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विज्ञान को समाज तक पहुंचाने का सशक्त उपकरण है विज्ञान कविताएं –   सविता चडढा

 जब से दुनिया बनी है विज्ञान की भूमिका हम सबके जीवन में प्रारंभ से विद्यमान है । विज्ञान के अनेक रूप भी हमारे आसपास, हमारे सौरमंडल में विचरण करते रहे हैं । हमारे मन में कई जिज्ञासाएं  बचपन से बनी रही हैं। सौर मंडल क्या है , ब्रह्मांड क्या है धरती  कैसे बनी, चेतन और अवचेतन मन, आने वाले सपने, बादल और चमकती बिजली….अनगिन विषय  विज्ञान के दायरे में आते रहे हैं। 

बचपन में जब रामायण के कई दृष्टांत सुने  तो मुझे लगता था उस समय भी विज्ञान विद्यमान था , नहीं तो पुष्पक विमान कैसे बनता । पवन पुत्र हनुमान जी की यात्रा का उल्लेख भी मुझे बहुत जिज्ञासा में डालता था। बालपन की जिज्ञासाएं  यह जानने को सदैव इच्छुक रहती , कैसे श्रीराम और लक्ष्मण जी को अपने कंधों पर बिठाकर ले गए थे पवन पुत्र और जब राम और रावण के युद्ध की बात होती  और इसमें प्रयोग किए गएअनेक अस्त्र।  मुझे लगता  यह सब भी विज्ञान का ही चमत्कार था और विज्ञान आज का नहीं युगों युगों से इस पृथ्वी पर विद्यमान है । पारस को छूने से जब लोहा भी सोना बन जाता है तो क्या यह  विज्ञान नहीं है । मैं तो यहां पर यह भी कहना चाहती हूं अगर कोई साधारण मनुष्य, असाधारण व्यक्तियों की छत्रछाया में आकर चमत्कार कर जाता है अपने जीवन में , यह भी तो विज्ञान है । क्या ये मनोविज्ञान है?  विज्ञान  में भी तो मनोविज्ञान में भी तो विज्ञान  है। विज्ञान के जितने भी चमत्कार हुए हैं उसे बनाया तो मनुष्य नहीं है । बहुत ही विस्तृत दायरा है विज्ञान का। विज्ञान के विभिन्न रूपों को देखने का अवसर मुझे मिला एक विज्ञान कविताओं के संग्रह में।

सविता चड्ढा

पिछले दिनों” विज्ञान कविताएं ” पुस्तक मेरे हाथ में आई और हाथ में भी इसलिए आई क्योंकि मुझे विज्ञान पर कविताएं लिखने के लिए आमंत्रित किया गया था।  मैंने अपनी लिखी कविताओं में से कुछ कविताएं प्रदूषण और पर्यावरण, काश कोई ऐसा यंत्र मिल जाए,  जो मनुष्य के मन के आकार को जान सके, पल पल का साथी विज्ञान,एकात्म ऐसे अनेक विषयों पर लिखी मेरी कविताएं इस संग्रह में शामिल है । इस पुस्तक के संपादक सुरेश नीरव जी को मैंने अपनी कविताएं भेज दी,  मुझे बहुत हैरानी हुई कि उन्होंने इन कविताओं को विज्ञान कविताएं स्वीकार किया और कहा इन कविताओं में वैज्ञानिकता है । मित्रों मैंने कई कहानियां लिखी है जिसमें मनोविज्ञान और चिकित्सा विज्ञान से संबंधित विषय कहानियों में लिए गए हैं । जब यह पुस्तक तैयार होकर मेरे हाथ में पहुंची और मैंने इसे पढ़ा तो मैंने पाया कि विज्ञान का हमारे समाज में कितना महत्व है और कविताएं एक सशक्त माध्यम है विज्ञान को समाज तक पहुंचाने का ,समाज की जिज्ञासाओं को विज्ञान ही शांत कर सकता है।  जब आप इस  संग्रह की कविताएं पढ़ेंगे तो आप जान पाएंगे कि सपनों का विज्ञान क्या है, डीएनए, प्राणी और पदार्थ क्या हैं। विज्ञान कविता है क्या ? इन सब के बारे में पंडित सुरेश नीरव जी ने इस पुस्तक में विस्तार से बताया है। डॉक्टर शुभता मिश्रा, अंधकार  चंद्रयान की सुंदर पृथ्वी के बारे में बताती हैं और टैबलेट आहार के बारे में बताती हैं। सुरेंद्र कुमार सैनी कहते हैं कि सत्य को पहचानने का नाम है विज्ञान है । नीरज नैथानी वृक्षों के संसार और ऊर्जा प्रदायनी गंगा को लेकर विज्ञान को परिभाषित करते हैं । मंगलयान, खिचड़ी और प्रोटीन एक कदम, विज्ञान पर अपनी बात, विज्ञान से जुड़ी कई बातें यशपाल सिंह यश ने अपनी कविताओं में बताई हैं और अरुण कुमार पासवान  ने ,सुबह की सैर ,वृक्षारोपण और महायुद्ध के माध्यम से विज्ञान को हम सबको परोसा है। राकेश जुगरान ने पॉलिथीन,जीवन दर्शन और जंगल के मासूम परिंदे जैसे विषयों पर लिखकर विज्ञान को परिभाषित किया है। मधु मिश्रा ने विज्ञान की बात करते हुए पेड़ों को ऑक्सीजन प्रदाता कहां है और संतुलित भोजन और पेड़ों को बचाने पर अपनी सुंदर रचनाएं प्रस्तुत की है । पंकज त्यागी असीम ने इसरो के माध्यम से और मोबाइल को लेकर अपनी कुछ बातें विज्ञान के साथ जोड़ी है । वहीं डॉक्टर कल्पना पांडेय ने शून्य का गणित और कोविड महामारी और विज्ञान को बहुत ही जादुई बताते हुए विज्ञान को प्रस्तुत किया है । इसी प्रकार सुबोध पुण्डीर  कहते हैं कि आज बिजली के सहारे जिंदगी का काम चल रहा है। उन्होंने भी पेड़ों को ऑक्सीजन का भंडार बताया है।  रामवरन ओझा इस पुस्तक में विज्ञान के चमत्कारों की बात करते हैं । पंडित सुरेश नीरव पुस्तक के अंत में” तुम गीत लिखो विज्ञान के ” एक बहुत ही सुंदर गीत के साथ प्रस्तुत हुए हैं।  इस संग्रह को पढ़ते हुए मैंने पाया कि विज्ञान पर लिखी गई ये कविताएं समाज को विज्ञान के कई रूप प्रस्तुत करती है और यह सिद्ध हो जाता है कि विज्ञान को समाज तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम कविता भी हो सकती है।

हमारा व्यवहार हमारे मानसिक संतुलन को अभिव्यक्त करता है- सविता चड्डा
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सविता चड्ढा

हमारा व्यवहार हमारे मानसिक संतुलन को अभिव्यक्त करता है। साधारण लोग इस बात की ओर भले ही ध्यान ना दें लेकिन आप यह जान लें कि हम जो भी करते हैं, कैसे उठते हैं, बैठते हैं, चलते हैं, बात करते समय हमारे चेहरे की भाव भ॔गिमांए  अगर कोई ध्यान से देखता है तो वह जान सकता है कि आपके हृदय में क्या चल रहा है, आपके मस्तिष्क की अवस्था कैसी हैं, जीवन के प्रति  आपका दृष्टिकोण क्या है ?

