राम लौट घर आये हैं। हरिश्चन्द्र त्रिपाठी’हरीश

आओ मिल-जुल खुशी मनायें,
राम लौट घर आये हैं,
चलो अवध सन्देशा लेकर,
घर-घर अक्षत आये हैं।टेक।

गहन निशा की मिटी कालिमा,
दुर्दिन सारा बीत गया,
नये भोर की अगवानी को,
बरस पॉच सौ रीत गया।
रात अंधेरी गुजर गई अब,
नव प्रभात फिर आये हैं।
आओ मिल-जुल खुशी मनायें,
राम लौट घर आये हैं1।

विध्वंसक भाव विचारों की,
हो गई पराजित बर्बरता,
सत्य-न्याय का बिगुल बज रहा,
चहॅक उठी है मानवता।
राष्ट्र-धर्म के गीत सुनाते,
अधर सुधा छलकाये हैं।
आओ मिल-जुल खुशी मनायें,
राम लौट घर आये हैं।।2।

क्षिति-जल-अम्बर जगत देखता,
दसों दिशायें , दनुज , देवता।
शेष विधर्मी राह झॉकते,
चाह रहे कुछ मिले नेवता।
विश्व-पटल पर कौतूहल के,
मेघ सनातन छाये हैं।
आओ मिल-जुल खुशी मनायें,
राम लौट घर आये हैं।3।

निरख नियति की व्यग्र भावना,
करते कोटिक कंठ साधना।
राम हमारे सभी राम के,
कौन अभागा जिसे चाव ना।
धन्य सुपावन भूमि अवध की,
हनुमत शीश नवाये हैं।
आओ मिल-जुल खुशी मनायें,
राम लौट घर आये हैं।4।

रचना मौलिक,अप्रकाशित,स्वरचित,सर्वाधिकार सुरक्षित है।

हरिश्चन्द्र त्रिपाठी’हरीश;
रायबरेली (उप्र) 229010

एक समीक्षा | पुस्तक अठारह पग चिन्ह | पुष्पा श्रीवास्तव ‘शैली’ | रश्मि लहर

एक समीक्षा
पुस्तक अठारह पग चिन्ह
लेखिका** आदरणीया रश्मि लहर जी
पृष्ठ*95 मूल्य ₹150/
प्रकाशन * बोधि प्रकाशन
Isbn:9789355367945
सी *8,इक्षुपुरी कॉलोनी,लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
मो• 917565001657

‘अठारह पग चिन्ह’

“तुम्हे देखा नहींं लेकिन नज़र में बस गए हो तुम,
ये सच है हॅंसी की सुरमई सी लालिमा हो तुम।”

बड़ी रोचक बात है कि हमने एक-दूसरे को अभी तक देखा नहीं है ,लेकिन विश्वास की नदी का प्रवाह गति के साथ अविरल है।
पंक्तियाॅं उकेरते हुए मन आह्लादित हो उठा।

मेरी प्रिय सखी रश्मि ‘लहर’ जी का कहानी संग्रह ‘अठारह पग चिन्ह’ हाथ में आते ही अथाह प्रसन्नता हुई।

जीवन-लहरों से अंजुरी भर अनुभवों को बटोरते हुए, शब्दों के माध्यम से कागज पर उकेरते हुए, हृदय पर अंकित कर देने का अद्भुत प्रयास कहानीकार की लेखनी को शीर्ष पर विराजमान कर देता है।

‘अठारह पग चिन्ह’ नाम को सार्थकता प्रदान करते हुए हर पग पर जीवन का एक चित्र मिलता है। इस यात्रा में कहानीकार और पाठक के बीच का अन्तर समाप्त होता महसूस किया हमने।

आदरणीय माया मृग जी का ये वक्तव्य कि
“ये आपकी कहानियाॅं हैं, सिर्फ कहानीकार की नही” अक्षरशः सत्य सिद्ध होता है।

यात्रा प्रारंभ करते ही ‘लव यू नानी’
पत्र के माध्यम से बड़ा ही मजबूत संदेश देती हुई कहानी मन को भाव विभोर कर जाती है।

