लगभग एक वर्ष पहले मुझे एक अविस्मरणीय पुस्तक मिली-‘सदी की सबसे बड़ी तालाबंदी | लेखक -अवधेश सिंह जी की | रश्मि ‘लहर’

पुस्तक -‘सदी की सबसे बड़ी तालाबंदी’, लेखक -अवधेश सिंह
प्रथम संस्करण -२०२३
मूल्य -रूपये-२९५
प्रकाशक -ए.आर.पब्लिशिंग कंपनी
ISBN: 978-93-94165-02-1
पृष्ठ संख्या -112

लगभग एक वर्ष पहले मुझे एक अविस्मरणीय पुस्तक मिली-‘सदी की सबसे बड़ी तालाबंदी’, लेखक -अवधेश सिंह जी की। पुस्तक पढ़ने के मध्य कई बार अश्रुपूरित नेत्रों ने व्यवधान डाला। मैं कई बार फूट-फूट कर रोई भी। बहुत सोचा कि इस पुस्तक पर अपने विचार लिखूॅं, पर, खोये हुए अपनों की स्मृतियों के कारण मन सदैव हिम्मत हारता रहा। आज अपने को संयत कर अपने विचार व्यक्त कर रही हूॅं।

यदि हम ‘सदी की सबसे बड़ी तालाबंदी ‘ की बात करें तो यह पुस्तक कई मायनों में विशिष्ट है। इसमें प्रयुक्त आंकड़ें, उस समय की पारिवारिक स्थितियाॅं, समाज में फैलते स्वार्थ की कटुताऍं तथा व्यक्तिगत हित के भाव की सटीक अभिव्यक्ति इस पुस्तक को अन्य पुस्तकों से एकदम अलग कर देती है। मजे की बात यह है कि लेखक की शैली इतनी रोचक, तथ्यात्मक रूप से परिपक्व तथा सहज है कि पाठक पूरी पुस्तक तन्मयता से पढ़ता चला जाता है। देखा गया है कि कई बार आंकड़ों से जुड़ी पुस्तकें ऊब से भर देती हैं।

लेखक ने संपूर्ण विषय को अट्ठारह भागों में बाॅंट कर लिखा है। महामारी के दौर का आरंभ, चरम सीमा तथा भविष्य में उपजने वाले विभिन्न दुष्परिणामों से निपटने के प्रयासों की सार्थक पहल का भली प्रकार वर्णन किया है। यह पुस्तक अपने विषय-विभाजन के कारण बहुत व्यवस्थित ढंग से पाठकों के मन-मस्तिष्क को छू पाने में तथा प्रभावित कर पाने में पूर्णतया समर्थ रही है। एक उदाहरण देखिए –

९. कोरोना के असली योद्धा विषय के अंतर्गत जब पाठक यह पढ़ता है कि –

“तमाम सुरक्षा कवच से लैस एम्स में अभी तक 489 से अधिक स्वास्थ्यकर्मी कोरोना वायरस की चपेट मे आ गये हैं, जिनमें तीन की मौत डराने वाली है.. कमोबेश यही स्थिति पूरे देश की है, न तो कोरोना वायरस का कहर थमता दिख रहा है, और न कोरोना योद्धाओं का साहस।” यह पढ़कर मन उस विचित्र समय की याद करके चिंतित हो जाता है। लेखक ने जीवन के तथा समाज के हर रूप को शब्दों के माध्यम से चित्रित करने का सफल प्रयास किया है।

यहाॅं पर मैं बनार्ड शों के इस कथन को उद्धृत करना चाहूॅंगी-“विचारों के युद्ध में किताबें ही अस्त्र होती हैं।” इस पुस्तक को पढ़ते समय मुझे यह पंक्तियां एकदम सही प्रतीत हुईं। मुझे लगा कि दहशत भरे उस समय को जब भविष्य में कोई पढ़ना चाहेगा तो मददगारों के विभिन्न रूपों से भी रूबरू होगा तथा मानवीय सरोकारों के नकारात्मक एवं सकारात्मक पक्षों को भी समझेगा तथा उनसे भविष्य को सुरक्षित करने का विलक्षण ढंग सीखेगा।

किताब भले ही महामारी से जुड़ी है, परन्तु उसमें सिमटे मनोभाव पीढ़ियों को प्रभावित करने की अक्षुण्ण क्षमता रखते हैं। पुस्तक पढ़ते समय मुझे अब्राहिम लिंकन जी की यह पंक्तियाॅं याद आ गईं-“मैं यही कहूॅंगा कि, वही मेरा सबसे अच्छा दोस्त है, जो मुझे ऐसी किताब दे जो आज तक मैंने न पढ़ी हो।”
ऐसी महत्वपूर्ण पुस्तक सदियों तक अपनी महत्ता बनाए रखेगी ऐसा मेरा विश्वास है।

इसमें महामारी के समय संपूर्ण विश्व के क्रमानुसार आंकड़ों का यथार्थवादी आकलन किया गया है। मानवीय चेतना को झकझोरने वाले अनुभवों के साथ संदेश देने वाले कुछ वाक्य मन से विलग नहीं होते हैं।

पुस्तक में पृष्ठ संख्या 48 पर कोविड हाहाकार..में लिखित पंक्तियाॅं पढ़कर मन उद्वेलन से भर गया – राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कोविड-19 महामारी के दौरान एक लाख से अधिक बच्चों ने अपने माता-पिता में से एक या दोनों को खो दिया है। न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने राज्यों से सक्रिय कदम उठाने को कहा । अदालत ने कहा, “उन बच्चों की पहचान करें जिन्होंने दोनों या एक माता या पिता को खो दिया है, संकटग्रस्त बच्चों की जरूरतों का पता लगाने के लिए यह एक जरूरी प्रारंभिक बिंदु है।”

ऐसी तमाम बातें आम आदमी को पता ही नहीं हैं। पुस्तक पढ़कर यह भी स्पष्ट होता है कि सरकार किसी भी समस्या से निपटने की तैयारी भी करती है तथा हर ओर अपनी पैनी नज़र रखती है। भविष्य में आम जनता/छात्र-छात्राओं के लिए यह पुस्तक बहुत उपयोगी सिद्ध होगी। क्योंकि लेखक की खोजी दृष्टि से सरकार द्वारा किए कोई कार्य बच नहीं पाए हैं। अमूमन लोगों को इतनी जानकारी होती ही नहीं है कि सरकार या अदालत भी कुछ सहयोग करती है। पुस्तक के अंत में सिख गुरुद्वारा कमेटी, अरदास केन्द्रों तथा छोटी बड़ी व्यक्तिगत संस्थाओं द्वारा की गई मदद की चर्चा समाज के लिए बहुत उपयोगी है। मन यह सोचकर शांत हुआ कि इंसानियत अभी जिंदा है और आगे भी ज़िदा रहेगी। समाज इतना बुरा नहीं हुआ है जितनी बुराई होती है। मानव मानव की पीड़ा समझे तथा बाॅंटे यह किसी भी समाज के उत्थान का संकेत है।

अंत में मैं लेखक को धन्यवाद देना चाहूॅंगी कि उनके सफल तथा सजग प्रयासों के कारण एक सार्थक पुस्तक हम सबके समक्ष है। यदि बात त्रुटियों की करें तो मुझे पुस्तक में न तो कुछ अतिरिक्त लगा, न फर्जी लगा। वर्तनी का भी पूरा ध्यान रखा गया है। बहुत कम ऐसा होता है जबकि कोई पुस्तक इतने गंभीर विषय को समेटने के बावजूद रोचक बनी रहे। भविष्य में भी ऐसी पुस्तकें पढ़ने को मिलेंगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

