Karwa Chauth 2021 | करवा चौथ और आरती

‘करवा चौथ और आरती’

कार्तिक माह का आगमन हो चुका था..आरती मन ही मन बहुत परेशान थी, दो दिन बाद ही करवा चौथ का व्रत होगा..पहली बार अकेले सबकुछ करने की सोच से ही वो उदास थी.. चौबीस वर्ष वो संयुक्त परिवार के स्नेहिल माहौल में रही थी, पर इस वर्ष कुछ ऐसा घटित हुआ कि पतिदेव ने घर छोड़ देने का फैसला किया..वो धक से रह गई.. असंभव लगा उसको आगे जी पाना.. सबसे इतना प्रेम था उसको कि मायका भी भूल गई थी वो..उसको नये घर में शिफ्ट हुए दस माह हो चुके थे, पर पुराने झगड़े जस के तस दिमाग पर कब्जा किये थे.. उसने दिमाग को झटका और तैयारी करने लगी..याद कर-कर के सामान जुटाने लगी.. फिर अचानक फूट-फूट कर रो पड़ी.. “हे भगवान! ये क्या हो गया.. मैं कैसे जी पाऊंगी बिना अम्मा लोगों के..” ये सोच कर वो फिर तनावग्रस्त हो गई..तब तक प्रवेश आ गया..”अरे! तुम फिर रोने लगी? कहकर उसको गले लगा लिया” उसकी ऑंख भी भरी थी, पर छलकने नहीं दिया उसने..”चलो, बाजार हो आते हैं” कहकर वो गाड़ी निकालने लगा..मन से वो भी बहुत अशांत था, पर आरती के सम्मान के लिए उसको ये बड़ा निर्णय लेना पड़ा..उन दोनों के कोई बच्चा नहीं था..पर उनको छोटे भाई के बच्चे अपने ही लगते थे.. उसके दिमाग में उस दिन की वो कड़वी बात फिर उलझ गई.. किचकिच होना तो आम बात थी, पर छोटे भाई का ये कहना कि “मेरे बच्चों को अपना समझना छोड़ क्यों नहीं देते ये लोग..जब इनके अपने बच्चे नहीं हैं तो नहीं हैं, फिर काहे हर समय बड़ी मम्मी बनी फिरती है ये बाॅंझ”..
भाई ने अपनी पत्नी से कहा था..जीने उतरते समय प्रवेश ने जैसे ही ये शब्द सुने धक से रह गया वो! उसको यकीन नहीं हुआ..जो उसके कानों ने सुना..आरती का निश्छल प्रेम.. समर्पण सब व्यर्थ? छि: ..इतनी गिरी हुई सोच थी छोटे की, सहसा उसको घिन आई अपने रिश्ते पर, और तो और माॅं-बाबूजी भी चुप थे.. उसने तुरंत निर्णय ले लिया और .. ..तब तक आरती ने उसका हाथ दबाया.. “क्या सोचने लग गए आप, चलिए ना..”
“ओह! चलो -चलो” कहकर उसने गाड़ी निकाली..
आज करवा चौथ था..
सजी-धजी आरती उसको बहुत प्यारी लग रही थी.. प्रवेश ने प्यार से उससे पूछा “क्या क्या बनेगा आज , सब मैं बनाऊंगा ..तुम बस बता देना”
तभी कालबेल बजी..”मैं देखता हूॅं..”कहकर प्रवेश दरवाजा खोलने बढ़ा..
प्रवेश की “सुनो” की आवाज सुनकर आरती बाहर आई.. “अरे अम्मा..”खुशी से आरती की आवाज थरथरा गई.. सामने अम्मा-पापा खड़े थे! आरती दौड़ कर अम्मा के गले लग गई और फूट-फूट कर रो पड़ी..
“रोते नहीं है आरती, इतने सालों से तुमने बिन कुछ कहे अपनी सारी जि़म्मेदारी निभाई है, तुम्हारे वहाॅं से आने के बाद हम दोनों ने बहुत विचार किया और फिर तुमको अपने घर वापस ले चलने के लिए आ गये..”
“नहीं अम्मा, अब वहाॅं नहीं जाएंगे हम, आप छोटे के साथ ही रहिए वहां.. “प्रवेश ने बहुत खिन्नता से कहा..
“बेटा.. छोटे को दस दिन पहले ही हम लोगों ने घर से निकाल दिया है, तुम लोगों के जाने के बाद से वो बहुत बदल गया था, शराब पीकर ऊटपटांग बोलता था, एक दिन आरती के लिए कुछ ऐसा कहा कि तुम्हारे पापा अपना आपा खो बैठे और उसको घर से निकल जाने को कह दिया..”बताते बताते अम्मा हाॅंफ सी गईं और उन्होंने आरती का हाथ कस के पकड़ लिया..”आप अंदर चलिए अम्मा..सारी बातें दरवाजे पर ही कर लेंगी क्या?” कहते हुए आरती ने दोनों के पैर छुए और दोनों को अंदर लेकर चल दी..
दस महीने बाद अपने घर में पूजा करने बैठी आरती ने अम्मा के साथ चंद्रमा का दर्शन किया और प्रवेश को साज-श्रंगार किये हुए अम्मा के साथ, हॅंसते खिलखिलाते देखकर सहसा भावुक हो गई.. “कितने दिन बाद प्रवेश इतना खुश दिख रहा है”, सोचते हुए आरती.. अपनी अम्मा के साथ करवा चौथ की पूजा संपन्न करने बैठ गई।

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शिल्पी चड्डा स्मृति सम्मान 2021- परिणामों की घोषणा

शिल्पी चड्डा स्मृति सम्मान, 2021-  परिणामों की घोषणा

सविता चड्डा जन सेवा समिति द्वारा प्रत्येक वर्ष 12 दिसंबर को दिए जाने वाले चार पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई है।

शिल्पी चड्डा स्मृति सम्मान :  डॉ. मंजु रूस्तगी, चेन्नई

हीरो में हीरा सम्मान: ओम प्रकाश प्रजापति, ट्रू मीडिया, दिल्ली

गीतकारश्री सम्मान :  डॉ. मधु चतुर्वेदी,गजरौला 

साहित्यकार सम्मान : राजेंद्र नटखट , दिल्ली

डॉ मंजु रूस्तगी, चेन्नई द्वारा भेजे गए लेख को इस बार चुना गया है  शिल्पी चड्डा स्मृति सम्मान 2021 के लिए। उल्लेखनीय है कि इस सम्मान के अंतर्गत  ₹5100 की नगद राशि के साथ प्रतीक चिन्ह, प्रमाण पत्र, अंगवस्त्रम, पुष्प माला आदि से सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान वरिष्ठ साहित्यकार सविता चड्डा द्वारा अपनी बेटी की स्मृति  शुरू किया  है।

