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विज्ञान को समाज तक पहुंचाने का सशक्त उपकरण है विज्ञान कविताएं –   सविता चडढा

 जब से दुनिया बनी है विज्ञान की भूमिका हम सबके जीवन में प्रारंभ से विद्यमान है । विज्ञान के अनेक रूप भी हमारे आसपास, हमारे सौरमंडल में विचरण करते रहे हैं । हमारे मन में कई जिज्ञासाएं  बचपन से बनी रही हैं। सौर मंडल क्या है , ब्रह्मांड क्या है धरती  कैसे बनी, चेतन और अवचेतन मन, आने वाले सपने, बादल और चमकती बिजली….अनगिन विषय  विज्ञान के दायरे में आते रहे हैं। 

बचपन में जब रामायण के कई दृष्टांत सुने  तो मुझे लगता था उस समय भी विज्ञान विद्यमान था , नहीं तो पुष्पक विमान कैसे बनता । पवन पुत्र हनुमान जी की यात्रा का उल्लेख भी मुझे बहुत जिज्ञासा में डालता था। बालपन की जिज्ञासाएं  यह जानने को सदैव इच्छुक रहती , कैसे श्रीराम और लक्ष्मण जी को अपने कंधों पर बिठाकर ले गए थे पवन पुत्र और जब राम और रावण के युद्ध की बात होती  और इसमें प्रयोग किए गएअनेक अस्त्र।  मुझे लगता  यह सब भी विज्ञान का ही चमत्कार था और विज्ञान आज का नहीं युगों युगों से इस पृथ्वी पर विद्यमान है । पारस को छूने से जब लोहा भी सोना बन जाता है तो क्या यह  विज्ञान नहीं है । मैं तो यहां पर यह भी कहना चाहती हूं अगर कोई साधारण मनुष्य, असाधारण व्यक्तियों की छत्रछाया में आकर चमत्कार कर जाता है अपने जीवन में , यह भी तो विज्ञान है । क्या ये मनोविज्ञान है?  विज्ञान  में भी तो मनोविज्ञान में भी तो विज्ञान  है। विज्ञान के जितने भी चमत्कार हुए हैं उसे बनाया तो मनुष्य नहीं है । बहुत ही विस्तृत दायरा है विज्ञान का। विज्ञान के विभिन्न रूपों को देखने का अवसर मुझे मिला एक विज्ञान कविताओं के संग्रह में।

सविता चड्ढा

पिछले दिनों” विज्ञान कविताएं ” पुस्तक मेरे हाथ में आई और हाथ में भी इसलिए आई क्योंकि मुझे विज्ञान पर कविताएं लिखने के लिए आमंत्रित किया गया था।  मैंने अपनी लिखी कविताओं में से कुछ कविताएं प्रदूषण और पर्यावरण, काश कोई ऐसा यंत्र मिल जाए,  जो मनुष्य के मन के आकार को जान सके, पल पल का साथी विज्ञान,एकात्म ऐसे अनेक विषयों पर लिखी मेरी कविताएं इस संग्रह में शामिल है । इस पुस्तक के संपादक सुरेश नीरव जी को मैंने अपनी कविताएं भेज दी,  मुझे बहुत हैरानी हुई कि उन्होंने इन कविताओं को विज्ञान कविताएं स्वीकार किया और कहा इन कविताओं में वैज्ञानिकता है । मित्रों मैंने कई कहानियां लिखी है जिसमें मनोविज्ञान और चिकित्सा विज्ञान से संबंधित विषय कहानियों में लिए गए हैं । जब यह पुस्तक तैयार होकर मेरे हाथ में पहुंची और मैंने इसे पढ़ा तो मैंने पाया कि विज्ञान का हमारे समाज में कितना महत्व है और कविताएं एक सशक्त माध्यम है विज्ञान को समाज तक पहुंचाने का ,समाज की जिज्ञासाओं को विज्ञान ही शांत कर सकता है।  जब आप इस  संग्रह की कविताएं पढ़ेंगे तो आप जान पाएंगे कि सपनों का विज्ञान क्या है, डीएनए, प्राणी और पदार्थ क्या हैं। विज्ञान कविता है क्या ? इन सब के बारे में पंडित सुरेश नीरव जी ने इस पुस्तक में विस्तार से बताया है। डॉक्टर शुभता मिश्रा, अंधकार  चंद्रयान की सुंदर पृथ्वी के बारे में बताती हैं और टैबलेट आहार के बारे में बताती हैं। सुरेंद्र कुमार सैनी कहते हैं कि सत्य को पहचानने का नाम है विज्ञान है । नीरज नैथानी वृक्षों के संसार और ऊर्जा प्रदायनी गंगा को लेकर विज्ञान को परिभाषित करते हैं । मंगलयान, खिचड़ी और प्रोटीन एक कदम, विज्ञान पर अपनी बात, विज्ञान से जुड़ी कई बातें यशपाल सिंह यश ने अपनी कविताओं में बताई हैं और अरुण कुमार पासवान  ने ,सुबह की सैर ,वृक्षारोपण और महायुद्ध के माध्यम से विज्ञान को हम सबको परोसा है। राकेश जुगरान ने पॉलिथीन,जीवन दर्शन और जंगल के मासूम परिंदे जैसे विषयों पर लिखकर विज्ञान को परिभाषित किया है। मधु मिश्रा ने विज्ञान की बात करते हुए पेड़ों को ऑक्सीजन प्रदाता कहां है और संतुलित भोजन और पेड़ों को बचाने पर अपनी सुंदर रचनाएं प्रस्तुत की है । पंकज त्यागी असीम ने इसरो के माध्यम से और मोबाइल को लेकर अपनी कुछ बातें विज्ञान के साथ जोड़ी है । वहीं डॉक्टर कल्पना पांडेय ने शून्य का गणित और कोविड महामारी और विज्ञान को बहुत ही जादुई बताते हुए विज्ञान को प्रस्तुत किया है । इसी प्रकार सुबोध पुण्डीर  कहते हैं कि आज बिजली के सहारे जिंदगी का काम चल रहा है। उन्होंने भी पेड़ों को ऑक्सीजन का भंडार बताया है।  रामवरन ओझा इस पुस्तक में विज्ञान के चमत्कारों की बात करते हैं । पंडित सुरेश नीरव पुस्तक के अंत में” तुम गीत लिखो विज्ञान के ” एक बहुत ही सुंदर गीत के साथ प्रस्तुत हुए हैं।  इस संग्रह को पढ़ते हुए मैंने पाया कि विज्ञान पर लिखी गई ये कविताएं समाज को विज्ञान के कई रूप प्रस्तुत करती है और यह सिद्ध हो जाता है कि विज्ञान को समाज तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम कविता भी हो सकती है।

हमारा व्यवहार हमारे मानसिक संतुलन को अभिव्यक्त करता है- सविता चड्डा
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सविता चड्ढा

हमारा व्यवहार हमारे मानसिक संतुलन को अभिव्यक्त करता है। साधारण लोग इस बात की ओर भले ही ध्यान ना दें लेकिन आप यह जान लें कि हम जो भी करते हैं, कैसे उठते हैं, बैठते हैं, चलते हैं, बात करते समय हमारे चेहरे की भाव भ॔गिमांए  अगर कोई ध्यान से देखता है तो वह जान सकता है कि आपके हृदय में क्या चल रहा है, आपके मस्तिष्क की अवस्था कैसी हैं, जीवन के प्रति  आपका दृष्टिकोण क्या है ?

आप सोचेंगे ऐसा कैसे संभव है।  मैं आपको बहुत सारी बातें बता सकती हूं।  मेरी बताई गई बातें आपके मस्तिष्क को परिवर्तित नहीं कर सकती, आपकी सोच को भी बदल नहीं सकती ,हां उसे कुछ समय के लिए प्रकाशित कर सकती हैं और अगर आप निरंतर उस प्रकाश को महसूस करेंगे तो छोटे से छोटे कंकर से बचाव संभव हो सकेगा।

सबसे पहले तो यह जान लेना चाहिए,  संसार की सारी बातें सब व्यक्तियों के लिए नहीं होती। उदाहरण के लिए  यदि हम कला में स्नातक की डिग्री लेना चाहते हैं या कला में स्नातक की शिक्षा लेना चाहते हैं तो उसके लिए हमें अलग सब्जेक्ट पढ़ने होते हैं और यदि हम कॉमर्स विषय  लेते हैं तो उसके लिए हम अलग शिक्षा लेते हैं। इसी प्रकार चिकित्सा, विज्ञान या जीवन में शिक्षा के क्षेत्र में लिए जाने वाले सभी विषयों के लिए, हमें अलग अलग तरह से उसका  चयन करना पड़ता है।  इसी प्रकार  ईश्वर ने हमें हमारे मस्तिष्क को  जिस प्रकार बना दिया है हमें केवल वही बातें पसंद आती हैं और हम उसी के अनुसार ही अपना वातावरण चुनते हैं। अपने संगी साथी पसंद करते हैं।  हमें अपने ही सोच वाले व्यक्ति पसंद आते हैं। मस्तिष्क का निर्धारण कोई व्यक्ति नहीं कर सकता, इसे हम कुछ पल के लिए बदल सकते हैं। उदाहरण के लिए  अगर पानी को गर्म किया जाए तो वह कुछ समय के पश्चात शीतल हो जाता है अर्थात जो उसका वास्तविक स्वभाव है वह उसमें बदल ही जाता है।  इसी प्रकार ईश्वर द्वारा प्रदत्त मस्तिष्क में  बहुत अधिक परिवर्तन नहीं हो सकता लेकिन इसे धीरे धीरे नकारात्मकता से सकारात्मकता की और स्थाई रूप से लाया जा सकता है।

जैसे किसी ने पहले बी. ए. पास कोर्स में दाखिला लिया बाद में उसे  लगा कि कॉमर्स की शिक्षा अधिक उपयोगी है तो वह किसी दूसरे संस्थान में, अपनी दूसरी पुस्तकों के साथ उपस्थित होता है और लगातार उसीका अध्ययन करता है तो वह इस शिक्षा में भी उतीर्ण  हो सकता है अर्थात ईश्वर द्वारा प्रदत मस्तिष्क को पूर्ण रूप से बदलने के लिए हमें अपने हृदय का सहारा इसमें मिल सकता है। यह सहारा  कोई भी हो सकता है, पुस्तकें भी हो सकती हैं ,व्यक्ति भी हो सकता है।  उनका सहारा लेकर आप अपने जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन ला सकते हैं बशर्ते आपका मस्तिष्क उसे स्वीकार करने के लिए उपस्थित हो। ये विषय बहुत विस्तृत है और इस पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है।

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डॉ.नीरज की काव्य कृतियां मेरी दृष्टि में / ब्रजेश नाथ त्रिपाठी

डॉ.नीरज की काव्य कृतियां_मेरी दृष्टि में

सुनहरी भोर की ओर

नव गति नव लय ताल तुम्ही हो के शिख से लेकर मुक्तक के नख तक पुण्य सलिल मंदाकिनी की काव्य धारा के तट पर स्थापित अनेक तीर्थों का दरशन- परसन करते हुए भगवान भास्कर के बाल रूप को अर्घ्य अर्पित करने का शुभ अवसर अनुज डॉ. रसिक किशोर सिंह नीरज की काव्य कृतियां ” सुनहरी भोर की ओर” और “अञ्जुरी भर प्यास लिये ” का अवगाहन करके प्राप्त हुआ।

‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ की अवधारणा को पुष्ट करती हुई इस कृति के अनुपम रूप सौंदर्य को देखकर मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं हो रहा है की डॉ. नीरज एक साहित्यकार ही नहीं एक संस्था हैं जिससे जुड़ने का सुयोग सैकड़ों कवियों के साथ मुझे भी प्राप्त हुआ है।

मेरा अभी तक का यह मानना था की बहुत लिखा महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि बहुत अच्छा लिखा मायने रखता था लेकिन मुझे खुशी है कि मेरा मत निर्मूल सिद्ध हुआ क्योंकि आज सुनहरी भोर की ओर और अञ्जुरी भर प्यास लिये का रसास्वादन करने के पश्चात मैं दावे से कह सकता हूं मैं दावे से कह सकता हूं कि नीरज जी ने बहुत लिखा और बहुत अच्छा लिखा। यद्यपि इन दो काव्य कृतियों के अतिरिक्त मैने नीरज जी की गद्य पद्य में कोई अन्य कृति नहीं पढी किंतु अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित इस स्फुट रचनाओं एवं काव्य मंचो का मैं साक्षी रहा हूं इस गर्व की अनुभूति के साथ कि मेरे मित्र ने साहित्य में जिस स्थान को प्राप्त करने का संकल्प लिया था उसने उस लक्ष्य को प्राप्त कर लिया।

मुझे लगता है नीरज जी का और मेरा साथ संभवत 1990 के दशक से है इस कालखंड की सबसे स्मरणीय घटना है 2003 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्त लेकर मेरा अपने घर जगतपुर आना ।
कहने को रायबरेली नगर से 20 किलोमीटर दूर एक विकासखंड लेकिन मेरे लिए ‘दिल्ली दूर आयद’ नगर के साहित्यिक मित्रों से ना मिल पाने का एक बहुत बड़ा कारण 71 वर्ष की आयु के कारण नगर में परंपरागत आयोजित होने वाले सांध्य कालीन कार्यक्रमों में सम्मिलित ना हो पाने की विवशता, खैर छोड़िए यह सब तो अपनी रामकहानी है जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये।

कृतियों के संबंध में तमाम मनीषियों ने अपनी – अपनी भूमिका में काव्य कृतियों एवं रचनाओं के बारे में सुंदर शब्दावली में उनके कृतित्व और व्यक्तित्व की भूरि- भूरि प्रशंसा की है इस सार तत्व के साथ कि अच्छे को तो अच्छा कहना ही है। समान मत रखने के कारण मैं उन तमाम मनीषियों को प्रणाम करता हूं जिन्होंने अपनी भूमिकाओं में कृतियों के अनेक पक्षों पर दृष्टि डालते हुए उसे समग्रता प्रदान की है।