आप सोचेंगे ऐसा कैसे संभव है।  मैं आपको बहुत सारी बातें बता सकती हूं।  मेरी बताई गई बातें आपके मस्तिष्क को परिवर्तित नहीं कर सकती, आपकी सोच को भी बदल नहीं सकती ,हां उसे कुछ समय के लिए प्रकाशित कर सकती हैं और अगर आप निरंतर उस प्रकाश को महसूस करेंगे तो छोटे से छोटे कंकर से बचाव संभव हो सकेगा।

सबसे पहले तो यह जान लेना चाहिए,  संसार की सारी बातें सब व्यक्तियों के लिए नहीं होती। उदाहरण के लिए  यदि हम कला में स्नातक की डिग्री लेना चाहते हैं या कला में स्नातक की शिक्षा लेना चाहते हैं तो उसके लिए हमें अलग सब्जेक्ट पढ़ने होते हैं और यदि हम कॉमर्स विषय  लेते हैं तो उसके लिए हम अलग शिक्षा लेते हैं। इसी प्रकार चिकित्सा, विज्ञान या जीवन में शिक्षा के क्षेत्र में लिए जाने वाले सभी विषयों के लिए, हमें अलग अलग तरह से उसका  चयन करना पड़ता है।  इसी प्रकार  ईश्वर ने हमें हमारे मस्तिष्क को  जिस प्रकार बना दिया है हमें केवल वही बातें पसंद आती हैं और हम उसी के अनुसार ही अपना वातावरण चुनते हैं। अपने संगी साथी पसंद करते हैं।  हमें अपने ही सोच वाले व्यक्ति पसंद आते हैं। मस्तिष्क का निर्धारण कोई व्यक्ति नहीं कर सकता, इसे हम कुछ पल के लिए बदल सकते हैं। उदाहरण के लिए  अगर पानी को गर्म किया जाए तो वह कुछ समय के पश्चात शीतल हो जाता है अर्थात जो उसका वास्तविक स्वभाव है वह उसमें बदल ही जाता है।  इसी प्रकार ईश्वर द्वारा प्रदत्त मस्तिष्क में  बहुत अधिक परिवर्तन नहीं हो सकता लेकिन इसे धीरे धीरे नकारात्मकता से सकारात्मकता की और स्थाई रूप से लाया जा सकता है।

जैसे किसी ने पहले बी. ए. पास कोर्स में दाखिला लिया बाद में उसे  लगा कि कॉमर्स की शिक्षा अधिक उपयोगी है तो वह किसी दूसरे संस्थान में, अपनी दूसरी पुस्तकों के साथ उपस्थित होता है और लगातार उसीका अध्ययन करता है तो वह इस शिक्षा में भी उतीर्ण  हो सकता है अर्थात ईश्वर द्वारा प्रदत मस्तिष्क को पूर्ण रूप से बदलने के लिए हमें अपने हृदय का सहारा इसमें मिल सकता है। यह सहारा  कोई भी हो सकता है, पुस्तकें भी हो सकती हैं ,व्यक्ति भी हो सकता है।  उनका सहारा लेकर आप अपने जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन ला सकते हैं बशर्ते आपका मस्तिष्क उसे स्वीकार करने के लिए उपस्थित हो। ये विषय बहुत विस्तृत है और इस पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है।

आशा की शैली एक मिशन है – कुँवर प्रदीप निगम

आशा की शैली एक मिशन है

आशा जी से मेरा परिचय अभी तक पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से ही है। साक्षात्कार का अवसर नहीं मिला। इसे साहित्यिक भेंट कहते हैं। ऐसे सम्बंधों में एक जिज्ञासा बनी रहती है कि जिसकी कलम इतनी तपस्वी है, वह निश्चित ही तपा हुआ सोना होगा।

शैल-सूत्र तो मैं वर्षों से पढ़ रहा हूँ लेकिन उसकी शैली के मानदण्ड, उसका विस्तार, तपस्या और उसकी अमर ज्योति का संज्ञान मुझे अप्रैल 3, 2013 को हुआ जब पोस्टमैन मुझे शैल-सूत्र का दिसम्बर 2012 अंक दे गया। इस विशेषांक का पृष्ठ खोलते ही मुझे अपने पुराने मित्र, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र का लेख ‘चन्दा पर खेती करने वाली आशा’ पढ़ा। इस विशेषांक को देखकर मैं समझा कि जिस को मैं सरिता समझ रहा था, वह गंगासागर तट निकला। मैं विचार करने लगा, कि अभी तक मैं आशा जी को मात्र कवयित्री/लेखिका/सम्पादक समझता था, लेकिन ऐसा नहीं है। उन्होंने तो सामाजिक संघर्ष की शिला पर एक पैर से खड़े होकर लम्बी अवधि तक घोर तपस्या की है। ऐसे क्रान्तिकारी क्षणों में ही कविता का जन्म होता है।

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मैंने छाया देवदार की, उपन्यास के अब तक प्रकाशित अंश पढ़े हैं। उसमें जमीदारी ऐंठ और अय्याशी के बीच कहीं न कहीं स्त्रीशक्ति और उनमें अधिकारों की सुलगती आंच दिखाई देती है। हालांकि तत्कालीन सामाजिक ढांचे में स्त्री की जो हालत रही, जो दुर्दशा हुई उसका प्रकारांतर से अभूतपूर्व दृश्य लेखिका ने उल्लिखित किया है। यह कथा तत्कालीन सामाजिक संरचना और समय के बदले हुए परिवेश हाशिये की जिन्दगी जी रहे सामाजिक न्याय से वंचित लोगों की पीड़ा और मूक संघर्ष को रेखांकित करती है। उपन्यास की नायिका समझती है कि ‘इन ऐंठुए आतंकी जमींदारों के लिए औरत का शरीर ही भगवान है। ये ऐंठुए जवान औरत के तलुवे चाटते हैं।’ मेरा आशय है कि लेखिका ने उस आतंकी मानसिकता और बेबस औरत की सामाजिक कमजोरी का बड़े ही सहज लहजे में आज के बदले हुए विकसित समाज को अहसास कराया है। इसे कहते हैं कलम की जादूगरी। आशा जी ने भी खौलते हुए स्वार्थी समाज को नज़दीक से देखा है और सामाजिक विसंगतियों को टक्कर भी दी है। इनके सामने ऐसे भी संकट आकर खड़े हो गए, जो इनके वर्चस्व को उखाड़ फेंकना चाहते थे लेकिन इनके भीतर बैठा कवि, इन्हें परामर्श देता रहा कि ‘ये कैंचियाँ हमें उड़ने से ख़ाक रोकेंगी, कि हम परों से नहीं हौसलों से उड़ते हैं।’ वही हौसले, आशा जी को उन कठिनाइयों के बीच से ले जाकर आज श्रमसाध्य कर्त्तव्यबोध में ले आई हैं। उन्हीं ‘हौसलों’ ने एक लेखिका के रूप में आशा जी को पहचान दी है और इन्होंने अब तक लेखन/सम्पादन से जुड़ी रहकर प्रखरता को प्राप्त किया है, तथा आज देश की वरिष्ठ साहित्यकार के रूप में सर्वविज्ञ हैं। इनकी कर्त्तव्यनिष्ठा, लगन और तप ने इनके चरण आगे बढ़ाये और पीछे मुड़कर देखने नहीं दिया। इनके साथ एक सिद्धांत और जुड़ गया कि, ‘ये और बात है आँधी हमारे वश में नहीं, मगर चिराग़ जलाना तो इख़्तियार में है।’ आशा जी चिराग़ जलाती रहीं, अंधियारे को रोशनी दिखाती रहीं और लबालब इनका आत्मविश्वास दृढ़ता के साथ खड़ा आवाज़ देता रहा, कि, ‘फानूस बन के जिसकी हिफ़ाज़त हवा करे, वो शम्अ क्या बुझे जिसे रोशन खुदा करे।’ शायद यही संकल्प झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और अंतरिक्ष की यात्रा से वापस लौटी सुश्री सुनीता विलियम्स का भी रहा होगा।