इस अवसर पर  शिल्पी चड्डा स्मृति सम्मान  के अलावा उपरोक्त  तीन महत्वपूर्ण  सम्मान भी प्रदान किए जाने हैं जिन्हें प्रतीक चिन्ह, प्रमाण पत्र, अंगवस्त्रम और माल्यार्पण द्वारा एक गरिमा पूर्ण आयोजन  में इस समारोह में सम्मानित  किया जाना है।

देशभर से प्राप्त प्राप्त लेखों में से 20 अन्य ऐसे साहित्यकारों के लेखों को भी चुना गया है जिन्हें इस समारोह में प्रतीक चिन्ह प्रधान कर सम्मानित किया जाएगा:

1.डॉक्टर घमंडी लाल अग्रवाल, गुरुग्राम

 2. डॉक्टर दर्शनी प्रिया, दिल्ली 

3. डॉक्टर कल्पना पांडेय, नोएडा 

4. डॉ अंजू गहलोत, दिल्ली 

5. निहाल च॔द शिवहरे,झांसी

6. सुरेखा शर्मा, गुरुग्राम 

7. डा. दुर्गा सिन्हा,फरीदाबाद 

8. सरला मेहता, इंदौर

9. अभिमन्यु सिंह, रायबरेली

10. मुकेश कुमार ऋषि वर्मा,आगरा

11. डा. अलका शर्मा,दिल्ली

12. रश्मि संजय श्रीवास्तव, लखनऊ

13. सविता स्याल, गुरुग्राम

14. डॉ शकुंतला मित्तल,

15. सविता मिश्रा, बेंगलुरु

16. सरिता गुप्ता ,दिल्ली 

17. डॉक्टर पुष्प लता ,मुजफ्फरपुर

18. सोनिया सोनम, पानीपत 

19. शशि कोछर, रोहतक

20. यति शर्मा, दिल्ली

21. अंजु भारती, दिल्ली

उपरोक्त के अलावा प्राप्त सभी लेखों को समिति द्वारा  एक पुस्तक में भी समायोजित करने की योजना है। समिति के अध्यक्ष सुभाष चडढा ने देश भर से इस सम्मान के लिए लेख भेजने के लिए सभी लेखकों, कवियों और साहित्यकारों का आभार प्रकट भी किया और उन्हें शुभकामनाएं और बधाई दी।

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विज्ञान को समाज तक पहुंचाने का सशक्त उपकरण है विज्ञान कविताएं –   सविता चडढा

 जब से दुनिया बनी है विज्ञान की भूमिका हम सबके जीवन में प्रारंभ से विद्यमान है । विज्ञान के अनेक रूप भी हमारे आसपास, हमारे सौरमंडल में विचरण करते रहे हैं । हमारे मन में कई जिज्ञासाएं  बचपन से बनी रही हैं। सौर मंडल क्या है , ब्रह्मांड क्या है धरती  कैसे बनी, चेतन और अवचेतन मन, आने वाले सपने, बादल और चमकती बिजली….अनगिन विषय  विज्ञान के दायरे में आते रहे हैं। 

बचपन में जब रामायण के कई दृष्टांत सुने  तो मुझे लगता था उस समय भी विज्ञान विद्यमान था , नहीं तो पुष्पक विमान कैसे बनता । पवन पुत्र हनुमान जी की यात्रा का उल्लेख भी मुझे बहुत जिज्ञासा में डालता था। बालपन की जिज्ञासाएं  यह जानने को सदैव इच्छुक रहती , कैसे श्रीराम और लक्ष्मण जी को अपने कंधों पर बिठाकर ले गए थे पवन पुत्र और जब राम और रावण के युद्ध की बात होती  और इसमें प्रयोग किए गएअनेक अस्त्र।  मुझे लगता  यह सब भी विज्ञान का ही चमत्कार था और विज्ञान आज का नहीं युगों युगों से इस पृथ्वी पर विद्यमान है । पारस को छूने से जब लोहा भी सोना बन जाता है तो क्या यह  विज्ञान नहीं है । मैं तो यहां पर यह भी कहना चाहती हूं अगर कोई साधारण मनुष्य, असाधारण व्यक्तियों की छत्रछाया में आकर चमत्कार कर जाता है अपने जीवन में , यह भी तो विज्ञान है । क्या ये मनोविज्ञान है?  विज्ञान  में भी तो मनोविज्ञान में भी तो विज्ञान  है। विज्ञान के जितने भी चमत्कार हुए हैं उसे बनाया तो मनुष्य नहीं है । बहुत ही विस्तृत दायरा है विज्ञान का। विज्ञान के विभिन्न रूपों को देखने का अवसर मुझे मिला एक विज्ञान कविताओं के संग्रह में।

सविता चड्ढा

पिछले दिनों” विज्ञान कविताएं ” पुस्तक मेरे हाथ में आई और हाथ में भी इसलिए आई क्योंकि मुझे विज्ञान पर कविताएं लिखने के लिए आमंत्रित किया गया था।  मैंने अपनी लिखी कविताओं में से कुछ कविताएं प्रदूषण और पर्यावरण, काश कोई ऐसा यंत्र मिल जाए,  जो मनुष्य के मन के आकार को जान सके, पल पल का साथी विज्ञान,एकात्म ऐसे अनेक विषयों पर लिखी मेरी कविताएं इस संग्रह में शामिल है । इस पुस्तक के संपादक सुरेश नीरव जी को मैंने अपनी कविताएं भेज दी,  मुझे बहुत हैरानी हुई कि उन्होंने इन कविताओं को विज्ञान कविताएं स्वीकार किया और कहा इन कविताओं में वैज्ञानिकता है । मित्रों मैंने कई कहानियां लिखी है जिसमें मनोविज्ञान और चिकित्सा विज्ञान से संबंधित विषय कहानियों में लिए गए हैं । जब यह पुस्तक तैयार होकर मेरे हाथ में पहुंची और मैंने इसे पढ़ा तो मैंने पाया कि विज्ञान का हमारे समाज में कितना महत्व है और कविताएं एक सशक्त माध्यम है विज्ञान को समाज तक पहुंचाने का ,समाज की जिज्ञासाओं को विज्ञान ही शांत कर सकता है।  जब आप इस  संग्रह की कविताएं पढ़ेंगे तो आप जान पाएंगे कि सपनों का विज्ञान क्या है, डीएनए, प्राणी और पदार्थ क्या हैं। विज्ञान कविता है क्या ? इन सब के बारे में पंडित सुरेश नीरव जी ने इस पुस्तक में विस्तार से बताया है। डॉक्टर शुभता मिश्रा, अंधकार  चंद्रयान की सुंदर पृथ्वी के बारे में बताती हैं और टैबलेट आहार के बारे में बताती हैं। सुरेंद्र कुमार सैनी कहते हैं कि सत्य को पहचानने का नाम है विज्ञान है । नीरज नैथानी वृक्षों के संसार और ऊर्जा प्रदायनी गंगा को लेकर विज्ञान को परिभाषित करते हैं । मंगलयान, खिचड़ी और प्रोटीन एक कदम, विज्ञान पर अपनी बात, विज्ञान से जुड़ी कई बातें यशपाल सिंह यश ने अपनी कविताओं में बताई हैं और अरुण कुमार पासवान  ने ,सुबह की सैर ,वृक्षारोपण और महायुद्ध के माध्यम से विज्ञान को हम सबको परोसा है। राकेश जुगरान ने पॉलिथीन,जीवन दर्शन और जंगल के मासूम परिंदे जैसे विषयों पर लिखकर विज्ञान को परिभाषित किया है। मधु मिश्रा ने विज्ञान की बात करते हुए पेड़ों को ऑक्सीजन प्रदाता कहां है और संतुलित भोजन और पेड़ों को बचाने पर अपनी सुंदर रचनाएं प्रस्तुत की है । पंकज त्यागी असीम ने इसरो के माध्यम से और मोबाइल को लेकर अपनी कुछ बातें विज्ञान के साथ जोड़ी है । वहीं डॉक्टर कल्पना पांडेय ने शून्य का गणित और कोविड महामारी और विज्ञान को बहुत ही जादुई बताते हुए विज्ञान को प्रस्तुत किया है । इसी प्रकार सुबोध पुण्डीर  कहते हैं कि आज बिजली के सहारे जिंदगी का काम चल रहा है। उन्होंने भी पेड़ों को ऑक्सीजन का भंडार बताया है।  रामवरन ओझा इस पुस्तक में विज्ञान के चमत्कारों की बात करते हैं । पंडित सुरेश नीरव पुस्तक के अंत में” तुम गीत लिखो विज्ञान के ” एक बहुत ही सुंदर गीत के साथ प्रस्तुत हुए हैं।  इस संग्रह को पढ़ते हुए मैंने पाया कि विज्ञान पर लिखी गई ये कविताएं समाज को विज्ञान के कई रूप प्रस्तुत करती है और यह सिद्ध हो जाता है कि विज्ञान को समाज तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम कविता भी हो सकती है।

