ha mera desh| हा-मेरा देश/सीताराम चौहान पथिक

ha mera desh : सीताराम चौहान  पथिक की रचना हा-मेरा देश वर्तमान स्थिति हिंदुस्तान की दर्शाता है कि जहां एक रोटी के लिए बचपन श्रम करने के लिए मजबूर है लोग अभी भी भूखे मर रहे है गरीबी का आलम यह है कि तन पर लपेटने के लिए कपड़ा नहीं है मायूसी में किसान और सैनिक खुदखुशी करने पर मजबूर हैं लेखक का सन्देश साफ़ है कि देश में खुशहाली हो अमीर और गरीब में मतभेद न हो हर व्यक्ति को समान्य अवसर मिले प्रस्तुत है रचना ।

 

हा — मेरा देश ।


चेहरे पर मासूमियत, मजबूरी की छाप ,
मुरझाया बचपन चला- बूढ़ी दादी के साथ,
कैसे गुजरेगा ये दिन- कैसे गुजरेगी रात ,
फ़िक्र यही , बस किस तरह बुझे पेट की आग।

हाय — मेरे देश की यह कैसी तक़दीर ,
भूखे मरते इक तरफ-नोटो में तुले अमीर ,
ऐसा कैसे हो गया, हाय- गांधी का देश ॽ
गांधी के बंदर सभी , हंसते बेच ज़मीर ।

देख ग़रीबी देश की , बापू जी गये पसीज ,
किया अलविदा सूट को- लंगोटी पर रीझ ,
बापू बंदर  आपके– बिगड़ गये है तीन ,
तुम्ही सुधारों अब इन्हें – सीखें ज़रा तमीज ।

मायूसी में जी रहा

धरती पुत्र किसान ,
सरहद पर है जूझता-

मन से दुखी जवान ,
किसान और जवान गर,

करें खुदकुशी हाय ,
रहनुमाओं — बुनियाद पर

थोड़ा सा दो ध्यान ।

ना तोलो जात ग़रीब की

इंसानी  फ़र्ज़ निभाओ ,
हे राजनीति के जयचंदो ,

दामन पाकीज बनाओ ,
घुन देश- भक्ति को लगा

तरसती भारत माता ,

दुश्मन के सिर पर चढ़ो , मौत बन जाओ ।

यह देश शूरवीरों का है–
घिघियाने की भाषा छोड़ो ,

दुश्मन ललकार रहा घर में ,

दोनों बाजू उसके तोड़ो ,
राणा प्रताप के भामाशाह ,

आगे बढ़ कर आहुतियां दो ,

जो बिखर गई कड़ियां उनको,

दानशबंदी से फिर जोड़ों ।

कोई भूखा- नंगा ना रहे ,

इंसाफ  और खुशहाली हो ,
बुढ़िया दादी का हाथ पकड़ ,

फिर से ना कोई सवाली हो ,
हो ऐसा हिन्दुस्तान मेरा

हर देश-भक्त भारतवासी ,
ध्वज पथिक तिरंगा फहराये ,

ना कहीं कोई बदहाली हो ।।
ha - mera-desh
सीताराम चौहान पथिक
दिल्ली

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  1.  शिक्षा का मूल्यांकन 
  2. लाल बहादुर स्मृति दिवस पर कविता 

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shiksha ka moolyaankan/सीताराम चौहान पथिक

shiksha ka moolyaankan: सीताराम चौहान पथिक की रचना शिक्षा का मूल्यांकन जो वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर कटाक्ष है प्रस्तुत है –