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कल साधनारत महिला साहित्यकार द्वारा अपने कंधों पर एक बड़ा दायित्व वहन कर लेना विशेष अनुकरणीय है और वह है शैल-सूत्र का प्रबंधन, सम्पादन और निस्तारण। वह भी ऐसे समय में जब पीत-पत्रकारिता का वर्चस्व है और साहित्यिक खेमेबाजी से रचनात्मकता पंगु होती जा रही है। इस समय सकारात्मक सृजन नहीं हो पा रहा। जो हो रहा है उसे सामूहिक स्वीकृति नहीं मिल पाती। एक जोड़ता है तो दूसरा जानबूझकर तोड़ता है। नये रचनाधर्मी न केवल भ्रमित होते हैं, बल्कि उनके विकास की गति भी प्रभावित होती है। वैसे भी साहित्यिक पत्रिकाओं एवं पाठकों की भी संख्या कम होती जा रही है। उस पर खेमेबाजी के चलते कभी-कभी अच्छी रचनाएँ पाठकों तक नहीं पहुँच पातीं। धर्मयुग, सारिका, हिन्दुस्तान जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ पाठकों की कमी से नहीं, बल्कि प्रतिष्ठिनों की व्यवसायिकता के कारण बंद हुई हैं। दरअसल साहित्यिक पत्रिकाओं को विज्ञापन कम मिलने के कारण प्रकाशकों को यह सौदा घाटे का लगने लगा और पत्रिकाएँ बंद होने लगीं। यह परिस्थितियाँ विकाराल रूप से आशा जी के सामने भी हैं, फिर भी उनका हौसला देखिए कि पत्रिका समय से और शान से निकल रही है। इसे उनका मिश्नरी कार्य कहा जाना चाहिए। सच यह है कि साहित्यिक पत्रिकाओं को अखबारों की पीत-पत्रकारिता निगल रही है। अखबारों के साहित्यिक विशेषांक इस असाहित्यिकता के लिए जिम्मेदार हैं। विशेषांकों के उन पन्नों पर जो छापा जा रहा है, वह बिकाऊ तो है पर टिकाऊ नहीं। उनमें सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्य नहीं हैं। उन विशेषांकों में अपसंस्कृति को मान्यता देने की कोशिश की जा रही है। इसके खिलाफ किसी ने आवाज़ नहीं उठाई।

ऐसी विषम परिस्थितियों में आशा जी द्वारा शैल-सूत्र का प्रकाशन एक चुनौतीपूर्ण कार्य है क्योंकि इस पत्रिका की सामग्री टिकाऊ हैं इससे स्पष्ट होता है कि यह प्रकाशन इनकी कर्मठता, ईमानदारी, संकल्प और सहिष्णुता का परिणाम है। उनके इस संकल्प का अन्य प्रकाशकों को अनुकरण करना चाहिए। कोई आशा जी का अनुकरण करे या ना करे लेकिन जिस मिशन को लेकर वह चल रही हैं उसके प्रकाश से लोग अपनी राह आसान करते रहेंगे। यही उनका मिशन है। अंततः में आशा जी को एक शेर भेंट कर रहा हूँ,

जहाँ रहेगा वहाँ रोशनी लुटायेगा
किसी चिराग़ का अपना मकां नहीं होता।’

– कुँवर प्रदीप निगम, कानपुर देहात

सविता चड्ढा का अनुभव – कलम की शक्ति

सविता चड्ढा का अनुभव – कलम की शक्ति

कलम की शक्ति

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जब किसी नुकीले प्रश्न को मेरी कलम ने उछाल दिया आसमानी सितारों ने मुझे मुश्किलों से निकाल लिया।
– सविता चडढा

मुझे कलम से इतना प्यार हो गया कि मैं जहां भी जाती , सुंदर, आकर्षक, रंग-बिरंगे पैन देखती और उन्हें खरीद लेती थी। महंगे से महंगा और सस्ते से सस्ता पैन अपने पास रखना मेरी आदत में शुमार हो गया था । मुझे याद है एक बार राष्ट्रपति भवन में डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा जी के हाथ में मैंने एक खूबसूरत पेन देखा था जिससे उन्होंने मेरी पुस्तक पर हस्ताक्षर किए थे। मैं उनसे तो वह पेन नहीं मांग पाई लेकिन बाद में मैं नेपाल में एक यात्रा के दौरान मैंने वैसा ही एक पेन दुकान पर देखा ।उस समय उस पेन की कीमत 700 थी । मैंने वह पेन खरीद लिया मेरे साथ मेरे और मित्र भी थे और मेरा बेटा भी था । उन्होंने कहा इतना महंगा पहन खरीदने की क्या जरूरत है। मेरे बेटे सोनल शंटी ने मेरे जवाब देने से पहले ही उन्हें कह दिया था” अंकल शौक की कोई कीमत नहीं होती, मम्मी को सुंदर पैन खरीदने का शौक है ।”
इसी प्रकार जब एक बार श्रीमान साहब सिंह वर्मा , जो दिल्ली के मुख्यमंत्री थे उनके निवास पर एक भव्य साहित्यिक समारोह था और मैंने उन्हें अपनी एक पुस्तक भेंट की तो उन्होंने अपने जेब से मुझे एक खूबसूरत पैन निकालकर दे दिया था। वह पेन भी मेरे पास आज सुरक्षित है। इसी प्रकार पंजाब केसरी के महेंद्र खन्ना भी एक बार मेरे लिए बहुत खूबसूरत पैन लेकर आए थे। समय-समय पर गोष्ठियों में, मित्रों से मुझे बहुत सारे कलम(पैन) मिले हैं और मैंने उन्हें सहेज कर रख लिया है । हालांकि उनमें से कई मैंने उपयोग कर लिए और कई भेंट भी कर दिए हैं।
मित्रों अगर हम कलम की बात करते हैं, कलम की प्रशंसा करते हैं, कलम हमें रास्ता दिखाती है, कलम हमारे लिए भगवान के समान है तो हमें कलम से लिखे जाने वाले एक-एक शब्द को सोच विचार कर लिखना चाहिए। कलम की नोक को सदा सुनहरा और साफ रखना भी हमारा ही उत्तरदायित्व है न ?