हमारा व्यवहार हमारे मानसिक संतुलन को अभिव्यक्त करता है- सविता चड्डा
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सविता चड्ढा

हमारा व्यवहार हमारे मानसिक संतुलन को अभिव्यक्त करता है। साधारण लोग इस बात की ओर भले ही ध्यान ना दें लेकिन आप यह जान लें कि हम जो भी करते हैं, कैसे उठते हैं, बैठते हैं, चलते हैं, बात करते समय हमारे चेहरे की भाव भ॔गिमांए  अगर कोई ध्यान से देखता है तो वह जान सकता है कि आपके हृदय में क्या चल रहा है, आपके मस्तिष्क की अवस्था कैसी हैं, जीवन के प्रति  आपका दृष्टिकोण क्या है ?

आप सोचेंगे ऐसा कैसे संभव है।  मैं आपको बहुत सारी बातें बता सकती हूं।  मेरी बताई गई बातें आपके मस्तिष्क को परिवर्तित नहीं कर सकती, आपकी सोच को भी बदल नहीं सकती ,हां उसे कुछ समय के लिए प्रकाशित कर सकती हैं और अगर आप निरंतर उस प्रकाश को महसूस करेंगे तो छोटे से छोटे कंकर से बचाव संभव हो सकेगा।

सबसे पहले तो यह जान लेना चाहिए,  संसार की सारी बातें सब व्यक्तियों के लिए नहीं होती। उदाहरण के लिए  यदि हम कला में स्नातक की डिग्री लेना चाहते हैं या कला में स्नातक की शिक्षा लेना चाहते हैं तो उसके लिए हमें अलग सब्जेक्ट पढ़ने होते हैं और यदि हम कॉमर्स विषय  लेते हैं तो उसके लिए हम अलग शिक्षा लेते हैं। इसी प्रकार चिकित्सा, विज्ञान या जीवन में शिक्षा के क्षेत्र में लिए जाने वाले सभी विषयों के लिए, हमें अलग अलग तरह से उसका  चयन करना पड़ता है।  इसी प्रकार  ईश्वर ने हमें हमारे मस्तिष्क को  जिस प्रकार बना दिया है हमें केवल वही बातें पसंद आती हैं और हम उसी के अनुसार ही अपना वातावरण चुनते हैं। अपने संगी साथी पसंद करते हैं।  हमें अपने ही सोच वाले व्यक्ति पसंद आते हैं। मस्तिष्क का निर्धारण कोई व्यक्ति नहीं कर सकता, इसे हम कुछ पल के लिए बदल सकते हैं। उदाहरण के लिए  अगर पानी को गर्म किया जाए तो वह कुछ समय के पश्चात शीतल हो जाता है अर्थात जो उसका वास्तविक स्वभाव है वह उसमें बदल ही जाता है।  इसी प्रकार ईश्वर द्वारा प्रदत्त मस्तिष्क में  बहुत अधिक परिवर्तन नहीं हो सकता लेकिन इसे धीरे धीरे नकारात्मकता से सकारात्मकता की और स्थाई रूप से लाया जा सकता है।

जैसे किसी ने पहले बी. ए. पास कोर्स में दाखिला लिया बाद में उसे  लगा कि कॉमर्स की शिक्षा अधिक उपयोगी है तो वह किसी दूसरे संस्थान में, अपनी दूसरी पुस्तकों के साथ उपस्थित होता है और लगातार उसीका अध्ययन करता है तो वह इस शिक्षा में भी उतीर्ण  हो सकता है अर्थात ईश्वर द्वारा प्रदत मस्तिष्क को पूर्ण रूप से बदलने के लिए हमें अपने हृदय का सहारा इसमें मिल सकता है। यह सहारा  कोई भी हो सकता है, पुस्तकें भी हो सकती हैं ,व्यक्ति भी हो सकता है।  उनका सहारा लेकर आप अपने जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन ला सकते हैं बशर्ते आपका मस्तिष्क उसे स्वीकार करने के लिए उपस्थित हो। ये विषय बहुत विस्तृत है और इस पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है।

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डॉ.नीरज की काव्य कृतियां मेरी दृष्टि में / ब्रजेश नाथ त्रिपाठी

डॉ.नीरज की काव्य कृतियां_मेरी दृष्टि में

सुनहरी भोर की ओर

नव गति नव लय ताल तुम्ही हो के शिख से लेकर मुक्तक के नख तक पुण्य सलिल मंदाकिनी की काव्य धारा के तट पर स्थापित अनेक तीर्थों का दरशन- परसन करते हुए भगवान भास्कर के बाल रूप को अर्घ्य अर्पित करने का शुभ अवसर अनुज डॉ. रसिक किशोर सिंह नीरज की काव्य कृतियां ” सुनहरी भोर की ओर” और “अञ्जुरी भर प्यास लिये ” का अवगाहन करके प्राप्त हुआ।

‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ की अवधारणा को पुष्ट करती हुई इस कृति के अनुपम रूप सौंदर्य को देखकर मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं हो रहा है की डॉ. नीरज एक साहित्यकार ही नहीं एक संस्था हैं जिससे जुड़ने का सुयोग सैकड़ों कवियों के साथ मुझे भी प्राप्त हुआ है।