सुनहरी भोर की ओर कृति के प्रारंभिक पृष्ठों में स्वामी गीतानंद गिरि का आशीर्वाद शिव कुमार शिव और डॉ.रंगनाथ मिश्र सत्य ने तो अपनी बात कही लेकिन रचनाकार ने चुप्पी साध ली शायद इसीलिए कि कृति की सारी रचनाएं अपनी उत्कृष्टता से रचनाकार की यशगाथा को हिंदी साहित्य के इतिहास में अनंत काल तक उद्घभाषित करती रहेंगी।

नई कविता में ‘ज्योति पुंज प्रकाश’ ‘परिणाम हैं तेरे’ के पश्चात जैसे ही ‘अनुभूति और अभिव्यक्ति’ शीर्षक से बिल्कुल नये प्लाट पर लिखी कविता को पढ़कर मैं चमत्कृत हो उठा। यथा — सरोवर से निकले / सद्य:
स्नानित महिषों के दल / एक- दूसरे से लुरियाते/ वक्र विषाणों से खुजलाते एक दूसरे को /कर्ण पल्लवों की पवित्री से/ एक दूसरे पर छिड़कने अभिषेक जल।

     मैंने इस कविता को कितनी बार पढ़ा कह नहीं सकता कोई चित्रकार भी इतनी सजीवता से इन क्षणों को , इन दृश्यों को अपनी तूलिका से नहीं उकेर सकता इसका परिणाम यह हुआ कि पन्ना पलटने की प्रवृत्ति अपने आप दरकिनार हो गयी और मैंने सावधान होकर पूर्ण मनोयोग से अगले पृष्ठ को खोला शीर्षक था   'कानन मधुरस बतियां'   यथा---  तन दियना मन बाती, दीपित अंग/  प्राण शलभ न रहै थिर, तरल तरंग, दीखत जो मुख आपन, दरपन माहिं/  बार-बार भ्रम जागे वा  मुख नाहि  । 

पढ़ते-पढ़ते मैं भवसागर में डूब गया । यह मेरा अल्प ज्ञान कह लें या धृष्टता लेकिन सभी विद्वजनों से क्षमा मांगते हुए मैं कहूंगा कि इतनी अप्रतिम अद्वितीय अनुपम रचना इससे पूर्व नहीं पढ़ी।
अमीर खुसरो की यह लुप्तप्राय विधा, शैली जिसके शब्द संयोजन से शहद टपकता हो उसे इस सदी में स्थापित करने का श्रेय डॉ. नीरज जी को जाता है और निश्चय ही हिंदी साहित्य के इतिहासकारों की दृष्टि 33 और 34 पृष्ठ के इस पन्ने पर जानी चाहिए ।
दोहा , छंद, सवैया, कुंडलिनी आदि अन्यान्य विधाओं को तो अपनाया किंतु इस विधा को आगे बढ़ाने का उपक्रम क्यों नहीं हुआ यह एक विचारणीय प्रश्न है?
मेरी दृष्टि से कविता इस पन्ने में ही पूर्ण हो गई है । नई कविता की यह यात्रा पृष्ठ संख्या 37 पर टंकित –‘प्रणय- राशि बनकर अनंग में’ समा जाती है । पुन: पृष्ठ संख्या 52 ‘संस्कृति दम तोड़ती यहां’ से ‘मैं पत्थर हूं ‘ पृष्ठ संख्या 60 तक जब तक ग़ज़ल अपनी पूर्ण अल्हड़ता के साथ मार्ग में खड़ी नहीं हो जाती , चलती रहती है।
इससे पूर्व कि मैं ग़ज़लों की बात करूं एक नई विशिष्ट कविता या गीत कहें का उल्लेख किए बिना नहीं रह सकता यद्यपि इसका शीर्षक कविता के भावों के अनुरूप नहीं है भले ही वह कविता का एक अंश ही है। शीर्षक है ‘प्रणय राशि बन कर अनंग में’ और कविता है ‘कविते! तुम पावन प्रसाद सी, मुक्त कृपा सी बरसो । नीर -क्षीर बिलगाओ , और बोध -शोध सी परसो ।
चलिए अब ग़ज़लों की बात करते हैं ग़ज़लों के लिए नई ज़मीन तलाशने की काफ़ी कोशिश की गई और रचनाकार अपने इस प्रयास में काफ़ी हद तक सफल भी हुआ दूसरी ग़ज़ल ‘ बादशां तो दिल के थे’ , बादशा से एक स्मृति दिमाग में कौंध गई यह उस समय की बात है जब पंडित बालकृष्ण मिश्र एडवोकेट को ‘गीतों का राजकुमार ‘ कहकर प्रतिष्ठा दी गई थी ।
रिफॉर्म क्लब के सामने बृहद काव्य गोष्ठी का आयोजन था पंडित बालकृष्ण मिश्र मुक्तकों की श्रंखला में यह मुक्तक पढ़ रहे थे– उम्र दरिया के किनारों की तरह कटती रही । या कि चंदा की तरह घटती रही बढ़ती रही ।कभी बादशाह कभी दहला कभी ग़ुलाम बना । ज़िंदगी ताश के पत्तों की तरह बंटती रही। और मेरे बगल में बैठे उर्दू के महान शायर जनाब वाक़िफ रायबरेलवी मुझसे कह रहे थे बृजेश इस पंडित को कितनी बार कहा है कि बादशां की जगह पर बादिश पढ़ा करो लेकिन यह मानता ही नहीं ।मुझको लगता है कि मिश्र जी हिंदी के स्वत्व को बनाए रखना चाहते थे इसलिए वह तिरा, मिरा का प्रयोग हिंदी में करने के पक्षधर नहीं थे। हिंदी शब्दावली में उर्दू ,अरबी ,फारसी तथा अन्य भाषाओं के आगत शब्द जिस प्रकार लिये गये हैं उसी प्रकार उन्हें प्रयुक्त भी करना चाहिए। बहरहाल मुझे गर्व है कि मैं सदैव हिंदी -उर्दू के इन कीर्ति स्तंभों का कृपा पात्र रहा।
संग्रहीत 15 ग़ज़लों में कई अच्छे शेर कहे गए हैं उसमें से एक लाजवाब शेर यह भी है–
‘साथ लाए थे छड़ी जो, वो ले गए वापस।
पास में इसके तो माथा है टेकने के लिए’।
बालगीत के सभी गीत बहुत सुंदर हैं और यह सिद्ध करने में पूर्ण समर्थ हैं कि रचनाकार को बाल मनोविज्ञान का अच्छा ज्ञान है।
हाइकु ने जापान से भारत विशेष रूप से रायबरेली उत्तर प्रदेश तक जिस तीव्र गति से यात्रा की उतनी ही तीव्रता से त्रिशूल ने उसे आत्मसात ही नहीं कर लिया बल्कि तुकांत के प्रयोग से उसका शुद्ध भारतीय करण भी कर दिया जिसके लिए पंडित शंभू शरण द्विवेदी बंधु को सदैव स्मरण किया जाएगा। उनका एक प्रसिद्ध हाइकु या त्रिशूल है– कुछ कहोगे / अपने विवेक से / कहां रहोगे ।
नीरज के इस त्रिशूल को कौन भुला सकता है – गंध गमकी/ फगुनी पलाश की / छाया दहकी। रचनाकार द्वारा द्विवेदी जी को सम्मान देते हुए त्रिशूल शीर्षक से ही 15 त्रिशूल छंद संग्रह की माला में पिरोये हैं जो अपनी सार्थकता सिद्ध करने में सक्षम हैं।
छंद और मुक्तक अंशावतार न लगकर पूर्णावतार लगते हैं और कवि की कोमल हृदयानुभूति के संवाहक के रूप में काव्य कृति को अलंकृति करते हैं मुझे विश्वास है कि इनमें से बहुसंख्यक छंदों एवं मुक्तकों का प्रयोग मंच उद्घोषकों द्वारा जनमानस के मध्य होता रहेगा ।
निश्चय ही इस काव्य कृति को डॉक्टर नीरज की सर्वश्रेष्ठ कृति के रूप में हिंदी साहित्य में विशेष स्थान प्राप्त होगा।

अञ्जुरी भर प्यास लिए

   डॉ.नीरज की दूसरी काव्य कृति के अंतिम पृष्ठ पर शतएकादश दोहों को छोड़ दिया जाये तो पूरी कृति गीतों को समर्पित है वस्तुतः जहां तक मैं समझता हूं रसिक जी मूलतः तथा स्वभावत: गीतकार हैं उनके रोम-रोम में गीतों का स्पंदन है गीतों ने ही साहित्य जगत में उनकी पहचान बनाई है अतः गीतात्मकता उनके पूरे साहित्य में रचा बसा है कहीं-कहीं वाणी कठोर भले ही हुयी हो लेकिन उसमें द्वेष ना होकर शाश्वत प्रेम और वात्सल्य की ही प्रबलता है ठीक उस कुम्भकार की तरह जिसका एक हाथ बाहर घड़े पर चोट मारता है और घड़े के भीतर से एक हाथ उस पर होने वाले आघात से बचाता रहता है । परंपरा का निर्वाह करना और बात है अन्यथा मुझे तो लगता है कि नीरज जी के गीत ही कृति की भूमिका भी है और विस्तृत कलेवर भी , कृति को प्रसिद्धि भूमिका के साथ भी मिलती है और उनके बिना भी, बस रचनाकार की दृष्टि प्रखर होनी चाहिए गीतों की प्रमाणिकता और श्रेष्ठता स्वयं सिद्ध है इसके लिए 10 मूर्धन्य विद्वानों के हस्ताक्षर गीत के स्वाभिमान को कदाचित आहत ही करेंगे ।

अपनी बात में कृतिकार ने कृति के बारे में न्यूनाधिक और अन्य के बारे में अधिकाधिक विचार रखे हैं जिसे आत्मकथा , संस्मरण और यात्रा वृतांत के एक अंश के रूप में भी देखा जा सकता है यद्यपि मुझे यह बहुत रुचिकर और आनंद दायक लगा। इसलिए नहीं कि इसमें मेरा भी उल्लेख है बल्कि इसलिए भी कि बीते दिनों का इतिहास एकाएक सजीव हो उठा । यह इतिहास उस कालखंड का था जिसका एक पात्र मैं भी था । सुखद दिनों की अनुभूति सबको अच्छी लगती है और मुझे कहने दे कि रायबरेली नगर में हिंदी साहित्य का वह स्वर्ण काल था ।
रेलवे में पंडित गोविंद नारायण मिश्र जी (त्रिवेणी काव्य कृति के रचयिता) स्टेशन परिसर में काव्य आयोजन, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में “एक ताल जिंदगी ” काव्य कृति के रचनाकार भाई स्वप्निल तिवारी जी और नई कविता के पुरोधा आनंद स्वरूप श्रीवास्तव जी के प्रयास से बैंक परिसर में काव्य समारोह, गांधी धर्मशाला में डॉ.चक्रधर नलिन द्वारा प्रतिवर्ष महावाणी का प्रकाशन और हिंदी समारोह और रायबरेली में लघु कथा को पुष्पित, पल्लवित करने वाले राजेंद्र मोहन त्रिवेदी बंधु के यहां प्रत्येक माह के अंतिम शनिवार को होने वाली गोष्ठियों को कौन न याद करना चाहेगा। जैसे पिंक सिटी के रूप में जयपुर विख्यात है उसी तरह चतुर्भुजपुर से सूरजूपुर मोहल्ले तक चारों ओर बस काव्य उत्सव।
तब आज जैसी ना तो खेमे बंदी, गुटबंदी या जुगलबंदी थी । हिंदी उर्दू के सभी कवि, शायर एक छत के नीचे इकट्ठा होते थे नई-नई रचनाएं सुनाने की होड़, बड़ा कवि हो या छोटा सभी अपने घरों में गोष्ठी आयोजित करते थे। गोष्ठी भी मात्र काव्य तक सीमित ना हो परिचर्चा कहानी, लघुकथा, समस्या पूर्ति के रूप में साहित्य सृजन के लिए भूमि को उपजाऊ बना रही थी। आज उस दौर के कवियों, शायरों में स्मृति शेष की संख्या सबसे ज्यादा है और जो विद्यमान हैं उनमें कतिपय को छोड़कर वही 30- 35 वर्ष पहले की रचनाएं पढ़ रहे हैं शायद वह लिखना बंद कर चुके हैं या उस स्तर का नहीं लिख पा रहे हैं जो 30 – 35 वर्ष पूर्व लिखा था।
इसका एक दूसरा पहलू भी है और वह है मंच संस्कृति मेरी समझ से “मंच कवि और कविता के पांव में बंधी हुई वह जंजीर है जो तालियों की गड़गड़ाहट से टूटती है ” । कवि के लिए कविता तो श्वास , प्रश्वास है फिर मात्र वाहवाही के लिए?
नीरज जी देखिए मैं भी आप द्वारा वर्णित इतिहास के प्रवाह में बह गया भान हीं नहीं रहा कि मैं कृति के बारे में लिख रहा था या पुराना पत्रा बाच रहा हूं ,क्षमा करें !
उन कतिपय कवियों में एक नाम डॉ . रसिक किशोर सिंह नीरज का भी है जो आज पहले से ज्यादा श्रेष्ठ साहित्य का सृजन कर रहे हैं और अनवरत साहित्य साधना में रत हैं ।
प्रस्तुत कृति में वाणी वंदना से लेकर ” भारत दर्शन हुआ नीरज” तक साठ गीत हैं जिनमें स्थान- स्थान पर भारतीय संस्कृति का उदात्त स्वरूप बिखरा हुआ है। इसमें तमाम गीत जिस पृष्ठभूमि पर लिखे गए हैं लगता है कि वह जन-जन की व्यथा का चित्रण कर रहे हैं यथा — भाई ने भाई के तोड़े क्षण भर में सपने । उनके मन की बात जान ली लेकिन कही नहीं। अपने ही अनजाने हैं कुछ। मन का चोर कहां बसता है कौन बताएगा। पुनश्च – दिल टूटा अपनों से हुए बहुत मज़बूर यह कैसी सौगात रही । बुरे वक़्त में बेटी ही तो मर्यादा ढ़ोती। किंतु पिता सागर सा केवल वह विषपान किया करते हैं । आंखों के अंदर कण कोई चुभता जैसे शूल लगा है ।
बड़े छोटों के अंदर बहुत गहरी हुई खाई
इन्हें कैसे भरेंगे अब नहीं कुछ समझ में आई
अपने को समष्टि में समाहित करने की कला, जग की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझने की संवेदना ,लोगों का मन टटोलने की चेष्टा, यही कवि को तथा उसके कार्य को विशिष्टता प्रदान करता है ।डॉक्टर शिव बहादुर सिंह भदौरिया की मुझे एक पंक्ति याद आ रही है – “मैंने देखा है बिंधे शर से तड़पता हारिल, मेरे देखे को मेरा हाल न जाना जाए।” कितनी सहजता और खूबसूरती से जग में रहकर भी अपने को जग से अलग कर लिया। यही बात कबीर ने भी कही थी दास कबीर जतन से ओढ़ी, ज्यों कि त्यों धरि दीनी चदरिया ।
डॉक्टर रसिक किशोर सिंह नीरज समझते हैं तभी तो उन्होंने गूंगी पीड़ा को अपना स्वर देकर उसे जन-जन तक पहुंचाने का स्तुत्य प्रयास अपने गीतों और दोहों के माध्यम से किया है। उनके सभी गीत हृदयस्पर्शी हैं तथा अपने कर्तव्यों का पालन करने में सामर्थ्यवान हैं। विश्वासन था, मन का चोर कहां बसता है, सचमुच प्यार करो , जग दहता अंगार हो गया, मनहर दिन आये , मेरे गांव में आना जी, और भीग गई ममता के जल से, सबसे सुंदर बन पड़े हैं और जिन की गूंज एक लंबे अंतराल तक हृदय के द्वार पर सुनाई देगी। गीतों को दीप्ति प्रदान करते हुए ” एक एक एक” दोहे अपनी आभा से पूरी कृति को प्रकाश मई बनाएंगे।
मैं इन श्रेष्ठ कृतियों के प्रणयन के लिए डॉक्टर नीरज को आशीर्वाद तथा साधुवाद उनके ही एक दोहे को उद्धृत करते हुए दे रहा हूं– जगमग जगमग जग दिखा चकाचौंध में आज।
अंधकार लेकिन यहां अंतस गया विराज।।

