भारतीय इतिहास में रामप्यारी गुर्जर कौन थी | Veerangana Rampyari Gurzar

भारतीय इतिहास में रामप्यारी गुर्जर कौन थी | Veerangana Rampyari Gurzar

कुछ छुपा – छुपा और अनकहा इतिहास। जब खोजने पर सामने आया। तो पता चला। की एक ऐसी वीरांगना भी थी जिन्होंने आपने देश के लिए सर्वत्र निछावर कर दुश्मन को खदेड़ दिया था उसका नाम था रामप्यारी गुर्जर तैमूर को अपना भारत विजय अभियान अपूर्ण छोड़ पलायन करने हेतु विवश करने वाली वीरांगना रामप्यारी गुर्जर

रामप्यारी गुर्जर का परिचय

सहारनपुर के एक चौहान गुर्जर परिवार में रामप्यारी गुर्जर का जन्म हुआ। कुशाग्र, बुद्धि और इच्छा शक्ति ने बाल अवस्था में ही ओजपूर्ण और तेजस्वी बना दिया था।

नैसर्गिक रूप से शक्ति और तेज भरपूर मात्रा में ईश्वर से मिला था। निर्भय और कर्मठ स्वभाव की, रामप्यारी अपनी मां से नित्य ही पहलवान बनने हेतु आवश्यक नियम जिज्ञासा पूर्वक पूछा करती थी और फिर प्रात: काल हो या संध्याकाल, वे नियमित रूप से किसी एकान्त स्थान में व्यायाम किया करती थी। नियमित व्यायाम, अथक परिश्रम और अनुशासित जीवन शैली से अत्यंत शक्तिशाली योद्धा बन कर उभरीं।

रामप्यारी सदैव पुरुषों के सदृश वस्त्र पहनती थी और अपने ग्राम और पड़ोसी ग्रामों में पहलवानों के कौशल देखने अपने पिता और भाई के साथ जाती थी|  रामप्यारी की योग्यता, शक्ति एवं कौशल की प्रसिद्धि शनैः शनैः आस पड़ोस के सभी ग्रामों में फैलने लगी। एक बालिका का इस तरह पहलवानी में रुचि लेना चर्चा का विषय ही था।

सन् 1398 उस समय भारतवर्ष पर तुग़लक वंश का शासन हुआ करता था, परंतु ये शासन नाममात्र का था, वह न तो उस समय शक्तिशाली थे और न ही सक्षम इसलिए उसका आधिपत्य कोई भी राजा स्वीकारने को तैयार नहीं था।

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तैमूर ने दिल्ली में मौत का मानो एक खूनी उत्सव सा मनाया

इसी समय आगमन हुआ समरकन्द के क्रूर आक्रांता अमीर तैमूर का, तैमूर के खड्ग और उसके युद्ध कौशल के आगे  दिल्ली का सुल्तान नसीरुद्दीन तुग़लक निरीह व दुर्बल सिद्ध हुआ और उसकी सेना पराजित हुई। नसीरुद्दीन तुग़लक को परास्त करने के पश्चात तैमूर ने दिल्ली में मौत का मानो एक खूनी उत्सव सा मनाया, जिसका उल्लेख करते हुये आज भी कई लोगों की आत्माएँ काप उठती है। दिल्ली में तैमूर ने लूट पाट मार काट मचा रखी थी। करीब एक लाख हिन्दुओं को मारकर उनके शीश से स्तभ बनाये थे। उसका अत्याचार दिन ब दिन ज्यादा हो रहा था और वह दिल्ली से आगे बढ़ने की मनशा में था। दिल्ली को क्षत विक्षत करने के उपरांत तैमूर ने अपनी क्रूर दृष्टि हिंदुओं और उनके तीर्थों की ओर घुमाई।

जाट क्षेत्र के तत्कालीन प्रमुख देवपाल ने महापंचायत का आयोजन किया

तैमूर की मनसा की जानकारी जब जाट क्षेत्र में पहुँची, (जाट क्षेत्र में आज का हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ भाग आते हैं।) जाट क्षेत्र के तत्कालीन प्रमुख देवपाल ने महापंचायत का आयोजन किया। इस महापंचायत में जाट, गुर्जर, अहीर, वाल्मीकि, राजपूत, ब्राह्मण एवं आदिवासी जैसे अनेक समुदायों के सदस्य शामिल थे , जिसमें अस्सी हज़ार पुरुष यॊद्धाओं का नेतृत्व महाबली जॊगराज सिंह ने किया । महापंचायत में देवपाल ने न केवल तैमूर के अत्याचारों को सबके समक्ष उजागर किया, अपितु वहाँ उपस्थित सभी समुदायों से यह निवेदन किया कि वे अपने सभी मतभेद भुलाकर एक हों, और तैमूर को उसी की भाषा में जवाब कर न केवल सनातन समुदाय की रक्षा करें, वरन समूचे भारतवर्ष के लिए एक अनुपम उदाहरण पेश करने की बात रखी।

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महापंचायत ने सर्व समाज की एक सेना तैयार की

