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प्यासा कलश | नरेन्द्र सिंह बघेल | लघुकथा

यह जरूरी नहीं कि जो कलश भरा दिखाई देता हो प्यासा न हो । इस पीड़ा को कलश बनाने वाला सिर्फ कुम्हार ही समझ सकता है , इसीलिए वह ग्राहक को कलश बेचते समय कलश को ठोंक बजा कर इस आश्वासन से देता है कि इसका पानी ठंडा रहेगा ।सच बात यह है कि जब तक वह अपनी बाह्य परत से जलकण आँसू के रूप में निकालता है तब तक कलश का जल शीतल रहता है , यदि कलश से आंसू निकलने बंद हो जाएं तो फिर जल की शीतलता भी गायब हो जाती है । इसलिए तन को शीतल रखने के लिए आँसू निकलना भी जरूरी रहता है जो मानसिक विकार को तन से निकाल देते हैं ।कलश से आँसू निकलने का फार्मूला सिर्फ कुम्हार को ही पता है , वो कुम्हार जो सृष्टि का नियंता है । जो आँसू निकलते हैं उन्हें निकल जाने दें ये निकल कर तन को शीतल ही करेंगे । प्यासा कलश दूसरों की प्यास शीतल जल से जरूर बुझाता है पर खुद प्यासा रहकर लगातार आँसू ही बहाता रहता है । बेचारा प्यासा कलश ।
*** नरेन्द्र ****

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किराये का रिश्ता | रत्ना भदौरिया

दो दिन पहले फेसबुक पर एक लाईन पढ़ी ‘उसके साथ रिश्ता मेरा किराये के घर जैसा रहा, मैंने उससे सजाया तो बहुत लेकिन वो कभी मेरा न हुआ। अभी पढ़ ही रही थी कि दिमाग ने चलना शुरू कर दिया और चार साल पहले इन्हीं पंक्तियों में जुड़ी मेरी एक सहेली जो आज भी यही सोच के साथ जिंदगी काट रही है। जब तब मैं अपने गांव जाती हूं तो उससे जरुर मिलती हूं फिर वो घंटों बैठकर अपनी कहानी सुनाती है मुझे।

आज इस लाइन को पढ़ते ही एक बार फिर वो और उसकी कहानी याद आ गयी स्नातक की पढ़ाई के बाद उसने बी टी सी के लिए दाखिला लिया और मैं आगे की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद चली गई। बी टी सी करते करते उसे एक लड़के से प्यार हो गया। प्यार सिर्फ प्यार तक सीमित नहीं रहा बात शादी तक पहुंची। दोनों तैयार थे लेकिन जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया कि मेरी सहेली उमा के पापा की मृत्यु हो गई ‌। मृत्यु के अभी पन्द्रह दिन भी व्यतीत नहीं हुए कि उसके प्रेमी ने उससे शादी के लिए घर में बात करने कहा उसने कहा देखो प्यार जितना आपका जरुरी है उतना मेरा भी लेकिन अभी पापा को गये हुए पंद्रह दिन भी नहीं हुए और घर में कोई नहीं है मां को संभालने वाला उसने कहा ठीक है संभालो मां को अपनी उसी दिन से उसने राश्ता बदला और दूसरी लड़की से शादी कर ली। कई महीने बाद पता चला।ये तो आजकल शोसल मीडिया का शुक्र जो बात आयी गयी पता चल ही जाती है।

तब उसने पूछा कि आपने ऐसा क्यों किया ?प्रेमी का जवाब तो क्या करता उधर लड़की भी तुमसे सुंदर,पैसे भी अच्छे मिल रहे थे और तो और शादी भी जल्दी हो गयी ।इधर क्या ? पता नहीं कितने साल तुम अपनी मां को संभालती और बाप तो था नहीं मिलता भी क्या ?अच्छा जब प्रेम किया था तब ये चीजें नहीं देखी थी कि ये उमा खूबसूरत नहीं है और फिर शादी की बात की ही क्यों थी ?तब तुम्हारा बाप नौकरी करता था और न तुम्हारे ऊपर मां का बोझ ढोने की जिम्मेदारी थी। खूबसूरती में नौकरी का क्या लेना- देना उमा ने पूछा ?हो -हो कर हंसते हुए बोला तुम भी उमा कितनी भोली हो अरे नौकरी करता तो मोटी रकम तो देता कमसे कम तेरा बाप ?अच्छा !छोटा सा उत्तर देकर कुछ क्षण उमा चुप रही और फिर एक जोरदार थप्पड़ मारते हुए कहा आज बहुत खुश हूं इसलिए कि मुझे समझ आ गयी।