मिलती रही मुश्किलें, आंधियां पग पग पर
कलम ने कभी भी होने नहीं बेहाल दिया।

सविता चडढा

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कलम की शक्ति सबसे अधिक शक्तिशाली है- सविता चडढा

कलम की शक्ति सबसे अधिक शक्तिशाली है- सविता चडढा

सविता चडढा, वरिष्ठ साहित्यकार को आप जानते ही हैं, पढ़िए उनके जीवन का महत्वपूर्ण अनुभव जब उन्हें कैंसर ने जकड़ लिया, उन्हीं की कलम से।

बहुत ही अद्भुत जीवन है मेरा ।

बचपन में पांच भाई बहनों में सबसे बड़ी बेटी के रूप में परिवार में रहना और मध्यवर्गीय परिवार की कठिनाइयों को देखते हुए बड़े होना । थोड़ा बड़े होने पर शिक्षा को अपना लक्ष्य बनाते हुए पढ़ाई करना और 20 वर्ष से पूर्व ही सरकारी नौकरी पा लेना । आज यह सब एक सपना सा लगता है। जीवन में बहुत ही उतार-चढ़ाव आए अगर उन सब का वर्णन करुंगी तो आप भी मेरे साथ , कई बार पहाड़ की चोटी पर चढ़ेंगे और फिर उतरेंगे ।मुझे लगता है इस प्रक्रिया में आपको बहुत थकान हो सकती है । मैं उस प्रक्रिया से आप को बचाने की कोशिश में हूं। मैं आपको केवल अपने जीवन से जुड़ा एक अनुभव बता रही हूं।
2007 में अपने बगल में एक गांठ का पता चलने के पश्चात जब उसका परीक्षण करवाया गया तो पता चला कि यह गांठ मेलिगनेंट अर्थात कैंसर युक्त है। यह सूचना बहुत डरा देने वाली थी । आप जानते हैं कि मैं डर के साथ दोस्ती करने वाली नहीं थी।‌ मैंने डर को अपने से थोड़ा दूर कर दिया और इस समस्या के समाधान में जुट गई थी। उसके लंबी प्रक्रिया का बखान भी मैं नहीं करना चाहती । आप सब जानते हैं कैंसर के बाद मनुष्य किन कठिनाइयों से खेलता है।

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अक्टूबर 2007 में राजीव गांधी अस्पताल में मेरी उस गांठ की सर्जरी हुई

कठिनाइयों से खेलने की बात पर आप हैरान भी हो सकते हैं पर कठिनाइयों से जूझना अलग बात है और कठिनाइयों से खेलना अलग बात है । जब हम किसी चीज से खेलते हैं तो उसे खेल खेल में जीत भी सकते हैं। अक्टूबर 2007 में राजीव गांधी अस्पताल में मेरी उस गांठ की सर्जरी हुई । उस समय मैं पंजाब नेशनल बैंक में वरिष्ठ प्रबंधक राजभाषा के रूप में कार्यरत थी । कई बार ध्यान में आता है अगर मैं बैंक में कार्य न करती होती तो मैं अपनी किताबों की संख्या में कुछ वृद्धि भी कर सकती थी। दूसरी ओर में सोचती हूं अगर मैं बैंक में नौकरी ना कर रही होती तो शायद इस बीमारी का इलाज कराने में मैं सफल भी नहीं हो पाती। कुछ बीमारियों को महारोग कहा गया है अर्थात इस पर खर्चा भी बहुत अधिक होता है और यह बीमारी व्यवस्थित भी बहुत मुश्किल से होती है । खैर, अपने संस्थान पंजाब नेशनल बैंक की मैं बहुत ही शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मुझे मानो नया जीवन दिया।

मित्रों जीवन है तो कठिनाइयां भी है । मैं कई बार एक उदाहरण दिया करती हूं, यदि हमें वैष्णो देवी की यात्रा करनी है तो हमारे पास दो विकल्प हैं या तो हम पैदल जाएं या हम खच्चर की सवारी करें।(यह दूसरी बात है आज तीसरा विकल्प भी विद्यमान है पर वह सभी के लिए उपलब्ध नहीं हो सकता)।
मित्रों दोनों ही विकल्पों में कष्ट है हम कौन सा कष्ट झेल सकते हैं, कितनी देर तक जेल सकते हैं ,ये हम पर निर्भर करता है और हम अपने लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं। पैदल जाएंगे तो भी रास्ते की कठिनाइयां है और यदि खच्चर पर यात्रा करते हैं तो भी अलग तरह की कठिनाइयां सामने आती हैं । जो लोग ये यात्रा कर चुके हैं उन्हें भी ये जानकारी होगी।
मैंने अपने संपूर्ण इलाज के दौरान , अपना समर्पण भगवान को और डाक्टरों को कर दिया था। आज मैं बहुत याद करने की कोशिश करती हूं तो मुझे आपको यह बताते हुए बहुत अच्छा लग रहा है कि 5 वर्ष चले अपने इस इलाज के दौरान, मुझे बिल्कुल भी किसी भी दुख या कठिनाई का एहसास नहीं हुआ । ईश्वर हमेशा ही मानो मेरे साथ साथ रहा और उसने मेरे सारे दुख बिल्कुल समाप्त कर दिए । डॉक्टरों के कहे अनुसार बस दवाई खानी पड़ी और 5 वर्ष दवाई खाने के बाद में 2012 में मेरी दवाई भी बंद हो गई। आज मैं आप सब के आशीर्वाद से बिल्कुल ठीक हूं, स्वस्थ हूं और आप जानते ही हैं ऐसा क्यों हो पाया । भगवान, डॉक्टरों के साथ साथ कलम की शक्ति मेरे पास थी, कलम की शक्ति सब शक्तियों से ऊपर है । इसने मुझे बहुत हौंसला दिया और मेरे भीतर का सारा अवसाद मानो मेरी कलम के रास्ते पिघलता रहा बाहर आता रहा।”

