानक एक दिन सौभाग्य से थिएटर में ही फिल्म निर्देशक संजीव सक्सेना आए ।वह मेरे गाने को सुनकर मेरी आवाज पर प्रसन्न हो गए तभी उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया। फिल्मों में गाना गाने की बात कही।उनकी बात को मैंने तुरंत स्वीकार कर लिया क्योंकि मैं तो यही चाहती थी। इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए घर -द्वार, नाते -रिश्ते तोड़ कर मुंबई आई थी।दूसरे दिन से ही मैं थिएटर छोड़कर फिल्म इंडस्ट्री जाने लगी ।

सभी मेरी तारीफ करते थे । कुछ समय पश्चात अपने अभिनय कौशल को भी उन लोगों के सामने प्रकट करने की आज्ञा मांगी और मुझे अभिनय करने की आज्ञा मिल गई।मेरे अभिनय एवं स्वर से फिल्म निर्देशक संजीव सक्सेना जी अति प्रभावित हुए। उन्होंने मुझे फिल्मों में नायिका के लिए सिलेक्ट कर लिया। अब क्या था मैं अपनी मंजिल पर पहुंच चुकी थी ।अब मैं अच्छा से अच्छा प्रदर्शन करने की सोचती थी।

मेरी पहली फिल्म जब रिलीज़ हुई तो हिट हो गई ।मेरे पास प्रशंसकों के प्रशंसा भरे पत्र आने लगे ।यह सब देख कर मैं बहुत प्रसन्न हुई ।आज तक मैंने बहुत सी फिल्मों में काम किया ।उनमें कई फिल्में सुपरहिट साबित हुई।

अब अपने वर्तमान में आते हुए आयुषी कहती है कि मुझे दुख तो बस इस बात का है कि आज शहर में सभी मेरे प्रशंसक हैं परंतु मेरे परिवार वाले मुझसे नाराज हैं ।इतने दिनों तक मैं उनके वियोग में जीती रही ।अब उनसे मिलने की इच्छा होती है ।यह कहकर आयुषी फूट-फूट कर रोने लगी।

श्रेया ने उसे समझाया । बोली- आयुषी धैर्य रखो ।यदि ईश्वर कही है और वह सब की इच्छा की पूर्ति करता है तो वह तुम्हारी इच्छा की पूर्ति भी अवश्य करेगा।यह न जाने कितने बिछड़े लोगों को मिलाता तथा कितनों को भी वियोग की भंवर में फंसा कर बेहाल करता है ।मुझे ऐसा आभास होता है कि तुम्हारे घर के लोग भी तुम्हें जल्दी ही मिलेंगे।

इधर आयुषी के मम्मी पापा सतीश व अन्य सभी लोग टेलीविजन व समाचार पत्रों के माध्यम से जान चुके थे कि अब आयुषी बहुत ऊंची ऊंचाइयों को छू चुकी है ।वे सभी बहुत प्रसन्न हुए ।आयुषी से मिलने के विचार से मुंबई चल दिए ।बड़ी मुश्किलों का सामना करते हुए वे आयुषी का पता लगा पाए ।उसके यहां पहुंचकर नौकर ने उसके विषय में जानकारी ली उनसे मिलने की वजह कहीं ।

अगले दिन आयुषी सुबह का नाश्ता कर रही थी कि एक नौकर ने आकर बताया । कुछ लोग उनसे मिलने गांव से आए हैं ।क्या उन्हें अंदर ले आऊं।आयुषी ने सोचा कि यहां गांव से कौन आया होगा ।यहां गांव से मेरा कोई रिश्ता तो है नहीं फिर कौन आया है ,हो न हो कोई प्रशंसा ही आया होगा ।यह सोचकर उसने गेस्ट रूम में लाने की आज्ञा दे दी।

वे सभी अंदर आए ।अपने परिवारी जनों को देखकर आयुषी स्तंभित रह गई ।उसकी आंखों से प्रसन्नता के आंसू बहने लगे ।उसने सभी से प्रेम पूर्वक व्यवहार किया।सब का यथोचित स्वागत सत्कार किया तथा घर से भागने के लिए क्षमा याचना करते हुए कहा ” मैं आप सब लोगों की इच्छा के विरुद्ध यह कार्य किया किंतु मैं करती ही क्या ईश्वर की यही इच्छा थी। अतः विवश होकर मुझे ऐसा करना पड़ा ।आप लोग मुझे इसके लिए क्षमा करें।”

सतीश ने कहा,” क्षमा तो हम लोगों को तुम से मांगना चाहिए। हमने तुम्हारी प्रतिभा को पहचाना नहीं, उसको निखारने में तुम्हारा सहयोग नहीं दिया ।अतः तुम हम सभी को क्षमा कर दो ।आयुषी के माता पिता उसके कार्य की प्रशंसा करने लगे और कहने लगे हम सभी पुराने विचारों के हैं ।हमें क्या पता कि संगीत और अभिनय में भी इतनी उन्नति की जा सकती है ।हम तो इस कार्य को निकृष्ट ही समझते रहे। तुम ने यह सिद्ध कर दिया कि किसी भी क्षेत्र में ऊंचाइयों को प्राप्त कर नाम कमाया जा सकता है ।

इस प्रकार से अपनी लगन और परिश्रम से अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया। ईश्वर की कृपा से उसके बिछड़े हुए परिजन भी मिल गये।

सुंदरी | Emotional Motivational Story in Hindi

सुंदरी – Emotional Motivational Story in Hindi

अबुल हसन तो था पाँचवक्ती नमाजी पर उठना-बैठना था हिंदुओं के साथ। उसके रग-रग में भारतीय सभ्यता और संस्कृति रची-बसी थी। भारतीय संस्कृति के चार आधार ‘ गंगा , गीता, गायत्री और गौ ’ जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानता था। वह यहाँ रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को हिंदू समझता क्योंकि उसके अनुसार हिंदू-हिंदुत्व कोई धर्म नहीं वरन् एक जीवन-पद्धति ,एक व्यापक विचार-धारा है जो मानवता से भी आगे ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘अहिंसा परमो धर्म:’ की अवधारणा से अनुप्राणित है।

बचपन में ही माँ की ममता से वंचित हो जाने वाले अबुल हसन के पिता मक़बूल हसन दर्जी का काम करते थे। वह बचपन से ही पढ़ाई में होशियार था। वह मैट्रिक की परीक्षा में पूरे जिले में अव्वल आया था लेकिन आगे पढ़ने की इच्छा आर्थिक तंगी के कारण परवान न चढ़ सकी। बड़ा भाई माजिद हसन कलकत्ता के किसी चटकल फैक्ट्री में काम करता था। भारत विभाजन के बाद पटसन उत्पादन का अधिकांश क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान ( बांग्लादेश) में चला गया और कलकत्ता की चटकल मिलें धीरें-धीरें बंद होने लगी तो वह गाँव आ गया। घर गृहस्थी से उसका कोई लेना- देना ना था केवल गाँव के आवारा युवकों के साथ ताश खेलना और शाम को गाजा –चिलम का दम लगाना ही अब उसका काम रह गया था।

पिता के इंतकाल हो जाने के बाद अपने चार बेटियों और दो बेटों वाले परिवार के पालन-पोषण के लिए उसने गाय खरीदने का मन बनाया क्योंकि खेती-किसानी से बढ़ता परिवार पालना मुश्किल हो रहा था। बड़े भाई से कोई आशा न थी क्योंकि वह मस्त-मलंगा बना घूमता रहता था। उसे परिवार से कुछ लेना-देना ही नहीं था। उसके खुद के परिवार में मात्र एक बेटी थी फातिमा ,जिसे उसकी बीवी बीस साल पहले ही छोड़कर भाग गई थी। अबुल हसन फातिमा को अपने बेटी से भी ज्यादा प्यार करता था क्योंकि वह उस घर की पहली संतान थी।

पा लागी पंडीजी ! ” अबुल ने गाँव के पोस्ट मास्टर नागेद्र पाठक को आते देख दूर से ही कहा।
“खुश रह – खुश रह— ” पाठकजी ने हाथ से आशीर्वाद की मुद्रा बनाते हुए कहा।
“अबुल ! तुम्हारे पिताजी ने डाकघर में बचत खाता खोला था। उसमें हर माह कुछ रुपये डाला करते थे। पासबुक लेकर आना मृत्यु प्रमाण-पत्र के साथ। नोमिनी ने तुम्हारा ही नाम है।”
“ठीक है, पंडीजी ! पैसे की बड़ी दरकार थी । एक गैया खरीदने को सोच रहा था ” अबुल ने सुकून भरे स्वर में कहा।

कपिला गाय जिसका नाम अबुल ने सुंदरी रखा है, के आने बाद उसके दुआर की रौनक ही कुछ अलग हो गई है। गाय के लिए सीमेंट का नाद तो बछड़े के लिए लोहे की और उनके आराम करने के लिए एसबेस्टस का ओसारा भी। उसके गले की घण्टी की आवाज वह दूर से ही पहचान लेता है। ओसारा में बैठकर जब सुंदरी पागुर करती है तो उसे वह बड़े प्यार से निहारता है। ऐसा लगता है कि सुंदरी गाय नहीं उसकी माँ है जो गाय के रूप में उसके पास आई है।

सुबह चार किलो और शाम को चार किलो दूध निकलता है चारों थनों से । अबुल का कहना है कि सुंदरी के लिए दोनों बेटे यानी वह और बछड़ा ,जिसका नाम उसने कृष्णा रखा है, बराबर है। इसलिए दो थनों का दूध कृष्णा का और दो थनों का मेरा। दूध निकालने का काम भी वही करता है। दूध निकालने के बाद दूध की बाल्टी जमीन पर रखने से पहले अपने माथे लगाता है मानों सुंदरी ने उसे प्रसाद दिया है जिसे वह स्वीकार कर रहा हो। सुबह का दूध घर के लिए काम आता और शाम का दूध मोहल्ले के उन बच्चों के लिए जिनकी माएँ प्रसवकाल में ही चल बसी थीं।

एक दिन खेत में पानी देते समय, समय भान ही नहीं रहा। आया तो देखता है कि दूध पत्नी ने निकाल लिया है। दूध मात्रा में ज्यादा दिख रहा था।
“रफीक की अम्मी ! दूध निकालने में दिक्कत तो नहीं हुई।”
“नहीं , इतनी सीधी गाय है कि कोई बच्चा भी दूध निकाल ले।‘’
“लेकिन दूध ज्यादा लग रहा है।‘’ ‘
“मैंने थोड़ा पानी मिला दिया।‘’

यह तुमने क्या किया ? क्या कोई अपने माँ के प्रसाद में पानी मिलाता है ? ‘’ स्वर में क्रोध मिश्रित पीड़ा का भाव था। पाँच मिनट तक बाल्टी में रखे दूध को वह देखता रहा। फिर बाल्टी का सारा दूध धीरे से पागुर कर रहे कृष्णा के सामने रखे लोहे के नाद में डाल दिया।

उसने भतीजी फातिमा और अपनी दो बेटियों समीना और अमीना के हाथ पीले कर दिए थे। बड़े बेटे रफीक ने पड़ोस के गाँव में खुले प्राईवेट कॉलेज में आई. एस. सी. में दाखिला लिया है। पढ़ने में वह होशियार है। विज्ञान में उसकी विशेष रुचि है। छोटा हकीक गाँव के प्राथमिक पाठशाला में तीसरी जमात में है।

दूसरी बेटी अमीना के देवर के निकाह का न्योता आया है। 24 अप्रैल को निकाह है । अमीना का निकाह गाँव से चालीस किलो मीटर दूर एक कस्बे में हुआ है। उसके ससुर का अपना मोटर गैरेज है जिसको अमीना का पति संभालता है। अबुल ने 24 अप्रैल के सुबह दूध निकाला। दूध को स्टील के डिब्बे में भरने के बाद कपड़े में लपेट कर झोले में रख लिया। खाना खाकर 1 बजे निकला लेकिन अमीना के यहाँ पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई।

अमीना ने उसे अपने कमरे में बुलवाया तो कुशल-क्षेम के बाद उसने झोले में रखे सब सामान दिखाना शुरु किया । फिर दूध का डिब्बा बड़े प्यार से निकाल कर देते हुए कहा “ ये लो बेटी ! यह है सुन्दरी मइया की तरफ से ।‘’ अमीना ने डिब्बे को हाथ में ले अपने सीने से सटा लिया। निकाह के अगले दिन वह अपने घर आ गया।

“ अबुल भाई! अपनी सुंदरी को जरा बचा के रखना। हो सके तो अपने ओसारे में फाटक लगवा लो। कल रात रघुवीर यादव की भैस चोर चुरा ले गए। ज़माना बड़ा खराब आ गया है।‘’ सुदामा साहू ने अपनी लम्बी गरदन हिलाते हुए कहा।

“ ठीक ही कह रहे हो सुदामा भाई ! पंद्रह दिन पहले ही सुधाकर तेवारी की गैया भी चोरी हो गई थी। क्या करोगे भाई , जमाना ही चोर-उच्चकों का आ गया है। उन्ही की बढ़ंती है।‘’ ठंढ़ी साँस भरते हुए अबुल ने कहा।

आज रात अबुल को नींद नहीं आ रही है। बार-बार वह बिछावन से उठकर ओसारा में जाता और सुंदरी के पीठ पर हाथ फेरता । उसके माथे को सहलाता , फिर बिछावन पर आ आँखें बंद कर सोने का प्रयास करता।

सुबह उठते ही पत्नी ने कहा “ यह तुम्हे हो क्या गया है? न सोते हो न सोने देते हो। इतनी प्यारी है तुम्हे गैया तो वहीं क्यों नहीं सोते।‘’
“ ठीक ही कह रही हो, रफीक की अम्मी ! आज से मेरा बिछावन ओसारे में ही होगा।‘’ अबुल के स्वर में इत्मीनान झलक रहा था।

सुंदरी को आए दो साल पूरे होने को हैं। तीन बार का प्रयास असफल होने के बाद चौथे प्रयास में वह गर्भवती हुई है। छठा महीना चल रहा है । सुंदरी का बढ़ा पेट स्पष्ट दिखने लगा है।
“अबुल! अब कृष्णा को क्यों नहीं बेच देते। आज के समय में बछड़े को पालने का क्या फायदा? अब न तो बैल वाली खेती रही ना बैलगाड़ी। फिर इसको नाहक ही गले का ढोल बनाये हुए हो।‘’ बड़े भाई माज़िद ने उसका मन टटोलते हुए कहा।
“क्या बात करते हो भैया ! क्या कोई अपने भाई को बेचता है? अरे कृष्णा अपना भाई है भाई।‘’
“हुह—भाई— !’’ कहते हुए माज़िद अपने तेज कदमों से चिलम के अड्डे की तरफ निकल पड़ा।