पापा के जाने से भी आज दुखी नहीं खुश हूं कि शायद वो नहीं जाते तो मैं प्यार में अंधी होकर क्या कर बैठती। अनुतरित, आश्चर्यचकित ज़रुर हूं लेकिन खुश हूं।कहते हुए वहीं लाईन गुनगुने लगी’उसके साथ मेरा रिश्ता किराये के घर जैसा रहा, मैंने उससे सजाया तो बहुत लेकिन वो कभी मेरा न हुआ।।

रत्ना भदौरिया रायबरेली उत्तर प्रदेश

लगभग एक वर्ष पहले मुझे एक अविस्मरणीय पुस्तक मिली-‘सदी की सबसे बड़ी तालाबंदी | लेखक -अवधेश सिंह जी की | रश्मि ‘लहर’

पुस्तक -‘सदी की सबसे बड़ी तालाबंदी’, लेखक -अवधेश सिंह
प्रथम संस्करण -२०२३
मूल्य -रूपये-२९५
प्रकाशक -ए.आर.पब्लिशिंग कंपनी
ISBN: 978-93-94165-02-1
पृष्ठ संख्या -112

लगभग एक वर्ष पहले मुझे एक अविस्मरणीय पुस्तक मिली-‘सदी की सबसे बड़ी तालाबंदी’, लेखक -अवधेश सिंह जी की। पुस्तक पढ़ने के मध्य कई बार अश्रुपूरित नेत्रों ने व्यवधान डाला। मैं कई बार फूट-फूट कर रोई भी। बहुत सोचा कि इस पुस्तक पर अपने विचार लिखूॅं, पर, खोये हुए अपनों की स्मृतियों के कारण मन सदैव हिम्मत हारता रहा। आज अपने को संयत कर अपने विचार व्यक्त कर रही हूॅं।

यदि हम ‘सदी की सबसे बड़ी तालाबंदी ‘ की बात करें तो यह पुस्तक कई मायनों में विशिष्ट है। इसमें प्रयुक्त आंकड़ें, उस समय की पारिवारिक स्थितियाॅं, समाज में फैलते स्वार्थ की कटुताऍं तथा व्यक्तिगत हित के भाव की सटीक अभिव्यक्ति इस पुस्तक को अन्य पुस्तकों से एकदम अलग कर देती है। मजे की बात यह है कि लेखक की शैली इतनी रोचक, तथ्यात्मक रूप से परिपक्व तथा सहज है कि पाठक पूरी पुस्तक तन्मयता से पढ़ता चला जाता है। देखा गया है कि कई बार आंकड़ों से जुड़ी पुस्तकें ऊब से भर देती हैं।

लेखक ने संपूर्ण विषय को अट्ठारह भागों में बाॅंट कर लिखा है। महामारी के दौर का आरंभ, चरम सीमा तथा भविष्य में उपजने वाले विभिन्न दुष्परिणामों से निपटने के प्रयासों की सार्थक पहल का भली प्रकार वर्णन किया है। यह पुस्तक अपने विषय-विभाजन के कारण बहुत व्यवस्थित ढंग से पाठकों के मन-मस्तिष्क को छू पाने में तथा प्रभावित कर पाने में पूर्णतया समर्थ रही है। एक उदाहरण देखिए –

९. कोरोना के असली योद्धा विषय के अंतर्गत जब पाठक यह पढ़ता है कि –

“तमाम सुरक्षा कवच से लैस एम्स में अभी तक 489 से अधिक स्वास्थ्यकर्मी कोरोना वायरस की चपेट मे आ गये हैं, जिनमें तीन की मौत डराने वाली है.. कमोबेश यही स्थिति पूरे देश की है, न तो कोरोना वायरस का कहर थमता दिख रहा है, और न कोरोना योद्धाओं का साहस।” यह पढ़कर मन उस विचित्र समय की याद करके चिंतित हो जाता है। लेखक ने जीवन के तथा समाज के हर रूप को शब्दों के माध्यम से चित्रित करने का सफल प्रयास किया है।

यहाॅं पर मैं बनार्ड शों के इस कथन को उद्धृत करना चाहूॅंगी-“विचारों के युद्ध में किताबें ही अस्त्र होती हैं।” इस पुस्तक को पढ़ते समय मुझे यह पंक्तियां एकदम सही प्रतीत हुईं। मुझे लगा कि दहशत भरे उस समय को जब भविष्य में कोई पढ़ना चाहेगा तो मददगारों के विभिन्न रूपों से भी रूबरू होगा तथा मानवीय सरोकारों के नकारात्मक एवं सकारात्मक पक्षों को भी समझेगा तथा उनसे भविष्य को सुरक्षित करने का विलक्षण ढंग सीखेगा।

