hindi geet lyrics || हम सबके हैं सभी  हमारे

डॉ. रसिक किशोर सिंह ‘ नीरज ‘ प्रस्तुत गीत संग्रह hindi geet lyrics हम सबके हैं  सभी  हमारे  के  माध्यम  से  अपनी  काव्य-साधना के भाव  सुमन  राष्ट्रभाषा  हिंदी  के श्री  चरणों  में  अर्पित  कर रहे हैं  |  इस  संकलन  की गीतात्मक  अभिव्यक्तियों में  भाव  की  प्रधानता  है | 

  गाँवों में फिर चलें 

(hindi geet lyrics)


गाँवों  में   फिर    चलें 

महानगर  को  छोड़  दें 

 मर्माहत    मानव   के 

जीवन   में   मोड़   दें | 

 

बाधित संस्कृति -प्रवाह 

कृत्रिमता     है     यहाँ 

स्वप्नों  से  सम्मोहित 

चकाचौंध  जहाँ -तहाँ 

व्यस्तता  हुई   प्रबल 

न  स्नेह की हवा बही 

झूठ का चला चलन 

न सत्य की प्रथा रही | 

 

मानव हो शांत सुखी 

प्रदूषण – गढ़ तोड़ दें 

गाँवो  में  फिर   चलें 

महानगर को छोड़ दें | 

 

शूरवीर -दानवीर 

सब यहीं पर सो  गये 

प्रौद्योगिकी विज्ञान के 

श्रेष्ठ  रूप  हो   गये 

वसुधैव कुटुम्बकम की  

सद्भावना रही यहाँ 

भारतीय चिंतन की 

समता है और कहाँ ?

 

भ्रमित पंथ अनुकरण 

‘नीरज’  अब  छोड़   दें 

गाँवों   में  फिर  चलें 

महानगर को छोड़ दें | 

https://youtu.be/HG7-Qe4du_c


 २.मैं अकेला हूँ 

(hindi geet lyrics)

 

भीड़ में रहते हुए भी  मैं अकेला हूँ | 

मैं नहीं केवल अकेला 

है अपार समूह जन का 

किन्तु फिर भी बेधता है 

क्यों अकेलापन ह्रदय का 

 

सिंधु नौका के विहग सा मैं अकेला हूँ | 

भीड़ में रहते हुए भी मैं अकेला हूँ | | 

 

मित्र कितने शत्रु कितने 

दुःख कितने हर्ष कितने 

कल्पना के नव सृजन में 

सत्य कितने झूठ कितने 

 

जय पराजय त्रासदी सौ बार झेला हूँ | 

भीड़ में रहते हुये भी मैं अकेला हूँ ||  

 

थके   मेरे पाँव चलते 

स्वप्न नयनों में मचलते 

ठोकरें लगतीं  मगर हम 

लड़खड़ाकर  फिर सम्हलते 

 

‘नीरज’ यह खेल कितनी बार खेला हूँ | 

भीड़ में रहते हुये  भी मैं अकेला हूँ || 

https://youtu.be/9m9VeSkqSCA


३. मत समझो घट भरा हुआ है 

(hindi geet lyrics )

 

मत समझो घट भरा  हुआ है | 

पूरा   का   पूरा     रीता    है|| 

 

एक – एक     क्षण  बीते कैसे 

यह वियोग की अकथ कहानी 

अम्बर   पट पर   नक्षत्रों    में 

पीड़ा की   है  अमिट  निशानी 

भरा-भरा  दिखता  सारा नभ 

पर अन्तस  रीता -रीता  है | 

पूरा    का  पूरा  रीता   है || 

 

जीवन तिल तिल कर कटता 

है प्रहर मौन इंगित  कर जाते 

सूनेपन    की  इस नगरी   में 

परछाईं     से   आते      जाते 

तम  प्रकाश की आँख मिचौनी 

में    ही   यह  जीवन बीता  है||

पूरा    का  पूरा  रीता   है ||     

 

विस्मृति की इस तन्मयता में 

खो   जाता है दुख सुख सारा 

मैं तुम का विलयन हो जाता 

खो  जाता अस्तित्व हमारा 

दग्ध प्राण निःशब्द  सुनाते 

मूक प्रणय की नवगीता है |

पूरा    का पूरा रीता है | | 

https://youtu.be/CpvZ8fVtY0M
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तुलसी गीत / डॉ. रसिक किशोर सिंह नीरज