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तंबाकू की हैवानियत / अशोक कुमार गौतम

“बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथहिं गावा।।”

(उत्तरकाण्ड- रामचरित मानस)

तंबाकू की हैवानियत

मानव रूप में जीवन पाना ईश्वर का दिया हुआ सबसे खूबसूरत उपहार है। जिसे सजा-संवार कर बनाए रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। तंबाकू के सेवन से हम अपना खुशहाल जीवन बर्बाद कर देते हैं। ‘नशा’ नाश की जड़ है, इस सूक्ति को भूलकर विभिन्न माध्यमों में तंबाकू खाते पीते हैं, जिससे असमय मृत्यु हो जाती है। विश्व के विभिन्न देशों में सन 1500 ई0 के बाद तंबाकू का सेवन प्रारंभ हो गया था। तब तंबाकू सिर्फ छोटे व्यापार का माध्यम हुआ करती थी। पुर्तगाल के व्यापारियों द्वारा भारत में सन 1608 ई0 में तंबाकू का पहला पौधा रोपा गया था। वह पौधा आज लगभग संपूर्ण भारत में लह-लहा रहा है। सन 1920 में जर्मन के वैज्ञानिकों ने तंबाकू से होने वाले कैंसर का पता लगाया था और सभी देशों को सचेत किया था। परंतु सन 1980 में तंबाकू खाने से होने वाले कैंसर की पुष्टि हुई है। निकोटियाना प्रजाति के पेड़ों के पत्तों को सुखाकर तंबाकू बनाया जाता है, जिसका प्रयोग सिगरेट, गुटखा, पान आदि के माध्यम से करते हैं। मध्यप्रदेश में तेंदू के पत्तों से बीड़ी बनाई जाती है जिसके अंदर भी तंबाकू भरते हैं। तम्बाकू में निकोटीन पाया जाता है जो शरीर की नसों को शनैः शनैः ब्लॉक करने लगता है, जिससे चेहरे की चमक तक चली जाती है। मुँह भी पूरा नहीं खोल पाते हैं।
अखिल विश्व में तंबाकू का प्रयोग दो प्रकार से होता है- चबाकर खाना और धुंआ के द्वारा। दोनों ही प्रकार से तंबाकू द्वारा बने उत्पादों का सेवन करने से मुख में कैंसर, गले में कैंसर, फेफड़ों में कैंसर, हृदय रोग दमा आदि बीमारियाँ हो जाती हैं। ये बीमारियाँ अकाल जानलेवा बन जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) के सर्वे में विश्व में प्रतिवर्ष 60 लाख से अधिक लोगों की असमय मृत्यु का कारण तंबाकू है। इसके दुष्परिणामों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 31 मई सन 1988 को अंतरराष्ट्रीय बैठक करके यह निर्णय लिया कि तंबाकू सेवन की रोकथाम और निवारण के लिए प्रतिवर्ष 31 मई को ‘विश्व तंबाकू निषेध दिवस’ मनाया जाएगा। वर्ष 2008 में भारत सरकार ने तंबाकू से जुड़े विज्ञापनों पर रोक लगा दी तथा तंबाकू से जुड़े सभी उत्पादों जैसे गुटखा, बीड़ी, सिगरेट, पान में प्रयोग की जाने वाली तंबाकू आदि के पैकेट ऊपर बिच्छू का चित्र, मुंह में कैंसर वाली मानवाकृति छपवाने का आदेश दिया। इतना ही नहीं नशा से जुड़ी हर पाउच, पैकेट, बोतल पर स्लोगन भी लिखवाया जाता है कि तंबाकू सेवन/मदिरा सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
भारत सरकार ने सार्वजनिक स्थानों जैसे बस स्टेशन, रेलवे स्टेशन, चिकित्सालय, स्कूल, कॉलेज, विभिन्न कार्यालयों आदि में धूम्रपान करने पर अर्थदंड का प्रावधान किया है। साथ ही 18 वर्ष से कम आयु के लड़कों को तंबाकू से जुड़े उत्पादों की बिक्री पर रोक लगा दी गयी है। यदि देखा जाए तो धूम्रपान की शुरुआत अक्सर शौकिया लोग करते हैं, लेकिन शुरू में खुशी या गम का इजहार करने का शौक समय के साथ लत बन जाता है जो प्राणघातक है। आज की युवा पीढ़ी अपने शौक पूरा करने तथा दोस्ती को प्रगाढ़ बनाने के लिए धूम्रपान कर रही है। तंबाकू का सेवन किसी भी रूप में करना मीठा जहर है जिसके प्रति शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लड़के लड़कियां अधिक आकर्षित हो रही हैं। इसके दुष्परिणाम बहुत ही घातक होंगे। यह युवा पीढ़ी के लिए चिंता का विषय है।
सरकार विभिन्न विज्ञापनों में करोड़ों रुपए खर्च करती है जिससे तंबाकू से लोगों को छुटकारा मिले। एक सिगरेट पीने से 11 मिनट आयु कम होती है तथा विश्व में 6 सेकंड में एक मृत्यु तंबाकू से होने वाले कैंसर से होती है। तम्बाकू सेवन छुड़ाने के लिए आयुर्वेद को बढ़ावा दिया जाए, जिससे इस बीमारी और लत को रोका जा सके।
भारत में विडम्बना है कि नशा मुक्ति अभियान में करोड़ों रुपए खर्च करके आमजन को जागरूक करने का सार्थक प्रयास किया जाता है, किंतु ‘नशा’ से जुड़ी वस्तुओं और अन्य मादक पदार्थों के उत्पादन पर रोक नहीं लगाई जाती है? यह भी वास्तविकता है कि धूम्रपान/आबकारी विभाग से सरकार को राजस्व प्राप्त होता है, परन्तु मानव जीवन को खतरा में डालना भी अनुचित है। इसलिए हम जिम्मेदार नागरिकों को संकल्प लेना होगा कि न नशा करेंगे, न किसी को प्रेरित करेंगे। नशा न करने से घर की अर्थव्यवस्था सुदृढ होगी, साथ ही पारिवारिक स्नेह, आत्मीय सम्मान और शारीरिक, मानसिक बल मिलेगा।

         
सरयू-भगवती कुंज,
अशोक कुमार गौतम
(असिस्टेंट प्रोफेसर)
शिवा जी नगर, रायबरेली
मो. 9415951459

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हिंदी की घटती लोकप्रियता, बढ़ता जनाधार | Essay on Hindi Diwas in Hindi

हिंदी की घटती लोकप्रियता, बढ़ता जनाधार | Essay on Hindi Diwas in Hindi

हिंदी की घटती लोकप्रियता, बढ़ता जनाधार

हिंदी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन पाई है

भाषा के बिना समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। मजबूत और दृढ़ राष्ट्र की एकता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रभाषा का होना उतना ही आवश्यक है, जितना जीवित रहने के लिए आत्मा का होना आवश्यक है। हिंदी भाषा की जब भी बात होती है तो मन में 14 सितंबर हिंदी दिवस गूँजने लगता है, तत्क्षण बैंकिंग सेक्टर, आईसीएसई, सीबीएसई बोर्ड के स्कूल, सोशल मीडिया, हिंग्लिश का प्रचलन आदि की ओर ध्यानाकर्षण होने लगता है। हम सब मिलकर चिंतन करें कि आखिर 72 वर्ष बाद भी हिंदी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन पाई है? वोट की राजनीति या विभिन्न सरकारों में इच्छाशक्ति की कमी या क्षेत्रवाद? या भौतिकवादी समाज में खुद को श्रेष्ठ दिखाना? कारण कुछ भी हो, हम कह सकते हैं कि हिंदी अपने ही देश में बेगानी होती जा रही है। हिंदी का प्रत्येक व्यंजन और स्वर मुख्यतः अर्धचंद्र और बिंदी से बना है। यदि हम हिंदी लिखते समय सुकृत बिंदी और अर्धचंद्र का प्रयोग आवश्यकतानुसार करें, तो सभी वर्ण अति सुंदर तथा सुडौल बनेंगे। विश्व की सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत है, तत्पश्चात क्रमानुसार पालि> प्राकृत> अपभ्रंश तब हिंदी का उद्भव हुआ है।

सर्वप्रथम महात्मा गांधी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की पहल की थी

गुरु गोरखनाथ हिंदी के प्रथम गद्य लेखक माने जाते हैं। चंद्रवरदाई, जायसी, खुसरो, अब्दुल रहमान, रैदास, सूरदास तुलसीदास, बिहारी, मीराबाई, नाभादास आदि ने हिंदी में अपनी रचनाएं की है, जो आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल से हिंदी प्रचलन में होने का प्रमाण है। हिंदी के पुरोधा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सन 1903 में सरस्वती पत्रिका का संपादन किया, तब वे रेलवे में नौकरी करते थे। उसी वर्ष द्विवेदी जी ने राष्ट्रप्रेम और हिंदी के उत्थान के लिए नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। स्वतंत्र भारत से पूर्व सन 1918 ईस्वी में सर्वप्रथम महात्मा गांधी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की पहल की थी। भारतीय संविधान के भाग 17 में वर्णित अनुच्छेद 343 से 351 तक संघ की भाषा, उच्चतम तथा उच्च न्यायालयों की भाषा, प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा देने का वर्णन है। हम गर्व के साथ कहते हैं कि विश्वपटल पर हिंदी दूसरे पायदान पर है। दिनांक 10 जनवरी 2017 को दैनिक जागरण के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित शीर्षक ‘दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बनी हिंदी, के अंतर्गत मुंबई विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉक्टर करुणा शंकर उपाध्याय ने अपनी पुस्तक हिंदी का विश्व संदर्भ में यह उल्लेख किया है कि हिंदी विश्व पटल पर सर्वाधिक बोली जाती है।

सरकारी, गैर सरकारी कार्यालयों में जो व्यक्ति कार्यालयी कार्य हिंदी में करे, उसे अतिरिक्त वेतन, अतिरिक्त अवकाश तथा अहिंदी भाषी राज्यों में भ्रमण हेतु पैकेज दिया जाना चाहिए। हिंदी विषय के विभिन्न साहित्यकारों और अन्य ज्ञानोपयोगी बिंदुओं पर शोधकार्य होना चाहिए, जिसके लिए सरकार और विश्वविद्यालयों को पहल करनी होगी। हिंदी को प्रोत्साहन देने के लिए संपूर्ण भारत के सभी स्कूलों में हिंदी विषय में प्रथम श्रेणी प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को अन्य विद्यार्थियों की अपेक्षा अतिरिक्त छात्रवृत्ति, प्रशस्ति पत्र औऱ अधिभार अंक मिलना चाहिए, जिससे छात्रों का हिंदी प्रेम और मनोबल बढ़े। महानगरों की ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं वाले स्कूलों में छात्रों और अभिभावकों से हिंदी में ही वार्तालाप किया जाए। हिंदी को पाठ्यक्रम का एक हिस्सा मानकर नहीं, वरन मातृभाषा के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए।

हिंदी आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वैज्ञानिक शब्दावली की भाषा है

हिंदी आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वैज्ञानिक शब्दावली की भाषा है। जिसके उच्चारण कंठ, तालु, होष्ठ, नासिका आदि से निर्धारित अक्षरों में किए जाते हैं। ऐसा वैज्ञानिक आधार अन्य भाषाओं में नहीं मिलेगा। हिंदी में जो लिखते हैं, वही पढ़ते हैं- जैसे ‘क’ को ‘क’ ही पढ़ेंगे। अंग्रेजी में ‘क’ को सीएच, क्यू, सी, के पढ़ते या लिखते हैं। अखिल विश्व की प्रमुख भाषाओं में चीनी भाषा में 204, दूसरे स्थान पर हिंदी में 52, संस्कृत में 44, उर्दू में 34, फारसी में 31, अंग्रेजी में 26 और लैटिन भाषा में 22 वर्ण होते हैं। हिंदी की महत्ता और वैज्ञानिक पद्धति को समझते हुए देश में सर्वप्रथम बनारस हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी के आईआईटी विभाग ने अपने पाठ्यक्रम को हिंदी भाषा में पढ़ने-पढ़ाने की अनुमति प्रदान की है।