‘करवा चौथ’ जैसी कहानी मानवता के दायित्व का निर्वहन दर्शाती है।आगे बढ़ते हुए पुनः जीवन के बीच से उभर कर मन को आह्लादित कर देती है।

कहानी ‘प्रेम के रिश्ते’ में पर शोएब चचा कोरोना जैसी महामारी को भी अपने दायित्व के बीच नहीं आने देते। मानवता की मशाल जलाते हुए यह कहानी समाज को एक सीख दे जाती है।

‘बावरी’ को पढ़ते हुए ऑंख भर आती है, स्वतः एक चित्र मस्तिष्क पर खिंच जाता है।हृदय चीख उठता है।

अनुत्तरित प्रेम के दीप के रूप में ‘अनमोल’
कहानी निरंतर मद्धम लौ की तरह प्रकाशित होते रहने का पर्याय है।

ममता का सिंधु समेटे समाधान के साथ खड़ी हो जाती हैं ‘अम्मा’।

‘अचानक’ कहानी को पढ़ते वक्त मन तीन स्थान पर ठहरता है।

पहला कि नकारात्मकता गुंडो के रूप में समाज में अवसर मिलते ही हावी हो जाती है।
दूसरा दादी के रूप में दूसरे की पीड़ा को न समझने वाले लोग। और तीसरा संकल्प और संकल्प की माॅं ,जो रूढ़ियों को तोड़ते हुए सुलभा की पीड़ा में दुखी हैं, और सुलभा से विवाह करने के लिए अड़े हुए हैं। यह कहानी समाज के बीच पथ प्रदर्शिका का कार्य करती है। कहानीकार और लेखनी दोनो को
साधुवाद।

‘असली उत्सव’, ‘अद्भुत डॉक्टर’, ‘तेरी बिंदिया रे’ सभी कहानियाॅं पाठक को बाॅंधें रखने में समर्थ हैं।

धीरे-धीरे कदम रखते हुए ‘लव यू गौरव’ और ‘गुलगुले’ पर ठहरना पड़ जाता है।

मां की ममता और संवेदना की लहर थामे नहीं थमती है। कहानी समाप्त होते-होते नेत्रों का बाॅंध टूट जाता है, और ऑंसू रूपी गुलगुले बिखर जाते हैं।

प्रणाम करती हूॅं कहानीकार की अंजुरी को जिसमें भावनाओं के पुष्प एक गुच्छ के रूप में एक साथ समाहित हैं।

‘अतीत के दस्तावेज’ में आज के स्वार्थी संतानों की लालची और विकृत मानसिकता को उधेड़ने का सार्थक प्रयास करते हुए नज़र आती है लेखनी।

‘शिरीष’, ‘संयोग’ और ‘कैसे-कैसे दु:ख’ के माध्यम से जीवन के बड़े नाज़ुक पहलुओं को छूने का प्रयास किया है कहानीकार ने।

एक के बाद एक सभी कहानियाॅं भावनात्मकता का सजीव निर्वाह करती हैं।प्रवाहमयता के साथ-साथ पाठक को अपने में डुबा लेने का अद्भुत सामर्थ्य है इन कहानियों में।

ये समाज के बीच ज्वलंत प्रश्नों को उठाती हैं, और समाधान भी प्रस्तुत करती हैं तथा अंत में उद्देश्य परक संदेश प्रेषित करते हुए सार्थकता को पोषित करती हैं।

मैं ‘अठारह पग चिन्ह’ कहानी संग्रह की सफलता की कामना करती हुई प्रिय मित्र रश्मि ‘लहर’ जी की लेखनी और भावों की सरिता का आचमन करते हुए प्रणाम करती हूॅं।

