Navvrsh geet/मैं तो वह गुजरा जमाना ढूढ़ती हूं।

मैं तो वह गुजरा जमाना ढूढ़ती हूं।

(Navvrsh geet)


आ गया नववर्ष है लेकिन प्रिए,
मैं तो वह गुजरा जमाना ढूंढ़ती हूं।

तुलसी के चौरे पर मां का सर झुकाना,
और माटी का मुझे चंदन लगाना।

बुदबुदाते होंठ लेकिन स्वर नहीं,
मां का वह मंगल मनाना ढूंढ़ती हूं।

मखमली कुर्ते की जब उधड़ी सिलाई,
और पहनने की थी मैंने जिद मचाई।

सिल दिया था मां ने फिर टांका सितारा,
मैं तो वह कुर्ता पुराना ढूंढ़ती हूं।

कौन आया कौन आया ,कौन आया,
गूंजता था घर में देखो कौन आया।

आज तो दरवाजे बजती डोर वेल,
सांकलों का खटखटाना ढूंढ़ती हूं।

Navvrsh-geet-pushpa-shailee

श्रीमती पुष्पा श्रीवास्तव “शैली”
रायबरेली उत्तर प्रदेश।

short poem on republic day-मेरा वतन/पुष्पा श्रीवास्तव शैली।

रायबरेली की प्रसिद्ध लेखिका पुष्पा शैली का इस गणतंत्र दिवस पर राष्ट्र को समर्पित रचना मेरा वतन short poem on republic day.इस वर्ष हम ७२ गणतंत्र दिवस हिंदुस्तान मे मनाएँगे इस वर्ष के मुख्य अतिथि  इंग्लैंड के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन होंगे  हिंदी रचनाकार के माध्यम से हिंदी भाषी लोगों के लिए  प्रस्तुत है रचना  –

मेरा वतन।

 

गीत गाकर वतन का धरा से गये,
बांकुरों को हृदय से नमन कीजिये।
छोड़िए बात नफरत की अब दोस्तों,
बैर को आग में अब दफन कीजिये।

देखना घर उजड़ने ना पाये कोई,
आंख से आँसू अब ना गिराये कोई।
बुझते चेहरे पड़े स्याह थे अब तलक,
देखना फिर ना उनको जलाये कोई।

वादियां हँस के फिर मुकुराने लगे।
सोचिये दिल से अब वो जतन कीजिये।

राखियाँ जाने कितनी वहाँ सो गयीं,
रंग सिंदूर और चूड़ियाँ खो गयीं।
माँ ने ममता लुटा दी न रोयी तनिक,
आँख लेकिन पिता की धुआँ हो गयी।

जल गयी अनगिनत बालपन की हँसी,
कैसे बच पाएंगी अब मनन कीजिए।

थक ना जाना अभी दौड़ना है तुम्हे,
मुँह नदी का अभी मोड़ना है तुम्हें।
यह प्रबल वेग है पाँव उखड़ेंगे तो,
किंतु सागर से अब जोड़ना है तुम्हे।

खिलखिलायेगा अब तो हमारा चमन,
हिन्द जय हिंद शेरे वतन कीजिये।।

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पुष्पा श्रीवास्तव शैली

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