मैं सफदर हाशमी साहब की इन पंक्तियों के साथ अपने विचारों को विराम देती हूॅं-
सफदर हाशमी कहते हैं-

किताबें करती हैं बातें
बीते ज़मानों की
दुनिया की, इंसानों की
आज की, कल की
एक-एक पल की
ख़ुशियों की, ग़मों की
फूलों की, बमों की
जीत की, हार की
प्यार की, मार की
क्या तुम नहीं सुनोगे
इन किताबों की बातें?
किताबें कुछ कहना चाहती हैं।
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं॥

रश्मि ‘लहर’
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
मोबाइल -9794473806

एक समीक्षा | पुस्तक अठारह पग चिन्ह | पुष्पा श्रीवास्तव ‘शैली’ | रश्मि लहर

एक समीक्षा
पुस्तक अठारह पग चिन्ह
लेखिका** आदरणीया रश्मि लहर जी
पृष्ठ*95 मूल्य ₹150/
प्रकाशन * बोधि प्रकाशन
Isbn:9789355367945
सी *8,इक्षुपुरी कॉलोनी,लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
मो• 917565001657

‘अठारह पग चिन्ह’

“तुम्हे देखा नहींं लेकिन नज़र में बस गए हो तुम,
ये सच है हॅंसी की सुरमई सी लालिमा हो तुम।”

बड़ी रोचक बात है कि हमने एक-दूसरे को अभी तक देखा नहीं है ,लेकिन विश्वास की नदी का प्रवाह गति के साथ अविरल है।
पंक्तियाॅं उकेरते हुए मन आह्लादित हो उठा।

मेरी प्रिय सखी रश्मि ‘लहर’ जी का कहानी संग्रह ‘अठारह पग चिन्ह’ हाथ में आते ही अथाह प्रसन्नता हुई।

जीवन-लहरों से अंजुरी भर अनुभवों को बटोरते हुए, शब्दों के माध्यम से कागज पर उकेरते हुए, हृदय पर अंकित कर देने का अद्भुत प्रयास कहानीकार की लेखनी को शीर्ष पर विराजमान कर देता है।

‘अठारह पग चिन्ह’ नाम को सार्थकता प्रदान करते हुए हर पग पर जीवन का एक चित्र मिलता है। इस यात्रा में कहानीकार और पाठक के बीच का अन्तर समाप्त होता महसूस किया हमने।

आदरणीय माया मृग जी का ये वक्तव्य कि
“ये आपकी कहानियाॅं हैं, सिर्फ कहानीकार की नही” अक्षरशः सत्य सिद्ध होता है।

यात्रा प्रारंभ करते ही ‘लव यू नानी’
पत्र के माध्यम से बड़ा ही मजबूत संदेश देती हुई कहानी मन को भाव विभोर कर जाती है।

‘करवा चौथ’ जैसी कहानी मानवता के दायित्व का निर्वहन दर्शाती है।आगे बढ़ते हुए पुनः जीवन के बीच से उभर कर मन को आह्लादित कर देती है।

कहानी ‘प्रेम के रिश्ते’ में पर शोएब चचा कोरोना जैसी महामारी को भी अपने दायित्व के बीच नहीं आने देते। मानवता की मशाल जलाते हुए यह कहानी समाज को एक सीख दे जाती है।

‘बावरी’ को पढ़ते हुए ऑंख भर आती है, स्वतः एक चित्र मस्तिष्क पर खिंच जाता है।हृदय चीख उठता है।

अनुत्तरित प्रेम के दीप के रूप में ‘अनमोल’
कहानी निरंतर मद्धम लौ की तरह प्रकाशित होते रहने का पर्याय है।

ममता का सिंधु समेटे समाधान के साथ खड़ी हो जाती हैं ‘अम्मा’।

‘अचानक’ कहानी को पढ़ते वक्त मन तीन स्थान पर ठहरता है।

पहला कि नकारात्मकता गुंडो के रूप में समाज में अवसर मिलते ही हावी हो जाती है।
दूसरा दादी के रूप में दूसरे की पीड़ा को न समझने वाले लोग। और तीसरा संकल्प और संकल्प की माॅं ,जो रूढ़ियों को तोड़ते हुए सुलभा की पीड़ा में दुखी हैं, और सुलभा से विवाह करने के लिए अड़े हुए हैं। यह कहानी समाज के बीच पथ प्रदर्शिका का कार्य करती है। कहानीकार और लेखनी दोनो को
साधुवाद।

‘असली उत्सव’, ‘अद्भुत डॉक्टर’, ‘तेरी बिंदिया रे’ सभी कहानियाॅं पाठक को बाॅंधें रखने में समर्थ हैं।

धीरे-धीरे कदम रखते हुए ‘लव यू गौरव’ और ‘गुलगुले’ पर ठहरना पड़ जाता है।

मां की ममता और संवेदना की लहर थामे नहीं थमती है। कहानी समाप्त होते-होते नेत्रों का बाॅंध टूट जाता है, और ऑंसू रूपी गुलगुले बिखर जाते हैं।

प्रणाम करती हूॅं कहानीकार की अंजुरी को जिसमें भावनाओं के पुष्प एक गुच्छ के रूप में एक साथ समाहित हैं।

‘अतीत के दस्तावेज’ में आज के स्वार्थी संतानों की लालची और विकृत मानसिकता को उधेड़ने का सार्थक प्रयास करते हुए नज़र आती है लेखनी।

‘शिरीष’, ‘संयोग’ और ‘कैसे-कैसे दु:ख’ के माध्यम से जीवन के बड़े नाज़ुक पहलुओं को छूने का प्रयास किया है कहानीकार ने।

एक के बाद एक सभी कहानियाॅं भावनात्मकता का सजीव निर्वाह करती हैं।प्रवाहमयता के साथ-साथ पाठक को अपने में डुबा लेने का अद्भुत सामर्थ्य है इन कहानियों में।

ये समाज के बीच ज्वलंत प्रश्नों को उठाती हैं, और समाधान भी प्रस्तुत करती हैं तथा अंत में उद्देश्य परक संदेश प्रेषित करते हुए सार्थकता को पोषित करती हैं।

मैं ‘अठारह पग चिन्ह’ कहानी संग्रह की सफलता की कामना करती हुई प्रिय मित्र रश्मि ‘लहर’ जी की लेखनी और भावों की सरिता का आचमन करते हुए प्रणाम करती हूॅं।

पुष्पा श्रीवास्तव ‘शैली’
रायबरेली

फिर वो एक दिन | पुस्तक समीक्षा | कंचन सौरव मिस्सर

लेखिका “कंचन सौरव मिस्सर” जी की पहली किताब “और फिर वो एक दिन” एक ऐसी कहानी है, जिसके माध्यम से लेखिका यह बताने की कोशिश करती हैं कि मन से की हुई प्रार्थना हमेशा स्वीकार होती हैं।

ये कहानी एक ऐसी लड़की की है जो सुंदर न हो कर भी एक सुंदर पति के सपने देखती है। लोगों की बातों के बोझ के तले दबे एक ऐसे इंसान की खोज में है, जो उसे इन सबसे दूर उसे सपनों के घर में ले जाए, जहां वो उसके साथ हमेशा खुश रहे। इस कहानी के माध्यम से लेखिका यह बताने की कोशिश करती है कि मन से की हुई प्रार्थना हमेशा स्वीकार होती है और उसका जवाब भगवान देते ज़रूर हैं।