पुष्पा श्रीवास्तव ‘शैली’
रायबरेली

नए भवन में | दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश

राम आए पधारे,
नए भवन में।
नींद भर करके सोए,
नए भवन में।
साथ लक्ष्मण,मां सीता,
और हनुमत भी हैं।
साथ उनके ये सारा,
जनमत भी है।
सारी खुशियां पधारीं,
नए भवन में।
भाई शत्रुघ्न,भरत,
कैकई,कौशल्या भी।
राजा दशरथ, सुमित्रा,
आई उर्मिला भी।
देख खुशियां मनाईं,
नए भवन में।
सरयू नदिया का पानी,
भी इठलाता है।
आज कितना हूं खुश,
सबको बतलाता है।
प्रीति की फुहार बरसी,
नए भवन में।
राम जी की कृपा,
सदा सबको मिले।
उनके आशीष से,
जीवन सबका खिले।
स्वर्ग से फूल बरसे,
नए भवन में।
अब तो ‘दुर्गेश’ का,
मन उछलनें लगा।
हर घड़ी राम का,
नाम जपने लगा।
बहे खुशियों के आंसू,

नए भवन में।

(सारे अधिकार लेखक के आधीन)
दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश

शतक संगति समारोह में सविता चडढा जन सेवा समिति सम्मानित”

नई दिल्ली : काकासाहेब कालेलकर एवं विष्णु प्रभाकर की स्मृति में आयोजित सन्निधि की सौ संगोष्ठी पूर्ण होने पर शतक संगति समारोह का आयोजन गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा नई दिल्ली में आयोजित किया गया।इस अवसर पर विभिन्न साहित्यकारों एवं उत्कृष्ट कार्य करने वाली समिति और संस्थाओं को भी सम्मानित किया। साहित्य ,कला,संस्कृति एवं सामाजिक सरोकारों को समर्पित सविता चडढा जन सेवा समिति को भी उनके साहित्य अनुराग, विशिष्ट साहित्य सेवा एवं समाज सेवा तथा नव युवाओं को प्रोत्साहन द्वारा समाज को जागरुक एवं समर्थ करने के उत्कृष्ट एवं निष्ठा पूर्ण प्रयासों के लिए विशिष्ट सेवा सम्मान 2024 प्रदान किया गया ।इस अवसर पर देशभर से पधारे साहित्यकारों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की।


कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सुप्रसिद्ध हास्य कवि श्री सुरेंद्र शर्मा जी रहे जिन्होंने हिंदी भाषा एवं अन्य भाषाओं पर अपने सारगर्भित विचार प्रस्तुत किये। इस अवसर पर जनसत्ता के संपादक और लेखक मुकेश भारद्वाज और वरिष्ठ आलोचक डॉ गोपेश्वर सिंह की उपस्थिति उल्लेखनीय रही ।कार्यक्रम में सभी अतिथियों का स्वागत अतुल प्रभाकर ने किया । कार्यक्रम का उत्कृष्ट संचालन प्रसून लतांत ने किया ।

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सजा | रत्ना भदौरिया | लघुकथा

कल के दृश्य ने वो गाना सार्थक कर दिया ‘मेरा गम तेरे ग़म से कितना कम है ‘। अभी तक गाना खूब सुना ,गुनगुनाया लेकिन हमेशा लगता रहा कि नहीं दुनिया में मुझसे ज्यादा दुखी कोई भी नहीं है। कल के दृश्य ने सबकुछ बदल दिया और लगने लगा अरे ! मुझसे कम दुखी कोई नहीं है। मेरी और नंदिनी की बात अभी ज्यादा पहले नहीं शुरू हुई थी महज एक महीना हुआ था लेकिन दोनों को एक दूसरे पर विश्वास ऐसा जम गया मानो बचपन की सहेलियां हों। काम की व्यस्तता की वजह से फोन पर कम ही बातें होती मैसेज से हाल खबर रोज ही हो जाती। इन एक महीने में तीन से चार बार फोन पर बात हुई। लेकिन ज़्यादातर दो से तीन मिनट ही बात सम्भव हो पायी।कल हम दोनों फ्री थे मेरा कुछ स्वास्थ्य ठीक नहीं था और नंदिनी की कालेज की छुट्टी थी। बातों का दौर लम्बा चला तो उसने उस दृश्य का जिक्र किया जो मेरे लिए दृश्य लेकिन उसकी कहानी थी। नंदिनी ने बात मेरी शादी से शुरू की । तो मैंने कहा नहीं यार अभी नहीं वैसे सच बताऊं करना नहीं चाहती कोई रुचि नहीं है। भाई ,बहन , मां- बाप सब लोग हैं नौकरी भी है फिर क्या जरूरत आज कल वैसे भी लड़कों का कोई भरोसा नहीं। वैसे नंदिनी आपकी शादी हो गयी क्या? नहीं मैं तो चालीस से ऊपर की हो गयी अब क्या करूंगी शादी करके ? क्या ?आप तो बहुत बड़ी हैं मुझसे माफ़ी चाहूंगी हमेशा आपका नाम या यार कहकर बुलाती रही मैं इतनी बेवकूफ कभी पूछा भी नहीं।

