Laghukatha Pareshani | लघुकथा परेशानी / रत्ना सिंह

Laghukatha Pareshani | लघुकथा परेशानी / रत्ना सिंह


परेशानी– एक कार्यक्रम में जाने के लिए नेताजी घर से निकले ही थे कि पार्टी का एक कार्यकर्ता दौड़कर पास आया और उनके कान में फुसफुसाते हुए कहने लगा कि अभी अभी सूचना मिली है कि आप के चुनावी क्षेत्र में एक लड़की का रेप हो गया है।
आखिर जिस बात का डर था वही हुआ अब उस कार्यक्रम को स्थगित करना पड़ेगा, और ड्राइवर से कहा कि जल्दी से गाड़ी निकालो हमारा वहां पहुंचना बहुत जरूरी है।
सब सत्यानाश हो गया!
लेकिन वहां का माहौल अभी बहुत खराब है अभी आप वहां मत जाइए कार्यकर्ता ने अपनापन दिखाते हुए कहा। बाद में अगर चुनाव नतीजे हमारे पक्ष में नहीं आए तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? आखिर पार्टी हमें अपना काम ठीक से ना करने का नोटिस थमा कर बाहर कर देगी। इसलिए अभी हमारा वहां पहुंचना बहुत जरूरी है कि आखिर यह हुआ कैसे जिसको भी ऐसा करना था वह चुनाव—?
नेताजी को परेशानी में देखकर कार्यकर्ता कहने लगा कि वहां जिस लड़की के साथ दुष्कर्म हुआ वह दुष्कर्म करने वाला कोई और नहीं हमारी ही पार्टी का कार्यकर्ता है, और वहां का माहौल बिल्कुल भी ठीक नहीं है।
“क्या कहा तूने? अपनी ही पार्टी का कार्यकर्ता था? तो फिर यह तो आजकल आम बात है —–न इसमें हमारी क्या गलती? बिना मतलब मैं डरा दिया कमबखत ने—-। तुझे पता नहीं अभी पिछले ही दिनों एक मामला ऐसे ही रफा-दफा हुआ है वैसे यह भी हो जाएगा इसमें क्या?
नेता जी ने यह कहते हुए एक लंबी सांस छोड़ी उनके चेहरे पर अब तनिक भी परेशानी नहीं झलक रही थी।

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Short Story of Savita Chaddha | लघुकथा | सविता चड्ढा

Short Story of Savita Chaddha- लघुकथा / सविता चड्ढा

गलत संगत

बेटे कुंदन की मौत के 50 वर्ष बाद अब उसके पिता की हाल ही में मृत्यु हुई है । इन 50 वर्षों में कुंदन के पिता हर रोज सोचते रहे कि मैं अपने बेटे को क्यों नहीं समझा पाया कि वह बुरी संगत छोड़ दें और अपनी पढ़ाई में ध्यान दें। दो चार गलत मित्रों की संगत में वह ऐसा फंसा कि उसने अपने सोने जैसी जिंदगी को एक दिन ईट कंक्रीट से बनी, रेगिस्तान सी गर्म सड़क पर तड़प तड़प कर दम तोड़ दिया।

उसकी लाश भी कई दिन के बाद मां-बाप को मिली थी।

कुंदन की मां तो आज भी जीवित है और वह चीख चीख कर हर रोज सबको कहती फिरती है कि अपने माता पिता के कहे में रहो । जब उम्र पढ़ने की हो तो सिर्फ पढ़ो, गलत संगत में मत पड़ो।

वह जानती है उसका कुंदन वापस नहीं आएगा, फिर भी वह हर बेटे में अपना कुंदन देखती है और भगवान के आगे भी यही बड़बड़ाती है और रोती है।

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रिश्ते

राखी का दिन था। मां की मौत के बाद बहन मानसी भाई के दरवाजे पर खड़ी थी। उसने तीन चार बार डोर बेल बजाई लेकिन दरवाजा नहीं खुला। वह दरवाजे के बाहर बने चबूतरे पर बैठ गई। थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला और भाई ने दरवाजे पर बहन को बैठा देख कहा “ये टाईम है आने का, मुझे दुकान पर जाना है और तेरी भाभी वैसे ही बीमार है।” कहते हुए भाई ने सकुटर स्टार्ट किया और बोला” कोई जरुरत नहीं है राखी की।”

बहन समझ गई थी, मां रही नहीं अब कैसे त्योहार और कैसे रिश्ते। मानसी ने साथ लाया मिठाई का डिब्बा दरवाजे पर रखा और भरी आंखों से वापस लौट गई, शायद कभी न आने के लिए।