किताब भले ही महामारी से जुड़ी है, परन्तु उसमें सिमटे मनोभाव पीढ़ियों को प्रभावित करने की अक्षुण्ण क्षमता रखते हैं। पुस्तक पढ़ते समय मुझे अब्राहिम लिंकन जी की यह पंक्तियाॅं याद आ गईं-“मैं यही कहूॅंगा कि, वही मेरा सबसे अच्छा दोस्त है, जो मुझे ऐसी किताब दे जो आज तक मैंने न पढ़ी हो।”
ऐसी महत्वपूर्ण पुस्तक सदियों तक अपनी महत्ता बनाए रखेगी ऐसा मेरा विश्वास है।

इसमें महामारी के समय संपूर्ण विश्व के क्रमानुसार आंकड़ों का यथार्थवादी आकलन किया गया है। मानवीय चेतना को झकझोरने वाले अनुभवों के साथ संदेश देने वाले कुछ वाक्य मन से विलग नहीं होते हैं।

पुस्तक में पृष्ठ संख्या 48 पर कोविड हाहाकार..में लिखित पंक्तियाॅं पढ़कर मन उद्वेलन से भर गया – राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कोविड-19 महामारी के दौरान एक लाख से अधिक बच्चों ने अपने माता-पिता में से एक या दोनों को खो दिया है। न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने राज्यों से सक्रिय कदम उठाने को कहा । अदालत ने कहा, “उन बच्चों की पहचान करें जिन्होंने दोनों या एक माता या पिता को खो दिया है, संकटग्रस्त बच्चों की जरूरतों का पता लगाने के लिए यह एक जरूरी प्रारंभिक बिंदु है।”

ऐसी तमाम बातें आम आदमी को पता ही नहीं हैं। पुस्तक पढ़कर यह भी स्पष्ट होता है कि सरकार किसी भी समस्या से निपटने की तैयारी भी करती है तथा हर ओर अपनी पैनी नज़र रखती है। भविष्य में आम जनता/छात्र-छात्राओं के लिए यह पुस्तक बहुत उपयोगी सिद्ध होगी। क्योंकि लेखक की खोजी दृष्टि से सरकार द्वारा किए कोई कार्य बच नहीं पाए हैं। अमूमन लोगों को इतनी जानकारी होती ही नहीं है कि सरकार या अदालत भी कुछ सहयोग करती है। पुस्तक के अंत में सिख गुरुद्वारा कमेटी, अरदास केन्द्रों तथा छोटी बड़ी व्यक्तिगत संस्थाओं द्वारा की गई मदद की चर्चा समाज के लिए बहुत उपयोगी है। मन यह सोचकर शांत हुआ कि इंसानियत अभी जिंदा है और आगे भी ज़िदा रहेगी। समाज इतना बुरा नहीं हुआ है जितनी बुराई होती है। मानव मानव की पीड़ा समझे तथा बाॅंटे यह किसी भी समाज के उत्थान का संकेत है।

अंत में मैं लेखक को धन्यवाद देना चाहूॅंगी कि उनके सफल तथा सजग प्रयासों के कारण एक सार्थक पुस्तक हम सबके समक्ष है। यदि बात त्रुटियों की करें तो मुझे पुस्तक में न तो कुछ अतिरिक्त लगा, न फर्जी लगा। वर्तनी का भी पूरा ध्यान रखा गया है। बहुत कम ऐसा होता है जबकि कोई पुस्तक इतने गंभीर विषय को समेटने के बावजूद रोचक बनी रहे। भविष्य में भी ऐसी पुस्तकें पढ़ने को मिलेंगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

मैं सफदर हाशमी साहब की इन पंक्तियों के साथ अपने विचारों को विराम देती हूॅं-
सफदर हाशमी कहते हैं-

किताबें करती हैं बातें
बीते ज़मानों की
दुनिया की, इंसानों की
आज की, कल की
एक-एक पल की
ख़ुशियों की, ग़मों की
फूलों की, बमों की
जीत की, हार की
प्यार की, मार की
क्या तुम नहीं सुनोगे
इन किताबों की बातें?
किताबें कुछ कहना चाहती हैं।
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं॥

रश्मि ‘लहर’
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
मोबाइल -9794473806

पराजित प्रतीक्षा | अनिल पाराशर ‘मासूम’

“अच्छा हुआ तूने किसी का तो फ़ोन उठाया। शायद अपने किसी दोस्त का ही उठाया होगा, नहीं तो अब तक सब कुछ राख हो गया होता। ये तुझे देखना चाहती थी, तुझे दिखना चाहती थी, पर तू हर फ़ोन काट रहा था। अफ़सोस! अब तू तो इसे देख सकता है, पर यह तुझे देख नहीं सकती। अगर तू फ़ोन उठा लेता, तो शायद ये नहीं जाती, रुक जाती।” महेंद्र नाथ जी ने अपने बेटे श्रीकांत के कंधे पर अपना हाथ रखते हुए कहा।