वो कहती हैं कि “बचपन से ही कुछ कर गुजरने की चाहत आज इस किताब से शुरू हुई है।” उन्होंने किताब के पहले पन्ने पर अपने जीवन के कुछ खास लोगों का आभार व्यक्त किया है; जिसमे सबसे पहले ईश्वर को और फिर अपनी प्यारी दादी कृष्णा शर्मा, माता पूजा शर्मा और पिता श्री विजय शर्मा का भी आभार व्यक्त किया। उनका मानना है कि इनके बिना किताब लिख पाना संभव नहीं था।

किताब के बारे में

“और फिर वो एक दिन” किताब एक ऐसा उपन्यास है जिसमे नायिका को कम खूबसूरत और कम आकर्षक दिखाया गया है। जो कि अमूमन समाज में ऐसा होता है और ये हमारे समाज की आम सी कहानी है। ऐसी कहानी जो फिसलते वक़्त की रेत पर ज़िंदगी के कुछ कहे-अनकहे एहसासों को बयां करती है।

पुरानी रूढ़िवादिता के चलते यह सोच धारणा बन गयी है कि व्यक्ति विशेष का खूबसूरत होना ज़रूरी है। फिर उसकी ‘सीरत’ का ज़िक्र बाद में आता है।

यह किताब एक ऐसी ही लड़की की कहानी है जो अपने बाहरी रूप से सुंदर न होने पर भी विवाह के ऊँचे ख़्वाब सजा लेती है।

अब उसके यह ख़्वाब पूरे होते है या नही !
क्या-क्या मुश्किलें आती है ?
यही ख़्वाब पूरे होने की यात्रा का वर्णन मिलता है इस पुस्तक में।

ये किताब एक ऐसी लड़की के सपने हैं जो एक खूबसूरत हमसफर की तलाश में है। किताब को Aelin Publishers ने प्रकाशित किया है।
किताब अमेज़न पर उपलब्ध है।

अमेज़न पर यहां से खरीदें: https://amzn.to/3LW2Cfj

फ्लिप्कार्ट पर यहां प्राप्त करें: https://dl.flipkart.com/s/gfJicZuuuN

इस किताब “और फिर वो एक दिन” की अमेज़न पर बहुत अच्छी समीक्षाएं प्राप्त हो रही हैं।

एक समीक्षक “पवन दुबे जी” इस किताब के बारे में अमेज़न पर लिखते हैं कि…

“Positive approach के साथ लिखी गयी किताब है।
लेखिका के लिखे शब्दों की सकारात्मकता पढ़ने पर आप तक भी पहुँचेगी। अच्छी पुस्तक है। नए लेखकों की किताबें पढ़ना ही चाहिए।”

“कंचन सौरव मिस्सर” जी की पहली किताब “और फिर वो एक दिन” एक ऐसी कहानी है, जिसके माध्यम से लेखिका यह बताने की कोशिश करती हैं कि मन से की हुई प्रार्थना हमेशा स्वीकार होती हैं।ये कहानी एक ऐसी लड़की की है जो सुंदर न हो कर भी एक सुंदर पति के सपने देखती है। लोगों की बातों के बोझ के तले दबे एक ऐसे इंसान की खोज में है, जो उसे इन सबसे दूर उसे सपनों के घर में ले जाए, जहां वो उसके साथ हमेशा खुश रहे। इस कहानी के माध्यम से लेखिका यह बताने की कोशिश करती है कि मन से की हुई प्रार्थना हमेशा स्वीकार होती है और उसका जवाब भगवान देते ज़रूर हैं।वो कहती हैं कि “बचपन से ही कुछ कर गुजरने की चाहत आज इस किताब से शुरू हुई है।” उन्होंने किताब के पहले पन्ने पर अपने जीवन के कुछ खास लोगों का आभार व्यक्त किया है; जिसमे सबसे पहले ईश्वर को और फिर अपनी प्यारी दादी कृष्णा शर्मा, माता पूजा शर्मा और पिता श्री विजय शर्मा का भी आभार व्यक्त किया। उनका मानना है कि इनके बिना किताब लिख पाना संभव नहीं था।किताब के बारे में।”और फिर वो एक दिन” किताब एक ऐसा उपन्यास है जिसमे नायिका को कम खूबसूरत और कम आकर्षक दिखाया गया है। जो कि अमूमन समाज में ऐसा होता है और ये हमारे समाज की आम सी कहानी है। ऐसी कहानी जो फिसलते वक़्त की रेत पर ज़िंदगी के कुछ कहे-अनकहे एहसासों को बयां करती है। पुरानी रूढ़िवादिता के चलते यह सोच धारणा बन गयी है कि व्यक्ति विशेष का खूबसूरत होना ज़रूरी है। फिर उसकी ‘सीरत’ का ज़िक्र बाद में आता है।यह किताब एक ऐसी ही लड़की की कहानी है जो अपने बाहरी रूप से सुंदर न होने पर भी विवाह के ऊँचे ख़्वाब सजा लेती है।अब उसके यह ख़्वाब पूरे होते है या नही !क्या-क्या मुश्किलें आती है ?यही ख़्वाब पूरे होने की यात्रा का वर्णन मिलता है इस पुस्तक में।ये किताब एक ऐसी लड़की के सपने हैं जो एक खूबसूरत हमसफर की तलाश में है। किताब को Aelin Publishers ने प्रकाशित किया है। किताब अमेज़न पर उपलब्ध है। अमेज़न पर यहां से खरीदें: https://amzn.to/3LW2Cfjइस किताब “और फिर वो एक दिन” की अमेज़न पर बहुत अच्छी समीक्षाएं प्राप्त हो रही हैं। एक समीक्षक “पवन दुबे जी” इस किताब के बारे में अमेज़न पर लिखते हैं कि…”Positive approach के साथ लिखी गयी किताब है।लेखिका के लिखे शब्दों की सकारात्मकता पढ़ने पर आप तक भी पहुँचेगी। अच्छी पुस्तक है। नए लेखकों की किताबें पढ़ना ही चाहिए।”

उड़ मन पाखी | पुस्तक समीक्षा | विजया गुप्ता | रश्मि लहर

उड़ मन पाखी – कविता संग्रह
कवयित्री – विजया गुप्ता
सहज प्रकाशन
113- लालबाग गांधी कालोनी, मुजफ्फरनगर
प्रथम संस्करण – 2019
मुद्रक : पब्लिश प्वाइंट – मुजफ्फरनगर
मूल्य : 300 रूपये

रश्मि लहर

सौम्य, सहज और सरल व्यक्तित्व की स्वामिनी आदरणीय विजया गुप्ता दीदी की पुस्तक ‘उड़ मन पाखी’ पढ़ने का सुखद अवसर मिला | 48 अविस्मरणीय कविताओं का संग्रह, जिसमें प्ररोचना के माध्यम से श्रद्धेय श्री उमाकान्त शुक्ल जी के विचारों से जुड़नें का भी सौभाग्य मिला। कुछ पुस्तके इतनी अच्छी होती हैं कि पढ़ते-पढ़ते एक अदभुत स्नेह-भाव हृदय-तल को सहला जाता है और मन स्निग्धता से भरा मिलता है। इस पुस्तक को पढ़ते-पढ़ते लगा जैसे साहित्याकाश का एक उज्जवल तारा मेरे अन्तर्मन को प्रकाशित कर गया।