मेरा अभी तक का यह मानना था की बहुत लिखा महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि बहुत अच्छा लिखा मायने रखता था लेकिन मुझे खुशी है कि मेरा मत निर्मूल सिद्ध हुआ क्योंकि आज सुनहरी भोर की ओर और अञ्जुरी भर प्यास लिये का रसास्वादन करने के पश्चात मैं दावे से कह सकता हूं मैं दावे से कह सकता हूं कि नीरज जी ने बहुत लिखा और बहुत अच्छा लिखा। यद्यपि इन दो काव्य कृतियों के अतिरिक्त मैने नीरज जी की गद्य पद्य में कोई अन्य कृति नहीं पढी किंतु अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित इस स्फुट रचनाओं एवं काव्य मंचो का मैं साक्षी रहा हूं इस गर्व की अनुभूति के साथ कि मेरे मित्र ने साहित्य में जिस स्थान को प्राप्त करने का संकल्प लिया था उसने उस लक्ष्य को प्राप्त कर लिया।

मुझे लगता है नीरज जी का और मेरा साथ संभवत 1990 के दशक से है इस कालखंड की सबसे स्मरणीय घटना है 2003 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्त लेकर मेरा अपने घर जगतपुर आना ।
कहने को रायबरेली नगर से 20 किलोमीटर दूर एक विकासखंड लेकिन मेरे लिए ‘दिल्ली दूर आयद’ नगर के साहित्यिक मित्रों से ना मिल पाने का एक बहुत बड़ा कारण 71 वर्ष की आयु के कारण नगर में परंपरागत आयोजित होने वाले सांध्य कालीन कार्यक्रमों में सम्मिलित ना हो पाने की विवशता, खैर छोड़िए यह सब तो अपनी रामकहानी है जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये।

कृतियों के संबंध में तमाम मनीषियों ने अपनी – अपनी भूमिका में काव्य कृतियों एवं रचनाओं के बारे में सुंदर शब्दावली में उनके कृतित्व और व्यक्तित्व की भूरि- भूरि प्रशंसा की है इस सार तत्व के साथ कि अच्छे को तो अच्छा कहना ही है। समान मत रखने के कारण मैं उन तमाम मनीषियों को प्रणाम करता हूं जिन्होंने अपनी भूमिकाओं में कृतियों के अनेक पक्षों पर दृष्टि डालते हुए उसे समग्रता प्रदान की है।

सुनहरी भोर की ओर कृति के प्रारंभिक पृष्ठों में स्वामी गीतानंद गिरि का आशीर्वाद शिव कुमार शिव और डॉ.रंगनाथ मिश्र सत्य ने तो अपनी बात कही लेकिन रचनाकार ने चुप्पी साध ली शायद इसीलिए कि कृति की सारी रचनाएं अपनी उत्कृष्टता से रचनाकार की यशगाथा को हिंदी साहित्य के इतिहास में अनंत काल तक उद्घभाषित करती रहेंगी।

नई कविता में ‘ज्योति पुंज प्रकाश’ ‘परिणाम हैं तेरे’ के पश्चात जैसे ही ‘अनुभूति और अभिव्यक्ति’ शीर्षक से बिल्कुल नये प्लाट पर लिखी कविता को पढ़कर मैं चमत्कृत हो उठा। यथा — सरोवर से निकले / सद्य:
स्नानित महिषों के दल / एक- दूसरे से लुरियाते/ वक्र विषाणों से खुजलाते एक दूसरे को /कर्ण पल्लवों की पवित्री से/ एक दूसरे पर छिड़कने अभिषेक जल।

     मैंने इस कविता को कितनी बार पढ़ा कह नहीं सकता कोई चित्रकार भी इतनी सजीवता से इन क्षणों को , इन दृश्यों को अपनी तूलिका से नहीं उकेर सकता इसका परिणाम यह हुआ कि पन्ना पलटने की प्रवृत्ति अपने आप दरकिनार हो गयी और मैंने सावधान होकर पूर्ण मनोयोग से अगले पृष्ठ को खोला शीर्षक था   'कानन मधुरस बतियां'   यथा---  तन दियना मन बाती, दीपित अंग/  प्राण शलभ न रहै थिर, तरल तरंग, दीखत जो मुख आपन, दरपन माहिं/  बार-बार भ्रम जागे वा  मुख नाहि  । 