फातिमा के ससुर को कल रात हार्ट अटैक आया थ। डॉक्टर के पास ले जाए इसके पहले ही प्राण निकल गए। बहुत ही बुरी खबर थी। अबुल ने रुपये-पैसे का इंतजाम कर जाने का निर्णय लिया क्योंकि मस्त-मलंगा माज़िद को तो गांजा-चिलम की दुनिया से फुरसत ही नहीं। जाते वक्त बड़े बेटे रफीक से कहा “सुंदरी का ध्यान रखना। दाना-पानी समय से देना । मैं तीसरे दिन आ ही जाऊगा। ‘’
“ठीक है अब्बा ! आप काहे चिंता करते हैं ? आप जाइए।‘’

तीसरे दिन अबुल को घर पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई। आते ही सुंदरी के पास गया। सुंदरी के आँखों से आँसू बह रहे थे। वह उसके गले से लिपट गया। बेचैनी की हालत में उसके आँसू पोछने लगा। उसका ध्यान लोहे की नाद की तरफ गया जो खाली पड़ा था।
“रफीक– रफीक —! कहाँ हो तुम यहाँ आओ। जल्दी— — जल्दी — –।‘’ स्वर में व्याकुलता थी।

“ बताओ—बताओ – बेटा ! कृष्णा—- कृष्णा — मेरा कृष्णा – कहाँ — -कहाँ है ——– ।‘’ पागलों की तरह ऊँची-ऊँची आवाज में वह रफीक को झकझोर- झकझोर कर पूछने लगा।


रफीक ने सहमते हुए कहा “ अब्बा — अब्बा ! बड़े अब्बा कल दो आदमी को लाए थे। वही लोग कृष्णा को ले गए।‘’


“ क्या ? ‘’ अबुल के सामने अंधेरा-सा छाने लगा। वह अपना सिर पकड़ कर बैठ गया।


एकाएक उठा और उस तरफ तेज कदमों से चलने लगा जिधर माज़िद का गांजा-चिलम का अड्डा है। अभी थोड़ी दूर ही गया था कि माज़िद उधर से लाल-लाल आँखें किए हुए चिलम के नशे में आता दिखाई दिया।


“भैया! कृष्णा को कहाँ बेचा ? किसे बेचा?—किसे बेचा ? — बताओ— बताओ ।‘’ वह माज़िद के दोनों बाँहों को पकड़ कर जोर-जोर से हिलाने लगा।


“क्या—क्या बकवास कर रहे हो– कृष्णा – कृष्णा –। उसे जहाँ होना चाहिए वहाँ भेज दिया मैंने। अच्छा रोकड़ा मिला है — — ओ भी नकद — चलो छोड़ो ऐ सब बातें।‘’ कहते हुए लड़खड़ाते कदमों से वह घर की ओर बढ़ गया।


अबुल उसके पीछे-पीछे चिंता और दु:ख से निमग्न बोझिल कदमों से चल रहा था।

दरवाजे पर रखी बेंच पर धम्म से बैठते ही माज़िद ने आवाज लगाई “ रफीक ! एक लोटा पानी लाना।‘’


“भैया! आखिर कृष्णा ने क्या बिगाड़ा था आपका जो आपने उसे बेच दिया — वह भी हम लोगों की तरह ही —अपनी माँ का लाडला है।‘’ उसके स्वर में मनुहार था।


“हुह—‘’ कहकर माज़िद ने अपना मुँह दूसरी ओर फेर लिया।

“देखो—देखो भैया ! सुंदरी की आँखों से बह रहे आँसूओं को देखो भैया — वह रो रही है — — भैया — वह अपने बेटे के लिए रो रही है —– रो रही है वह— — ।‘’ कहने के साथ ही वह माज़िद के पैरों के पास बैठ गया।


“बता दो भैया ! बता दो तुम्हे खुदा की कसम – बता दो — मैं उन्हें रुपये वापस कर अपने कृष्णा को लाऊँगा — वापस लाऊँगा — अपनी गैया के आँखों में आँसू नहीं देख सकता– भैया –भैया –।‘’ कहते हुए वह माज़िद के पैरों पर लोट गया।

पानी पीने के बाद माज़िद को थोड़ा चेत हुआ। अबुल को उठाते हुए बोला “अब कुछ नहीं होगा भाई ! अफज़ल भाई के आदमी कल ही लेकर चले गए कृष्णा को। आज ट्रक में लोड कर लखनऊ भेज देगा।‘’


अरे वही, इब्राहिमपुर वाला अफज़ल कुरैशी न ? ‘’ अबुल ने छटपटाहट भरे स्वर में कहा।

“हाँ— हाँ वही कुरैशी।‘’


“चलो भैया ! अभी चलो। इसी समय हम छुड़ा लायेंगे अपने कृष्णा को। उस कसाई कुरैशी से । चलो भैया — चलो –।‘’


“चलो चलते है —। ‘’ माज़िद ने अनमने स्वर में कहा।


“देखो हम दोनो भाई जा रहे हैं अपने कृष्णा को लाने। मत रोओ — मत रोओ — – हम लायेंगे अपने कृष्णा को लायेंगे।‘’ वह सुंदरी के माथे को सहला-सहला कर कह रहा था मानो उसे सांत्वना दे रहा हो।


अफज़ल कुरैशी इब्राहिमपुर का सबसे बड़ा मांस व्यापारी है। पूरे कस्बे में उसका दबदबा है । पुलिस से उसकी साँठ-गाँठ है। बाज़ार मे उसकी दो दुकाने हैं । जिसमें हलाल बकरे का मीट और चिकेन बिकता है ।दोनों दुकानें खूब चलती हैं । यह तो दिन का और बाहरी व्यापार है । असली कारोबार तो उसका रात में होता है ,पशु तश्करी का। अच्छी-खासी मोटी कमाई हो जाती है पुलिस को खिलाने-पिलाने के बाद भी। रात को नौ बजने वाले थे। कुरैशी अपने गद्दी पर बैठा रुपये गिन रहा था।

मोटर साईकिल से उतरते ही अबुल ने अफज़ल के पैरों को पकड़ लिया। “ अफज़ल भाई ! ये लो अपने सात हजार और मेरा कृष्णा मुझे वापस कर दो। ‘’
“कौन कृष्णा ?‘’ अफज़ल ने नजर उठाते हुए कहा।


“ वही बछड़ा जो आपके आदमी रघुनाथपुर से खरीद कर लाए है।‘’ माज़िद ने कुरैशी की ओर देखते हुए कहा।
“ अच्छा तो वह बछड़ा ही कृष्णा है।‘’ अफज़ल ने निर्विकार भाव से कहा।

“ हाँ—हाँ– वही है हमारा कृष्णा – अफज़ल भाई।‘’ विनती का भाव अबुल के स्वर में साफ झलक रहा था।


“लेकिन वह ट्रक तो लखनऊ के लिए रवाना होने ही वाला है। ठीक नौ बजे ट्रक खुल जायेगा मेरे दूसरे दुकान से।‘’


“ अफज़ल भाई ! खुदा के लिए ऐसा मत कहो – कुछ रहम करो – रहम करो ।‘’ अबुल गिड़गिड़ाने लगा।


“ठीक है जल्दी जाओ यदि ट्रक नहीं गया होगा तो तुम्हारा कृष्णा तुम्हे मिल जायेगा।‘’


मोटर साईकिल को तेज गति देते हुए अबुल ने अल्लाह को याद किया। तब तक अफज़ल कुरैशी का फोन ड्राइवर को आ चुका था। मोटर साईकिल दुकान पर पहुँचे-पहुँचे तब तक ढेर सारा धुँआ छोड़ता हुआ ट्रक लखनऊ के लिए रवाना हो गया।
“लखनऊ जाने वाला ट्रक कहाँ है?’’ मोटर साईकिल पर बैठे –बैठे ही अबुल ने व्यग्रता से दुकान की गद्दी पर बैठे अफज़ल के बेटे से पूछा।


“वह तो अभी-अभी खुली है —वो देखिए – निकल गई।


अबुल मोटर साईकिल को ट्रक की दिशा में पूरी रफ्तार से बढ़ा रहा था, लेकिन ट्रक भी काफी तीव्र गति से अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहा था। ट्रक लगभग 800 मीटर की दूरी पर था। मोटर साईकिल का स्पीड इंडीकेटर —80— – -90 —- – 100 —— 110 — को छूने लगा। ऐसा लग़ रहा था कि अबुल को ट्रक में लदा कृष्णा ही दिखाई दे रहा बाकी कुछ नहीं। एकाएक स्पीड- ब्रेकर पर मोटर साईकिल लगभग 2 फीट ऊपर उछला और दोनों सड़क पर गिरते ही बेहोश हो गए।


पीछे से आ रहे कार वाले ने दोनों को उठाया। माज़िद को पानी के छींटे मारने पर होश आ गया। उसे कंधे और घुटने में चोट लगी थी। अबुल के सिर पर गहरी चोट लगी थी। सिर के पीछे का हिस्सा उभर आया था। दो व्यक्ति लगातार पंखा झल रहे थे। बेटा रफीक बार-बार चेहरे पर पानी के छींटे दे रहा था। लगभग बीस मिनट बाद धीरे-धीरे उसने आँखें खोली। आँखें खोलते ही उसने अपने दोनों हाथों को जमीन पर टिका दिया मानो कोई चौपाया जानवर हो।


अबुल के घर सब रात भर जागते रहे। माज़िद अब होशो‌-हवाश में था। लेकिन अबुल होश में होते हुए भी ऐसे कर रहा था मानो वह अबुल नहीं ,कोई चौपाया जानवर हो। पड़ोस के डॉक्टर ताहिर हुसैन ने दोनों भाइयों को दर्द-निवारक इंजेक्शन लगा दिया। अबुल की स्थिति ज्यादा खराब थी अत: उसे नींद का इंजेक्शन भी लगाना पड़ा।


अबुल की पत्नी नज़मा की नींद मा—मा— की आवाज से एकाएक खुल गई।अरे मा—मा– की आवाज कौन कर रहा है? वह यह समझने का प्रयास कर ही रही थी कि एक बार फिर मा— मा—की आवाज से उसका सारा भ्रम दूर हो गया। वह अपना माथा पकड़ कर बैठ गई।

रात को चौथा पहर खत्म होने वाला था। पौ फटने को था। नींद के इंजेक्शन का असर कम होते ही अबुल बछड़े की तरह उछलने-कूदने लगा। कूदते-कूदते वह सुंदरी के पास पहुँच और उसके पैरों को चाटने लगा ठीक वैसे ही जैसे कृष्णा चाटता था। सुंदरी भी उसे प्यार से चाटने लगी।

धीरे-धीरे पूरे गाँव में यह बात फैल गई। लोग आते और अबुल का बछड़ा रूप देख दु:खमिश्रित आश्चर्य से भर उठते।


नज़मा,माज़िद ,रफीक, हकीक किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए ? हफ्ता गुजर गया,अबुल का कृष्णा रूप ज्यों का त्यों था। डॉक्टर ताहिर हुसैन और गाँव के मुखिया नवल किशोर राय ने मनोचिकित्सक से दिखलाने की सलाह दी। सकीना भी यह खबर सुन अपने पति आफताब के साथ आई थी। आफताब ने कहा “उसके गाँव में एक डॉक्टर है जो पागलों का इलाज करते हैं। कितने ही मनोरोगियों को ठीक किया है उन्होंने।‘’

“ठीक है, मेहमान कल ले चलते है आपके गाँव।‘’ नज़मा ने टीस को दबाते हुए कहा।


सुबह जब रफीक और आफताब ने अबुल को चलने के लिए कहा तो उसने ना में गरदन हिलाते हुए मा— मा— कर सुंदरी के माथे को चाटने लगा। रफीक साथ ले चलने के लिए उसे बार-बार पकड़ने की कोशिश करता लेकिन हर बार वह कृष्णा की तरह कुँलाचे भरता और सुंदरी के चारो ओर चक्कर काटने लगता।


एक हफ्ता और इसी तरह गुजर गया। गाँव के लोगो ने कहा कि इसके दोनों हाथों को पीछे करके बाँध दो और कमर में रस्सी डाल कर ले जाओ।


अजीब दृश्य बन गया जब चार नौजवानों ने मिलकर अबुल के हाथ पीछे बाँध दिए और कमर में रस्सी डाल दी। उस समय भी वह बछड़े की तरह उछल रहा था और बार-बार मा— मा— की आवाज लगा सुंदरी की तरफ भागने का प्रयास कर रहा था। उधर सुंदरी भी रम्भाकर अपने दु:ख और छटपटाहट व्यक्त कर रही थी। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।


अबुल के चिकित्सा का आज सातवाँ दिन था। थोड़ा-सा सुधार दिख रहा था। जीभ बाहर निकाल कर खाने और बार-बार जीभ से जमीन या दीवाल चाटना कम हुआ था। छठे दिन उसे नींद भी आई थी। इलाज कर रहे डॉक्टर महेंद्र भटनागर ने आफताब से कहा “ यह डिसोसिएटिव एमनेसिआ* की बीमारी है। धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा। आज इसके हाथ और कमर की रस्सी खोल दो। चिकित्सीय परीक्षण कर वे दवाइयाँ लिख रहे थे। सब कुछ शांत वातावरण में चल रहा था।


सामने सड़क पर एक व्यक्ति अपनी गाय को लिए जा रहा था। उसका बछड़ा थोड़ी दूरी पर पीछे-पीछे आ रहा था। बछड़े ने मा—- मा— की आवाज लगाई तो गाय भी मा—मा— कर रम्भाने लगी।
देखते ही देखते अबुल एकाएक बछड़े की तरह कुँलाचे भर कूद पड़ा और अपने घर की तरफ कुँचाले भरता हुआ सरपट दौड़ा। लोग देखे- समझे तब तक वह आँखों से ओझल हो चुका था।


इधर, अबुल की चिंता में पूरा घर दु;खी-परेशान था। किसी को भी सुंदरी की चिंता न थी। अबुल के जाने बाद वह चुपचाप पड़ी रहती , न कुछ खाती ,न रम्भाती ; मानो पुत्रशोक मना रही हो। सात दिनों तक दाना-पानी न मिलने से उसका शरीर मृतप्राय हो चुका था। शरीर में कोई गति न थी। आँखों से कीचड़ निकल रहे थे और आसुओं की धार से आँखों के दोनों तरफ लकीर-सी बन गई थी। अपने सिर धरती पर रख बिल्कुल निस्पंद पड़ी हुई थी मानो मृत्यु की प्रतीक्षा कर रही हो। उसके चारो तरफ मक्खियाँ भिनभिना रही थी। ऐसा लगता था कि उसके प्राण अब निकले तब निकले। लेकिन किसी की प्रतीक्षा में उसके प्राण रुके हुए थे।

