हिमाचल की भीमाकाली और सराहन / आशा शैली

हिमाचल की भीमाकाली और सराहन / आशा शैली

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आशा शैली

हिमाचल प्रदेश का मन्दिरों और देवस्थानों से ओत-प्रोत अपूर्व प्राड्डतिक दृश्य है मन को आनन्द से भर देने वाला। नीचे-ऊपर पहाड़ ही पहाड़, झरने, नदियाँ, चारों ओर पिघलती बर्फ लेकर पर्वत शृंखलाएँ ऐसी, जैसे ईश्वर कुछ संदेशा लिखकर लोगों तक पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसी ही असमान्तर बर्फीली रेखाएँ पर्वतों को घेरे हैं। हरियाली के उपर बर्फ के सुन्दर मुकुट ऐसे सजे हुए हैं जैसे किसी राजा के सर पर चांदी का मुकुट सजा हो।

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हिमाचल में माँ ज्वाला और चिन्तपुरनी के भव्य मन्दिर हैं तो माँ भीमाकाली भी यहाँ विराजमान है। विष्णु, शिव, इन्द्र और अन्य देवी देवताओं के साथ देवी के मन्दिर भी प्रचुर मात्रा में मिलते हैं जिनमें माँ ज्वाला और चिन्तपुरनी के मन्दिर तो विश्वविख्यात हैं ही, परन्तु श्राईकोटि ;श्रीकोटिद्ध जहाँ नारद जी ने तप किया और माँ भीमाकाली का भव्य मन्दिर भी अब हिमाचल से बाहर जाना जाने लगा है।
शिमला से जब हम राष्ट्रीय राजमार्ग की यात्रा किन्नौर की ओर को करते हैं तो शिमला से लगभग 200 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद हमें ‘सराहन’ नाम का लघु-नगर मिलता है। इसी सराहन नगर में अपनी पूरी साज-सज्जा के साथ खड़ा है माँ भीमाकाली का भव्य मन्दिर। यह मन्दिर शक्तिपीठ तो नहीं है फिर भी इसकी मान्यता शक्तिपीठ से किसी भी तरह कम नहीं। सराहन नाम के इस उपनगर को जहाँ सेब उत्पादन के लिए जाना जाता है वहीं भीमाकाली के कारण इसका महत्व है। बल्कि सच पूछा जाए तो सरहान का महत्व मन्दिर के कारण अधिक है।


सराहन को ड्डष्ण से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि यह नगर बहुत प्राचीन है और इसका पूर्व नाम शोणितपुर है जो राक्षसराज वाणसुर की राजधानी रहा है। द्वारिकाधीश के ज्येष्ठ पुत्र प्रद्युम्न के पुत्र अर्थात् श्री ड्डष्ण के पौत्र अनिरु( का वाणसुर की पुत्री उषा से स्वप्न में प्रेम हुआ तो उषा ने अनिरु( का अपहरण करवा लिया। इस पर वाणासुर ने दोनों को बंदी बना लिया। पता चलने पर श्रीड्डष्ण का वाणासुर से यु( हुआ और वाणासुर मारा गया। परन्तु इस प्रेमकथा में देवी की कहीं चर्चा नहीं है, क्योंकि तब देवी की स्थापना यहाँ नहीं थी। रामपुर बुशहर के पूर्व मुख्यमंत्री श्री वीरभद्र सिंह का वंश उन्हीं चन्द्रवंशीय अनिरु( का वंश कहा जाता है। इन चन्द्रवंशी राजाओं की राजधानी पूर्वकाल में कामरू जाम के स्थान पर बताई जाती है, जो कामरूप का अपभ्रंश कहा जाता है। कालांतर में ये लोग अपनी राजधानी सराहन ले आये। यहाँ पर इन चन्द्रवंशी राजाओं की राजधानी के चिन्ह इनके प्राचीन महल हैं। गोरखा लोगों के लगातार आक्रमण होते रहने से इन लोगों को राजधानी, रामपुर बुशहर की भौगौलिक संरचना के कारण रामपुर बुशहर लानी पड़ी। यहाँ ये अपनी रक्षा व्यवस्था को अधिक सुचारू रूप से सँभाल सकते थे। तीव्रगामी और रौद्र रूप धारिणी सतलुज नदी के किनारे बसा यह नगर बिलकुल मुहाने पर पहुँचकर ही दिखाई देता है इसलिए शत्रु पर आसानी से आक्रमण किया जा सकता था। अतः तत्कालीन राजा रामसिंह ने इस स्थान का सुरक्षात्मक दृष्टि से चयन किया। सराहन और रामपुर की दूरी मात्र 40 किलोमीटर के लगभग रह जाती है।