पढ़ते-पढ़ते मैं भवसागर में डूब गया । यह मेरा अल्प ज्ञान कह लें या धृष्टता लेकिन सभी विद्वजनों से क्षमा मांगते हुए मैं कहूंगा कि इतनी अप्रतिम अद्वितीय अनुपम रचना इससे पूर्व नहीं पढ़ी।
अमीर खुसरो की यह लुप्तप्राय विधा, शैली जिसके शब्द संयोजन से शहद टपकता हो उसे इस सदी में स्थापित करने का श्रेय डॉ. नीरज जी को जाता है और निश्चय ही हिंदी साहित्य के इतिहासकारों की दृष्टि 33 और 34 पृष्ठ के इस पन्ने पर जानी चाहिए ।
दोहा , छंद, सवैया, कुंडलिनी आदि अन्यान्य विधाओं को तो अपनाया किंतु इस विधा को आगे बढ़ाने का उपक्रम क्यों नहीं हुआ यह एक विचारणीय प्रश्न है?
मेरी दृष्टि से कविता इस पन्ने में ही पूर्ण हो गई है । नई कविता की यह यात्रा पृष्ठ संख्या 37 पर टंकित –‘प्रणय- राशि बनकर अनंग में’ समा जाती है । पुन: पृष्ठ संख्या 52 ‘संस्कृति दम तोड़ती यहां’ से ‘मैं पत्थर हूं ‘ पृष्ठ संख्या 60 तक जब तक ग़ज़ल अपनी पूर्ण अल्हड़ता के साथ मार्ग में खड़ी नहीं हो जाती , चलती रहती है।
इससे पूर्व कि मैं ग़ज़लों की बात करूं एक नई विशिष्ट कविता या गीत कहें का उल्लेख किए बिना नहीं रह सकता यद्यपि इसका शीर्षक कविता के भावों के अनुरूप नहीं है भले ही वह कविता का एक अंश ही है। शीर्षक है ‘प्रणय राशि बन कर अनंग में’ और कविता है ‘कविते! तुम पावन प्रसाद सी, मुक्त कृपा सी बरसो । नीर -क्षीर बिलगाओ , और बोध -शोध सी परसो ।
चलिए अब ग़ज़लों की बात करते हैं ग़ज़लों के लिए नई ज़मीन तलाशने की काफ़ी कोशिश की गई और रचनाकार अपने इस प्रयास में काफ़ी हद तक सफल भी हुआ दूसरी ग़ज़ल ‘ बादशां तो दिल के थे’ , बादशा से एक स्मृति दिमाग में कौंध गई यह उस समय की बात है जब पंडित बालकृष्ण मिश्र एडवोकेट को ‘गीतों का राजकुमार ‘ कहकर प्रतिष्ठा दी गई थी ।
रिफॉर्म क्लब के सामने बृहद काव्य गोष्ठी का आयोजन था पंडित बालकृष्ण मिश्र मुक्तकों की श्रंखला में यह मुक्तक पढ़ रहे थे– उम्र दरिया के किनारों की तरह कटती रही । या कि चंदा की तरह घटती रही बढ़ती रही ।कभी बादशाह कभी दहला कभी ग़ुलाम बना । ज़िंदगी ताश के पत्तों की तरह बंटती रही। और मेरे बगल में बैठे उर्दू के महान शायर जनाब वाक़िफ रायबरेलवी मुझसे कह रहे थे बृजेश इस पंडित को कितनी बार कहा है कि बादशां की जगह पर बादिश पढ़ा करो लेकिन यह मानता ही नहीं ।मुझको लगता है कि मिश्र जी हिंदी के स्वत्व को बनाए रखना चाहते थे इसलिए वह तिरा, मिरा का प्रयोग हिंदी में करने के पक्षधर नहीं थे। हिंदी शब्दावली में उर्दू ,अरबी ,फारसी तथा अन्य भाषाओं के आगत शब्द जिस प्रकार लिये गये हैं उसी प्रकार उन्हें प्रयुक्त भी करना चाहिए। बहरहाल मुझे गर्व है कि मैं सदैव हिंदी -उर्दू के इन कीर्ति स्तंभों का कृपा पात्र रहा।
संग्रहीत 15 ग़ज़लों में कई अच्छे शेर कहे गए हैं उसमें से एक लाजवाब शेर यह भी है–
‘साथ लाए थे छड़ी जो, वो ले गए वापस।
पास में इसके तो माथा है टेकने के लिए’।
बालगीत के सभी गीत बहुत सुंदर हैं और यह सिद्ध करने में पूर्ण समर्थ हैं कि रचनाकार को बाल मनोविज्ञान का अच्छा ज्ञान है।
हाइकु ने जापान से भारत विशेष रूप से रायबरेली उत्तर प्रदेश तक जिस तीव्र गति से यात्रा की उतनी ही तीव्रता से त्रिशूल ने उसे आत्मसात ही नहीं कर लिया बल्कि तुकांत के प्रयोग से उसका शुद्ध भारतीय करण भी कर दिया जिसके लिए पंडित शंभू शरण द्विवेदी बंधु को सदैव स्मरण किया जाएगा। उनका एक प्रसिद्ध हाइकु या त्रिशूल है– कुछ कहोगे / अपने विवेक से / कहां रहोगे ।
नीरज के इस त्रिशूल को कौन भुला सकता है – गंध गमकी/ फगुनी पलाश की / छाया दहकी। रचनाकार द्वारा द्विवेदी जी को सम्मान देते हुए त्रिशूल शीर्षक से ही 15 त्रिशूल छंद संग्रह की माला में पिरोये हैं जो अपनी सार्थकता सिद्ध करने में सक्षम हैं।
छंद और मुक्तक अंशावतार न लगकर पूर्णावतार लगते हैं और कवि की कोमल हृदयानुभूति के संवाहक के रूप में काव्य कृति को अलंकृति करते हैं मुझे विश्वास है कि इनमें से बहुसंख्यक छंदों एवं मुक्तकों का प्रयोग मंच उद्घोषकों द्वारा जनमानस के मध्य होता रहेगा ।
निश्चय ही इस काव्य कृति को डॉक्टर नीरज की सर्वश्रेष्ठ कृति के रूप में हिंदी साहित्य में विशेष स्थान प्राप्त होगा।

अञ्जुरी भर प्यास लिए

   डॉ.नीरज की दूसरी काव्य कृति के अंतिम पृष्ठ पर शतएकादश दोहों को छोड़ दिया जाये तो पूरी कृति गीतों को समर्पित है वस्तुतः जहां तक मैं समझता हूं रसिक जी मूलतः तथा स्वभावत: गीतकार हैं उनके रोम-रोम में गीतों का स्पंदन है गीतों ने ही साहित्य जगत में उनकी पहचान बनाई है अतः गीतात्मकता उनके पूरे साहित्य में रचा बसा है कहीं-कहीं वाणी कठोर भले ही हुयी हो लेकिन उसमें द्वेष ना होकर शाश्वत प्रेम और वात्सल्य की ही प्रबलता है ठीक उस कुम्भकार की तरह जिसका एक हाथ बाहर घड़े पर चोट मारता है और घड़े के भीतर से एक हाथ उस पर होने वाले आघात से बचाता रहता है । परंपरा का निर्वाह करना और बात है अन्यथा मुझे तो लगता है कि नीरज जी के गीत ही कृति की भूमिका भी है और विस्तृत कलेवर भी , कृति को प्रसिद्धि भूमिका के साथ भी मिलती है और उनके बिना भी, बस रचनाकार की दृष्टि प्रखर होनी चाहिए गीतों की प्रमाणिकता और श्रेष्ठता स्वयं सिद्ध है इसके लिए 10 मूर्धन्य विद्वानों के हस्ताक्षर गीत के स्वाभिमान को कदाचित आहत ही करेंगे ।

