मेरी जम्मू-कश्मीर यात्रा | आशा शैली

यात्राएँ करना सम्भवतया मेरा स्वभाव ही बन गया है अथवा नियति, लेकिन परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव और देश की वर्तमान परिस्थितियों में सोच भी नहीं सकती थी कि कभी मुझे कश्मीर भी जाने का सौभाग्य प्राप्त होगा। जब से होश सँभाला है सुनती आई थी कि धरती पर कहीं स्वर्ग यदि है तो वह कश्मीर में ही है। आज उसी स्वर्ग के दर्शन करने का सौभाग्य अथवा अवसर अकस्मात उपस्थित हो गया।

हुआ यूँ, कि एक कश्मीरी लड़का ‘डॉक्टर इकबाल बट्ट मेरे ही मकान में रहता था। उन दिनों मैं अपने निजी घर-गाँव गौरा में रहती थी जो शिमला जिला में पड़ता है। जम्मू मेरा आना-जाना अक्सर ही होता रहता था। वहाँ मेरी एक बहुत पुरानी मित्र वीना शर्मा रहती थीं, उनकी बेटी रोहिणी का विवाह था। जब मुझे वीना के बेटे ध्रुव का फोन आया, जो विवाह का निमन्त्रण था तो डॉक्टर इकबाल भी मेरे साथ चलने के लिए तैयार हो गया। उस समय तो मैंने सोचा था कि उसे अपने घर जाने की इच्छा हो रही होगी परन्तु बहुत बाद में मेरी समझ में आया कि वह बहुत डरपोक था और गाँव के मेरे मकान में वह अकेले रहते हुए डर रहा था। अस्तु,
यथा समय हम दोनों जम्मू के लिए चल पड़े। रोहिणी के विवाह के बाद मैं डॉक्टर इकबाल के आग्रह पर अपनी मित्र वीना और उसके परिवार से विदा लेकर इकबाल के घर ‘दिलना’ (जो बारामूला जिला का एक गाँव है) के लिए चल पड़ी।
मन में विचित्र सी उत्सुकता थी, अजब रोमाँच, अनजाना सा कौतुहल। कैसा माहौल होगा वहाँ का? सभी लोगों का कहना था कि मुझे कश्मीर नहीं जाना चाहिए क्योंकि वहाँ का माहौल अभी तक ठीक नहीं हुआ था, परन्तु खतरों से खेलना शायद मेरा स्वभाव बन चुका था या अपने हालात से विद्रोह का यह एक सशक्त माध्यम मुझे अनजाने में ही दूर कहीं दूर ले जाता और मैं जहाँ जी चाहता वहाँ चल पड़ती। फिर चाहे कितनी भी वर्जनाएँ हों मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता। बस अपने इसी स्वभाव के वशीभूत मेरी कश्मीर यात्रा आरम्भ हो गई।


इकबाल हर बात में कहता रहता था कि कश्मीर का कोई मुकाबला नहीं है। मैं भी सोचती थी कि सारी दुनिया ही कश्मीर की प्रशंसक है तो फिर इकबाल का तो वहाँ पर घर ही है। उसके साथ रहते मुझे क्या परेशानी हो सकती है? लेकिन इकबाल स्वयं ही बात-बात में डरता रहता था तो मुझे भी डरना तो चाहिए ही था। उसने मुझे एक भी साड़ी कश्मीर के लिए नहीं रखने दी जबकि मुझे साड़ी पहनना अच्छा लगता है पर इकबाल ने नहीं पहनने दी। और तो और, उसने मेरे कानों में पहने हुए टॉप्स पर लगी जंजीर भी उतरवा दी। मैं जितने दिन कश्मीर में रही मुझे सलवार-कमीज से ही काम चलाना पड़ा। वैसे उसके डरने में मुझे उस समय कुछ भी अनुचित नहीं लगा क्योंकि आतंकवाद का दौर तो था ही।