शिक्षा का मूल्यांकन ।

विश्व विद्या्लय ज्ञान का विश्व-मन्दिर ।
अथवा उच्च शिक्षा का

आधुनिक फैशन- रैम्प ॽ
वहां- फैशन रैम्प – पर

टिकटों द्वारा प्रवेश होता है ,
यहां- शिक्षा परिसर – रैम्प पर

प्रवेश निशुल्क है ।

प्रातः से सांय तक रंग- बिरंगे

डिजाइनदार अल्प – परिधानों मे ,
तितलियों की कैटवाक होती है

शोख अदाओं के साथ ,
शिक्षा – परिसर नहीं ,

मानों फिल्मी स्टूडियो हो ।
रैगिंग प्रतिबंधित होने से

भ्रमरो को थामना पड़ता है
दूर से कलेजा अपने हाथ । जी हां ,

यही शिक्षा का विश्व – विद्यालय परिसर है ।
शिक्षा- संस्कृति और सभ्यता का केन्द्र ।
किन्तु शिक्षा कैसी — कक्षाओं में

छात्र नदारद
कैंटीनों में चटपटे व्यंजनों का
रसास्वादन करते ,
रोमांस करते छात्रों की टोलियां ।।

संस्कृति के नाम पर

पश्चिम का भद्दा अंधानुकरण ।
भारतीय भाषाओं का उपहास ।
दासता की प्रतीक अंग्रेजी का वर्चस्व ।
यही है हमारे राष्ट्रीय नेताओं
की कथनी-करनी का अन्तर।
भारत की राष्ट्रीयता पर
कुठाराघात ।
नैतिकता का गिरता स्तर ।

अब समय आ गया है ,
मैकाले की शिक्षा – प्रणाली पर

पुनर्विचार करने का ,
अर्धनग्न फैशन – प्रवॄति को
करना होगा दृढ़तापूर्वक हतोत्साहित ।
छात्रों को स्कूलों की तरह देना होगा ,
राष्ट्रीय ड्रेस – कोड ।
शिक्षा – परिसर में

महापुरुषों की अमॄत -वाणी का
गुंजाना होगा जय – घोष ।

देश- भक्त  क्रान्ति कारियो के

उल्लेखनीय योगदान का ,
पाठ्य- पुस्तको में करना होगा

निष्ठापूर्वक समावेश ।
तभी होगी भारतीय शिक्षा सार्थक एवं निर्दोष

shiksha- ka- moolyaankan
सीताराम चौहान पथिक

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लाल बहादुर शास्त्री स्मृति दिवस पर कविता

lal bahadur shastri  smriti divas  :सीताराम चौहान पथिक  की लाल बहादुर शास्त्री स्मृति दिवस पर कविता ,श्री लाल बहादुर शास्त्री का जंन्म २ अक्टूबर १९०४ को उत्तरप्रदेश के वाराणसी से सात मील दूर एक छोटे से रेलवे टाउन मुगलसराय में हुआ था। उनके पिता शिक्षक थे । जब शास्त्री जी डेढ वर्ष के थे उनके पिता का देहांत  हो गया उनकी माँ अपने तीनो बच्चों के साथ अपने पिता के यहाँ बस गयी । शास्त्री जी जब ११ वर्ष के थे तभी उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कुछ करने का मन बना लिया था । १९२७ में उनकी शादी हो गयी दहेज के नाम पर एक चरखा मिला और हाथ के बनाये हुए कुछ कपडे थे वास्तव में इस दहेज से बहुत खुश थे कुल ७ वर्ष तक ब्रिटिश जेलों में रहें एक रेल दुर्घटना जिसमे कई लोग मारे गए थे , के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। लाल बहादुर शास्त्री जी के जन्मदिवस पर 2 अक्टूबर को शास्त्री जयंती व उनके देहावसान वाले दिन 11 जनवरी को लालबहादुर शास्त्री स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाता है।

लाल बहादुर शास्त्री जी
पुण्यतिथि पर कविता 

(lal bahadur shastri  smriti divas)


श्री लाल बहादुर शास्त्री ,
शत्-शत नमन तुम्हे ।
राष्ट्र- प्रेम और सादगी ,
नैनन भरा स्नेह ।

हे सौम्य- मूर्ति है युग – पुरुष ,
नैतिकता के दूत ।
देखो , भारत वर्ष में ,
नेता की करतूत ।

