हिंदी कहानी मातम / सम्पूर्णानंद मिश्र

एन०टी०पी०सी० में अभियंता पद पर पदस्थ शर्मा जी की अवस्था छप्पन की थी। बेहद चुस्त-दुरुस्त, सघन मूंछें, वाणी में मिठास, कार्य के प्रति लगन आदि गुणों ने शेष कर्मचारियों से उन्हें अलग खड़ा कर दिया था। अपने कार्य- कौशल के कारण अधिकारियों के चहेते हो गए थे। उसी पद पर पदस्थ और कर्मचारी उनकी इस कार्य- क्षमता को पचा नहीं पाते थे, कभी- कभी उनसे बहस भी कर लिया करते थे , लेकिन शर्मा जी कभी किसी की बात की गाड़ी को अपने दिल की पटरी पर नहीं चलाते थे। और नहीं प्रत्युत्तर देना उचित समझते थे। आज घर से आफिस आकर शर्मा जी ने जैसे ही अपना काम करना प्रारंभ किया कि उनके मोबाइल की घंटी घनघना उठी। बड़े बेटे प्रमोद ने कहा पापा आप जल्दी घर आ जाइए। मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है, वह बेहोश हो गई हैं। शर्मा जी की पत्नी इधर तीन- चार महीनों से बीमार थी। बिटिया कामिनी की असामयिक मृत्यु ने उन्हें पूरी तरह से झकझोर दिया था। कोविड की महामारी में वे कामिनी को नहीं बचा सके।

पच्चीस साल की थी कामिनी जब उसकी मृत्यु हुई थी। पांच फीट चार इंच लंबी, गेहुंआ रंग, देह में कसावट, नीली गहरी आंखें,उभरे हुए उरोज इस तरह की बनावट थी, जैसे लगता था कि विधाता ने फुर्सत में बनाया हो। व्याह के लिए शर्मा जी वर ढूंढ़ रहे थे, लेकिन कोई अच्छा लड़का नहीं मिल रहा था। एकाध जगह लड़का पसंद आया तो मांग इतनी थी कि शर्मा जी उस मांग के एवरेस्ट पर चढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। कामिनी एम० ए० बी० एड० थी। शहर के एक पब्लिक स्कूल में पढ़ाती थी। पच्चीस हजार रुपए की तनख्वाह थी। घर में कुछ आर्थिक सहयोग भी कर देती थी, जिससे गृहस्थी की गाड़ी चलाने में जयप्रकाश शर्मा को कभी किसी प्रकार की दिक्कत नहीं हुई। घर पहुंचकर शर्मा जी ने शहर से एंबुलेंस बुलाया और पत्नी को शहर के एक अच्छे निजी अस्पताल में भर्ती कराया। डाक्टर श्रीवास्तव ने कई आवश्यक जांच लिख दी। और कहा कि जांच की रिपोर्ट के बाद ही हम कुछ कह बता पाएंगे, वैसे इन्हें गहरा सदमा लगा है, कोई बात ऐसी जरूर है जिसकी पीड़ा इनके मस्तिष्क पर बार- बार प्रहार कर रही है। प्रमोद ने कहा कि मम्मी ठीक हो जायेंगी न सर। डाक्टर ने सिर हिलाया।