श्रीकांत यह भी नहीं कह सका कि मुझे बुलाया क्यों नहीं, क्योंकि रात को पार्टी में जाने के बाद उसने सभी घर वालों के फ़ोन उठाने बंद कर दिए थे। ऐसा पहली बार नहीं हुआ था, यह उसकी आदत थी। अब रात को जितनी पी हुई थी, सब उतर चुकी थी। मन में एक दुःख भी था, पर अब कुछ हो नहीं सकता था।

महेंद्र नाथ जी ने कविता के चेहरे से कपड़ा हटाते हुए कहा “कांत, एक बार देख ले और बता पहचानता है इसे?”

“आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? क्यों नहीं पहचानूँगा अपनी माँ को?” श्रीकांत ने आँसू पोंछते हुए कहा।

मैंने तो इस बात पर ध्यान नहीं दिया था, परंतु जाने से पहले कविता बोल रही थी “कांत को तीन दिन से नहीं देखा, तीन दिन से उसकी पार्टी चल ही रही है। एक बात सोचती हूँ कि जब वह यहाँ होता है तब उसके कमरे में जाकर उसे सोते हुए जरूर देखती हूँ और देखकर संतोष कर लेती हूँ। उसका चेहरा मुझे पूरा याद रहता है, हमेशा ही याद रहेगा। पर क्या वह मुझे देखकर पहचान लेगा? कई महीनों से उसने घर में रहते हुए भी नज़र भरके मुझे नहीं देखा है; जबकि पिछले कुछ महीनों में मैं उसकी चिंता में बहुत बदल गई हूँ। अगर मुझे कुछ हो जाए, तो मेरे चेहरे से कपड़ा हटाकर उसे बता ज़रूर देना कि ये तुम्हारी माँ थी, तब शायद वह पहचान जाए।”

श्रीकांत फूट-फूटकर रोने लगा। काँपती आवाज़ में कहने लगा- “पापा संस्कार कब करना है?”

“तूने दर्शन कर लिए और पहचान लिया माँ को, यही बहुत है। बहुत ख़ुश होगी वह, जहाँ भी होगी। रही बात संस्कार की, तो उसे तो तू रहने ही दे। तेरी शराब और तेरे दोस्त तेरा इंतिज़ार कर रहे होंगे, अब तू जा सकता है। संस्कार का काम मैं स्वयं देख लूँगा। तूने अक्सर अपनी माँ से कहा था “आपने मेरे लिए किया ही क्या है?”, तो आज तू भी बदला ले ले, आख़िरी ज़िम्मेदारी पूरी न करके।”

एक बात और कही थी कविता ने कि “कांत से कहना उसने मेरे घर पैदा होकर मुझे ज़िंदगी की सबसे बड़ी ख़ुशी दी थी। वही ख़ुशी मैं कांत को दूँगी उसके घर जन्म लेकर। मगर वह दुःख उसे कभी नहीं दूँगी, जो उसने जवान होकर मुझे दिए; बल्कि उसके सारे दुःख माँग लूँगी।” कहते-कहते महेंद्र नाथ जी की आँखें भीग गईं।

वे धीरे से बोले “बेटा अपने सफ़र पर निकल जा ताकि मैं भी कविता को उसके आख़िरी सफ़र पर ले चलूँ। अपना ख़याल रखना। एक बात और, मुझे लगता था कि जो शराब पीता है, शराब उसकी जान ले लेती है; मगर तेरी शराब ने कविता की जान ले ली। हो सके तो शराब छोड़ देना, तेरी माँ यही चाहती थी।”

आख़िरी बार श्रीकांत की तरफ पीठ करके महेंद्र नाथ बोले “जब मैं जाऊँगा तो कोशिश करूँगा तेरे किसी दोस्त को भी इस बात का पता ना चले। मैं आराम से जाना चाहूँगा और तेरे आराम में कभी खलल नहीं डालना चाहूँगा। हाँ! मगर मैं भूल नहीं सकूँगा कि तूने मेरी कविता को मुझसे छीन लिया। मैं तो ग़ुस्सा भी नहीं हो सकता तुझ पर; क्योंकि कविता ने कहा था “आप उसे कुछ कहना नहीं, आप के ग़ुस्सा करते ही वह अपना आपा खो देता है और उसकी तबियत ख़राब हो जाती है।”

तभी आवाजें गूँजने लगीं- “राम नाम सत्य है।”

श्रीकांत को लगा उसके दोनों पैरों में जैसे कीलें गड़ी हुईं थीं। न वो माँ के साथ चल सकता था, न ही अपनी दुनिया में लौट सकता था।

