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लघुकथा | एक नई रोशनी -सविता चडढा

लघुकथा | एक नई रोशनी -सविता चडढा

उस दिन बाप बेटे में तकरार शुरू हो गई। देर रात बेटे ने कुछ ज्यादा ही पी ली थी। बाप ने समझाने की कोशिश की लेकिन तकरार बढ़ते-बढते बहुत सारी हदें पार कर गई । तकरार के बाद धक्का-मुक्की शुरू हुई और बेटे ने बाप पर हाथ उठा दिया।  बाप  चोटिल हो गया। 

अगले दिन  बाप ने सोचा भगवान से ही जाकर पूछता हूं । सुबह उठने पर जब वह धीरे-धीरे मंदिर की सीढ़ियां चड़ रहा था तो उसे एक महिला ने पूछा “अंकल  आपको क्या हुआ ।” उसने नजरें उठाई और देखा , ये तो गुणवंती की बहू है । उसने घर ,अपने  सम्मान को बचाने की फिज़ूल कोशिश करते  हुए इतना ही कहा “भगवान का शुक्र मनाओ गुणवंती की बहू ,भगवान ने तुम्हें तीन बेटियां ही दी है।  बेटियां कभी बाप पर हाथ नहीं उठाती। गुणवंती की बहू ने एक नई रोशनी महसूस की और भगवान का आभार प्रकट किया।

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गलत संगत

बेटे कुंदन की मौत के 50 वर्ष बाद अब उसके पिता की हाल ही में मृत्यु हुई है । इन 50 वर्षों में कुंदन के पिता हर रोज सोचते रहे कि मैं अपने बेटे को क्यों नहीं समझा पाया कि वह बुरी संगत छोड़ दें और अपनी पढ़ाई में ध्यान दें। दो चार गलत मित्रों की संगत में वह ऐसा फंसा कि उसने अपने सोने जैसी जिंदगी को एक दिन ईट कंक्रीट से बनी, रेगिस्तान सी गर्म सड़क पर तड़प तड़प कर दम तोड़ दिया।

उसकी लाश भी कई दिन के बाद मां-बाप को मिली थी।

कुंदन की मां तो आज भी जीवित है और वह चीख चीख कर हर रोज सबको कहती फिरती है कि अपने माता पिता के कहे में रहो । जब उम्र पढ़ने की हो तो सिर्फ पढ़ो, गलत संगत में मत पड़ो।

वह जानती है उसका कुंदन वापस नहीं आएगा, फिर भी वह हर बेटे में अपना कुंदन देखती है और भगवान के आगे भी यही बड़बड़ाती है और रोती है।

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रिश्ते

राखी का दिन था। मां की मौत के बाद बहन मानसी भाई के दरवाजे पर खड़ी थी। उसने तीन चार बार डोर बेल बजाई लेकिन दरवाजा नहीं खुला। वह दरवाजे के बाहर बने चबूतरे पर बैठ गई। थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला और भाई ने दरवाजे पर बहन को बैठा देख कहा “ये टाईम है आने का, मुझे दुकान पर जाना है और तेरी भाभी वैसे ही बीमार है।” कहते हुए भाई ने सकुटर स्टार्ट किया और बोला” कोई जरुरत नहीं है राखी की।”

बहन समझ गई थी, मां रही नहीं अब कैसे त्योहार और कैसे रिश्ते। मानसी ने साथ लाया मिठाई का डिब्बा दरवाजे पर रखा और भरी आंखों से वापस लौट गई, शायद कभी न आने के लिए।

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short story kar bhala to ho bhala / सविता चड्ढा

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लघुकथा

“कर भला तो हो भला”

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सविता चड्ढा


कनिका को जब से यह सूचना मिली है कि उसके पिता को अपने कारोबार मेंं काफी बड़ा घाटा हो गया है और वे बहुत परेशान हैं। उसे ये भी बताया गया है कि उसके पिता द्वारा प्रेषित सामान को गुणवत्ता के आधार पर खरा नहीं पाया गया । इसलिऐ उस माल का भुगतान नहीं किया गया और कंपनी ने वह सारा माल भी वापस लौटा दिया है ।
बात इससे भी अधिक यह हो गई कि उसके पिता को अब आगे से वह कंपनी कभी माल बनाने का ऑर्डर भी नहीं देगी। कनिका मन पर बोझ लिए, विचार करने लगी। उसकी अंतरात्मा ने उसे झकझोरा, वह सोचने लगी “मेरे दादी कहां करती थी, जब बेटियां अपने ससुराल का जानबूझकर कोई नुकसान करती हैं तो उसका खामियाजा उसके मायके वालों को भुगतना पड़ सकता है।”

कनिका के मन से पता नहीं कैसी हूक उठी, कई दिन से वह वैसे भी आत्मग्लानि से जूझ रही थी। वह उठी और अपनी सास से जोर जबरदस्ती से हस्ताक्षर कराए मकान के कागज, उनसे हथियाए हुए सोने के जेवरात उन्हें वापस कर दिए , ये कहते हुए

” जब आप अपनी इच्छा से मुझे देना चाहेंगी मैं ले लूंगी, अभी आप रख लीजिए।”

कनिका को पूरा विश्वास है अब उसके मायके में सब ठीक हो जाएगा।


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