अपनी बात में कृतिकार ने कृति के बारे में न्यूनाधिक और अन्य के बारे में अधिकाधिक विचार रखे हैं जिसे आत्मकथा , संस्मरण और यात्रा वृतांत के एक अंश के रूप में भी देखा जा सकता है यद्यपि मुझे यह बहुत रुचिकर और आनंद दायक लगा। इसलिए नहीं कि इसमें मेरा भी उल्लेख है बल्कि इसलिए भी कि बीते दिनों का इतिहास एकाएक सजीव हो उठा । यह इतिहास उस कालखंड का था जिसका एक पात्र मैं भी था । सुखद दिनों की अनुभूति सबको अच्छी लगती है और मुझे कहने दे कि रायबरेली नगर में हिंदी साहित्य का वह स्वर्ण काल था ।
रेलवे में पंडित गोविंद नारायण मिश्र जी (त्रिवेणी काव्य कृति के रचयिता) स्टेशन परिसर में काव्य आयोजन, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में “एक ताल जिंदगी ” काव्य कृति के रचनाकार भाई स्वप्निल तिवारी जी और नई कविता के पुरोधा आनंद स्वरूप श्रीवास्तव जी के प्रयास से बैंक परिसर में काव्य समारोह, गांधी धर्मशाला में डॉ.चक्रधर नलिन द्वारा प्रतिवर्ष महावाणी का प्रकाशन और हिंदी समारोह और रायबरेली में लघु कथा को पुष्पित, पल्लवित करने वाले राजेंद्र मोहन त्रिवेदी बंधु के यहां प्रत्येक माह के अंतिम शनिवार को होने वाली गोष्ठियों को कौन न याद करना चाहेगा। जैसे पिंक सिटी के रूप में जयपुर विख्यात है उसी तरह चतुर्भुजपुर से सूरजूपुर मोहल्ले तक चारों ओर बस काव्य उत्सव।
तब आज जैसी ना तो खेमे बंदी, गुटबंदी या जुगलबंदी थी । हिंदी उर्दू के सभी कवि, शायर एक छत के नीचे इकट्ठा होते थे नई-नई रचनाएं सुनाने की होड़, बड़ा कवि हो या छोटा सभी अपने घरों में गोष्ठी आयोजित करते थे। गोष्ठी भी मात्र काव्य तक सीमित ना हो परिचर्चा कहानी, लघुकथा, समस्या पूर्ति के रूप में साहित्य सृजन के लिए भूमि को उपजाऊ बना रही थी। आज उस दौर के कवियों, शायरों में स्मृति शेष की संख्या सबसे ज्यादा है और जो विद्यमान हैं उनमें कतिपय को छोड़कर वही 30- 35 वर्ष पहले की रचनाएं पढ़ रहे हैं शायद वह लिखना बंद कर चुके हैं या उस स्तर का नहीं लिख पा रहे हैं जो 30 – 35 वर्ष पूर्व लिखा था।
इसका एक दूसरा पहलू भी है और वह है मंच संस्कृति मेरी समझ से “मंच कवि और कविता के पांव में बंधी हुई वह जंजीर है जो तालियों की गड़गड़ाहट से टूटती है ” । कवि के लिए कविता तो श्वास , प्रश्वास है फिर मात्र वाहवाही के लिए?
नीरज जी देखिए मैं भी आप द्वारा वर्णित इतिहास के प्रवाह में बह गया भान हीं नहीं रहा कि मैं कृति के बारे में लिख रहा था या पुराना पत्रा बाच रहा हूं ,क्षमा करें !
उन कतिपय कवियों में एक नाम डॉ . रसिक किशोर सिंह नीरज का भी है जो आज पहले से ज्यादा श्रेष्ठ साहित्य का सृजन कर रहे हैं और अनवरत साहित्य साधना में रत हैं ।
प्रस्तुत कृति में वाणी वंदना से लेकर ” भारत दर्शन हुआ नीरज” तक साठ गीत हैं जिनमें स्थान- स्थान पर भारतीय संस्कृति का उदात्त स्वरूप बिखरा हुआ है। इसमें तमाम गीत जिस पृष्ठभूमि पर लिखे गए हैं लगता है कि वह जन-जन की व्यथा का चित्रण कर रहे हैं यथा — भाई ने भाई के तोड़े क्षण भर में सपने । उनके मन की बात जान ली लेकिन कही नहीं। अपने ही अनजाने हैं कुछ। मन का चोर कहां बसता है कौन बताएगा। पुनश्च – दिल टूटा अपनों से हुए बहुत मज़बूर यह कैसी सौगात रही । बुरे वक़्त में बेटी ही तो मर्यादा ढ़ोती। किंतु पिता सागर सा केवल वह विषपान किया करते हैं । आंखों के अंदर कण कोई चुभता जैसे शूल लगा है ।
बड़े छोटों के अंदर बहुत गहरी हुई खाई
इन्हें कैसे भरेंगे अब नहीं कुछ समझ में आई
अपने को समष्टि में समाहित करने की कला, जग की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझने की संवेदना ,लोगों का मन टटोलने की चेष्टा, यही कवि को तथा उसके कार्य को विशिष्टता प्रदान करता है ।डॉक्टर शिव बहादुर सिंह भदौरिया की मुझे एक पंक्ति याद आ रही है – “मैंने देखा है बिंधे शर से तड़पता हारिल, मेरे देखे को मेरा हाल न जाना जाए।” कितनी सहजता और खूबसूरती से जग में रहकर भी अपने को जग से अलग कर लिया। यही बात कबीर ने भी कही थी दास कबीर जतन से ओढ़ी, ज्यों कि त्यों धरि दीनी चदरिया ।
डॉक्टर रसिक किशोर सिंह नीरज समझते हैं तभी तो उन्होंने गूंगी पीड़ा को अपना स्वर देकर उसे जन-जन तक पहुंचाने का स्तुत्य प्रयास अपने गीतों और दोहों के माध्यम से किया है। उनके सभी गीत हृदयस्पर्शी हैं तथा अपने कर्तव्यों का पालन करने में सामर्थ्यवान हैं। विश्वासन था, मन का चोर कहां बसता है, सचमुच प्यार करो , जग दहता अंगार हो गया, मनहर दिन आये , मेरे गांव में आना जी, और भीग गई ममता के जल से, सबसे सुंदर बन पड़े हैं और जिन की गूंज एक लंबे अंतराल तक हृदय के द्वार पर सुनाई देगी। गीतों को दीप्ति प्रदान करते हुए ” एक एक एक” दोहे अपनी आभा से पूरी कृति को प्रकाश मई बनाएंगे।
मैं इन श्रेष्ठ कृतियों के प्रणयन के लिए डॉक्टर नीरज को आशीर्वाद तथा साधुवाद उनके ही एक दोहे को उद्धृत करते हुए दे रहा हूं– जगमग जगमग जग दिखा चकाचौंध में आज।
अंधकार लेकिन यहां अंतस गया विराज।।

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तंबाकू की हैवानियत / अशोक कुमार गौतम

“बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथहिं गावा।।”

(उत्तरकाण्ड- रामचरित मानस)