अवधी भाषा में लिखी मधुरस पंखुड़ियां साझा काव्य संग्रह पुस्तक का हुआ विमोचन

रायबरेली: अवधी भाषा में लिखी मधुरस पंखुड़ियां साझा काव्य संग्रह पुस्तक का हुआ विमोचन । अवधी भाषा अवध के क्षेत्र की भाषा है जिसे आगे बढ़ाने के लिए साहित्यकारों का एक समूह काम कर रहा है जिसका एक पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम रायबरेली में आयोजित हुआ l

अवधी मधुरस कला समन्वय समिति अमेठी के तत्वाधान में आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में भाषा सलाहकार डॉ संतलाल उपस्थित रहे संयुक्त रूप से प्रकाशित मधुरस पंखुड़ियां साझा काव्य संग्रह पुस्तक में अवधी भाषा में लिखी कविताओं को संकलित किया गया है l
कार्यक्रम में अनिल कुमार सिंह, शिव कुमार सिंह ‘शिव’ डॉ रामगोपाल जायसवाल, डॉ मनोज सिंह ,जितेंद्र सिंह और अंकित सैनी के साथ अवधी भाषा के प्रख्यात विद्वान इंद्रेश भदोरिया व हिंदी रचनाकार समूह के संस्थापक अभिमन्यु सिंह भी मौजूद रहे l

मुख्य अतिथि डॉक्टर संतलाल ने बताया कि अवधी भाषा का इतिहास रामायण काल से माना जाता है इसलिए यह पुरानी भाषाओं में गिनी जाती है भले ही शहर के लोग इसे बोलने में संकोच करते हैं लेकिन गांव क्षेत्र में आज भी यह भाषा प्रचलित है जिसे संकलित करके आगे बढ़ाने की आवश्यकता है l

बिहार में विद्या वाचस्पति सम्मान से सम्मानित हुए जिले के प्रख्यात अवधी विद्वान इंद्रेश भदौरिया

साहित्य के क्षेत्र में रायबरेली जिले का नाम भी स्वर्णिम अक्षर से लिखा जाता है वर्तमान में अवधी भाषा के प्रख्यात विद्वान इंद्रेश बहादुर सिंह भदौरिया को बिहार में वाचस्पति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है l

मूल रूप से हरचंदपुर क्षेत्र के निवासी इंद्रेश कुमार भदौरिया अवधी भाषा के प्रख्यात विद्वान हैं उनकी कई पुस्तक अब तक प्रकाशित हो चुकी है कई बड़े-बड़े मंचों पर अपना लोहा अवधि भाषा के क्षेत्र में मनवा चुके इंद्रेश कुमार भदौरिया को बिहार प्रदेश में विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ विश्वविद्यालय के तत्वाधान में आयोजित एक मंड सम्मान कार्यक्रम में विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया गया है l

इंद्रेश कुमार भदौरिया की कई पुस्तक ऐसी है जिन पर विशेष रूप से शोध भी हो रहा है क्योंकि उन्होंने अवधी भाषा को एक स्थान दिलाने के लिए प्रयास किया है l

पुरस्कार प्राप्त करने वाले इंद्रेश कुमार भदौरिया का कहना है कि जिस तरह भोजपुरी अब बुंदेली भाषा को महत्व दिया जाता है वैसे ही अवधी भाषा को भी महत्व देना चाहिए क्योंकि यह मीठी भाषा अवध क्षेत्र के गांव में बोली जाती है लेकिन शहर के लोग इसे बोलने में संकोच करते हैं जबकि घर के अंदर इसी भाषा का उपयोग आपस में बात करने के लिए किया जाता है तो क्यों ना इस भाषा को प्रचारित और प्रसारित करके सामाजिक जीवन में भी बोलने के लिए प्रयोग किया जाए l

वाचस्पति पुरस्कार से सम्मानित होने पर जिले के साहित्यकार भाषा सलाहकार डॉ संतलाल, पुष्पा श्रीवास्तव शैली, अशोक कुमार, डॉक्टर प्रियंका, रत्ना भदौरिया और कल्पना अवस्थी ने इंद्रेश भदौरिया को शुभकामनाएं दी है l

Weekend Top

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martyred shailendra pratap singh par kavita

जम्मू कश्मीर के सोपोर जिले मेँ आतंकी हमले मेँ शहीद सीआरपीएफ रायबरेली के जवान शैलेन्द्र प्रताप सिंह के लिए हिंदी विद्धान दयाशंकर जी की कविता martyred shailendra pratap singh par kavita