लूट – लूट कर खा रहे ,
फिर भी नहीं अघाए ।
इनके काले कर्म सब ,
खादी मैं छिप जाए ।

भ्रष्ट – आचरण स्वार्थी ,
पद – लोलुप मंत्री सभी ।
सीधी- सादी प्रजा अब ,
दुःख किस्से कहें कभी ।

नैतिकता दम तोड़ती ,
नेता रंगे  सियार ।
कुर्सी प्राणों से बंधी ,
आत्मा करें पुकार ।

जय जवान और जय किसान
दोनों हुए हताश ।
आ जाओ बहादुर शास्त्री ,
आँखे  हुई उदास ।

तुम जैसा निस्वार्थी ,
राजनीति आदर्श ।
लाएं कहां से खोज कर ,
स्वाभिमान उत्कर्ष ।

रोज बट  रही रेवड़ी ,
अपनों – अपनों के बीच ।
प्रतिभा पिसती है यहां ,
आरक्षण के बीच ।

कोई भी ऐसा नहीं ,
सुनें प्रजा की पीर ।
बगुलों में जो हंस हो ,
करें नीर और क्षीर ।

ऐसे संकट के समय ,
मुख से वचन कहै ।
धूर्त पडौसी देश से ,
कैसे मुक्त रहै ॽ

लाल बहादुर शास्त्री ,
फिर आओ इक बार ।
आकर फिर लाहौर तक ,
खींचो इक दीवार ।

भारत – मां के हे सपूत ,
तुम पर है अभिमान ।
पथिक उज्ज्वल नक्षत्र तुम ,
भारत की पहचान ।

सीताराम चौहान पथिक

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bhandara hospital fire-क्या कसूर था|डॉ० सम्पूर्णानंद मिश्र

हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ० सम्पूर्णानंद मिश्र की रचना क्या कसूर था /bhandara hospital fire घटना से आहत  होकर उन नवजातों को  समर्पित  अपनी कविता   के माध्यम से उन  नवजातों  के लिए  श्रद्धाँजलि  अपनी प्रकट की  ये  घटना  शुक्रवार  की  रात  रात्रि  २ बजे लगभग हुई  जब  महाराष्ट्र  के भंडारा  के  जिला  अस्पताल  में  शार्ट  सर्किट  लगने  से  १० नवजात बच्चों की  दर्दनाक  मृत्यु  हो  गयी  उस समय  वार्ड  में  १७  बच्चे  थे  रेस्क्यू  के  माध्यम  से  ७  बच्चे  ही  बचा  पाई  टीम  प्रस्तुत  है  रचना 

क्या कसूर था


उठता धुंआ

पुष्ट करता है

भ्रम और संदेह को

कि दाल में कुछ काला है

बात जैसी भी हो

दर्द कम नहीं हो सकता

फोड़ा नासूर हो गया

नहीं भुलाया जा सकता है

इस हरे ज़ख़्म को

अपना अंगूठा तक

नहीं चूसा था

नवजातों में से किसी ने

न निहार सके थे

अपने- अपने पाल्यों को

एक भी उनमें से

गर्भ के हिंडोले में ही नौ महीने तक

झूलाया था उन्हें अभी

बाहरी दुनिया में एक कदम भी

चलना नहीं सिखाया था

क्या मालूम जिन हाथों में

वे बालपोथी और कुछ खिलौने

थमाना चाहती हैं

वे ममता के हाथ को

थामने के लिए नहीं हुए थे प्रसूत

यही उनकी नियति थी

क्रूर काल की ही संगति थी

वैसे भी मंदिर, गिरिजाघर, अस्पताल

प्रतिबद्ध हैं

देश की जनसंख्या

कम करने के लिए

खूब अध्ययन किया है

माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत का

इन संस्थाओं ने

लेकिन क्या कसूर था

उन नवजातों का

जिनका नहीं हो पाया था संपर्क

ठीक- ठीक अपने

जनक और जननी से

अभी तक

क्या शॉर्ट सर्किट से हुई

यह मौत भी

जांच की बलि चढ़ जायेगी ?