तुलसी गीत   (tulsi geet dr. rasik kishor singh neeraj) डॉ. रसिक किशोर सिंह नीरज के गीत संग्रह ‘हम सबके है सभी हमारे से लिया गया है | प्रस्तुत है रचना –

तुलसी गीत 

(tulsi geet dr. rasik kishor singh neeraj)


वसुधा में नित्य राम

दर्शन की बात करनी है

हुलसी के पुत्र तुलसी

पैगम्बर की बात करनी है |

 

रत्नों  में रत्न पाकर

हुए राममय धनी थे

सौभाग्य  संत  तेरा

हीरे की नव कनी थे |

 

युग   प्रेरणा   रहो      तुम

परिवर्तन की बात करनी है

हुलसी   के   पुत्र    तुलसी

पैगम्बर की बात करनी है |

 

कवि  भावना  में  तेरी

यमुना   हुई  प्रवाहित

मानस  सुधा को पीकर

रस भक्ति स्वर निनादित |

 

आत्मा सुत आत्मीय सबके

प्रत्यर्पण की बात करनी है

हुलसी   के  पुत्र   तुलसी

पैगम्बर की बात करनी है |

 

झंकृत न हो सका   उर

जब काव्य गीत स्वर था

बजरंग   की   कृपा   से

हुआ ज्ञान भी मुखर था |

 

तुलसी से  चन्दन हाथ ले

रघुवर की बात  करनी  है

हुलसी   के  पुत्र    तुलसी

पैगम्बर की बात करनी है |

 

आदर्श  के      पुजारी

भविष्यत के दृश्य देखे

अन्तः करण मनुज के

सौभाग्य   कर्म  लेखे |

 

अविरल तुम्हारी नवधा

भक्ती की बात करनी हैं

हुलसी   के  पुत्र   तुलसी

पैगम्बर की बात करनी है |

 

कविता लिखी या मंत्रो

में   दिव्य दृष्टि   तेरी

है सकल विश्व आँगन

रसधार    वृष्टि  तेरी |

 

भू स्वर्ग  सृष्टि    करके

अम्बर की बात करनी है

हुलसी   के  पुत्र   तुलसी

पैगम्बर की बात करनी है |

 

किया सर्वस्व राम अर्पण

शिक्षण   सहज दिया था

बंधुत्व       भावना    से

जग ऐक्यमय  किया था |

 

‘नीरज ‘ राम  हो ह्रदय में

तुलसी की बात करनी है

हुलसी  के   पुत्र   तुलसी

पैगम्बर की बात करनी है |

https://youtu.be/QshJCxN5X3w


२. वर दे हे माँ ,जग कल्याणी 


वीणा पाणि सुभग वरदानी

वर दे हे माँ ,जग कल्याणी |

 

झंकृत    वीणा के   तारों   से

स्वरलय गति की झनकारो से

गीतों  की मधुरिम तानों से

झूम   उठे  मानस कल्याणी

वीणा पाणि सुभग वरदानी

वर दे हे माँ ,जग कल्याणी |

 

शब्दों में नव अर्थ जगा दे

तिमिर घोर अज्ञान भगा दे

भावों में’ शुचि पावनता दे

नवल ज्योति भर दे वरदानी

वीणा पाणि सुभग वरदानी

वर दे हे माँ ,जग कल्याणी |

 

लिखे लेखनी तेरी महिमा

अंकित छंद -छंद में गरिमा

अक्षर आभा युत ज्यों मणि माँ

नव रस नित्य करें अगवानी

वीणा पाणि सुभग वरदानी

वर दे हे माँ ,जग कल्याणी |

 

Navvrsh geet/मैं तो वह गुजरा जमाना ढूढ़ती हूं।

मैं तो वह गुजरा जमाना ढूढ़ती हूं।

(Navvrsh geet)


आ गया नववर्ष है लेकिन प्रिए,
मैं तो वह गुजरा जमाना ढूंढ़ती हूं।

तुलसी के चौरे पर मां का सर झुकाना,
और माटी का मुझे चंदन लगाना।

बुदबुदाते होंठ लेकिन स्वर नहीं,
मां का वह मंगल मनाना ढूंढ़ती हूं।

मखमली कुर्ते की जब उधड़ी सिलाई,
और पहनने की थी मैंने जिद मचाई।

सिल दिया था मां ने फिर टांका सितारा,
मैं तो वह कुर्ता पुराना ढूंढ़ती हूं।

कौन आया कौन आया ,कौन आया,
गूंजता था घर में देखो कौन आया।

आज तो दरवाजे बजती डोर वेल,
सांकलों का खटखटाना ढूंढ़ती हूं।

Navvrsh-geet-pushpa-shailee

श्रीमती पुष्पा श्रीवास्तव “शैली”
रायबरेली उत्तर प्रदेश।

new year hindi geet -डॉ. रसिक किशोर सिंह नीरज के गीत

  नव वर्ष 

(new year hindi geet )