अबुल के पीछे-पीछे आफताब और रफीक दौड़ने लगे । लगभग पाँच किलो मीटर की दूरी थी दोनों गाँवों के बीच। खेत- खलिहान ,सड़क, नदी-नालों को पार कर अबुल कुँलाचे भरता हुआ सुंदरी के पास पहुँच गया। रास्ते में कई जगह गिरा-पड़ा था।शरीर पर जहाँ-तहाँ चोट के निशान स्पष्ट दिख रहे थे। आते ही पहले उसने सुंदरी के पिछले पैर को चाटना शुरु किया। फिर पीठ को चाटने लगा। कोई हरकत नहीं देख वह उसके माथे को जोर-जोर से चाटने लगा। न कोई गति ना कोई प्रेम प्रदर्शन। न प्यार से वह पूँछ हिला रही है और न ही उसे चाट रही है। वह अपनी जीभ से उसकी आँखों को चाटने लगा मानो उसे सहला रहा हो। फिर चारो तरफ उछल-कूँद मचाने लगा जैसे कृष्णा करता था। उसकी आँखों में आँसू आने लगे थे। वह मा—मा— कर सुंदरी के चारो ओर बार-बार चक्कर काटने लगा। वह व्याकुल हो कभी पैरों को , कभी थन को , कभी पीठ तो कभी माथे को चाटता। शायद उसे सुंदरी के अंतिम अवस्था का एहसास होने लगा था। वह अंत में उसके माथे को जोर-जोर से चाटने लगा। एकाएक सुंदरी ने अपना सिर उठाया और जीभ को निकाल कर अबुल के माथे को छुआ। फिर उसका सिर धम्म से धरती पर गिर पड़ा।


तब तक रफीक और आफताब भी आ चुके थे। सामने घटित दृश्य को देख दोनों पत्थर की मूर्ति की भाँति जड़वत हो गए। अबुल अपने दोनों बाहों में सुंदरी को लिये हुए था और उसका जीभ बाहर निकला हुआ था जो सुंदरी के माथे को स्पर्श कर रहा था ।


कुछ देर बाद जब उन्हें चेत हुआ तो आगे बढ़कर रफीक ने अबुल के कंधों को पकड़ उठाने का प्रयास किया लेकिन छूते ही उसका सिर एक तरफ लुढ़क गया। सुंदरी और अबुल दोनों का शरीर ठंढा पड़ चुका था।

कहानी की सीख

विघटनशील स्मृतिलोप ( Dissociative Amnesia) विघटनशील मनोविकार का एक अंग है, जिसमें व्यक्ति आमतौर पर किसी तनावपूर्ण घटना के बाद व्यक्तिगत सूचना को याद करने में असमर्थ हो जाता है। विघटन की स्थिति में व्यक्ति अपने नये अस्तित्व को मह्सूस करता है।

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आदित्य अभिनव उर्फ डॉ. सी. पी. श्रीवास्तव

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Vo Boodha aadamee – पवन शर्मा परमार्थी

Vo Boodha aadamee – पवन शर्मा परमार्थी

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पवन शर्मा परमार्थी

वो बूढ़ा आदमी


बात बहुत पुरानी है, राजधानी दिल्ली के ही एक क्षेत्र है, जिसका नाम लिखना में आवश्यक नहीं समझता। फिर भी इतना तो बताना ही होगा कि उस क्षेत्र में अक्सर आना-जाना लगा रहता था। उस क्षेत्र की एक पटरी पर मैंने एक बूढ़े आदमी को देखा। चेहरे पर मूँछे, सिर पर गमछा बाँधे, फ़टी हुई पूरी बाजू की कमीज व मैली-सी धोती बाँधे था। शरीर का तो क्या कहिये, मुँह में दाँत नहीं और पेट में आँत नहीं।

जून का महीना था, गर्मी अपने चरम पर थी। पसीना रुकने का नाम नहीं ले रहा था। ऐसे में उस बूढ़े आदमी ने कनस्तर की टीन की दो परत कर उस पर मोटी-मोटी सेंकी थी दो रोटियां। सब्जी के नाम पर मुझे उसके पास कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा। हाँ, दिखाई दे रहीं थी तो एक अखबार पर रखीं दो रोटियां। मैं उस बूढ़े आदमी को दूर खड़ा देख रहा था कि वह बेचारा उन दो रोटियों को किसके साथ निगलता है।

देखते ही देखते मैंने देखा कि उस बूढ़े आदमी ने एक कागज़ की पुड़ियों से थोड़ी से कुटी हुई लाल मिर्च, थोड़ा नमक निकालकर उन्हें एक छोटी-सी कटोरी में डालकर उसमें जरा-सा पानी मिलाकर चटनी बनाई। उसमें कुछ और मिलाने के लिए शायद उसके पास….।

यह देखकर मुझे बहुत हैरानी हुई, मन कुंद हुआ, मेरी आँखों से यह देखकर पानी….। मेरा मन विचलित हो गया । यह देखकर मुझसे रहा नहीं गया, और मैं तुरन्त उस बूढ़े आदमी के पास पहुँच गया। हाथ जोड़कर बुढ़े को नमन किया। बूढ़ा मेरी ओर देखने लगा, वह मुझे जानने, समझने की कोशिश करने लगा। उससे पहले बूढ़ा कुछ कह पाता या कोई प्रश्न करता, मैं ही बोल पड़ा–“बाबा जी मैं एक मुआफ़िर हूँ, यहाँ से निकल रहा था कि आप पर नज़र पड़ गई, आपको देखा तो बस….।”

“हाँ बोलो बिटवा, का बात बा।”

“नहीं, बाबा काम तो कोई नहीं लेकिन कुछ प्रश्न हैं मेरे मन जो आपसे पूछना चाहता हूँ।”

हाँ….,हाँ, जरूर पूछो बिटवा। पर इक बात हमरी समझ मा कतई ना आई बा कि तुम प्रश्न काहे….।”

“बाबा जी आप इस उम्र में इतनी कड़ी मेहनत करते है, फिर भी आप भरपेट खाना नहीं खा पाते हैं। बिना किसी साग सब्जी के आप….।”

“बस इत्ती-सी (इतनी-सी) बात अरे, बबुआ। इमा हैरानी की कोउ बात नाहिं बा, ई तो हमरा रोज का काम बा। जब हम सब्जी लाइक कमात बा, तो सब्जी संग खात बा, और जब हमहु नहीं कमा पात हैं तो….।”

“क्या आपको इस तरह खाने में कोई परेशानी नहीं होती।”

“अरे नाहीं बबुआ, हमहु को कोउ परेशानी नाहीं होत बा, फिर होत भी तो का करीं। जब हमरी किस्मत ई मा लिखा तो फिर कोनों से का शिकायत करीं। हमहुँ तो या ही मा खुश रहत बा।”

“बाबा जी मैं समझ गया। आप अपनी हैसियत के हिसाब से चलते हैं। फिर भी मैं यह कहना चाहता हूँ कि मैं आपको लाल मिर्च के साथ रोटी खाते हुए नहीं देख पा रहा हूँ। इसलिए मेरी इच्छा है कि मैं आपके लिए अभी होटल से सब्जी लेकर आता हूँ, आप तब रोटी….।” इतना कहकर मैं वहाँ से सब्जी लेने जाने लिए जैसे ही मुड़ा, बाबा जी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोले–“नाहिं….नाहिं बबुआ, ई तो तो हमरा रोजाना….। चलो आज तुम्हरी सब्जी खाइन तो कल, परसों कोनो को….? फिर ई तो हमरे स्वाभिमान की बात बा, हम स्वाभिमानी बा बबुआ। हमहु काऊ की दया का पात्र बनना नाहिं चाहि।”

बाबा जी की बात सुनकर मैं हैरत में पड़ गया और धर्म संकट में भी और यह सोचने और विवश हो गया कि आज भी ऐसे स्वाभिमानी लोग जिन्दा हैं जो अपनी आन-बान-शान के लिए अपने स्वाभिमान को बरकरार रखे हुए हैं।

सोचता हूँ कि इस स्वार्थी समाज में क्या अभी बाबा जी जैसे निस्वार्थ, स्वाभिमानी लोग जिन्दा है? इसके अतिरिक्त अनेक प्रश्न अपने मस्तिष्क में लिए में अपने गंतव्य की ओर निकल पड़ा और….।

कहानी की  सीख 

 Vo Boodha aadamee – पवन शर्मा परमार्थी द्वारा रचित कहानी  हमें सीख देती है बाबा जी जैसे निस्वार्थ, स्वाभिमानी लोग जिन्दा है जो अपने स्वाभिमान को बरकरार रखे हुए।  प्रस्तुत कहानी की शिक्षा भी है मनुष्य को ईमानदारी, स्वाभिमान , प्रेम , दया  जैसे गुणों को नहीं छोड़ना चाहिए इन्ही गुणों के आधार पर मनुष्य महान बनता है।

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Old Age Home in Hindi | वृद्धाश्रम – डॉ0 सोनिका अम्बाला

Old Age Home in Hindi | वृद्धाश्रम – डॉ0 सोनिका अम्बाला

वृद्धाश्रम 


गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का अद्भुत संगम, तंबुओं का शहर, कुंभ मेला, शिक्षा का केंद्र, मुगल कालीन शासक अकबर का साम्राज्य, अक्षय वट, स्वाधीनता संग्राम का केंद्र अल्फ्रेड पार्क, राजनीतिक केंद्र, त्रेतायुग में भगवान श्री राम का विश्राम स्थल जैसे तमाम विशेषणों को समेटे है- आध्यात्मिक भूमि प्रयागराज। यहां की सभ्यता, संस्कृति और शिक्षा व्यवस्था आज भी अद्भुत व निराली है। इसी शहर में नामी-गिरामी डॉक्टर वीर प्रताप रहते थे। नाम के अनुरूप ऑपरेशन, दवा-इलाज करने में निपुण थे। उनके परिवार में पत्नी, छोटा बेटा और वृद्ध पिता जी थे। डॉक्टर की ख्याति दिनों दिन बढ़ती जा रही थी। जिनकी चर्चा भारत के कोने-कोने में होने लगी थी। महाशय ने खूब धन कमाया और तत्पश्चात हाईटेक, फिल्मी सितारों का शहर एवं भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में अपना चिकित्सालय खोल लिया। वहां तो मानो धन-वर्षा ही होने लगी, क्योंकि ‘वीर प्रताप’ नाम ही काफी है। कुछ समय बाद वीर ने पत्नी, बेटा और पिता को भी मुंबई बुला लिया।
प्रयागराज-भारत की प्राचीन संस्कृति और मुंबई की पाश्चात्य संस्कृति में वृद्ध पिता जी समन्वय स्थापित नहीं कर पा रहे थे। पिता की यह विचारधारा वीर प्रताप को चुभने लगी थी। पिता जी वीर प्रताप को समझाते हुए कहते थे- अस्पताल के कर्मचारियों और नौकरों के साथ भी मानवता का व्यवहार करो। प्यार और सम्मान का भूखा हर व्यक्ति है। यह संस्कारी बातें अब तो डॉक्टर वीर प्रताप को इतना चुभी कि पिता को अपने साथ रखना ही नहीं चाहते थे। समय बीतता गया मानसिक तनाव कोरोना की तरह परिवार में फैल चुका था। कुछ दिन बाद डॉक्टर वीर अपने पिता को प्रयागराज घुमाने के बहाने ले गए। वहीं हमेशा के लिए दूरी बनाते हुए वृद्धाश्रम में पिता को छोड़कर वापस मुंबई लौट आए।
अब डॉक्टर का संपूर्ण ध्यान धन कमाने में लगा हुआ था। कोई रोकने-टोकने वाला नहीं था, पत्नी भी स्वयं को असहाय पाती थी। वीर प्रताप की पत्नी अपने ससुर जी को पिता की तरह मान-सम्मान देती थी। धनाड्य परिवार के बेटे का रुतबा तो सातवें आसमान पर था। बेटे की स्कूल में ग्रीष्मकालीन छुट्टियां हो चुकी थी।समय निकालकर डॉक्टर साहब सपरिवार महाकालेश्वर मंदिर उज्जैन दर्शन करने गए थे। उज्जैन में चर्चा फैली हुई थी कि यहाँ पर सिद्ध पुरुष ज्योतिषी बाबा आए हुए हैं। उनकी वाणी में मानो साक्षात सरस्वती विद्यमान हैं। बाबा जो भी कहते हैं, वह बात सत्य निकलती है। डॉक्टर वीर प्रताप अपनी उत्सुकता शांत करने के लिए ज्योतिषी बाबा के हाथ में  251 दक्षिणा स्वरूप अर्पित करते हुए पूछा- ‘गुरुदेव, मेरे पास धन, दौलत, गाड़ियां, बंगला, परिवार सब कुछ है। फिर भी इतना जानना चाहता हूं कि मेरी मृत्यु कब, कहां और किन परिस्थितियों में होगी?’ बाबा ने कड़ी नज़रें ऊपर उठाते हुए रुपये तुरन्त वापस करते हुए कहा कि मैं एक भी रुपया नहीं लेता हूँ, सिर्फ पेट भरने के लिए थोड़ा सा भोजन या अन्न ले लेता हूँ। इतना कहने के बाद मूलतः शांत स्वभाव के ज्योतिषी बाबा ने ध्यानपूर्वक वीर प्रताप की हस्त रेखाएं देखी और पढ़ी। रेखाएं देखने के बाद कुछ क्षण के लिए वीर प्रताप को निहारते रहे, फिर अपनी उंगलियों में कुछ जोड़-घटाना किया। तत्पश्चात लंबी सांस लेकर कहा- ‘वत्स वीर प्रताप, जिन परिस्थितियों में और जिस स्थान पर भविष्य में आप के पिता की मृत्यु होगी उसी परिस्थिति में आप की भी मृत्यु निश्चित है।’
यह सुनकर डॉक्टर वीर प्रताप एकदम से भयभीत होकर बाबा के चरणों में गिर पड़े। खुद को संभालते हुए पिताजी को वापस लाने सीधा प्रयागराज चले गए। वृद्धाश्रम में पहुंचकर पिता के श्री चरणों में अपना सिर रखते हुए अपनी अक्षम्य गलती के लिए माफी मांगी। स्वभाव वश कोमल हृदय वाले पिताजी ने अपने पुत्र को माफ कर दिया और सभी सदस्य एक साथ रहने लगे।