हाँ! तो हम जम्मू बस अड्डे पर पहुँचे तो सुबह के आठ बजने वाले थे। वहाँ से श्रीनगर के लिए बसें भी चलती थीं और टाटा सूमो टैक्सियाँ भी। बसों का किराया अवश्य ही कम था परन्तु वे शाम छः बजे के बाद ही श्रीनगर पहुँचातीं और हमें रात श्रीनगर गुजारनी पड़ती। बात एक ही थी, टाटा सूमो का किराया कुछ अधिक था परन्तु वे तीन-चार बजे के बीच श्रीनगर पहुँचा देतीं जिससे हम बारामूला के लिए समय से बस पकड़ सकते थे और रात होने से पहले इकबाल के घर दिलना पहुँच जाते। सो हमने टाटा सूमो में जाने का फैसला लिया।


जम्मू से हम जिस सूमो में सवार हुए, उसमें आगे की सीटों पर कुछ पुलिस के लोग बैठे थे इसलिए हम सब बीच वाले केबिन में बैठ गए। हमारे साथ कुछ हिमाचली लड़कियाँ भी बैठी थीं, जिन्हें टीचर ट्रेनिंग के लिए श्रीनगर जाना था। कुछ सैनिक थे जो वापस अपनी ड्यूटी पर जा रहे थे, रास्ते के लिए अच्छा गप्पबाजी का सामान हो गया। जम्मू बस अड्डे से निकलने के कुछ ही देर बाद पहाड़ी सिलसिला शुरू हो गया और ऊधमपुर तक आते-आते तो बाकायदा ठीक-ठाक पहाड़ ही दिखाई देने लगे। क्योंकि मैं हिमाचल के दुर्गम और ऊँचे पहाड़ों की रहने वाली हूँ इसलिए मुझ पर इन रूखी पहाड़ियों ने कोई प्रभाव नहीं डाला और मैं उन लड़कियों से बातों में उलझ गई।


सूमो में बैठे पुलिस विभाग के अधिकारी अपने अधिकारियों पर टिप्पणियाँ कर रहे थे तो सैनिक अपने अधिकारियों की छीछालेदर करते-करते सरकारी नीतियों की आलोचना पर उतर आए। सब के सब सरकारी नीतियों से असंतुष्ट थे तो हिमाचली लड़कियाँ जो अपने-अपने क्षेत्र में शिक्षिकाएँ भी थीं, अपने कश्मीरी छात्रों के अभद्र और उद्दण्ड व्यवहार से खिन्न थीं। उनका कहना था कि कश्मीरी छात्र राष्ट्रगान के समय पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाने लगते हैं। उन्हें अनुशासन में रखना बहुत कठिन हो जाता है।
दस बजे के करीब सूमो एक ढाबे पर रुक गई। नाश्ता तो करना ही था। मैं, सूमो से उतरकर आगे-पीछे के प्राकृतिक-अप्राकृतिक दृश्यों में कुछ नयापन तलाशती रही परन्तु मुझे कहीं कुछ भी नया नजर नहीं आ रहा था जिससे इकबाल कुछ चिढ़ने-सा लगा था। वह जहाँ कहीं कहता, ‘देखो, यह कितना खूबसूरत है’ तो मैं तुरन्त उस स्थान की हिमाचल के किसी अंचल से तुलना करने लगती। सच तो यही था कि पता नहीं क्यों, मुझे हिमाचल से अधिक सुन्दर तब भी कहीं कुछ लगता ही नहीं था और आज भी नहीं लगता और शायद लगेगा भी नहीं।


