सुमित्रानंदन पंत के काव्य में सुंदरम का दर्शन

सुमित्रानंदन पंत के काव्य में सुंदरम का दर्शन

प्रकृति के चितेरे और छायावाद के कवि सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई सन 1900 ई० को कौसानी जिला अल्मोड़ा उत्तराखंड में हुआ था। पिता का नाम गंगा दत्त और माता का नाम सरस्वती था। सुमित्रानंदन पंत का जन्म के 8 घंटा बाद माता सरस्वती की असमय मृत्यु हो गई थी। आपका पालन-पोषण आपकी दादी ने किया था। *पंत का बचपन का नाम गोसाई दत्त था।

      *रचनाएँ*
सुमित्रानंदन पंत जी की प्रमुख रचनाएँ पल्लव, वीड़ा, नौका विहार, गुंजन, बादल, लोकायतन, युगांत, युगवाणी, ग्राम्या, ताज आदि हैं। पंत ने प्रगतिवाद में भी कुछ रचनाएँ की हैं, जिनमें प्रमुख युगवाणी, ग्राम्या हैं। पंत के जीवन की अंतिम काव्यकृति 'सत्य काम' है। सुमित्रानंदन पंत जी महर्षि अरविंद घोष के दर्शन से प्रभावित थे। जिसको आधार मानकर नौका विहार की रचना सन 1932 में हुई। जिसमें प्रतापगढ़ के काला कांकर के राजा दिनेश सिंह का राजमहल और सदानीरा माँ गंगा का वर्णन है। पंत जी सामाजिक संबंधों को भी निभाने मे आगे रहते थे। पं० सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की सपुत्री 'सरोज' बीमारी की हालत में राना बेनीमाधव सिंह जिला चिकित्सालय, रायबरेली में भर्ती थी और बाद में असमय मृत्यु हो गई थी, तब पंत जी इसी अस्पताल में सरोज को देखने आए थे।
                 *पुरस्कार*
सुमित्रानंदन पंत को सन 1961 में पद्म विभूषण सम्मान प्राप्त हुआ। सन 1977 में चिदंबरा कृति पर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।

'ताज' कविता सन 1935 में लिखी गई, जो कार्ल मार्क्स का मूल आधार- शोषित और शोषक पर आधारित थी। ताज के माध्यम से पंत ने लिखा है कि कब्र दफन व्यक्तियों पर चादर चढ़ाया जाता है और जीवित लोग भूखे-नंगे सो जाते हैं। सुमित्रानंदन पंत सबसे अधिक चमकीला शुक्रतारा को अपना मानते थे और दुर्भाग्य से प्रयागराज में 28 दिसंबर सन 1977 को पंत नामक 'शुक्र' हमेशा-हमेशा के लिए अस्त हो गया।

       *सुमित्रानंदन पंत के प्रकृति संबंधी विचार*
संसार में जहाँ पुरुष है वहाँ प्रकृति है। जहाँ प्रकृति है वहाँ पुरूष है। दोनों एक-दूसरे के सहचर रहे हैं। प्रकृति की गोद में पुरुष हर सुख सुविधा रूपी अमूल्य निधि वो भी निःशुल्क प्राप्त करता है। नारी सौंदर्य या प्रकृति सौंदर्य को कवि अपना प्रमुख विषय मानते हैं, परन्तु सुमित्रा नंदन पंत ने प्रकृति को ही सौंदर्य का विषय माना है। ग्रामीणांचल हो या शहरी क्षेत्र, हर स्थान पर प्रकृति का विशेष महत्व रहता है। आपका गांव प्रकृति की गोद में ही बसा हुआ है, इसलिए छायावादी कवि पंत प्रकृति कुशल चितेरे कवि हैं। पंत ने मानवीय चेतना के समान प्रकृति को भी हंसते-रोते दिखाया है-
  अचिरता देख जगत की आप,
  शून्य भरता समीर निश्वास।
  डालता पातों पर चुपचाप,
  ओस के आँसू नीलाकाश।।