*शहीद सैनिक शैलेन्द्र सिंह को समर्पित*

बालक शैलेन्द्र का बाल्यकाल,

ग्रामांचल मध्य व्यतीत हुआ।

प्रारंभिक शिक्षा हेतु माता ने,

ननिहाल नगर को भेज दिया ।

अपने सीमित श्रम साधन से,

प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण किया।

चल पड़े कदम देश की सेवा को,
दायित्व भार जो मिला तुम्हे,

उसको पूरा करना होगा ।

है शत्रु खड़ा जो सीमा पर,
उसका रण-मद हरना होगा।

रण की वेदी पर कभी कभी,
कुछ पुष्प चढ़ाने पड़ते हैं।

कुछ महा वीर होते शहीद,
जो मातृभूमि हित लड़ते हैं।

वह मौन हो गया परमवीर,
अपने पीछें संदेश छोड़ गया ।

भावी    युवकों की  आंखों   को,
भारत की सीमा की ओर मोड़ गया।

स्वर गूंजा मत रोना मुझको तिरंगे में लिपटे होने पर,
मत     तर्पण     करना    आंखों   के   पानी   का।

करना है तो तर्पण करना,
सीमा पर प्रखर जवानी का ।

श्रद्धांजलि मुझको देते हो,
तो साथ शपथ लेनी होगी।

भारत की सीमा पर वीरों प्राणों की आहुति अपनी देनी होगी।
जो दीप जलाया है मैंने,
वह बुझे नहीं बरखा व तूफानों से।

उसकी लौ क्रीड़ा करती रहे सतत,

आजादी के परवानों से।
*दया शंकर*
राष्ट्रपति पुरस्कृत,साहित्यकार
पूर्व अध्यक्ष हिंदी परिषद रायबरेली

2

nahin thaharata hai vakt

नहीं ठहरता है वक्त

ए मुसाफ़िर सब बीत जायेगा
यह वक़्त कभी ठहरा ही नहीं !
रफ्त़ा- रफ़्ता निकल जायेगा
उजाले कब तलक क़ैद रहेंगे
देखना ! कल सुबह
अपनी रिहाई के
गीत ज़रूर गायेंगे
माना कि
आज सारे जुगनूं
तम से संधि कर
उजालों को चिढ़ा रहे हैं
जब अंधकार की छाती चीरकर
कल
रश्मियां विकीर्ण हो जायेंगी
तो इन्हीं में से कुछ जुगनूं
आफ़ताब से भी हाथ मिलायेंगे
ए मुसाफ़िर सब बीत जायेगा
ये वक्त कभी ठहरा ही नहीं!
आज आंजनेय के बध के लिए
बिसात बिछाई जा रही है
एक और सुरसा की ज़िंदगी
दांव पर लगाई जा रही है
लेकिन झूठ के वक्ष को चीरकर
जब
सत्य का सूर्य कल उदित होगा
तो देखना! यही अंधेरे
दिन में ही दिनकर
से हाथ मिलायेंगे
ए मुसाफ़िर सब बीत जायेगा
ये वक्त कभी ठहरा ही नहीं

संपूर्णानंद मिश्र
प्रयागराज फूलपुर

 

3

Dr rasik kishore singh neeraj ka rachna sansar

Dr rasik kishore singh neeraj ka rachna sansar
डॉ. रसिक किशोर सिंह ‘नीरज’ की इलाहाबाद से वर्ष 2003 में प्रकाशित पुस्तक ‘अभिलाषायें स्वर की’ काव्य संकलन में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गीत कारों ,साहित्यकारों ने उनके साहित्य पर अपनी सम्मति प्रकट करते हुए कुछ इस प्रकार लिखे हैं

भूमिका

कविता अंतस की वह प्रतिध्वनि है जो शब्द बनकर हृदय से निकलती है। कविता वह उच्छ् वास है जो शब्दों को स्वयं यति- गति देता हुआ उनमें हृदय के भावों को भरना चाहता है क्योंकि कविता उच्छ् वास है और उच्छ् वास स्वर का ही पूर्णरूप है, अतः यदि स्वर की कुछ अभिलाषाएँ हैं तो वे एक प्रकार से हृदय की अभिलाषाएँ ही हैं जो काव्य का रूप लेकर विस्तृत हुई हैं ।’अभिलाषायें स्वर की’ काव्य संग्रह एक ऐसा ही संग्रह है इसमें कवि डॉ. रसिक किशोर सिंह ‘नीरज’ ने अपनी अभिलाषाओं के पहले स्वर दिए फिर शब्द।

 