देवी भीमाकाली के साथ एक कथा जुड़ी है, कहा यह जाता है कि भीमाकाली का आगमन तो तपस्वी तांत्रिक भीमगिरि के साथ हुआ है। लोक में प्रचलित कथा के अनुसार भीमगिरि नाम के एक तांत्रिक संत ने बहुत समय तक कामाख्या में तपस्या की। कामाख्या से भ्रमण करते-करते वे इधर आ निकले। वे कामाख्या से आते समय अपने साथ दैवीय शक्ति को अपनी छड़ी में स्थापित करके ले आये। सराहन नाम के इस स्थान पर जब वे रुके तो उन्हें इस स्थान की रमणीयता भा गई और वे यहीं एक गुफा में तप करने के लिए आसन लगाकर बैठ गये। इस समय मातृशक्ति सहित छड़ी को उन्होंने वहीं पर विराजित कर दिया। लम्बे समय की तपस्या के पश्चात् जब वे वहाँ से जाने लगे तो मातृशक्ति ने जाने से इनकार कर दिया। तब तांत्रिक के पास कोई चारा न बचा और उसने माँ कामाख्या को वहीं स्थापित कर दिया। भीमगिरि द्वारा स्थापित यह शक्ति कालांतर में भीमाकाली कहलाने लगी।


भीमाकाली का यह भव्य मन्दिर जो हिमाचली राजाओं का निजी सम्पत्ति है। यहाँ परिसर में दो मन्दिरहिमाचल अगल-बगल खड़े हैं। प्राचीन मन्दिर के द्वार बहुत छोटे हैं, लगभग दो-तीन फीट ऊँचे और गवाक्ष तो सम्भवतया एक फीट के भी नहीं हैं। पूर्वकाल में स्थापित इस मन्दिर में पहाड़ी निर्माण कला के अनुसार बड़े-बड़े पत्थरों को तराशकर लगाया गया है। हर तीन फीट के बाद लकड़ी के मोटे-मोटे शहतीर इसमें लगाये गये हैं। यह मन्दिर 500 वर्ष से अधिक पुराना बताया जाता है, परन्तु अब बंद रहता है। इसे केवल राज परिवार की पूजा के लिए खोला जाता है।


जो तीन मंजिला मन्दिर आज जनता के दर्शनार्थ खुला रहता है, वह नव निर्मित है। हिमाचल प्रदेश भी अन्य भारत की तरह भयंकर छुआछूत से प्रभावित था। आज से 40/50 वर्ष पूर्व जब मन्दिर में सर्व साधारण के लिए प्रवेश खोला गया था तब राज परिवार द्वारा इस मन्दिर का निर्माण किया गया था। बाद में वीरभद्र सिंह, ;जिन्हें वहाँ की जनता मरणोपरान्त भी राजा साहब कहती हैद्ध ने इसे न्यास को सौंप दिया।


मन्दिर के ऊपर के गुम्बद सारे के सारे सोने के हैं। अंदर सिंह वाहिनी का सिंहासन भी सोने का है। मुख्य मूर्ति और साथ-साथ दस सिंहासनों में सरस्वती, लक्ष्मी, गणेश, शिवजी इत्यादि देवी देवताओं की मूर्तियाँ विराजमान हैं, जिन पर रोज पुजारी फूल-जल चढ़ाते हैं। इन पुजारियों को बकायदा तन्ख्वाह दी जाती है। मुख्य दर्शन के लिए तंग संकरी सीढ़ियों से तीन मंजिल ऊपर जाना होता है, मन्दिर में प्रवेश करते ही धरातल पर एक पालकी रखी हुई है, जिसमें बैठकर माँ भीमाकाली की सवारी रामपुर जाती है। वहाँ इस मूर्ति के सामने सात दिन तक भजन कीर्तन हुआ करता है, मेला लगता है हजारों दर्शनार्थी एकत्रित होते हैं।