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आशा शैली

आशा शैली उर्दू शायरी को हिमाचल प्रदेश का एक गरांकद्र अतिया हैं

मोहतरमा आशा शैली साहिबा हिमाचल प्रदेश की कोहस्तानी बुलंदियों से अपनी ताज़ाकारी, खुश शगुफतगी, लहजे की तवानाई और शगुफ्ता बयानी के ज़रिये उम्दा उर्दू शायरी के नमूने पेश करके एक मुद्दत से दिलो-दिमाग फरहती और तस्कीन का सामान मुहैया फरमा रही हैं। इन का कलाम पढ़ कर नये रास्ते खुलते हुए महसूस होते हैं और कारी ये महसूस करता है कि वह खुली फिज़ाओं और ताजा हवाओं में साँस ले रहा है और ऐसा होना एक कुदरती अमर है। शायरी का तअलुक माहौल से है। आशा शैली हिमाचल परदेश के एक दूर अफतादह, पसमान्दा मगर खूबसूरत और कुदरती मनाज़र से मालामाल इलाके की रहने वाली हैं। बर्फ़ से ढकी हुई पहाड़ियों की फलक बर-दोष चोटियाँ, सुबक सिर नदियाँ, बरसात में भीगने हुए देवदारों के घने स्याह जंगल, दूर-दूर तक फैले हुए सिलसिला हाय कोह, पत्थरों से सर फोड़ते पुरशोर पहाड़ी नदी-नाले, नागिन की तरह बलखाती लहराती हुई शबनम आलूद पगडंडियाँ और इनसे लिपटते हुए सर सब्जी पेड़ों के साये, साँस लेती हुई जिन्दा-जावेद सबीही हाथों में हज़ार आइने लिए साफ़ शफ़ाफ़ मुतरनम झरने, रंग-बरंगे पंछियों के दिल आवेज़ कहकहे, अतरबेज़ हवायें, शामों के झुटपुटे और घरों को लौटते हुए पंछियों की लम्बी कतारें, फूलों से लदी हुई हसीन शादियाँ, मन को मोह लेने वाले कुदरती मनाज़र, सादा सरिश्त कोही मख़लूक और दूर किसी चरवाहे की बांसुरी से निकलती हुई दर्द भरी लय से गूँजती हुई घाटियाँ आशा शैली की शायरी के लिए मवाद फराहम करती हैं और इनके फिक्र की तितली के परों पर रंग बिछा देते हैं। जदीद मआशरे की तेजी से तब्दील होते हुए हालात मआशी व तहजीबी ग्लोबलाईजेशन चारहाना मादीयत और सैटलाइट मीडिया के बायस रोनुमा होने वाली तब्दीलियों ने अभी उनके दामने कोह में बसी हुई बस्ती पर यलगार नहीं दी है और उनकी शायरी पर बसों और कारखानों की चिमनियों के स्याह धुएँ की परतें नहीं जमी हैं। सच तो यह है कि आशा शैली उर्दू शायरी को हिमाचल प्रदेश का एक गरांकद्र अतिया हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वो सिर्फ हिमाचल प्रदेश ही की हैं। पंजाब की सोंधी मिट्टी के साथ भी इनका रिश्ता उस्तवार है। इन्होंने शायरी का आग़ाज़ किया है तो पंजाब के एक बुजुर्ग और क्लासिकी रंग के उस्ताद शायर जनाब रघुबीर सहाय साहिर सयालकोटी साहब मरहूम के आगे ज़ानुए तलम्मज़ता किया। जिनका यह शेर है

महफिल में जज़ीरे मिरे हुस्ने बयान के
हर शख्स पूछता है ये हज़रत कहाँ के हैं

क़िबला साहिर साहब जालन्धर के रहने वाले थे। जब तक बकैद-ए-हयात रहे, आशा शैली जी को बराबर अपने कीमती मश्विरे और इसलाह से फ़ैजयाब फरमाते रहे। जनाब जिगर जालंधरी और जनाब आर डी शर्मा तासीर साहब भी जनाब साहरि के दामने-फ़ैज असर से बाबस्ता थे। इस तरह वो मोहतरमा शैली के ख्वाजा ताश ठहरे। साहिर साहब की वफ़ात के बाद शैली पंजाब के रंगे-जदीद के नामवर शायर प्रोफेसर मेहर गेरा के दामने फ़ैज से वाबस्ता हो गयीं। मेहर गेरा साहब पंजाब की जदीद उर्दू शायरी के मैमारों में से एक हैं। इनका जिक्रे खैर आते ही उनका शेर याद आ जाना एक कुदरती अमर है,

तमाम उम्र रहा उसको अब्र का अहसास
न जाने कौन सी रुत में वो शख्स भीगा था।

आशा शैली का पंजाब की सरज़मीन के साथ तअलुक का जिक्र

आशा शैली का पंजाब की सरज़मीन के साथ तअलुक का जिक्र आ ही गया है तो ये भी अर्ज कर दूँ कि पंजाब के जिला मोगा के दो-तीन देहातों में इन की ज़मीनें थीं, जो अब ग़ालिबन इन्होंने फरोख्त कर दी हैं। पंजाब में मुनक्कद होने वाले मुशायरों में भी वो तशरीफ़ लाती रही हैं।
हाँ तो मैं ज़िक्र कर रहा था कि आशा शैली को एक तरफ़ जहाँ क्लासिकी रंग के एक उस्ताद कमाल से फ़ैजयाब होने का मौका मिला वहीं दूसरी तरफ उन्हें रंगे जदीद के एक ताबनाक चराग़ों से अपनी शायरी का चिराग़ रोशन करने का मौका मिला। इस तरह इन के कलाम में दोनों असातज़ा के रंग कलाम का हसीन अमतज़ाज मिलना एक कुदरती बात है। आशा शैली के कलाम की जदीदियत रवायत की तौसीअ ही से आलमे वजूद में आई है। मै इसे अनहराफ का नाम नहीं देता क्योंकि जदीद तरीन जदीदियत की जड़ें भी रवायत के मख़ज़ गोशों में मिल जायेंगी। वैसे भी मेरी दानिस्त में अनहराफ का तअलुक नाख़ल्फ़ी से और तौसीअ का तअलुक सआदतमंदी से है। शैली जी के कलाम में मौसम, पत्थर, शहर, धूप, जाड़ा, किरचें, रुत, जंगल, जज़ीरा वगैरह अल्फ़ाज़ का मिल जाना जदीदियत की तरफ़ उनके बढ़ते हुए कदमों की निशानदेही करता है।

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सविता चडढा और हिंदी पत्रकारिता

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हिंदी पत्रकारिता दिवस पर मुझे याद आ गया है एक नाम श्रीमती सविता चड्ढा का। जब वह हिंदी पत्रकारिता का डिप्लोमा करने के लिए एक बहुत ही प्रतिष्ठित कॉलेज में गई थी और इंटरव्यू के दौरान उन्हें बताया गया कि यहां पर केवल अंग्रेजी में ही पत्रकारिता पढ़ाई जाती है लेकिन सविता जी तो हिंदी में लिखा करती थी । हालांकि इंटरव्यू के दौरान उनके विरोध पर बाद में उन्हें उस कॉलेज में भी दाखिला दे दिया गया था। हिंदी की दशा पर उस दौरान सविता जी को बहुत ही कष्ट हुआ था और बाद उनके प्रयास के बाद एक ऐसे कॉलेज में उन्होंने दाखिला ले लिया था
जहां से वे पत्रकारिता हिंदी में कर सकती थी ।
सविता जी ने एक बहुत ही खूबसूरत बात मुझे बताई, उन्होंने कहा