अरे नहीं कोई बात नहीं बिट्ट सब चलता है। शादी नहीं की इसके पीछे बहुत बड़ी कहानी है। बताइये ना दीदी आज मैं बिल्कुल व्यस्त नहीं हूं मैंने कहा। नहीं बिट्टू फिर कभी बताऊंगी। नहीं दीदी मैं जिद्द करने लगी । चलो अच्छा इतनी जिद्द कर रही हो तो बता ही देती हूं। आज के बीस साल पहले पापा सरकारी मास्टर के पद से रिटायर हुए और घर पर रहने लगे। एक साल व्यतीत भी नहीं हुआ था कि पापा को कैंसर हो गया उनके रिटायरमेंट के जितने पैसे थे सब उनकी दवाई में लग गये और दुर्भाग्य देखो उसी दौरान कोरोना आ गया मैं प्राइवेट स्कूल अध्यापिका थी कालेज की नौकरी तो बाद में मिली, नौकरी छूट गयी पापा को कैंसर के साथ -साथ कोरोना भी हो गया।

मां भी पापा की देखभाल करते -करते कोरोना की शिकार हो गयी। और एक एक करके दोनों चलते बने। घर ,पैसा जो भी बचा था दोनों भाईयों ने ले लिया मैं अकेले रह गयी। फिर पता है बिट्टू सब लोग कहते इसका भी कहीं रिश्ता कर दो । दोनों भाइयों ने योजना बनाई और जितने भी रिश्ते आते वे तोड़वा देते एक भाई एक कमी निकालता तो दूसरा दूसरी कमी , कोई रिश्ता ही नहीं हो पा रहा था। पास पड़ोस के लोग और भी बोलने लगे थे लेकिन भाइयों को कोई फर्क नहीं पड़ा, एक सबसे दुर्भाग्य का दिन तब आया जब पता चला कि मुझे पागल होने के लिए दवाईयां दी जा रही थी वो भी भाइयों के द्वारा इसका कारण जानने कि कोशिश कि तो पता चला कि महज यह कारण था ,अब इसे संभाले कौन और शादी में तनिक रकम नहीं खर्च होती कौन करे इतने पैसे खर्च —-।

फिर पता है बिट्टू मैंने कहा दिया ना किसी को किसी के सामने गिड़गिड़ाने की जरूरत है और ना ही मेरे बारे में चिंता करने की आप सब अपना अपना देखो। उस दिन से चौकन्नी और सतर्कता के साथ काम करने लगी भगवान का शुक्र रहा कि जल्द ही गांव के एक स्कूल में नौकरी मिल गयी। बिट्टू आज मैं पैंतालीस साल की हो गयी हूं और खुश हूं अपनी दुनिया में लेकिन दोनों भाईयों को जब कभी कभी दुखी देखती हूं तो समझ नहीं पाती की उनको क्या कहूं उनके किये की सजा है या कुछ और ——।

सखियां मंगल गाओ | प्रतिभा इन्दु

आने वाला है वह शुभ दिन
मिलकर हर्ष मनाओ ,
आयेंगे श्री राम अवध में
सखियाँ मंगल गाओ !