 

bhandara -hospital- fire
डॉ० सम्पूर्णानंद मिश्र
प्रयागराज फूलपुर
7458994874

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Hindi diwas poem/हिंदी साहित्य-संसार|शैलेन्द्र कुमार

Hindi diwas poem : भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी 2006 को प्रति वर्ष विश्व हिन्दी दिवस के रूप मनाये जाने की घोषणा की थी। उसके बाद से भारतीय विदेश मंत्रालय ने विदेश में 10 जनवरी 2006 को पहली बार विश्व हिन्दी दिवस मनाया था।
विश्व हिन्दी दिवस का उद्देश्य विश्व में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये जागरूकता पैदा करना, हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना, हिन्दी के लिए वातावरण निर्मित करना, हिन्दी के प्रति अनुराग पैदा करना, हिन्दी की दशा के लिए जागरूकता पैदा करना तथा हिन्दी को विश्व भाषा के रूप में प्रस्तुत करना है। सभी सरकारी कार्यालयों में विभिन्न विषयों पर हिन्दी में व्याख्यान आयोजित किये जाते हैं। विश्व में हिन्दी का विकास करने और इसे प्रचारित-प्रसारित करने के उद्देश्य से विश्व हिन्दी सम्मेलनों की शुरुआत की गई और प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ था इसीलिए इस दिन को ‘विश्व हिन्दी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

हिंदी साहित्य-संसार

Hindi diwas poem


विविध विधाओं के खिल रहे

कुसुम यहांँ हिंदी साहित्य-संसार

बहुत सुहाना है ।

शिल्प ताजमहल से भी सुंदर है इसका,

हर गीत कंचन हर शब्द नगीना है।

अनंत अलंकारों का आगार है यहांँ पर,

तीन गुणों की खान नौ रसों का खजाना है।

बिम्बों से साकार हो उठती है काव्य सुषमा,

प्रत्येक भाव लगता जाना पहचाना है ।

कल्पना की उड़ान पंछियों से ऊंची है यहांँ,

यथार्थ चित्रण में सब ने लोहा माना है।

Hindi-diwas-poem
शैलेंद्र कुमार

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international hindi day poem/प्रेमलता शर्मा

आज विश्व हिंदी दिवस पर प्रेमलता शर्मा की रचना international hindi day poem सभी हिंदी भाषियों को समर्पित है जो विश्व के हर कोने में बसे है हिंदी का प्रचार -प्रसार कर रहे है
१० जनवरी २००६ से विश्व हिंदी दिवस की शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल से हुई तभी से अंतराष्ट्रीय हिंदी दिवस विदेश मंत्रालय में मनाया जाने लगा |

विश्व हिंदी दिवस पर कविता


हिंदी हमारी आन है हिंदी हमारी शान है
हम हिंद के बाशिंदे हैं हिंदी हमारी जान हैं
बात आजकल की ही नहीं है
बरसों पुरानी बात है
कल भी थी आज भी है

हिंदी हिंद का ताज है
कौन भुला सकता है

बाल्मीकि और वेद व्यास को
कौन अनजान है

रामायण और महाभारत से
जीवन को आलोकित करते
दोहे कबीर सूरदास के
तुलसीदास की रामचरितमानस ने
आदर्श जीवन जीने का संदेश दिया
बुद्ध के उपदेशों ने

सही गलत का मार्ग प्रशस्त किया
प्रेमचंद की गोदान और कफन ने
एक निर्धन किसान की पीड़ा को बयां किया
कितनों के मैं   नाम गिनाऊं
अनगिनत हिंदी साहित्य के

यह वह सितारे हैं
हिंदी आज भी इन्हीं सितारों से

पश्चिम में भी सम्मानित है
हिंदी सिर्फ हिंद में ही नहीं

सात समुंदर पार भी अपनी छटा  बिखेरती हैं

international- hindi -day- poem
प्रेमलता शर्मा

आपको हिंदी कविता international hindi day poem /विश्व हिंदी दिवस पर कविता /प्रेमलता शर्मा की रचना कैसी लगी अपने सुझाव कमेन्ट बॉक्स मे अवश्य बताए अच्छी लगे तो फ़ेसबुक, ट्विटर, आदि सामाजिक मंचो पर शेयर करें इससे हमारी टीम का उत्साह बढ़ता है।

