moral story in hindi -पवन शर्मा परमार्थी

इकतरफा प्रेम की परिणिति, नशा और पागलपन

(moral story in hindi)

भैया बात दुःख की है, पर मेरा मानना है कि उसकी मृत्यु नहीं उसे मुक्ति मिली है, अच्छा हुआ, क्योंकि ऐसे दुःख उठाने से तो ठीक है, पीड़ा से मुक्ति पा जाना । ऐसी ही मुक्ति मिली है मनोज को। हालांकि परिवार के किसी  सदस्य का परलोक सिधार जाना बहुत ही दुःखद विषय होता है । परन्तु, उन्हें मनोज के पागलपन से मुक्ति मिल जाने पर कोई……।

ये वाक्य थे मृतक मनोज के दोस्त व पड़ोसी रमेश के । क्योंकि उससे ज्यादा मनोज के बारे में कोई नहीं जानता था । दोनों ही बचपन के साथी थे, साथ-साथ, खेले-कूदे और पढ़े-लिखे थे । दोनों एक दूसरे के सुख-दुःख में सम्मिलित रहते थे । यूँ कहिए कि प्रगाढ़ पारिवारिक सम्बन्ध थे । दोनों एक-दूजे के लिए सदैव समर्पित भी रहते थे ।

मनोज के जाने का परिवार को तो दुःख था ही, रमेश को भी पीड़ा कम न थी । सामने पड़े मनोज के निर्जीव शरीर को देख रहा था वह । उसकी आँखों से आँसुओं की बूँदे रमेश की कमीज पर गिर रही थीं, अहसास करा रहीं थीं उसकी पीड़ा का । अपने आँसुओं को रुमाल से पोंछते हुए रमेश मनोज अपनी मित्र की स्मृतियों में खो गया–कितना अच्छा था वह कभी । मनोज, पढ़ने-लिखने, खेल-कूद में बहुत होशियार था । सभी के साथ हँस-बोलकर, घुल मिलकर रहना उसकी विशेष आदत थी । उसने स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की थी, वह भाग्यशाली था कि थोड़ा परिश्रम करने पर ही उसे सरकारी नौकरी मिल गई थी ।

दिल्ली नगर निगम में लिपिक (क्लर्क) के पद पर उसकी नियुक्ति हुई । वह बहुत ही पूर्ण परिश्रम व निष्ठा के साथ काम करता था । कार्यालय में सभी साथी एवं अधिकारी उससे बहुत प्रसन्न रहते थे।

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मनोज भी नौकरी मिलने से बहुत प्रसन्न था । यूँ तो परिवार में वह सबसे छोटा था (उसके दो बड़े भाई और दो बहनें थीं, जिनकी शादी हो चुकी थी, बस वही घर में कुंवारा था) पर बड़े की तरह सबका ध्यान रखता था । यह समझिए कि वह परिवार के प्रति अपने दायित्व को भलि-भाँति समझता था । दोस्ती के रिश्ते को भी बहुत अच्छी तरह समझता था। घर पर या कार्यालय में जो भी जाता, उसका वह अच्छी तरह से मान-सम्मान करता था, चाय-पानी से लेकर भोजन से अतिथि सत्कार करता था । किसी को यदि आर्थिक आवश्यकता होती तो जो भी सम्भव हो सकता था, मदद करता था । इसी कारण  दोस्त व रिश्तेदार उससे बहुत-सी अपेक्षाएं रखते थे और उसे एक होनहार व्यक्ति मानते थे ।

यहाँ एक बात पर गौर करने की आवश्यकता है कि जो व्यक्ति सज्जन होता है, उसके कई शत्रु भी होते हैं या ईर्ष्या में शत्रु बन जाते हैं । मनोज को नौकरी करते हुए लगभग चार वर्ष हो गए थे एक ही कार्यालय में कार्य करते हुए । कार्यालय में भी उसके  सद्व्यवहार के कारण परिवार जैसा ही वातावरण बन गया था । ऐसा होना स्वभाविक भी होता है, शायद इसलिए सभी के साथ प्रेम व विश्वास बन गया था । पूर्ण ईमानदारी के साथ वह काम के प्रति सदैव निष्ठावान बना रहता था, अपने काम के साथ कोई व्यक्ति लापरवाही करे तो उसे बरदाश्त नहीं होता था । यही कारण था कि कई लोग उससे अन्दर ही अन्दर कटुता का भाव रखते थे । लेकिन वह ऐसी बातों पर ध्यान नहीं देता था ।