प्रकृति ने मानव को सौंदर्य तथा कल्पनाजीवी बनाया है। जिसमें ज्ञान आध्यात्म रहस्य छिपा हुआ है। प्रकृति के द्वारा रहस्यवाद का दर्शन का गौरव पंत को प्राप्त हुआ है। मौन निमंत्रण कविता में पंत ने लिखा है-
  स्तब्ध ज्योत्सना में जब संसार,
  चकित रहता शिशु सा नादान।
  विश्व के पलकों पर सुकुमार,
  विचरते हैं जब स्वप्न अजान।
  न जाने नक्षत्रों से कौन?
  निमंत्रण देता मुझको मौन।

सुमित्रानंदन पंत की कविता 'नौका विहार' सन 1932 में प्रकाशित हुई थी। नौका विहार के माध्यम से दार्शनिक के रूप में स्वयं को स्थापित किया है, क्योंकि पंत का दार्शनिक दृष्टिकोण महर्षि अरविंद से प्रभावित है। प्रकृति की ही तरह मनुष्य का जीवन और जन्म-मरण को परिभाषित किया है- 
  इस धारा का सा ही जग का क्रम,
  शास्वत इस जीवन का उद्गम।
  शास्वत है गति, शाश्वत है संगम।
  हे जगजीवन के कर्णधार,
 चिर जन्म मरण के आर पार,
 शास्वत जीवन नौका विहार।

पंत जी ने प्रकृति के माध्यम से सौन्दर्यानुभूति की कल्पना करते हुए नायिका के कोमल अंगों की तुलना सोनजुही की बेल से किया है। ‘सोनजूही की कली’ कविता में यदि नायिका सोनजूही है तो नायक भी पवन है। कहने का आशय है- पंत जी ने अपनी कविताओं में पात्रों का नामकरण में भी मानवीकरण किया है-
दुबली पतली देह लतर लोनी लंबाई,
प्रेम डोर सी सहज सुहाई। फूलों के गुच्छों से उभरे अंगों की गोलाई,
निखरे रंगों की गोराई।
(सोनजुही – अंतिमा सन 1954)

अपने जीवन का सर्वत्र त्यागने को तैयार थे, लेकिन प्रकृति की गोद नहीं छोड़ सकते थे। तभी तो उन्होंने नदी, तालाब, झरना, बर्फ,  ओस, नौका, लताएं, पवन आदि में प्राकृतिक सौंदर्य देखा जो मानव जीवन को ज्ञान का प्रकाश देने वाला है। इन्हीं सब में कविता के अंकुर प्रस्फुटित हैं-
  वियोगी होगा पहला कवि,
  आह से उपजा होगा गान।
  निकलकर आँखों से चुपचाप,
  बही होगी कविता अनजान।

कहा जाता है साहित्य समाज का दर्पण है। साहित्यिक-काव्य सत्यम-शिवम-सुंदरम पर आधारित है। पंत की रचनाओं में यत्र तत्र 'सत्य और शिव' के दर्शन होते हैं, लेकिन मूलतः सुंदरम के कवि हैं। कवि की कल्पना गत सुंदरम के क्रोड़ (गोद) में ही नहीं खेलता। 'बादल' कविता में अनेक रंग बिरंगे सजीव सत्य को आकार देता काव्यांश का चित्रण-
  धूम धुंआरे काजल कारे,
  हम ही हैं बिकरारे बादल।
  मदन राज के वीर बहादुर,
  पावस के उड़ते फणिधर।

उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत का समस्त काव्य प्रकृति को समर्पित है। प्रकृति के माध्यम से जीवन के हर पहलू को छुआ है। ऐसा काव्यसृजन अन्यत्र कहीं मिल पाना असंभव तो नहीं, किंतु दुर्लभ है।

अशोक कुमार गौतम
असिस्टेंट प्रोफेसर
अध्यक्ष हिंदी विभाग
शिवा जी नगर, रायबरेली
मो० 9415951459

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