anubhav Savita Chadha/अनुभव-सविता चडढा

अनुभव

anubhav- Savita- Chadhaसविता चडढा

आज गणतंत्र दिवस की परेड देखी तो बहुत सारी बातें याद आ गई

anubhav Savita Chadha:1960 की बात थी जब मैं अपने पिताजी के साथ यहां पर गणतंत्र दिवस की परेड देखने आई थी ।हम सब थे मेरी नानी जी, मेरी चाई जी, मैं और मेरे भाई बहन। पापा जी कि ड्यूटी गणतंत्र दिवस में लगी हुई थी और हम सब सुबह 6:00 बजे ही यहां पहुंच गए थे। परेड खत्म होने के बाद पापा जी हमें राष्ट्रपति भवन और उसके सामने विदेश मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और सारे भवन दिखा रहे थे ।राजपथ से ऊपर राष्ट्रपति भवन की ओर जाते हुए मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं किसी राज महल की ओर प्रवेश कर रही हूं। अचानक मन में एक विचार आया था कितनी अच्छी जगह है, काश मैं यहां हमेंशा रह सकती।

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उस समय कभी सोचा भी नहीं था कि हम जो सोचते हैं वह हो जाता है लेकिन आज मेरा यह अनुभव यह सिद्ध कर रहा है कि जो भी हम सोचते हैं वह एक एक दिन हो सकता है।
झील कुरंजा, लाल बिल्डिंग, हायर सेकेंडरी स्कूल में जब मैं पढ़ रही थी । उस समय मैं 11वीं कक्षा में थी। उस समय वराह गिरी वेंकट गिरी साहब राष्ट्रपति थे । तब भी एक बार राष्ट्रपति भवन जाने का अवसर मिला था। राष्ट्रपति महोदय के समक्ष हमें एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए हमारे स्कूल के अध्यापक गण लेकर आए थे । अब तो वही इच्छा फिर बलवती हुई और फिर मन में विचार आया काश मैं यहां हमेशा यह सकूं।

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1972 में मेरी नौकरी पर्यटन विभाग में लग गई थी उस समय पर्यटन विभाग का कार्यालय रेल भवन में था रेल भवन राजपथ और राष्ट्रपति भवन के पास ही था। 1980 में मुझे नार्थ ब्लॉक, वित्त मंत्रालय में वरिष्ठ अनुवादक के रूप में चुन लिया गया था। यह वही स्थान था जहां मैंने सोचा था कि मुझे हमेशा आना चाहिए ।जब हम भोजन अवकाश में बाहर निकलते तो सामने राष्ट्रपति भवन और इधर विदेश मंत्रालय और मैं भी तो मंत्रालय में काम करती थी। इस राजपथ पर जितने वर्ष भी मैं रही मैंने अपने भीतर एक अद्भुत उत्साह महसूस किया।
कुछ वर्ष यहां नौकरी करने के पश्चात में प्रमोशन पा कर पंजाब नेशनल बैंक के संसद मार्ग कार्यालय में चली गई थी लेकिन राजपथ यहां से भी दूर नहीं था । उन दिनों संसद भवन के बीच बने रास्ते से दूसरी और आसानी से जाया जा सकता था। संसद भवन, रेल भवन और फिर उसके आगे इंडिया गेट और फिर राजपथ , ये हमेशा ही मेरे बहुत प्रिय स्थल रहे हैं और भगवान का धन्यवाद करती हूं कि उसने मुझे मेरे जीवन के अधिकांश वर्ष इसी स्थान पर रहने का शुभ अवसर भी दे दिया।
मैं कभी-कभी सोचती हूं अगर मैंने बचपन में यहां रहने का सुखद स्वप्न नहीं देखा होता तो क्या मैं यहां आ सकती थी । मुझे पता नहीं यह सच होता कि नहीं पर मुझे लगता है कि यह मेरी मन की इच्छा ईश्वर ने जरूर कहीं ना कहीं सुनी होगी। हमारे कर्मों को वही तो कार्यान्वित करता है और मैं धन्यवाद करती हूं उस परमात्मा का जिसने हमेशा ही मुझे सच्ची राह दिखाने में अपना आशीर्वाद बनाए रखा है।


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Abhimanyu

मेरा नाम अभिमन्यु है इस वेबसाइट को हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए बनाया गया इसका उद्देश्य सभी हिंदी के रचनाकारों की रचना को विश्व तक पहचान दिलाना है

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