काफी सफर तय करने के बाद वह रोमांचक घड़ी आई जिसकी स्मृति सदा ही बनी रहेगी। यह थी वह सुरंग, जिसे पार करने के बाद जम्मू का इलाका खत्म होकर कश्मीर शुरू हो जाता था। वैसे तो कालका से शिमला जाते समय रेल के सफर में रास्ते में 103 सुरंगें पड़ती हैं, पर यह मेरे जीवनकाल में देखी गई सबसे लम्बी सुरंग थी जो शायद 1430 मीटर लम्बी थी सच में बहुत ही रोमांचक लगी। सुरंग में दाखिल होने से पहले इकबाल ने मुझे बताया कि यह सुरंग जम्मू को कश्मीर से अलग करती है।


यहाँ हमें रोक लिया गया। कुछ पुलिस अधिकारी और जवान गाड़ी में चढ़ आए उन्होंने हम सब का सामान चौक किया। हम लोगों को गाड़ी से नीचे उतरना पड़ा क्योंकि वहाँ पर हमारी शारीरिक तलाशी होनी थी। सड़क के दोनों ओर दो केबिन बने हुए थे वहाँ, एक महिलाओं के लिए और दूसरा पुरुषों के लिए। मैं जिस केबिन में गई वहाँ पुलिस की वर्दी में 30/35 वर्ष की एक सुन्दर कश्मीरी महिला बैठी हुई थी। मेरे पर्स की तलाशी लेते वक्त उसे मेरी बड़ी सी डायरी दिखाई दे गई थी, वह चौंक गई और मुझसे बड़े-बड़े सवाल करने लगी। उसे लगा कि मैं पत्रकार हूँ, (इकबाल ने मुझे पहले ही सावधान कर दिया था।) मैंने पत्रकार होने से इनकार किया और उसे बताया कि मैं उर्दू शायर हूँ, क्योंकि कुछ गजलें मेरी डायरी में उर्दू में भी लिखी हुई थीं। उसने डायरी में उर्दू में लिखी मेरी गजलें तो पढ़ीं लेकिन शायद उसे विश्वास नहीं आया या फिर हो सकता है, उसे शायरी से सचमुच ही लगाव रहा हो क्योंकि वह मुझसे शेर सुनाने की जिद करने लगी। बाहर इकबाल चिल्ला रहा था और भीतर वह महिला जाने ही नहीं दे रही थी। अतः एक-दो शेर सुनाकर मैंने उससे जान छुड़ाई और तुरन्त वापस आकर सूमो में बैठ गई।


इकबाल का मूड खराब हो चुका था। वह कह रहा था कि ‘‘ये सी.आइ.डी. वाले हैं, आप को पता भी नहीं चलेगा कि आप कब कानून की पकड़ में आ गई हैं।’’ लेकिन मैं सोच रही थी कि मैं कोई गैरकानूनी काम करूँगी तब न पकड़ में आऊँगी। ऐसे ही कैसे कोई मुझे कानून में लपेट लेगा? पर इकबाल था कि बराबर बोले ही जा रहा था। परन्तु अब हम सुरंग में प्रवेश कर चुके थे अतः उसके घुटन भरे वातावरण ने उसे चुप करा दिया था। जी हाँ! सुरंग में थोड़ी सी दूरी तय करने के बाद ही घुटन होने लगी थी, लेकिन ज्यादा नहीं। वह रामबाग तक चुप ही रहा।


रामबाग पहुँकर हम लोगों ने खाना खाया। बड़ी मुश्किल मेरे लिए हो जाती है कि पहाड़ में हर जगह ही दाल-भात का भोजन करना पड़ता है, जो मेरे लिए किसी मुहिम से कम नहीं। जगह अच्छी थी, पहाड़ थे सो, थोड़ा सा अपनापन लगा। लड़कियाँ शायद रात को शिमला से चली थीं इसलिए वे घर से खाना बनवाकर लाई थीं। मुझे भी वीना ने कुछ मिठाई और पूरी वगैरह दी थी, उसे पता था कि मैं चावल नहीं खा सकती लेकिन इकबाल ने चावल ही खाए। वहाँ एक बड़ा सा ढाबा था जिसके सामने और कई गाड़ियाँ खड़ी थीं। कुछ बसों का वहाँ रात्रि पड़ाव भी था।