 

 नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन | 

 

 सद्कर्म करें सतपंथ  चलें 

आलोक दीप बन सदा जलें 

पथ पर नित नव निर्माण करें 

साहस से अभय प्रयाण करें 

हम करें राष्ट्र का आराधन 

नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन | 

 

हम मातृ भूमि को प्यार करें 

जन- जन का हम सत्कार करें 

मानवता का हम गुण गायें 

विपदाओ मे हम मुस्कायें 

हम जियें सदा समरस जीवन 

नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन |


२. नवल वर्ष शतबार बधाई 

नयी दिशा में प्रगति लक्ष्य पर,

शुचि मंगलमय शुभ जीवन हो ,

नवल  वर्ष   शतबार    बधाई ,

तेरा उज्जवलतम यौवन हो |

 

स्वस्थ  विचार बुद्धि में उपजें ,

और ह्रदय में मधुरिम रिश्ते,

छल प्रपंच के ढूह ढहे सब ,

स्वच्छ बने समता के रस्ते |

 

ऐसा मंत्र पढ़ो युग स्वर में,

सभी अपावन भी पावन हो ,

नवल वर्ष शतबार बधाई ,

तेरा उज्जवलतम यौवन हो |

 

बहे पवित्र आचरण धारा ,

धुले कलुष जीवन का सारा ,

भेदभाव मन का मिट जाये ,

तम पर अंकित हो उजियारा |

 

पग-पग पथ पर अनय मिटाता ,

गरिमा  आभामय  जीवन  हो ,

नवल  वर्ष शतबार   बधाई ,

तेरा उज्जवलतम यौवन हो |

 

नवल ज्योति बिखराते आओ ,

जीवन का तम  दूर    हटाओ ,

नव उमंग नव गति लय लाओ ,

नव  आभा  फैलाते  जाओ |

 

हो अवसाद तिरोहित मन का ,

आह्लादित रसमय जीवन हो ,

नवल  वर्ष शतबार   बधाई ,

तेरा उज्जवलतम यौवन हो |

 

baba kalpnesh ke geet- कलम मेरी गही माता/बाबा कल्पनेश

कलम मेरी गही माता 

(baba kalpnesh ke geet)

कलम मेरी गहो माता सदा उर नेह की दाता।

चले यह नित्य करुणा पथ यही मुझको सदा भाता।।

भरम यह तोड़ती जग का उठाए प्रेम का छाता।

जगाए राष्ट्र भारत को बढ़ाए आत्म का नाता।।

निबलता देश की टूटे बनें सब वीर व्रत धारी।

चलें सब साथ होकर के सजे यह राष्ट्र फुलवारी।।

महक आकाश तक फैले यशी हों साथ नर-नारी।

मनुजता मूल्य पाए निज हटे जो मोह भ्रम भारी।।

सभी का श्रम बने सार्थक सभी को मूल्य मिल पाए।

नहीं  हों दीन भारत में कलम यह गीत लिख गाए।।

सुने नित विश्व सारा ही सभी को गीत यह भाए।

भरत का देश जागा है समय शुभ लौट कर आए।।

पुरातन शौर्य वह जागे भरत जब शेर से खेला।

वही यह राष्ट्र प्यारा है बनाकर विश्व को चेला।।

भरा करता रहा सब में मनुज के भाव का रेला।

लगे संगम किनारे जो अभी भी देख लें  मेला।।

नहीं कोई करे ऐसा यहाँ निंदित पड़े होना।

जगत अपमान दे भारी मिला जो मान हो खोना।।

जगे फिर दीनता हिय में पड़े एकांत में रोना।

लुटेरे लूट लें सारा हमारी निधि खरा सोना।।

जगे यह राष्ट्र-राष्ट्री सब सभी सम्पन्नता  पाएं।

सभी जन राष्ट्र सेवा में श्रमिक सा गीत  रच गाएं।।

निकल निज देश के हित में स्वयं अवदान ले आएं।

सदा हर जीव का मंगल रचें कवि गीत-कविताएं।।


२. हे राम

(baba kalpnesh ke geet )