वर्षों से प्यासी आँखों में
नूतन आस जगी है ,
आने वाला है वह क्षण , उस
पथ पर दृष्टि लगी है ।
द्वार-द्वार पर बनी रंगोली
कंचन थाल सजाओ !
आयेंगे श्रीराम अवध में
सखियाँ मंगल गाओ !

इंतजार के बाद सामने
चिर प्रतीक्षित घड़ियाँ ,
सारी अड़चन दूर हुई अब
टूट गई हथकड़ियाँ ।
प्रभु के पग जिस जगह पड़ेंगे
उस पर फूल सजाओ !
आयेंगे श्रीराम अवध में
सखियाँ मंगल गाओ !

राम पिता हैं सकल विश्व के
जननी सीता माई ,
धर्म , अर्थ औ” काम,मोक्ष हैं
रघुवर चारों भाई ।
नवल रंग , नूतन उमंग भर
धर्म-ध्वजा फहराओ !
आयेंगे श्रीराम अवध में
सखियाँ मंगल गाओ !

प्रतिभा इन्दु

Weekend Top

1

martyred shailendra pratap singh par kavita

जम्मू कश्मीर के सोपोर जिले मेँ आतंकी हमले मेँ शहीद सीआरपीएफ रायबरेली के जवान शैलेन्द्र प्रताप सिंह के लिए हिंदी विद्धान दयाशंकर जी की कविता martyred shailendra pratap singh par kavita

*शहीद सैनिक शैलेन्द्र सिंह को समर्पित*

बालक शैलेन्द्र का बाल्यकाल,

ग्रामांचल मध्य व्यतीत हुआ।

प्रारंभिक शिक्षा हेतु माता ने,

ननिहाल नगर को भेज दिया ।

अपने सीमित श्रम साधन से,

प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण किया।

चल पड़े कदम देश की सेवा को,
दायित्व भार जो मिला तुम्हे,

उसको पूरा करना होगा ।

है शत्रु खड़ा जो सीमा पर,
उसका रण-मद हरना होगा।

रण की वेदी पर कभी कभी,
कुछ पुष्प चढ़ाने पड़ते हैं।

कुछ महा वीर होते शहीद,
जो मातृभूमि हित लड़ते हैं।

वह मौन हो गया परमवीर,
अपने पीछें संदेश छोड़ गया ।

भावी    युवकों की  आंखों   को,
भारत की सीमा की ओर मोड़ गया।

स्वर गूंजा मत रोना मुझको तिरंगे में लिपटे होने पर,
मत     तर्पण     करना    आंखों   के   पानी   का।

करना है तो तर्पण करना,
सीमा पर प्रखर जवानी का ।

श्रद्धांजलि मुझको देते हो,
तो साथ शपथ लेनी होगी।

भारत की सीमा पर वीरों प्राणों की आहुति अपनी देनी होगी।
जो दीप जलाया है मैंने,
वह बुझे नहीं बरखा व तूफानों से।

उसकी लौ क्रीड़ा करती रहे सतत,

आजादी के परवानों से।
*दया शंकर*
राष्ट्रपति पुरस्कृत,साहित्यकार
पूर्व अध्यक्ष हिंदी परिषद रायबरेली

2

nahin thaharata hai vakt

नहीं ठहरता है वक्त

ए मुसाफ़िर सब बीत जायेगा
यह वक़्त कभी ठहरा ही नहीं !
रफ्त़ा- रफ़्ता निकल जायेगा
उजाले कब तलक क़ैद रहेंगे
देखना ! कल सुबह
अपनी रिहाई के
गीत ज़रूर गायेंगे
माना कि
आज सारे जुगनूं
तम से संधि कर
उजालों को चिढ़ा रहे हैं
जब अंधकार की छाती चीरकर
कल
रश्मियां विकीर्ण हो जायेंगी
तो इन्हीं में से कुछ जुगनूं
आफ़ताब से भी हाथ मिलायेंगे
ए मुसाफ़िर सब बीत जायेगा
ये वक्त कभी ठहरा ही नहीं!
आज आंजनेय के बध के लिए
बिसात बिछाई जा रही है
एक और सुरसा की ज़िंदगी
दांव पर लगाई जा रही है
लेकिन झूठ के वक्ष को चीरकर
जब
सत्य का सूर्य कल उदित होगा
तो देखना! यही अंधेरे
दिन में ही दिनकर
से हाथ मिलायेंगे
ए मुसाफ़िर सब बीत जायेगा
ये वक्त कभी ठहरा ही नहीं