खाना खाकर हमलोग आगे चल पड़े। रास्ते के दोनों ओर मजनू के वृक्ष अपनी लम्बी और बेलनुमा टहनियों से धरती माँ को प्रणाम कर रहे थे। इकबाल ने मुझे बताया कि इस पेड़ की लकड़ी से क्रिकेट खेलने के बैट बनते हैं। मैंने एक पेड़ अपने गाँव में भी मजनू का देखा था परन्तु जिसने उसे लगाया था शायद वह भी उसका नाम नहीं जानता था और न ही उसकी उपयोगिता के बारे में जानता होगा अन्यथा वहाँ भी घर-घर इसके पेड़ होते। आखिर धन कमाना कौन नहीं चाहता? यहाँ भी पूरे रास्ते लगभग हर घर के सामने बने-अधबने क्रिकेट बैट भारी मात्रा में सलीके से चट्टे (चौकोर ढेर) लगाकर रखे हुए थे।


हम शाम के चार बजे श्रीनगर पहुँच गए। श्रीनगर में प्रवेश करके, नदी पर बने हुए लकड़ी के पुल पर से गुजरते हुए हमें यत्र-तत्र छोटे शिकारे नजर आए। पता चला कि यदि हम रात को पहुँचते तो हमें पाँच बजे के बाद कोई बस बारामूला के लिए नहीं मिलती और तब हमें यहीं, इन्हीं शिकारों में रात गुजारनी पड़ती जिसके बारे में सोचकर भी झुरझुरी हो आती है क्योंकि नदी में पानी तो नाम मात्र को था और स्थान-स्थान पर पॉलीथिन और कचरे के ढेर नदी को घिनोना बना रहे थे। श्रीनगर बस अड्डे पर भी भारत के किसी अन्य छोटे कस्बे जैसा ही दृश्य उपस्थित था। कहीं भी-कुछ भी तो नया नहीं था। हम थक चुके थे और बारामूला की आखिरी बस छूटने का भय था। बस तैयार खड़ी थी जिसमें कुछ सीटें अभी बाकी बची हुई थीं सो हमें सीट भी मिल गई और हम आधे घण्टे बाद इकबाल के घर दिलना पहुँच गए। जहाँ उसकी माँ और भाइयों ने मेरा भरपूर स्वागत किया।


डॉक्टर इकबाल ने घर पहुँचते ही अपनी माँ और भाभी को बता दिया था कि मैं शुद्ध शाकाहारी हूँ और घास-पात ही खाती हूँ इसलिए मेरे लिए पनीर की सब्जी बनाई गई। अभी हम लोग चाय ही पी रहे थे कि पड़ौस में कहीं से औरतों के गाने की आवाजें आने लगी। थोड़ी ही देर में लोग हमें बुलाने भी आ गए। कैसे उन लोगों को पता चला होगा कि कोई मेहमान आए हैं। गाँव में जकात (भण्डारा) थी। दो खूबसूरत औरतें मेरे पास आईं, कहने लगीं, ‘‘गाय नहीं बनी है। आप चलिए।’’ इकबाल ने हँस कर कहा कि ‘‘ये तो घास खाती हैं, तुम किसी दिन घास बना कर इन्हें बुला लेना।’’ उस दिन तो वे औरतें मायूस होकर चली गईं, लेकिन जब तक हम वहाँ रहे हर दिन किसी न किसी घर से बुलावा आता रहा और हम चाय की दावत कुबूल करते रहे। खास बात यह कि बारमूला के हर घर में बेकरी में बनी चीजों का प्रयोग अवश्य ही होता है। लोग घरों में कुछ नहीं बनाते। वहाँ दिलना और बारामूला में कुछ शायरों से भी मेरी मुलाकात हुई। मैं जिस घर में भी जाती लोग मुझसे ग़ज़ल की फरमाइश जरूर करते थे।


