मैथिलीशरण गुप्त के काव्य में राष्ट्रीय चेतना

मैथिलीशरण गुप्त के काव्य में राष्ट्रीय चेतना

अशोक कुमार गौतम
असिस्टेंट प्रोफेसर
(अध्यक्ष हिंदी विभाग)
शिवा जी नगर, रायबरेली।
+919415951459
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त सन 1886 को चिरगांव जिला झांसी में हुआ था।  आप खड़ी बोली के रचनाकार और द्विवेदी युग के कवि हैं। स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने सन 1952 में गुप्त जी को राज्यसभा सदस्य मनोनीत किया था।

    मैथिलीशरण गुप्त जी की प्रमुख रचनाएँ साकेत, यशोधरा, द्वापर, पंचवटी, सैरन्ध्री, नहुष, भारत भारती आदि हैं। साकेत महाकाव्य की रचना सन 1931 में कई, जिसमें कुल 12 सर्ग हैं। साकेत का अर्थ है- अयोध्या।  साकेत का प्राणतत्व लक्ष्मण की अर्धांगिनी उर्मिला को माना गया है। साकेत में सीता जी को, यशोधरा महाकाव्य में यशोधरा जी को संघर्ष, त्याग, बलिदान की प्रतिमूर्ति दिखाया गया है। मैथिलीशरण गुप्त की मृत्यु 12 दिसंबर 1964 को हुई थी।

    किसी भी राष्ट्र की आत्मा उसकी सभ्यता और संस्कृति में निवास करती है। ईश्वर के प्रति प्रेम और देश के प्रति सम्मान, सद्भाव की भावना को राष्ट्र भावना कहते हैं। मैथिलीशरण गुप्त के संपूर्ण काव्य ग्रंथों में सर्वत्र राष्ट्रीय चेतना परिलक्षित होती है। गुप्त जी की कविता में राष्ट्रप्रेम, राष्ट्र उत्थान, राष्ट्र कल्याण आदि जो भाव छिपे हुए हैं, वह अन्यत्र तत्कालीन कवियों में बहुत सीमित एक मिल सकेंगे। गुप्त जी की प्रथम कृति 'भारत भारती' है। जिसमें गुप्त जी ने आत्म गौरव का सम्मान बढ़ाने का प्रयास किया है-

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं, नर पशु निरा, और मृतक समान है।।

    गुप्त जी ने राष्ट्रीय भावना में अपनी मातृभाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है। इस दृष्टिकोण से आपने कविता 'नागरी और हिंदी' लिखी है-
      एक लिपि एक विस्तार होना योग्य हिंदुस्तान में।
      अब आ गई यह बात सब विद्वतत्जनों के ध्यान में।।

    मैथिलीशरण गुप्त की कृति 'भारत भारती' ने उन्हें राष्ट्रकवि बना दिया है। यद्यपि कविता गुप्त जी की उग्र राष्ट्रीय चेतना का परिचायक बन गई थी, जिसे अंग्रेजों ने जप्त कर लिया था। आपने भारत भारती में वर्तमान परिवेश को लेखनी के माध्यम से बड़े दुःख के साथ व्यक्त किया है-
     जिस लेखनी में लिखा उत्कर्ष भारतवर्ष का।
      लिखने चली अब हाल वह उसके अमिट अपकर्ष का।
          ×          ×          ×         ×
      हे पुण्य भूमि! कहाँ गई है वह तुम्हारी श्री कहो।

    गुप्त जी अपने देश के सम्मान में मातृभूमि की रक्षा के लिए प्रथम वंदना करते हैं। मातृभूमि को पूज्य बताते हुए आप लिखते हैं-
      जो जननी का भी सर्वथा थी पालन करती रही।
      तू क्यों न हमारी पूज्य हो मातृभूमि मात मही।।
   हमारे देश भारत को 'सोने की चिड़ियाँ' की संज्ञा दी गई थी, जिसकी महानता का वर्णन करते हुए गुप्त जी ने भारत के प्रति दुःख प्रकट करते हुए लिखा है-
     सुख का सब साधन है इसमें।
     भरपूर भरा धन है इसमें।
     पर हा! अब योग्य रहे न हमीं।
    इससे दुःख की जड़ आ जमी।।

    हमारे समाज को सुधारने के साथ राष्ट्र भावना का निर्माण की अभिव्यक्ति भी मैथिलीशरण गुप्त जी ने अपने काव्य में की है। सदाचार के माध्यम से इस पावन भूमि को स्वर्ग बताते हुए कहा है-
      बना लो जहाँ, वहीं स्वर्ग है।
      स्वयंभूत थोड़ा वहीं स्वर्ग है।। 

    राष्ट्रकवि गुप्त जी ने अपनी विख्यात कविता 'भारत भारती' में भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्य काल का वर्णन बड़े मार्मिक ढंग से किया है। जिसमें आम-खास भारतीय नागरिक को प्रेरक और नया सन्देश दिया है की हम सब मिलकर देश की उन्नति के लिए विचार करें-
      हम कौन थे? क्या हो गए और क्या होंगे अभी?
      आओ विचारे आज मिलकर यह समस्याएं सभी।।

    गुप्त जी ने अपनी प्रसिद्ध कृति 'यशोधरा' में गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा के माध्यम से देश प्रेम को व्यक्त करते हुए लिखा है-
      मधुर बनाता सब वस्तुओं का नाता है।
      भाता वहीं उसको, जहाँ जो जन्म पाता है।।

    द्विवेदी युग के प्रखर कवि मैथिली शरण गुप्त के अंदर अपने देश के प्रति उन्नतिशील राष्ट्रीय भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी, जिससे प्रभावित होकर महात्मा गाँधी जी ने मैथिलीशरण गुप्त को राष्ट्रकवि की संज्ञा दी है।



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