बड़े गर्व की बात है उच्च न्यायालय प्रयागराज के न्यायमूर्ति श्री शेखर कुमार यादव ने स्व का तंत्र और मातृभाषा विषयक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए अधिवक्ताओं से कहा कि आप हिंदी में बहस करें। मैं हिंदी में निर्णय दूँगा। साथ ही कहा कि 25 प्रतिशत निर्णय में हिंदी में ही देता हूँ।

विश्वविद्यालयों की वार्षिक/सेमेस्टर परीक्षाओं में वर्णनात्मक/निबंधात्मक प्रश्नोत्तर लगभग समाप्त करके बहुविकल्पीय प्रश्नपत्रों को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। इस विकृत व्यवस्था से नकल को बढ़ावा तो मिला ही, साथ-साथ विद्यार्थी के अंदर लिखने-पढ़ने का कौशल तथा भाषाई ज्ञान समाप्त हो रहा है। अब तो व्हाट्सएप की संक्षिप्त भाषा को विद्यार्थी अपने जीवन और लेखन में उतरने लगे हैं।जिसका संक्षिप्त प्रयोग न हिंदी का सही व्याकरणीय ज्ञान का बोध करा पा रहा है, न अंग्रेजी का। जैसे प्लीज को पीएलजेड, थैंक्स को टीएचएनएक्स, मैसेज को एमएसजेड लिखने का प्रचलन खूब चल रहा है। जो आने वाली पीढ़ी के लिए घातक है।

कोविड-19 का दुष्प्रभाव बच्चों पर बहुत पड़ा है। इसके कारण 2 वर्षों से वास्तविक, स्कूली और किताबी और प्रयोगात्मक पढ़ाई न हो पाने के कारण उत्पन्न हुई भाषाई, उच्चारण और व्याकरण की समस्या दूर करने के लिए शिक्षकों के साथ-साथ अभिभावकों को भी आगे आना होगा। अभिभावक गण अपने पाल्यों की कॉपियां देखें और त्रुटियों की ओर उनका ध्यानाकर्षण करें।

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हिंदी दिलों को जोड़ने वाली मातृभाषा।

अंग्रेजी व्यापारिक भाषा है तो हिंदी दिलों को जोड़ने वाली मातृ भाषा। हिंदी माँ है तो उर्दू मौसी और संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। इसका गहनता से अध्ययन करते हुए हिंदी भाषा को सशक्तिकरण के रूप में अपनाना होगा। प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाने का तात्पर्य यह नहीं है कि हिंदी पीछे है या कमजोर है। इस महत्वपूर्ण दिन को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाने का उद्देश्य है- हिंदी को सम्मान देना। इस सम्मान की गरिमा बनाए रखने के लिए देवनागरी लिपि हिंदी को यथाशीघ्र राष्ट्रभाषा घोषित किया जाना चाहिए।

कभी-कभी मैं स्वयं हतप्रभ रह जाता हूँ। 21 अगस्त सन 2021 को हिंदुस्तान समाचार पत्र में प्रकाशित खबर के अनुसार प्रवक्ता पद के प्रश्नपत्र में 90% व्याकरण सम्बन्धी और अक्षरों की त्रुटियां हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में इतनी अधिक त्रुटियाँ होना हम सब को कटघरे में खड़ा करता है।यह योग्यता में कमी या इच्छाशक्ति में कमी या हिंदी के प्रति दुर्व्यवहार दर्शाता है? आखिर हमारी शैक्षिक पद्धति कहाँ जा रही है। अंत में इतना ही कहना चाहूँगा।

सविता चड्डा की रचना धर्मिता एक अमूल्य निधि है – डा पुष्पा सिह बिसेन

साहित्य जगत में अपनी लेखनी के माध्यम से अपना स्थान एवं अपनी पहचान को जिस प्रकार से बनाने में सविता जी सफल हुई है वह बहुत ही कठिन है। बहुत ही कम आयु में नौकरी प्राप्त करना और वैवाहिक बंधन को आत्मसात करते हुए ,एक सफर की शुरुआत, जिसमें जीवन साथी के साथ साथ अनेक रिश्ते भी  होते हैं।  अपना परिवार एवं दफ्तर, सभी तरह से सामंजस्य और सत्य के साथ ,साहस से समाज के सरोकारों की बातें, स्त्री की स्थिति के संदर्भ में अनेक समस्याओं को उद्धृत करते हुए,  अपनी बात को सरल शब्दों में रखने का हुनर सभी में नहीं दृष्टिगत होता । इनकी अनेक पुस्तकों के अवलोकन से यह बात साबित हुई है कि लेखिका एक मंजी हुई साहित्यकार तो है ही साथ ही विदुषी स्त्री भी हैं।  अपने अनेक प्रिय कार्यों में लेखन इन्हें अति प्रिय है। 

अपने अनेक करीब 10-12 वर्षों के मुलाकात में हम लगभग 10-12 बार ही सविता जी से मिल पाए हैं लेकिन सविता जी के व्यक्तित्व की बात करें तो इनकी व्यवहार कुशलता, स्नेह और आत्मीयता का कोई जवाब नहीं। ” मैं और मेरे साक्षात्कार”  पुस्तक को पढ़ने से इनकी अनेक प्रकार की खूबियों को जानने का मौका मिला।  अनेक प्रश्न जटिल भी है लेकिन इतनी सहजता से उनके उत्तर को विस्तार पूर्वक देना, ज्ञान के भंडार की वह विशेषता है जो कम लोगों में पाई जाती है । 

मैं प्रोफेसर नाम नामवर सिंह और आचार्य निशांत केतु जी के सानिध्य में 25 वर्षों से रही । महिला रचनाकारों में सविता चड्ढा जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से बहुत ही ज्यादा प्रभावित रही । मैंने महिला साहित्यकारों में कृष्णा सोबती, प्रभा खेतान एवं बुशरा रहमान को समग्र पढ़ी हूं।  अनेक समस्याओं के संग ,जो भी इन सभी की लेखन धर्मिता है,  उससे अलग हटकर, अनेक विधाओं में जो पठनीय  सामग्री सविता जी ने साहित्य जगत को दी है, वह अद्भुत दिव्यतम है। साहित्य भी एक ऐसा सरोवर है कि जिस में डुबकी लगाकर हम सार्थक साहित्य लेखन को आत्मसात करते हुए उसके मर्म को समझ सकते हैं।

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अनेक सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं ने इन्हें इनके लेखन के लिए सम्मानित किया है। सविता जी को अगर मैं  साहित्य रतन कहूं तो यह गलत नहीं होगा ।  सविता जी मैं जन्मजात अनेक विलक्षण प्रतिभाओं के बीज अंश मौजूद रहे होंगे जिन्हें समय-समय पर  वात्सल्य की उर्जा ने अंकुरित कर पल्लवित पोषित किया होगा । यहां अगर मैं उनके पति भाई श्री सुभाष चंद्र जी की बात ना करूं तो यह अन्याय होगा क्योंकि एक साहित्य वटवृक्ष  को उनके प्रेम और सानिध्य ने विशाल बरगद का स्वरूप दिया है 

हां, सविता दीदी अपने साहित्य सृजन के साथ-साथ अपने मधुर व्यवहार एवं मितव्ययता के लिए भी प्रसिद्ध है । उनमें जो सहजता एवं सरलता का संसार है वह बहुत ही दुर्लभ है । द्वेष, ईर्ष्या का लेश मात्र भी समावेश नहीं है । सभी से अथाह प्रेम करती हैं और अपने व्यक्तित्व की जो छाप लोगों के दिलों में छोड़ती हैं वे सभी जानते हैं ।

वह सदैव अपने लेखन से हमारे साहित्य जगत को शिक्षाप्रद साहित्य देती रहती है । कलम की धनी सविता जी सदैव इसी प्रकार अपने आप को गतिमान रखते हुए प्रगति पथ पर अग्रसर रहेगी।  साक्षात्कार की इस पुस्तक में अनेक विद्वानों के द्वारा लिए उनके लिए गए साक्षात्कार के जो प्रश्न है वह बहुत ही स्पीक और सार्थक हैं । साहित्य की मर्यादा का ध्यान रखते हुए,  सवालों और जवाबों के दायरे में बहुत ही सच्चाई और आत्मीयता का बोध होता है । प्रश्नों की श्रृंखला के बीच  यदि स्वयं का स्वयं से तादात्म्य बैठाना और सहजता के साथ उत्तर देना रचनाकार के व्यक्तित्व को अद्भुत बनाता है । आप सभी जानते हैं इन्हें और उनकी साहित्यिक विशिष्टता एवं श्रेष्ठता को पहचानते हैं । तभी तो इस पुस्तक में एक भी विवादित प्रश्न नहीं है।  लेखिका अपनी दोनों आंखों मैं परिवार एवं साहित्य को रचाती  बसाती है तभी तो आज सफलता के उस मुकाम पर आप प्रतिष्ठित होती हैं जहां ना तो साहित्य को आपसे कोई शिकायत है और ना ही परिवार को कोई रंज । बहुत ही खुशहाल परिवार की बेटी और बहू है सविता जी।

 मैं यह दावे के साथ कह सकती हूं कि आज के 21वीं सदी में सविता चड्डा जी के जैसा सामाजिक सरोकार एवं वर्तमान समस्याओं को उद्धृत करते हुए कोई भी नहीं लिख रहा है । साहित्यिक गुट बदियों से दूर स्वयं को रखते हुए इन्होंने अपनी रचना धर्मिता को जो मुकाम दिया है वह एक मील का पत्थर है। अपनी कहानियों,कविताओं से ये समाज से जुड़ती हैं और उन्हें समस्याओं से उभारती भी हैं।

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एक बार आचार्य निशांत केतु जी के यहां साहित्यिक बातचीत के दौरान जब यह बात कही गई थी आज के समय में लुम बहुत ही सार्थक लेखन कर रही हो,  तब मैंने कहा कि आचार्य जी ऐसा नहीं है सविता जी का लेखन श्रेष्ठ है।  बोले कि नाम तो बहुत सुना हूं लेकिन कोई पुस्तक पढ़ा नहीं हूं, यह मेरा दुर्भाग्य रहा । जबकि नामवर बाबूजी  जानते थे सविता जी को और कहते भी थे व्यवसायिकता   के दौर में कुछ महिलाएं ही अच्छा लेखन कर रही हैं।  मैं स्वयं को सौभाग्यशाली समझती हूं कि मुझे एक ऐसी श्रेष्ठ रचनाकारा का  प्यार – दुलार प्राप्त होता रहता है । 

आज के दौर में अगर सविता जी जैसे लोग आपके  साहित्य सृजन में है तो समझिए आपको अच्छा और बेहतर साहित्य पढ़ने का मौका मिलेगा।  शिक्षाप्रद साहित्य हमारे समाज एवं राष्ट्र के उत्थान में अपना योगदान देते हुए उसके रचनाकार को सदियों सदियों तक जीवंत रखता है।  

सविता जी का संपूर्ण साहित्य हमारे साहित्य जगत के लिए अनमोल धरोहर है और हम  महिला लेखिकाओं के लिए एक साहित्यिक विरासत जिसे पढ़कर अगली पीढ़ी याद करेगी कि 21वीं सदी की महान विदुषी साहित्यकारा सविता चड्ढा जी की रचना धर्मिता एक ऐसी अमूल्य निधि है जो हमें संभालकर रखनी है सदियों सदियों तक ।

डॉ पुष्पा सिंह बिसेन 
वरिष्ठ साहित्यकार 
मोबाइल 9873338623

डॉ. अंबेडकर के राष्ट्रवादी विचार | Nationalism thoughts of Dr Ambedkar

डॉ. अंबेडकर के राष्ट्रवादी विचार | Nationalism thoughts of Dr Ambedkar

“जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता हांसिल नहीं कर लेते, कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वो आपके किसी काम की नहीं।”

– डॉ भीमराव अम्बेडकर

बाबा साहब डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का जीवन परिचय / Dr Bhim Rao Ambedkar Biography in Hindi

भारत रत्न, ज्ञानवान, दूरदृष्टा, अर्थशास्त्री, मुक्तिदाता, संविधान निर्माता, समता मूलक भाव रखने वाले, करुणा, मैत्री और बंधुत्व की भावना से परिपूर्ण बाबा साहब डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल सन 1891 को मध्य प्रदेश राज्य के इंदौर जिला में महू सेना छावनी में हुआ था। डॉ. अंबेडकर के पिता का नाम राम जी राव और माता का नाम भीमाबाई था। डॉ. अंबेडकर अपने पिता की चौदहवीं संतान थे। डॉ. अंबेडकर के अलावा उनके दो भाई बलवंत और आनंद राव तथा उनकी दो बहनें मंजुला और तुलसा ही जीवित रह पाई थी। डॉ. अंबेडकर जब मात्र 5 वर्ष के थे तभी उनकी माता भीमाबाई का निधन 1896 ईस्वी को हो गया था। बचपन में ही माता का साया सिर से उठ गया तब उनकी बुआ मीराबाई ने माँ की कमी नहीं होने दी और उनका लालन-पालन बड़े स्नेह से किया। अबोध बालक भीमराव के पिता राम जी राव सेना में सूबेदार पद से सेवानिवृत्त हो चुके थे। पिता ने मराठा विद्यालय में उनका दाखिला करा दिया। भीमराव अंबेडकर का जन्म अछूत (महार) जाति में होने के कारण प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए बहुत बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। उन्हें विद्या ग्रहण करने के लिए कमरे से बाहर (जहाँ जूता चप्पल उतारे जाते थे के पास) बैठकर पढ़ना पड़ता था। अन्य मराठा छात्र उनके साथ अमानवीय व्यवहार करते थे, किताब-कॉपी नहीं छूने देते थे। यहाँ तक अंबेडकर अपने हाँथों से घड़ा का पानी निकाल कर भी नहीं पी सकते थे, दूसरे विद्यार्थी दूर से पानी पिलाते थे। बाबा साहब उसी प्रकार स्कूल में दबकर रहते थे, जिस प्रकार 32 दाँतों के बीच जीभ रहती है। बालक भीमराव अंबेडकर अपने साथ हो रहे दुर्व्यवहार को सीने में दफन करके अपनी पढ़ाई की ओर ध्यान देते थे क्योंकि पढ़ने की असीम चेष्टा उनके अंदर विद्यमान थी। डॉ आंबेडकर जब 14 वर्ष के हुए तभी उनका विवाह 9 वर्ष की रमाबाई से कर दिया गया था। जैसे-जैसे अंबेडकर बड़े होते गए उनके जीवन में समस्याएं भी बढ़ती गई। जलती छुआछूत का प्रकोप आपको अपमानित करता था, लताड़ता था। वह जीवन जिया है आपने। आज की पीढ़ी तत्कालीन भारतीय समाज में निम्न जाति के प्रति घृणित और दूषित भावना की कल्पना भी नहीं कर सकती है।