प्रथम रचना “माँ भारती” ..
श्वेतवसन धारिणी
कलिमल तिमिर हारिणी…
ज्ञान को विस्तार दो |
पढ़कर मन प्रसन्न हो गया।
अभिव्यक्ति निर्बाध हो
शब्द प्रवाह अबाध हो

जैसे भाव समेटे रचना संपूर्णता के साथ माँ भारती से जोड़ती गई।

इसी प्रकार कविता ‘प्रेम’ की पहली पक्ति पढ़कर ही मन प्रकृति की कोमलता में खो गया… “मखमली दूब पर पड़ी ओस सी फूलों से लदी जल सी”

अनुपम शब्द गठन..ज्यों-ज्यों कविता पढ़ते गए …मन पुलकित होता गया। कवयित्री का भोला मन हर कविता में एक नये भाव के साथ सुसज्जित मिला | इतना भावपूर्ण लेखन पढ़कर मन मुदित हो गया।

“नभ के नयनों से बूंद गिरी” (मधुर-मिलन) या “मन बुनकर बुनने लगा ताने –बाने” (नेह-निमंत्रण)

कलात्मक बिंब सहेजे पक्तियाँ भला किसे नहीं मोह लेंगी | अद्भुत भाव सॅंजोए ये रचनाएँ सहज ही मनसपटल पर अंकित हो जाती हैं |
इस संग्रह में जहां नारी-विमर्श के स्वर हैं तो वहीं इंसानियत को भी विभिन्न रूपों से शब्दों में बांधने का प्रयास किया गया है | कविताओं का मनोरम गुलदस्ता स्मृतिपरक, प्रकृतिपरक तथा जीवन के विभिन्न रूपों से जुड़ी रचनाओं के पुष्पों से महक उठा है | इन कविताओं के माध्यम से कवयित्री पाठक को मानव-जीवन से बाॅंधे रखने में सफल रही हैं | “सुन रे कागा” हो या “एक कोना वतन का” हर कविता में एक संदेश छुपा है। निःसंदेह यह कृति कवयित्री की साहित्यिक परिपक्वता को एक नया आयाम दे पाने में सफल हुई है | कविता ‘साधना’ हो या ‘दंभ’, ‘चिर सनातन हो’ या ‘हे राम!’ मात्र मनभावन ही नहीं हैं बल्कि जीवन को प्रेरणा से भी भरती हैं। जैसे ‘ऐसे थे ताऊ जी’ वाली कविता को ही देखिए, उस समय की दिनचर्या को कवयित्री ने कितनी मधुरता से व्यक्त कर दिया है। पढ़कर लगा जैसे उसी युग में पहुॅंच गये। इसी प्रकार


‘आल्हा ऊदल गोरा बादल’
‘कुॅंवर दे, फूलन दे’..
‘द्रौपदी का चीरहरण’


जैसी रचनाओं में अतीत की प्रेरणादाई स्मृतियों को कितने सहज भाव से अभिव्यक्त कर दिया गया है। एक अन्य कविता में कवयित्री के प्रश्न पर “बताओ मुझे कब तक चलता रहेगा यह सिलसिला यूं ही” पाठक सोचने पर मजबूर हो जाता है। कुछ रचनाएं यर्थाथ पर चिंतन करने को विवश करती हैं। जैसे ‘धरतीपुत्र’ में पात्र जब “पत्नी की बाली बनवाऊंगा” सोचता है तो अनायास ही उसके सपने स्वयं से जुड़े प्रतीत होने लगते हैं।

पुस्तक का शीर्षक तथा मुख पृष्ठ भी सार्थकता से रचा गया है। इसके साथ ही पुस्तक में इनकी पहली पुस्तक पर पाठकों की जो प्रतिक्रियाएं हैं वो भी लाजवाब हैं | ये प्रतिक्रियाएं एक तरफ कवयित्री की लोकप्रियता का बोध कराती हैं वहीं दूसरी तरफ नैसर्गिक सामाजिकता समेटे रचनाओं से परिचय भी कराती हैं |

कविताओं की दुनिया बहुत अनोखी होती है | इतनी मोहक कविताएं रच जाती हैं कि पाठक पढ़कर चकित रह जाता है।

अंत में मैं यही कहूॅंगी कि इस उत्कृष्ट पुस्तक में जहाॅं माधुर्यता का भाव सहेजे अलंकार युक्त रचनाएं हैं, वहीं समाज के कुरूप चेहरे पर भी कटाक्ष किया गया है, जिनमें समाज को झकझोरने की पूरी ताक़त है।


रश्मि लहर
लखनऊ, उत्तर प्रदेश

सविता चडडा की प्रिय कविताएं- भावपूर्ण अभिव्यक्ति और अद्भुत भावनाओं का संगम है ये काव्य संग्रह : डाॅ कल्पना पाडेंय

सविता चड्ढा के बारे में कुछ कहना छोटा मुंह बड़ी बात होगी । आप संघर्षों की एक जीता- जागता मिसाल हैं। जीवन में आपने कड़वे, खट्टे- मीठे अनुभवों को जिया है पर बांटा सिर्फ़ सुखों को है। आज बहुत ही प्रेम से, आशीर्वाद के रूप में आपने मुझे अपनी कविताओं की पुस्तक ‘ मेरी प्रिय कविताएं’ उपहार में दीं।

मेरी प्रिय कविताएं’

मेरे में इतना सामर्थ्य नहीं कि मैं आपकी कविताओं की समीक्षा कर सकूं पर हां! अपने अंतर्मन की बात कहना चाहती हूं जो मुझे आपकी रचनाओं को पढ़ने के बाद महसूस हुआ।

सबसे पहले मैं बात करती हूं पुस्तक के आवरण की। जैसी सौम्यता, सरलता, चिंतन में डूबा व्यक्तित्व आपका दिखाई देता है उसी का सम्मोहक प्रतिबिंब  पृष्ठ की शोभा बढ़ा रहा है और उसी का प्रभाव आपकी रचनाओं में भी नज़र आता है। कहते हैं जैसी आप की सोच होगी वैसे ही आपके आचार और विचार भी होंगे। पुस्तक की प्रथम रचना ‘सुख का गुलाब’ जीवन में सकारात्मकता की प्रथम सीढ़ी है। आदरणीया सविता जी ने प्रथम रचना से ही जीवन के लक्ष्य को इंगित किया है। संसार में रहते हुए मुसीबतों के भंवर में डूबते-उतराते हुए भी आनंद के उस एक पल को प्राप्त कर ही लेना है जिसकी सभी को चाह होती है। कवयित्री ने इस रचना के माध्यम से जीवन में हमेशा सुखों के यानी अच्छे संस्कारों के बीज बोकर अच्छाइयों को बढ़ाने की बात की है।  जिस दिन अच्छे कर्म नहीं किए वह दिन बेकार गया। बहुत ही ख़ूबसूरत सोच है आपकी।

सामाजिक जीवन में पल-पल के अनुभवों को आपने सीख के रूप में अपनी रचनाओं में संवारा है। नेकी कर दरिया में डाल की उक्ति को रचनाओं में जीवंत करने का सुंदर प्रयास किया है। संभव है, परिवर्तन निश्चित है, अब पहचान ज़रूरी है, मिल जाती है मंज़िल, जैसी रचनाएं जीवन में उदासी, निराशा से हिम्मत नहीं हारने और डटकर उनसे संघर्ष करने की सीख देती हैं । अपने पर भरोसा और विश्वास करने की सीख देते हुए आपकी रचना ‘उठना होगा’ अंतर्मन में आत्मविश्वास का भाव भरती है।