संयोग की बात थी कि उसी कार्यालय में एक नेहा नाम की  लड़की भी काम करती थी, जिसकी नियुक्ति कुछ ही दिन पहले उसी कार्यालय में हुई और उसकी सीट भी मनोज के साथ में ही थी । क्योंकि एक ही कार्यालय में एक ही साथ काम करते थे तो व्यवहार में रहना, खाना-पीना, हँसना-बोलना स्वाभाविक था । कार्यालय की दिनचर्या दोनों की प्रतिदिन एक जैसी ही थी तो उनमें एक दूजे के प्रति आकर्षण होना कोई बड़ी बात नहीं थी, दोनों एक दूजे से घुलमिल गए थे, दोनों एक दूसरे के प्रति समर्पित दिखाई देने लगे । वे एक दूसरे के प्रति आसक्त हैं, ऐसा लोग अनुभव करने लगे । इसी तरह लगभग एक वर्ष कैसे बीत गया, पता भी नहीं चला ? वे अगर् कभी न मिलें तो एक-दूसरे की कमी महसूस करते । इसी तरह समय का चक्र घूमता रहा, आखिर एक दिन मनोज ने नेहा के सामने शादी का प्रस्ताव रख ही दिया । शादी का प्रस्ताव सुनकर पहले तो नेहा चौंकी लेकिन सम्भलकर बोली–

“अच्छा, किससे कर रहे हो शादी, जरा हमें भी तो पता चले ।”

नेहा की बात सुनकर मनोज ने भावुक होकर कहा–“नहीं, नेहा शादी करनी जरूरी है, शायद तुम नहीं जानती कि….।”

“क्या नहीं जानती, तनिक स्पष्ट कर बोलो तो मनोज, मैं क्या….?”

“यही कि मैं…मैं…तुमसे ही शादी करना चाहता हूँ, क्योंकि….।”

“क्या मतलब, तुमने ऐसा सोच कैसे लिया, मैंने तो कभी ऐसा सोचा ही नहीं, फिर….?”,

“लेकिन नेहा मैं तो तुमसे बहुत प्यार करता हूँ और शायद तुम भी मुझसे….।”

“नही, मनोज गलतफहमी मत पालो, मैं तुम्हें प्यार नहीं करती, मैं केवल तुम्हें अपना एक अच्छा दोस्त मानती हूँ, दोस्ती और प्रेम में अन्तर होता है, इसलिए….।”

“परन्तु, मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ । शायद तुम्हें नहीं पता,  मैं तुमसे अथाह प्रेम करता हूँ कि अब तुम्हारे बिना नहीं रह सकता….।”

इतना सुनकर नेहा कहने लगी—“मनोज क्या तुम्हें कोई गलतफहमी नहीं हो रही है । मैं भी तुम से कम प्यार नहीं करती हूँ, केवल दोस्त समझ कर ।  हाँ, यह बात सही है कि तुम मेरे एक अच्छे दोस्त हो,  दोस्त की तरह ही सोचती हूँ, न कि प्रेमिका के रूप में, अगर तुम ऐसा सोच रहे हो तो गलत….।”

“लेकिन ऐसा क्यों नेहा ?”

इस पर नेहा कुछ देर तो चुप रही और फिर बोली–“मनोज ऐसा नहीं है कि तुम जानते नहीं कि दोस्ती और प्रेम में कितना अन्तर होता है ?”

“हाँ नेहा, यह तो मैं भूल ही गया था, भावनाओं में बहकर, प्रेम के वशीभूत मुझे याद ही नहीं रहा कि बिन तुम्हारी मर्जी के मैं भला….।”

“हाँ, मनोज मित्र और मीत में अन्तर होता है, मैं तम्हें केवल अपना अच्छा मित्र मानती हूँ, प्रेमी नहीं । मैं चाहकर भी तुमसे शादी नहीं कर सकती, क्योंकि मैं किसी और से प्रेम करती हूँ । मेरे मन में तुम्हारे प्रति आदर है, सम्मान है । परन्तु….।”

मनोज पर मानो पहाड़ टूटकर गिर गया हो, उसकी हालत देखते ही बनती थी । वह क्या-क्या सपने सँजोये बैठा था, कितने अरमान थे उसके दिल में नेहा से शादी करने के लिए, जो एक पल में धराशायी हो गए ? उसका दिमाग झन्ना गया चाहकर भी उसका दिल इस बात को मानने को तैयार नहीं था कि….। क्योंकि मनोज उसके प्यार में पूरी तरह गिरफ्त हो चुका था, उसके मन-मस्तिष्क में सिर्फ नेहा ही नेहा बस चुकी थी, जिसकी गिरफ्त से बाहर निकलना शायद उसके बस में नहीं रह गया था ।

मनोज वास्तव में उससे असीम प्रेम करने लगा था, उसके मन-मस्तिष्क में केवल नेहा की छवि इस प्रकार बस गई कि जिससे बाहर निकल पाना उसके बस से बाहर हो गया था । वह चाहकर भी उसे भूल नहीं पा रहा था । उसके साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ था, उसका प्यार इकतरफा बनकर रह गया, उसे इसका सदमा लगा । उसे नहीं पता था कि उसके साथ नेहा की ओर से इस प्रकार का….। उसने कई बार उससे फिर से  विचार करने  की विनती भी की, परन्तु, उसकी तरफ से उत्तर न में ही मिला । जिसने मनोज को तोड़कर रख दिया । नेहा ने भी धीरे-धीरे उससे किनारा कर लिया और कुछ दिन बाद वह अपना तबादला करवाकर दूसरे कार्यालय में चली गई । उसके चले जाने के बाद तो मनोज का जो हाल हुआ बस….।

