मान्यताओं पर करारा प्रहार करता उपन्यास | बुझाए न बुझे

मान्यताओं पर करारा प्रहार करता उपन्यास-: बुझाए न बुझे

उपन्यास का शीर्षक मिर्जा गालिब की शेर के अंश से लिया गया है और बीच-बीच में मिर्जा गालिब साहब की शायरी को जगह-जगह स्थान दिया गया है साथ ही हिंदुस्तान और हिंदुस्तान के बाहर के विद्वानों की उक्तियों से सजाया गया है और उपन्यास का अंत सुकरात की पंक्ति से किया गया है।

उपन्यास का आनंद लेने के लिए आपको वकालत छोड़नी होगी और जज की कुर्सी संभालनी होगी तभी आप उपन्यास का का आनन्द ले सकते हैं। 31 खंडों में विभक्त उपन्यास के तीसरे खंड में ही हिन्दू धर्म या कहें ब्राह्मणवाद करारा प्रहार किया गया है जिससे आपको लगेगा कि लेखक या तो नास्तिक है या हिन्दू धर्म से इतर धर्म मानने वाला है। एक बानगी स्वामी जी के शब्दों में-‘ अपनी दुकानदारी चलाने के लिए हमारे पूर्वजों को राक्षस बता दिया।’ श्लोकों को विज्ञापन करार दिया। इसी तरह स्वामी जी का कथन है-‘ धर्म बेचों, बगैर लागत के इससे ज्यादा लाभकारी दूसरा धंधा नहीं है । इसके साथ उपन्यास हिंदू धर्म के गूढ़ रहस्यों की जानकारी दी गई है जिसके बारे में केवल विशिष्ट पंडितों या विद्वानों को ही पता है।

अगला पक्ष है स्त्री, जिसमें नैतिकता मर्यादा और विभिन्न धर्मों के सहारे स्त्री को गुलाम बनाने का हर संभव प्रयास किया गया है इसके बाद भी स्त्री सर उठाने की कोशिश की गई तो प्रेम और सुरक्षा के नाम पर उसके पैरों में बेड़ियां डाल दी गई। यहां तक कि विवाह को भी गुलाम बनाने का तरीका कहा गया है और एक कड़वा सच ये भी स्वीकार किया गया कि स्त्री को कोठा चलाने की अनुमति है समाज में तांगा चलाने की नहीं।

इसका दूसरा पक्ष भी है जिसे आप त्रिया चरित्र कह सकते हैं। जैसे छेड़छाड़ या बलात्कार का झूठ आरोप लगाना , दहेज प्रथा का झूठा आरोप लगाकर ससुराल पक्ष को पूरी तरह बर्बाद कर के खुद अपने पुराने या नये आशिक से विवाह करना या खुद यौन संबंधों के लिए उकसाना और बाद में ब्लैकमेल करना।

समाज को एक नई दिशा देता और पठनीय व संग्रहणीय उपन्यास के लेखक को बधाई।

समीक्षक– उदय राज वर्मा उदय
पुस्तक – बुझाए न बुझे ( उपन्यास)
लेखक– निमिष अग्रवाल
प्रकाशक– हिन्द युग्म ब्लू
मूल्य– 150/
पृष्ठ – 200

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