कहानी की सीख 

डॉ. सोनिका, अम्बाला की स्वरचित रचना ‘वृद्धाश्रम’ हमको सीख देती है कि हमें अपने माता–पिता का सम्मान अंतिम साँस तक करना चाहिए क्योंकि उनके पालन -पोषण के बिना हम कुछ नहीं होते हैं। प्रस्तुत कहानी में वीर प्रताप प्रसिद्धि पाते ही अपने पिता को भूल गए , उन्होंने पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ दिया। लेकिन एक यात्रा के दौरान स्वामी जी की भविष्यवाणी सुनकर जमीर जाग उठा, उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और वह तुरंत अपने पिता के पास जाकर माफ़ी मांगते हुए उनको अपने साथ घर ले आता है । कहने को यह एक कहानी है लेकिन आज वर्तमान भौतिकवादी युग का कटु सत्य है।

 


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डॉ0 सोनिका अम्बाला (हरियाणा)

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फांकें में एक रात कहानी


गुलफ़ाम महज़ तेरह साल का था, जब उसके अब्बू फ़िरोज़ अल्ला को प्यारे हो गए। प्रयागराज के एक छोटे से कस्बे में एक छोटी सी दुकान है, जहां फ़िरोज़ बाइक बनाने का काम करता था।चालीस साल की अवस्था थी। बेहद चुस्त-दुरुस्त, शरीर गठा हुआ, नीली आंखें, हिरण की तरह फुर्तीला। एक अलग ही सांचे में पकाकर अल्ला ताला ने उसको निकाला था। व्यवहार में विनम्रता। ईमानदारी तो उसके चेहरे के दर्पण से ही अपना प्रतिबिंब दिखा देती थी। उसके पूर्वज बिहार से बहुत पहले ही आकर बस गए थे। उन दिनों चंपारण में आज की तरह ही एक महामारी आई थी, जिसमें गुलफ़ाम के परदादा सब कुछ छोड़कर जान बचाकर यहां आ गए थे तब से यह परिवार यहीं रहने लगा। फ़िरोज अच्छा मैकेनिक था इसमें किसी तरह का कोई संशय नहीं था, मीठी ज़ुबान थी। किसी भी ग्राहक को निराश नहीं करता था। देर सबेर सभी का काम कर देता था, पैसा जो दे दो उसी में संतोष कर लेता था। संतोष जिसके मन में आ जाय बड़े से बड़ा प्रलोभन उसकी ईमान को नहीं डिगा सकता है। उस रात को गुलफ़ाम कभी भी नहीं भूल सकता जिस दिन महज़ दो सौ ग्राम दूध पीकर पेट सहलाते हुए निद्रा देवी को वह नींद के लिए पुकार रहा था। फ़िरोज को लाकडाउन की वज़ह से एक पैसा भी नहीं मिला।

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उस दिन वह बेहद निराश था। यह परिवार रोज़ कुआं खोदकर पानी पीता था। आज उसे चूल्हे की चिंता सर्पिणी की भांति रह- रह डंक मार रही थी। आज घर में क्या बनेगा ? घर पहुंचते ही छोटी बिटिया सकीना साइकिल पकड़ लेती थी। फ़िरोज उसके गालों को चूमने लगता था। इसके बाद उसे पांच रुपए वाला पारले बिस्कुट उसके हाथों में दे देता था। यह नित्य का काम था। कुछ समय तक वह वात्सल्य- सुख की सरिता में जी भर नहाता था। आज सकीना सोई हुई थी। घर में पहुंचते ही पत्नी अमीना का चेहरा बेहद निराश था; क्योंकि फ़िरोज़ के हाथ में कोई थैला नहीं था। घर में केवल आध पाव दाल बचा हुआ था। इसके अलावा सारे डिब्बे झांय- झांय कर रहे थे। अमीना ने फ़िरोज़ से कहा कि आज क्या खिलाएंगे बच्चों को! हम लोग तो पानी पीकर भी रात गुजार लेंगे। अमीना भी आठ तक पढ़ी थी। महामारी के प्रकोप से परिचित थी, समझ रही थी धंधा ऐसे समय में मंदा हो गया है। ऊपर से पुलिस वालों का आतंक। कई परिवार फूलपुर कस्बे से अपना मकान औने पौने दाम में बेचकर अपने- अपने गांव में ही कुछ करने के इरादे से चले गए थे, लेकिन फ़िरोज़ के कुल पांच बच्चे थे; सात लोगों का कुनबा लेकर कहां जाता वह! वैसे भी गांव में कौन सा पारिजात वृक्ष था, जो उसकी भूख मिटा देता।उस दिन घर में कुछ नहीं बन पाया।

पड़ोस से बड़ी मिन्नतें कर आध सेर दूध लेकर अमीना आई और उसमें आध सेर पानी मिलाकर किसी तरह बच्चों की भूख को शांत किया। आकाश में तारे टिमटिमा ही रहे थे कि फ़िरोज़ उठ गया। उसे नींद नहीं लगी,और सकीना के रोने की आवाज़ ने उसके भ्रम को पुष्ट कर दिया। वह समझ गया कि उसे भूख लगी है। अमीना ने उसे अपनी गोद में ले लिया ; कुछ देर तक तो वह शांत थी, लेकिन फिर वह रोने लगी। अमीना की छाती भी सूख चुकी थी। उसको कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। उसने उसे दूध की जगह पानी पिलाया। अमीना की आंखों से आंसू झरझर बहने लगे। इसी दुश्चिंताओं के स्वप्न के दरिया में फ़िरोज कब डूब गया। उसे नींद आ गई। सुबह के सात बज चुके थे। भगवान भुवन भास्कर अपनी अर्चियों से पूरी कायनात को नहला रहे थे, अमीना ने आवाज़ दी कि क्या आज दुकान नहीं जाओगे ? वह हड़बड़ा कर उठा और देखा कि दिन काफी चढ़ चुके हैं, वह आधे घण्टे के भीतर ही तैयार हो गया। अपनी साइकिल से चल पड़ा। रात का भयावह दृश्य उसके मस्तिष्क पर किसी मयूर की तरह नृत्य कर रहा था; वह जानता था कि फांकें में एक रात तो बीत गई, अगर आज कुछ बोहनी नहीं होगी तो कैसे चलेगा! इसी उधेड़बुन में लगभग पांच सौ मीटर ही चला होगा कि उसकी साइकिल असंतुलित हो गई और वह डिबाइडर से टकराते हुए गिर पड़ा। फूलपुर ब्रिज से तेज़ रफ़्तार से आ रही ट्रक उसे रौंदते हुए निकल चुकी थी, और वह वहीं इस असार संसार को छोड़कर अल्ला को प्यारा हो गया। उसके मुहल्ले का अख़्तर इफको टाउनशिप में सफाई का काम कांटैक्ट बेस पर करता था, वह उधर से जा रहा था; देखा कि बीसों लोगों की भीड़ इकट्ठी है।वह रुक गया, और उसने देखा कि यह तो फ़िरोज़ है; उसने अमीना के घर फ़ौरन सूचना भिजवायी कि फ़िरोज़ का एक्सीडेंट हो गया है अमीना भागते-भागते आ पहुंची और फ़िरोज़ को देखते ही बेहोश होकर गिर पड़ी। कुछ देर बाद ही पुलिस वाले आ गए और पंचनामा हेतु अपनी कार्रवाई करने लगे। उधर फ़िरोज़ के घर में मातम छा गया था।

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सम्पूर्णानंद मिश्र
प्रयागराज फूलपुर
7458994874

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Short Stories in hindi | नवोदित कथाकार रत्ना सिंह का जीवन परिचय 

Short Stories in hindi : प्रस्तुत लघुकथा स्वेटर  की लेखिका   रत्ना सिंह  के  द्वारा पाठकों के समक्ष प्रेरणादायी कहानी प्रस्तुत है हमें आशा है कि यह कहानी आपके जीवन में बदलाव जरूर लायेगी। जानते है लेखिका के बारे में –

नवोदित कथाकार रत्ना सिंह का परिचय 

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रत्ना सिंह भदौरिया

 


  • नाम –  रत्ना सिंह

  • जन्म – 1995

  • जन्म स्थान  – रायबरेली 

  •  पेशा -नर्स

  • प्रकाशन-हंस जैसी अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लघुकथा वह कहानियां स्वीकृति।

  • सम्मान – स्काउटिंग के क्षेत्र में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित।

  • सम्पर्क-पहाडपुर कासो जिला रायबरेली उत्तर प्रदेश।

  • परिचय –  रायबरेली जनपद की मूल निवासी और इन्दिरा गाँधी राजकीय महाविद्यालय की पूर्व छात्रा रत्ना सिंह भदौरिया नवोदित कथाकार है। इनकी कहानियाँ और लघुकथायें हंस जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका के लिए स्वीकृत हुई हैं। कथा जगत की प्रतिष्ठित कथाकार मन्नू भण्डारी रत्ना सिंह की कथा गुरु हैं। वर्तमान में रत्ना सिंह दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में स्टाफ नर्स हैं। इनका कहानी संग्रह शीघ्र ही पाठकों के सम्मुख होगा । इस समय रत्ना सिंह एक उपन्यास प्रणीत कर रही हैं।

लघुकथा स्वेटर 

रोज की तरह आज सुबह 9:00 बजे भी बहुत ठंड थी मैंने और रीमा ने जल्दी-जल्दी जूते मोजे सौल स्वेटर टोपी आदि पहनकर पार्क में टहलने चल पड़े रीमा हमारी बड़ी बहन है जो रोज सवेरे मेरे साथ पार्क में टहलने जाती है हम दोनों पार्क में टहलते टहलते वहीं पड़ी एक बेंच पर बैठ गए l हर दिन की तरह देखा कि रेखा आज भी काम पर वही पतला स्वेटर पहनकर जा रही थी वह हमारे घर के थोड़ी दूर पर एक घर में काम करती है वहां काम करने के बाद मेरे घर भी आती है । मैंने पार्क में बैठे बैठे सोचा कि बहुत सारे कपड़े हैं आज इसे भी कुछ गर्म कपड़े दे दूं। मैं घर आकर सबसे पहले अलमारी खोलकर बैठ गई कुछ गर्म कपड़े निकाल कर रख दिए तभी घंटी बजी मैंने दरवाजा खोला अरे! रेखा तू आजा । रेखा कांपती हुई कमर दोहरी कर के अंदर आ गई मैंने उससे कहा ,”देख पहले तो तू इससे एक स्वेटर निकाल कर पहन ले”। उसने कहा ,मेम साहब इतने अच्छे कपड़े यह तो तुमरे ऊपर अच्छे लगत हैं। मैंने कहा नहीं यह सब तेरे लिए जा तू पहन कर आ—-।
अरे तू कितनी सुंदर लग रही है अब कल अब कल से यह पतला वाला स्वेटर पहन कर मत आना और यह भी सारे कपड़े घर लेकर जाना वह तो फूली नहीं समा रही थी उसने जल्दी-जल्दी अपना काम खत्म किया और चली गई।
आज मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं थी ,इसलिए पार्क में टहलने नहीं गई जैसे ही दरवाजे की घंटी बजी दरवाजा खोला तो देखा कि वही पतला स्वेटर पहने कांपती हुई रेखा सामने खड़ी थी,मैंने स्नेह से डांटते हुए कहा ,तुझे कल ही तो स्वेटर दिए थे। उधर से जो आवाज आई वह सुनकर मैं हतप्रभ हो गई।
क्या बताऊं मेम साहब मैं कल जैसे ही यहां से निकली थोड़ी दूर गई तो देखा “एक वृद्ध विधवा महिला सड़क के किनारे पड़ी ठंड से कांप रही थी “।
मैंने समझा कि मुझसे ज्यादा स्वेटर की जरूरत इनको है इसलिए मैंने वह स्वेटर उनको दे दिए।


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परत दर परत-Dowry story in hindi-

Dowry story in hindi

परत दर परत

Dowry story in hindi : दो दिन से पानी की मोटर खराब थी। कल प्लम्बर ने बड़ी खुशामद के बाद जब सुबह आने का आश्वासन दिया तब जाकर सुजाता का मन कुछ शान्त हुआ था फिर भी जैसे एक अविश्वास-सा बना हुआ था, इसीलिए आज छः बजे से ही सुजाता घर के पिछले बरामदे में प्लम्बर की राह देखती चक्कर काट रही थी। यहाँ से पूरा नहीं तो आधा शहर तो दिखाई दे ही जाता था।
प्लम्बर के घर पर फोन भी तो नहीं था कि वह फोन करके पूछ ही लेती या याद दिला देती। अब तो चुपचाप इंतज़ार करना है। राह देखते-देखते जब साढ़े सात बज गए तो वह थककर कुर्सी पर बैठकर नीचे शहर की तलहटी में बहती सतलुज नदी की लहरों से मन बहलाने की कोशिश करने लगी।
शहर के कदमों में बहती सतलुज नदी कुल्लू और शिमला जिले की विभाजन रेखा का काम करती, शहर को गुंजाती पूरे जोर-शोर से बह रही थी। अचानक ही सुजाता को लगा कि पुल पर कुछ भीड़-सी है। अभी वह बात को समझने की कोशिश करती कि कुछ लोगों को उसने पुल की तरफ दौड़ते देखा। थोड़ी ही देर में पुलिस भी पहुँच गई वहाँ। सुजाता की जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही थी। सोच रही थी कि बाहर जाकर बात का पता लगए, कि तभी पड़ोस की अर्चना भागती हुई आई, ‘‘आंटी……आंटी!’’ अर्चना हाँफ रही थी।
‘‘क्या हुआ अर्चना? तुम हाँफ क्यों रही हो?’’ पर अर्चना शायद खुद पर काबू पाने की चेष्टा कर रही थी, उसने पुल की तरफ इशारा किया।
‘‘हाँ, मैं भी देख ही रही हूँ, पर हुआ क्या है?’’ अब तक अर्चना अपनी साँसों पर काबू पाकर कुर्सी पर बैठ चुकी थी। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें फैलकर और भी बड़ी दिखाई दे रही थीं,

