बीमारी | रत्ना सिंह | लघुकथा

बीमारी | रत्ना सिंह | लघुकथा

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रत्ना सिंह

सोमवार का दिन था आफिस जाना था लेकिन तबियत कुछ ठीक नहीं लगी तो सोचा आज आराम कर लेता हूं।शाम को बतियाने शर्मा जी के यहां चला गया पंचायत चुनाव पर चर्चा हो रही थी,कि शर्मा जी का बेटा नितिन आफिस से आया। कैसा रहा आज आफिस का दिन ?शर्मा जी ने पूछा ! पापा बहुत बढ़िया!बेटे ने कहा।उसकी खुशी समा नहीं रही थी। फिर कुछ रुककर बोला “पापा आज एक मजेदार बात बताता हूं। हमारे जो हेड हैं वो कह रहे थे कि उनके पापा नींद में तो कुछ बड़बड़ाते ही हैं जब जगे होते हैं तब भी बड़बड़ाते रहते हैं।दिमाग खराब कर रखा है उन्होंने। कभी कभी मन करता है कि सड़क पर छोड़ आऊं। तो मैंने उन्हें कहा छोड़ आइऐ मेरे पापा ने भी ऐसा ही किया। क्यों पापा? ठीक कहा! पापा की आवाज,तू पागल हो गया है नितिन सब जगह बेजजती करवा रहा है। पापा उस समय दादा जी कितना रोये थे,उनकी क्या ग़लती, सिर्फ उन्हें बीमारी ही तो लगी थी । जब सड़क पर दादा जी को छोड़ते हुए बेजजती महसूस नहीं हुई अभी बताते हुए क्यों? बताइए पापा अब क्यों नहीं बोल रहें हैं नितिन बोल रहा था, शर्मा जी के गले से आवाज नहीं निकली सिर नीचे झुक गया।

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