मन्दिर के द्वितल में जहाँ सिंहवाहिनी की स्वर्ण प्रतिमा स्थापित है। यहाँ हर समय ताला लगा रहता है क्योंकि एक बार तस्करों ने यह मूर्ति चुरा ली थी, जिसे दिल्ली की तंग गलियों से बरामद किया गया था। तस्कर मूर्ति को हानि नहीं पहुँचा पाये थे।
मन्दिर के सामने एक गुफा है जिसका दरवाजा बंद किया हुआ है। कहा जाता है कि ब्रिटिश शासन से पहले जिस अपराधी को भी मृत्यु दण्ड दिया जाता था उसे इस गुफा में धकेल दिया जाता था और वह कभी लौट कर नहीं आ सकता था। परन्तु हमने बड़े बुजुर्गों से यह भी सुना है कि इस गुफा का दूसरा छोर भी था। दण्डित व्यक्ति उस छोर से बाहर निकल जाते और फिर वहीं बसने लगे। चूंकि सैकड़ों वर्षों पूर्व आवागमन के साधन नहीं थे और इन क्षेत्रों में घने जंगल थे इसलिए किसी को पता नहीं चलता था और इस प्रकार धीरे-धीरे वहाँ पूरा गाँव बस गया, जिसका नाम रावीं है।


मन्दिर के पास ही एक म्यूजियम है, जिसमें इन हिमाचली राजाओं का उपयोग में लाया हुआ प्राचीन सामान रखा गया है। ‘वीरभद्र सिंह’ हिमाचल के पूर्व मुख्य मंत्री इसी राजवंश से हैं। पूरा जीवन पूजा के समय वे जरूर मंदिर में आते रहे हैं। मन्दिर से थोड़ी ही दूरी पर राज महल है, अत्यंत सुन्दर एक महल जिसमें लकड़ी के ऊपर अपूर्व नक्काशी की गई है। मन्दिरों के दरवाजों पर उन राजाओं के समय की अपूर्व नक्काशी का नमूना देखने को मिलता है। मन्दिर के सामने ही दोनों तरफ दो सिंहों के पुतले बने हुए हैं। दरवाजे पर पालकी, गणेश, पद्मफूल इत्यादि की नक्काशी की गई है जिसे देख कर प्राचीन समय की अपूर्व काष्ठकला का परिचय मिलता है।


मन्दिर के अंदर जो मूर्तियाँ हैं उनमें भीमाकाली की मूर्ति, बौ( मूर्ति, चण्डिका मूर्ति आदि हैं। जब चण्डिका और अन्नपूर्णा माताओं को रामपुर पालकी में बिठाकर ले जाया जाता है तब राज खानदान का कोई सदस्य आकर पहले माता का पूजन करता है उसके बाद ही बाकी सब लोग पूजन करते हैं।


भीमाकाली मन्दिर के पुजारियों के पास एक हस्त लिखित पुस्तक है, जिसे रावीं की पोथी कहा जाता है। यह पुस्तक वे लोग किसी को नहीं दिखाते। कहा जाता है कि इसमें इस क्षेत्र के राजाओं-सामन्तों एवं राजपरिवारों के रीति-रिवाज के बारे में सब कुछ लिखा है। पुस्तक कितनी प्राचीन है, ज्ञात नहीं परन्तु जब यह लिखी गई थी उस समय की राजनैतिक परिस्थितियों के बारे में भी सब जानकारी इस किताब में लिपिब( है। यह पहाड़ी भाषा के साथ पुरातन कुछ भाषाओं के संमिश्रण से लिखा गया है। डॉक्टर बंशी राम जी ने इसे शारदा लिपि में लिखित बताया है। बहुत मांगने पर भी उन्हें यह हस्तलिखित पुस्तक नहीं दी गई। उन्होंने प्रदेश सरकार से भी अनुरोध किया था, एक पन्ना केवल उनके हाथ लगा था जिसे पढ़कर बहुत सारी बातें उन्होंने बताई थी। डॉ. वंशीराम का गहन अध्ययन इस पुस्तक के ज्ञान को अवश्य जन-जन तक पहुँचा देता यदि उन्हें पुस्तक मिली होती। बहुत अनुनय विनय करने पर भी पुरोहितों ने उस पुस्तक को देने से इंकार कर दिया। डॉ. वंशीराम के अनुसार पुस्तक को राहुल सांड्डत्यायन ने भी देखा भर था। उन्हें भी इन स्थानीय पुजारियों ने पुस्तक नहीं दी, जिसका उन्हें सदैव खेद रहा। इन पुजारियों का कहना है कि यह किताब और किसी के हाथ आने से इस पहाड़ी के सारे लोग, ब्राह्मण परिवार के सारे लोग नष्ट हो जायेंगे। इसे पूजा जाता है पर पढ़ा नहीं जाता।’ यह समस्त अंधविश्वास से एक सम्पूर्ण इतिहास अनपढ़े अनजाने ही रह गये।

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