 

हे राम जैसे आप हैं, यह जग कहाँ-कब मानता।

निज कल्पना के रूप में, कल्पित तुम्हे  है तानता।।

व्यवहार कर कुछ और ही,प्रवचन करे कुछ और ही।

जो वेद का व्याख्यान है, इस जगत लागे बौर ही।।

यह वेद को पढ़ता भले,पर कामना रत नित्य ही।

निज मापनी आकार में, निज को कहे आदित्य ही।।

यह ज्ञान का भंडार है, उर में सदा ही ठानता।

हे राम जैसे आप हैं, यह जग कहाँ है मानता।।

सम्मान दे माता-पिता,आचरण वैसा अब नहीं।

दुत्कार दे बैठे रहो,आदर नही कोई कहीं।।

आदेश कैसे मानता,ज्ञानी हुआ हर पूत है।

हनुमान को लड्डू खिला,बनता स्वयं हरि दूत है।।

यह देखता टीवी भले,निज बाप कब पहचानता।

हे राम जैसे आप हैं, यह जग कहाँ है मानता।।

ओंकार अथवा राम ही,जपता भले कर माल ले।

आशय नहीं पर मानता,गुरुदेव वाणी भाल ले।।

चंदन भले माला भले,आजान का स्वर तान ले।

कर्तव्य अपना जान ले,जो शास्त्र सम्मति मान ले।।

गुरु वाग केवल बोलता, पर कुछ कहाँ  है जानता।

हे राम जैसे आप हैं, यह जग कहाँ-कब मानता।।


  ३.  साध्य


कविता हमारी साध्य हो,साधन करें जो आज हो।

साधन हमारी भावना,हमको उसी की लाज हो।।

संसार सारा निज सखे,आओ इसे हम प्यार दें।

बोले सभी यह संत हैं, जिसपर हमें अति नाज हो।।

सब कुछ यहाँ परमात्मा, कुछ भिन्न जानो है नहीं। 

बस एक ही यह ज्ञान है,इस ज्ञान से ही काज हो।।

जो मंत्र गुरुवर से मिला,उसको हृदय में धार लें।

तब धन्य जीवन धन्य हो, निज शीश पर जग ताज हो।।

जो योग है वह जान लें, निज आत्म को विस्तार दें।

पाकर जिसे हर आदमी, मेटे उसे जो खाज हो।।

यह जीव-जीवन क्यों मिला,यह प्रश्न उत्तर खोज लें।

इस जग चराचर क्या भरा,हम जान लें जो राज हो।।

आओ लिखें वह गीतिका, जिसमें सरित सी धार हो।

हिय की कलुषता सब बहे,ऐसा सरस अंदाज हो।।

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बाबा कल्पनेश

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कल दीवाली होगी-बाबा कल्पनेश

ताटंक छंद


 

कल दीवाली होगी

कल दीवाली होगी अम्मा, मैं भी दिए जलाऊँगा,
यह प्रकाश का पर्व युगों से, गीत लिखूँगा-गाऊँगा।

गुड़िया बोल रही है अम्मा, मुझको गणपति ला देना,
रग्घूमल की उस दुकान से,गुड्डा सुंदर सा लेना।
दीवाली के लिए रँगोली,मुझको सुखद बनाना है,
भाँति-भाँति के रंग बहुत से,भरकर उसे सजाना है।
खेत-बाग-मंदिर पर दीपक, लेश द्वार आ जाऊँगा,
कल दीवाली होगी अम्मा, मैं भी दिए जलाऊँगा।

सजी हुई हैं बहुत दुकानें, लाई-खील-बतासे हैं,
बोलो नन्हे क्या-क्या लेना,बाबू जी के झाँसे हैं।
गुड़िया हुई रुआंसी लखकर,दिल मेरा घबड़ाता है,
धिक्कार कलम लिख देती मुझको,खुलकर रोना आता है।
खुशियों का त्योहार सोचता,खुशियाँ मैं भी पाऊँगा,
कल दीवाली होगी अम्मा, मैं भी दिए जाऊँगा।

पारस के सूरज जी आए,जाने क्या-क्या लाए हैं,
बच्चे टोले भर के दौड़े,सब का मन ललचाए हैं।
गुड़िया आकर घर में मेरी,गिन-गिन नाम बताए है,
मुझको भी ये लेना कह कर,हाथ-शीश मटकाए है।
सुनकर हँसते-हँसते बोला,मैं भी तुझको लाऊँगा,
कल दीवाली होगी अम्मा, मैं भी दिए जलाऊँगा।