कवि डॉ. रसिक किशोर ‘नीरज‘ ने इस संग्रह में कविता के विभिन्न रूप प्रस्तुत किए हैं। उदाहरणतया उन्होंने अतुकांत में भी कुछ कवितायें लिखी हैं एक प्रश्न तथा अस्मिता कविता इसी शैली की कविताएं हैं तथा पवन बिना क्षण एक नहीं….. वह तस्वीर जरूरी है…… किसी अजाने स्वप्नलोक में…… अनहद के रव भर जाता है…. पत्र तुम्हारा मुझे मिला….. खिलता हो अंतर्मन जिससे….
विश्व की सुंदर सुकृति पर….. मित्रता का मधुर गान……. चढ़ाने की कोशिश……. चूमते श्रृंगार को नयन…… बनाम घंटियां बजती रही बहुत…… जो भी कांटो में हंसते ……..जिंदगी थी पास दूर समझते ही रह गये…….. गीत लिखता और गाता ही रहा हूं……. श्रेष्ठ गीत हैं इन रचनाओं में कवि ने अपने अंतर की प्रति ध्वनियों को शब्द दिए हैं
डॉ. कुंंअर बैचेन गाज़ियाबाद
2. कविता के प्रति नीरज का अनुराग बचपन से ही रहा है बड़े होने पर इसी काव्य प्रेम ने उन्हें सक्रिय सृजनात्मक कर्म में प्रवृत्त कियाl यौवनोमष के साथ प्रणयानुभूति उनके जीवन में शिद्त से उभरी और कविता धारा से समस्वरित भी हुई ।वह अनेक मरुस्थलों से होकर गुजरी किन्तु तिरोहित नहीं हुई। संघर्षों से जूझते हुए भावुक मन के लिए कविता ही जीवन का प्रमुख सम्बल सिद्ध हुई
डॉ. शिव बहादुर सिंह भदौरिया

इस प्रकार रायबरेली के ही सुप्रसिद्ध गीतकार पंडित बालकृष्ण मिश्र ने तथा डॉ. गिरजा शंकर त्रिवेदी संपादक नवगीत हिंदी मुंबई ने और डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी बरेली आदि ने अपनी शुभकामनाएं देते हुए डॉ. नीरज के गीतों की प्रशंसा की है

(1). पारब्रह्म परमेश्वर

पारब्रह्म परमेश्वर तेरी
जग में सारी माया है।
सभी प्राणियों का तू
नवसृजन सृष्टि करता
तेरी ही तूलिका से
नव रूप रंग भरता।
कुछ रखते सत् विचार
कुछ होते अत्याचारी
तरह तरह के लोग यहाँँ
आते, रहते बारी-बारी ।
जग के रंगमंच में थोड़ा
अभिनय सबका आया है।
कहीं किसी का भेद
खेद हो जाता मन में
नहीं किसी की प्रगति
कभी देखी जन-जन में ।
सदा सदा से द्वेष
पनपता क्यों जीवन में
माया के चक्कर में
मतवाले यौवन में।
‘नीरज’ रहती नहीं एक सी
कहीं धूप व छाया है।।

(2).राम हमारे ब्रह्म रूप हैंं

राम हमारे ब्रह्म रूप हैं ,राम हमारे दर्शन हैं ।
जीवन के हर क्षण में उनके, दर्शन ही आकर्षण हैं ।।
हुलसी सुत तुलसी ने उनका
दर्शन अद्भुत जब पाया ।
हुआ निनाँदित स्वर तुलसी का
‘रामचरितमानस’ गाया।।
वैदिक संस्कृति अनुरंजित हो
पुनः लोक में मुखर हुई ।
अवधपुरी की भाषा अवधी
भी शुचि स्वर में निखर गई।।
कोटि-कोटि मानव जीवन में, मानस मधु का वर्षण है ।
राम हमारे ब्रह्म रूप हैं राम, हमारे दर्शन हैं।।
ब्रह्म- रूप का रूपक सुंदर ,
राम निरंजन अखिलेश्वर ।
अन्यायी के वही विनाशक,
दीन दलित के परमेश्वर ।।
सभी गुणों के आगर सागर ,
नवधा भक्ति दिवाकर हैं।
मन मंदिर में भाव मनोहर
निशि में वही निशाकर है।
नीरज के मानस में प्रतिपल, राम विराट विलक्षण हैंं।
राम हमारे ब्रह्म रूप हैं , राम हमारे दर्शन हैं।

(3).शब्द स्वरों की अभिलाषायें

रात और दिन कैसे कटते
अब तो कुछ भी कहा ना जाये
उमड़ घुमड़ रह जाती पीड़ा
बरस न पाती सहा न जाये।
रह-रहकर सुधियाँ हैं आतीं
अन्तस मन विह्वल कर जातीं
संज्ञाहीन बनातीं पल भर
और शून्य से टकरा जातीं।
शब्द स्वरों की अभिलाषायें
अधरों तक ना कभी आ पायें
भावों की आवेशित ध्वनियाँ
‘ नीरज’ मन में ही रह जायें।