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मनोज प्यार में धोखा खाकर कुछ दिन तो बिल्कुल मौन रहा, दिल में  लगी ठेस को वह सहन नहीं कर पा रहा था, न उसका काम में मन लगता, न ही घर पर । उसने लगभग सभी से बात करना भी बन्द कर दिया । दफ्तर भी कभी जाता, कभी नहीं जाता । उसकी स्थिति एक बुझे हुए दीपक की तरह हो गई । कार्यालय में भी दिन भर उसी की चर्चा रहती पर उसे किसी से भी कोई शिकायत नहीं होती । बस उसी के ख्यालों में खोया इधर से उधर भटकने लगा । आखिर एक दिन ऐसा आया कि जब वो सब देखने को मिला जिसकी कभी आशा न की  थी । मनोज ने अपना ग़म भुलाने के लिए नशे का सहारा ले लिया, यानि कि उसने शराब पीनी शुरू कर दी । यह सिलसिला निरन्तर चलता रहा । इसी तरह लगभग एक वर्ष निकल गया । कार्यालय कभी चला जाये, कभी नहीं, कार्यालय में भी अधिकारी उससे कुछ नहीं कहते, उसे चेतावनी देकर इतिश्री कर देते ।

मनोज ने खुद को पूरी तरह नशे में डुबो दिया, अब उसने अफीम, गांझा भी लेना शुरू कर दिया था। उसकी हालत और खराब होती चली गई, चौबीस घण्टे नशे में डूबा रहता । उसने फिर कार्यालय जाना भी बन्द कर दिया । अब अधिकारियों ने भी सहयोग करना छोड़ दिया, और एक दो बार नौकरी पर आने को नोटिस भी भेजा, परन्तु नतीजा शून्य रहा । मनोज की ओर से कोई उत्तर न मिलने के कारण उसे नौकरी से निकाल दिया गया । मनोज को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा, नशे से उसका दिमाग बिल्कुल शून्य हो चुका था, उसके अन्दर सोचने समझने की कोई क्षमता नहीं रह गई थी, क्योंकि वह पागल हो चुका था । अब लोग उसे मनोज नहीं, पागल कहकर पुकारने लगे।

पागल की स्थिति क्या होती है, बताने की आवश्यकता नहीं ? अब न उसे किसी प्यार का पता था, न  ग़म का । न उसे हँसने का पता था, न रोने का । न जागने का पता था, न सोने का । न भूख का पता था, न खाने का । न दिन का पता था न रात का । न शराब का पता था न अन्य….। बस इसी तरह कभी बस्ती में, तो कभी जंगल में ही भटकते देखा जाता ।उसकी नींद हराम हो चुकी थी । कुछ दिनों से उसे कभी सोता नहीं देखा गया। बस, इसी हालत में उसने कई  वर्ष बिता दिए और आज उसकी नरकीय जिन्दगी का अन्त होने पर बेचारा पागलपन से मुक्त हुआ ।

रमेश की तन्द्रा लौटी, सभी लोग उसे अंतिम संस्कार के लिए तैयारी कर चुके थे । कुछ समय पश्चात उसकी अन्तिम यात्रा निकली, अंतिम यात्रा के बाद उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया । एकतरफा प्रेम की परिणिति नशा और पाग़लपन होगा ऐसा किसी ने  सोचा न था और सबके मुख से एक ही वाक्य निकला कि इकतरफा प्यार के में पागल आज बेचारा पागलपन से मुक्त हुआ । ईश्वर उसकी आत्मा को शांति प्रदान करे ।

 

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पवन शर्मा परमार्थी

कवि-लेखक

9911466020

दिल्ली, भारत ।

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Abhimanyu

मेरा नाम अभिमन्यु है इस वेबसाइट को हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए बनाया गया इसका उद्देश्य सभी हिंदी के रचनाकारों की रचना को विश्व तक पहचान दिलाना है

One thought on “moral story in hindi -पवन शर्मा परमार्थी

  • March 15, 2021 at 6:17 pm
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    प्रेरक कहानी
    इससे यह संदेश तो मिलता ही है कि प्यार में इतना पागल भी नहीं होना चाहिए कि खुद की भी खबर न रहे।जिन भाई बहनों ने इतना प्यार दिया,उन सबको भूलकर एक प्रेमिका के प्यार में खुद और परिवार को बर्बाद कर देना कहाँ की समझदारी है?

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