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vivashata ek kavita/कल्पना अवस्थी

हिंदीरचनाकर की प्रतिभाशाली लेखिका कल्पना अवस्थी की रचना vivashata ek kavita /विवशता ये कविता उन्होंने अपने भाई को समर्पित की है जो अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन उनकी यादें और उनके उत्कृष्ट कार्य सभी की यादों में रहेंगे | हिंदीरचनाकर परिवार की तरफ से उनके भाई के लिए विन्रम श्रद्दांजलि और ईश्वर उनको शक्ति दे कि वह भाई के अधूरे कार्यो को पूरा करे |

विवशता एक कविता /कल्पना अवस्थी

vivashata ek kavita /विवशता 


तुझे भुलाना ये  जिंदगी आसान नहीं है

मैं जिंदा तो हूं, पर मुझ में जान नहीं है

कभी सोचा भी ना था कि

जिंदगी का यह फैसला होगा

जिंदा रहूंगी मैं

तेरी मौत का सिलसिला होगा

भूलने की कोशिश इसलिए की थी,

कि सब खुश रहें  तेरे साथ

कभी सोचा इक  भी बार कि

क्या होगा तेरे बाद?

माना कि तेरा दिल तोड़ा था मैंने

अधूरे रास्ते में तुझे छोड़ा था मैंने

पर इतना कौन रूठ जाता है

अधूरे सफर में साथ छूट जाता है

जिंदगी दांव पर लग गई

कोई इम्तिहान नहीं है

मैं जिंदा तो हूं पर मुझ में जान नहीं है

 

जहां तुम हो वही बुला लो मुझे

मैं जी ना पाऊं ऐसी ना सजा दो मुझे

 ऐसे नाराज होकर जाता कौन है?

अपनी जिंदगी को भुलाता कौन है?

मां- पापा कैसे जिएंगे सोचा होता,

तुम बिन भैया अकेले हो गए,

खुद को रोका होता

वह रोते हैं, कि वह मेरा सहारा था

मैं नहीं वो बहुत प्यारा था

मुझे तो इतना प्यार दिया तुमने कि

कोई नहीं दे सकता

तुम्हें ले गया वह तो

मेरी जान क्यों नहीं ले सकता

तुम्हें ले गया वो  तो

मेरी जान क्यों नहीं ले सकता

गए थे तो यादें भी ले जाते

यह मुझे मार देंगी

ना तुम्हारी तरह गले लगाएंगे

न तुम जैसा प्यार देंगी

अब मेरी भी जिंदगी, वीरान नजर आती है

कुछ बचा नहीं इसमें, शमशान नजर आती है

अब  कुछ कर गुजरने का अरमान नहीं है

 मैं  ज़िंदा  तो हूं पर मुझमें जान नहीं है

 

अब मेरी भी ज्यादा दिन की कहानी नहीं है

क्योंकि तेरे सिवा कोई चीज

याद अपनी नहीं है

लौट आओ ना किसी बहाने से

अच्छा नहीं लगता कुछ तुम्हारे दूर जाने से

इंतजार रहेगा कि किसी रूप में

मेरे पास आओगे

अपनी लाडो को ऐसे ना भूल जाओगे

तेरे बिना कल्पना का

ये  सफर आसान नहीं है

मैं जिंदा तो हूं पर मुझमें जान नहीं है|

vivashata-kalpana-awasthi
कल्पना अवस्थी

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vivashata ek kavita /विवशता कविता कैसी लगी अपने सुझाव कमेंट बॉक्स में अवश्य बताये |