धरा धाम पर नभ उतरेगा,तारे धरती आएँगे,
चंदा मामा शीश झुका कर, और कहीं छिप जाएँगे।
हर-घर-आँगन-नगर-गाँव में, खुशी पटाखे फूटेंगे,
चिंताओं के परकोटे तो,तड़-तड़ तड़-तड़ टूटेंगे।
खुशियों में आकंठ डूब कर,नाचूँगा मैं धाऊँगा,
कल दीवाली होगी अम्मा, मैं भी दिए जलाऊँगा।

घर का दीपक अम्मा लेशें,परम्परा की थाती है,
तुलसी के चौरे पर दीपक, यह दैनिक सँझबाती है।
बाद इसी के भइया-भौजी,सब जन दीप जलाना जी,
गणपति-लक्ष्मी-सरस्वती को,फिर घर में बैठाना जी।
जितनी होंगी तिमिर दिवारें,सब को तोड़ गिराऊँगा,
कल दीवाली होगी अम्मा, मैं भी दिए जलाऊँगा।

बाबा कल्पनेश

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बचपन गीत
bachapan geet
दुर्गा शंकर वर्मा “दुर्गेश”

बचपन गीत

बचपन के वे प्यारे दिन,
छप-छप पानी वाले दिन।
 
धमा चौकड़ी उछल कूद के,
धूम मचाने वाले दिन।
 
छप-छप पानी वाले दिन।
कागज़ की एक नाव बनाना,
पानी में उसको तैराना।
चींटों को फिर पकड़-पकड़ कर,
नाव के अंदर उन्हें बैठाना।
बहती नाव के पीछे-पीछे,
दौड़ लगाने वाले दिन।
छप-छप पानी वाले दिन।
 
चार बजे स्कूल से आना,
ताल,तलैया खूब नहाना।
 
बाबा जी को पता चले जब,
हाथ में डंडा लेकर आना।
 
आमों के पेड़ों पर चढ़कर,
आम तोड़ने वाले दिन।
 
छप-छप पानी वाले दिन।
बर्फ बेचने वाला आता,
भोंपू को वह तेज बजाता।
भोंपू की आवाज को सुनकर,
उसके पास दौड़कर जाता।
दादी से पैसे लेकर के,
बर्फ चूसने वाले दिन।
छप-छप पानी वाले दिन।
 
साबुन का वह घोल बनाना,
गुब्बारे सा उसे फुलाना।
 
फूंक मारकर  उसे उड़ाना,
दोनों हाथों से पिचकाना।
 
अजिया के संग रात लेटकर,
आसमान के तारे गिन।
छप-छप पानी वाले दिन।
—————————
गीतकार-दुर्गा शंकर वर्मा “दुर्गेश” रायबरेली।
 

हमें विश्वास है कि हमारे लेखक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस वरिष्ठ सम्मानित लेखक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।लेखक की बिना आज्ञा के रचना को पुनः प्रकाशित’ करना क़ानूनी अपराध है |आपकी रचनात्मकता को हिंदीरचनाकार देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए [email protected] सम्पर्क कर सकते है|

 
कुटिल चिकित्सक काला अन्तस- डॉ. रसिक किशोर सिंह नीरज

डॉ.  रसिक किशोर नीरज की कविता-” कुटिल चिकित्सक काला अन्तस” वर्तमान प्रकृति की महामारी से ग्रसित सामान्य, निर्धन परिवार जो अपनी बीमारी का इलाज धनाभाव में नहीं करा पाते तथा अस्पतालों और अच्छे चिकित्सकों का मनमानी शुल्क ना दे पाने के कारण जीवन रक्षा की भीख मांग रहे हैं इस कड़वे सत्य को उजागर करती है यह रचना:-

कुटिल चिकित्सक काला अन्तस

कतिपय रोग  ग्रस्त  होकर

सन्निकट मृत्यु के खड़े हुये

क्या  कोई  अवशेष   रहा

रोगों   से बिन  लड़े  हुये।

 

कल्पना नहीं थी अस्पताल में

आने    के   दिन   देखे     जो

भोग -भोगते   जन्म- जन्म के

ब्रह्मा   के  हैं    लेखे      जो।

 