” मुझे आज लगता है कि जब हम आहत होते हैं तो हमारे भीतर एक प्रकाश पुंज भी स्थापित हो जाता है । वह हमें रास्ता भी दिखा सकता है और हमें जलाकर खाक भी कर सकता है। यह व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह आहत होने के पश्चात मस्तिष्क में व्याप्त इस प्रकाश पुंज का प्रयोग कैसे करता है।”

जिन दिनों वे डिप्लोमा कर रही थी बहुत खोजने के पश्चात भी उन्हें हिंदी में पत्रकारिता पर कोई मार्गदर्शक पुस्तक नहीं मिली थी जिससे नए पत्रकार मार्गदर्शन प्राप्त कर सकें।

पत्रकारिता पर 10 पुस्तकें प्रकाशित होने की यात्रा 

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पत्रकारिता का डिप्लोमा पूरा करने के बाद सविता जी ने , परीक्षा के लिए उस समय जो भी नोटस तैयार किए थे उन सब को इकट्ठा किया और उनकी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई ” नई पत्रकारिता और समाचार लेखन ।” यह पुस्तक तक्षशिला प्रकाशन ने 1989 में प्रकाशित की थी। पुस्तक प्रकाशित होते ही उसे दिल्ली विश्वविद्यालय के पत्रकारिता पाठ्यक्रम में सहायक ग्रंथ के रूप में रख लिया गया और बाद में इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद भी श्री उमेश चंद्र बहुगुणा जी ने वर्ष 1998 में किया। ये अनुवाद भी तक्षशिला प्रकाशन ने ही करवाया था । बाद में यह पुस्तक विदेशों में भी पहुंच गई थी । 1992 में सविता जी की एक और पुस्तक प्रकाशित हुई थी तक्षशिला से जिसका शीर्षक था ” नामी उर्दू पत्रकार ।” बताते हुए बहुत अच्छा लग रहा है कि इसके बाद उनकी 1995 में पुस्तक आई “हिंदी पत्रकारिता सिद्धांत और स्वरूप “ यह पुस्तक भी समय-समय पर पुनरमुद्रित होती रही।
महावीर एंड संस से पत्रकारिता पर उनकी एक किताब “हिंदी पत्रकारिता अध्ययन और आयाम “ प्रकाशित की 2009 में। इस पुस्तक ने भी बहुत ही सम्मान और प्यार पाया। इसके बाद राज सूर्य प्रकाशन ने हिंदी पत्रकारिता पर उनकी चार पुस्तकें प्रकाशित की पहली पुस्तक, 2003 में “आजादी के 50 वर्ष और हिंदी पत्रकारिता प्रकाशित की , 2003 में ही “पत्रों की दुनिया “ , 2004 में ” इतिहास और पत्रकारिता”, 2012 में “दूरदर्शन का इतिहास और टेली फिल्में” प्रकाशित की। राज सूर्य से प्रकाशित उनकी 2 पुस्तकें भी विभिन्न विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता पाठ्यक्रम में संस्तुत हैं।
पत्रकारिता पर 10 पुस्तकें प्रकाशित होने के पश्चात सविता जी मानती है ” मुझे अब तक जो ज्ञान था, वह सब मैंने पत्रकारिता में पदार्पण करने वाले अपने उन मित्रों को दे दिया है जो पत्रकारिता में पदार्पण करना चाहते हैं। अगर मुझे कभी मौका लगा तो मैं हिंदी पत्रकारिता पर अपने जीवन के और अनुभव लिखकर एक और ग्रंथ देने का प्रयास करुंगी।”

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आपको  पत्रकारिता दिवस पर विशेष – सविता चडढा और हिंदी पत्रकारिता का विशेष साक्षात्कार  पंकज गुप्ता के द्वारा कैसा लगा, पसंद आये तो सामाजिक मंचो पर शेयर करे इससे रचनाकार का उत्साह बढ़ता है, हिंदीरचनाकर पर अपनी रचना भेजने के लिए व्हाट्सएप्प नंबर 91 94540 02444, 9621313609 संपर्क कर कर सकते है। ईमेल के द्वारा रचना भेजने के लिए  [email protected] सम्पर्क कर सकते है|

जो हार न माने, वो है- आशा/ डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र

जो हार न माने, वो है-आशा


कुंजड़िन चेन-शु-चू के अनथक परिश्रम का उदाहरण

चीन की गौरव कही जाने वाली कुंजड़िन चेन-शु-चू के अनथक परिश्रम का उदाहरण देते हुए हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने अपने एक लेख में कहा है कि मैं जब भी हिन्दी की अग्रणी लेखिका आशा शैली को देखता हूँ तो मुझे बरबस उस उद्यम साहसी, विनम्र, मितव्ययी और परोपकार की भावना से सराबोर कर्मयोगिनी का स्मरण हो आता है। जिसने स्वयं सब्जी बेच कर जरूरतमंदों के लिए पाँच करोड़ की धनराशि एकत्र कर ली थी। उन्होंने दोनों में बहुत साम्य अनुभव किया है। डॉ. मिश्र ने उन्हें ‘वन विमेन आर्मी’ कहा है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं। वे जिस जीवट के साथ बिना किसी बाह्य सहायता के अकेले दम भाषा-साहित्य के क्षेत्र में अनवरत काम कर रही हैं, वह किसी अघोषित युद्ध से कम नहीं।
हालांकि धन-संग्रह करने के मामले में तो आशा शैली की चेन-शु-चू से बराबरी नहीं की जा सकती, परन्तु इतना जरूर है कि उन्होंने साधनविहीन ग्रामीण वातावरण में रहते हुए मामूली स्तर से अपनी लेखन यात्रा प्रारंभ की और आज साठ वर्षों के बाद उनके खाते में ढेर सारी कहानियाँ, लघु कथाएँ, कविताएँ, गजलें, उपन्यास आदि के अलावा एक संपादक के रूप में असंख्य उदीयमान लेखकों और कवियों का उत्साहवर्द्धन करके उनकी प्रतिभा को सँवार-माँज कर साहित्य के क्षेत्र में राष्ट्रीय फलक पर लाने का पुण्य जरूर संग्रहीत है।

आशा शैली की हिम्मत और उनका हौसला अभी भी बरकरार है

(जो हार न माने, वो है-आशा)