तंबाकू की हैवानियत

मानव रूप में जीवन पाना ईश्वर का दिया हुआ सबसे खूबसूरत उपहार है। जिसे सजा-संवार कर बनाए रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। तंबाकू के सेवन से हम अपना खुशहाल जीवन बर्बाद कर देते हैं। ‘नशा’ नाश की जड़ है, इस सूक्ति को भूलकर विभिन्न माध्यमों में तंबाकू खाते पीते हैं, जिससे असमय मृत्यु हो जाती है। विश्व के विभिन्न देशों में सन 1500 ई0 के बाद तंबाकू का सेवन प्रारंभ हो गया था। तब तंबाकू सिर्फ छोटे व्यापार का माध्यम हुआ करती थी। पुर्तगाल के व्यापारियों द्वारा भारत में सन 1608 ई0 में तंबाकू का पहला पौधा रोपा गया था। वह पौधा आज लगभग संपूर्ण भारत में लह-लहा रहा है। सन 1920 में जर्मन के वैज्ञानिकों ने तंबाकू से होने वाले कैंसर का पता लगाया था और सभी देशों को सचेत किया था। परंतु सन 1980 में तंबाकू खाने से होने वाले कैंसर की पुष्टि हुई है। निकोटियाना प्रजाति के पेड़ों के पत्तों को सुखाकर तंबाकू बनाया जाता है, जिसका प्रयोग सिगरेट, गुटखा, पान आदि के माध्यम से करते हैं। मध्यप्रदेश में तेंदू के पत्तों से बीड़ी बनाई जाती है जिसके अंदर भी तंबाकू भरते हैं। तम्बाकू में निकोटीन पाया जाता है जो शरीर की नसों को शनैः शनैः ब्लॉक करने लगता है, जिससे चेहरे की चमक तक चली जाती है। मुँह भी पूरा नहीं खोल पाते हैं।
अखिल विश्व में तंबाकू का प्रयोग दो प्रकार से होता है- चबाकर खाना और धुंआ के द्वारा। दोनों ही प्रकार से तंबाकू द्वारा बने उत्पादों का सेवन करने से मुख में कैंसर, गले में कैंसर, फेफड़ों में कैंसर, हृदय रोग दमा आदि बीमारियाँ हो जाती हैं। ये बीमारियाँ अकाल जानलेवा बन जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) के सर्वे में विश्व में प्रतिवर्ष 60 लाख से अधिक लोगों की असमय मृत्यु का कारण तंबाकू है। इसके दुष्परिणामों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 31 मई सन 1988 को अंतरराष्ट्रीय बैठक करके यह निर्णय लिया कि तंबाकू सेवन की रोकथाम और निवारण के लिए प्रतिवर्ष 31 मई को ‘विश्व तंबाकू निषेध दिवस’ मनाया जाएगा। वर्ष 2008 में भारत सरकार ने तंबाकू से जुड़े विज्ञापनों पर रोक लगा दी तथा तंबाकू से जुड़े सभी उत्पादों जैसे गुटखा, बीड़ी, सिगरेट, पान में प्रयोग की जाने वाली तंबाकू आदि के पैकेट ऊपर बिच्छू का चित्र, मुंह में कैंसर वाली मानवाकृति छपवाने का आदेश दिया। इतना ही नहीं नशा से जुड़ी हर पाउच, पैकेट, बोतल पर स्लोगन भी लिखवाया जाता है कि तंबाकू सेवन/मदिरा सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
भारत सरकार ने सार्वजनिक स्थानों जैसे बस स्टेशन, रेलवे स्टेशन, चिकित्सालय, स्कूल, कॉलेज, विभिन्न कार्यालयों आदि में धूम्रपान करने पर अर्थदंड का प्रावधान किया है। साथ ही 18 वर्ष से कम आयु के लड़कों को तंबाकू से जुड़े उत्पादों की बिक्री पर रोक लगा दी गयी है। यदि देखा जाए तो धूम्रपान की शुरुआत अक्सर शौकिया लोग करते हैं, लेकिन शुरू में खुशी या गम का इजहार करने का शौक समय के साथ लत बन जाता है जो प्राणघातक है। आज की युवा पीढ़ी अपने शौक पूरा करने तथा दोस्ती को प्रगाढ़ बनाने के लिए धूम्रपान कर रही है। तंबाकू का सेवन किसी भी रूप में करना मीठा जहर है जिसके प्रति शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लड़के लड़कियां अधिक आकर्षित हो रही हैं। इसके दुष्परिणाम बहुत ही घातक होंगे। यह युवा पीढ़ी के लिए चिंता का विषय है।
सरकार विभिन्न विज्ञापनों में करोड़ों रुपए खर्च करती है जिससे तंबाकू से लोगों को छुटकारा मिले। एक सिगरेट पीने से 11 मिनट आयु कम होती है तथा विश्व में 6 सेकंड में एक मृत्यु तंबाकू से होने वाले कैंसर से होती है। तम्बाकू सेवन छुड़ाने के लिए आयुर्वेद को बढ़ावा दिया जाए, जिससे इस बीमारी और लत को रोका जा सके।
भारत में विडम्बना है कि नशा मुक्ति अभियान में करोड़ों रुपए खर्च करके आमजन को जागरूक करने का सार्थक प्रयास किया जाता है, किंतु ‘नशा’ से जुड़ी वस्तुओं और अन्य मादक पदार्थों के उत्पादन पर रोक नहीं लगाई जाती है? यह भी वास्तविकता है कि धूम्रपान/आबकारी विभाग से सरकार को राजस्व प्राप्त होता है, परन्तु मानव जीवन को खतरा में डालना भी अनुचित है। इसलिए हम जिम्मेदार नागरिकों को संकल्प लेना होगा कि न नशा करेंगे, न किसी को प्रेरित करेंगे। नशा न करने से घर की अर्थव्यवस्था सुदृढ होगी, साथ ही पारिवारिक स्नेह, आत्मीय सम्मान और शारीरिक, मानसिक बल मिलेगा।

         
सरयू-भगवती कुंज,
अशोक कुमार गौतम
(असिस्टेंट प्रोफेसर)
शिवा जी नगर, रायबरेली
मो. 9415951459

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हिंदी की घटती लोकप्रियता, बढ़ता जनाधार | Essay on Hindi Diwas in Hindi

हिंदी की घटती लोकप्रियता, बढ़ता जनाधार | Essay on Hindi Diwas in Hindi

हिंदी की घटती लोकप्रियता, बढ़ता जनाधार

हिंदी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन पाई है

भाषा के बिना समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। मजबूत और दृढ़ राष्ट्र की एकता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रभाषा का होना उतना ही आवश्यक है, जितना जीवित रहने के लिए आत्मा का होना आवश्यक है। हिंदी भाषा की जब भी बात होती है तो मन में 14 सितंबर हिंदी दिवस गूँजने लगता है, तत्क्षण बैंकिंग सेक्टर, आईसीएसई, सीबीएसई बोर्ड के स्कूल, सोशल मीडिया, हिंग्लिश का प्रचलन आदि की ओर ध्यानाकर्षण होने लगता है। हम सब मिलकर चिंतन करें कि आखिर 72 वर्ष बाद भी हिंदी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन पाई है? वोट की राजनीति या विभिन्न सरकारों में इच्छाशक्ति की कमी या क्षेत्रवाद? या भौतिकवादी समाज में खुद को श्रेष्ठ दिखाना? कारण कुछ भी हो, हम कह सकते हैं कि हिंदी अपने ही देश में बेगानी होती जा रही है। हिंदी का प्रत्येक व्यंजन और स्वर मुख्यतः अर्धचंद्र और बिंदी से बना है। यदि हम हिंदी लिखते समय सुकृत बिंदी और अर्धचंद्र का प्रयोग आवश्यकतानुसार करें, तो सभी वर्ण अति सुंदर तथा सुडौल बनेंगे। विश्व की सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत है, तत्पश्चात क्रमानुसार पालि> प्राकृत> अपभ्रंश तब हिंदी का उद्भव हुआ है।

सर्वप्रथम महात्मा गांधी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की पहल की थी