एक दिन इकबाल मुझे किसी शायर के घर ले गया। मेरे मना करने पर बोला, ‘‘बड़े अच्छे शायर हैं। आप को उनसे मिलकर खुशी होगी। जब से उन्हें इस बात का पता चला है कि हमारे घर में कोई शाइरा आई हैं तभी से वे मुझसे आप को उनके घर लाने के लिए इसरार कर रहे हैं।


एक दिन बाद दोपहर तीन बजे के करीब हम उनके घर चले गए। वे अपने इलाके में बी.डी.ओ. थे। बड़ा सुन्दर घर बनाया हुआ था लेकिन दिलना के हर घर की तरह वहाँ भी बैठने का इन्तजाम जमीन पर ही था। पहले तो हमें उन्होंने बैठक में बैठाया जहाँ कुर्सियाँ और सोफे लगे हुए थे फिर शायद वे असहज अनुभव करने लगे तो बोले ‘‘चलिए आराम से अन्दर बैठा जाए।’’ अब हम जहाँ पहुँचे वह एक बड़ा हाल कमरा था। बिना किसी तरह के फर्नीचर के खूबसूरत कीमती कालीन पर दीवार के सहारे-सहारे गाव तकिए लगे हुए थे।


अब जो हमज़ौक लोग बैठे हैं तो कुछ हमसे सुना गया और कुछ उन्होंने सुनाया। सुनते-सुनाते वक्त का पता ही न चला। इकबाल बेचैन होने लगा तो मुझे भी आज्ञा लेने की याद आई। बाहर निकल कर देखा, अँधेरा होने लगा था। पूरे परिवार से विदा लेते-लेते कुछ समय और लग गया। उनका घर नजर से ओझल होते ही इकबाल ने बौखलाना शुरू कर दिया, ‘‘जल्दी चलो, आपको पता ही नहीं है कुछ भी।’’


मैं कुछ कहने ही चली थी कि उसने मुँह पर अँगुली रखकर धीरे से ‘शी’ की आवाज निकाली और मेरा बाजू पकड़ कर घसीटने लगा। जल्दी ही हम सड़क पर थे। उसने पलभर रुक कर चारों तरफ देखा फिर इत्मीनान की साँस लेकर बोला ‘चलो।’ और मेरा बाजू पकड़कर लगभग घसीटता हुआ सड़क पार कर गया।


सड़क पार होते ही उसने मेरा बाजू छोड़ दिया और एक लम्बा गहरा साँस लेकर बोला, ‘‘पता है, हम जहाँ से गुजर रहे थे वह एक खूंखार आतंकवादी का घर था। अगर वह आपको देख लेता तो गजब हो जाता। वह भी उस सुरंग वाली सी.आई.डी. की तरह ही सोचता कि आप रात को इधर से क्यों गुजर रही हैं।’’ खैर अब हम इकबाल के घर के पास थे और इकबाल पूरी तरह से निश्चिंत था।
मैं वहाँ पूरा एक महीना रही। मैं थोड़ी-थोड़ी कश्मीरी जबान भी समझने लगी थी। जैसे दही को जमदुद कहा जाता है, पानी को त्री और प्यास को त्रेश। इकबाल की माँ मुझे हर रोज कलमा पढ़ाने की कोशिश करती थी। मैं सोचती थी कि हमारे यहाँ कोई मुसलमान आए तो हम उसे कभी भी गीता पढ़ने को क्यों नहीं कहते? पर हाँ, यह बिल्कुल सच है हम किसी को नहीं कहते कि वह गीता या रामायण पढ़े।