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‘‘आंटी, मधुर……मधुर की बहू ने…. पुल पर से सतलुज में छलांग लगा दी है। उसकी चप्पल और दुपट्टा वहाँ मिला है।’’
‘‘क्या कह रही है रे?’’ सुजाता चौंककर  खड़ी हो गई।
‘‘हाँ आंटी। उनके घर में तो बड़ी भीड़ है, वहाँ तो पुलिस वाले पहले गए थे, अब पुल पर आए हैं। ’’
‘‘तुझे किसने बताया?’’
‘‘मधुर आंटी के नौकर हरी ने। वह दुकान पर सफाई करने जा ही रहा था कि मधुर आंटी की बेटी गौरी पुल की तरफ से भागती हुई आई और उसने ही कहा कि नयना भाभी ने पुल पर से नदी में छलांग लगा दी है।’’
सुजाता की साँस अटक गई थी। उसे अपनी समस्या तो भूल ही गई। आँखों के आगे नयना का मासूम-सा चेहरा बार-बार घूमने लगा। अभी एक महीना ही तो हुआ था उस घर में शहनाई बजे।
नयना बतरा, उसकी बेटी आरती की नई टीचर थी। पिछले अभिभावक दिवस पर जब वह आरती के स्कूल पोर्टमोर में मीटिंग के लिए शिमला गई थी, तभी उसका नयना से परिचय हुआ था। अभी छः महीने पहले की ही तो बात है। मीटिंग से कुछ पहले ही प्रिंसिपल ने अभिभावकों को नए आए शिक्षकों का परिचय दिया जिनमें नयना बतरा भी थी। नयना बहुत हँसमुख और चंचल लग रही थी। बल्कि यूँ कहा जाए कि उसकी तो आँखें ही बोलती थीं तो कोई अतिश्योक्ति नहीं थी। उस एक मुलाकात में ही वह सुजाता को अच्छी लगने लगी थी परन्तु दूसरे दिन सुजाता घर वापस लौट आई थी।
आरती पोर्टमोर के हॉस्टल में थी। वह जब भी माँ को फोन करती तो नयना मैडम के बारे में जरूर बात करती। तभी एक दिन आरती ने बताया कि उसकी मैडम अब रामपुर बुशहर ही आ रही है। उनकी शादी मधुर आंटी के बेटे शील से हो रही है,
‘‘मम्मी! आप जरूर मेरी मैम को मिलकर आना। ’’
हालांकि मधुर का घर उनके घर से ज्यादा दूर नहीं था पर सुजाता चाहकर भी नयना से मिलने का समय नहीं निकाल पाई। आज उसी नयना की आत्महत्या का समाचार था, जो उसके गले नहीं उतर रहा था। कितनी विचित्र बात थी, सुजाता कैसे विश्वास कर ले इस बात पर? आरती ने बताया था कि नयना मैडम जूडो-कराटे की चैम्पियन भी रही हैं और कॉलेज यूनियन की लीडर भी। ऐसी लड़की विवाह के एक महीने बाद ही आत्महत्या कर ले…..? असम्भव।
दोपहर को आरती का फोन आया, वह घटना की सत्यता के बारे संदिग्ध थी। सुजाता की पुष्टि पर वह रोने ही लग गई आर रोते-रोते बोली, ‘‘नहीं मम्मी, ऐसा नहीं हो सकता। हमारी मैम तो कहती थी कि आत्महत्या कायर लोग करते हैं। बहादुर तो मुसीबतों को सामना करते हैं। वो कैसे कर सकती हैं आत्महत्या? नहीं सब लोग झूठ बोल रहे हैं। हमारे स्कूल में भी सब ऐसा ही कह रहे हैं।’’ सुजाता ने बड़ी मुश्किल से बेटी को समझाया, पर सच क्या है इसका पता नहीं चल रहा था।
इस घटना को तीन दिन बीत गए थे। खबरें छन-छन कर आ ही रही थीं। फिर सुना गया कि नयना की माँ रामपुर पुलिस स्टेशन गई थी, अपनी बेटी की गुमशुदगी की रपट लिखाने पर पुलिस वालों ने रपट नहीं लिखी। अब तो हर रोज  कोई न कोई नई बात सामने आने लगी थी। फिर धीरे-धीरे मामला ठंडा पड़ता गया और लोग भूलने लगे नयना और मधुर को। तभी एक दिन पूरा शहर सन्नाटे में आ गया। मधुर, उसकी बेटी गौरी और बेटा शील दहेज अधिनियम के अन्तर्गत धर लिया गया। मामला क्या है जानने के लिए सुजाता ने शाम को मधुर की अभिन्न मित्र बेला को घेर लिया।
बेला, सुजाता के बगल वाले मकान में ही रहती थी। उसके पास टीवी नहीं था और वह रोज संध्या के भोजन से निपटकर सुजाता के पास टीवी देखने बैठा करती थी। उस रात भी भोजन से निवृत्त होकर जब बेला और सुजाता टेलीविजन के सामने बैठी सीरियल देख रही थीं तो सुजाता ने अचानक ही बात छेड़ दी,
‘‘बहन जी, कैसी है मधुर? आप गए थे उसे दखने?’’

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‘‘हाँ भाभी! गई तो थी, पर हम लोग कर क्या सकते हैं बेचारी के लिए? ऐसी गन्दी बहू ले आई कम्बख़त कि जेल का मुँह देखने की नौबत आ गई पूरे परिवार को।’’
‘‘क्यों क्या हुआ…..?’’ सुजाता ने एकदम अनजान बनते हुए कहा।
‘‘तुम्हें नहीं पता क्या…., बहू की माँ ने दहेज का केस कर दिया है। बदमाश राण्ड, अपने यार के साथ खुद भाग गई और बेचारी मधुर के पूरे परिवार को फंसा गई।’’
‘‘पर बहन जी, मैंने तो सुना था कि पुलिस ने उसका केस ही दर्ज नहीं किया फिर ये कैसे हो गया?’’
‘‘अरे भाभी, तुम ना! बहुत सीधी हो। वो जो पी.डब्लयू.डी. मनिस्टर है न, वह उनके गाँव का है। बस वही आकर बैठ गया पुलिस वालों की छाती पर। अब तो केस सी.बी.आई. के पास चला गया है। पता नहीं क्या होगा।’’ बहन जी का स्वर चिन्ता में डूबा हुआ था।
‘‘परेशानी की क्या बात है बहन जी, अब और क्या होना है? सीबीआई तो दूध का दूध और पानी का पानी कर देगी।’’
‘‘यही तो परेशानी की बात है, यहाँ तो कोई सुनने वाला भी नहीं बेचारी का। आदमी पहले ही नहीं, बेटा भी जेल में है खुद तो अस्पताल में पड़ी है।’’
‘‘क्यों अस्पताल में क्यों?’’ सुजाता ने अनजान बनते हुए पूछा।
‘‘अरे, उसे तो पुलिस को देखते ही हार्ट अटैक पड़ गया था। पुलिस वाले ही उसे अस्पताल ले गए थे।’’ फिर थोड़ा रुक कर कहने लगीं, ‘‘बहू गई तो गई राण्ड, पर जाते-जाते बेचारी मधुर के 50 तोले के सोने के कंगन भी ले गई। इतना खर्चा शादी में किया ऊपर से यह मुसीबत। बेचारी मधुर तो मारी गई बेमौत।’’
‘‘हाँ, कह तो आप ठीक ही रहे हैं।’’ सुजाता ने कहा, ‘‘पर मैंने तो सुना है, कि नयना के ड्रेसिंग टेबल की दराज़ में [email protected] के नए नोट भी निकले हैं। अगर वह अपने पंद्रह हज़ार के नोट वहीं पर छोड़ गई तो मधुर के कंगन क्यों ले गई?’’
‘‘पहने हुए थे राण्ड ने। मधुर ने दिए थे उसे शादी में मुँह दिखाई।’’ बेला बहन जी अपना पूरा गुबार उस नयना पर निकाल रही थीं, जिसका अभी तक कोई सुराग भी नहीं मिला था।
हर दिन एक नई कहानी सुनने को मिल रही थी, कोई कहता, एक महीना हो गया शादी को आज तक किसी ने नयना की शक्ल भी नहीं देखी। कोई कहता, ससुराल वालों ने मार दी लड़की। यानि जितने मुँह उतनी बातें। सीबीआई. ने पूरे जोर-शोर से अपना काम शुरू कर दिया था। शहर के बहुत से बा-रसूख लोग धरे जा रहे थे रोज छान-बीन के चक्कर में।
ऐसे माहौल में शहर में एक बार फिर से जैसे भूकम्प आ गया हो, शोर मचा, मधुर के छोटे बेटे को खेल आ गई है। उस पर देवी का प्राकट्य हो गया है। कौतुहल वश सुजाता भी भीड़ में शामिल हो गई अन्यथा उसे इन सब बातों में कोई रुचि नहीं थी।
सुजाता ने देखा, घर में सारा शहर उमड़ा पड़ा था। पैर रखने को जगह नहीं मिल रही थी। बड़ी मुश्किल से कुछ लोगों को धकेलते हुए उसने एक ऐसे कोने में खड़े होने के लिए जगह बना ली जहाँ से मधुर का छोटा बेटा सुमेर बैठा हुआ साफ़ दिखाई दे रहा था।
सुजाता ने देखा, सुमेर पूजा करने की मुद्रा में लग रहा था। पालथी मार कर बैठे सुमेर के माथे पर बड़ा-सा रोली का तिलक लगा था, जिस पर चावल चमक रहे थे। हालांकि सुमेर की आयु मुश्किल से पंद्रह साल की थी, परन्तु इस समय उसके चेहरे पर पूर्ण गम्भीरता का साम्राज्य फैला हुआ था। सामने थाली में थोड़ी पूजा की सामग्री भी रखी हुई थी। भीड़ में एक पुलिस इंस्पेक्टर के साथ दो सिपाही भी खड़े थे। सम्भवतया सोच रहे थे कि क्या कर सकते हैं।
मधुर, गौरी और शील, तीनों ही पुलिस हिरासत में थे, घर में वयस्क के नाम पर केवल एक नौकर हरी था और थी परिवार की एक विवाहित बेटी जो घटना के बाद ही आई थी। वह भी हतप्रभ खड़ी थी। सुमेर थोड़ी-थोड़ी देर बाद सिर को गोल-गोल घुमाता कह रहा था, ‘‘काली! मैं काली हूँ। खुश हूँ। मुझे बलि मिली है, मैं खुश हूँ।…..और बलि चाहिए, और बलि।’’
अब पुलिस इंस्पेक्टर सुमेर के पास आकर पूछने लगा, ‘‘बेटा…..मुझे बताओ, क्या हुआ है, किसकी बलि हुई है?’’ पर सुमेर जैसे कुछ सुन ही नहीं रहा था। फिर बोलने लगा, ‘‘काली हूँ, काली। आधी बलि मिली है, और लूँगी….और लूँगी…..और बलि…..’’ और सिर को पूरे जोर से गोल-गोल घुमाने लगा।
अब एक बुजुर्ग महिला धरती पर माथा टेक कर बोली, ‘‘माता। यदि तू काली माँ है तो हमें बता, घर की नई बहू कहाँ चली गई और तुझे किसकी बलि दी गई है? बकरे की या मुर्गे की?’’
‘‘नहीं, मुझे नर बलि दी गई है। नई बहू की। नई बहू….हाँ…..हाँ नई बहू।’’ सुमेर का सिर बराबर घूम रहा था, अब उसने सिर को नीचे धरती से लगा दिया था। इंस्पेक्टर ने उसका सिर उठाना चाहा तो वह बिफर गया,
‘‘दूर रहो। वहाँ देखो जाकर, घास के नीचे। वहीं रखी थी मेरी बलि।’’ उसने बिना सिर उठाए ही कहा। इंस्पेक्टर ने तुरन्त सिपाहियों को इशारा किया। सिपाही उधर को हो लिए जहाँ घर की गाय के लिए घास रखा जाता था। ऊपर से थोड़ा-सा हरा घास उठाने के बाद नीचे की सूखी घास ऐसे दबी हुई था जैसे कोई वज़नदार चीज़ उस पर रखी गई हो। तभी एक सिपाही चिल्लाया ‘‘साब! साब, पायल।’’ यह पायल उसी घास में उलझी हुई थी। उसने पायल लाकर इंस्पेक्टर को दे दी। बड़े गौर से पायल को दखते हुए इंस्पेक्टर नौकर की तरफ घूमा। तो हरि ने आँखें झुकाकर कहा, ‘‘जी साब, ये बहू जी की ही है। ये उन्हें ढीली थी, कई बार निकल जाती थी। एक बार मुझे भी खोजने को कहा था मैंने तभी देखी थी।’’
अचानक सब का ध्यान फिर सुमेर की तरफ चला गया जो जोर-जोर से रोने लग गया था और रोते-रोते जमीन पर ही लेट गया। पर अब तक तो मामला पलट चुका था। पुलिस के संदेह की सूई परिवार की ओर घूम चुकी थी। इंस्पेक्टर ने सुमेर को गोद में उठा लिया तो वह कुछ नहीं बोला। उसे मानसिक चिकित्सा हेतु ले जाया गया। पुलिस की जीप निकली तो भीड़ भी छंटने लगी। घर आकर सुजाता और उलझ गई, क्या हुआ होगा? उसे लग रहा था कि सुमेर नाटक कर रहा है। उसे अवश्य ही बहुत कुछ पता है जो वह कह नहीं पा रहा। शायद इंस्पेक्टर को भी वही लगा हो जो उसे लगा है, इसीलिए वह सुमेर को ले गया है।
उधर हिरासत में गौरी अपने बयान पल-पल बदल रही थी। कभी वह कहती कि वह और नयना दोनों रोज नदी पर घूमने जाती थीं, कभी कहती उसने नयना को उधर जाते देखा तो उसका पीछा किया। शील ने पुलिस को बताया कि दो दिन बाद नयना को बीए के पेपर देने अपने मायके जाना था। अलबत्ता मधुर चुप थी।
बड़े लोग, बड़ी बातें। पर कुछ दिन बाद सब शान्त हो गया। मधुर का परिवार जमानत पर आ गया और मुकदमा चलता रहा।
दो साल गुज़र गए। इस बीच सुजाता ने गाड़ी ले ली थी। पड़ोस के गाँव का ही एक लड़का सुजाता ने ड्राइवर रख लिया थी गाड़ी के लिए, उसका नाम सोनू था। जब उसे कहीं जाना होता तो सोनू को बुला लेती।
एक दिन सोनू ने उसे बताया, ‘‘बीबी जी! मधुर की बेटी गौरी ने फांसी लगा ली है।’’
‘‘क्यों…?’’
‘‘जैसी करनी, वैसी भरनी। यह तो होना ही था।’’
‘‘पर क्यों होना था?’’ सुजाता थोड़ा खीज गई।
‘‘बीबी जी! जब बेगानी बेटियों को जहर देकर मारा जाता है तो अपनी बेटियों के बारे में भी सोचना चाहिए कि नहीं? सोनू ने उल्टा सवाल कर दिया।
‘‘पर तू कैसे कह रहा है कि बहू इन्होंने मारी है। कुछ निकला तो है ही नहीं।’’
‘‘निकलेगा कैसे, बड़े घरों के मामले ऐसे ही दबते हैं।’’ तू तो ऐसे कह रहा है जैसे सब कुछ तेरी आँखों के सामने हुआ हो।’’ सुजाता की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी।
‘‘और क्या, सब सामने ही तो था। लाश तो मैं ही फेंक कर आया था।’’
‘‘क्या कह रहा है रे?’’
‘‘हाँ बीबी जी।’’ सोनू रुआंसा हो गया, जब तक मैंने सी.बी.आई वालों को सब कुछ नहीं बता दिया, मेरे मन पर भारी बोझ रहता था, पर अब मैं हल्का महसूस कर रहा हूँ। मुझे हर समय लगता था, कि मैं भी इस हत्या में शामिल हूँ। मैंने तो जो सच था, बता दिया अब उनको सजा  मिले या न मिले मैं दोषी नहीं हूँ।’’
‘‘पर तू इस मामले में कहाँ से कूद गया। तू तो उन दिनों सरकारी गाड़ी चलाता था न?’’
‘‘हाँ जी, कच्ची नौकरी थी। जैसे आप बुला लेते हैं, वैसे ही साब भी बुला लेते थे इसीलिए फंस गया। अब मैं आपको ठीक से बता ही देता हूँ सारा मामला, पर चाय भी पियूँगा ।’’ वह पालथी मारकर वहीं जमीन पर बैठ गया। सुजाता को भी चाय की तलब तो लग ही रही थी, वह चाय बना लाई। चाय का कप सोनू को दिया और सामने ही कुर्सी पर बैठ गई। सोनू ने चाय का कप पकड़ा फिर बड़े मनोयोग से सारी कहानी सुनाने लगा,
‘‘उस दिन मेरे साहब की मेम साब, अपने सेब के बाग से बहुत देर में वापस आई थी इसलिए मुझे भी घर जाने में देर हो गई। घर जाकर खाना खाया और थका हुआ था तो गहरी नींद आ गई। रात आधी गुज़र गई थी कि दरवाजा भड़भड़ाने लगा। घर वाली मेरे उठने से पहले ही उठकर बाहर गई, लौटकर बोली ‘साब ने बुलाया है। मैं कुढ़ता हुआ कपड़े फंसाता बाहर निकल गया। कोठी पर पहुँचा तो साब ने कहा, ‘इसी समय शिमला जाना है।’ अब साब को जवाब कैसे देता चल पड़ा, पर तभी साब ने जीप बाजार में उतारने को कहा। मधुर बीबी जी के घर के पास पहुँचकर उन्होंने गाड़ी रुकवाई और घर में चले गए। रोज का काम था, हम छोटे लोग क्या कह सकते थे। मैंने सोचा शायद ये भी जाती होंगी, पर थोड़ी ही देर बाद शील बाबू और हमारे साहब, एक भारी-सी बोरी को दोनों तरफ से पकड़े बाहर आए और बोरी को जीप के पिछले हिस्से में पटक दिया और हम शिमला की सड़क पर हो लिए।’’ वह थोड़ा रुका, जैसे बोलते-बोलते थक गया हो।
‘‘सैंज से पहले ही साहब ने मुझे गाड़ी लूहरी वाली सड़क पर डालने को कहा तो मैंने गाड़ी नीचे वाली सड़क पर उतार दी। पुल के पास पहुँचकर साब ने गाड़ी रोकने को कहा।
गाड़ी रुकने पर साहब नीचे उतरे और बोरी को अकेले घसीटने लगे तो मैंने उनकी मदद करने के लिए बोरी को पीछे से पकड़ा, अब मुझे लगा कि बोरी में कुछ नरम-नरम सी चीज़ है। पर जब तक मैं कुछ सोचता-समझता बोरी सतलुज के पानी में थी। इतना ही नहीं जिस जगह बोरी फेंकी गई थी, वहाँ कुछ ही समय पहले एक जोड़ा मगरमच्छ लाकर छोड़े गए थे। फिर साब ने लॉगबुक भरी और स्टेशन शिमला लिख दिया। तीन दिन बाद जब हम वापस आए तब मामला मेरी समझ में आया। कैसे हैं न ये बड़े लोग, बस एक फ्रिज नहीं आया तो लड़की मार दी। वह भी पैसे तो आ ही गए थे, बहू ने उन्हें बताया नहीं था।’’
सुजाता आँखें फाड़े सोनू को देख रही थी कि तभी सोनू फिर बोल उठा, ‘‘बीबी जी, आपको पता ही नहीं, सुमेर को कोई देवी-वेवी नहीं आई थी। उन लोगों ने सुमेेर के सामने ही कोई जहरीली चीज बहू जी को जबरदस्ती पिलाई थी। वह चीखता रहा, ‘मत मारो भाभी को’ पर बड़े भैया ने उन्हें पकड़ा और गौरी ने कटोरी जबरदस्ती उनके मुँह से लगा दी। मधुर बीबी ने उनके बाल खींचे और मुँह खोला। बड़ा तेज जहर था थोड़ी ही देर में मर गई बेचारी। सुमेर ने तो नाटक किया था, ताकि सब पकड़े जाएँ।’’
‘‘हूँ…। तो यह सब सुमेर ने बताया होगा पुलिस को।’’ सुजाता ने एक ठंडी साँस भरते हुए कहा, ‘‘फिर भी छूट ही गए सब। हाँ भाई! पैसा है तो हर गुनाह माफ।’’
‘‘बीबी जी, इस दुनिया में तो छूट गए, पर भगवान के घर से कैसे छूटेंगे। आँख के सामने है।’’ कहता हुआ वह उठकर खड़ा हो गया।