संपूर्णानंद मिश्र
प्रयागराज फूलपुर

 

3

Dr rasik kishore singh neeraj ka rachna sansar

Dr rasik kishore singh neeraj ka rachna sansar
डॉ. रसिक किशोर सिंह ‘नीरज’ की इलाहाबाद से वर्ष 2003 में प्रकाशित पुस्तक ‘अभिलाषायें स्वर की’ काव्य संकलन में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गीत कारों ,साहित्यकारों ने उनके साहित्य पर अपनी सम्मति प्रकट करते हुए कुछ इस प्रकार लिखे हैं

भूमिका

कविता अंतस की वह प्रतिध्वनि है जो शब्द बनकर हृदय से निकलती है। कविता वह उच्छ् वास है जो शब्दों को स्वयं यति- गति देता हुआ उनमें हृदय के भावों को भरना चाहता है क्योंकि कविता उच्छ् वास है और उच्छ् वास स्वर का ही पूर्णरूप है, अतः यदि स्वर की कुछ अभिलाषाएँ हैं तो वे एक प्रकार से हृदय की अभिलाषाएँ ही हैं जो काव्य का रूप लेकर विस्तृत हुई हैं ।’अभिलाषायें स्वर की’ काव्य संग्रह एक ऐसा ही संग्रह है इसमें कवि डॉ. रसिक किशोर सिंह ‘नीरज’ ने अपनी अभिलाषाओं के पहले स्वर दिए फिर शब्द।

 

कवि डॉ. रसिक किशोर ‘नीरज‘ ने इस संग्रह में कविता के विभिन्न रूप प्रस्तुत किए हैं। उदाहरणतया उन्होंने अतुकांत में भी कुछ कवितायें लिखी हैं एक प्रश्न तथा अस्मिता कविता इसी शैली की कविताएं हैं तथा पवन बिना क्षण एक नहीं….. वह तस्वीर जरूरी है…… किसी अजाने स्वप्नलोक में…… अनहद के रव भर जाता है…. पत्र तुम्हारा मुझे मिला….. खिलता हो अंतर्मन जिससे….
विश्व की सुंदर सुकृति पर….. मित्रता का मधुर गान……. चढ़ाने की कोशिश……. चूमते श्रृंगार को नयन…… बनाम घंटियां बजती रही बहुत…… जो भी कांटो में हंसते ……..जिंदगी थी पास दूर समझते ही रह गये…….. गीत लिखता और गाता ही रहा हूं……. श्रेष्ठ गीत हैं इन रचनाओं में कवि ने अपने अंतर की प्रति ध्वनियों को शब्द दिए हैं
डॉ. कुंंअर बैचेन गाज़ियाबाद
2. कविता के प्रति नीरज का अनुराग बचपन से ही रहा है बड़े होने पर इसी काव्य प्रेम ने उन्हें सक्रिय सृजनात्मक कर्म में प्रवृत्त कियाl यौवनोमष के साथ प्रणयानुभूति उनके जीवन में शिद्त से उभरी और कविता धारा से समस्वरित भी हुई ।वह अनेक मरुस्थलों से होकर गुजरी किन्तु तिरोहित नहीं हुई। संघर्षों से जूझते हुए भावुक मन के लिए कविता ही जीवन का प्रमुख सम्बल सिद्ध हुई
डॉ. शिव बहादुर सिंह भदौरिया