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Hindi Short Story Kanoon | कानून (एक लघु कथा)

Hindi Short Story Kanoon | कानून (एक लघु कथा)

कानून

महादेवा की ओर से बहुत तेज दो युवक अपनी बाइक की चलाते हुए आ रहे थे ।सामने एक अधेड़ सड़क पार कर रहा था। टक्कर लग गई। बूढ़ा गिर पड़ा। उसके सिर में चोट आई ,घुटने में कुछ चोट आई ।वह बेहोश हो गया। लड़के भाग गए।
भीड़ जमा हो गई। कई लोगों ने यह कहा इसे जल्दी से उठा कर अस्पताल ले चला जाए। थोड़ी दूर पर एक पुलिस वाला खड़ा था। उसने कहा–” यह पुलिस केस है। आप इसे छू नहीं सकते,जब तक कि पुलिस इसे अनुमति नहीं देती।” बूढ़ा तड़पता रहा ।लोग तमाशा देखते रहे ।अंत में एक नवयुवक हिम्मत करके सामने आया। उसने कहा–” कानून को जो करना हो, मुझे कर ले। मैं इस बाबा को लेकर अस्पताल जाऊंगा”। उसने एक ऑटो रिक्शा बुलाया। बाबा को में बैठाया और अस्पताल लेकर चला गया।
क्षेत्रीय विधायक को पता चला।। उसने युवक को पता लगाकर उसे पुरस्कृत करने की बात कहा। युवक के घर गया भी। युवक ने कहा –“आप मुझे पुरस्कृत करने की बजाय ,अच्छा होता यह कानून बनवा देते कि यदि कोई घायल होता है, तो उसकी सहायता करने वाले से कोई पूछताछ पुलिस न करें। बल्कि अस्पताल में जाकर पीड़ित से उसका बयान ले और जो करना हो कार्यवाही वह करें।” अगले सत्र में मुख्यमंत्री से मिलकर इस तरह का कानून पास करवाया। लोगों को पता चला तो, लोग युवक की जय-जयकार करने लगे।

शिक्षा – इस लघुकथा में हमे शिक्षा मिलती है कि हमें इंसानियत को नहीं भूलना चाहिए , युवक ने आगे आकर वृद्ध आदमी की सहायता की उसने पुलिस का इंतज़ार नही किया मानवता का धर्म ये कहानी हमको सिखाती है।

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अशोक कुमार गौतम की लघुकथा विघटन | Laghukatha Vighatan

अशोक कुमार गौतम की लघुकथा विघटन | Laghukatha Vighatan

यमुना नदी की गोद में बसा देवकली गाँव इटावा जनपद में स्थित है। रमणीय और प्राकृतिक वातावरण, हरे-भरे पेड़ पौधे, कहीं पठार तो कहीं छोटी-छोटी घाटियां हर इंसान को अपनी ओर अनायास ही मोहित कर लेते हैं। इस क्षेत्र में कई दशकों से समय-असमय गोलियों की गड़गड़ाहट भी सुनाई देती रहती थी। यहाँ की राजनीति की धमक आज भी दिल्ली तक सुनाई देती है। देवकली गाँव में गिरजा शंकर चौधरी अपनी पत्नी प्रिया और अन्य तीन भाइयों के साथ रहते थे, जो मध्यमवर्गीय परिवार में गिने जाते थे। कभी-कभी गाँव की राजनीति और जंगल से आने वाली धमकियों का भी शिकार हो जाया करते थे। किंतु किसी के सामने सिर नहीं झुकाया। किसी भी प्रकार का बाहरी विवाद होने पर चारों भाई एकजुट होकर मुकाबला करते थे। गिरजा शंकर चौधरी के अन्य भाई गाँव से पलायन करने की बात सोचते थे, परंतु परिवार की एकता और खून के रिश्ते ने कभी किसी भाई को एक-दूसरे से अलग नहीं होने दिया।

गिरजा शंकर के तीन पुत्र मयंक, अंकित, दिलीप और एक पुत्री जिसका नाम सोनिका था। सभी देखने में सुंदर और हाव-भाव से कुशाग्र बुद्धि वाले लगते थे। जैसे-जैसे बच्चे बड़े हुए, सब का दाखिला भी सरकारी स्कूलों में करा दिया जाता था। जीवन के 57 वसन्त देख चुके गिरजा शंकर और उसकी पत्नी प्रिया को कभी-कभी भरपेट भोजन भी नहीं मिलता था। वह गृहस्थी चलाने और संतानों की पढ़ाई के लिए मजदूरी करता था, तो कभी कानपुर में आढ़तियों का कार्य करता था। गिरजा शंकर शहरी आब-ओ-हवा से अच्छी तरफ वाकिफ़ हो चुका था। इसलिये उसे डर सताया करता था कि मेरा घना वृक्ष रूपी परिवार की कोई डाली टूट कर अलग न हो जाये।