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उदार प्रवृत्ति के बाबा साहब के जीवन में सबसे दुःखद समय तब आया जब उनकी प्रिय पत्नी जो हर समय सुख-दुःख में साथ खड़ी रहती थी, जिन्हें प्यार से रामू कह कर पुकारते थे वह बीमार हो गई और गरीबी के कारण इलाज न होने के कारण सन 1935 में स्वर्गवासी हो गईं। उस समय अंबेडकर ने खुद को अकेले महसूस किया। दुःख की इस घड़ी में टूट गए थे, हताश हो गए थे किंतु आपके अंदर एक अटूट विश्वास और अदम्य साहस था जिसके बल पर आपने स्वयं को वह जंग लड़ने के लिए तैयार किया जिसके लिए पृथ्वी पर आपका जन्म हुआ था। वह जंग थी ‘शूद्र स्वतंत्रता।’ अम्बेडकर जी ने 20 मार्च सन 1927 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के महाड़ स्थान पर दलितों के साथ चवदार तालाब में अपने हाँथ से पानी पीकर पानी का अधिकार प्राप्त किया था। 25 दिसम्बर सन 1927 को महाड़ तालाब के किनारे पुरुष सत्तात्मक और वर्ण के आधार पर भेदभाव करने वाला ग्रंथ मनुस्मृति का दहन किया था। मनुस्मृति में लिखा है- स्त्रीशूद्रो नाधीयताम अर्थात स्त्री औऱ शूद्र ज्ञान प्राप्त न करे।

मनुस्मृति के अनुसार अन्य वर्णों के लिए अपराध पर आर्थिक दंड का प्रावधान था, जबकि शूद्रों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान था- शतं ब्राह्मण मकृष्य क्षत्रियों दंडं अहर्ति। वैश्यों व्यर्थ शतं द्वेवा, शूद्रस्तु वधम अहर्सि। (मनुस्मृति 8/267)। मनुस्मृति के पदचिन्हों पर चलते हुए तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है- पूजिअ विप्र सील गुन हीना। शूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।। (अरण्यकाण्ड 1/34)

भारत में डॉक्टर अंबेडकर के जीवन में जातिवाद का ज़हर घोलने वाले हजारों दुश्मन चारों ओर मधुमक्खियों की तरह फैले हुए थे, किंतु आपकी प्रतिभा, नेक इरादे, प्रबल इच्छा शक्ति एवं ओजस्वी विचारधारा के आगे दुश्मन सदैव नतमस्तक थे। डॉ. अंबेडकर के विषय में हम कह सकते हैं कि यह संसार एक सौरमंडल की तरह है और आप उस सौरमंडल का सूर्य।
डॉक्टर अंबेडकर धन्य हैं जिनके पास अदम्य साहस, हिमालय पर्वत के समान दृढ़ संकल्पित इरादे जिन्हें डगमगाने की इस दुनिया में किसी के पास साहस न था। आपके आगे पूरा विश्व नतमस्तक हो गया था। इसी असीम ज्ञान के कारण समस्त मानव जाति का प्रेरणास्रोत बन गए।

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सन 1947 में जब भारत अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हुआ तब इस भारतीय लोकतंत्र को संचालित करने का कोई नियम व कानून नहीं था, इसलिए भारतीय संविधान जो विश्व का सबसे बड़ा संविधान और सबसे बड़ा लोकतंत्र को संचालित करता है को तैयार करने की किसी अन्य के पास योग्यता न थी, तब डॉ आंबेडकर को एक टीम के साथ इस नेक एवं बड़े महत्वपूर्ण कार्य के लिए उपयुक्त माना गया, किंतु सभी लोग किसी न किसी कारण से अलग हो गए। तब डॉ. अंबेडकर को सौंपी गई एक बड़ी जिम्मेदारी को अपनी कठोर मेहनत और लगन से निष्ठापूर्वक 18 घंटे लगातार काम करके बखूबी निभाया। इस बीच डॉक्टर अंबेडकर को मधुमेह हो जाने के कारण स्वास्थ्य खराब होने लगा फिर भी उन्होंने अथक प्रयासों के बाद 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में भारतीय संविधान पूर्ण किया। लगभग 6.4 करोड़ रुपये खर्च हुए। प्रारूप पर 114 दिन बहस चली। मूल संविधान में 22 भाग, 8 अनुसूचियाँ और 395 अनुच्छेद हैं। प्रमुख अंश विभिन्न देशों से भी लिए गए हैं। भारत का संविधान 26 नवम्बर सन 1949 को बनकर तैयार हुआ और 26 जनवरी सन 1950 को लागू हुआ। विश्व का सबसे बड़ा संविधान भारत का है। संविधान की मूल प्रति हिंदी और अंग्रेजी भाषा में हस्तलिखित है। भारतीय संविधान को राष्ट्रीय ग्रंथ की उपाधि दी गई है। उससे भारत का लोकतंत्र संचालित होता है और उसका सम्मान सभी भारतीय हृदय से करते हैं। दिन प्रतिदिन बिगड़ते स्वास्थ्य का इलाज महाराष्ट्र के एक अस्पताल में करा रहे थे। उन दिनों उनकी देखभाल करने वाला कोई जिम्मेदार व्यक्ति नहीं था अस्पताल की नर्स शारदा कबीर (ब्राम्हण) उनकी देखभाल जिम्मेदारी के साथ कर रही थी। इस कारण शारदा का स्नेह डॉक्टर अंबेडकर के प्रति बढ़ता गया और सन 1948 में नर्स के साथ अंबेडकर का विवाह संपन्न हो गया। विवाह बाद शारदा कबीर का नाम बदलकर सविता अंबेडकर नाम रखा गया।

डॉ. अंबेडकर प्रारंभ से ही हिंदू धर्म में समावेशित उन कुरीतियों और कुप्रथाओं के आलोचक रहे हैं, जो मानवता के खिलाफ थीं। हिंदू धर्म प्रारंभ से ही ऊँच-नीच में विश्वास करता रहा है जो मानवता के बिल्कुल प्रतिकूल है।शूद्र जातियों के साथ कुत्ते बिल्लियों से बदतर व्यवहार किया जाता था। शूद्र लोग जब पगडंडियों से निकलते थे तो कमर में झाडू, गले में मटका बाँधकर ही निकलते थे। अंबेडकर ने हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध आदि धर्मों का गहनता के साथ अध्ययन किया। अंततः आप बौद्ध धर्म से प्रभावित हुए और 14 अक्टूबर 1956 को 22 प्रतिज्ञा के साथ आपने अपनी पत्नी और लगभग 5,00000 अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया। डॉक्टर अंबेडकर बौद्ध धर्म के सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए श्रीलंका, म्यांमार गए। डॉ. अंबेडकर ने अपना अंतिम लेख ‘द बुद्ध एंड हिज धम्म’ सन 1956 में पूर्ण किया था। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान बुद्ध से है। डॉक्टर अंबेडकर बीसवीं सदी के सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में प्रसिद्ध हुए। डॉक्टर अंबेडकर एक विश्व प्रसिद्ध शख्सियत थे जिन्होंने गरीबों, वंचितों, महिलाओं, बच्चों मजदूरों आदि की आवाज बुलंद की। डॉक्टर अंबेडकर कहते थे शिक्षा वह शेरनी का दूध है जो पियेगा दहाड़ेगा इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि डॉक्टर अंबेडकर के अंदर ज्ञान की गंगा बहती थी। डॉक्टर अंबेडकर को अमेरिका में ज्ञान का प्रतीक Symbol of Knowledge कहा जाता है, तो वहीं भारत में दुर्भाग्य है कि आपके पुतले तोड़े जाते हैं, गाली दी जाती हैं और उन्हें अपमानित किया जाता है। डॉक्टर अंबेडकर किसी एक जाति के नहीं थे वरन सभी के उद्धारक थे किंतु अफसोस होता है छोटी जाति में पैदा होने के कारण उनके साथ समानता के व्यवहार आज भी नहीं किया जाता है।

सर्वविदित है उस समय शूद्र अछूत कहे जाने वाले समाज को शिक्षा अर्जित करना हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार दंडनीय व प्रतिबंधित था और धर्म का उल्लंघन भी। मान्यता थी कि मनुस्मृति के अनुसार शूद्र सिर्फ अपने जाति आधारित कर्म करेगा, इसके अलावा कुछ भी नहीं करेगा। जब डॉक्टर अंबेडकर को शिक्षा ग्रहण करने की बात आई तो सामंतवादी व्यवस्था प्रणाली में अंबेडकर को स्कूल में दाखिला लेने से इनकार कर दिया गया। उनके अंदर शिक्षा प्राप्त करने की असीम जिज्ञासा थी वह इसके लिए किसी भी रास्ते से गुजरने को तैयार थे। अंबेडकर साहब अपना पूरा ध्यान पठन-पाठन में लगाते थे, किंतु कक्षा के अन्य बच्चे उस अबोध निरीह बालक को अछूत महार कह कर उसके साथ अनुचित व्यवहार करते थे। डॉक्टर अंबेडकर अपने साथ ज्यादती को महसूस करते और सहन भी करते थे, किंतु उनका कोई साथी ही न होने कारण अपमान के कड़वे घूंट पीने के लिए मजबूर थे। उस दर्द को सीने में दफन कर लेते थे और अपने जीवन में लक्ष्य की ओर अग्रसर करते रहते थे। तनिक भी समय नष्ट नहीं करते थे। अंबेडकर ने मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। स्नातक परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की, तत्पश्चात पिता का देहावसान हो गया तब उन्हें एक बड़ा झटका लगा। वह दिन उनके जीवन का सर्वाधिक दुखद दिन था। आर्थिक समस्या से जूझ रहे अंबेडकर की शेष शिक्षा बाधित होने लगी थी लेकिन कहते हैं परिश्रमी का साथ ईश्वर भी देता है। तो अंबेडकर की प्रतिभा से प्रभावित होकर महाराष्ट्र के बड़ौदा नरेश सयाजी राव गायकवाड ने उनके आगे की पढ़ाई पूर्ण करने की जिम्मेदारी लेकर उन्हें 25 रुपये मासिक छात्रवृत्ति देने की घोषणा की, इस शर्त के साथ कि अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद 10 वर्ष बड़ौदा रियासत में सेवा करेंगे। डॉक्टर अंबेडकर ने आगे की शिक्षा, वकालत, शोधकार्य, डॉक्टरेट उपाधियाँ अमेरिका, लंदन, ओसामिया में जाकर पूर्ण किया। हमारे लिए बड़ा ही गौरवशाली व्यक्तित्व था जिसने देश-विदेश तक अपने ज्ञान का परचम लहराया। त्याग, परिश्रम व लंबे संघर्ष के बाद शिक्षा जगत में अपना अद्वितीय स्थान रखने वाले प्रथम भारतीय बन गए। डॉक्टर अंबेडकर के अंदर विद्यमान अपार ज्ञान सदैव अतुलनीय रहेगा क्योंकि आप स्वयं विश्व प्रेरक हैं। आपका कहना था जिस समाज में व्याप्त वर्षों पुराने कृतियों का अंत करना है तो व्यक्ति को पूर्ण शिक्षित होना पड़ेगा तभी सभी बुराइयों को नष्ट कर सकते हैं, इसलिए ‘शिक्षित बनो संगठित रहो।’ बाबा साहब स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री 15 अगस्त 1947 से सितंबर 1951 तक रहे। 29 अगस्त 1947 से 24 जनवरी 1950 तक मसौदा समिति के अध्यक्ष थे। 3 अप्रैल 1952 से 6 दिसम्बर 1956 तक राज्यसभा सदस्य थे।

भारत राष्ट्र को बाबा साहब की देन
(स्रोत : पुस्तक- भारतरत्न भीमराव अंबेडकर, लेखक डॉ एम.एल. परिहार, प्रकाशक बुद्धम पब्लिशर्स जयपुर)

  • रोजगार कार्यालय की स्थापना, कर्मचारी राज्य बीमा निगम,
  • काम का समय 12 घण्टे से कम करके 8 घण्टा,
  • महिलाओं को प्रसूति अवकाश, मंहगाई भत्ता,
  • अवकाश का वेतन,
  • हेल्थ इंश्योरेंस,
  • कर्मचारी भविष्य निधि,
  • श्रमिक कल्याण कोष,
  • तकनीकी प्रशिक्षण योजना,
  • सेंट्रल सिचाई आयोग का गठन
  • वित्त आयोग का गठन,
  • मतदान का अधिकार,
  • भारतीय सांख्यकीय कानून,
  • हीराकुंड बाँध,
  • दामोदर घाटी परियोजना,
  • ओडिशा नदी परियोजना,
  • भाखड़ा नागल बाँध,
  • भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना।


मधुमेह के कारण बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर का स्वास्थ्य बिगड़ता ही चला गया है और युगपुरुष डॉक्टर अंबेडकर 65 वर्ष की उम्र में 6 दिसंबर सन 1956 गुरुवार की रात चिरनिद्रा में हमेशा के लिए लीन हो गए। आपकी स्मृतियों को संजोने के लिए मुम्बई के चैत्यभूमि में भव्य समाधि स्थल बनाया गया है।

अशोक कुमार गौतम
असिस्टेंट प्रोफेसर (अध्यक्ष हिंदी विभाग)
शिवा जी नगर, दूरभाष नगर
रायबरेली (उप्र)
मो. 9415951459

भारतीय इतिहास में रामप्यारी गुर्जर कौन थी | Veerangana Rampyari Gurzar

भारतीय इतिहास में रामप्यारी गुर्जर कौन थी | Veerangana Rampyari Gurzar

कुछ छुपा – छुपा और अनकहा इतिहास। जब खोजने पर सामने आया। तो पता चला। की एक ऐसी वीरांगना भी थी जिन्होंने आपने देश के लिए सर्वत्र निछावर कर दुश्मन को खदेड़ दिया था उसका नाम था रामप्यारी गुर्जर तैमूर को अपना भारत विजय अभियान अपूर्ण छोड़ पलायन करने हेतु विवश करने वाली वीरांगना रामप्यारी गुर्जर