पूरा एक महीना दिलना रहने के दौरान श्रीनगर की डलझील, गुलमर्ग और बहुत सी सूफी संतों की दरगाहों के साथ-साथ मैंने जिस कश्मीर को जाना-समझा वह न तो भारत के साथ कोई समझौता करने के लिए तैयार दिखाई दिया और न ही वह अपने आप को भारत का हिस्सा मानता है। अगर मैं यह कहूँ कि कश्मीर अलगाववादियों की आड़ में पाकिस्तान के हाथों में खेल रहा है और भारत को भावनात्मक त्रास देकर उसका दुरुपयोग कर रहा है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि कश्मीरी नागरिक भारत की दी हुई हर सुविधा का उपयोग करना और प्रशासन को असफल सिद्ध करने का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देते।


वहाँ पर कोई बिजली का बिल नहीं देता और सरकार बिजली के कनेक्शन भी नहीं काटती जबकि किसी भी भारतीय नागरिक के समय पर बिल न अदा करने पर उसके घर अथवा व्यवसायिक संस्थान के तार काट दिए जाते हैं। यहाँ, हर घर में रोशनी के लिए गैस के छः सात छोटे सिलेंडर होते हैं, जो महीनों तक विद्युत आपूर्ति के न होने पर भी नागरिकों को असुविधा अथवा अभाव नहीं होने देते। स्थानीय बसों में कण्डेक्टर के पास टिकट नहीं होते। जन साधारण पैसा अवश्य देते हैं और जवान लड़के-लड़कियाँ तो कई बार कण्डेक्टर को धमका भी देते हैं और पैसा नहीं देते। जब टिकट ही नहीं छपेंगे तो सरकार को टैक्स कौन देगा? इसी तरह सरकारी बैंकों (भारतीय स्टेट बैंक, पंजाब नैशनल बैंक, यू.को. बैंक आदि) में कश्मीरी लोग अपना खाता नहीं खोलते। कश्मीरी जनता का सारा धन जम्मू-कश्मीर बैंक में जाता है। सरकारी बैंक मात्र वेतन देने के लिए मौजूद हैं। वहाँ कोई आकाशवाणी और दूरदर्शन की ओर आकर्षित नहीं है। जब कभी घण्टे-आधे घण्टे के लिए बिजली आती है तो लोग पाकिस्तान टी.वी. या पाकिस्तान रेडियो सुनते हैं।


मुझे वह घटना भी नहीं भूलती जब मैं आकाशवाणी श्रीनगर में रिकार्डिंग के लिए गई थी। इकबाल मुझे आकाशवाणी छोड़कर किसी मित्र से मिलने चला गया था। उसे अन्दर नहीं जाने दिया गया था। उसने मुझसे कहा था, ‘‘रिकार्डिंग खत्म होने पर, बाहर गेट के पास रहना मैं दो घण्टे में आपको लेने आ जाऊँगा।’’ भीतर जाने पर आकाशवाणी के निदेशक बहुत ही सभ्यता से पेश आए। अतिथि कलाकार के बतौर मेरी रिकार्डिंग कर ली गई। फिर रिकार्डिंग के बाद जब मैं बाहर आई तो इकबाल अभी वापस नहीं पहुँचा था। मुझे उसका इन्तजार तो करना ही था, क्योंकि मैं वहाँ के रास्तों से परिचित नहीं थी। मैं आकाशवाणी के गेट के पास चुपचाप खड़ी हो गई। वहाँ से दायें-बायें हो जाने से इकबाल को मुझे तलाश करना पड़ सकता था। तब तक मोबाइल नहीं थे।


गेट पर दोनों ओर मोर्चे बने हुए थे। रेत के भरे बोरे गेट के दोनों तरफ रखे थे और बंदूकधारी सिपाही उनके पीछे खड़े थे। ऐसा हर आकाशवाणी केंद्र पर तो नहीं होता परन्तु वहाँ यह व्यवस्था सम्भवतया सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यक थी। थोड़ी देर तो मैं इधर-उधर टहलती रही। गेट पर तैनात सिपाही भी मुझे देख रहे थे, फिर एक सिपाही मेरे पास आ गया। मुझसे उसने वहाँ टहलने का कारण पूछा, तो मैंने सारी बात उसे बता दी। जब वह बोला था तो मैंने उससे तुरन्त ही पूछ लिया, ‘‘आप हिमाचल के हो क्या? मैं भी हिमाचल की ही हूँ। मैंने आपकी भाषा को पहचान लिया है।’’