गिरजा शंकर की पढ़ाई तो न के बराबर थी पर राजनीतिक और साहित्यिक मंचों पर भाषण तथा रेडियो पर प्रसारित वार्ताओं में विभिन्न महापुरुषों के विषय में सुना करता था, जिसमें एक सुना था कि डॉ0 भीमराव अंबेडकर कहते थे- “शिक्षा उस शेरनी का दूध है, जो पियेगा दहाड़ेगा।” यही मूल मंत्र गिरजा शंकर के मन-मस्तिष्क में बसा हुआ था। बेटी सोनिका भी पढ़ने में तेज थी। गिरजा शंकर चौधरी अपनी पुत्री सोनिका का दहेज रहित विवाह अपने से श्रेष्ठ परिवार में कर देता है। सोनिका के ससुराल वाले भी उसे बेहद प्यार और सम्मान करते थे। सोनिका अपनी ससुराल में बहुत खुश थी, साथ ही मायके के भी सुख-दुःख में साथ खड़ी रहती थी। ससुराल वालों ने भी उसकी पढ़ाई में बाधा नहीं उत्पन्न की, जिससे वह राजकीय इंटरमीडिएट कॉलेज में नौकरी पा जाती है। गिरजा शंकर अपने तीनों पुत्रों को कानपुर शहर में पढ़ने के लिए भेज देता है, वे सरकारी हॉस्टल में रहने लगते हैं। कोचिंग में पढाने के लिए गिरिजा शंकर के पास रुपए ना थे, इसलिए तीनों पुत्र कानपुर के फूलबाग स्थित राजकीय पार्षद पुस्तकालय में जाकर पढ़ाई करते थे। सभी बेटे बेहद संस्कारवान और पढ़ाई में अव्वल हो गए थे। कुछ समय बाद मँझला बेटा अंकित बुरी संगत में फंस गया, जिसके कारण उसका मन पढ़ाई से हटकर कुमार्ग पर चलने लगा था। अन्य दोनों भाइयों ने खूब समझाया पर वह नहीं माना। मयंक को केंद्रीय विद्यालय में प्रवक्ता की नौकरी मिल गई और पहली नियुक्ति अम्बाला में हुई। अब गिरजा शंकर के सिर पर कुछ भार कम पड़ गया। फिर भी वह अपनी मेहनत में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता था। छोटा पुत्र दिलीप कद-काठी में लंबा चौड़ा और पढ़ने में अव्वल तो पहले से ही था, इसलिए उसे दारोगा की नौकरी मिल गई। इस परिवार को कभी पद-प्रतिष्ठा पर घमंड न था। मंझला बेटा वापस अपने गाँव देवकली आकर छोटी मोटी दलाली करने लगा था। बारी बारी से तीनों लड़कों का विवाह भी योग्य और सुशील कन्याओं से हो गया। गिरजा शंकर की तीनों बहुओं में आपसी लगाव, स्नेह और संस्कारों की चर्चा पूरे गाँव में होती थी। सोनिका, मयंक और दिलीप मिलकर तन-मन-धन से अपने भाई अंकित की हरसंभव मदद करते थे। अब तो गिरजा शंकर को आसमान में उड़ना चाहिए था, किंतु गिरजा शंकर और उसके तीनों पुत्रों ने जमीन से नाता नहीं छोड़ा.. अर्थात किसी में भी रंच मात्र का अहंकार न था। संयुक्त परिवार होने के कारण कोई विरोधी भी फटकने नहीं पाता था, न ही बाहरी व्यक्ति किसी प्रकार की हानि पहुँचा पाता था। अब तो गाँव वालों की आँखों में गिरजा शंकर और उसका परिवार खटकने लगा था।