रामप्यारी गुर्जर का परिचय

सहारनपुर के एक चौहान गुर्जर परिवार में रामप्यारी गुर्जर का जन्म हुआ। कुशाग्र, बुद्धि और इच्छा शक्ति ने बाल अवस्था में ही ओजपूर्ण और तेजस्वी बना दिया था।

नैसर्गिक रूप से शक्ति और तेज भरपूर मात्रा में ईश्वर से मिला था। निर्भय और कर्मठ स्वभाव की, रामप्यारी अपनी मां से नित्य ही पहलवान बनने हेतु आवश्यक नियम जिज्ञासा पूर्वक पूछा करती थी और फिर प्रात: काल हो या संध्याकाल, वे नियमित रूप से किसी एकान्त स्थान में व्यायाम किया करती थी। नियमित व्यायाम, अथक परिश्रम और अनुशासित जीवन शैली से अत्यंत शक्तिशाली योद्धा बन कर उभरीं।

रामप्यारी सदैव पुरुषों के सदृश वस्त्र पहनती थी और अपने ग्राम और पड़ोसी ग्रामों में पहलवानों के कौशल देखने अपने पिता और भाई के साथ जाती थी|  रामप्यारी की योग्यता, शक्ति एवं कौशल की प्रसिद्धि शनैः शनैः आस पड़ोस के सभी ग्रामों में फैलने लगी। एक बालिका का इस तरह पहलवानी में रुचि लेना चर्चा का विषय ही था।

सन् 1398 उस समय भारतवर्ष पर तुग़लक वंश का शासन हुआ करता था, परंतु ये शासन नाममात्र का था, वह न तो उस समय शक्तिशाली थे और न ही सक्षम इसलिए उसका आधिपत्य कोई भी राजा स्वीकारने को तैयार नहीं था।

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तैमूर ने दिल्ली में मौत का मानो एक खूनी उत्सव सा मनाया

इसी समय आगमन हुआ समरकन्द के क्रूर आक्रांता अमीर तैमूर का, तैमूर के खड्ग और उसके युद्ध कौशल के आगे  दिल्ली का सुल्तान नसीरुद्दीन तुग़लक निरीह व दुर्बल सिद्ध हुआ और उसकी सेना पराजित हुई। नसीरुद्दीन तुग़लक को परास्त करने के पश्चात तैमूर ने दिल्ली में मौत का मानो एक खूनी उत्सव सा मनाया, जिसका उल्लेख करते हुये आज भी कई लोगों की आत्माएँ काप उठती है। दिल्ली में तैमूर ने लूट पाट मार काट मचा रखी थी। करीब एक लाख हिन्दुओं को मारकर उनके शीश से स्तभ बनाये थे। उसका अत्याचार दिन ब दिन ज्यादा हो रहा था और वह दिल्ली से आगे बढ़ने की मनशा में था। दिल्ली को क्षत विक्षत करने के उपरांत तैमूर ने अपनी क्रूर दृष्टि हिंदुओं और उनके तीर्थों की ओर घुमाई।

जाट क्षेत्र के तत्कालीन प्रमुख देवपाल ने महापंचायत का आयोजन किया

तैमूर की मनसा की जानकारी जब जाट क्षेत्र में पहुँची, (जाट क्षेत्र में आज का हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ भाग आते हैं।) जाट क्षेत्र के तत्कालीन प्रमुख देवपाल ने महापंचायत का आयोजन किया। इस महापंचायत में जाट, गुर्जर, अहीर, वाल्मीकि, राजपूत, ब्राह्मण एवं आदिवासी जैसे अनेक समुदायों के सदस्य शामिल थे , जिसमें अस्सी हज़ार पुरुष यॊद्धाओं का नेतृत्व महाबली जॊगराज सिंह ने किया । महापंचायत में देवपाल ने न केवल तैमूर के अत्याचारों को सबके समक्ष उजागर किया, अपितु वहाँ उपस्थित सभी समुदायों से यह निवेदन किया कि वे अपने सभी मतभेद भुलाकर एक हों, और तैमूर को उसी की भाषा में जवाब कर न केवल सनातन समुदाय की रक्षा करें, वरन समूचे भारतवर्ष के लिए एक अनुपम उदाहरण पेश करने की बात रखी।

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महापंचायत ने सर्व समाज की एक सेना तैयार की

अपने देश, जाति के लिए कुछ करने का यह सुअवसर कोई भी अपने हाथ से जाने देना नहीं चाहता था। अंतत : सभी समुदायों की सहमति से महापंचायत ने तैमूर की सेना से छापामार युद्ध लड़ने की रणनीति बनायीं।  इस हेतु  महापंचायत ने सर्व समाज की एक सेना तैयार की, जिसमें इस महापंचायत सेना के ध्वज के अंतर्गत 80,000  योद्धा शामिल हुए थे। इस कार्य को करने के लिए बढ़-चढ़कर लोग भाग ले रहे थे।

सेनापति नियुक्त हुई रामप्यारी गुर्जर

महिलाएँ फिर क्यों पीछे रहने वाली थी, उन्हें समर्थन देने हेतु चालीस हजार अतिरिक्त सैनिकों की टुकड़ी तैयार कर ली, जिसमें सभी महिला सदस्य थी, और उनकी सेनापति नियुक्त हुई रामप्यारी गुर्जर। वहीं मुख्य सेना के प्रमुख थे महाबली जोगराज सिंह गुर्जर और उनके सेनापति थे वीर योद्धा हरवीर सिंह गुलिया।

चाकचौबंद पहरेदारी के तहत तैमूर को मुंह की खानी पड़ रही थी

सेना को सशक्त बनाने और सुनियोजित योजना के अंतर्गत पाच सौ युवा अश्वारोहियों को तैमूर की सेना पर जासूसी हेतु लगाया गया, जिससे उसकी योजनाओं और भविष्य के आक्रमणों के बारे में पता चल सके। यदि तैमूर एक स्थान पर हमला करने की योजना बनाता, तो उससे पहले ही रुग्ण, वृद्धजनों और शिशुओं को सुरक्षित स्थानों पर सभी मूल्यवान वस्तुओं सहित स्थानांतरित कर दिया जाता। चाकचौबंद पहरेदारी के तहत तैमूर को मुंह की खानी पड़ रही थी, इतनी चतुराई से इतिहास में कोई युद्ध नही लड़ा गया।

रामप्यारी गुर्जर जैसी अनेकों वीर महिलाओं ने जिस तरह तैमूर को नाकों चने चबवाने पर विवश किया, वो अपने आप में असंख्य भारतीय महिलाओं हेतु किसी प्रेरणास्त्रोत से कम नहीं होगा। यह युद्ध कोई आम युद्ध नहीं था, अपितु अपने सम्मान, अपने संस्कृति की रक्षा हेतु किया गया एक धर्मयुद्ध था, जिसमें जाति , धर्म सबको पीछे छोडते हुये हमारे वीर योद्धाओं ने एक क्रूर आक्रांता को उसी की शैली में सबक सिखाया। यह युद्ध इतिहास में इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें लिंग भेद नहीं था , बराबर की जिम्मेदारियाँ दी गई थी और बढ़ चढ़ कर हर एक ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया था। इस युद्ध में महिलाओं ने अपने नेतृत्व में अपनी शक्तियों का प्रदर्शन भरपूर किया था क्योंकि उन्हें संगठित करने वाली रामप्यारी गुर्जर स्वयं समर्पित योद्धा थी।

भारत में तैमूर के अभियान का मुख्य उद्देश्य

ब्रिटिश इतिहासकार विन्सेंट  ए स्मिथ द्वारा रचित पुस्तक ‘द ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ इंडिया : फ्रोम द अर्लीएस्ट टाइम्स टू द एण्ड ऑफ 1911’ की माने तो भारत में तैमूर के अभियान का मुख्य उद्देश्य था: सनातन समुदाय का विनाश कर भारत में इस्लाम की ध्वजा लहराना । जब तुग़लक वंश को धाराशायी करने के पश्चात तैमूर ने दिल्ली पर आक्रमण किया था, तो उसने उन क्षेत्रों को छोड़ दिया, जहाँ मुसलमानों की आबादी ज़्यादा था, और उसने केवल सनातन समुदाय पर निशाना बनाया।

सैफ्रन स्वोर्ड्स (Saffron Swords: Centuries of Indic Resistance to Invaders) जिसकी लेखिका हैं मनोशी सिंह रावल, इसमें 51 ऐसे हिन्दू वीरों की कथाएँ हैं जिन्होंने इस्लामिक आताताईयों और ब्रिटिश लूटेरों के अजेयता के दंभ को करारा झटका किया था।

FAQ

इस पुस्तक की लेखिका हैं मनोशी सिंह रावल, इसमें 51 ऐसे हिन्दू वीरों की कथाएँ हैं जिन्होंने इस्लामिक आताताईयों और ब्रिटिश लूटेरों के अजेयता के दंभ को करारा झटका किया था।

सनातन समुदाय का विनाश कर भारत में इस्लाम की ध्वजा लहराना । जब तुग़लक वंश को धाराशायी करने के पश्चात तैमूर ने दिल्ली पर आक्रमण किया था, तो उसने उन क्षेत्रों को छोड़ दिया, जहाँ मुसलमानों की आबादी ज़्यादा थी , और उसने केवल सनातन समुदाय पर निशाना बनाया

वीरांगना रामप्यारी गुर्जर

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका | Role of Women in Indian Independence Movement in Hindi

किसी भी राष्ट्र के सुदृढ़ ढाँचे, उस राष्ट्र के निर्माण और रख-रखाव में जितना हिस्सा पुरुष वर्ग का है उतना ही बल्कि उससे भी कहीं अधिक नारी वर्ग का होता है। प्रश्न उठ सकता है कि चलो बराबर तो हुआ परन्तु अधिक कैसे हो गया? तो इसे आप यूँ समझ सकते हैं कि चाहे नारी किसी क्षेत्र में सक्रिय न भी रहे तो भी पुरुष की सफलता के पीछे स्त्री हर समय उपस्थित अवश्य ही रहती है। पुरुष वर्ग भी समर्पित भाव से कहीं भी कार्य तभी कर सकता है जब वह अपने दायित्वों के प्रति निश्चिंत हो जाए, परन्तु बड़े-बड़े विद्वान भी इस सत्य से इनकार नहीं कर सकते कि किसी भी राष्ट्र के निर्माण में स्त्री की ही मुख्य भूमिका रहती है। पुरुष का नम्बर तो उसके बाद आता है।

मनुष्य के जन्म से भी पूर्व नारी की भूमिका गर्भवती माँ के रूप में प्रारम्भ हो जाती है।

फिर बालक का जन्म और लालन-पालन और उसकी शिक्षा। शिशु जो समाज का भावी कर्णधार होता है, माँ के अभाव में कई प्रकार की कुण्ठाओं का शिकार हो जाता है, जबकि एक नारी के हाथों पले-पनपे बालक स्वस्थ, सभ्य और सुसंस्ड्डत नागरिक बनते हैं। जिस बालक का लालन-पालन माँ के दुलार के अभाव में हुआ हो उस में कोमल भावनाओं का अभाव रहता है। वैसे तो आज के मशीनी युग में सारे समीकरण बदलते जा रहे हैं फिर भी जिस बच्चे को विदुषी माँ का संरक्षण प्राप्त होता है उसे उदारता और बुद्धिमत्ता की देन माँ से मिली होने के कारण उस बालक को सभ्य नागरिक होना ही होता है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण शिवाजी मराठा की माता जीजाबाई का पालन-पोषण है। कहा यह जाता है कि विदेशी शासकों से देश को स्वतन्त्र कराने का प्रण जीजाबाई ने ही लिया था। अपने इसी प्रयोजन को सामने रखकर उसने बालकपन से ही शिवाजी को लक्ष्य निर्धारित शिक्षा से समृद्ध किया और मुगलों से टक्कर लेने के योग्य बनाया। सम्राट अकबर के लालन-पालन और शिक्षा में उसकी धाय माँ माहिम का सबसे बड़ा हाथ माना जाता है।

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नारी के सहयोग का दूसरा चरण है शिक्षा

सृष्टि का सबसे बड़ा सत्य यही है कि बालक का पहला गुरू माँ होती है। बालक के होंठ हिलते ही माँ उसे बोलना सिखाती है। विद्वानों का कथन है कि मनुष्य वही बनता है जैसे उसके संस्कार होते हैं और संस्कार उसे अधिकतर घर से अर्थात् माँ से प्राप्त होते हैं। गृहस्वामिनी शिक्षित और सुसंस्ड्डत हुई तो वह अपने बच्चे को कभी बिगड़ने नहीं देगी। सुप्रसिद्ध लेखक और क्रान्तिकारी यशपाल यह मानते हैं कि उनको देशभक्ति की शिक्षा उनकी माँ ने ही दी थी। लालबहादुर शास्त्री की माता ने भी उन्हें अपने देश की रक्षा और सेवा की प्रेरणा दी थी। इससे यह सिद्ध होता है कि माँ अर्थात् नारी ही राष्ट्र के निर्माण और उत्थान में पहला पड़ाव होती है। वह देखती है कि उसका बच्चा किन लोगों के साथ उठ-बैठ रहा है। क्या कर रहा है और क्या नहीं। अतः नींव का पत्थर बनी नारी राष्ट्रनिर्माण में उसे सुदृढ़ आधार देती है।

भारत को स्वतंत्रता प्राप्त किए हुए शताब्दी पूरी होने में कुछ ही वर्ष बाकी रह गए हैं। शताब्दियों तक परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े रहने और विदेशियों के अत्याचार सहने के बाद, हजारों नहीं लाखों बलिदानियों के बलिदान के बाद हमारा देश विदेशी आक्रान्ताओं के चंगुल से बाहर निकल पाया है। अन्तिम और निर्णायक लड़ाई में नेता जी सुभाष, भगतसिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद और अशफ़ाक उल्लाह जैसे हज़ारों देशभक्तों के बलिदान की भागीदारी के साथ इस आन्दोलन में भारत के हर नागरिक का बहुमूल्य योगदान रहा है।

कुछ लोग यह भी कहते सुने जा सकते हैं कि हम पीछे पलट कर देखते रहते हैं परन्तु अपने गौरवमय अतीत को याद रखना हर देश के नागरिक का प्रथम कर्तव्य होता है। जो देश अपने गौरवमय अतीत को भुला देता है उसका पतन अवश्यम्भावी होता है। अतः हमें देश को स्वतंत्र कराने वाली विभूतियों के प्रति श्रद्धावनत होना ही चाहिए और उनके बलिदान के लिए उन्हें याद रखना और उनके पदचिन्हों पर चलना हमारा दायित्व बन जाता है। हमें हर समय सावधान रहकर देखना चाहिए कि कहीं हम अपनी स्वतंत्रता की नींव में रखी उस सुदृढ़ आधारशिलाओं को विस्मृत तो नहीं करते जा रहे हैं?

