बंजारा मन गाये | दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश’

बंजारा मन गाये | दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश’

बंजारा मन गाये,
बंजारा मन गाये।
दर्द छुपें हैं दिल में जितने,
गाकर उन्हें सुनायें।
सुबह हुई कब शाम हो गई,
पता नहीं चलता है।
सारा जीवन घूम-घूम कर,
धूप छांव बनता है।
ग़म के छाले दिल में कितनें,
किसको यह बात। बतायें।
आसमान है चादर मेरी,
धरती मेरा बिछौना।
सर्दी-गर्मी सबको झेलें,
यह जीवन का रोना।
किस्मत में बस यही लिखा,
मन सोच-सोच घबराये।
नहीं ठिकाना कोई मेरा,
ना घर कोई अपना।
अपना कोई घर भी होगा,
मुझको लगता सपना।
पूरा जीवन दर्द भरा है, कौन इसे सहलाये।

दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश’
रायबरेली।