Vishva hindi diwas par kavita/सीताराम चौहान पथिक

Vishva hindi diwas par kavita: हर साल 10 जनवरी भारतीय दूतावास के लिये खास होता है क्योंकि इस दिन विश्व हिंदी दिवस खास तौर पर इन जगहों पर मनाया जाता हैं विश्व हिंदी दिवस का उद्देश्य हिंदी को अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप प्रचारित-प्रसारित करना है।विश्व में कही पर भी जहाँ पर भारतीय दूतावास है यह हिंदी भाषा का अंतरराष्ट्रीय दिवस हर्षोल्लास से मनाया जाता है। सभी सरकारी कार्यालयों में हिंदी में व्याख्यान आयोजित किये जाते है,विश्व में हिंदी का प्रचार प्रसार हो इसलिए विश्व हिंदी सम्मेलन की शुरुआत की 10 जनवरी 1975 पहला विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर में आयोजित किया गया था इसी दिन से विश्व  हिंदी दिवस मनाया जाने लगा। भारत मे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में 10 जनवरी 2006 को विश्व हिंदी दिवस मनाने की घोषणा की, इस प्रकार से भारत मे भारतीय विदेश मंत्रालय ने पहला विश्व हिंदी दिवस इस दिन मनाया था।

विश्व हिन्दी दिवस ।


विश्व हिन्दी दिवस पर ,
शत्-शत नमन हिन्दी तुझे ।
घर में निरादॄत- विश्व पूजित ,
चमत्कॄत हिन्दी कर गई मुझे।

हिन्दी तू विश्व – वंदनीय ,
प्रवासी तेरे अनेक भक्त ।
देश में भी सुत तेरे ,
बना रहे तुझे सशक्त ।

यश- कीर्ति की स्वर्णिम ध्वजा
फहरा रही है विश्व में ।
साहित्य- कला – संस्कृति की
छाप है हर दृश्य में ।।

हिन्दी भाषा – भाषियों ने ,
बहुमत से सम्मानित किया।
शिष्ट मण्डल कला संस्कृति के
हिन्दी को जीवन-रस दिया।

हिन्दी सिनेमा – मीडिया से ,
विश्व में इक क्रान्ति आई ।
गीत फिल्मी साहित्य कृतियां
विश्व को हिन्दी सुहाई ।

हिन्दी समन्वित शिष्ट भाषा ,
वैज्ञानिकीय है दॄष्टिकोण इसका ।
समाहित है इसमें अऩेक ध्वनियां ,
सानी नहीं है कोई इसका ।

राजभाषा- राष्ट्र भाषा बने हिन्दी ,
कोई जन नायक को सद्बुद्धि दे ।
राजनीति छोड़ भारत हित जिएं ,
मां शारदा की हार्दिक आशीष लें ।

राष्ट्र हित में त्याग दें निज स्वार्थ ,
हिन्दी विश्व भाषा का करें सम्मान ।
समॄद्ध होगी प्रांत – भाषा ,
पाएगी सर्वोच्च स्थान ।

विश्व हिन्दी दिवस सुअवसर ,
मिलकर मनाएं देश वासी ।
सौभाग्य भारत का उदय हो ,
लें – पथिक श्रेय वासी प्रवासी

Vishva- hindi- diwas -par- kavita

सीताराम चौहान पथिक

हिंदी रचनाकार वेबसाइट के सभी हिंदी विद्वानों और खास तौर से सीताराम चौहान पथिक Vishva hindi diwas par kavita का सभी हिंदी भाषियों को विश्व हिंदी दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं संदेश दिया है

Motivational poem in hindi -फल/डॉ० सम्पूर्णानंद मिश्र

डॉ० सम्पूर्णानंद मिश्र की रचना फल Motivational poem in hindi प्रेेरणा दायक कविता का सार यह है कि फल वही प्राप्त कर पाता है जिन्होंने अहंकार के
वृहदाकार खोह को प्यार की मिट्टी से पाटा हो,वही व्यक्ति सच्चा सुख प्राप्त कर पाता है प्रस्तुत है रचना-

फल

(Motivational poem in hindi)