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लड़ाई के तीन कारण होते हैं, ‘जर, जोरू और ज़मीन

अरबी की कहावत है कि लड़ाई के तीन कारण होते हैं, ‘जर, जोरू और ज़मीन।’ इन तीन ‘ज़’ में से ज़मीन अर्थात धरती (या देश भी कह सकते हैं) आदिकाल से ही युद्धों का कारण बनते रहे हैं। जब भी कोई देश परतन्त्र होता है अर्थात् मातृभूमि किसी विदेशी सत्ता के हाथ में चली जाती है तो शेष दोनों ‘ज’ (जर और जमीन जैसी बेजान सम्पदा के साथ जोरू अर्थात् स्त्री भी) अपने आप लड़ाई का हिस्सा बन जाते हैं। स्त्री, जिसके पास चेतना सहित दिल और दिमाग भी होता है, गुलामी की जंजीरें काटने के लिए पुरुषों के कन्धे से कन्धा मिलाकर हुंकार कर उठती है और ऐसी हर हुंकार किसी भी आन्दोलन में नए प्राण फूंकने का काम करती है।
शताब्दियों पूर्व मुस्लिम शासकों की गुलामी को स्वीकार न करके उनसे टक्कर लेने और बलिदान देने वाली वीरांगनाओं में राजपूताने के नारी वर्ग का ही नाम इतिहास में उजागर है, किन्तु अंग्रेज शासकों के अन्यायी शासन के विरोध में पूरे भारत का ही नारी वर्ग जाग उठा था। न सिर्फ जाग उठा बल्कि पूरे जोर-शोर से उनकी दहाड़ की गूँज ही थी जो अंग्रेजी शासन के सिंहासन को हिला देने वाली सिद्ध हुई।

सब जानते हैं कि व्यापार करने आई चालाक अंग्रेज जाति जब अपने छल-बल से विखण्डित भारतीय शासकों की फूट का लाभ उठाते हुए स्वयं शासक बन बैठी तो उसकी लिप्सा ने उसे पूरे भारत को हड़पने के लिए उकसाया और कोई न कोई बहाना बनाकर छोटी-छोटी रियासतों को हड़पने का एक कार्यक्रम बना लिया। उस समय अंग्रेजी सत्ता के विरोध में उभरने वाला असंतोष का पहला नारी स्वर जो अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ उभरा, वह झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का था। लक्ष्मीबाई का नाम कोई अकेला नाम नहीं था, अपितु उसके साथ उसकी पूरी नारी सेना थी। इस संदर्भ में उनकी विशेष परामर्शदात्री झलकारी बाई का नाम बड़े गर्व से लिया जा सकता है। इनकी विशेष सहयोगी मोती बाई (नर्तकी) का नाम लिया जाता है, जिन महिला रत्नों ने अन्तिम साँस तक महारानी का साथ निभाया।

झांसी से उठने वाला विदेशी सत्ता के विरुद्ध खुला विद्रोह ही स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम रूप-रेखा बना

झांसी से उठने वाला विदेशी सत्ता के विरुद्ध खुला विद्रोह ही स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम रूप-रेखा बना, जिसे प्रथम स्वर दिया एक नारी ने। निःसंदेह नारी की स्वतंत्रता संग्राम में यह उल्लेखनीय भूमिका रही है। स्वतंत्रता संग्राम में सन् 57 में चमकने वाली इस पुरानी तलवार के ताल पर बुंदेलखण्ड में गूँजता झांसी की रानी का यशगान ही उनकी अमर कथा कहता है। ओजस्वी कवियत्री श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान के शब्दों में-

‘‘चमक उठी सन् सत्तवन में, वह तलवार पुरानी थी
खूब लड़ी मरदानी, वह तो झांसी वाली रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मरदानी, वह तो झांसी वाली रानी थी।’’

इस पुरानी तलवार के पीछे जो फौज थी, उसके बहुत से महत्वपूर्ण पदों पर महिलाएँ तैनात थीं, जिन्होंने अंग्रेजों को छटी का दूध याद दिया दिया था। इसमें रानी के तोपखाने पर तैनात दो बहनों के नाम बड़े ही गर्व से लिए जाते हैं। झलकारी रानी की अंगरक्षक थी। रानी लक्ष्मीबाई के गम्भीर रूप से घायल होने पर उनका छत्र और मुकुट लगाकर झलकारी ने अंग्रेजों को तब तक भ्रम में रखा जब तक रानी की समाधि नहीं बन गई। अन्त में झलकारी के पति के वीरगति प्राप्त करने पर ही अंग्रेज सच्चाई को जान पाए, परन्तु वे उसे झुका नहीं सके। इतने लम्बे समय तक अंग्रेज फौजों से लड़ना कोई हँसी-ठट्ठे का काम नहीं था जिसे झलकारी बाई ने अन्तिम साँस तक बड़े दम-खम से निभाया और अन्त में वीरगति को प्राप्त हुई।

रानी की मृत्यु के साथ ही इस महायज्ञ की अग्नि मन्द तो अवश्य ही पड़ गई परन्तु बुझी नहीं और समय पाकर फिर भड़क उठी। अब तक तो अंग्रेजों ने भारत की अर्थ व्यवस्था नष्टप्रायः कर दी थी। पं. जवाहर लाल नेहरू के शब्दों में ‘‘यह व्यवस्था भारत की किसी भी आवश्यकता की पूर्ति नहीं करती। यह न ही देश के काम की है और न ही आम जनता के हित में है।’’ नेहरू जी ने अपनी पुस्तक ‘वीमेंस ऑफ़ इण्डिया’ में लिखा है, ‘उनकी (अंग्रेज़ शासकों की) इच्छा थी कि वही नीति चलाई जाए जिससे भारतीयों को अधिक से अधिक दबाया जा सके और शासक वर्ग का हितसाधन हो।’ अंग्रेजों के इन कुचक्रों के बाद भी अत्यल्प मात्रा में ही सही परन्तु भारतीय नारी ने स्वतंत्रता संग्राम की मुख्य धारा से जुड़ने का प्रयास जारी रखा था।

पहला नारी-स्वर जुड़ा वह बम्बई के एक सम्पन्न पारसी घराने की चौबीस वर्षीय युवती ‘श्रीमती भीकाजी कामा’

महात्मा गाँधी और सुभाष चन्द्र बोस जैसे नेता स्वतंत्रता की मशाल लेकर इस महासंग्राम की रणभूमि में उतर चुके थे। इनका साथ देने के लिए चारों ओर से जन समुद्र उमड़ा पड़ रहा था, ऐसे में उनकी हुंकार में अपना स्वर मिलाने से भारतीय नारी भला कैसे पीछे रह सकती थी? इस हुंकार में जो पहला नारी-स्वर जुड़ा वह बम्बई के एक सम्पन्न पारसी घराने की चौबीस वर्षीय युवती ‘श्रीमती भीकाजी कामा’ का था। देश की स्वतंत्रता के संग्राम में हिस्सा लेने से इस सम्पन्न महिला को कोई भी सुख-सुविधा न रोक सकी। श्रीमती कामा अपने संकल्प को निभाने के लिए कांग्रेस से आ मिलीं। आगे चलकर इसी विदुषी वीरांगना ने भारत को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में तिरंगा दिया। यह झण्डा भीकाजी कामा के मस्तिष्क की उपज के फलस्वरूप हमारे सामने आया है। अन्तर केवल इतना है कि भीकाजी कामा के बनाए झण्डे के मध्य में चरखा कातती महिला हुआ करती थी और आज हम वहाँ अशोक चिन्ह देखते हैं।

पंडित जवाहरलाल नेहरू के अनुसार श्रीमती ऐनी बेसेंट एक विस्फोटक शक्ति के रूप में उभरीं। इस समय राष्ट्रीय जागरण दक्षिण की महिलाओं में भी काफ़ी जोर पकड़ चुका था। रामाबाई रानाडे, पं. रामाबाई, सरोजनी नायडू, लेडी बोस, पं. विजया लक्ष्मी, अरुणा आसिफ़ अली, अवंतिका बाई और कमला देवी आदि जाने कितने ऐसे नाम हैं जिन्होंने देश के स्वतंत्रता संग्राम में सुनहरे पृष्ठ जोड़े। इन साहसी महिलाओं और दबंग सेनानियों का सहयोग पुरुषों के बलिदानी साहस और मनोबल को सहस्रगुना बढ़ाने में अवश्य ही सक्षम रहा है इसमें कोई भी संदेह नहीं है।

1917 में श्रीमती कोसीन के नेतृत्व में प्रथम आधुनिक महिला संगठन अस्तित्व में आया

इस काल खण्ड में महिलाओ की अग्रणी भूमिका रहने और आगे बढ़ कर काम करने के बाद भी इनका अपना अलग कोई संगठन तब तक नहीं बन पाया था। वे पुरुषों के साथ मिलकर काम कर रही थीं। किन्तु पर्याप्त मात्रा में महिलाओं के स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ने के कारण अलग महिला दल की आवश्यकता को अनुभव करते हुए 1917 में श्रीमती कोसीन के नेतृत्व में प्रथम आधुनिक महिला संगठन अस्तित्व में आया। महिला संगठन के बनते ही इस ‘चुम्बकीय व्यक्तित्व’ के आकर्षण में हजारों की संख्या में साहसी महिलाएँ खिंची चली आईं।
सन् 1919 में प्रथम महिला दल डॉ. सरोजनी नायडू के नेतृत्व में सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट मोंटगू से मिला। अभी तक महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था, न ही वे राजनीति में भाग ले सकती थीं। डॉ. सरोजनी नायडू ने मोंटगू के सामने यह प्रस्ताव रखा कि व्यस्क मताधिकार के तहत महिलाओं को भी राजनीति में भाग लेने और वोट देने का अधिकार मिलना चाहिए किन्तु ब्रिटिश सरकार ने इनकी इस उचित माँग को अस्वीकार कर दिया।

सरोजनी नायडू अकेली ही तो नहीं थीं, भारत की सैकड़ों, हजारों ही नहीं अपितु लाखों महिलाएँ उनके साथ थीं, अतः ब्रिटिश सरकार को आखिर झुकना ही पड़ा। अधिकार देने के बाद भी चालाक शासक ने उसमें छिद्र रख ही लिया, क्योंकि यह अधिकार केवल करदाताओं को ही दिया गया। परिणाम स्वरूप जब चुनाव हुए तो बहुत कम महिलाएँ ही चुनी गईं। इस प्रकार इस तरह मात्र कुछ ही महिलाओं को उभरने का अवसर मिला।

इतना सब होने के बाद भी स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों में महिलाओं की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही गई। श्रीमती कामदार, अवंतिका बाई गोखले, कमलम्मा, सत्यवती, कृष्ण देवी पंजीकर, जयश्री राजा जी, हंसा महतो, पेरिन कप्तान, नीलावती मुंशी, मनीबेन, देव महत्रे बहनें और ऐसे ही अनगिनत नाम हैं जिन्होंने अपने बलिदान से देश के इतिहास का एक सुनहरा अध्याय लिखा है। मद्रास की सबमनी लक्ष्मीपति नमक सत्याग्रह में नेता रही हैं। स्वयं श्रीमती कस्तूरबा गाँधी का योगदान भी जीवन पर्यन्त रहा।

भारत में भारतवासियों का शासन स्थापित कराने में हमें बहुत से विदेशियों का सहयोग भी प्राप्त था। वे सभी अंग्रेजों के कुशासन चक्र में पिसते हुएपीड़ित भारतीयों के प्रति संवेदनशील थे। यहाँ की गरीबी अशिक्षा और पारम्परिक रूढ़ियों को कारण मानकर इन राष्ट्रभक्त विदेशियों ने, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को त्वरा, प्रोत्साहन और सक्षमता प्रदान की। इसमें विदेशी मूल आयरलैण्ड की एक महिला स्वामी विवेकानन्द जी को मिलीं। स्वामी जी ने उनका ‘सिस्टर निवेदिता’, नया नामकरण किया। निवेदिता ने स्वामी जी से दीक्षा लेकर उनको अपना गुरु माना और भारतवासियों की हर प्रकार मदद की।

दुर्गा भाभी का नाम कौन नहीं जानता

दुर्गा भाभी का नाम कौन नहीं जानता। सरदार भगतसिंह को बचाने के लिए वे स्वयं अपनी और अपने पुत्र तक की जान पर खेलकर उन्हें सुरक्षित निकाल ले गईं और अन्तिम समय तक अपने पति की इच्छाओं का सम्मान करते हुए देश रक्षा और स्वतंत्रता के युद्ध में संलग्न रहीं। नेता जी सुभाष की आजाद हिन्द फौज की कैप्टन लक्ष्मी सहगल और अन्य महिलाएँ वाहिनी में अपनी जान पर खेलती रहीं।

हिमाचल प्रदेश के राजा भवानी सेन की तीसरी पत्नी रानी खैरागढ़ी क्रान्तिकारियों को भरपूर धन देकर उनकी सहायता करती रहीं और अपना बस चलते तक उन्होंने उन क्रान्तिकारी वीरों को सुरक्षा प्रदान की जिन्हें बाद में पकड़े जाने पर काले पानी भेज दिया गया।

सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी लेखनी और अहिंसात्मक आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाई। महारानी जिन्दा ने अपना अन्तिम समय रंगून की जेल में ही गुजारा। भारत के विभिन्न भागों से इसके भी अतिक्ति चीन्हें-अनचीन्हें अनेक नारी रत्नों ने स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेकर स्त्री जाति को गौरवान्वित किया है। अतः हम सगर्व कह सकते हैं कि हमारे स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेकर भारतीय नारी के इतिहास को गौरवान्वित और समृद्ध किया है।

