Patthar dil laghukatha-डॉ० सम्पूर्णानंद मिश्र

 पत्थर दिल – लघुकथा

(Patthar dil laghukatha)

बहुत खुश थी सुहानी। आज उसे केन्द्र सरकार के एक प्रतिष्ठित विभाग में नौकरी मिल गई। खुशी का ठिकाना नहीं था। उसकी प्रसन्नता उसके चेहरे से साफ़ दिखाई पड़ रही थी। इधर कई वर्षों से सिविल सेवा की तैयारी में जी जान से लगी थी। सुहानी आज सत्ताइस साल की पूरी हो गई। घर में अपाहिज़ पिता जो पिछले दस वर्षों से ज़िंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। उनके दवा की जिम्मेदारी से लेकर छोटे भाई के पढ़ाने का खर्च और बूढ़ी मां के कैंसर जैसे जानलेवा बीमारी जिसमें रोगी का अटेंडेंट बिल्कुल टूट जाता है, यह सब कुछ वह एक छोटी सी प्राइवेट नौकरी और वहां से छूटने पर कुछ छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर किसी तरह से घर को चला रही थी। जिस शहर में सुहानी रहती है उसी शहर में उसके मुंहबोले एक मामा भी रहते हैं। शुरूआती दौर में वह अक्सर भांजी के यहां आया करते थे जब उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी थी। पिता को पच्चीस हजार का पगार मिल जाता था, लेकिन दुर्भाग्यवश उस घटना में फ़ालिज मार देने के कारण कुछ दिन तो मालिक ने आधा वेतन दिया, बाद में वह भी बंद कर दिया। मुफ़लिसी में खुले दरवाजे भी बंद हो जाते हैं। जो अच्छे समय पर डींगे हांकते थें चौबीस घंटे वहां डटे रहते थे उन्होंने भी किनारा कर लिया। मुंहबोले मामा से सुहानी ने सिर्फ़ दो हजार रुपए मांगे थे, मुसीबत में अपनों का ही सहारा होता है यह समझकर उसने मामा से मदद मांगी थी लेकिन मामा ने स्पष्ट मना कर दिया कहा कि मुझे अपनी बच्ची की फीस जमा करनी है और बेटे सोनू को ट्यूशन जाने के लिए एक नई साइकिल खरीदनी है कहकर पलड़ा झाड़ लिया। कहा गया है कि जब विपत्ति आती है तो कुछ अनिष्ट भी कर जाती है। कैंसर से जूझ रही मां के कीमों थेरेपी के लिए अपने पिता के आफिस गई। कंपनी के मालिक से अपनी हालत बयां कर डाली, लेकिन मालिक ने कहा तुम्हारे पिता के इलाज के लिए पहले से ही बहुत पैसा मैंने दे दिया है अब मैं नहीं दे सकता। सुहानी ने कहा कि मुझे कुछ पैसे और दे दीजिए मैं पाई-पाई आपका चुका दूंगी। थोड़ा सा वक्त दे दीजिए, समय एक जैसा नहीं रहता है। यह कहते- कहते उसकी आंखों से आंसू चू पड़े, लेकिन मालिक का पत्थर दिल नहीं पसीजा। निराश होकर जब घर पहुंची तो देखा दरवाजे पर भीड़ लगी हुई थी। लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। उसकी मां इलाज़ के अभाव में इस नश्वर संसार से अपने सारे संबंध तोड़कर देवलोक के लिए महाप्रस्थान कर चुकी थी।

Patthar- dil- laghukatha
डॉ० सम्पूर्णानंद मिश्र
फूलपुर प्रयागराज
7458994874

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Abhimanyu

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