Moral story|hindi kahani/अंजली शर्मा

आता तो रोज है आखिर माँ लेती क्यों नहीं

(Moral story in hindi)


छोटी मुनिया तो माँ के आँचल में दुबक गई लेकिन, बड़ा, बड़ा कुनमुना रहा था। माँ ने उठकर देखा तो उसका पैर खुला हुआ था इसलिए ठंड में कुनमुना रहा था। माँ ने कंबल खींचकर बड़े के पैरों में ढक दिया, जैसे ही माँ ने कंबल खींचा छोटा का सिर खुल गया वो चिड़चिड़ाने लगा। माँ बड़े को ढकती तो छोटा खुल जाता और छोटे को ढकती तो बड़ा, दोनो हाथ-पैर सिकोड़े पड़े थे। माँ कि छटपटाहट उसे सोने नहीं दे रही थी, बार-बार बड़बड़ाती आज अचानक ठंड इतनी बढ़ क्यों गयी, ये ठंड को भी अभी से आ जाना था।

सुबह पिता जाम पर जाते-जाते कह रहे थे, अब ठंड बढ़ रही है ऐसे में कंबल वाले आते हैं तुम ध्यान रखना, कम-से- कम दो कंबल तो ले ही लेना। बच्चों ने माँ से ऐसा कहते हुये पिता को सुन लिया था, जैसे ही कंबल वाला आया बच्चे माँ को आवाज लगाने लगे, माँ कंबल वाला आया है। माँ काम कर रही थी सो अभी टाल दिया। अब जब भी कंबल वाला आता बच्चे माँ को बताने दौड़ते। माँ बहुत सुंदर-सुंदर कंबल आया है, शाल और चादर भी है। तुम अपने लिये शाल भी ले लेना सुबह उठती हो तुम्हारे पास शाल नहीं है तुम्हें ठंड लगती होगी। पिताजी के लिये चादर भी ले लेना उनका बिछौना बिल्कुल फट चुका है। जब भी कंबल वाला आता माँ बच्चों की बातों को अनसुना कर देती, मुनिया कह रही होती है मैं तो लाल वाला लूंगी, बड़ा कहता मैं आकाश वाला और छोटा कहता मैं तो शेर वाला लूंगा। माँ चाहती थी कि ये कंबल वाला यहाँ से जल्दी निकल जाय और कंबल वाला था कि बार-बार वहीं आकर आवाज लगाने लग जाता। बेचने वालों की भी अजीब आदत होती है, कान चौकन्ना रखते हैं। बच्चों की बात सुनकर कंबल वाला भी रोज यहीं मंडराता रहता कंबल ले, शाल ले, चादर ले, माँ को बड़ी चिड़चिड़ाहट होती थी। जब भी कंबल वाला आता माँ टाल जाती, जबकि, पिताजी रोज कहकर जाते थे कि, शायद आज आयें कंबल वाले तुम जरा बाहर ध्यान रखना। बच्चों को समझ में नहीं आता कि, जब पिता ने बोला है तो माँ कंबल लेती क्यों नहीं।

इधर रोज ठंड बढ़ती जा रही थी। माँ रोज रात में यही बड़बड़ाती कि, कंबल वाले आज फिर नहीं आये, पता नहीं कब आयेंगे, इस बार आयेंगे भी या नहीं आयेंगे। पिता शाम को घर में आते ही माँ से यही सवाल पूछते कंबल वाले आये थे क्या! माँ कहती इधर तो नहीं आये, उधर तुम्हें कहीं दिखे क्या! तुम्हें कहीं दिखें तो तुम ध्यान रखना, एकाध तो ले ही लेना।

बच्चे आपस में बात करते कि, माँ-पिताजी को आखिर; कौन से कंबल वाले का इंतजार है। कौन से कंबल वाले से कंबल खरीदना चाहते हैं। आखिर,उन्हें कैसा कंबल चाहिए । ठंड बढ़ती जा रही है और माँ-पिताजी कह रहे हैं थोड़ा और इंतजार कर लेते हैं। बच्चे सोच रहे हैं जितने कंबल वालेे आये हैं उन्होंने तो सबके बारे में माँ को बताया है फिर वो कौन सा कंबल वाला है जिसका माँ पिता जी को इंतजार है। अब बच्चों को क्या मालूम; माँ-पिताजी कंबल बेचने वालों की नहीं, कंबल बाँटने वालों की बात कर रहे हैं।

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अंजली शर्मा

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )

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Abhimanyu

मेरा नाम अभिमन्यु है इस वेबसाइट को हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए बनाया गया इसका उद्देश्य सभी हिंदी के रचनाकारों की रचना को विश्व तक पहचान दिलाना है

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