पंडित नेहरू ने अपनी पुस्तक ‘वीमेंस ऑफ़ इण्डिया’ में लिखा है कि ‘स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का योगदान स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है।’ शिक्षित वर्ग तो एक ओर, हज़ारों, लाखों अनपढ़, अशिक्षित और अपरिपक्व नारियों ने देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत होकर अदम्य साहस और विलक्षण सूझ-बूझ का परिचय दिया है।

नशे की हर वस्तु को नष्ट और बरबाद करने का इन्होंने प्रण कर लिया। चाहे जहाँ इन्हें महुआ आदि मादक द्रव्य बनाने वाले पेड़ मिलते, उन्हें काट डालतीं। किसी चुनौती, किसी बाधा को मानने के लिए ये ग्रामीण संगठन तैयार नहीं थे। इस प्रकार भारत को सुखी एवं समृद्ध बनाने का यह संघर्ष भारत के स्वतंत्र होने तक चलता ही रहा, अनवरत, अबाध।

आज जिस स्वतंत्रता का हम उपयोग अथवा उपभोग कर रहे हैं, वह इन्हीं विदुषी दबंग और बलिदानी वीरांगनाओं के रक्तकणों से सुसज्जित है। स्वतंत्र भारत में इस पूजनीय मातृशक्ति को नमन करने और इनके पदचिन्हों पर चलने का यदि हम प्रयास भर भी कर लेते हैं तो हमारा जीवन सार्थक हो जाता है।

FAQ

सरदार भगतसिंह को बचाने के लिए वे स्वयं अपनी और अपने पुत्र तक की जान पर खेलकर उन्हें सुरक्षित निकाल ले गईं और अन्तिम समय तक अपने पति की इच्छाओं का सम्मान करते हुए देश रक्षा और स्वतंत्रता के युद्ध में संलग्न रहीं।

श्रीमती कामदार, अवंतिका बाई गोखले, कमलम्मा, सत्यवती, कृष्ण देवी पंजीकर, जयश्री राजा जी, हंसा महतो, पेरिन कप्तान, नीलावती मुंशी, मनीबेन, देव महत्रे बहनें और ऐसे ही अनगिनत नाम हैं जिन्होंने अपने बलिदान से देश के इतिहास का एक सुनहरा अध्याय लिखा है।

दूसरा जलियांवाला बाग़ हत्याकांड रायबरेली का किसान आंदोलन

बहुत ही सच्ची घटनाएं इतिहास के पन्नों में आज भी दफन है। यदि इनका सूक्ष्मता से अध्ययन किया जाए तो निश्चित रूप से भारत वर्ष सोने की चिड़िया नजर आएगा, परंतु भौतिकवादी युग में ऐतिहासिक धरोहरों से इंसान का सरोकार निरंतर घटता ही जा रहा है। रायबरेली के दक्षिण छोर में सई नदी के तट पर स्थित शहीद स्मारक सीमेंट और कंक्रीट का स्तंभ मात्र नहीं है, वरन बहुत सी माताओं, बहनों, वीर नारियों का सुहाग इस स्मारक के कण-कण में रचा बसा है। मुंशीगंज के इस गोलीकांड में किसी का पुत्र, किसी का भाई, किसी का पति, किसी का पिता अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए कुर्बान हो गया है। जब इस शहीद स्मारक की तरफ देखता हूँ तो वक्षस्थल गर्व से चौड़ा हो जाता है कि इन अमर वीर सपूतों की बदौलत हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं, किंतु इस पर्यटक स्थल की बदहाली देख कर मन व्यथित हो जाता है। इस शहीद स्मारक में सुरक्षा के इंतजाम नाकाफी होने के कारण यह पूज्यनीय धरोहर रूपी स्थल वास्तव में युगल जोड़ों का संगम स्थल बनकर रह गया है।

इस पावन भूमि पर प्रति वर्ष 7 जनवरी को विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम, कवि सम्मेलन आदि होते हैं। मेला जैसा हर्ष-उल्लास का वातावरण रहता है। तब जगदंबिका प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’ की काव्य पंक्तियाँ सार्थक हो जाती हैं-

“शहीदों की चिताओं में लगेंगे हर बरस मेले।
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा।
कभी वह दिन भी आएगा जब अपना राज देखेंगे,
जब अपनी ही जमीं होगा अपना ही आसमां होगा।”

भारतीय इतिहास में दूसरा जलियांवाला बाग हत्याकांड रायबरेली के मुंशीगंज गोलीकांड को कहा जाता है।

रायबरेली शहर को दक्षिणी क्षेत्रों से जोड़ने के लिए मुंशीगंज के निकट सई नदी पर पुल बना हुआ था जो रायबरेली नगर और मुंशीगंज को जोड़ता था। अंग्रेजों को अधिक कर टैक्स देने और उनकी गुलामी के विरोध में हजारों किसान इसी पुल के दूसरी छोर पर एकत्रित हुए थे। इस आंदोलन में हिस्सा लेने पं.जवाहरलाल नेहरू जी पंजाब मेल से रायबरेली रेलवे स्टेशन पर उतर कर पैदल ही सई नदी के तट पर पहुँच गए थे, जबकि पहले मोतीलाल नेहरू को रायबरेली आना था। किसानों के शांतिपूर्ण आंदोलन को समाप्त करने और अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए अंग्रेजों ने 07 जनवरी 1921को निहत्थे किसानों पर धावा बोल अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दिया, मजबूत कंक्रीट का बना पुल को भी तोड़ दिया गया था। इस पुल के अवशेष रूप में दीवालें आज भी खड़ी हैं, जिस पर वर्तमान समय में लगभग 4 फ़ीट चौड़ा लोहे की रॉड और चद्दर से बना अस्थायी पुल आज भी प्रतिदिन सैकड़ों पैदल और साइकिल यात्रियों को नदी पार कराते हुए थकता नहीं है, बल्कि अपनी गौरवशाली अतीत की याद तरो-ताजा कर देता है। इस स्मारक स्थल को आज भी टूटा पुल के नाम से पुकारा जाता है। इस हत्याकांड में लगभग 700 से अधिक भारतीय किसानों की हत्या की गयी थी और 1200 से ऊपर किसान घायल हुए थे। घायलों में काफी लोगों ने बाद में दम तोड़ दिया था। तब क्रूर अंग्रेजों ने अपने दस्तावेजों में मृतकों की संख्या मात्र तीन ही लिखी थी। इतनी अधिक मौतों के कारण इसे किसान आंदोलन और दूसरा जलियांवाला बाग हत्याकांड कहा जाता है।

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आंदोलनकारियों ने चंदनिया में 5 जनवरी 1921 किसान सभा का आयोजन किया

ताल्लुकेदारों और जमींदारों का नया हथकंडा था कि दुकानों और घरों में लूटपाट करने के झूठे आरोपों में भोली और निरीह जनता को फंसा दो। इस अत्याचार से परेशान होकर किसानों और आंदोलनकारियों ने चंदनिया में 5 जनवरी 1921 किसान सभा का आयोजन किया। पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार 7 जनवरी 1921 को सूर्य की लालिमा के साथ ही हजारों किसान बैलगाड़ियों से आकर मुंशीगंज में एकत्रित होने लगे थे। इस बीच जनता को जवाहरलाल नेहरू के आने की खबर मिल चुकी थी। आम लोगों को उम्मीद हो गयी थी कि नेहरू जे के आते ही मेरे दोनों नेताओं के दर्शन हो जाएंगे। क्योंकि अतिउत्साही जनता अपने नेताओं ‘बाबा जानकी दास और अमोल शर्मा, का दर्शन करना चाहती थी, जिन्हें अंग्रेजों ने 5 जनवरी 1921 को गिरफ्तार करके लखनऊ जेल भेज दिया था। जनता नारे लगा रही थी- जानकीदास, अमोल शर्मा, जिंदाबाद जिंदाबाद.., ‘हरी बेगारी बंद हो।’

शिव बालक अहिंसात्मक आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे

सभी राष्ट्रीय चेतनावादी समाचार पत्रों में मुंशीगंज गोली कांड का मुख्य आरोपी खुरहटी के ताल्लुकेदार सरदार वीरपाल सिंह को ठहराया, क्योंकि तत्कालीन जिला कलेक्टर ए.जी. शेरिफ से वीरपाल की अच्छी खासी दोस्ती थी। वीरपाल सिंह ने कलेक्टर शेरिफ को पं जवाहरलाल नेहरू, रायबरेली जिला कॉंग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पं0 मार्तण्डदत्त वैद्य आदि के खिलाफ भड़काया था कि आम जनता नेहरू से मिलने न पाए, वरना नेहरू के भाषण सुनकर जनता उग्र हो जाएगी, जबकि जनता का उद्देश्य ऐसा कुछ भी नहीं था। खुरहटी निवासी शिवबालक ने सरदार वीरपाल सिंह के खिलाफ आवाज उठाई। शिव बालक अहिंसात्मक आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे। आम जनता पंडित जवाहरलाल नेहरू के दर्शन पाना चाहती थी। इसी समय नदी के तट पर अवसर देखकर वीरपाल सिंह ने कलेक्टर की शह पर शिवबालक से बदला लेने के लिए गोली चला दी, जिसमें शिवबालक की मृत्यु हो गई। गोलियों की आवाज सुनकर ब्रिटिश सिपाहियों ने भी निहत्थे जनता पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।

क्रांतिकारी गणेश शंकर विद्यार्थी ने 13 जनवरी 1921 को प्रकाशित अंक में इस गोलीकांड को प्रमुखता से प्रकाशित किया था

कानपुर के प्रसिद्ध पत्रकार, सप्ताहिक पत्र ‘प्रताप’ के संपादक, क्रांतिकारी गणेश शंकर विद्यार्थी ने 13 जनवरी 1921 को प्रकाशित अंक में इस गोलीकांड को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। प्रकाशित अंक ‘प्रताप’ में विद्यार्थी जी ने लिखा कि “डायर ने जो कुछ किया था उससे रायबरेली के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने क्या कम किया है। निहत्थे और निर्दोषों पर उसने गोलियां चलवाई, यही काम यहां रायबरेली में किया गया। वहाँ मशीनगन थीं, यहाँ बंदूकें थीं। वहाँ घिरा हुआ बाग था तो यहाँ नदी का किनारा। परंतु निर्दयता और पशुता की मात्रा में कोई कमी न थी। मरने वालों के लिए मुंशीगंज की गोलियां वैसे ही कातिल थी, जैसी जलियांवाला बाग की गोलियां।” पुनः गणेश शंकर विद्यार्थी ने इस गोलीकांड को 19 जनवरी सन 1921 को अपने अखबार ‘प्रताप’ में प्रकाशित किया था।

अंग्रेजों ने गणेश शंकर विद्यार्थी पर मानहानि का केस चलाया

ये खबरें पढ़कर अंग्रेजों ने गणेश शंकर विद्यार्थी पर मानहानि का केस चलाया। गणेश जी के आलेख का समर्थन पंडित जवाहरलाल नेहरू, मदन मोहन मालवीय, मोतीलाल नेहरू, सी.एस. रंगाअय्यर आदि ने किया। श्रीमती जनकिया, बुधिया, बसंता आदि 65 लोगों ने गणेश शंकर विद्यार्थी के पक्ष में गवाही दी। पाँच मास लंबी बहस के बाद 30 जुलाई 1921 को मानहानि केस निर्णय के तहत न्यायाधीश मकसूद अली खान ने गणेश शंकर विद्यार्थी को विभिन्न धाराओं में छः माह की जेल और ₹ 1000 जुर्माना की सजा सुनाई। 100 वर्ष पहले के ₹ 1000 की कीमत का आज के समय में अनुमान लगा पाना आसान नहीं है। गणेश शंकर विद्यार्थी की जुर्माना राशि सेठ कंधई लाल अग्रवाल ने भर दिया था। अंग्रेजों का यह निर्दयी कृत्य सिद्ध करता था कि ‘अंग्रेज हैं मनुष्य परंतु यथार्थ में पशु।’

रायबरेली विकास प्राधिकरण द्वारा शहीद स्मारक को पर्यटक स्थल (पिकनिक स्पॉट) के रूप में स्थापित किया गया था।

इस पवित्र स्थल पर शहीद स्मारक, पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी द्वारा रोपित कदम्ब वृक्ष, बच्चों के लिए झूले, नवग्रह वाटिका, शहीदों की सांकेतिक मूर्तियां, जिराफ़, मगरमच्छ, कछुआ जैसे कुछ जलीय जीव सीमेंट और चीनी मिट्टी से बनाये गए, और रंग-विरंगे फूल पौधे रोपे गए थे। छोटा सा टीन शेड बना था।

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अफसोस! शासन-प्रशासन की बदइंतजामी के कारण अराजक तत्वों ने लगभग सब कुछ तोड़-फोड़ दिया है। अराजकतत्वों पर वैधानिक कार्यवाही होनी चाहिए।

इस गोलीकांड के एक सौ वर्ष पूर्ण हो गए हैं, किंतु शहीदों की याद में बना यह पार्क आज भी बदहाली के आँसू रो रहा है। इसी स्थान पर भारत माता का विशालकाय भव्य मंदिर भी बना हुआ है। दुर्भाग्य है कि इस मंदिर में कबूतर, कुत्ते घूम-घूमकर मल मूत्र त्याग कर गंदगी फैलाते हैं। सोंचो! यह सब देखकर शहीदों की आत्मा क्या कहती होगी?

कहा जाता है जब किसानों की हत्याएं हो रही थीं, अंग्रेजी हुक़ूमत की अंधाधुंध गोलियां निहत्थी जनता पर चल रही थीं, तब सई नदी का पानी लाल हो गया था। अब इंतजार है भारत माता का कोई लाल आगे आये और इस पवित्र स्थल का जीर्णोद्धार करा सके.. वन्देमातरम

अशोक कुमार गौतम
असिस्टेंट प्रोफेसर (अध्यक्ष हिंदी विभाग)
शिवा जी नगर (दूरभाष नगर) रायबरेली
मो. 9415951459