इस प्रकार रायबरेली के ही सुप्रसिद्ध गीतकार पंडित बालकृष्ण मिश्र ने तथा डॉ. गिरजा शंकर त्रिवेदी संपादक नवगीत हिंदी मुंबई ने और डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी बरेली आदि ने अपनी शुभकामनाएं देते हुए डॉ. नीरज के गीतों की प्रशंसा की है

(1). पारब्रह्म परमेश्वर

पारब्रह्म परमेश्वर तेरी
जग में सारी माया है।
सभी प्राणियों का तू
नवसृजन सृष्टि करता
तेरी ही तूलिका से
नव रूप रंग भरता।
कुछ रखते सत् विचार
कुछ होते अत्याचारी
तरह तरह के लोग यहाँँ
आते, रहते बारी-बारी ।
जग के रंगमंच में थोड़ा
अभिनय सबका आया है।
कहीं किसी का भेद
खेद हो जाता मन में
नहीं किसी की प्रगति
कभी देखी जन-जन में ।
सदा सदा से द्वेष
पनपता क्यों जीवन में
माया के चक्कर में
मतवाले यौवन में।
‘नीरज’ रहती नहीं एक सी
कहीं धूप व छाया है।।

(2).राम हमारे ब्रह्म रूप हैंं

राम हमारे ब्रह्म रूप हैं ,राम हमारे दर्शन हैं ।
जीवन के हर क्षण में उनके, दर्शन ही आकर्षण हैं ।।
हुलसी सुत तुलसी ने उनका
दर्शन अद्भुत जब पाया ।
हुआ निनाँदित स्वर तुलसी का
‘रामचरितमानस’ गाया।।
वैदिक संस्कृति अनुरंजित हो
पुनः लोक में मुखर हुई ।
अवधपुरी की भाषा अवधी
भी शुचि स्वर में निखर गई।।
कोटि-कोटि मानव जीवन में, मानस मधु का वर्षण है ।
राम हमारे ब्रह्म रूप हैं राम, हमारे दर्शन हैं।।
ब्रह्म- रूप का रूपक सुंदर ,
राम निरंजन अखिलेश्वर ।
अन्यायी के वही विनाशक,
दीन दलित के परमेश्वर ।।
सभी गुणों के आगर सागर ,
नवधा भक्ति दिवाकर हैं।
मन मंदिर में भाव मनोहर
निशि में वही निशाकर है।
नीरज के मानस में प्रतिपल, राम विराट विलक्षण हैंं।
राम हमारे ब्रह्म रूप हैं , राम हमारे दर्शन हैं।

(3).शब्द स्वरों की अभिलाषायें

रात और दिन कैसे कटते
अब तो कुछ भी कहा ना जाये
उमड़ घुमड़ रह जाती पीड़ा
बरस न पाती सहा न जाये।
रह-रहकर सुधियाँ हैं आतीं
अन्तस मन विह्वल कर जातीं
संज्ञाहीन बनातीं पल भर
और शून्य से टकरा जातीं।
शब्द स्वरों की अभिलाषायें
अधरों तक ना कभी आ पायें
भावों की आवेशित ध्वनियाँ
‘ नीरज’ मन में ही रह जायें।

(4). समर्पण से हमारी चेतना

नई संवेदना ही तो
ह्रदय में भाव भरती है
नई संवेग की गति विधि
नई धारा में बहती है ।
कदाचित मैं कहूँँ तो क्या कि
वाणी मौन रहती है
बिखरते शब्द क्रम को अर्थ
धागों में पिरोती है ।
नई हर रश्मि अंतस की
नई आभा संजोती है
बदल हर रंग में जलती
सतत नव ज्योति देती है।
अगर दीपक नहीं जलते
बुझी सी शाम लगती है
मगर हर रात की घड़ियाँ
तुम्हारे नाम होती हैं।
नया आलोक ले ‘नीरज’
सरोवर मध्य खिलता है
समर्पण से हमारी चेतना
को ज्ञान मिलता है ।