ग्रामीणों ने षड्यंत्र के तहत अंकित को गाँव की राजनीति में उतरने के लिए खूब भड़काया और वोट तथा सत्ता सुख का लालच दिया। विभिन्न सुख-दुःख को सहन करते हुए जो परिवार सागर की तरह शांत रहता था आज उस परिवार में अंकित राहु बनकर खड़ा हो गया। दोनों भाइयों से चुनाव लड़ने के लिए धन एवं प्रचार हेतु समय माँगने लगा, जो कि संभव न था। मयंक, दिलीप और सोनिका ने समझाते हुए कहा कि चुनाव लड़ना मानो ओखल में सिर डालने जैसा है। इसलिए परिवार में शांत रहकर जीवन यापन करो। बहन-भाइयों की यह संस्कारी बातें अंकित के हृदय में भाला की नोक की तरह चुभ रही थीं। ग्रामीणों की मंशानुरूप अब अंकित के मन में परिवार के प्रति विद्रोह की भावना जागृत हो गई। उसने परिवार से विघटन करने तक की सोच लिया। गिरजा शंकर औऱ प्रिया ने आँखों में आँसू लिए अंकित को खूब समझाया कि परिवार के साथ मिलकर चलोगे तो किसी के सामने हाँथ नहीं फैलाना पड़ेगा।

ईर्ष्यालु अंकित के जीवन में गाँव वालों ने जो आग लगाई थी वह जाग्रत ज्वालामुखी की तरह भड़क रही थी। आखिर में अंकित वट वृक्ष रूपी परिवार से अलग हो गया और गाँव में हर तरफ अपने ही परिवार की बुराई करने लगा। धीरे-धीरे हंसते-खेलते परिवार में विघटन हो गया। आँगन में नफरत की दीवाल खड़ी हो गई और दो चूल्हे जलने लगे। गिरजा शंकर चौधरी इस असहनीय दुःख को बर्दास्त न कर पाने के कारण कुंठाग्रस्त जीवन व्यतीत करने लगा था।

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विघटन | Short story Vighatan in Hindi

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विघटन

अस्पताल का काम खत्म करके मैं घर की ओर निकला आज मरीज ज्यादा थे तो मुझे थोड़ी देर हो गई। अचानक से मुझे बाहर हटाओ बाहर हटाओ की जोर जोर से आवाज सुनाई दी मैं वहां गया तो देखा एक बूढ़ा सड़क के किनारे बिल्कुल शिथिल पड़ा था रात काफी हो चली थी मुझे थोड़ी दया आई और मैं गाड़ी से उतरकर बूढ़े के पास गया उसे उठाया गाड़ी में से पानी पिलाया और घर की ओर चलने लगा तो पीछे से जोर-जोर सांस लेने की आवाज आई मुड़कर देखा तो वह बूढ़ा लंबी लंबी सांसे ले रहा था और वहां पर खड़े लोग मूकदर्शक की तरह देख रहे थे आपस में बुदबुदाते अच्छा है मर जाए साला हम लोगों की बला से। मैं दौड़ कर उसके पास पहुंचा और उसे अपने अस्पताल ले गया वहां उसे भर्ती करवाया। एक-दो दिन उसका इलाज होने के बाद वह ठीक हो गया
बाबा ! अब आप घर जा सकते हैं मैंने कहा।
नहीं बेटा मैं घर जाकर नहीं रह सकता।
बाबा की आवाज इतनी डरी और सहमी थी कि मैं उनकी आवाज से ही समझ गया था उनके साथ जरूर कुछ गलत हुआ है
मैंने पूछा क्यों बाबा क्या हुआ? क्या बताऊं बेटा दो दिन पहले ही मेरी बेटी ने एक दूसरी जाति के लड़के से शादी कर ली इसलिए यह गांव वाले मुझे निकाल रहे हैं कह रहे हैं कि अब ना वापस तेरी बेटी आ सकती है और ना तू ,पूरे गांव में ही क्या आस-पास के गांव में भी ढिंढोरा पिटवा दिया कि मेरे हाथ का कोई पानी भी ना पिए ना अपने घर के आस-पास जाने दे।
मैंने पूछा,” बाबा इसके पहले सब ठीक था”।
बाबा ने कहा,” हां बेटा इसके पहले तो मैं और मेरी बेटी गांव में ही काम करते थे”। मैं मजदूरी करता बेटी सब के कपड़े सिलती।
मैंने कहा,”बाबा सिर्फ इतनी सी बात कि आपकी बेटी ने दूसरी जाति में शादी कर ली और आपको समाज ने बहिष्कार कर दिया”।
हां बेटा जिस समाज के लिए–। इसके आगे उनका स्वर भिंच गया बस उनकी आंखों से आंसू टपक रहे थे मैं उनको ढांढस बंधा रहा था।

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Short Story Ghar Aana | लघुकथा घर आना- पुष्पा श्रीवास्तव ‘शैली’

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घर आना


आँखों के आंसू बहकर गालों पर सूख चुके थे, बस की खिड़की से हौले हौले आती हवा के झोकों ने झपकी लेने पर मजबूर कर दिया. अचानक से मोनी को अर्जुन दा की तबियत ख़राब होने की सूचना मिली! मोनी से रहा न गया! मन में अंजाना डर बिठाये पति रोहित और बेटे आदि को साथ ले पिता से मिलने अस्पताल जा पहुंची!

