निर्मम प्रहार – Short story on Poverty in Hindi

निर्मम प्रहार – Short story on Poverty in Hindi-

समीक्षा


यह कहानी भारतीय ग्रामीण जीवन की एक झलक मात्र है संपूर्णानंद जी ने इस कहानी के माध्यम से कोरोना वायरस और गरीबी के बीच के संघर्ष को उद्घाटित करने का अच्छा प्रयास किया है। भोलू जैसे न जाने कितने मजलूम ऐसे हैं जो रोज़ ऐसा दर्द भोग रहें हैं। उनकी फरियाद न प्रशासन सुनता है और न ही समाज सेवा के नाम पर देश को दिन प्रतिदिन लूटने वाले राजनेता। किसी ने कहा है ताकतवर की शिकायत सुनी जाती है और गरीब की फरियाद भी कोई नहीं सुनता ‌।
संवैधानिक दृष्टि से सभी लोग समान हैं लेकिन अगर आपको जमींदारी का जीवंत उदाहरण देखना है तो आपको ईंट के भट्ठों पर जाना होगा।
भोलू के पिता को मरना ही था यदि कोरोना न होता तब भी। उसकी मृत्यु सुनिश्चित थी क्योंकि कोरोना वायरस से बड़ा वायरस गरीबी का वायरस है फ़र्क बस इतना है कि कोरोनावायरस से हो रही मौतों की सरकार गणना कर रही है और ग़रीबी से मरने वाले लोग गणना के योग्य नहीं समझे जाते हैं। कोरोनावायरस ने सभी बीमारियों पर प्रतिबंध लगा दिया है । और सत्तासीन राक्षसों के लिए ग़रीब जनता सिर्फ एक निवाला हो गई है।


बाल मुकुन्द चौरसिया
स्नातकोत्तर शिक्षक, हिंदी
केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक-3 जोरहाट असम


निर्मम प्रहार

(Short story on Poverty in Hindi)


नौ साल का भोलू दौड़ते- दौड़ते अपनी मां के पास आते ही रोने लगा और कहने लगा कि मां-मां बापू को कुछ लोग गालियां देते हुए मार रहे हैं, यह सुनते ही फूलमती के क्रोध‌ का पारा आसमान छूने लगा। उसने कहा चलो भट्टे पर। निबहुरा, मुंहझौसा रधवा कि इतनी हिम्मत कि मेरे मरद की पिटाई कर रहा है। भोलू डरा हुआ था, उसे कुछ नहीं समझ में आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है; नौ साल की अवस्था कोई अवस्था होती है इस उम्र में बच्चों को घर गृहस्थी से कोई मतलब नहीं होता है, लेकिन भोलू उन सौभाग्यशाली बच्चों की जमात से अलग था उसे बचपन का वह सुख नहीं मिल सका जिसका वह वास्तविक हकदार था। घर में ग़रीबी सुरसा की तरह मुंहबाए खड़ी थी। भोलू गांव के समीप वाले रामसिंह के भट्टे पर ईंटा पाथने का काम करता था। बेहद ईमानदार और जुनूनी था। अपने संपूर्ण काम को निपटा कर वह घर सूर्यास्त के बाद ही आता था। दोपहर में फूलमती यही कोई छ: सात रोटी और थोड़ा सा मट्ठा और कभी कभी आलू का चोखा उसके लिए बनाकर पहुंचा जाती थी। घर में जागीर के नाम पर फूल की शिनाख़्त मिटाती दो थाली, एक कनस्तर में सेर दो सेर आटा सौ ग्राम कड़ू तेल और एक दो प्याज। यही जागीर भोलू के पिता जग्गन को अपने पिता विश्वनाथ से मिली थी।जग्गन जब तेरह साल का था; तभी गांव में आए हुए हैजे ने उसके पिता को अपना निवाला बना लिया। ग़रीब के यहां रोग व्याधि बिन बुलाए मेहमान की तरह आ जाते हैं और जाने का नाम भी नहीं लेते। जग्गन के पिता विश्वनाथ ने उसे संघर्ष की तपती भट्ठी में झोंक दिया और नश्वर संसार से विदा हो गए। पिता की कमी तो जग्गू को पग- पग पर खटकती है। मां का तो उसने चेहरा भी नहीं देख पाया था; जनते ही इस असार संसार को छोड़कर चली गई। फूलमती भोलू को लेकर जब भट्ठे पर जाती है तब वहां का दृश्य देखकर वह अवाक रह जाती है; जग्गन अधमरा पड़ा था। सिर खुल गया था; पानी मांग रहा था लेकिन रधवा निर्दयी के आतंक के कारण किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि उसे पानी दे सके। ग़रीबी में आदमी के साहस को लकवा मार देता है। सारे दु:ख को फूलमती पी गई। घर से जब चली थी तब उसका क्रोध डायनामाइट की तरह था, जो रधवा जैसे पहाड़ को एक क्षण में उड़ा देना चाहती थी लेकिन वहां पहुंचकर पूरी तरह शांत हो जाती है केवल रधवा से इतना कहा कि बाबूजी आपने यह अच्छा नहीं किया, जिस आदमी ने आपके यहां हाड़- तोड़ मेहनत किया न धूप देखा न छांव उसके साथ यह व्यवहार! इसने आपसे केवल अपना हिसाब ही तो मांगा था कोई हीरा मोती तो नहीं! अब हम कहां ले जांय। इस लाकडाउन में कौन डाक्डर इसको देखेगा पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं है। ग़रीबी आदमी के क्रोध‌ की ज्वाला को भभकने ही नहीं देती। पानी के छींटें मारकर उसके वेग को विराम दे देती है। फूलमती की मिन्नतों का रधवा जैसे पत्थर दिल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा, उल्टा शराब के नशे में उसे वह गालियां देता रहा। विपन्नता में कोई लाठी नहीं पकड़ाता। बेचारी किसी तरह उसे भट्ठे से कुछ दूर पर एक छोटे से अस्पताल ले जाती है लेकिन कोरोना की इस भयावहता को देखकर कोई डाक्टर हाथ नहीं लगाता। अस्पताल के एक कर्मचारी ने कुछ दया दिखाते हुए दर्द की एक दो गोलियां दे दी। थक-हारकर वह अपने मर्द जग्गन को घर लायी और पानी में हल्दी मिलाकर पिलायी, कि पीड़ा कुछ कम हो जायेगी। लेकिन रात में उसका दर्द बढ़ता ही गया। बुखार से उसकी देह और तप रही थी। फूलमती ने माथे पर तेल रखा कि शायद कुछ आराम मिल जाय लेकिन विधाता को यह सब नहीं मंजूर था। उनकी लीला को कौन जान सकता है! वैसे भी गरीबों की पूरी ज़िंदगी इंतहान देते- देते ही बीत जाती है इस इंतहान को जग्गन नहीं पास कर सका। उसके सिर से अभी भी रक्त स्राव हो रहा था जो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था; कुछ पल में ही जग्गू की आंखें पथराने लगी पुतलियों पर धीरे-धीरे नीली रेखा बनने लगी। फूलमती ने जग्गू जग्गू कहकर आवाज दी लेकिन जग्गू की सांस उखड़ गई थी। फूलमती बेहोश होकर गिर पड़ी थी। भोलू बाबा- बाबा कहकर रोने लगा।

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सम्पूर्णानन्द मिश्र
प्रयागराज फूलपुर
7458994874

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Abhimanyu

मेरा नाम अभिमन्यु है इस वेबसाइट को हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए बनाया गया इसका उद्देश्य सभी हिंदी के रचनाकारों की रचना को विश्व तक पहचान दिलाना है

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