वृहद सुख की कामना
मन में लिए
घूम रहा है मनुष्य इधर- उधर
उस मृग की तरह
छद्माभास जिसे होता है अनवरत
छद्माभास
एक गंभीर रोग है नज़र का
जिसके ताने- बाने को
सत्ता और संपत्ति ने ही बुना है
निरंतर सिलता है
सत्ता और संपत्ति
अहंकार के ही परिधान को
भटक रहा है सदियों से इंसान
इसीलिए इसे धारण कर
नरक का पथ निर्मित होता है अहंकार से
क्योंकि इस दोष से नहीं बच सके हैं

बड़े- बड़े संन्यासी
इसीलिए नहीं चख सके
समता के फल के स्वाद को
क्योंकि
समता के फल का स्वाद
मिलता है उन्हीं को
जिन्होंने अहंकार के
वृहदाकार खोह को
प्यार की मिट्टी से पाटा हो
देश के कुछ संतों ने पाटा था इसे
चख सके इसीलिए
समता के फल के
मीठे स्वाद को वे

Motivational poem hindi

डॉ० सम्पूर्णानंद मिश्र
प्रयागराज फूलपुर
7458994874

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Navvrsh par kavita||maa par kavita/baba kalpnesh

बाबा कल्पनेश की कलम से दो रचना जो समाज को एक संदेश देती हैं Navvrsh par kavita,maa par kavita नववर्ष,माँ ममतामयि जो पाठको के सामने प्रस्तुत है।

नववर्ष


अभी कहाँ नव वर्ष, यहाँ भारत में आया।
अभी यहाँ हर ठाँव, अधिक कुहरा गहराया।।

हम तो अधिक उदार, पराया पर्व मनाते।
अपने त्यागे छंद ,गजल औरों की गाते।।

हिंदी से मुख मोड़, सदा अंग्रेजी सीखें।
हमको समझे हेय,उन्ही नयनों को दीखें।

हम जो नहीं कदापि,रूप हमको वह भाया।
अभी कहाँ नव वर्ष, यहाँ भारत में आया।।

हम ज्यों बाल अबोध,दौड़ कर आगी पकड़े।
जले भले ही हाथ, सोच पर अपनी अकड़े।।

सन् यह बीता बीस,सनातन नहीं हमारा।
अभी अधिक है दूर,चैत का नव जयकारा।।

जब बसंत हर ठाँव, मिले सुंदर गहराया।
अभी कहाँ नव वर्ष, यहाँ भारत में आया।।

अपना जो आधार, हमें है कम ही भाता।
निज पतरी का भात,हमें है कहाँ सुहाता।।

दूजे का हर रंग, बड़ा चटकीला लगता।
हमको अपना चाव,आश्चर्य पल-पल ठगता।।

उनके सुनकर बोल,सदा हमने दुहराया।
अभी कहाँ नव वर्ष, यहाँ भारत में आया।।


विधा-मधु/दोधक/बंधु/फलस्वरूप छंद
विधान-भगण भगण जगण+22
11वर्ण, चार चरण,प्रति दो चरण समतुकांत

माँ ममतामयि


नीर भरे दृग मातु निहारे।
माँ ममतामयि लाल पुकारे।।

डूब रहा भव सिंधु किनारे।
जीवन कंटक हैं भयकारे।।

दृष्टि करो नित नेह भरी री।
डूब रही अब जीव तरी री।।

ज्ञान नहीं चित रंच बचा है।
जीवन सार विसार लचा है।।

पाप भरी गगरी अब फूटे।
जीवन याचकता जग छूटे।।

नित्य सुझुका रहे यह माथा।
तीन त्रिलोक रचे यश गाथा।।

गूँज रही महिमा जग भारी।
बालक-पालक माँ भयहारी।।

कौन दिशा यह बालक जाए।
माँ ममता तज क्या जग पाए।।

ले निज अंक सुधार करो री।
सत्य सुधा रस सार भरो री।।

हो चिर जीव सदा यह माता।
गीत रहे महिमा तव गाता। ।

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बाबा कल्पनेश

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