दूर से ही पिता को देख रही थी मोनी! पास जाने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी! उसे पता था कि अपने पसंद की शादी करने से पापा अब तक नाराज़ होंगे! फोन पर दो वर्ष पूर्व बात करते हुए उसके पापा ने यह कहते हुए फ़ोन काटा था की आज के बाद इस घर के दरवाजे तेरे लिए हमेशा के लिए बंद!
मोनी की माँ बचपन में ही गुजर गयी थी! उसका पालन पोषण सब उसके पापा ने किया था! तभी तीमारदार के रूप में वहां उपस्थित उनके भाई की नज़र मोनी पर पड़ी! उन्होंने धीरे से बेड पर मशीनों से घिरे मोनी के पापा से कहा-“दादा! ,मोनी आई है!”
अर्जुन दा ने चौंकते हुए पुछा, “मोनी.. मोनी आई है? कहाँ है मोनी?? मोनी?” मोनी के नाम भर से चेहरे की चमक एकदम से बढ़ गयी! अपना नाम पिता के मुख से सुनते ही मोनी पिता के पास दौड़ी गयी!

फिर क्या था, आंसुओं के सैलाब में पिता और पुत्री खूब नहाए! आंसू जब थमे तो अर्जुन दा ने मोनी से पूछा- “अकेले आई है मोनी?”
मोनी ने इशारे से पति और बेटे को पास बुलाया! नन्हे आदि को देख कर अर्जुन दा निहाल हुए जा रहे थे! दिन भर रहने के बाद अगले दिन फिर आने का वादा कर के मोनी वापिस जाने लगी!
तभी अर्जुन दा ने तीनो को वापिस बुलाया, जैसे कुछ ज़रूरी काम रह गया हो! रोहित और मोनी का हाथ अपने हाथ में ले कर जैसे अर्जुन दा ने इस रिश्ते को स्वीकृति प्रदान की! और फिर आश्वस्त होते हुए बोले-
“घर आना!..”
मोनी के मन में ढेर सारे भाव उद्वेलित हो रहे थे! अस्पताल के गेट तक पहुची ही थी कि उन्ही तीमारदार का फ़ोन था!
“बेटा, पापा नहीं रहे!”


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पुष्पा श्रीवास्तव शैली

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short story kar bhala to ho bhala / सविता चड्ढा

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लघुकथा

“कर भला तो हो भला”

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सविता चड्ढा


कनिका को जब से यह सूचना मिली है कि उसके पिता को अपने कारोबार मेंं काफी बड़ा घाटा हो गया है और वे बहुत परेशान हैं। उसे ये भी बताया गया है कि उसके पिता द्वारा प्रेषित सामान को गुणवत्ता के आधार पर खरा नहीं पाया गया । इसलिऐ उस माल का भुगतान नहीं किया गया और कंपनी ने वह सारा माल भी वापस लौटा दिया है ।
बात इससे भी अधिक यह हो गई कि उसके पिता को अब आगे से वह कंपनी कभी माल बनाने का ऑर्डर भी नहीं देगी। कनिका मन पर बोझ लिए, विचार करने लगी। उसकी अंतरात्मा ने उसे झकझोरा, वह सोचने लगी “मेरे दादी कहां करती थी, जब बेटियां अपने ससुराल का जानबूझकर कोई नुकसान करती हैं तो उसका खामियाजा उसके मायके वालों को भुगतना पड़ सकता है।”

कनिका के मन से पता नहीं कैसी हूक उठी, कई दिन से वह वैसे भी आत्मग्लानि से जूझ रही थी। वह उठी और अपनी सास से जोर जबरदस्ती से हस्ताक्षर कराए मकान के कागज, उनसे हथियाए हुए सोने के जेवरात उन्हें वापस कर दिए , ये कहते हुए

” जब आप अपनी इच्छा से मुझे देना चाहेंगी मैं ले लूंगी, अभी आप रख लीजिए।”

कनिका को पूरा विश्वास है अब उसके मायके में सब ठीक हो जाएगा।


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