वर्ग-भेद आज भी समाज को किस क़दर लहूलुहान कर रहा है इसकी पीड़ा और संवेदना अमीरी-गरीबी और बहुत दुख होता है जैसी रचनाएं उसके मर्म को अपने अंदर समेटे हुए हैं। शिक्षा जीवन को संवारने का अद्भुत शस्त्र है। ‘मोची’ कविता के माध्यम से शिक्षा को, जीवन को सुंदर बनाने के लिए अचूक वरदान कहा है और अशिक्षा जीवन स्तर को श्रेष्ठ बनाने में बहुत बड़ा अवरोध है। बच्चे भविष्य का कर्णधार हैं ।शिक्षा उनके लिए अनमोल ख़जाना है जो उनके जीवन में उजाला और चमक भर सकता है। आज भी समाज में बचपन, भूख प्यास की तड़प से बेहाल और शरीर अर्धनग्न क्यों है ? बहुत ही ज्वलंत प्रश्न ‘ये बच्चे हैं किसका भविष्य’ के माध्यम से सभी के दिलों को झकझोर देता है। जहां मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो वहां शिक्षा मात्र एक दिखावा हो जाती है। समाज को अपने ऐसे अंधकारपूर्ण भविष्य के प्रति सचेत करती आपकी रचना एक मुखर संदेश देती है।

 ‘मां’, ‘मां की खुशबू के लिए ‘, ‘स्त्री का घर’ ‘भारत में जन्मी नार हूं’ रचनाएं संपूर्ण स्त्री जाति के सम्मान, स्वाभिमान के प्रति आपकी कटिबद्धता का प्रतिबिंब हैं। अपने स्त्रीत्व की पहचान और सम्मान के लिए स्त्री स्वयं ज़िम्मेदार है। स्त्री और पुरुष रथ के दो पहिए हैं। जिस तरह पुरुष के अस्तित्व में, उसके सम्मान में, उसके स्वत्व में वह स्वतंत्र है उसी तरह  एक खबर और, आज़ाद औरत कविता संदेश देती है कि स्त्री को समाज में पहचान स्थापित करने के लिए किसी सहारे की ज़रूरत नहीं। अत्याचारों को सहने, विवश रहने वाली स्त्रियों को ‘भली औरत’ की संज्ञा देने वाले समाज की कुंठित मानसिकता आज भी ज़िंदा है।

सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार को आपने खुली चुनौती दी है। कुछ सरकारी नौकर तरह-तरह की सुख – सुविधाओं का उपभोग करते हुए सिर्फ़ अपनी ज़िंदगी के मज़े उठाते हैं बल्कि समाज की जिस सेवा के लिए उन्हें ज़िम्मेदारी दी गई है उसे भूल कर वे बाकी सारे काम करते हैं।  ‘दफ्त़रों में’ ‘आओ बनाएं’ कविता के माध्यम से भ्रष्टाचार में डूबे हुए ऐसे ही सरकारी वातावरण और समाज के विकास नाम पर अधर में लटकी परियोजनाओं और अधिकारियों का उनके प्रति संवेदनहीनता का यथार्थ चित्रण कर समाज की चेतना को जगाने का प्रयास किया है। 

आपसी रिश्तों- संबंधों की मज़बूती, उनमें आई दरार को प्रेम से भरने ,अविश्वास को भरोसे में बदलने, जीवन में विनम्रता को अपनाने के प्रति आप सदैव तत्पर हैं। ‘अपनों को अपनों से’, ‘दो रास्ते’, ‘किवाड़ खोलने होंगे’, ‘हाव भाव और व्यवहार’, ‘क्षमा करना’, ‘मां -बेटी’, ‘दिल बचाना सीखिए’ जैसी रचनाएं अनेक सुंदर और भावपूर्ण अभिव्यक्तियों से सराबोर हैं आपकी ये अद्भुत पुस्तक भावनाओं का संगम है।

जीवन में संस्कारों का मूल्य, उनका योगदान ,एक परिपूर्ण व्यक्तित्व के लिए नितांत अपरिहार्य है। अच्छे और सुंदर संस्कार न केवल मानसिक सोच में संतुलन और ठहराव लाते हैं बल्कि विपरीत परिस्थितियों का आकलन भी बड़ी ही गहराई व समझदारीपूर्ण ढंग से करते हैं। ‘अपने जीवन से निरर्थकता कम कर लें’, ‘शुभ कर्म ही साथी’, ‘क्षमा करना’, ‘आज से समुद्र हो जा’, ‘अपनी सुगंध’, जैसी कविताओं में आपने अपनी इसी सोच को न केवल परिभाषित किया बल्कि जीवन में सुंदर और अच्छे संस्कारों के प्रभावों को सिद्ध भी किया।

जीवन के प्रति आपका नज़रिया बहुत ही स्पष्ट है। जीवन की हर परिस्थिति को आपने अनुभवों का अथाह सागर माना है। ज़िंदगी में हर पल, हर क्षण जो भी घटित होता है, अनुभव किया जाता है, उससे चिंतन की, परखने की प्रवृत्ति प्रखर हो जाती है। जीवन के लक्ष्य को निर्धारित करते हुए आपने उसे मंथन की एक सतत् प्रक्रिया माना है। एकात्म, सर्वोपरि है मन, दूजे को दुख देने से अपना सुख कम होता है, चलते रहना है, हवा बन जाओ, दृष्टि में बदलाव, जीवन बोध, कविता में सार्थक जीवन जीने के लिए हर पल उसमें मिठास भरते रहने को एक सुंदर पैगाम भरा कदम कहा है।

अच्छाइयों को अगर कोई आपकी कमी समझने लगे तो चुप रहना कवयित्री को कतई बर्दाश्त नहीं। अनाचार को सहना, उसे बढ़ावा देना है। सच को सच बोलना और झूठ के आगे झुकना नहीं यही आपकी जीवनशैली है जो आपकी रचनाओं में आपके व्यक्तित्व को बखूबी प्रदर्शित करती है। हाथ में कलम, खुद से रिश्ता, क्यों डरे, बस यह कहना है, अब तैयारी है,। चुप ही रहने से कुछ नहीं होगा , सच-सच आपके जीवन में इन पहलुओं के प्रति आपकी तटस्थता के प्रतिबिंब हैं।

जिस मिट्टी में हमारा जन्म हुआ है हम उसके ऋणी हैं। उसके प्रति हमारा कर्तव्य सदैव आभार व्यक्त करने वाले होना चाहिए । धड़कनों में वो जज़्बा होना चाहिए जो मर मिटने पर भी उफ़ तक न करे। आपकी धमनियों और शिराओं में लहू का हर क़तरा देश -प्रेम से ओतप्रोत है। राष्ट्र के प्रति समर्पित आप हर स्थिति में राष्ट्र के लिए कुर्बान होने को तत्पर हैं। ऐसी सच्ची साहित्यकारा, समाजसेविका, कर्तव्यनिष्ठ, उदारता की पराकाष्ठा, असीम प्रेम से परिपूर्ण आदरणीया सविता जी को उनके इस महान यज्ञ को, उनकी सुंदर पंक्तियों को, उनकी इस सुंदर पुस्तक को मैं सादर नमन करती हूं। दिल से आपको बधाई देती हूं । नि:संदेह समाज को प्रेरित करती आपकी यह पुस्तक सभी के मन को छू जाएगी।