dowry-story-in-hindi

आशा शैली
इन्दिरा नगर-2, लालकुआँ,
जिला नैनीताल-262402

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Real story in hindi writer asha shailee- वह कौन था जो उस कमरे में गया था

Real story in hindiwriter asha shailee 

वह कौन था जो उस कमरे में गया था

 

कभी-कभी जीवन में ऐसी घटनाएँ होती हैं जिन्हें हम चाहकर भी झूठला  नहीं सकते। ऐसे समय हमारा सारा का सारा ज्ञान-विवेक, सारी विद्या और अनुभव धरा का धरा रह जाता है।

यह सृष्टि विचित्र रहस्यों  से भरी पड़ी है। मेरे आदरणीय गुरु जी, डॉ. महाराज कृष्ण जैन हमेशा ऐसी कोई बात उठने पर झट से कह देते, ‘अरे! बहन जी, मत पड़िए इन बातों में।’ पर उन्हें मैं कभी यह बता नहीं पाई कि ऐसा होता है और न ही मैं अपने साथ हुई घटनाओं को झुठला पाई। आज मैं अपने जीवन की एक सत्य घटना पर बात करने जा रही हूँ। वैसे संस्मरण में सत्य ही तो होता है , ऐसा सत्य जो हमारे अनुभव से गुज़रा हो।

वैसे तो माता-पिता को अपनी प्रत्येक संतान प्रिय होती है, फिर भी कोई बच्चा थोड़ा अधिक ध्यान खींचता है या माता-पिता के अधिक निकट होता है या यह भी कह सकते हैं कि समय की मांग होती है। या यह भी हो सकता है कि जो हो रहा है, वह सहज स्वाभाविक रूप से हो रहा हो। जो भी हो, मेरा छोटा पुत्र महेंद्र विलक्षण बुद्धि का स्वामी था। कभी दूसरी श्रेणी में पास नहीं हुआ, फेल होना तो दूर की बात थी उसके लिए। तर्क-कुतर्क हर बात में आगे ही आगे। छोटी कक्षाओं से ही अध्यापकों से उलझना कोई बड़ी बात नहीं थी उसके लिए और कक्षा में नेतागीरी तो उसका शग़ल था। शैतान भी था ही। ख़ैर! हमारे गाँव गौरा में तब आठवीं तक स्कूल था। इसके बाद अब शहर तो जाना ही था।

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जब तक वह गाँव में पढ़ रहा था, तब तक तो उसे हमारा थोड़ा-घना भय रहता पर शहर जाकर वह और खुल गया। वैसे ही उसे साथी भी मिल गए। तब तक बड़े बेटे हेमन्त का विवाह हो गया था। वह महेंद्र की तरह खिलंदड़ा नहीं था, फिर विवाह के बाद उसका स्वभाव भी काफी बदल गया था, वह छोटे भाई के खर्चे आदि पर कुढ़ने भी लगा था।

हेमन्त, जहाँ पिता के साथ सेब के बाग़ और अन्य कारोबार देखता था वहीं महेंद्र जो मात्र अट्ठारह वर्ष का था, बिल्कुल भी गम्भीर नहीं था। आप सोच रहे होंगे यह तो हर घर में होता है। बेकार का रोना है यह। परन्तु यह बताना इस कहानी के लिए अति आवश्यक है क्योंकि मेरे पति दोनों भाइयों के बीच बढ़ती खाई के कारण अत्याधिक चिन्तित थे और यह घटना भी इसी चिन्ता से जुड़ी हुई है। बेटी तो मात्र दस वर्ष की थी और शिमला हॉस्टल में रहकर पढ़ रही थी। ऐसे ही समय में वह मनहूस दिन हमारी ज़िंदगी में आया और सब कुछ बिखर गया।

वह सन् 1982 के सितम्बर महीने की सोलह तारीख थी। भला वह तिथि भी कभी भुलाई जा सकती है? उसके अगले दिन वर्ष का अन्तिम श्राद्ध था। मेरे पति सेब बेचने के लिए ट्रक लेकर चण्डीगढ़ की मंडी गए हुए थे। वे उस दिन वापस आने वाले थे। कह कर गए थे कि ब्राह्मणों को श्राद्ध का न्योता दे देना और सारी तैयारी करके रखना हम समय पर लौट आएँगे। महेंद्र हॉस्टल से घर आया हुआ था। हर बच्चे की तरह ही उसे देर तक सोना अच्छा लगता था। घर में मैं थी, छोटे बेटे महेंद्र, बेटे-बहू के अतिरिक्त माघी और भास्कर नाम के दो गोरखा नौकर भी थे जिनमें से माघी काफी छोटे-से कद का था।

सुबह सबसे पहले मैं उठी और नहाकर पूजा के लिए फूल तोड़ रही थी उस समय माघी उठकर अपने कमरे से बाहर आया। अभी मुश्किल से छः बजे होंगे। इतनी जल्दी उठना रोज़ का काम ही था। सेब तोड़ने वालों के लिए भी खाना बनाना होता। खाना अभी लकड़ी पर ही बनता था, गाँव में गैस नहीं आई थी।

अभी मैं माघी से रसोईघर में लकड़ियाँ लाने को कह ही रही थी कि महेंद्र कुमार जी, गुस्से में उफनते हुए अपने कमरे से बाहर निकले और बाहर आते ही उबलना शुरू कर दिया,

‘‘कितनी बार कहा है कि मुझे आठ बजे से पहले मत उठाया करो, पर नहीं। कोई नहीं सोचता कि मुझे रात को पढ़ना होता है। कौन आया था मेरे कमरे में?’’

मैं और माघी दोनों एक-दूसरे का मुँह देखने लगे, क्योंकि अभी तक तो घर में हम दो ही जगे थे। मैंने माघी से पूछा, ‘‘क्यों रे! तू गया था क्या छोटे बाबू के कमरे में? क्यों गया था, तुझे पता था न वो गुस्सा करेगा??’’ माघी कुछ बोलता उससे पहले ही मेरा बेटा भिन्नाने लग गया, ‘‘मूर्ख समझा है क्या मुझे? अरे ये जरा-सा लड़का नहीं गया था, कोई बड़ा था। आप लोग मुझे चैन से पढ़ने भी नहीं देते। मेरी नींद पूरी नहीं होगी तो मैं कैसे पढ़ूँगा?’’

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‘‘पर कौन जाता तेरे कमरे में? अभी तो हम दोनों ही जगे हैं। मैं गई नहीं, माघी गया नहीं तो कौन गया होगा। सपना देखा है तुमने और सुबह सवेरे सबका मूड खराब करने आ गए हो। जाओ, जाकर सो जाओ।’’ मैंने कहा तो माघी भी बोल पड़ा, ‘‘नहीं बीबी जी! मैं भाई जी के कमरे में नहीं गया। सच कह रहा हूँ।’’

महेंद्र फिर बिफर गया, ‘‘तो क्या मैं झूठ कह रहा हूँ? बड़े आदमी और छोटे कद का पता नहीं चलता क्या? मैं सो थोड़ी न रहा था। अच्छे से जाग रहा था, जब मैंने अन्दर आने वाले के पैरों की आवाज़ सुनी तो मुँह पर रज़ाई डालकर, जान-बूझकर आँखें बंद कर लीं। आने वाले ने मेरे मुँह पर से रज़ाई उठाई और आँखें बंद देखकर फिर वापस डाल दी और बाहर निकल गया। मुझे पता होता कि आप झूठ बोलेंगे तो मैं उसी वक्त न उठ जाता और आप को झूठ नहीं बोलना पड़ता।’’

‘‘पर बेटा, मैं सचमुच ही तुम्हारे कमरे में नहीं गई। तुम्हें पता नहीं क्यों वहम हो रहा है?’’ मैं भी हैरान थी कि वह इतनी दृढ़ता से लड़ने की हद तक अपनी बात पर कायम था, जबकि इतनी बहस के बाद भी न तो भास्कर जागा था और न ही हेमन्त और उसकी पत्नी। आखिरकार विश्वास और अविश्वास के बीच गोते खाते हम तीनों अपने काम में उलझ गए।

हेमन्त वगैरह के जागने पर हमने उनसे भी यह बात पूछी तो वे हँसने लगे। हेमन्त ने तो झट कह दिया, ‘‘कोई फिल्म-विलम देखी होगी जिसका असर है इस पर।’’ बात आई-गई हो गई। थोड़ी ही देर बाद, लगभग आठ बजे बाज़ार से हमारा पुराना ड्राइवर, बहुत निकट सम्पर्क के एक पिता-पुत्री और कुछ बाजार के और लोग घर पर आ गए तो हमें आश्चर्य हुआ कि आज सुबह-सवेरे ये सब लोग क्यों? तभी कुछ गाँव के लोग आने लग गए। काफी अजीब लग रहा था, तभी बाजार से आई एक लड़की ने जिसका नाम राजेश था, धीरे से कहा, ‘‘चाची जी! चाचा जी की गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया है। मैं बैंक से छुट्टी लेकर आई हूँ। शायद आपको मेरी जरूरत हो।’’

‘‘अरे नहीं! कुछ खास नहीं। बस ज़रा सी टक्कर लगी है।’’ लड़की के पिता ने बात सम्भालने की कोशिश की। मैं बात को समझने की कोशिश कर रही थी। तभी हमारा पुराना ड्राइवर मेरे सामने सिर झुकाकर चुपचाप खड़ा हो गया।

‘‘हाँ जी! पंडित जी, आप कुछ बोल नहीं रहे।’’ गाँव के हमारे घनिष्ट सम्पर्क के व्यक्ति साधुराम बोले।

‘‘क्या बोलूँ बजिया जी! गाड़ी पलट गई है, मैं बड़े बाबू को लेने आया हूँ।’’ पंडित बहुत घीरे से बोला। अब मेरा चौंकना स्वाभाविक था, ‘‘और वे खुद? गाड़ी पलटने का मतलब…..?’’