‘‘हाँ! काँगड़ा का हूँ, इधर चलिए।’’ मेरे उसके द्वारा इंगित स्थान पर जाने से वह कुछ आश्वस्त तो हुआ परन्तु फिर बेचैन होकर कहने लगा, ‘‘मैं आपके साथ अधिक बात नहीं कर सकता क्योंकि इससे आपको खतरा हो सकता है।’’


‘‘क्या खतरा हो सकता है मुझे?’’


‘‘आप समझ नहीं रही हैं, यहाँ तो दिन रात यही होता है, कहीं से कोई गोली आएगी जो हमारे लिए होगी और आप हमारे साथ हैं इसलिए वह गोली आपके लिए भी हो सकती है। मैं आपके हाथ जोड़ता हूँ आप वहाँ, उस पेड़ के पास खड़े रह कर इन्तजार कर लीजिए।’’ इतना कह कर वह बिना जवाब का इंतज़ार किए, मुड़ कर चला गया और पुनः अपने मोर्चे पर खड़ा हो गया। मैं अक्सर ही सोचती हूँ कि इन हालात में हम किस कश्मीर को अपना कह रहे हैं? और हमारे नेता आखिर हमारी आने वाली नस्लों के लिए क्या सोच रहे हैं और क्या चाहते हैं?


दिलना के पास एक और गाँव है जिसका जिक्र करना अनुचित नहीं होगा। इस गाँव का नाम है कानसपुरा। कानसपुरा में मैंने बड़े-बड़े अवशेष देखे जो निःसंदेह बड़ी और विशाल मूर्तियों के थे। तब मुझे अपने पास कैमरा न होने का बहुत दुःख हुआ। इकबाल के बड़े भाई अध्यापक थे। उनसे छोटे डॉक्टर और उनसे छोटा फौजी। बड़े दोनों अविवाहित थे, जबकि फौजी विवाहित था। इकबाल सब से छोटा था। इकबाल के पिता फौज में ड्राइवर रहे थे और कारगिल में एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हुई थी।


इकबाल की माँ की पेंशन बन्द थी, जिसे बहाल कराने के लिए इकबाल मुझे भी साथ ले जाता था, क्योंकि उस विभाग के अधिकारी हिंदू भी थे और साहित्यकार भी थे। उसने मेरी बहुत-सी पुस्तकें घर से चलते समय साथ रख ली थीं। उस समय मुझे समझ में नहीं आया कि वह मेरी इतनी पुस्तकों का क्या करना चाहता है, पर अब समझ में आ रहा था। वह अपना काम निकालने के लिए साहित्य से जुड़े लोगों को मेरे माध्यम से प्रभावित कर रहा था।


जम्मू-कश्मीर के स्वस्थ्य विभाग के निदेशक मेरे पूर्व परिचित निकले। मैंने उनके साथ जालन्धर दूरदर्शन के मुशाइरों में भाग लिया था। इकबाल ने सरकारी नौकरी के लिए आवेदन कर रखा था, मैंने जब उनसे इकबाल की सिफारिश की तो उन्होंने उसे ऐसे लिया, जैसे मैंने उनसे चाय पिलाने को कहा हो। उन्होंने बाद में इकबाल की पोस्टिंग कारगिल में करवा दी।


इकबाल की माँ की पेंशन का मसला भी निपट गया और उसका फौजी भाई भी जो उन दिनों घर आया हुआ था, वापस लौट गया तो हम भी वापस हिमाचल लौट आए।

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