अपने देश, जाति के लिए कुछ करने का यह सुअवसर कोई भी अपने हाथ से जाने देना नहीं चाहता था। अंतत : सभी समुदायों की सहमति से महापंचायत ने तैमूर की सेना से छापामार युद्ध लड़ने की रणनीति बनायीं।  इस हेतु  महापंचायत ने सर्व समाज की एक सेना तैयार की, जिसमें इस महापंचायत सेना के ध्वज के अंतर्गत 80,000  योद्धा शामिल हुए थे। इस कार्य को करने के लिए बढ़-चढ़कर लोग भाग ले रहे थे।

सेनापति नियुक्त हुई रामप्यारी गुर्जर

महिलाएँ फिर क्यों पीछे रहने वाली थी, उन्हें समर्थन देने हेतु चालीस हजार अतिरिक्त सैनिकों की टुकड़ी तैयार कर ली, जिसमें सभी महिला सदस्य थी, और उनकी सेनापति नियुक्त हुई रामप्यारी गुर्जर। वहीं मुख्य सेना के प्रमुख थे महाबली जोगराज सिंह गुर्जर और उनके सेनापति थे वीर योद्धा हरवीर सिंह गुलिया।

चाकचौबंद पहरेदारी के तहत तैमूर को मुंह की खानी पड़ रही थी

सेना को सशक्त बनाने और सुनियोजित योजना के अंतर्गत पाच सौ युवा अश्वारोहियों को तैमूर की सेना पर जासूसी हेतु लगाया गया, जिससे उसकी योजनाओं और भविष्य के आक्रमणों के बारे में पता चल सके। यदि तैमूर एक स्थान पर हमला करने की योजना बनाता, तो उससे पहले ही रुग्ण, वृद्धजनों और शिशुओं को सुरक्षित स्थानों पर सभी मूल्यवान वस्तुओं सहित स्थानांतरित कर दिया जाता। चाकचौबंद पहरेदारी के तहत तैमूर को मुंह की खानी पड़ रही थी, इतनी चतुराई से इतिहास में कोई युद्ध नही लड़ा गया।

रामप्यारी गुर्जर जैसी अनेकों वीर महिलाओं ने जिस तरह तैमूर को नाकों चने चबवाने पर विवश किया, वो अपने आप में असंख्य भारतीय महिलाओं हेतु किसी प्रेरणास्त्रोत से कम नहीं होगा। यह युद्ध कोई आम युद्ध नहीं था, अपितु अपने सम्मान, अपने संस्कृति की रक्षा हेतु किया गया एक धर्मयुद्ध था, जिसमें जाति , धर्म सबको पीछे छोडते हुये हमारे वीर योद्धाओं ने एक क्रूर आक्रांता को उसी की शैली में सबक सिखाया। यह युद्ध इतिहास में इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें लिंग भेद नहीं था , बराबर की जिम्मेदारियाँ दी गई थी और बढ़ चढ़ कर हर एक ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया था। इस युद्ध में महिलाओं ने अपने नेतृत्व में अपनी शक्तियों का प्रदर्शन भरपूर किया था क्योंकि उन्हें संगठित करने वाली रामप्यारी गुर्जर स्वयं समर्पित योद्धा थी।

भारत में तैमूर के अभियान का मुख्य उद्देश्य

ब्रिटिश इतिहासकार विन्सेंट  ए स्मिथ द्वारा रचित पुस्तक ‘द ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ इंडिया : फ्रोम द अर्लीएस्ट टाइम्स टू द एण्ड ऑफ 1911’ की माने तो भारत में तैमूर के अभियान का मुख्य उद्देश्य था: सनातन समुदाय का विनाश कर भारत में इस्लाम की ध्वजा लहराना । जब तुग़लक वंश को धाराशायी करने के पश्चात तैमूर ने दिल्ली पर आक्रमण किया था, तो उसने उन क्षेत्रों को छोड़ दिया, जहाँ मुसलमानों की आबादी ज़्यादा था, और उसने केवल सनातन समुदाय पर निशाना बनाया।

सैफ्रन स्वोर्ड्स (Saffron Swords: Centuries of Indic Resistance to Invaders) जिसकी लेखिका हैं मनोशी सिंह रावल, इसमें 51 ऐसे हिन्दू वीरों की कथाएँ हैं जिन्होंने इस्लामिक आताताईयों और ब्रिटिश लूटेरों के अजेयता के दंभ को करारा झटका किया था।

FAQ

इस पुस्तक की लेखिका हैं मनोशी सिंह रावल, इसमें 51 ऐसे हिन्दू वीरों की कथाएँ हैं जिन्होंने इस्लामिक आताताईयों और ब्रिटिश लूटेरों के अजेयता के दंभ को करारा झटका किया था।

सनातन समुदाय का विनाश कर भारत में इस्लाम की ध्वजा लहराना । जब तुग़लक वंश को धाराशायी करने के पश्चात तैमूर ने दिल्ली पर आक्रमण किया था, तो उसने उन क्षेत्रों को छोड़ दिया, जहाँ मुसलमानों की आबादी ज़्यादा थी , और उसने केवल सनातन समुदाय पर निशाना बनाया

वीरांगना रामप्यारी गुर्जर

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