‘‘नहीं….नहीं बीबी जी! बाऊजी तो दिल्ली गए हैं, वे गाड़ी में थे ही नहीं। आप परेशान न हों।’’ बहुत पुराना ड्राइवर एकदम बेचैन-सा दिखाई दिया। मैं बहुत गौर से उसे देख रही थी। ‘‘बस गाड़ी सीधी करने के लिए मालिक का होना जरूरी है, इसलिए बड़े बाबू को मेरे साथ भेज दो।’’ उसने मुँह दूसरी तरफ कर लिया। उन दोनों में नौकर-मालिक का कम और दोस्ती का अधिक रिश्ता था। फिर थोड़ी ही देर बाद वे सब लोग घटना स्थल की ओर चले गए। घर में मेरे साथ रह गई बहू और राजेश या गाँव के लोग।

शायद गाँव में सब को पता चल चुका था कि क्या हुआ है। साधुराम मेरे पास आ बैठे तो राजेश वहाँ से उठ गई। वे धीरे से बोले, ‘‘बहन! जो होना था, हो गया। क्या कर सकते हैं।’’

मुझे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था, कि ये लोग क्या कह रहे हैं और क्या कर रहे हैं। मुझे याद है, मैंने पीले गहरे संतरी रंग की चौड़े लाल बॉर्डर की साड़ी पहन रखी थी। न जाने क्यों मुझे आभास हुआ कि अब मुझे ये साड़ी नहीं पहननी चाहिए। तभी मेरे माथे पर लगी बिंदिया गिर गई। मैं उठने लगी तो सब मेरे गिर्द इकट्ठे हो गए। मैंने कहा, ‘‘मेरी बिंदिया गिर गई है। दूसरी लगाकर आती हूँ।’’ कोई कुछ नहीं बोला। बस राजेश की माँ ने पकड़कर वहीं बैठा लिया। अजीब-सा सन्नाटा घर में पसरा हुआ था। न कोई चाय की मांग कर रहा था न खाने की। इसी तरह दो दिन गुजर गए। दूसरे दिन बाज़ार से कुछ लोग और आ गए। घर में फोन मेरे कमरे में था जो वहाँ से हटा दिया गया था।

मुझे लग रहा था मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा, बड़ी अजीब सी बात है ऐसी किसी भी घटना के समय मुझे रोना नहीं आता। जब आरती गई तब भी ऐसा ही हुआ था। लोग मेरे गले लगकर रो रहे थे पर मैं चुप थी। बस एक सन्नाटा-सा लगता है, जो कुछ कोई कह दे कर दो। जो कुछ पूछा जाए उसका जवाब दे दो और बस। इस समय भी वही अजीब सन्नाटा सा मुझपर था। तीसरे दिन मुझे बताया गया कि हमारे पतिदेव उसी गाड़ी में थे। बस थोड़े घायल हैं और अस्पताल में हैं। अब मेरा हठ करना सहज था कि मुझे जाना है वहाँ। दुर्घटना हमारे घर से सौ किलोमीटर दूर हुई थी। अब कुछ-कुछ समझ में आने लगा कि फोन मेरे कमरे से क्यों हटाया गया है। क्यों शहर और गाँव के लोगों का आना-जाना बना हुआ है। अब साधुराम, जिन्हें मेरे पति बजिया कहा करते थे और वे उन्हें, फिर मेरे पास आ बैठे और बड़े डरते-डरते कहने लगे, ‘‘बहन! बजिया घर से कब गए थे?’’

मैं हैरानी से उनका चेहरा ताक रही थी क्योंकि गाड़ी में सेब की पेटिया भरते समय वे गाड़ी के पास खड़े थे। वे फिर खिसियाए से कहने लगे, एक्सीडेंट वाले दिन मैंने उनको घर से उतरकर सड़क पर जंगल की तरफ भागते देखा था। उन्होंने सफेद कुर्ता-पायजामा और पीले रंग का स्वेटर पहन रखा था। (ये उनके घर में पहनने के कपड़े थे।) मैं सोच भी रहा था कि बाबू तो चंडीगढ़ गया था, आया कब? फिर मैंने सोचा, शायद रात को आ गया हो। पर ये उस तरफ को भाग क्यों रहा है? फिर सोचा शायद कहीं पेट खराब हो तो जंगल को दौड़ लगा रहा है।’’

‘‘आप घर तक क्यों नहीं आए, मिलने? आप लोगों का तो बड़ा प्रेम था न?’’

‘‘मुझे खुद बड़ा अजीब लग रहा था। मेरे दिमाग में तुरन्त ही आ गया कि इनके तो घर में सारा इंतजाम है, जंगल क्यों जाएँगे? फिर मैं घर के दोनों तरफ गाड़ी देखने के लिए गया पर मुझे कहीं गाड़ी दिखाई नहीं दी। मुझे क्या पता था कि यह शमशान की ओर दोड़ लगा रहा है। मैं आवाज़ लगाता तो शायद वह बच जाता। मुझे क्या पता था।’’ तभी मैंने देखा मेरा छोटा पुत्र सिर पीट-पीटकर रो रहा था और कह रहा था, ‘‘अब समझ में आया, सुबह सवेरे मेरे कमरे में कौन आया था। मेरे बाप को मेरी चिन्ता रहती थी। बाजी (दोनों बेटे पिता को बाउजी कहते थे जो जल्दी कहने से बाजी बन जाता था।) कहते थे, ये बिगड़ रहा है। इसका क्या होगा? हाय! मेरा बाप मुझे देखने आया था, आखरी समय में। मुझे क्या पता था, कम से कम मैं मुँह न ढंकता, आँखें बंद न करता तो जाते हुए बाजी को देख तो लेता।’’

मैं आज भी सोचती हूँ कि वह क्या था? यदि महेंद्र को वैसा कुछ आभास न हुआ होता तो वह इस तरह का व्यवहार  नहीं करता। खूब गुस्से में था, सुबह सवेरे। बिल्कुल लड़ने को तैयार। इसे आप नाटक तो नहीं कह सकते। फिर साधुराम ने जब उन्हें देखा तो वह वही समय था जो महेंद्र ने बताया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उनकी हृदयगति रुकने का वही समय था। बताइए, कैसे न विश्वास किया जाए कि कुछ तो है।

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आशा शैली

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Corona time painful story | पिता और बेटे की दर्द भरी कहानी

Corona time painful story| पिता और बेटे की दर्द भरी कहानी

रुका न पंछी पिंजरे में

Corona time painful story -धनेसर को यह समझ में नहीं आ रहा है कि क्या हो गया है, जिसको देखो वहीं मास्क लगाए हुए है। हर आदमी के चेहरे पर काला, नीला, पीला, हरा, सफेद, लाल कपड़ा न जाने कहाँ से आ गया। ये सब लोग एकाएक डागडर वाला मास्क क्यों लगा लिये ? पिछले साल होली के तीन दिन पहले साथ में काम करने वाले अकरम का एक्सीडेंट हुआ था तो देखा था डागडर बाबू लोग ऐसे ही लगाए हुए थे चेहरे पर। केवल आँखें ही दिख रही थी। होली के पहले तो ऐसा कुछ नहीं था। इस बार होली में वह घर गया था, तो आते वक्त अपने इकलौते बेटे मोहित को भी साथ लाया था । मोहित की माँ कुसुमी मोहित के जन्म के साल भर बाद ही टायफायड से चल बसी थी। पूरे गाँव में वह दिन भर इधर-उधर लफेरिया की तरह घूमता रहता। धनेसर की माँ पार्वती भी तो अब बूढ़ी हो गई है, कहाँ-कहाँ देखे उसे?  कभी आम –अमरूद तोड़ने, तो कभी मछली पकड़ने, तो कभी गाँव के चरवाहों के साथ कबड्डी-चिक्का खेलने में मग्न रहता। इस साल जुलाई में पाँच साल का  होने वाला है।
फैक्ट्री के गेट के सामने ही नया- नया स्कूल खुला है। रामबरन कह रहा था कि नर्सरी से किलास पाँच तक बच्चों तक का सकुल है। रंगरेजी मेडियम में पढ़ाई होगी। उसने अपने बेटे रीतेश को नर्सरी में डाला है। फीस तो ज्यादा है लेकिन बच्चें के भविष्य को बनाने के लिए थोड़ा कष्ट उठा लेंगे। खर्चा में काट-कटौती करेंगे। अच्छा सकुल में पढ़ेगा तभी तो बाबू बनेगा। यहीं सब सोच-गुन कर वह भी अपने मोहित को लाया है। एक दिन नाईट ड्यूटी ऑफ में जाकर पता लगाया तो साफ-साफ गोर-गोर मैडेम जो काउंटर पर बैठती हैं बोली “ बच्चा कितने साल का है ?’’ तो बताया कि चार पूरा होई गवा है। जुलाई में पाँच साल को होई जावेगा। मैडेम बोली थी कि “ले आओ, लकेजी में डमिशन हो जायेगा।‘’
घर से यहाँ आया तो पता चला कि फैट्री बंद है। करओना  नाम की कोई नई बीमारी चली है इसी  कारण फैट्री बंद होई गवा है। अब धनेसर के लिए बड़ा ही लमहर मुसीबत होई गवा है। पहले गाँव-जवार के चार-पाँच मजदूरों के साथ रहता था तो क्वाटर भाड़ा भी कम पड़ता था, खाना-खुराकी भी कम लगता था। रामबरन से बात करने के बाद मोहित को यहाँ लाने को मन बनाया तो सोचा, बच्चा को पढ़ाना-लिखाना है तो क्वाटर सेपरेट होना चाहिए। यहीं सोचकर उसी मुहल्ले में एक कमरे का क्वाटर ढूँढ़ा।  लैट्रीन-बाथरूम शेयरिंग है। रूम बड़ा है, किचेन के लिए भी काफी जगह है। किराया सुनकर तो तिलमिला गया था लेकिन बच्चे के केरियर का सवाल है , सोचकर कहा ‘ ठीक है साहेब !’’