डॉ. कल्पना पाण्डेय ‘नवग्रह’

म.न.- 9ए/बी12ए, धवलगिरी अपार्टमेंट्स

सेक्टर 34, नोएडा

गौतम बुद्धनगर, उत्तर प्रदेश

पिन-201307

मोबाइल नंबर- 9717966464

मान्यताओं पर करारा प्रहार करता उपन्यास | बुझाए न बुझे

मान्यताओं पर करारा प्रहार करता उपन्यास-: बुझाए न बुझे

उपन्यास का शीर्षक मिर्जा गालिब की शेर के अंश से लिया गया है और बीच-बीच में मिर्जा गालिब साहब की शायरी को जगह-जगह स्थान दिया गया है साथ ही हिंदुस्तान और हिंदुस्तान के बाहर के विद्वानों की उक्तियों से सजाया गया है और उपन्यास का अंत सुकरात की पंक्ति से किया गया है।

उपन्यास का आनंद लेने के लिए आपको वकालत छोड़नी होगी और जज की कुर्सी संभालनी होगी तभी आप उपन्यास का का आनन्द ले सकते हैं। 31 खंडों में विभक्त उपन्यास के तीसरे खंड में ही हिन्दू धर्म या कहें ब्राह्मणवाद करारा प्रहार किया गया है जिससे आपको लगेगा कि लेखक या तो नास्तिक है या हिन्दू धर्म से इतर धर्म मानने वाला है। एक बानगी स्वामी जी के शब्दों में-‘ अपनी दुकानदारी चलाने के लिए हमारे पूर्वजों को राक्षस बता दिया।’ श्लोकों को विज्ञापन करार दिया। इसी तरह स्वामी जी का कथन है-‘ धर्म बेचों, बगैर लागत के इससे ज्यादा लाभकारी दूसरा धंधा नहीं है । इसके साथ उपन्यास हिंदू धर्म के गूढ़ रहस्यों की जानकारी दी गई है जिसके बारे में केवल विशिष्ट पंडितों या विद्वानों को ही पता है।

अगला पक्ष है स्त्री, जिसमें नैतिकता मर्यादा और विभिन्न धर्मों के सहारे स्त्री को गुलाम बनाने का हर संभव प्रयास किया गया है इसके बाद भी स्त्री सर उठाने की कोशिश की गई तो प्रेम और सुरक्षा के नाम पर उसके पैरों में बेड़ियां डाल दी गई। यहां तक कि विवाह को भी गुलाम बनाने का तरीका कहा गया है और एक कड़वा सच ये भी स्वीकार किया गया कि स्त्री को कोठा चलाने की अनुमति है समाज में तांगा चलाने की नहीं।

इसका दूसरा पक्ष भी है जिसे आप त्रिया चरित्र कह सकते हैं। जैसे छेड़छाड़ या बलात्कार का झूठ आरोप लगाना , दहेज प्रथा का झूठा आरोप लगाकर ससुराल पक्ष को पूरी तरह बर्बाद कर के खुद अपने पुराने या नये आशिक से विवाह करना या खुद यौन संबंधों के लिए उकसाना और बाद में ब्लैकमेल करना।

समाज को एक नई दिशा देता और पठनीय व संग्रहणीय उपन्यास के लेखक को बधाई।

समीक्षक– उदय राज वर्मा उदय
पुस्तक – बुझाए न बुझे ( उपन्यास)
लेखक– निमिष अग्रवाल
प्रकाशक– हिन्द युग्म ब्लू
मूल्य– 150/
पृष्ठ – 200

गुलशेर अहमद का कहानी संग्रह “रेलवे स्टेशन की कुर्सी”, एक अत्यंत हॄदय-स्पर्शी एवं मार्मिक कहानियों की किताब

गुलशेर अहमद का कहानी संग्रह “रेलवे स्टेशन की कुर्सी”, एक अत्यंत हॄदय-स्पर्शी एवं मार्मिक कहानियों की किताब 

लिखना मुझे अच्छा लगता है। कविताएँ, कहानियाँ, शायरी… लिखते-लिखते एक दिन मेरे ज़ेहन में आया कि कहानियों को किताब की शक्ल में लोगों तक पहुँचाना चाहिए। दोस्त ने कहा – “यार तू तो बढ़िया लिखता है। तेरी कहानियों की किताब तो आनी ही चाहिए।” बस फिर क्या था हम फूल के गुब्बारा हो गए और फुला-फुला कर “थैंक यू” बोलते रहे।

दोस्त होते ही ऐसे हैं। ख़ैर…मैंने मेरी कहानियों को लिखा और जब एक संग्रह की तरह हो गई तो मुझे भी लगा कि किताब की शक्ल में लोगों तक पहुँचनी चाहिए। और दोस्त की प्रशंसा से ओथ-पोथ मैं लग गया इसके फेरे में। जहाँ कहीं भी, कुछ भी जानकारी मिलती लपेटने लगे। समेटते रहें और समझते रहें।

कुछ पब्लिशर्स को भेजा। कई पब्लिशर्स ने माना किया। कुछ ने टाईम का अभाव बताया और कुछ ने साफ कह दिया कि नहीं छाप सकते तो कुछ ने मेल का रिप्लाई करना भी मुनासिब नहीं समझा। इसी में से “राजमंगल प्रकाशन” ने इसे छापने की हामी भर दी और एक साल दो महीने के इंतज़ार के बाद आज किताब किंडल वर्जन में अमेज़न पर उपलब्ध हो चुकी है।

 
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“रेलवे स्टेशन की कुर्सी” किताब के बारे में

किताब के बारे में बताना चाहूँगा कि ये समाज की बात करती है। समाज में फैले असमानताओं की बात करती है। पढ़े लिखे और अनपढ़ लोगों के बीच की समानताओं की बात करती है। बाप-बेटे के ज़िन्दगी की बात करती है। दोनों के रिश्तों की बात करती है। दोस्ती और प्रेम की बात करती है। और भी बहुत कुछ….
 
मैंने कहानियाँ लिखी और अब किताब की शक्ल भी ले चुकी है। अभी किताब अमेज़न पर किंडल वर्जन में उपलब्ध है। जल्दी ही पेपर बैक भी ऑनलाइन उपलब्ध हो जाएगी। आप किताब को पढ़ें और अपना फैसला करें कि मैंने इसके साथ कितनी सच्चाई और ईमानदारी के साथ कहानियों को उकेरने में कामयाब हो सका हूँ। क्या में कहानियों के किरदारों के साथ न्याय कर सका हूँ? यदि नहीं भी हुआ हूँ तो आप नकारिए और बताईए मुझे। मुझे बुरा नहीं लगेगा। मैंने अपनी इस छोटी सी जीवन का जो भी अनुभव रहा है उसके हिसाब से इसमें लिखने की कोशिश की है।

लेखक गुलशेर अहमद का  परिचय

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बिहार के सीवान जिले के जमाल हाता गाँव में पैदा हुए। पहले घर पर और गाँव के मदरसे में पढ़ाई शुरू हुई जिससे ऊर्दू सीखा और फिर प्राथमिक और उच्च विद्यालय की पढ़ाई हुई। बचपन से ही स्थानीय भाषा भोजपुरी सीखी। इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन के लिए भोपाल में चार साल रहें।

