sansmaran aasha shailee ke saath /संस्मरण आशा शैली

संस्मरण आशा शैली के साथ

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आशा शैली

मेरे लिए बड़ा रोमांचक क्षण रहा, जब मुझे राजेन्द्र नाथ रहबर जी का फोन आया।(sansmaran aasha shailee ke saath) वे फोन बिना कारण करते ही नहीं इतना तो मैं बहुत पहले से ही जानती हूँ। मेरा और रहबर जी का परिचय 1984 के इण्डोपाक मुशायरे में शिमला के गेयटी थियेटर में हुआ था। उसके बाद पंजाब, हरियाणा और हिमाचल के लगभग हर मुशायरे में इनसे भेंट होती रहती थी।
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उन दिनों जनाब आज़ाद गुलाटी, प्रेम कुमार नज़र, जमीला बानो, मसूदा हयात, बी डी कालिया हमदम, बशीर बद्र, राजेन्द्र नाथ रहबर, अरमान शहाबी, मेहर गेरा वगैरह कुछ ऐसे नाम थे जो हर मुशायरे में मौजूद रहते, चाहे मुशायरा हिमाचल अकादमी कराये, हरयाणा अकादमी कराये या साहित्य मंच जालंधर कराये। राजेन्द्र नाथ रहबर जी उस्ताद शायर होने के नाते हर जगह रहते थे। अब साहित्य मंच जालंधर की हिमाचल शाखा की सचिव के नाते या हिमाचल की एकमात्र उर्दू शायर होने के नाते मुझे भी हाज़र रहने का मौका नसीब हो जाता, फिर भी मुझे याद है कि रहबर साहब ने कभी भी मुझे फ़ोन नहीं किया। बस उन दिनों हमारी बात फोन पर होती थी जब मेरे गुरू प्रोफेसर मेहर गेरा गम्भीर रूप से बीमार चल रहे थे। वे मुझे पल पल की खबर दे रहे थे और एक दिन प्रोफ़ेसर गेरा का सफ़र ख़त्म होने के साथ ही यह सिलसिला भी थम गया। फिर कुछ दिन रहबर साहब से प्रोफेसर मेहर गेरा की किताब खामोशी के बाद के सिलसिले में राबता रहा और बस।
उस दिन सालों बाद भी रहबर साहब का फोन जब आया था तो उन्होंने बताया कि अलवर से तुम्हें फोन आएगा, बात कर लेना। फिर अलवर से एक कांपती सी आवाज़ आई, “हमें पता चला है कि आप ने मेहर गेरा की कोई किताब निकाली है। हम कुछ शोरा पर काम कर रहे हैं आप हमें प्रोफेसर मेहर गेरा के बारे में जितना जानती हैं, बताइए।” इन साहेब ने अपना नाम राधे मोहन राय बताया था।
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मैं जो कुछ उनके बारे में जानती थी बता दिया। प्रोफेसर गेरा बहुत कम-गो पर मिलनसार इन्सान थे और उनकी मर्जी के बिना उनसे बात निकलवा लेना टेढ़ी खीर थी, इसलिए जो कुछ मैंने अलवर वालों को बताया वह शायद उन्हें सच नहीं लगा। उन्होंने कुछ और जगहों से भी पता लगाया होगा। नतीजतन अब जब किताब मेरे हाथ में आई तो देखा, बहुत सी बातें छूट गई हैं।
ख़ैर आपने देखा, किताब का उन्वान (शीर्षक) ही महत्वपूर्ण है और अपनी अहमियत दिखा रहा है। हाँ, मैं बताना भूल गयी कि राय साहब ने मेरे बारे में भी दरयाफ़्त किया था। बहुत बड़ा काम हाथ में लिया है राय साहब ने। एक हफ्ता पहले मेरे पास यह किताब आ गयी है। कुल 286 पेज की इस किताब में राधा मोहन राय साहब ने 68 शोरा-कराम को लिया है, जिसमें सात पेज इस नाचीज़ हस्ती को भी दिए हैं।
इस शोध के लिए वक्त, मेहनत, लगन और पैसा सभी कुछ दरकार है। ऐसी ही दस किताबें राय साहब निकाल चुके हैं। मेरा नम्बर नौवें हिस्से में है। सबसे बड़ी और काबिले फख़्र बात मेरे लिए मेरे उस्ताद मोहतरम के बाद उसी किताब में मेरा ज़िक्र होना है। बड़ी बात यह भी है कि आपने किसी से एक पैसे की तलब नहीं रखी और हर शायर को दो-दो कापियाँ बतौर तोहफ़ा भेजी हैं। अयन प्रकाशन से छपी इस किताब की कीमत सिक्कों के बतौर 600/- रुपये है, पर क्या सचमुच रुपयों में इसकी कीमत लगाई जा सकती है?
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