गुरु गोरखनाथ हिंदी के प्रथम गद्य लेखक माने जाते हैं। चंद्रवरदाई, जायसी, खुसरो, अब्दुल रहमान, रैदास, सूरदास तुलसीदास, बिहारी, मीराबाई, नाभादास आदि ने हिंदी में अपनी रचनाएं की है, जो आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल से हिंदी प्रचलन में होने का प्रमाण है। हिंदी के पुरोधा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सन 1903 में सरस्वती पत्रिका का संपादन किया, तब वे रेलवे में नौकरी करते थे। उसी वर्ष द्विवेदी जी ने राष्ट्रप्रेम और हिंदी के उत्थान के लिए नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। स्वतंत्र भारत से पूर्व सन 1918 ईस्वी में सर्वप्रथम महात्मा गांधी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की पहल की थी। भारतीय संविधान के भाग 17 में वर्णित अनुच्छेद 343 से 351 तक संघ की भाषा, उच्चतम तथा उच्च न्यायालयों की भाषा, प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा देने का वर्णन है। हम गर्व के साथ कहते हैं कि विश्वपटल पर हिंदी दूसरे पायदान पर है। दिनांक 10 जनवरी 2017 को दैनिक जागरण के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित शीर्षक ‘दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बनी हिंदी, के अंतर्गत मुंबई विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉक्टर करुणा शंकर उपाध्याय ने अपनी पुस्तक हिंदी का विश्व संदर्भ में यह उल्लेख किया है कि हिंदी विश्व पटल पर सर्वाधिक बोली जाती है।

सरकारी, गैर सरकारी कार्यालयों में जो व्यक्ति कार्यालयी कार्य हिंदी में करे, उसे अतिरिक्त वेतन, अतिरिक्त अवकाश तथा अहिंदी भाषी राज्यों में भ्रमण हेतु पैकेज दिया जाना चाहिए। हिंदी विषय के विभिन्न साहित्यकारों और अन्य ज्ञानोपयोगी बिंदुओं पर शोधकार्य होना चाहिए, जिसके लिए सरकार और विश्वविद्यालयों को पहल करनी होगी। हिंदी को प्रोत्साहन देने के लिए संपूर्ण भारत के सभी स्कूलों में हिंदी विषय में प्रथम श्रेणी प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को अन्य विद्यार्थियों की अपेक्षा अतिरिक्त छात्रवृत्ति, प्रशस्ति पत्र औऱ अधिभार अंक मिलना चाहिए, जिससे छात्रों का हिंदी प्रेम और मनोबल बढ़े। महानगरों की ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं वाले स्कूलों में छात्रों और अभिभावकों से हिंदी में ही वार्तालाप किया जाए। हिंदी को पाठ्यक्रम का एक हिस्सा मानकर नहीं, वरन मातृभाषा के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए।

हिंदी आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वैज्ञानिक शब्दावली की भाषा है

हिंदी आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वैज्ञानिक शब्दावली की भाषा है। जिसके उच्चारण कंठ, तालु, होष्ठ, नासिका आदि से निर्धारित अक्षरों में किए जाते हैं। ऐसा वैज्ञानिक आधार अन्य भाषाओं में नहीं मिलेगा। हिंदी में जो लिखते हैं, वही पढ़ते हैं- जैसे ‘क’ को ‘क’ ही पढ़ेंगे। अंग्रेजी में ‘क’ को सीएच, क्यू, सी, के पढ़ते या लिखते हैं। अखिल विश्व की प्रमुख भाषाओं में चीनी भाषा में 204, दूसरे स्थान पर हिंदी में 52, संस्कृत में 44, उर्दू में 34, फारसी में 31, अंग्रेजी में 26 और लैटिन भाषा में 22 वर्ण होते हैं। हिंदी की महत्ता और वैज्ञानिक पद्धति को समझते हुए देश में सर्वप्रथम बनारस हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी के आईआईटी विभाग ने अपने पाठ्यक्रम को हिंदी भाषा में पढ़ने-पढ़ाने की अनुमति प्रदान की है।

बड़े गर्व की बात है उच्च न्यायालय प्रयागराज के न्यायमूर्ति श्री शेखर कुमार यादव ने स्व का तंत्र और मातृभाषा विषयक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए अधिवक्ताओं से कहा कि आप हिंदी में बहस करें। मैं हिंदी में निर्णय दूँगा। साथ ही कहा कि 25 प्रतिशत निर्णय में हिंदी में ही देता हूँ।

विश्वविद्यालयों की वार्षिक/सेमेस्टर परीक्षाओं में वर्णनात्मक/निबंधात्मक प्रश्नोत्तर लगभग समाप्त करके बहुविकल्पीय प्रश्नपत्रों को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। इस विकृत व्यवस्था से नकल को बढ़ावा तो मिला ही, साथ-साथ विद्यार्थी के अंदर लिखने-पढ़ने का कौशल तथा भाषाई ज्ञान समाप्त हो रहा है। अब तो व्हाट्सएप की संक्षिप्त भाषा को विद्यार्थी अपने जीवन और लेखन में उतरने लगे हैं।जिसका संक्षिप्त प्रयोग न हिंदी का सही व्याकरणीय ज्ञान का बोध करा पा रहा है, न अंग्रेजी का। जैसे प्लीज को पीएलजेड, थैंक्स को टीएचएनएक्स, मैसेज को एमएसजेड लिखने का प्रचलन खूब चल रहा है। जो आने वाली पीढ़ी के लिए घातक है।

कोविड-19 का दुष्प्रभाव बच्चों पर बहुत पड़ा है। इसके कारण 2 वर्षों से वास्तविक, स्कूली और किताबी और प्रयोगात्मक पढ़ाई न हो पाने के कारण उत्पन्न हुई भाषाई, उच्चारण और व्याकरण की समस्या दूर करने के लिए शिक्षकों के साथ-साथ अभिभावकों को भी आगे आना होगा। अभिभावक गण अपने पाल्यों की कॉपियां देखें और त्रुटियों की ओर उनका ध्यानाकर्षण करें।

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हिंदी दिलों को जोड़ने वाली मातृभाषा।

अंग्रेजी व्यापारिक भाषा है तो हिंदी दिलों को जोड़ने वाली मातृ भाषा। हिंदी माँ है तो उर्दू मौसी और संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। इसका गहनता से अध्ययन करते हुए हिंदी भाषा को सशक्तिकरण के रूप में अपनाना होगा। प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाने का तात्पर्य यह नहीं है कि हिंदी पीछे है या कमजोर है। इस महत्वपूर्ण दिन को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाने का उद्देश्य है- हिंदी को सम्मान देना। इस सम्मान की गरिमा बनाए रखने के लिए देवनागरी लिपि हिंदी को यथाशीघ्र राष्ट्रभाषा घोषित किया जाना चाहिए।

कभी-कभी मैं स्वयं हतप्रभ रह जाता हूँ। 21 अगस्त सन 2021 को हिंदुस्तान समाचार पत्र में प्रकाशित खबर के अनुसार प्रवक्ता पद के प्रश्नपत्र में 90% व्याकरण सम्बन्धी और अक्षरों की त्रुटियां हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में इतनी अधिक त्रुटियाँ होना हम सब को कटघरे में खड़ा करता है।यह योग्यता में कमी या इच्छाशक्ति में कमी या हिंदी के प्रति दुर्व्यवहार दर्शाता है? आखिर हमारी शैक्षिक पद्धति कहाँ जा रही है। अंत में इतना ही कहना चाहूँगा।