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धनेसर जनवरी में अपने नए क्वाटर में आ गया। खाने-पीने का अपना अलग व्यवस्था कर लिया। एक फोल्डिंग चारपाई भी खरीद लाया। आखिर बच्चे को तो नीचे नहीं न सुला सकता है, वो भी पढ़ने वाला बच्चा। जनवरी से उसका दरमाहा एक हजार रुपये बढ़ा है। पहले सात हजार मिलता था अब आठ हजार मिलेगा। इसी बल पर उसने सारा पिलान किया था। मगर भगवान् को कुछ दूसरा ही मंजूर था।
धनेसर के नए मकान-मालिक प्रभूदयाल त्यागी, मेरठ के रहने वाले थे। गुड़गाँव में उनका  इलेक्ट्रॉनिक की दुकान है। बारह कमरे और तीन लैट्रीन-बाथरूम उन्होंने बनवाया है। ज्यादातर यूपी-बिहार के मजदूर इनमें रहते हैं। कुछ परिवार वाले तो कुछ अकेले। प्रभूदयाल जी ने धनेसर को बता दिया था कि किराया एडवांस में देना होगा यानी फरवरी का भी किराया जनवरी में देना होगा। किराया तीन हजार रुपये प्रति माह तय हुआ है। जनवरी में आठ हजार रुपये तनख्वाह मिली, तो वह जनवरी-फरवरी के किराया और राशन-पानी में ही चला गया।
मार्च में होली की छुट्टी जाते समय ही उसे मार्च और अप्रैल का किराया चुकाना पड़ा था। घर से आते वक्त केवल एक हजार रुपये ही बचे थे। सोचा था वहाँ फैट्री पहुँचने पर सब ठीक हो जायेगा लेकिन यहाँ तो सबकुछ बंद पड़ा है।
एक दिन घूमते-घूमते कॉन्वेंट की तरफ गया तो देखा ताला लगा हुआ है। मोहित भी साथ गया था। बड़ा खुश था वह स्कूल जाने के नाम पर, लेकिन वहाँ तो मायूसी  ही हाथ लगी थी। आते समय राशन दुकान वाले लाला रघुवंश अग्रवाल मिल गये। देखते ही बोले “ धनेसर ! तुम्हारे नाम पर सात सौ रुपये बाकी हैं। दो महीने से ज्यादा हो रहे हैं। कब दोगे ?’’
“ पा लागी लाला जी ! फैट्री खुलने तो दो सब चुका देंगे। कभी मेरे ऊपर बकाया रहा है क्या ? धनेसर ने पास आकर कहा।
“ सो तो ठीक है, लेकिन आजकल बड़ी कड़की चल रही है। कोरोना महामारी पूरे दुनिया में छाई गवा है – फैक्ट्री सब बंद हो गये हैं —  न जाने कब खुलेंगे — सब मज़दूर अपने गाँव जा रहे हैं। हमारी हालत भी पतली हो गई है। प्रेम से दे दो , जोर जबरदस्ती करना ठीक नहीं लगता है।‘’ लाला ने अपनी टेढ़ी निगाह से धनेसर को देखते हुए कहा।
“ हाँ- हाँ ! ठीक है , ये लीजिए पाँच सौ रुपये। बाकी के लिए थोड़ा धीरज रखिए ,वो भी दे दूँगा।‘’ शर्ट के भीतर वाले पॉकिट से पाँच सौ का नोट निकाल लाला को थमाते हुए धनेसर ने नरम आवाज में कहा।
क्वाटर में जो राशन था, बड़े मुश्किल से सात दिन तक चला। अब आगे क्या होगा? कैसे चलेगा ? धनेसर को कुछ समझ नहीं आ रहा था। रामबरन, अशरफ, मकेशर, फूलचंद, शशिभूषण, चंदेसर, गणेश , सब गाँव-जवार वाले बार-बार घर जाने की बात कर रहे थे। जब यहाँ फैक्ट्री बंद होई गवा तो हम लोग यहाँ क्या करेंगे ? जब सब कुछ सब जगह बंद है तो क्या किया जाए ? सरकार टेलीविजन पर कह रही है कि घर से बाहर नहीं निकलो नहीं तो कोरोना पकड़ लेगा। टी. वी. पर खबर देख कर बहुत डर लग रहा है। बाहर कोई काम नहीं घर के अंदर खाने के लिए अन्न का दाना नहीं। ऐसे में कोरोना से मरे या ना मरे लेकिन भूखे जरूर सब मर जायेंगे। सब मिलकर फाइनल किए कि जब मरना ही है तो अपने धरती पर मरेंगे। वहाँ एक-दो मुट्ठी जो भी मिल जायेगा गुजारा कर लेंगे। जैसे पहले ज़िनगी काटते थे वैसे फिर काटेंगे। यहाँ परदेस में कोई पूछने वाला नहीं ,वहाँ तो अपना गाँव-समाज है। अपनी माटी की बात ही कुछ और होती है। मरने पर चार आदमी कंधा देने वाला तो मिलेगा। यहाँ तो कुत्ता-कौवा की तरह भी पूछने वाला कोई नहीं।
धनेसर बड़ा असमंजस में था। उसने पड़ोसी परमेसर के मोबाइल पर अपने माई से बात किया।
“ प्रणाम माई ! ‘’
“खुश रह बेटा ! युग युग जी-अ  –।‘’
“ माई ! यहाँ तो फैट्री बंद है। सब कुछ बंद है। यहाँ तक कि ट्रेन-बस भी बंद है। क्या करे ?  उस पर से मोहित भी साथ है। माई ! कल से उसे बुखार है।  कुछ समझ नहीं आवत है? ‘’
“ तू किसी तरह चली आव बेटा ! मोहित का चेहरा मन से बिसरत नाहीं हवै। मोहित को देखने को मन छछनअ ता । तू  बेकार ही मोहित को ले गइल –। चली आव  बेटा ! कइसे  भी चल आव —  मोहित को देखे  बड़ी मन करत बा बेटा —  मोहित को ले आव  बेटा —  मोहित को  ले आव व–   ले आव–  ।‘’
“ठीक है माई !’’ कहकर धनेसर ने फोन काट दिया।
गाजीपुर और बलिया के आस-पास के सभी मज़दूरों ने अपने गाँव जाने का निर्णय लिया। सब एक साथ मोटरी-गेठरी बाँध चल पड़े। रास्ते में हर दस–बीस किलो मीटर की दूरी पर यूपी- बिहार के मजदूरों का झुंड दिखाई देता। कहीं- कहीं टेम्पु या पीक-अप  जैसे छोटे-मोटे वाहन भी दिख जाते थे जिनपर धान की बोझा की तरह लदे हुए स्त्री-पुरुष और बच्चें दिखाई पड़ते। जो जैसे है वैसे ही अपने घर की तरफ बढ़ता दिखाई देता। बड़ा भयावह मंजर था। मानवता का ऐसा विवश- विकल रूप शायद ही कभी देखने को मिला हो। बाप के कंधे पर बैठी बेटी, माँ के गोद रोता दूधमुँहा बच्चा,  माथे पर  बैग  को रखे चल रहे किशोरावस्था के लड़के-लड़कियाँ हृदय में अजीब-सी करुणा जगा रहे थे।  मोहित बुखार में बड़बड़ा रहा था – दादी— — दादी–  दादी–। उसका शरीर गर्म तवे की तरह तप रहा था। धनेसर उसे रास्ते में पारले-जी बिस्कुट देकर पानी पिलाता फिर कंधे पर लाद चल देता। पूरा काफिला पैदल ही चल रहा था।  ट्रेन-बस बंद, सारे साधन बंद, पूरा देश बंद लेकिन इनको इनकी धरती बुला रही थी। वे चल पड़े थे एक जुनून के साथ अपने गाँव, अपनी धरती के लिए।
जहाँ एक ओर किराया न दे पाने के कारण घर से सामान बाहर फेकने वाले गुड़गाँव के मकान-मालिक थे, राशन का बकाया वसूलने के लिए मार-पीट पर उतारु लाला-साहू- महाजन –बनिया थे वहीं इसी देश में राह चल रहे इन बेबस-मज़बूर मज़दूरों के लिए लंगर चला रहे लोग भी। रास्ते में जहाँ लंगर दिखता वहीं काफिला रुक जाता। दयालु लोग अपने-अपने घरों से खाना बनवा कर लाते। भरपेट खिलाने के बाद रास्ते के लिए भी देते। आखिर यह देश राजा बलि, दानवीर कर्ण, महावीर जैन, गौतम बुद्ध, कबीर और नानक का देश है। खाने-पीने के साथ-साथ दवा-दारू की व्यवस्था भी कर रहे थे लोग। धनेसर ने मोहित को लंगर के एक सज्जन को दिखाया।
“अरे ! इसका शरीर तो गर्म तवे की तरह तप रहा है। कुछ दवा दिया या नहीं।‘’
“ साहेब ! जो भी पैसा था सब राशन-पानी में खर्च हो गया। मकान-मालिक अगले महीने का किराया नहीं देने पर क्वाटर से निकाल दिया। जिस फैट्री के नौकरी के भरोसे पर बेटे को लाया था वहीं फैट्री बंद होई गवा , साहेब – क्या करें —– कुछ समझ में नहीं आवत है – साहेब–  ।’’ धनेसर फफक –फफक कर रोने लगा।
“चलो,कोशिश करते हैं। हमारे पास जो दवा है देते हैं,लेकिन स्थिति बहुत खराब हो गई है। बचने का चांस बहुत कम है। दूसरे में कोरोना का ऐसा कहर है कि यदि गलती से पता चल जाए तो तुम्हें और तुम्हारे बच्चे दोनों को चौदह दिनों के लिए क्वारेंटाइन सेंटर में डाल देंगे।‘’  उस सज्जन ने ठण्डी साँस लेते हुए कहा।
उन्होंने दो टेब्लेट को आधा-आधा टुकड़ा और एक टेब्लेट पूरा मोहित को खिलाया लेकिन दवा खाने के एक मिनट बाद ही मोहित ने उल्टी कर दी। सज्जन अपना माथा पकड़ कर बैठ गए।
धनेसर रोये जा रहा था। उस सज्जन ने धनेसर के बगल में बैठे अशरफ को को अपने पास बुलाकर कहा “ देखो ! तुम्हारे साथी का लड़का दो-तीन घण्टे का ही मेहमान है। इसकी अंतिम घड़ी आ गई है।  इससे अपनी भाषा में समझाना कि रास्ते में यह किसी को पता न चलने दे कि इसके कंधे पर लदा चार साल का बच्चा मरा हुआ है। यदि किसी को पता चल गया तो बच्चे का चीड़ –फाड़ करेंगे और उसे कम-से-कम चौदह दिनों के लिए क्वारेंटाईन कर देंगे। फिर तो घर जाना भूल ही जाना पड़ेगा। ठीक से समझ गए न ।‘’ इतना कह सज्जन अपने आँखों में आए आँसुओं को पोछने लगे।
धनेसर अपने पीठ पर मोहित को लादे चल रहा था। अशरफ ने उसके कंधे पर हौले से हाथ रख कहा “ देखो धनेसर भाई ! खुदा की मर्जी के आगे किसी की नहीं चलती शायद मोहित का तुम्हारा साथ इतने ही दिनों का हो। अगर मोहित चला जाता है तो किसी को पता नहीं चलने देना नहीं तो इसका मरा मुँह भी इसकी दादी नहीं देख पायेगी। यदि ज़रा भी भनक लग गया तो इसके शरीर को अस्पताल में ले जाकर चीड़-फाड़ करेंगे और तुम्हें  भी कम-से-कम चौदह दिनों के लिए क्वारेंटाईन कर देंगे। उस ऊपर वाले के आसरे ही हम लोग हैं। ध्यान रखना, धनेसर भाई– ।‘’
धनेसर को माई की बात याद आ गई “मोहित को देखे  बड़ी मन करत बा बेटा —  मोहित को ले आव  बेटा —  मोहित को  ले आव —   ले आव— – मोहित को —-।‘’
धनेसर ने मोहिता ! मोहिता ! पुकारा  लेकिन मोहित के शरीर में कोई हलचल नहीं थी । पिंजड़े का पंछी उड़ा चुका था।

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 धनेसर और अशरफ दोनों सड़क किनारे झाड़ी में जा बैठे। मोहित को कंधे से उतारकर धनेसर ने नब्ज टटोला। नब्ज कब का बंद हो चुकी था। वह पथराई आँखों से मोहित के शव को देख रहा था। वह एकाएक झोके से उठा और मोहित के शव को अपने कंधे पर डाल चल पड़ा।
रास्ते में जहाँ कहीं भीड़ या पुलिस दिखाई देती, धनेसर के मुँह में जुबान आ जाती।
“बेटे !  अब बस दो दिनों में हम पहुँच जायेंगे अपने घर , दादी के पास — ।‘’
“ हाँ !  हाँ !  ठीक है , दादी के हाथ का बना महुआ का हलवा खाना —  हाँ—हाँ —   खाना भाई  — खूब   जमके खाना — ।‘’
“ क्या —  मकई की रोटी – भैस के दूध में   — चीनी मिलाकर खाओगे – ठीक है  खाना – खाना  नाक डुबो – डुबो के खाना — ।‘’
चाँदनी रात में आकाश में चमकता चन्दा अपनी चाँदनी धरती पर दिल  खोलकर लुटा रहा था । धनेसर  मोहिता को अपने कंधे पर डाले  काफिले का साथ अपने धुन में बढ़े जा रहा था। वह चंदा को देख कर गाने लगा-
चन्दा मामा —
आ – रे – आव
वा-रे -आव
नादिया किनारे आव
चांदी के कटोरिया में
दूध -भात लेले आव
हमारा मोहित के
मुहवा में गुटुक—– कहकर पीठ पर लदे मोहित के मुँह में अपने दाहिने हाथ को कौर बना-बना  कर डालने लगा। ऐसा लग रहा था जैसे वह अपने  मोहित को  सच में दूध-भात खिला रहा हो। वह प्रमुदित -आनंदित बच्चे की भाँति उछल-उछल कर मग्न बढ़े जा रहा था।
घर पहुँचते ही धनेसर ने मोहित को खाट पर लिटा दिया और स्वयं  धम्म से जमीन पर बैठते हुए बोला “  देखो माई ! मैं ले आया तुम्हारे मोहिता को ।‘’
खाट पर पड़े मोहित को हिलाते हुए बोला “ मोहित ! देखो – दादी – दादी – बात करो  दादी से  । पाय लागो अपने दादी को —  मोहित उठो – उठो-  — अब काहे नहीं बोलत हव– —  रास्ते  में  तो बहुत  बोलत  रह – दादी – दादी — –।‘’
धनेसर का पड़ोसी परमेसर धनेसर की आवाज सुनकर आ गया। खाट से उठती सड़ाध के भभका से मन मिचलाने लगा। उसने खाट के पास जाकर मोहित को ध्यान से देखा। वह बिल्कुल निस्पंद पड़ा था। उसके चेहरे पर मक्खियाँ भिनभिना रही थी। उसने मोहित के नब्ज को टटोला । हाथ बिल्कुल ठण्डा था। उसे समझते देर न लगी कि मोहित को मरे हुए दो-तीन दिन हो चुके हैं। उसने धनेसर के कंधे पर हाथ रखकर कहा “  धनेसर भाई ! मोहिता तो मर चुका है । कैसे बोलेगा ? ‘’
“बाक पगला ! मोहित और हम रास्ते भर बात करते आए हैं। तोहे कोई भरम हुआ है । देखो—देखो—कैसा सुग्गा नियर नाक है , देखो – देखो—होठ  देखो — —   अरे – अभी नींद में है — – – तोहे पता नाही रास्ते में खूब बोलत रहे — रतिया में दूध -भात भी खइलक  –गुटुक – गुटुक —   खूब  दादी  — दादी – करत रहे —  —  सो के उठिहै तो  अपने दादी के गोद में चली  जैहे — –  — — ।  छोड़  द — – सुते दै  ओह के —  ।‘’  धनेसर एक रौ में बोल गया।
“माई ! बड़ी भूख लगी है । कुछ खायके होये तो लाओ , माई !‘’ कहकर धनेसर बाहर चापाकल पर हाथ मुँह धोने चला गया।
“ चाची ! धनेसर तो पगला गया है । तुमको तो सुधी है , देखो—ई – देखो  — मोहित मर गया है। हाथ पकड़ के देखो, नब्ज कब से बंद पड़ी है। शरीर एकदम ठण्डा है। आँख-नाक पर मक्खियाँ भिनभिना रही है। अब तो सड़ाध भी आने लगी है–   चाची–  ।‘’ परमेसर ने खाट पर पड़े मोहित का हाथ पार्वती के हाथ में देते हुए कहा।
पार्वती बार- बार मोहिता का नब्ज पकड़ कर देखती है।नब्ज कब की बंद पड़ी है। कहीं  लेशमात्र भी जीवन शेष नहीं है। उसका शरीर एकदम ठंडा पड़ चुका था। वह पछाड़ खाकर मोहित के शरीर पर गिर पड़ती है “  ओ—हमार—मोहिता – रे – मोहिता – तू तो – दगा दे कर चला गया रे रे – मोहिता  ।‘’ बदहवास हो अपना सिर पटकने लगती है।
जैसे ही धनेसर आँगन में आता है पार्वती उसके गले से लिपट पुक्काफाड़ कर रोने लगती है “ बेटा – हो – बेटा —  — मोहिता  तो दगा देकर चला गया हो – बेटा —  —  मोहिता —  हम सब के छोड़ के चला गया – हो बेटा–  — अरे—मोहिता – रे मोहिता — ।‘’
“ माई ! तुम क्या कह रही हो ? काहे रो रही हो ? तुम भी लोगों के कहे में आ गई।   अरे–   मोहिता बीमार था  इसीलिए नींद नहीं खुल रही है–  चलो – ले चलते है – डॉक्टर के पास  — चलो – चलो– ।‘’
वह झटके से मोहित को उठाकर चल दिया। दो कदम चलने के बाद लड़खड़ा कर औंधे मुँह गिर पड़ा। परमेसर ने दौड़कर उठाया। सीधा करने पर देखता है कि उसके आँखों की पुतलियाँ उलट गई हैं। शरीर बिल्कुल निस्पंद हो गया है । वह मोहिता  को लाने मोहिता के पास जा चुका था।

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आदित्य अभिनव उर्फ डॉ. चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव
 सहायक आचार्य, हिंदी विभाग 
 भवंस मेहता महाविद्यालय ,भरवारी ,कौशम्बी – 212201
 मोबाइल – 7972465770, 7767031429

Corona time painful story | पिता और बेटे की दर्द भरी कहानी रुका न पंछी पिंजरे में/आदित्य अभिनव उर्फ डॉ. चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव की रचना कैसी लगी।  अपने सुझाव कमेंट बॉक्स में अवश्य बतायें , पसंद आये तो समाजिक मंचो पर शेयर करे इससे रचनाकार का उत्साह बढ़ता है

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