आज हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, डोगरी, बांग्ला और उड़िया पर बराबर अधिकार रखने वाली आशा शैली न केवल लेखन तक सीमित हैं, बल्कि इन्होंने संपादन-प्रकाशन के क्षेत्र में भी अच्छा-खासा स्थान बनाया है। जिसके अंतर्गत यह वर्ष 2007 से हिन्दी कथा-साहित्य को समर्पित एक त्रैमासिक पत्रिका ‘शैल-सूत्र’ का नियमित प्रकाशन कर रही हैं, जिसमें नवोदित रचनाकारों के अलावा स्थापित लेखकों-कवियों की रचनाओं का भी समावेश होता है। इसके अतिरिक्त आत्मजा आरती की स्मृति को हर पल अपने ही आसपास महसूस करने के निमित्त ये ‘आरती प्रकाशन’ का भी संचालन करती हैं। इसके लिए काफी भाग-दौड़ करके इन्होंने आइ.एस.बी.एन. नंबर भी हासिल करने के बाद अब तक दर्जनों स्तरीय पुस्तकों का प्रकाशन सफलतापूर्वक किया है। ऐसा लगता है कि जीवन भर समय-समय पर कवि सम्मेलनों, साहित्यिक गोष्ठियों, परिचर्चाओं के आयोजन में इन्होंने जो आनंद लिया उसी से इन्हें आगे बढ़ने की ऊर्जा प्राप्त होती रही है। जीवन के एक कम अस्सी पड़ाव पार चुकी एकांत साधना-रत इस जीवट भरी महिला के भीतर बैठी लेखिका अभी भी पूरे दम-खम के साथ अपने सनातन धर्म का पालन करने में सक्रिय है।
मात्र चौदह वर्ष की अल्प-वय में दाम्पत्य-सूत्र से आबद्ध होने के तीन वर्ष उपरांत ही पति के साथ पाई-पाई जोड़कर परिश्रम पूर्वक हिमांचल के एक पर्वतीय गाँव में जमीन खरीद कर तैयार किये गये बाग में सेब, नाशपाती, अखरोट, प्लम, खुबानी, चेरी, बादाम आदि फल व सब्जियाँ पैदा कर लोगों को बाँटने के अलावा गाय पालने तथा तीन बच्चों की परवरिश के साथ-साथ साहित्य की अनवरत साधना में सुखानुभूति प्राप्त करना कोई मामूली काम न था। उस पर भी चालीस की वयःसंधि में पति का वियोग और फिर उसके दस वर्ष के अंतराल पर किसी वज्रपात की तरह युवा पुत्री की आकस्मिक मृत्यु का आघात इस भाव-प्रवण कवियित्री के हृदय को छलनी करने को पर्याप्त था। लेकिन धुन, धैर्य और साहस की धनी इस माँ ने प्रकृति का वह आघात भी सह लिया और बिना रुके साहित्य-साधना में लीन रही।
छठी कक्षा की पढ़ाई के दौरान पहली बार जब कुछ लिखा तो उसे सहपाठियों-अध्यापकों ने नहीं सराहा। फिर लिखी एक ग़ज़ल को दिल्ली के मिलाप ने 1960 में छापा। तब से शुरु हुई साहित्य-साधना में इनका रचना-संसार दर्जनों कहानियों के साथ-साथ ‘एक और द्रौपदी’ (काव्य संग्रह), काँटों का नीड़ (कविता संग्रह), ढलते सूरज की उदासियाँ (कविता संग्रह), प्रभात की उर्मियाँ (लघु कथा संग्रह), शज़रे तन्हा (उर्दू ग़ज़ल संग्रह), पीर पर्वत (गीत संग्रह), सागर से पर्वत तक (ओड़िया से हिन्दी में काव्यानुवाद), गर्द के नीचे (हिमाचल के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की जीवनियाँ), साहित्य भंडार इलाहाबाद से प्रकाशित दादी कहो कहानी (लोक कथा संग्रह), सूरज चाचा (बाल कविता संग्रह), हमारी लोक कथाऐं (भाग1 से 6 तक), हिमाचल बोलता है (हिमाचली कला-संस्कृति पर आधारित और किताब घर से प्रकाशित), अरु एक द्रौपदी (एक और द्रौपदी का बांग्ला अनुवाद) आदि-इत्यादि तक फैला हुआ है। एक हिमाचली दलित कन्या ‘बीरमा’ और पंजाब के एक बहुचर्चित राजपरिवार के शीर्ष पुरुष के ताने-बाने को लेकर रचा गया इनका उपन्यास ‘छाया देवदार की’ बेहद चर्चित रहा। इसके अलावा एक बाल उपन्यास ‘कोलकाता से अंडमान तक’ तथा कहानी संग्रह ‘द्वंद्व के शिखर’, चीड़ के वनों में लगी आग आदि 28 पुस्तकें उपलब्ध एवं अन्य बहुत सी पुस्तकें अभी प्रकाशनाधीन हैं। ‘आधुनिक नारी कहाँ जीती कहाँ हारी’ और स्त्री संघर्ष एक चिन्तन जैसी पौस्तकें एवं स्त्री-विमर्श को रेखांकित करने वाले अनगिनत सम-सामयिक लेख उनकी बौद्धिक प्रखरता का परिचय देते हैं। इसके अतिरिक्त विदेशों से प्रकाशित होने वाली अनेक हिंदी उर्दू पत्र-पत्रिकाओं में भी इनकी कहानियाँ सम्मानपूर्वक छपती रहती हैं।

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इस प्रकार पति के आकस्मिक परलोक गमन के दस वर्ष के अंतराल पर ही युवा पुत्री का भी अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाना, स्वर्णिम भविष्य की कल्पना से संजोये दो-दो पुत्रों के लिए बहुएँ ढूंढ कर उनके घर बसाने के बाद उनसे घनघोर उपेक्षा ही नहीं बल्कि घृणा, तिरस्कार, अपमान, आक्षेप, अपने ही बनाए घर से अपने ही पुत्रों द्वारा बेघर कर दिया जाना, फिर सिर छिपाने को एक आशियाने की तलाश में विभिन्न कस्बों, शहरों और प्रदेशों की ठोकरें खाना, पुत्रों के साथ विभिन्न न्यायालयों में मुकदमेबाजी के झंझटों के अलावा और भी न जाने क्या-क्या झेलने के बीच भी अनवरत उच्चस्तरीय साहित्य-सृजन के साथ-साथ उदीयमान लेखकों व कवियों का उत्साहवर्द्धन-मार्गदर्शन करना कोई आसान काम नहीं है।

2 अगस्त, 1942 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान में) के एक छोटे से गाँव अस्मान खट्टड़ से शुरू हुआ जीवन का सफर देश विभाजन के बाद जगाधरी, अंबाला, हल्द्वानी, खतौली, सितारगंज, लालकुआँ आदि अनेक जगहों में होते हुए निरंतर यायावरी में बीता। बीच के कुछ वर्ष हिमाचल के गाँव गौरा में घर-गृहस्थी में बीते परंतु पारिवारिक झंझटों ने शिमला के वर्किंग वीमेन हॉस्टल की शरण लेने को विवश कर दिया। जिंदगी के थपेड़ों ने आज इन्हें उत्तराखण्ड में नैनीताल जिले के एक गाँव में अनेक घर बदलते रहने के बाद किराये के एक दो कमरे वाले घर में ला पटका है। इतना सब झेलने के बावजूद भी न तो इन्होंने और न ही इनकी लेखनी ने कभी हार मानी और न विश्राम ही लिया।