थीं    भविष्य की  अभिलाषायें

खंडित       होता  मन  ही   मन

कुटिल चिकित्सक काला अन्तस

चेहरे      दिखते   सुंदर    तन।

 

सुंदरता  भावों  में   लेकिन

नहीं    क्रियाओं  में   देखी

निर्धन  की सेवा  है  उनको

नहीं  कभी   भाती    देखी।

 

क्षमता  हो न,  किंन्तु वह लेते

हैं  मनमानी   शुल्क   परीक्षा

रोगी  हो  असहाय  यहाँ   पर

माँगे  नव-जीवन की   भिक्षा।

 डॉ. रसिक किशोर सिंह नीरज की दूसरी कविता “कुछ मीठे स्वर की मृदु  ध्वनियाँ” प्रस्तुत है-

कुछ मीठे स्वर की  मृदु ध्वनियाँ

खोये  थे क्षण-क्षण जो मेरे

तेरी विरह व्यथा  यादों   में

लिख न सका वैसा जैसा था

देखा सपनों  के, वादों   में।

 

सभी विवादों  को माना   मैं

लेकिन  मौन नहीं सुख पाया

रहा   साध्य साधक तेरा   मैं

तेरी  ही  सुस्मृति  की काया।

 

बिल्कुल ही मैं  अपरिछिन्न  हूँ

  भिन्न- भिन्न    आशाएँ     मेरी

रूद्ध  पथिक  स्वागत  हित  तेरे

ही,  भावों   की  माला     मेरी ।

 

कुछ मीठे  स्वर की मृदु ध्वनियाँ

 अधरों   तक  आकर  रुक  जातीं

उच्छृंखल   मन की  अभिलाषा

 ‘नीरज’ मन  में कुछ  कह  जातीं।

kutil-chikitsak-kaala-antas
डॉ. रसिक किशोर सिंह नीरज

 
 

प्यार का गीत – बाबा कल्पनेश

प्यार का गीत – बाबा कल्पनेश
प्यार का गीत
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत,
जिसमें हार हुई हो मेरी और तुम्हारी जीत।
कई जन्म बीते हैं हमको करते-करते प्यार,
तन-मन छोड़े-पहने हमने आया नहीं उतार।
छूट न पाया बचपन लेकिन चढ़ने लगा खुमार,
कितने कंटक आए मग में अवरोधों के ज्वार।
हम दोनों का प्यार भला कब बनता अहो अतीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
तुम आयी जब उस दिन सम्मुख फँसे नयन के डार,
छिप कर खेले खेल हुआ पर भारी हाहाकार।
कोई खेल देख पुरवासी लेते नहीं डकार,
खुले मंच से नीचे भू पर देते तुरत उतार।
करने वाले प्यार भला कब होते हैं भयभीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
नदी भला कब टिक पायी है ऊँचे पर्वत शृंग,
और कली को देखे गुप-चुप रह पाता कब भृंग।
नयनों की भाषा कब कोई पढ़ पाता है अन्य,
पाठ प्यार का पढ़ते-पढ़ते जीवन होता धन्य।
जल बिन नदी नदी बिन मछली जीवन जाए रीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
कभी मेनका बन तुम आयी विश्व गया तब हार,
हुई शकुंतला खो सरिता तट लाए दिए पवार।
कण्वाश्रम पर आया देखा सिर पर चढ़ा बुखार,
भरत सिंह से खेल खेलता वह किसका उद्गार।
वही भरत इस भारत भू पर हम दोनों की प्रीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
श्रृद्धा मनु से शुरू कहानी फैली मानव वेलि,
अब भी तो यह चलता पथ पर करता सुख मय केलि।
इसे काम भौतिक जन कहते हरि चरणों में भक्ति,
आशय भले भिन्न हम कह लें दोनो ही अनुरक्ति।
कभी नहीं थमने वाली यह सत्य सनातन नीत,
मैं भी चाह रहा था लिखना वही प्यार का गीत।
बाबा कल्पनेश

Dr rasik kishore singh neeraj ka rachna sansar

Dr rasik kishore singh neeraj ka rachna sansar
डॉ. रसिक किशोर सिंह ‘नीरज’ की इलाहाबाद से वर्ष 2003 में प्रकाशित पुस्तक ‘अभिलाषायें स्वर की’ काव्य संकलन में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गीत कारों ,साहित्यकारों ने उनके साहित्य पर अपनी सम्मति प्रकट करते हुए कुछ इस प्रकार लिखे हैं