अहमद कहते हैं कि “जीवन एक दरिया की तरह है और हम सभी एक नाव पर हैं जहाँ कोई भी पतवार नहीं है लेकिन पतवार बनाने के लिए ज्ञान का भण्डार यहाँ अवश्य उपलब्ध है।
हम उससे अपनी नाव खेने का पतवार बना सकते हैं लेकिन खेवय्या प्रकृति ही होगी। हमारी इस जीवन के दरिया का किनारा मृत्यु है।”

आज कल दिल वालों की दिल्ली में निवास स्थल बनाएँ हुए हैं।
अब ये किताब आपकी है। आशा है ये आपको अपनी लगे, अच्छी लगे। इसकी कहानियाँ आपको अपनी लगे। इसके किरदार में आप खुद के देख पाएँ। गुलशेर अहमद  की    वेबसाइट विजिट करने के लिए क्लिक करे 
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गुलशेर अहमद का कहानी संग्रह “रेलवे स्टेशन की कुर्सी”, एक अत्यंत हॄदय-स्पर्शी एवं मार्मिक कहानियों की किताब  कैसी लगी,पसंद आये तो समाजिक मंचो पर शेयर करे इससे रचनाकार का उत्साह बढ़ता है।हिंदीरचनाकर पर अपनी रचना भेजने के लिए व्हाट्सएप्प नंबर 91 94540 02444, 9621313609 संपर्क कर कर सकते है। ईमेल के द्वारा रचना भेजने के लिए  help@hindirachnakar.in सम्पर्क कर सकते है|

 

book review /अञ्जुरी भर प्यास लिये-डॉ. त्रिलोकी सिंह

पुस्तक-समीक्षा

(book review )


कृति : अञ्जुरी भर प्यास लिये
[ गीत-संग्रह]
गीतकार : डाॅ०रसिक किशोर सिंह ‘ नीरज ‘
शिक्षा : एम०ए०,पी-एच०डी०,जी० डी०एम०एम०,एल०एल०बी०
प्रकाशक : आरती प्रकाशन,साहित्य सदन,इन्दिरा नगर-2,नैनीताल।
पृष्ठ संख्या – 120 , मूल्य – 250/=
समीक्षक : डाॅ. त्रिलोकी सिंह


book review : लगभग डेढ़ दर्जन उच्चकोटि की अनुपम कृतियों के प्रणेता डॉ० रसिक किशोर सिंह ‘नीरज’ के विशिष्ट एवं स्तरीय गीतों का संग्रह है- “अञ्जुरी भर प्यास लिए” इस संग्रह में समाविष्ट उनके गीतों में जीवन के विविध रंग दृष्टिगोचर होते हैं, जिनके अवलोकनोपरान्त यह सहज ही कहा जा सकता है कि कृतिकार के उरोदधि में प्रवहमान भावोर्मियाँ गीतों में ढलकर जनमानस की तृषा-तृप्ति हेतु पर्याप्त सक्षम हैं। उन्होंने जीवन के उतार-चढ़ाव, जीवनानुभूतियों, सामाजिक विसंगतियों,परिवार-समाज की विघटनकारी स्थितियों एवं घनिष्ठ सम्बन्धों के मध्य उत्तरोत्तर बढ़ते अन्तराल को बखूबी अपने गीतों में उतार दिया है,जिससे ये गीत पाठकों को मानव-मन की वेदनाओं-संवेदनाओं, कुंठाओं, मनोवृत्तियों की अनुभूति अवश्य कराते हैं। डॉ०नीरज के गीतों में प्रेम है, तो प्रेम की चुभन भी है ; निराशा- हताशा के बीच आशा का संचार भी है; मिथ्या के बीच सत्य का उद्-घाटन भी है; विप्रलम्भ की असह्य वेदना है तो सुखद संयोग का अपरिमित आनन्द भी है; और जीवन-पथ में चुभने वाले शूल हैं तो सुवास विकीर्ण करके अन्तस्तल को प्रमुदित एवं आह्लादित करने वाले सुगन्धित प्रसून भी हैं। इस प्रकार डॉ०नीरज जी के गीत अयस्कान्त की भाँति पाठकों को अपनी आकर्षण-शक्ति से खींच लेते हैं। इतना ही नहीं,हृदयोद्भूत उनके गीत अंतर को तोष व आनन्द प्रदान करने की शक्ति रखते हैं।
वास्तव में डॉ०नीरज जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी तो हैं ही,एक सशक्त, स्तरीय एवं विशिष्ट गीतकार भी हैं, जिन्होंने अपने गीतों के माध्यम से समाज में एक अभिनव जागृति लाने का सार्थक प्रयास किया है। वे समाज की समस्याओं को रेखांकित कर उनका समाधान भी प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने जीवन के आदर्श पक्ष को प्रत्यक्षाप्रत्यक्ष रूप में व्यक्त करने का सफल प्रयास किया है, जिससे मनुष्य दुःखों से उबर कर सुख का अनुभव कर सकता है। कभी उनका भावुक हृदय प्रकृति-क्रोड में क्रीड़ा करने लगता है तो कभी प्रकृति के विनाशकारी कोप से क्षुब्ध हो जाता है। सत्शास्त्रों के अध्येता डॉ०नीरज जी को अनेक भगवत्परायण सन्त- महात्माओं का सान्निध्य प्राप्त होने के कारण उनके गीतों में अध्यात्म का सुखद संस्पर्श भी है मिलता है। उनके कतिपय गीतों में दार्शनिकता के भी दर्शन होते हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ०रसिक किशोर सिंह “नीरज” के सद्यः प्रकाशित आलोच्य गीत-संग्रह-“अञ्जुरी भर प्यास लिये” में विभिन्न विषयों पर केंद्रित कुल 61 गीत और 111 दोहे संगृहीत हैं। परम्परानुसार वाग्देवी सरस्वती-वन्दना के अनन्तर जन-जागरण हेतु वे संकल्पबद्ध होकर नई पीढ़ी को प्रेरित- प्रोत्साहित करते हुए कहते हैं-

नया ओज लेकर सुपथ पर बढ़ें हम
नई सीढ़ियाँ नित प्रगति की चढ़ें हम
नया भाव मनुजत्व का ओजमय हो
बढ़े नव सृजन का नया स्वर गढ़ें हम
( ‘नया जागरण हो नयी रोशनी हो’ गीत से)

भाई-भाई के घनिष्ठ सम्बन्धों में दिन-प्रतिदिन बढ़ रही दूरी एवं मनोमलिनता की झाँकी डॉ०नीरज जी के “भाई ने भाई के तोड़े” शीर्षक गीत में द्रष्टव्य है-

अरमानों को रहे सँजोते,जीवन भर अपने।
भाई ने भाई के तोड़े,क्षण भर में सपने।
अपने एक दोहे में भी वे इसी भाव को व्यक्त करते हुए कहते हैं-
भाई-भाई में ठनी,घर-घर में है द्वन्द्व।
सत्य दिखे कैसे भला,मन के दृग हैं बन्द।।