(4). समर्पण से हमारी चेतना

नई संवेदना ही तो
ह्रदय में भाव भरती है
नई संवेग की गति विधि
नई धारा में बहती है ।
कदाचित मैं कहूँँ तो क्या कि
वाणी मौन रहती है
बिखरते शब्द क्रम को अर्थ
धागों में पिरोती है ।
नई हर रश्मि अंतस की
नई आभा संजोती है
बदल हर रंग में जलती
सतत नव ज्योति देती है।
अगर दीपक नहीं जलते
बुझी सी शाम लगती है
मगर हर रात की घड़ियाँ
तुम्हारे नाम होती हैं।
नया आलोक ले ‘नीरज’
सरोवर मध्य खिलता है
समर्पण से हमारी चेतना
को ज्ञान मिलता है ।

(5).नाम दाम के वे नेता हैं

कहलाते थे जन हितार्थ वह
नैतिकता की सुंदर मूर्ति
जन-जन की मन की अभिलाषा
नेता करते थे प्रतिपूर्ति।
बदले हैं आचरण सभी अब
लक्षित पग मानव के रोकें
राजनीति का पाठ पढ़ाकर
स्वार्थ नीति में सब कुछ झोंके।
दुहरा जीवन जीने वाले
पाखंडी लोगों से बचना
शासन सत्ता पर जो बैठे
देश की रक्षा उनसे करना।
पहले अपनी संस्कृति बेची
अब खुशहाली बेंच रहे हैं
देश से उनको मोह नहीं है
अपनी रोटी सेक रहे हैं।
देशभक्ति से दूर हैं वे ही
सच्चे देश भक्त कहलाते
कैसे आजादी आयी है
इस पर रंचक ध्यान न लाते।
कथनी करनी में अंतर है
सदा स्वार्थ में रहते लीन
नाम धाम के वे नेता हैं
स्वार्थ सिद्धि में सदा प्रवीन।

(6). आरक्षण

जिसको देखो सब ऐसे हैं
पैसे के ही सब पीछे हैं
नहीं चाहिए शांति ज्ञान अब
रसासिक्त होकर रूखे हैं।
शिक्षा दीक्षा लक्ष्य नहीं है
पैसे की है आपा धापी
भटक रहे बेरोजगार सब
कुंठा मन में इतनी व्यापी ।
आरक्षण बाधा बनती अब
प्रतिभाएं पीछे हो जातीं
भाग्य कोसते ‘नीरज’ जीते
जीवन को चिंतायें खातीं ।
व्यथा- कथा का अंत नहीं है
समाधान के अर्थ खो गये
आरक्षण के संरक्षण से
मेधावी यों व्यर्थ हो गये।
सत्ता पाने की लोलुपता ने
जाने क्या क्या है कर डाला
इस यथार्थ का अर्थ यही है
जलती जन-जीवन की ज्वाला।

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प्यार का गीत – बाबा कल्पनेश

प्यार का गीत – बाबा कल्पनेश
प्यार का गीत
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत,
जिसमें हार हुई हो मेरी और तुम्हारी जीत।
कई जन्म बीते हैं हमको करते-करते प्यार,
तन-मन छोड़े-पहने हमने आया नहीं उतार।
छूट न पाया बचपन लेकिन चढ़ने लगा खुमार,
कितने कंटक आए मग में अवरोधों के ज्वार।
हम दोनों का प्यार भला कब बनता अहो अतीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
तुम आयी जब उस दिन सम्मुख फँसे नयन के डार,
छिप कर खेले खेल हुआ पर भारी हाहाकार।
कोई खेल देख पुरवासी लेते नहीं डकार,
खुले मंच से नीचे भू पर देते तुरत उतार।
करने वाले प्यार भला कब होते हैं भयभीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
नदी भला कब टिक पायी है ऊँचे पर्वत शृंग,
और कली को देखे गुप-चुप रह पाता कब भृंग।
नयनों की भाषा कब कोई पढ़ पाता है अन्य,
पाठ प्यार का पढ़ते-पढ़ते जीवन होता धन्य।
जल बिन नदी नदी बिन मछली जीवन जाए रीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
कभी मेनका बन तुम आयी विश्व गया तब हार,
हुई शकुंतला खो सरिता तट लाए दिए पवार।
कण्वाश्रम पर आया देखा सिर पर चढ़ा बुखार,
भरत सिंह से खेल खेलता वह किसका उद्गार।
वही भरत इस भारत भू पर हम दोनों की प्रीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
श्रृद्धा मनु से शुरू कहानी फैली मानव वेलि,
अब भी तो यह चलता पथ पर करता सुख मय केलि।
इसे काम भौतिक जन कहते हरि चरणों में भक्ति,
आशय भले भिन्न हम कह लें दोनो ही अनुरक्ति।
कभी नहीं थमने वाली यह सत्य सनातन नीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
बाबा कल्पनेश