भूमिका

कविता अंतस की वह प्रतिध्वनि है जो शब्द बनकर हृदय से निकलती है। कविता वह उच्छ् वास है जो शब्दों को स्वयं यति- गति देता हुआ उनमें हृदय के भावों को भरना चाहता है क्योंकि कविता उच्छ् वास है और उच्छ् वास स्वर का ही पूर्णरूप है, अतः यदि स्वर की कुछ अभिलाषाएँ हैं तो वे एक प्रकार से हृदय की अभिलाषाएँ ही हैं जो काव्य का रूप लेकर विस्तृत हुई हैं ।’अभिलाषायें स्वर की’ काव्य संग्रह एक ऐसा ही संग्रह है इसमें कवि डॉ. रसिक किशोर सिंह ‘नीरज’ ने अपनी अभिलाषाओं के पहले स्वर दिए फिर शब्द।

 

कवि डॉ. रसिक किशोर ‘नीरज‘ ने इस संग्रह में कविता के विभिन्न रूप प्रस्तुत किए हैं। उदाहरणतया उन्होंने अतुकांत में भी कुछ कवितायें लिखी हैं एक प्रश्न तथा अस्मिता कविता इसी शैली की कविताएं हैं तथा पवन बिना क्षण एक नहीं….. वह तस्वीर जरूरी है…… किसी अजाने स्वप्नलोक में…… अनहद के रव भर जाता है…. पत्र तुम्हारा मुझे मिला….. खिलता हो अंतर्मन जिससे….
विश्व की सुंदर सुकृति पर….. मित्रता का मधुर गान……. चढ़ाने की कोशिश……. चूमते श्रृंगार को नयन…… बनाम घंटियां बजती रही बहुत…… जो भी कांटो में हंसते ……..जिंदगी थी पास दूर समझते ही रह गये…….. गीत लिखता और गाता ही रहा हूं……. श्रेष्ठ गीत हैं इन रचनाओं में कवि ने अपने अंतर की प्रति ध्वनियों को शब्द दिए हैं
डॉ. कुंंअर बैचेन गाज़ियाबाद
2. कविता के प्रति नीरज का अनुराग बचपन से ही रहा है बड़े होने पर इसी काव्य प्रेम ने उन्हें सक्रिय सृजनात्मक कर्म में प्रवृत्त कियाl यौवनोमष के साथ प्रणयानुभूति उनके जीवन में शिद्त से उभरी और कविता धारा से समस्वरित भी हुई ।वह अनेक मरुस्थलों से होकर गुजरी किन्तु तिरोहित नहीं हुई। संघर्षों से जूझते हुए भावुक मन के लिए कविता ही जीवन का प्रमुख सम्बल सिद्ध हुई
डॉ. शिव बहादुर सिंह भदौरिया

इस प्रकार रायबरेली के ही सुप्रसिद्ध गीतकार पंडित बालकृष्ण मिश्र ने तथा डॉ. गिरजा शंकर त्रिवेदी संपादक नवगीत हिंदी मुंबई ने और डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी बरेली आदि ने अपनी शुभकामनाएं देते हुए डॉ. नीरज के गीतों की प्रशंसा की है

(1). पारब्रह्म परमेश्वर

पारब्रह्म परमेश्वर तेरी
जग में सारी माया है।
सभी प्राणियों का तू
नवसृजन सृष्टि करता
तेरी ही तूलिका से
नव रूप रंग भरता।
कुछ रखते सत् विचार
कुछ होते अत्याचारी
तरह तरह के लोग यहाँँ
आते, रहते बारी-बारी ।
जग के रंगमंच में थोड़ा
अभिनय सबका आया है।
कहीं किसी का भेद
खेद हो जाता मन में
नहीं किसी की प्रगति
कभी देखी जन-जन में ।
सदा सदा से द्वेष
पनपता क्यों जीवन में
माया के चक्कर में
मतवाले यौवन में।
‘नीरज’ रहती नहीं एक सी
कहीं धूप व छाया है।।