(5).नाम दाम के वे नेता हैं

कहलाते थे जन हितार्थ वह
नैतिकता की सुंदर मूर्ति
जन-जन की मन की अभिलाषा
नेता करते थे प्रतिपूर्ति।
बदले हैं आचरण सभी अब
लक्षित पग मानव के रोकें
राजनीति का पाठ पढ़ाकर
स्वार्थ नीति में सब कुछ झोंके।
दुहरा जीवन जीने वाले
पाखंडी लोगों से बचना
शासन सत्ता पर जो बैठे
देश की रक्षा उनसे करना।
पहले अपनी संस्कृति बेची
अब खुशहाली बेंच रहे हैं
देश से उनको मोह नहीं है
अपनी रोटी सेक रहे हैं।
देशभक्ति से दूर हैं वे ही
सच्चे देश भक्त कहलाते
कैसे आजादी आयी है
इस पर रंचक ध्यान न लाते।
कथनी करनी में अंतर है
सदा स्वार्थ में रहते लीन
नाम धाम के वे नेता हैं
स्वार्थ सिद्धि में सदा प्रवीन।

(6). आरक्षण

जिसको देखो सब ऐसे हैं
पैसे के ही सब पीछे हैं
नहीं चाहिए शांति ज्ञान अब
रसासिक्त होकर रूखे हैं।
शिक्षा दीक्षा लक्ष्य नहीं है
पैसे की है आपा धापी
भटक रहे बेरोजगार सब
कुंठा मन में इतनी व्यापी ।
आरक्षण बाधा बनती अब
प्रतिभाएं पीछे हो जातीं
भाग्य कोसते ‘नीरज’ जीते
जीवन को चिंतायें खातीं ।
व्यथा- कथा का अंत नहीं है
समाधान के अर्थ खो गये
आरक्षण के संरक्षण से
मेधावी यों व्यर्थ हो गये।
सत्ता पाने की लोलुपता ने
जाने क्या क्या है कर डाला
इस यथार्थ का अर्थ यही है
जलती जन-जीवन की ज्वाला।

4

प्यार का गीत – बाबा कल्पनेश

प्यार का गीत – बाबा कल्पनेश
प्यार का गीत
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत,
जिसमें हार हुई हो मेरी और तुम्हारी जीत।
कई जन्म बीते हैं हमको करते-करते प्यार,
तन-मन छोड़े-पहने हमने आया नहीं उतार।
छूट न पाया बचपन लेकिन चढ़ने लगा खुमार,
कितने कंटक आए मग में अवरोधों के ज्वार।
हम दोनों का प्यार भला कब बनता अहो अतीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
तुम आयी जब उस दिन सम्मुख फँसे नयन के डार,
छिप कर खेले खेल हुआ पर भारी हाहाकार।
कोई खेल देख पुरवासी लेते नहीं डकार,
खुले मंच से नीचे भू पर देते तुरत उतार।
करने वाले प्यार भला कब होते हैं भयभीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
नदी भला कब टिक पायी है ऊँचे पर्वत शृंग,
और कली को देखे गुप-चुप रह पाता कब भृंग।
नयनों की भाषा कब कोई पढ़ पाता है अन्य,
पाठ प्यार का पढ़ते-पढ़ते जीवन होता धन्य।
जल बिन नदी नदी बिन मछली जीवन जाए रीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
कभी मेनका बन तुम आयी विश्व गया तब हार,
हुई शकुंतला खो सरिता तट लाए दिए पवार।
कण्वाश्रम पर आया देखा सिर पर चढ़ा बुखार,
भरत सिंह से खेल खेलता वह किसका उद्गार।
वही भरत इस भारत भू पर हम दोनों की प्रीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
श्रृद्धा मनु से शुरू कहानी फैली मानव वेलि,
अब भी तो यह चलता पथ पर करता सुख मय केलि।
इसे काम भौतिक जन कहते हरि चरणों में भक्ति,
आशय भले भिन्न हम कह लें दोनो ही अनुरक्ति।
कभी नहीं थमने वाली यह सत्य सनातन नीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
बाबा कल्पनेश