धैर्य रखिए और ईश्वर पर विश्वास कीजिए। शाम को रिपोर्ट आई। रिपोर्ट अच्छी नहीं थी। डाक्टर ने शर्मा जी को अपने केबिन में बुलाकर कहा कि मिस्टर शर्मा दस प्रतिशत उम्मीद है इनका ब्लड शुगर बहुत हाई है और ब्लड प्रेशर भी लगातार घट बढ़ रहा है किडनी भी प्रभावित हो चुका है। आप उम्मीद रखिए। आप दो लाख रुपए रिशेप्सन कांउटर पर जमा करा दीजिए, जिससे इनको शीघ्र ही आवश्यक दवाएं दी जा सकें। शर्मा जी जीवन में इतने निराश कभी नहीं हुए थे आज वह लाचार थे। मुंह सूख रहा था। कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था।पौष के महीने में रात लंबी होती है दिन छोटा होता है। पत्नी चंद्रावती आई० सी० यू० में थी। शर्मा जी कभी निराश आंखों से आई० सी० यू० के बाहर से पत्नी को बीच- बीच में देखने का असफल प्रयास कर लेते थे।जब मन नहीं माना तो दरवाजा खोलकर जैसे ही अंदर जाने लगे तैसे ही असिस्टेंट डाक्टर ने कहा कि आप बाहर चलिए यहां किसी को इजाजत नहीं है आप की जरूरत होगी तो हम बुला लेंगे। रात के दस बज चुके थे अस्पताल से घर की दूरी कुल चालीस किलोमीटर थी। यह चिंता भी उन्हें सता रही थी कि छोटी बिटिया कुमुद और बेटा विनोद कैसे होंगे कुछ खाए होंगे कि नहीं। घर का दरवाजा बंद किया होगा या नहीं। विनोद में अभी अल्हड़ता है कुमुद भी बहुत सयानी नहीं है।

इसी उधेड़बुन में शर्मा जी की आंखें कब लग गईं, उन्हें पता ही नहीं चला। रात के एक बज रहे थे, कुत्तों के भौंकने की आवाज़ से शर्मा जी जग गए थे उसी में से एक कुत्ता लगातार रो रहा था। बड़ा भयावह दृश्य था। कुत्तों का रोना अपशकुन माना जाता है।किसी अनिष्ट की आशंका से शर्मा जी बिल्कुल सहम गए थे प्रमोद को बुलाकर कहा बेटा तुम कुछ खाए कि नहीं! बेटे ने कहा पापा बस मम्मी ठीक हो जांय। यह कहकर वह फूट-फूट कर रोने लगा। शर्मा जी की आंखें भी भर आईं थीं। आपस में कुछ नर्स आई० सी० यू० के बाहर बातें कर रही थीं। तभी डाक्टर श्रीवास्तव आ गए और बड़ी धीमी आवाज़ में एक नर्स के कान में कुछ कहते हुए आगे बढ़ गए। नर्स डाक्टर साहब के मंतव्य को समझ गई थी ।

वह शर्मा जी के नजदीक आ गई और कहा कि हम लोगों ने पूरी शिद्दत से प्रयास किया, बट शी इज नो मोर। शर्मा जी की आंखें भरभरा आयी। आज से चालीस साल पहले का वह दृश्य उनकी आंखों में नाचने लगा जब पत्नी चंद्रावती को व्याह कर घर लाए थे कितना उल्लास था। जीवन में कितना रस था। बहनें बिना अपना नेक लिए ड्योढ़ी के अंदर नहीं जाने दिया था। एक तबका दिन और एक आज का दिन। शर्मा जी का यह सुखद अतीत आज उन्हें घोर संकट के दरिया में डुबो दिया था। प्रमोद फूट पड़ा। रो रो कर उसका बुरा हाल हो गया था। तभी एक वार्ड ब्वाय आकर कहने लगा इतना शोर मत मचाइए दूसरे और पेशेंट पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा। रात के तीन बज चुके थे। सन्नाटा पसरा हुआ था। शर्मा जी के इशारों को समझते हुए प्रमोद ने गाड़ी का प्रबंध किया। चंद्रावती की डेड बाडी रखी गई शर्मा जी और प्रमोद घर आ गए थे । कुछ मुहल्ले के लोग भी इकट्ठा हो गए थे। छोटी बिटिया कुमुद के सर पर हाथ रखकर शर्मा जी ने कहा कि तुम्हारी मम्मी हम लोगों को छोड़कर किसी और लोक में चली गई बेटा! विनोद ग़श खाकर गिर गया। घर में मातम छा गया था।

सम्पूर्णानंद मिश्र
शिवपुर वाराणसी
7458994874

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