(2).राम हमारे ब्रह्म रूप हैंं

राम हमारे ब्रह्म रूप हैं ,राम हमारे दर्शन हैं ।
जीवन के हर क्षण में उनके, दर्शन ही आकर्षण हैं ।।
हुलसी सुत तुलसी ने उनका
दर्शन अद्भुत जब पाया ।
हुआ निनाँदित स्वर तुलसी का
‘रामचरितमानस’ गाया।।
वैदिक संस्कृति अनुरंजित हो
पुनः लोक में मुखर हुई ।
अवधपुरी की भाषा अवधी
भी शुचि स्वर में निखर गई।।
कोटि-कोटि मानव जीवन में, मानस मधु का वर्षण है ।
राम हमारे ब्रह्म रूप हैं राम, हमारे दर्शन हैं।।
ब्रह्म- रूप का रूपक सुंदर ,
राम निरंजन अखिलेश्वर ।
अन्यायी के वही विनाशक,
दीन दलित के परमेश्वर ।।
सभी गुणों के आगर सागर ,
नवधा भक्ति दिवाकर हैं।
मन मंदिर में भाव मनोहर
निशि में वही निशाकर है।
नीरज के मानस में प्रतिपल, राम विराट विलक्षण हैंं।
राम हमारे ब्रह्म रूप हैं , राम हमारे दर्शन हैं।

(3).शब्द स्वरों की अभिलाषायें

रात और दिन कैसे कटते
अब तो कुछ भी कहा ना जाये
उमड़ घुमड़ रह जाती पीड़ा
बरस न पाती सहा न जाये।
रह-रहकर सुधियाँ हैं आतीं
अन्तस मन विह्वल कर जातीं
संज्ञाहीन बनातीं पल भर
और शून्य से टकरा जातीं।
शब्द स्वरों की अभिलाषायें
अधरों तक ना कभी आ पायें
भावों की आवेशित ध्वनियाँ
‘ नीरज’ मन में ही रह जायें।

(4). समर्पण से हमारी चेतना

नई संवेदना ही तो
ह्रदय में भाव भरती है
नई संवेग की गति विधि
नई धारा में बहती है ।
कदाचित मैं कहूँँ तो क्या कि
वाणी मौन रहती है
बिखरते शब्द क्रम को अर्थ
धागों में पिरोती है ।
नई हर रश्मि अंतस की
नई आभा संजोती है
बदल हर रंग में जलती
सतत नव ज्योति देती है।
अगर दीपक नहीं जलते
बुझी सी शाम लगती है
मगर हर रात की घड़ियाँ
तुम्हारे नाम होती हैं।
नया आलोक ले ‘नीरज’
सरोवर मध्य खिलता है
समर्पण से हमारी चेतना
को ज्ञान मिलता है ।

(5).नाम दाम के वे नेता हैं

कहलाते थे जन हितार्थ वह
नैतिकता की सुंदर मूर्ति
जन-जन की मन की अभिलाषा
नेता करते थे प्रतिपूर्ति।
बदले हैं आचरण सभी अब
लक्षित पग मानव के रोकें
राजनीति का पाठ पढ़ाकर
स्वार्थ नीति में सब कुछ झोंके।
दुहरा जीवन जीने वाले
पाखंडी लोगों से बचना
शासन सत्ता पर जो बैठे
देश की रक्षा उनसे करना।
पहले अपनी संस्कृति बेची
अब खुशहाली बेंच रहे हैं
देश से उनको मोह नहीं है
अपनी रोटी सेक रहे हैं।
देशभक्ति से दूर हैं वे ही
सच्चे देश भक्त कहलाते
कैसे आजादी आयी है
इस पर रंचक ध्यान न लाते।
कथनी करनी में अंतर है
सदा स्वार्थ में रहते लीन
नाम धाम के वे नेता हैं
स्वार्थ सिद्धि में सदा प्रवीन।

(6). आरक्षण

जिसको देखो सब ऐसे हैं
पैसे के ही सब पीछे हैं
नहीं चाहिए शांति ज्ञान अब
रसासिक्त होकर रूखे हैं।
शिक्षा दीक्षा लक्ष्य नहीं है
पैसे की है आपा धापी
भटक रहे बेरोजगार सब
कुंठा मन में इतनी व्यापी ।
आरक्षण बाधा बनती अब
प्रतिभाएं पीछे हो जातीं
भाग्य कोसते ‘नीरज’ जीते
जीवन को चिंतायें खातीं ।
व्यथा- कथा का अंत नहीं है
समाधान के अर्थ खो गये
आरक्षण के संरक्षण से
मेधावी यों व्यर्थ हो गये।
सत्ता पाने की लोलुपता ने
जाने क्या क्या है कर डाला
इस यथार्थ का अर्थ यही है
जलती जन-जीवन की ज्वाला।