मानव जीवन में दो रंग बहुत गहराई तक परस्पर घुले-मिले हैं–आशा और शैली। आशा है मनुष्य के जीने की डोर जो उसे स्वर्णिम भविष्य की उम्मीदों से बाँधे रखती है, उसकी खुली आँखों के सपनों का आधार। मानव आशाओं के पंख पर ही तो सवार होकर नित निरंतर जीवन-यात्रा पर निकल पड़ता है और उसके अंतिम छोर पर पहुँचने तक यह क्रम यूँ ही अनवरत चलता रहता है। और शैली है उसके जीने का ढंग, कला और जिंदगी के प्रति उसका अपना नजरिया। उसके अपने बनाये नियम, कायदे; जिनका वह स्वयं पालन करता है और किसी हद तक चाहता भी है कि दूसरे भी कमोवेश उनको अपनाऐं। आशा और शैली का यह मिला-जुला स्वरूप ही तो मनुष्य की अपनी पहचान है। लेकिन जब ये दोनों शब्द एकाकार हो जायें तो? एक ऐसा व्यक्तित्व उभर कर सामने आता है जिसमें जिजीविषा, हौसला, उल्लास, कठोर श्रम, सद्भाव, सेवा-सत्कार, प्रेम, करुणा, शालीनता, ज्ञान-पिपासा, जीवन को अनंत मानने वाले आध्यात्मिक चिंतन से पगा सनातनी सुरुचिपूर्ण संस्कारों के साथ-साथ नियमित जीवन-चर्या आदि का बेहतरीन सम्मिश्रण। विगत साठ सालों से साहित्य-साधना में लीन आशा शैली को उनके पाठक, मित्र और मिलने वाले सभी इसी रूप में जानते-पहचानते हैं।

एक का अस्सी की वयःसंधि में भी युवाओं सी ऊर्जा से लबरेज आशा शैली आज भी लगातार भारी अर्थाभाव के बावजूद छंद, गीत, ग़ज़ल, कविता, लघुकथा, कहानी, उपन्यास, वैचारिक आलेख आदि लिखने में स्वयं को व्यस्त रखती हैं। इनकी रचनाओं में प्रेम, भक्ति, विरह, वैराग्य, आक्रोश, व्यंग्य, हास्य आदि जीवन के हर रंग और रस का समावेश होता है। ‘शैल-सूत्र’ तथा आरती प्रकाशन से प्रकाशनार्थ आने वाली सारी सामग्री को अपने कंप्यूटर पर स्वयं टाइप करके ले-आउट, डिजायन और फिर मुद्रण आदि कार्य स्वयं करने से इनके बहुमुखी व्यक्तित्व और प्रतिभा का पता चलता है।

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इसके साथ-साथ देश भर में जहाँ कहीं से भी साहित्यिक गोष्ठी, कवि सम्मेलन, परिचर्चा आदि के लिए इन्हें बुलावा आता है, ये चल पड़ती हैं, अक्सर अपने खुद के खर्चे पर। वहाँ व्यवस्था चाहे जैसी भी हो इन्होंने सदैव आयोजकों के प्यार व सम्मान को ही तरजीह दी है।

लगभग साठ वर्षों की साहित्य-साधना और निजी जिंदगी के कष्ट-साध्य समय में आशा शैली को कभी भी किसी भी पुरस्कार के लिए लालायित नहीं देखा गया। अलबत्ता देश भर में फैले विभिन्न भाषा-भाषी अपने पाठकों, प्रशंसकों, संगठनों को लुटाया प्यार इन्हें कई गुना प्रतिफलित हुआ है। तमाम तरह के पुरस्कारों, अभिनंदन के प्रतीक चिह्नों और मानद उपाधियों के माध्यम से। जिनमें हिन्दी जगत की अनेक नामचीन संस्थाएँ भी शामिल हैं। उन्हीं ढेर सारे पुरस्कारों-सम्मानों से इनका कमरा अटा पड़ा है। विरासत में मिले गहन संस्कारों से बँधी आशा जी सैटिंग-गैटिंग और सोर्स-फोर्स-घूस-घूँसे तथा तमाम तरह के जुगाड़ों से भरे वर्तमान माहौल में ऐसा करके कोई भी पुरस्कार हासिल कर लेने को कतई गलत मानती हैं। आध्यात्मिक विचारों से भरपूर सादगी भरा इनका जीवन जरूरतमंदों को देते रहने का एक कभी खत्म न होने वाले सिलसिले की तरह है। फिर ऐसी कर्मयोगिनी किसी से कुछ लेने के विषय में तो सोच भी नहीं सकती।
संयोग-वियोग, हर्ष-विषाद, सुख-दुःख, लाभ-हानि और भी न जाने कैसे दृश्य मानव जीवन का अभिन्न अंग रहे हैं और आगे भी रहेंगे। यह क्रम निरंतर जीवन-यात्रा में आता रहता है; लेकिन धीरमति, स्थितप्रज्ञ व्यक्ति इनसे सदैव अप्रभावित रहते हुए अपना कर्म करने में जुटे रहते हैं, बल्कि रुकावटों, कष्टों और संघर्षों को वे और भी अधिक शक्ति-अर्जन का अवसर जान उल्लासपूर्वक आगे बढ़ते रहते हैं। यही वह सद्गुण आशा शैली में है जो उन्हें हर समस्या से पार पाने और आगे बढ़ने में सहायता करता है। शालीनता, ज्ञान-पिपासा, वाक्पटुता और व्यवहार-कौशल से भरपूर आशा जी के उदारमना अति अनुकरणीय व्यक्तित्व में एक विचित्र आकर्षण है, जिससे पहले ही संपर्क में व्यक्ति आबद्ध हो जाता है।
देश के अग्रणी लेखक डॉ. राष्ट्रबंधु ने आशा शैली के सम्बंध में लिखा है़ ‘वह अंदर से चाहे जितनी कमजोर और निराश हों लेकिन उनके अधरों पर सदा मुस्कान खेलती है। उनमें कहीं भी अबला की कोई शिथिलता नहीं दिखाई देती… बहुत बहादुर औरत हैं आशा जी, गज़ब की हिम्मत है उनमें।’
आशा शैली की हिम्मत और उनका हौसला अभी भी बरकरार है जैसे वे अभी-अभी युवावस्था की दहलीज पर खड़ी जीवन के अनंत संघर्षों को मुस्कराते हुए झेलने को तत्पर हों पूरी जिजीविषा के साथ। वे अभी भी साहित्य-साधना के नये सोपानों की ओर अग्रसर हैं। थकना-हारना तो जैसे वे जानती ही नहीं। लगता है इन्होंने अपने नाम को सार्थक बनाते हुए यह जीवन-मंत्र अपना लिया है, ‘जो हार न माने वो है आशा’।


डॉ बुद्धिनाथ मिश्र
देहरादून

आपको जो हार न माने, वो है-आशा/ डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र का लेख कैसा लगा , पसंद आये तो समाजिक मंचो पर शेयर करे इससे रचनाकार का उत्साह बढ़ता है।हिंदीरचनाकर पर अपनी रचना भेजने के लिए व्हाट्सएप्प नंबर 91 94540 02444, 9621313609 संपर्क कर कर सकते है। ईमेल के द्वारा रचना भेजने के लिए  [email protected] सम्पर्क कर सकते है|