वास्तव में गीतों में अर्थवत्ता तो होनी ही चाहिए,अन्यथा वे अन्तस्तल का संस्पर्श करने में समर्थ नहीं हो सकते। भावशून्य गीत ना तो मन को तोष प्रदान कर सकते हैं और ना ही जीवन में सकारात्मक परिवर्तन। ठीक इसी भाव पर केंद्रित अपनी निम्नांकित पंक्तियों में डॉक्टर नीरज जी यह सन्देश देते हैं कि गीतों के अर्थ एवं रिश्तो में प्रेम का होना अत्यावश्यक है अन्यथा इनका कोई मूल्य नहीं-

जिन गीतों का अर्थ नहीं कुछ,
व्यर्थ उन्हें फिर गाना क्या?
जिन रिश्तो में प्रीत नहीं उन,
रिश्तों को अपनाना क्या ?
( “जिन गीतों का अर्थ नहीं कुछ”- गीत से उद्धृत)

एक सच्चे प्रेम-पिपासित की भूमिका का निर्वहन करते हुए डॉक्टर नीरज जी ने अपने गीत- “सचमुच प्यार करो” में लिखा है-

तेरे पीछे परछाईं हूँ, मत प्रतिकार करो
जितना प्यार किया है मैंने,उतना प्यार करो।

गीतकार का मन अपनी प्रेयसी के सौन्दर्य में इतना निमग्न हो जाता है कि उसकी प्रेम-पिपासा बढ़ती ही जाती है। गीतकार के शब्दों में-

देख तुम्हारी सुन्दरता को,बढ़ जाती है प्यास
और अधिक अभिलाषाओं की, जग जाती है आस
(“नील गगन की चन्दा जैसी”- शीर्षक गीत से उद्धृत)

डॉक्टर नीरज जी के गीत- “परहित कर कुछ” में स्वहित की संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर परोपकार करने की प्रेरणा तो दी ही गई है, साथ ही जीवन में स्वावलम्बी बनने पर भी बल दिया गया है। इतना ही नहीं,इसी सारगर्भित गीत में दुःख का यथार्थ कारण और उसका निवारण भी है-

अपना और पराया ही तो,दुख का कारण है
दूरी रखना जग से केवल, दुःख निवारण है

डॉ०नीरज राष्ट्रभक्ति की भावना से ओतप्रोत हैं। वे एक स्वाभिमानी शूर की भाँति देश पर कुदृष्टि डालने वाले पाक को चेतावनी देते हुए कहते हैं-

सुनो पाक अब नहीं खिलायेंगे तुमको हम खीर
शेर यहाँ अब दिल्ली में हैं,सेना में हैं वीर
लेके रहेंगे पाक अधिकृत, पूरा ही कश्मीर
राजाओं की शक्ति देख लो, बनकर यहाँ वज़ीर
‘नीरज’ हर अभिमान मिटा दें, टूटेगा यदि धीर
बम भी अपने पास यहाँ पर,हैं अर्जुन के तीर।

(“बँटवारे की झेली हमने पीर”- शीर्षक गीत से उद्धृत)
“जिन्दगी तमाम हुई” शीर्षक गीत में डॉक्टर नीरज जी ने जीवन की तीनों अवस्थाओं-बचपन,यौवन और वार्द्धक्य का यथार्थ चित्रण किया है-

खेल-खेल में बचपन बीता
रंग जवानी में
चढ़ा अनोखा रूप रंग
मन की मनमानी में
गाढ़े दिन दे गया बुढ़ापा
नींद हराम हुई
इसी तरह से तो अपनी
जिन्दगी तमाम हुई ।

सनातन धर्म एवं सत्शास्त्रों में अटूट विश्वास होने के कारण डॉक्टर नीरज जी भी यह स्वीकार करते हैं कि कर्म ही मानव का भूत,वर्तमान और भविष्य निर्धारित करता है। सुकर्म से सुगतिऔर निन्दनीय कर्म से दुर्गति की प्राप्ति होती है।अर्थात् धर्मसम्मत कर्म से जीवन सुखमय होता है तो पाप- कर्मों से मनुष्य दुःख पाता है। इन्हीं भावों पर केन्द्रित उनकी पंक्तियाँ मनुष्य को पाप-कर्म से विरत होने और धर्मयुत् कर्म में रत होने की सत्प्रेरणा देती हैं-

सदा धर्मयुत् कर्म करें हम
तो जीवन है सुखमय होता
पाप-कर्म करने से नीरज
सदा-सदा ही दुख में रोता
धर्म शास्त्र की बातें अपनी
हैं जानी पहचानी
कर्म सजा ले प्राणी ।
(“समरसता आसव को पी ले”- शीर्षक गीत से)

सामाजिक उच्चादर्शों एवं मानवीय मूल्यों के पोषक एवं पक्षधर डॉ०नीरज जी ने सत्य, दया, करुणा, परहित, प्रेम आदि सद्भावों को अपने गीतों में इस प्रकार पिरोया है कि इनसे मानव के अन्तर्मन को एक नई ऊर्जा प्राप्त होती है और वह कलुषता एवं मनोमालिन्य का त्याग कर जीवन- मूल्यों को अपने जीवन में अपनाकर जीवन को कृतकृत्य करने की दिशा में सचेष्ट हो जाता है। वे जन-जन को प्रबोधित करते हुए कहते हैं-

‘नीरज’ अब खुद ही करो चिन्तन और विवेक
मानवता यदि मर गयी क्या सोचोगे नेक?
पाश्चात्य सभ्यता को करें न अंगीकार
सादा जीवन हो यहाँ ऊँचे सदा विचार

book review :निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि “अञ्जुरी भर प्यास लिये” गीत- संग्रह में डाॅ० रसिक किशोर सिंह ‘नीरज’ ने अपने उच्चकोटि के स्तरीय गीतों का संग्रह किया है। उनके सभी गीतों में भावपक्ष की प्रधानता तो है ही,कलात्मक सौष्ठव भी कम नहीं है। भावानुकूल शब्दों के प्रयोग में डॉक्टर नीरज जी पूर्ण दक्ष हैं। उनके भावमय गीतों में तत्सम शब्दों के साथ आवश्यकतानुसार तद्भव व देशज शब्द भी प्रयुक्त हैं ,जिनसे गीतों में सहजता एवं स्वाभाविकता आ गई है। उनके गीत मानव को सन्मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा तो देते ही हैं, जीवन को संस्कारित भी करते हैं। उनके गीतों में अभिव्यक्त लौकिक और अलौकिक प्रेम की पावन सरिता में अवगाहन कर पाठक आत्मविभोर एवं तृप्त हो जाते हैं। अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा एवं रूपकादि अलंकारों की सुन्दर छटा से उनके गीतों की महनीयता में स्वाभाविक रूप से वृद्धि हुई है। इस महार्घता के युग में सुन्दर एवं नयनाभिराम आवरण-पृष्ठ के साथ ग्लेज कागज पर मुद्रित 120 पृष्ठीय विवेच्य कृति का निर्धारित मूल्य अधिक नहीं कहा जा सकता।
अन्त में हम पूर्ण आशान्वित हैं कि डॉक्टर नीरज जी यावज्जीवन ऐसी ही सार्थक कृतियों का प्रणयन कर हिन्दी साहित्य के कोष में अभिवृद्धि करते रहेंगे । हम ऐसे शीर्षस्थ साहित्यकार डॉ०रसिक किशोर सिंह “नीरज” के स्वस्थ व सुदीर्घ जीवन की प्रभु से मंगलकामना करते हैं।
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समीक्षक — डॉ. त्रिलोकी सिंह हिन्दूपुर,करछना,प्रयागराज(उ०प्र०)

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